प्रश्न– कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।। (मानस, 7/43/6)
जैसा कि चौरासी लाख योनियों का दण्ड देखकर भगवान करुणा करके नर का शरीर प्रदान करते हैं, जिसे आवागमन से मुक्त होने का साधन बताया गया है, तो क्या उस नर का यही स्वरूप है जो रात्रि–दिन जन्म लेते रहते हैं या और कोई?
उत्तर– देखो, माया ही नारी है। माया का उतार-चढ़ाव चित्त के ऊपर है इसलिए चित्तवृत्ति ही नारी है। जब कभी प्रयत्नशील पुरुष के हृदय से चित्तवृत्ति द्वारा कार्य करनेवाली माया का प्रभाव निकल जाता है तो वह नर की स्थिति में आ जाता है। जिसका संचालन माया द्वारा होता है, वह नारी है न कि नर। देखो, यह मानस मन की सूक्ष्म स्थितियों का चित्रण है। इन स्थितियों का निर्णय इष्टदेव के शब्दों से ही होता है। साधक इन स्थितियों को इष्ट की वाणी द्वारा पाता है। इस मानस की रचना के साथ-साथ मानस-रोग भी बताये गये हैं। इन मानस-रोगों के माध्यम से उस नर-स्वरूप का निर्णय दिया गया है। उन रोगों के प्रसुप्त हो जाने पर नर-स्वरूप की योग्यता आ जाती है। सम्पूर्ण व्याधियों का मूल मोह है जो अनन्त रोगों के विस्तार का कारण है। काम वात, क्रोध पित्त और लोभ कफ है। अहंकार डमरूआ है, तृष्णा उदर रोग है। इसी प्रकार पन्द्रह-पचीस रोगों को बताया गया है और साथ ही निर्णय दिया गया है कि नर पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अतः जो इन विकारों से प्रभावित नहीं होता, वही नर है। जैसा कि-
एक ब्याधि बस नर मरहिं, ए असाधि बहु ब्याधि।
पीड़हिं सन्तत जीव कहुँ, सो किमि लहै समाधि।। (मानस, 7/121 क)
इन व्याधियों में से यदि एक भी व्याधि नर का स्पर्श कर देती है तो नर मर जाता है और जिसके पास ये सभी रोग हैं तो निरन्तर पीड़ित रहनेवाला जीव है। भला वह समत्व की स्थिति कैसे प्राप्त कर सकता है? अब आप विचार करें कि इनमें से कोई रोग है या नहीं। यदि है तो वह नर नहीं। नर तो एक ऐसा स्वरूप है कि प्रकृति के सभी पहलू काम-क्रोधादि जिनका नाम मानस-रोग है, जीवित अवश्य रहते हैं, पर वह उनसे प्रभावित नहीं होता। संयोगवश यदि कोई एक भी दोष कार्य करने लगता है तो नर मर जाता है और जहाँ सभी दोष हैं, वहाँ तो नर का प्रश्न ही नहीं पैदा होता। गोस्वामीजी के कथनानुसार वह जड़ जीव है। जब भगवान राम ने अन्दर-ही-अन्दर यह निश्चय किया कि मैं पृथ्वी निशाचरहीन कर दूँगा, तो सीता को सम्बोधित करते हुए कहते हैं-
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला।
मैं कछु करबि ललित नरलीला।।
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा।
जौ लगि करौं निसाचर नासा।। (मानस, 3/23/1-2)
निशा कहते हैं रात्रि को एवं निशाचर कहते हैं रात्रि में विचरण करनेवाले को। महापुरुषों की दृष्टि में बाहर कहीं रात्रि है ही नहीं। बाह्य निशा तो जीव-जगत् की जीवनी है।
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी।
परमारथी प्रपंच बियोगी।। (मानस, 2/92/3)
यह जगत् ही रात्रि है, ‘मोह निसाँ सबु सोवनिहारा’ (मानस, 2/92/2)- मोह ही निशा है। इसमें चलानेवाले काम, क्रोध, मद, मत्सर इत्यादि का विस्तार ही निशाचर है। आत्मा का रथी होकर संचालन करना ही राम है। उस आराध्य देव के आदेशानुसार जब मनुष्य इन्हें काटने में प्रवृत्त होता है तो वही नरलीला है। जब पुरुष इन विकारों के प्रभाव से ऊपर उठ जाता है तब वह नर कहलाता है। यहाँ मोहरूपी रावण एवं उसका प्रसार आसुरी सम्पत्ति होने से निशाचर है। भजन कोई लाख करे परन्तु जब तक इष्टदेव रथी नहीं हो जाते, तब तक इन विकारों का शमन नहीं होता। किसी के हृदय में यदि इन विकारों पर विजय मिली है तो अनुभव के द्वारा। विजय का परिणाम प्रेरक पर आधारित रहता है। श्रम साधक करता है परन्तु उसका अस्तित्व निमित्तमात्र है। अतः इष्टदेव से प्रेरित विकारों से त्राण पाने के लिए साधक प्रयत्नशील रहता है। यह नरत्व की स्थिति का प्रयास मात्र है।
यौगिक दृष्टि से नर मन की एक श्रेणी है, न कि स्थूल शरीरधारी कोई जीव। यह नरत्व की श्रेणी क्रमागत साधना के फलस्वरूप उसी परम प्रभु (इष्ट) की अनुकम्पा से मिलती है जो मोक्षदायिनी एवं साधन का धाम है। ऐसी स्थितिवाले साधकों को चेतावनी देते हुए भगवान स्वयं कहते हैं-
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।
पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।। (मानस, 7/43/2)
बहुमूल्य नर-तन पाकर यदि विषयों में मन लगाता है तो वह अमृत के बदले विष ग्रहण करता है। उपरोक्त नर की स्थिति हम किसी महापुरुष की सेवा एवं सान्निध्य से ही प्राप्त कर सकते हैं।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)