धर्म का स्वरूप, धर्म और संस्कृति, धर्म और राष्ट्र, तथा धर्म और विज्ञान

भारतीय संस्कृति संसद, कोलकाता में जनवरी, २००५ में आयोजित स्वर्ण जयन्ती समारोह के अवसर पर संसद ने एक पत्रक के माध्यम से धर्म का स्वरूप, धर्म और संस्कृति, धर्म और राष्ट्र तथा धर्म और विज्ञान विषय पर महाराजजी ने जो सुझाव दिया, उसे विशेष रूप से सभी पाठकों के लिए यथावत प्रस्तुत किया जा रहा है।

* धर्म का स्वरूप :- धर्म-संगोष्ठी के लिए निर्धारित प्रथम सत्र के विवेच्य विषय ‘धर्म का स्वरूप’ विषय में पत्रक में लिखा गया है- ‘‘भारत राष्ट्र की आत्मा धर्म है। यह धर्म सनातन धर्म कहा जाता है। सनातन का अर्थ है, जो शाश्वत है अथवा जो अनादि और अनन्त है। सनातन धर्म का सार यह है कि सारे विश्व में एक ही शाश्वत सत्य है जिसे वेदान्त या उपनिषदों ने ब्रह्म कहा है। यही ब्रह्म परमसत्य है। यह विश्व ब्रह्माण्ड उसी ब्रह्म से निकला है और उसी में विलीन हो जाता है। यह क्रम सृष्टि और प्रलय कहा जाता है। मनुष्य-योनि इस ब्रह्म को अनुभव करने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।’’

धर्म की जो उपर्युक्त परिभाषा दी गई है, धर्म की विशुद्ध परिभाषा कही जा सकती है; किन्तु वर्तमान में धर्म की यह परिभाषा कितना लोग जानते हैं? कदाचित् भारत के एक प्रतिशत लोग भी इस परिभाषा को नहीं जानते। अधिकांश लोग सनातन का एक भिन्न अर्थ लेते हैं कि परम्परागत सदाचार-संहिता हमारे विचारशील ऋषियों-मुनियों की बनायी हुई कही जाती है और आज के अधकचरी बुद्धिवालों को उन परम्पराओं, रूढ़ियों, विवाह या खान-पान के नियमों में परिवर्तन करने का दुस्साहस नहीं करना चाहिए। परम्परा से चले आ रहे ये नियम ही सनातन हैं।

वर्तमान में भारत अस्पृश्यता, भेदभाव तथा एक दूसरे के प्रति भयंकर घृणा से आक्रान्त है। अधिकांश लोग भ्रातृत्व समानता और सद्व्यवहार के लिए आहें भर रहे हैं। अभी कुछ ही दिन पहले जोधपुर में हरिजनों को मन्दिर में नहीं जाने दिया गया। भगवान क्या किसी जाति, वंश या कबीले की बपौती है?

रामायण का परिशीलन करने से विदित होता है कि भगवान राम ने सवर्णों का उद्धार नहीं किया। उन्होंने गले लगाया हरिजनों को; हरिजनों से भी जो हीन माने जाते हैं उन करोड़ों-अरबों आदिवासियों, जन-जातियों का ही उन्होंने उद्धार किया।

गोस्वामी तुलसीदासजी की रामचरित मानस में है कि भगवान के राज्याभिषेक के अनन्तर कुल-पुरोहित महर्षि वशिष्ठ भगवान राम के पास पहुँचे और निवेदन किया कि पौरोहित्य कर्म अत्यन्त निकृष्ट है- उपरोहित्य कर्म अति मन्दा। बेद पुरान सुमृति कर निन्दा।। जब न लेउँ मैं तब विधि मोही। कहा लाभ आगे सुत तोही।।(७/४७/६) ‘‘भगवन्! पुरोहिती का कर्म बड़ा निकृष्ट है। वेद, पुराण, स्मृति सभी इसकी निन्दा करते हैं। मैं यह पद ग्रहण नहीं कर रहा था; किन्तु विधाता ने समझाया कि पुत्र! यह जिम्मेदारी ले लो, तुम्हें इससे लाभ है। इसी कुल में राम का जन्म होनेवाला है, उनसे तुम्हारा उद्धार हो जायेगा। अतः अब आप मुझे अपने चरणों की अविरल भक्ति प्रदान करें।’’ अब जिन गुरु की गोद में राम पले, बढ़े, पढ़ना-लिखना सीखा, धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना सीखा, उनसे कैसे तथास्तु कहते? भगवान मौन ही रहे। वशिष्ठ ने सादर चरणों की वन्दना की और चले गये। ‘मौनं सम्मति लक्षणम्’ माना जाय तब भी केवल एक सवर्ण का उद्धार भगवान् राम द्वारा पाया जाता है, वह भी तब जब वे चरणों में गिरे। आज कुछ लोग कहते हैं कि अवर्ण मन्दिर में न जायँ।

मन्दिर में बैठकर कब किस महात्मा ने सिद्धि पायी है? भगवान राम जब अयोध्या में थे, उन्हें एक सन्त विश्वामित्र मिले। वह भी जंगल से आये थे और राम को जंगल में ही ले गये, उनके यज्ञ की रक्षा हुई। वनवासकाल में भगवान राम का पहला पड़ाव प्रयाग में पड़ा (श्रृंगवेरपुर में)। उस समय वह स्थान घनघोर जंगल था। उन्हें भरद्वाज ऋषि, महर्षि अत्रि, वाल्मीकि, सरभंग, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य, शबरी आदि मुनियों के आश्रम मिले- सब के सब जंगल में मिले। ऋषियों के यहाँ कथा-वार्त्ता थी, चिन्तन था; मन्दिर तो किसी के पास नहीं था। मन्दिर में बैठकर कब, किसने मुक्ति पायी? कहते हैं, मन्दिर में दर्शन करने मत जाओ।

मन्दिर अनावश्यक नहीं हैं। मंदिरों में हमने अपने पूर्वजों, उन महान् विभूतियों की स्मृतियाँ सँजोयी हैं, जो हमारे आदर्श रहे हैं। हमारे आदर्श जीवित हैं तो हम भी जीवित हैं, मन्दिर इसलिए आवश्यक हैं। यहाँ तक तो ठीक है; किन्तु भगवान सबके हैं न कि केवल सवर्णों के।

भगवान ने जो लीलायें कीं, जिनके बीच रहे अधिकांशतः ‘शिड्यूल्ड कास्ट-शिड्यूल्ड ट्राइब्स’ (अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति) के थे। वे अधम से अधम प्रजाति के थे। अधम ते अधम अधम अति नारी।शबरी थी। (मानस, ३/३४/३) बानर अधम थे, निशाचर अधम थे। गीध अधम खग आमिष भोगी। (मानस, ३/३२/२) कोल-भील अधम थे। इन्हीं सबका उद्धार करने में राम ने अपना जीवन व्यतीत कर दिया। राम ने इन सबको गले लगाया। यह हमारा गौरवशाली इतिहास है। उन महान् विभूति का मंदिर तो बनना ही चाहिए। जीते-जी भगवान ने उनके फल-फूल खाये लेकिन जब कालान्तर में उनका स्मारक सँजोया गया तो पुरोहित कहते हैं- वे मंदिर में न जायँ। जिनका उद्धार भगवान ने किया वे जातियाँ न जायँ। क्या कह रहे हैं ये लोग? एक भयंकर भ्रान्ति समाज में व्याप्त है।

आज आप धर्म की विशुद्ध परिभाषा देना चाहते हैं; किन्तु अभी तक भारत में जो धर्म प्रचलित है एक भयंकर खारे समुद्र की तरह लहरें मार रहा है। सबके हृदय में आज भी छुआछूत है। मंदिर-प्रवेश को लेकर निषेध है, तालाब और कूप के जल पर निषेध है। हीन भावना की चक्की में पूरा भारत पिस रहा है, हर गाँव सुलग रहा है। घोड़ी (पलवल), हरियाणा में अपना एक आश्रम है। वहाँ पेयजल की एक टंकी बनी। उसमें जल पीने की टोंटियाँ लगी थीं। कुछ लोगों ने सूचना दी, ‘‘महाराज! गजब हो गया। डुमार ने टोंटी छू दिया।’’ हमने कहा, ‘‘तो क्या हुआ? पवित्र करनेवाला मंत्र पढ़ लो।’’ यह ज्वार कहाँ से आया? किसने पढ़ाया यह धर्म? हर हृदय में, करोड़ों की संख्या में जो हिन्दू समुदाय है उसके हृदय में ये लहरें उठा करती हैं। इन लहरों का स्रोत क्या है, पहले उसे बन्द करें, इसके पश्चात् धर्म की विशुद्ध परिभाषा दें, तभी आप सफल हो सकेंगे।

गीता-प्रसारण से पूर्व अर्जुन भी ऐसी ही एक भ्रान्ति में आकण्ठ डूबा था और उस भ्रान्ति को ही शुद्ध सनातन धर्म मान रहा था। उसने कहा, ‘‘गोविन्द! कुलधर्म सनातन है, जातिधर्म शाश्वत है। ऐसा युद्ध करने से सनातन धर्म लुप्त हो जायेगा। कुल की स्त्रियाँ दूषित होंगी, वर्णसंकर पैदा होंगे। वर्णसंकर कुल और कुलघातियों को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। ऐसे युद्ध से पितर लोग गिर जायेंगे, पिण्डोदक क्रिया लुप्त हो जायेगी। गोविन्द! हमलोग समझदार होकर भी महान् पाप करने को उद्यत हुए हैं। क्यों न हमलोग इससे बचने का उपाय करें।’’ उसने एक आक्षेप भगवान श्रीकृष्ण पर भी लगाया कि हम-आप समझदार होकर भी ऐसा कर रहे हैं। धनुष फेंककर, अश्रु बहाते हुए रथ के पिछले भाग में वह बैठ गया। बोला, ‘‘केशव! ये शस्त्रधारी कौरव मुझे मार ही क्यों न डालें, मैं कदापि युद्ध नहीं करूँगा; क्योंकि इससे सनातन धर्म का लोप हो जायेगा।’’ एक धार्मिक भ्रान्ति ने अर्जुन को मौत के मुँह में धकेल दिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने हँसते हुए से कहा, कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। (गीता, २/२) तुझे इस विषम स्थल में अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हो गया? उसने तो सनातन धर्म का नाम लिया था; किन्तु उसे भगवान ने संज्ञा दी, ‘‘अज्ञान कैसा?’’ उसकी मान्यताओं के सन्दर्भ में भगवान ने कहा कि न यह कीर्ति बढ़ानेवाला है, न कल्याण करनेवाला है और न पूर्व के महापुरुषों ने भूलकर भी इसका आचरण किया। ‘अनार्यजुष्टम्’- यह अनार्यों का आचरण तूने कहाँ से सीख लिया?

जिसमें कीर्ति नहीं, कल्याण नहीं, श्रेष्ठ महापुरुषों ने भूलकर भी जिसका आचरण नहीं किया, सिद्ध है कि वह अज्ञान है। अर्जुन हतप्रभ रह गया कि अब तक जिसे वह सनातन धर्म मान बैठा था, वह अज्ञान निकला। तब उसने समर्पण किया और कहा, ‘‘गोविन्द! यह सब अज्ञान है तब आप ही बतायें कि सत्य क्या है? धर्मसम्मूढचेता– धर्म के मार्ग में मैं विशेष रूप से मूढ़चित्त हूँ, अब आप ही बताइये।’’

पहले भगवान ने उसकी भ्रान्तियों का निवारण किया। उसकी कमियाँ बतायीं, निवारण किया तभी उन्होंने सत्य बताया। इसलिए धर्म का विशुद्ध रूप जन-जन तक प्रसारित करने से पूर्व धर्म के नाम पर जो कुरीतियाँ फैली हुई हैं, पहले उनका निवारण करें। पात्र जब रिक्त हो जाय, हृदय माँग करे तभी धर्म का निर्देश करें। धर्म बताने से भी पहले धर्मशास्त्र दें जिसे वे स्वयं पढ़ सकें, अपने घर में रहकर स्वयं समझ जायँ, आपको पढ़ाना न पड़े।

प्रश्न है कि धर्म के प्रचार-प्रसार के व्यावहारिक उपाय क्या हो सकते हैं? हमारा सुझाव है कि धर्म के प्रचार से पूर्व यह अन्वेषण करें कि धर्म के नाम पर प्रचलित भ्रान्तियाँ कहाँ से आयीं? कितने समय से आयीं और क्यों आयीं? विश्लेषण से आप पायेंगे कि इनकी जड़ केवल स्मृतियाँ हैं। स्मृतियों की संख्या लगभग १६४ है। इनका लेखन प्रथम ईस्वी शताब्दी के आस-पास आरम्भ होता है। सातवीं शताब्दी तक ये भली प्रकार प्रकाश में आयीं, प्रशासन में इन्हें स्थान मिला। वैसे इनमें से कुछ सोलहवीं शताब्दी तक लिखी जाती रहीं। भेद-भाव और छुआछूत के लिये काफी हद तक ये स्मृति-लेखक जिम्मेदार हैं।

इन स्मृतिकारों ने ही प्रतिबंध लगाया है कि गीता घर में न रखें। ऐसा इसलिए कि गीता के होते हुए कोई मनुष्य-मनुष्य में फूट डाल ही नहीं सकता। गीता में भगवान कहते हैं कि- ‘मनुष्य मेरा विशुद्ध अंश है।’ उतना ही पवित्र जितना भगवान। कैसे डालेंगे फूट?

इस स्मृतियों का सृष्टि-प्रकरण देखें। इनमें लिखा है कि सरस्वती और दृषद्वंती नदियों का मध्यवर्ती भाग देवताओं का बसाया ब्रह्मावर्त देश है। यह दोनों पांचाल, शूरसेन अर्थात् मथुरा-ये ब्रह्मर्षि देश हैं जो ब्रह्मावर्त से कुछ कम महत्व के हैं। सरस्वती नदी से पूर्व, प्रयाग से पश्चिम हिमालय और विन्ध्य पर्वत के मध्य के भू-भाग को मध्यदेश कहते हैं। पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्रपर्यन्त हिमालय और विन्ध्य के मध्यवर्ती क्षेत्र को पण्डितों ने आर्यावर्त कहा है अर्थात् काशी के समीप मिर्जापुर में जो विन्ध्याचल है वहाँ से लेकर हिमालय की घाटी के बीच का भू-भाग आर्यावर्त है, जहाँ काले हिरण कुलाँचें भरते हैं। यह यज्ञ-योग्य प्रदेश है। इससे भिन्न बंगाल, मद्रास, कलिंग इत्यादि म्लेच्छ देश, अधम-अभागों का देश है। द्विजों को प्रयत्नपूर्वक आर्यावर्त में ही रहना चाहिए। जीवन पर संकट आने पर शूद्र किसी भी देश में रह सकते हैं। इस प्रकार सृष्टि उत्पत्ति प्रकरण संक्षेप में पूर्ण हुआ।

स्मृति में वर्णित इन विधाता को यह भी ज्ञात नहीं है कि हिमालय के आगे चीन है, समुद्र के पार अफ्रीका इत्यादि महाद्वीप हैं। मृग के अतिरिक्त कंगारू इत्यादि जीव भी सृष्टि में हैं। मात्र उपर्युक्त वर्णन कर उन्होंने घोषित कर दिया कि सृष्टि-प्रकरण पूर्ण हुआ। जहाँ तक यह लोग पैदल यात्रा उस युग में कर सकते थे, वहाँ तक का वर्णन इन स्मृतियों में पाया जाता है। क्या इतनी ही सृष्टि है जितना कि इन स्मृतियों में वर्णित है?

सृष्टि का ऐसा ही विवरण कविकुल गुरु कालिदास के महाकाव्य रघुवंश में भी देखने को मिलता है। महाराज रघु त्रिलोक विजय अभियान में निकले तो आसाम की ओर गये। वहाँ विजय प्राप्त की। वहाँ के पेड़-पौधों का वर्णन मिलता है। वहाँ से वे बंगाल-उड़ीसा होते हुए मद्रास आ गये, जहाँ काली मिर्च और काजू के वृक्षों का उल्लेख है। तत्पश्चात् गुजरात, कच्छ, राजस्थान का मरुस्थल, सिंधु नदी पार करते वे कश्मीर और बद्रीनाथ के उत्तुंग पर्वत शिखरों पर चढ़ गये। वहाँ की जनता ने देखा कि शाल वृक्षों के छिलके बहुत ऊँचाई पर रघु की हाथियों की रगड़ से छिल गये थे। वे हाथी ऐरावत नस्ल के जो थे।

तत्पश्चात् महान् प्रतापी महाराज रघु ने एक बाण पाताल में मारा तो वहाँ का राजा बलि रक्षा और शरण की याचना करने लगा। एक बाण उन्होंने ऊपर की ओर मारा तो इन्द्र ने हाथ जोड़ लिया। इस प्रकार त्रिलोक विजय कर उन्होंने खड्ग रख दिया। छः महीने पश्चात् त्रिलोक विजय अभियान में कैदी राजाओं को जब मुक्त किया गया तो इतने राजाओं ने रघु के चरणों में प्रणाम किया कि उनके मस्तक के चन्दन के घर्षण से रघु के पैरों की अँगुलियाँ गोरी हो गयीं (प्रतीत होता है रघु का रंग श्याम था)। इस प्रकार त्रिलोक विजय पूर्ण हुआ। रघुवंश महाकाव्य और मनुस्मृति का सृष्टि प्रकरण इतना ही है।

सभी स्मृतियों में मनु के नाम से प्रचारित ‘मनुस्मृति’ सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है तथा सभी स्मृतियों में इसे प्राचीन माना जाता है। इस स्मृति का प्रणयन किसने किया, यह कहना कठिन है; किन्तु इतना तो निर्विवाद है कि मानव के आदि पूर्वज राजर्षि मनु ने इसका प्रणयन नहीं किया है क्योंकि इस स्मृति में वेद, आरण्यक, वेदांगों, अत्रि-गौतम-भृगु-वैखानस-वशिष्ठ इत्यादि स्मृतिकारों का संकेत है। ‘केचित्’, ‘अपरे’, ‘अन्ये’ कहकर अन्य लेखकों के मतों का संदर्भ है तथा ‘वेद बाह्याः स्मृतयः’ कहकर सम्भवतः भारतीय नास्तिक दर्शनों की ओर भी संकेत किया गया है। इस स्मृति में यवन, कम्बोज, शक, पहलव तथा चीन आदि के नाम हैं जिनका उल्लेख सम्राट अशोक के शिलालेख में है। (आदि मनु के समय में सृष्टि में इतनी जातियाँ, मत-मतान्तर, इतनी स्मृतियाँ थीं क्या?) गीता-जैसे मानव धर्मशास्त्र के होते हुए भी इस स्मृति में है कि धर्मशास्त्र तो स्मृतियाँ हैं- श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः।(मनु., २/१०)

इस स्मृति के प्रणेता ने अपना नाम क्यों छिपा लिया, इस सम्बन्ध में क्या कहा जाय? किन्तु यह कहा जा सकता है कि ग्रन्थ को प्राचीन और प्रामाणिक बनाने के लिए ही उन्होंने सृष्टि के आदिपूर्वज राजर्षि मनु के नाम से इसे प्रचारित किया।

ज्योतिष के अनुसार भारत में जातक के नामकरण में राशि, नक्षत्र और उसके चरण के अनुसार नियत अक्षरों के उपयोग की परम्परा है। स्मृति के अनुसार जन्म के बारहवें दिन नामकरण के अवसर पर ब्राह्मण का नाम मंगलसूचक, क्षत्रिय का बलसूचक, वैश्य का धनसूचक और शूद्र का नाम घृणासूचक रखा जाय। उदाहरण के लिए आद्यक्षर ‘क’ आया तो ब्राह्मण बालक का नाम ‘करुणाकरण’, क्षत्रिय बालक का नाम ‘कृतान्त सिंह’, वैश्य बालक का नाम ‘करोड़ीमल’ और शूद्र बालक का नाम ‘कतवारु’ रखें। जिससे सृष्टि में ये बालक कहीं भी अपना नाम सुना दें तो सुननेवाला उसकी जाति समझ जाय और निश्चय कर ले कि इसके साथ कैसा व्यवहार करना है। स्मृतियों की मान्यता है कि ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण और पाँव से शूद्र उत्पन्न हुए इसलिए ब्राह्मण पवित्र है, श्रेष्ठ है; किन्तु गीता का उद्घोष है कि विधाता और उससे उत्पन्न सृष्टि नश्वर है- आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।।(८/१६) स्वयं सृष्टि के रचयिता विधाता, उनसे उत्पन्न यावन्मात्र जगत् पुनरावर्ती स्वभाववाला मरणधर्मा है और दुःखों की खान है। अब कोई ब्रह्मा के मुख से जन्मा हो चाहे पैर से, है तो मरणधर्मा, दुःखों की खान। इसमें श्रेष्ठता क्या है? यह हजार-दो हजार वर्षों से स्मृतियों द्वारा मानव-मानव के बीच डाली हुई दरार है। इसी से अधिकांश भारतीयों का हृदय दिन-रात उबलता रहता है। आप दस व्यक्तियों को सच समझाने का प्रयास करते हैं, जबकि करोड़ों भ्रान्तियों के करोड़ों अध्यापक प्रचार में लगे हैं कि छुआछूत बनाये रखो। भ्रान्तियों के ऐसे प्रचारक जन्म के अवसर पर, विवाह समारोहों में तथा अन्त्येष्टि में घर-घर पहुँचकर वही बता रहे हैं जो उन्हें पढ़ाया गया है। पहले उनके भ्रम का निवारण करें।

मनुस्मृति में है- शुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः।(मनु. २/१०), जबकि आदि शंकराचार्य ने गीता को ही स्मृति कहा है। आदिमनु को विरासत में सूर्य से मिलनेवाला शास्त्र गीता है। (गीता, ४/१) सूर्य ने अपने पुत्र मनु से कहा, दिया कुछ नहीं केवल कथन किया। पूर्वजों का मस्तिष्क इतना ग्रहणशील था कि जो कुछ कहा गया उन्होंने स्मृति में धारण कर लिया। प्राचीन भारत में श्रुतिधरों ने श्रुतज्ञान को सदा जीवित रखने के लिए स्मृति की परम्परा चलायी। उसी परम्परा में मनु ने इक्ष्वाकु से कहा और वही गीता-ज्ञान इक्ष्वाकु से राजर्षियों ने जाना। उस ज्ञान का लोप हो गया था जिसे भगवान श्रीकृष्ण पुनः प्रकाश में लाये।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, ‘‘अर्जुन! योग अविनाशी है। अतः गीता-ज्ञान कभी नष्ट तो नहीं होता; किन्तु मनुष्य उसे भूल अवश्य गया। उसी विस्मृत ज्ञान को मैं तेरे प्रति कहने जा रहा हूँ; क्योंकि तू मेरा भक्त है, प्रिय सखा है।’’ अंत में भगवान ने पूछा, ‘‘अर्जुन! क्या तूने मेरा कथन एकाग्रचित्त होकर श्रवण किया?’’ अर्जुन बोला, ‘‘गोविन्द! मेरा मोह नष्ट हुआ। मैं स्मृति को प्राप्त हुआ हूँ।’’ यही है मनुस्मृति गीता। गीता ही वास्तविक मनुस्मृति है, सृष्टि का आदि धर्मशास्त्र है।

इसके पश्चात् वृद्धावस्था में राजर्षि मनु ने एक प्रलय देखा। जब प्रलय का दृश्य शान्त हुआ, मनु ने सृष्टि को व्यवस्थित करना चाहा तब भगवान ने उन्हें दर्शन दिया, चार वेद दिये और कहा कि मनुष्य इसे सुने, इससे उनका हित होगा। महाराज मनु ने उसका नामकरण ‘श्रुति’ किया। इसके अतिरिक्त मनु के समक्ष कुछ उतरा नहीं तो इस गीता-ज्ञान से भिन्न मनु ने कह कहाँ से दिया? इसलिए उनके नाम से प्रचारित स्मृति उनके द्वारा कही हुई नहीं है।

विशुद्ध मनुस्मृति गीता है, जिसे योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः प्रकाशित किया। परमात्मा के श्रीमुख की वाणी गीता को सर्वसम्मत शास्त्र का सम्मान पहले से ही प्राप्त है। धर्मशास्त्र के रूप में यह विस्मृत हो चली है, इसे पुनः प्रकाश में लायें, घर-घर इसे पहुँचायें। अभी तक भारत के राष्ट्रीय ग्रन्थ का निर्धारण नहीं हो पाया है, अन्तर्राष्ट्रीय ग्रन्थ का भी स्थान रिक्त है। हम सबको मिल-जुलकर घोषित करना चाहिए कि भारत का मूलशास्त्र श्रीमद्भगवद्गीता है। आर्यों का, सनातनधर्मियों का, मानवमात्र का मूलशास्त्र यही है।

मनु, याज्ञवल्क्य और पाराशर के नाम से प्रचलित स्मृतियों में इन महापुरुषों के विचार नहीं हैं। ये स्मृतियाँ मध्यकालीन तथा अर्वाचीन छोटे-छोटे स्टेटों में, स्थानीय नरेशों के राज्यों में प्रचलित कानून संहिताएँ थीं। तत्कालीन सामाजिक व्यवस्थाओं के उपयोगी अवशेष इनमें हो सकते हैं; किन्तु वर्तमान कानूनों के स्रोत के रूप में इनका उद्धरण देने से ये महिमामंडित हो जाती हैं, जबकि विषमतामूलक अनेक गर्हित व्यवस्थाएँ भी इनमें देखी जा सकती हैं। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय संविधान की अनेक व्यवस्थाएँ स्मृतिप्रदत्त व्यवस्थाओं के विरोध में हैं, अतः स्मृतिजन्य व्यवस्थाओं से चिपके रहने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। धर्म के प्रचार-प्रसार से पहले भ्रान्तिवाली इन किताबों को न्यायालयों से, जन-मानस से हटा दें, भ्रान्तियों का उन्मूलन कर दें और भगवद्गीता प्रसारण में दे दें। जहाँ मूल सुधरा, पत्र-पुष्प-फल जैसे सभी कार्य स्वतः सही रूप में होने लगेंगे। धर्म क्या है? सत्य क्या है? इसका पालन कैसे करें? इन समस्त शंकाओं का समाधान श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य ‘यथार्थ गीता’ है।

आपकी जिज्ञासा है कि धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए वेदान्त के सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार के व्यावहारिक उपाय क्या हो सकते हैं? वेदान्त आदि शंकराचार्य जी के पश्चात् गठित सम्प्रदाय है और कोई भी सम्प्रदाय, सर्व-सम्प्रदाय समन्वय का आदर्श प्रस्तुत नहीं कर सका है। प्राचीन भारतीय साहित्य को लिपिबद्ध करने का पहला श्रेय महर्षि वेदव्यास को है। चारों वेद, भागवत, महाभारत, ब्रह्मसूत्र और महाभारत भीष्मपर्व के अन्तर्गत उल्लिखित गीता उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। भागवत भगवान का लीलामृत है, रोचक है, प्राथमिक प्रेरणा-स्रोत है, इसलिए उन्होंने शिष्यों को भागवत पढ़ाया। गीता तो पूरी साधना है, यह प्रस्थानत्रयी का भी आधार-ग्रन्थ है। भगवान वेदव्यास ने इसे ही शास्त्र की संज्ञा दी है। इसलिए धर्म-प्रचार के लिए किसी सम्प्रदाय का नाम न लेकर आपको सर्वमान्य एक शास्त्र देना होगा। नया कुछ लिख नहीं देना है, आपके पास लिखा-लिखाया पुरातन शास्त्र गीता है। इसे आप राष्ट्रीय धर्मशास्त्र के रूप में मान्यता दें, दिलायें, घर-घर इसकी सरल व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ पहुँचायें। इससे कुरीतियों, भ्रान्तियों का निवारण तथा धर्म की पुनर्स्थापना हो सकेगी।

* धर्म और संस्कृति :- अपने नाम तथा गौरव के अनुरूप ही इस संसद ने संस्कृति की यथार्थ अवधारणा प्रस्तुत की है साथ ही वर्तमान परिवेश में संस्कृति पर आ रही त्रासदी की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। वस्तुतः धर्म, साहित्य, कला, विज्ञान, संगीत इत्यादि क्षेत्रों में युगों की उपलब्धियाँ संस्कृति के अन्तर्गत आती हैं, किन्तु धर्म निःसन्देह संस्कृति का प्राण है। इस धर्म की अवधारणा धूमिल होने से ही संस्कृति में विकृति आ रही है।

सः का अर्थ है वह परमात्मा। यही उद्दालक ऋषि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को समझाया, तत्त्वमसि– तुम वही हो। कृति का अर्थ है कार्य। जब कृति परमात्मा से संयुक्त होकर संचालित होती है तब संस्कृति कहलाती है।

रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा, रीति-रिवाज, प्रथा-परम्परा सभ्यता के अंग हैं, जो देश-काल तथा परिस्थितियों के अनुरूप बदलते ही रहते हैं; किन्तु धर्म से अनुप्राणित संस्कृति शाश्वत है क्योंकि धर्म शाश्वत है। इसलिए धर्मविहीन संस्कृति केवल बाह्य आचरण और सभ्यता में सिमटकर विकृत हो रही है।

महाभारत के सभापर्व में है कि महिष्मतीपुरी में स्त्रियाँ स्वच्छन्द मैथुन जीवन व्यतीत करती थीं। पूर्वज ऋषियों ने एक पति-एक पत्नी की व्यवस्था दी, विवाह के माध्यम से। इस व्यवस्था को स्थिर करने के लिए उन्होंने धर्मशास्त्र को, एक परमात्मा को साक्षी बनाया, ज्योतिर्मय परमात्मा के प्रतीक अग्नि को साक्षी बनाया, एक व्यवस्था दी। इसी प्रकार पूर्वजों ने जीवन के हर क्रिया-कलाप को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया और उसे एक परमात्मा से जोड़ा। मित्र-मित्र के प्रति भाव, भाई-भाई के प्रति भाव, पड़ोस, समाज और देश के प्रति भाव, अर्थात् जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रवेश करते समय परमात्मा के स्मरण का विधान बनाया- इसका नाम है संस्कृति।

महाभारत का ही एक अन्य प्रसंग लें। अर्जुन पितामह भीष्म की गोद में बैठे थे। पितामह ने कहा, ‘‘अर्जुन! आज शस्त्र-पूजा होगी।’’ अर्जुन ने प्रश्न किया, ‘‘तातश्री! क्या शस्त्र भगवान हैं जो उनकी पूजा होगी?’’ पितामह बोले, ‘‘नहीं रे पगले! पूजा तो भगवान की ही होगी। हाँ, इस उद्देश्य से होगी कि वे हमें शस्त्र-कौशल में पारंगत कर दें।’’ यही कारण है कि भारत में किसान भी हल जोतने से पूर्व हल को नमन करता है, गद्दी पर बैठने से पूर्व सेठ उसे प्रणाम करता है, अखाड़े में जाता हुआ पहलवान मिट्टी के ढेर का स्पर्श करता है, जिसका आशय मात्र इतना ही है कि हम कार्य करने से पूर्व उस परमतत्त्व परमात्मा का, जो सत्य है, नित्य है स्मरण कर लें। भगवान के स्मरण के बिना भारत में कोई कार्य होता ही नहीं। यही है भारतीय संस्कृति!

भगवान को जिस तरीके से स्मरण करना है वह गीता के अनुसार एक परमात्मा का स्मरण है; किन्तु जब से स्मृतियों की धाँधली आयी तब से लोग भूत-भवानी, असंख्य देवी-देवता, पता नहीं किस-किसका स्मरण करने लगे। यह देन भी स्मृतियों की है। संस्कृति को भी यदि सुधारना है तो आपको एक शास्त्र, एक सत्य देना ही होगा।

यह तथ्य सुविदित है कि हर स्टेट का अलग-अलग देवता है। उदाहरण के लिए, चित्तौड़ के देवता एकलिंग जी, जोधपुर की चामुण्डा देवी, बीकानेर की करणी देवी, गहरवार क्षत्रियों की गड़बड़ा देवी। इन अनन्त देवी-देवताओं में भटका हुआ भारत! इन सबकी जड़ में स्मृतियाँ हैं। स्मृतियों में लिखा है कि देवताओं की पूजा करें। ब्राह्मण चाहे तो देवताओं को घटा सकता है, बढ़ा सकता है (अर्थात् देवता काल्पनिक हैं) इसलिए ब्राह्मण सर्वोपरि देवता है।

गत दो हजार वर्षों की अवधि में चक्रवर्ती सम्राटों को भी ज्ञात नहीं था कि जिस व्यवस्था को वे अपने सैन्य पराक्रम से संचालित कर रहे हैं, वह धर्म है भी या नहीं? धर्मशास्त्र कौन है?- यह उन्हें ज्ञात नहीं था। उन्हें ही क्यों, अधिकांश ब्राह्मणों को भी ज्ञात नहीं था कि धर्मशास्त्र कौन है? स्मृतियों में निर्देश है कि जो गर्भाधान से अन्त्येष्टि संस्कार तक का मंत्र जानता हो उसे ही यह स्मृति दिखायें अन्यथा नहीं। शिक्षा को कैदकर स्मृतिकारों ने स्मृतियों को पेटी में बन्द कर अपने जीविका के आरक्षण वाली व्यवस्था को धर्म घोषित कर तत्कालीन नरेशों के माध्यम से समाज के ऊपर थोप दिया। आज शिक्षा उन्मुक्त होते ही स्मृतियाँ जनसाधारण को सुलभ हो गयीं, ये निःशुल्क बाँटी जा रही हैं। इन स्मृतियों के होते हुए आप एक शाश्वत संस्कृति देने में सफल होंगे, इसमें सन्देह है। इसलिये इन स्मृतियों के सन्दर्भ में जन-जन को बताना होगा कि वे आईं कहाँ से और उनका औचित्य क्या है? संस्कृति में आ रही विकृतियाँ इन्हीं स्मृतियों की देन है। विकृतियों के कारणों को पहचान कर उनके स्थान पर सर्वमान्य शास्त्र गीता को पुनर्प्रतिष्ठित करने से ही सांस्कृतिक विकृतियों का निराकरण संभव है। यही गीता आदि मनुस्मृति है।

* धर्म और राष्ट्र :- आपकी मान्यता है कि सनातन धर्म भारत का राष्ट्रीय धर्म है जिसपर आघात होते रहे हैं। इन आक्रमणों का प्रतिरोध करते हुए राष्ट्र के विभिन्न सम्प्रदायों में समन्वय के उपाय सुझायें।

देखिए, अनन्त व्यवस्थायें मनुष्य को तोड़ती हैं, केवल धर्म ही मनुष्य को जोड़ता है; लेकिन धर्म दो-चार नहीं होते। सृष्टि में भगवान एक है और भगवान को प्राप्त करने की विधि भी एक ही है। आरंभ में प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति की ओर उन्मुख है, भगवान विस्मृत रहते हैं। उस समय वह आसुरी सम्पद् से संचालित है। प्रकृति की ओर से भगवान की ओर उन्मुख होने पर दैवी सम्पद् क्रियाशील हो उठती है। जब वह इष्टोन्मुखी होता है तो उसे धारण करने की विधि एक ही है। इन्द्रियों का संयम किसी का आरम्भिक स्तर का होगा, किसी का मध्यम स्तर का होगा किसी का उन्नत, कोई प्राप्ति के समीप होगा, तो कोई प्राप्ति वाला होगा। स्तर ऊँचा-नीचा हो सकता है किन्तु साधना दो-चार नहीं होती इसलिए अनेक धर्म या सम्प्रदायों का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में बताया कि एक ब्रह्म ही शाश्वत है। उसे ही वैदिक ऋषियों ने आत्मा, परमात्मा इत्यादि नामों से अभिहित किया है। आत्मा ही सत्य है, उसे प्राप्त करने की नियत विधि, योगविधि यज्ञ है। यज्ञ शरीर से बाहर नहीं है। उस यज्ञ को चरितार्थ करना, उसे कार्यरूप देना कर्म है। जिस उपाय से यज्ञ पूर्ण हो उस उपाय का नाम कर्म है। कर्म का अर्थ है आराधना, कर्म का अभिप्राय है चिन्तन। ‘‘अर्जुन! इस कर्म को किए बिना न सृष्टि में कभी कोई प्राप्त कर सका है न भविष्य में ही कोई प्राप्त कर सकेगा। अन्य कोई तरीका नहीं है। पूर्व में अनेक ऋषि इसी नियत कर्म पर चलकर मुझे प्राप्त हुए हैं।’’

अध्याय १६ में भगवान् कहते हैं- यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। इस शास्त्र की विधि त्यागकर, कामनाओं से प्रेरित होकर अन्य विधियों से जो यजन करते हैं उनके जीवन में न सुख है न सिद्धि और न परमगति ही है। वह इन सबसे वंचित हो जाता है। तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य व्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।। (गीता, १६/२४) इसलिए अर्जुन! तुम्हारे कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है।

कौन-सा शास्त्र? किसी अन्य की कल्पना में न उलझें। भगवान ने स्वयं शास्त्र बताया, इति गुह्यतमं शास्त्रं इदमुक्तं मयानघ– अर्जुन! यह गोपनीय से भी अतिगोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। इसे जानकर तू सम्पूर्ण अनुभूति, सदा रहनेवाली समृद्धि और परमश्रेय को प्राप्त करोगे। भगवान वेदव्यास ने कहा, गीता आपका शास्त्र है- गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रविस्तरै:’। और भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, ‘मेरे द्वारा प्रसारित।’ चौथे अध्याय में उन्होंने बताया, यही है अनादि शास्त्र। यहाँ स्पष्ट करते हैं कि इसके सिवाय अन्य कोई विधि भी नहीं है, तो असंख्य नश्वर देवी-देवताओं की पूजा कहाँ से प्रचलित हो गयी? इससे राष्ट्र असंख्य कबीलों में बँट गया है। प्रत्येक कबीला अपने देवताओं में सिमटकर एक-दूसरे की निन्दा कर रहा है। सनातन पर यह प्रहार स्मृतिजन्य है। गीता के होते कोई मत-मतान्तर खड़ा ही नहीं हो सकता। गीता को हटाकर ही हम सम्प्रदाय खड़ा कर सकते हैं, इसलिए आप गीता को शास्त्र के रूप में पहचानें। फिर आप छूने-खाने से नष्ट नहीं होंगे। आज भी पूरा भारत छूने-खाने की विभीषिका से बाहर नहीं निकल पाया है, इसके लाखों-करोड़ों उपदेशक आज भी हर गाँव में विद्यमान हैं, उनके रहते आप सफल नहीं हो सकते। अतः विकृति के मूल कारण स्मृतियों को तिलांजलि देकर गीताभाष्य ‘यथार्थ गीता’ का प्रसारण घर-घर पहुँचायें, तभी राष्ट्रीय एकता सम्भव है।

* धर्म और विज्ञान :- आपने धर्म और विज्ञान में सम्बन्ध जानने की जिज्ञासा की है तथा जड़ विज्ञान या भौतिक विज्ञान को धर्म विज्ञान का सहायक और पूरक रूप में संदर्शित करने का आग्रह किया है।

वस्तुतः विज्ञान एक यौगिक शब्द है। भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं- इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।। (गीता, ९/१) ‘‘अर्जुन! ईर्ष्यारहित तेरे लिये मैं इस परमगोपनीय ज्ञान को विज्ञानसहित कहूँगा, जिसे जानकर तू संसार-समुद्र से भली प्रकार पार हो जायेगा।’’ अर्थात् विज्ञान कोई ऐसी वस्तु है, जो संसार-समुद्र से पार लगाती है। आज जिसे आप भौतिक विज्ञान कहते हैं, उसने ऐसे उपकरण भी प्रस्तुत किये हैं जिनसे सम्पूर्ण सृष्टि ही नष्ट हो जाय। यह विज्ञान नष्ट करता है, वह मोक्ष देता है। भौतिक आविष्कारों को भारतीय साहित्य में ‘आसुरी माया’ की संज्ञा दी गयी है।

सामाजिक विकास प्रकाश में भी आपके पूर्वज कभी पीछे नहीं थे। महाभारत का प्रसंग है- सिन्धुराज जयद्रथ, द्रौपदी का अपहरण कर भाग रहा था। उसके शोध में संलग्न अर्जुन को एक वृद्ध सज्जन ने बताया कि कोई राजा किसी स्त्री का अपहरण कर भागा जा रहा है। उसके साथ उसकी सेना भी है। अर्जुन ने पूछा, ‘‘वह कितनी दूर गया होगा?’’ वृद्ध सज्जन ने बतलाया, ‘‘वह इन पहाड़ों के उस पार लगभग एक कोस (तीन किमी.) दूर निकल गया होगा।’’

तत्काल अर्जुन ने दिव्य अस्त्र का संधान किया और जयद्रथ को लक्ष्य कर उसे छोड़ दिया। जयद्रथ का रथ चूर-चूर हो गया, घोड़े धराशायी हो गये, फौज मारी गयी; किन्तु द्रौपदी और जयद्रथ को खरोंच भी नहीं लगी। भीम ने जयद्रथ की गर्दन पकड़ उसे युधिष्ठिर के समक्ष पटक दिया। आज भी कोई है ऐसा आविष्कार?

भारतीय मनीषियों की भाषा में मानव मात्र दैवी या आसुरी सम्पद् से संचालित होता है। जो प्रकृति की ओर उन्मुख करे, आसुरी सम्पद् कहलाती है। प्रकृति तक ही जो हमें सीमित रखती है, आसुरी माया है। दैवी सम्पद् से संचालित योगमाया, विद्यामाया ही विज्ञान है। साधना इतनी उन्नत हो कि भगवान सुनवाई कर लें। आत्मा से अभिन्न होकर परमात्मा जागृत हो जाय, मार्गदर्शन करने लगे, अँगुली पकड़ कर चलाने लगे- यह बेतार के तार का प्रसारण विज्ञान है। इस जागृति के पश्चात् साधक निश्चित ही भवसागर से पार हो जायेगा। बीच में प्रकृति में कोई ऐसा यंत्र नहीं कि उसे नष्ट कर दे या विचलित कर दे। इस प्रकार वास्तविक विज्ञान का धर्म से सदैव तादात्म्य ही है, विज्ञान का धर्म से समन्वय का प्रश्न ही नहीं उठता।

आप ज्यों-ज्यों गीता के अनुसार धर्म का आचरण करेंगे, श्रद्धापूर्वक गीताभाष्य ‘यथार्थ गीता’ का चार बार पाठ कर लें, तदनुसार अभ्यास आरम्भ कर दें। जहाँ श्रद्धा से डोर लगी, भगवान आपके हृदय से ही जागृत होकर मार्गदर्शन करने लगेंगे, विज्ञान का किंचित् आभास आपको मिलने लगेगा और जब सद्गुरु मिल जायेंगे तो विज्ञान की सम्पूर्ण धारा आपके हृदय में प्रवाहित हो जायेगी जो मोक्ष प्रदान करके ही शान्त होगी।

विज्ञान की अनुभूति के लिए धर्म की सही तालिका आवश्यक है। अभी तक इन समस्त समस्याओं के न सुलझने का कारण था कि हम सभी आधारहीन चल रहे थे। आपका आधार भगवान् श्रीकृष्णोक्त गीता है। धर्मशास्त्र के रूप में इसे अपनायें, आगे बढ़ायें। लोक में समृद्धि और परमश्रेय का विज्ञान, भगवान के श्रीमुख की वाणी गीता को ‘राष्ट्रीय धर्मशास्त्र’ घोषित करें।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत) * * *

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