धर्म में ऊँच-नीच, रंग-भेद, नस्ल-भेद, लिंग-भेद का क्या स्थान है?

प्रश्नधर्म में ऊँचनीच, रंगभेद, नस्लभेद, लिंगभेद का क्या स्थान है?

उत्तर :- धर्म में ऊँच-नीच, रंग-भेद, नस्ल या लिंग-भेद के लिए कोई स्थान नहीं है। जलवायु तथा तापमान के भेद से रंगों में परिवर्तन होता रहता है। अतिउष्ण प्रदेशों के निवासियों का श्याम रंग स्वाभाविक है। शीतप्रधान देशों के निवासियों का रंग गोरा होता है। समशीतोष्ण जलवायु वाले लोगों का रंग गेहुँआ रहता है। यह तो तापमान की देन है। धर्म का इससे कुछ भी लेना-देना नहीं है।

गीता के अनुसार, ‘‘शरीर एक वस्त्र है। जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्यागकर नवीन वस्त्र धारण कर लेता है उसी प्रकार भूतादिकों का स्वामी आत्मा शरीररूपी वस्त्र को त्यागकर नवीन शरीर धारण कर लेता है।’’ रंग-भेद, नस्ल-भेद इत्यादि वस्त्र के भेद हैं, आपके नहीं। आत्मा शुद्ध है, तत्त्व है, परमसत्य है। यही आपका निज स्वरूप है। साधना के सही दौर में पड़कर वह वहीं पहुँच जाता है जहाँ आत्मा विदित हो जाती है, वह आत्म-तृप्त, आत्मस्थित हो जाता है। बाह्य भेद तो प्रकृति की देन है। ईश्वर-पथ में कोई भेदभाव नहीं है-

नाम जपत कुष्ठी भला, चुइ चुइ गिरे जो चाम।

सुघर देह किस काम की, जिस मुख नाहीं नाम।।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं- पुरुष या तो क्षर है या अक्षर है। वह या तो इन्द्रिय स्तर पर जीवन-यापन करता है या संयम के स्तर पर जीता है। मनुष्य की यही दो श्रेणियाँ संसार में हैं। तीसरी श्रेणी अनिर्वचनीय है, जो शाश्वत परमात्मा है। वहाँ पहुँचकर वह न क्षर है न अक्षर है बल्कि कैवल्यस्वरूप है, कल्याण-तत्त्व है।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत) * * *

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