प्रणाम का महत्त्व

सन्ध्याकालीन वन्दना के पश्चात् साधकों एवं भाविकों के बीच प्रणाम का महत्त्व बताते हुए श्री परमहंसजी

पूज्य महाराजजी साधकों के मनोगत भावों को पकड़कर तदनुकूल उपदेश दिया करते थे और सामूहिक कार्यों में किसी-न-किसी त्रुटि का बहाना लेकर चिन्तन-पथ प्रशस्त कर दिया करते थे। आरती हो रही थी, सब लोग पूर्ण तन्मयता के साथ प्रार्थना में संलग्न थे। आरती समाप्त होने के उपरान्त सभी लोगों ने प्रणाम किया। जिन साधकों ने मन से सम्बन्ध जोड़, हृदय में स्वरूप पकड़कर प्रणाम किया उन्हें कुछ समय लगा; किन्तु कुछ नवीन साधक शीघ्र ही प्रणाम कर इधर-उधर ऐसे देखने लगे, जैसे कि उनकी पूजा पूरी हो चुकी हो। उन भोले पथिकों की ऐसी विकृति देख आप स्नेहपूर्वक बोले- बैठ जाओ, देखो जैसा कि अभी आरती होने पर सभी ने प्रणाम किया है। दो-एक साधकों को इंगित करते हुए कहा कि ये लोग तो इस प्रकार खुश हुए जैसे कि सिर का बोझ उतर गया हो। तुम लोगों को शर्म नहीं लगती! यह तो तुम्हारे अन्तःकरण की हाजिरी है। यदि यही क्रम तुम लोगों का अधिक दिनों तक चलता रहेगा तो अपनी साधना में असफल हो जाओगे।

प्रार्थना या आरती जो कुछ भी हम करते हैं, अपने भावों को सद्गुरु को समर्पित करते हैं। उसके बाद प्रणाम का यह मतलब नहीं हुआ कि हम ड्यूटी पूरी करके निकल जायँ, जैसे फर्ज अदायगी। जब प्रार्थना से चित्त शान्त हो जाता है, मन में संकल्पों की लहर हल्की हो जाती है, तब ऐसे समय में थोड़ा चिन्तन भी कर लें। इससे भजन में मदद मिलेगी। प्रणाम ही सब कुछ है किन्तु जो वास्तविक प्रणाम है, वह सिर झुकाना ही नहीं बल्कि सामने खड़े होकर उन्हीं सद्गुरु के स्वरूप को हृदय में पकड़ना चाहिए, जिस प्रकार कि ध्यान में पकड़ते हो। पाँच मिनट समय भले ही लग जाय, परन्तु पूर्णरूप में सुरति के द्वारा स्वरूप को हृदय में पकड़कर प्रणाम करना चाहिए। पहले अन्दर तत्पश्चात् बाहर से प्रणाम कर लो। यदि तुम्हारा यह क्रम जारी रहेगा तो धीरे-धीरे तुम्हें ध्यान में मदद मिलेगी; क्योंकि दिन में चार-पाँच बार प्रणाम करने का अवसर मिलता है। स्नान करने के बाद, सुबह, शाम एवं आरती आदि सब मिलाकर दिन में बीस या पचीस मिनट हो जाते हैं। यही उस ध्यान में सहायता प्रदान कर हमें परमकल्याण की ओर प्रेरित करता रहेगा। जो केवल ऊपर से प्रणाम करते हैं, शनैः-शनैः उनका ऊपरी भाव समाप्त होने लगता है और प्रणाम केवल फर्ज अदायगी के रूप में ही शेष रह जाता है। वस्तुतः वह उस कल्याण को नहीं दे पाता जिसके लिए कि हम प्रणाम करते हैं। यदि हमने लक्ष्यप्राप्ति के लिए गृहत्याग किया हो तो हृदय में स्वरूप पकड़कर प्रणाम करें। वैसे तो हजारों आकर प्रणाम करते हैं किन्तु भगवान के यहाँ भावों का ही महत्त्व है और दुनिया में फर्ज अदायगी एवं एक्टिंग का। हमारा प्रबल भाव ही उधर से कृपा बनकर लौटता है। यदि भावों में कुछ भी सन्दिग्धता है तो वही हमारे लिए घातक बन जायेगा, जैसे कि हनुमानजी संजीवनी लेकर आते समय गर्व किये कि अगर आज मैं न होता तो राम के भाई लक्ष्मण को कौन जिलाता? अतः यह लड़ाई मेरे ही बल पर हो रही है। इष्ट के प्रति अभाव उत्पन्न हो गया, जिसके परिणामस्वरूप भरत की तरफ से एक ऐसा सींक का बाण लगा कि हनुमानजी गिर पड़े। जिसके उपर बड़े-बड़े अस्त्र एवं वज्र का भी असर नहीं होता था, वह एक साधारण सींक के लगने से धराशायी हो गया।

वस्तुतः वैराग्य ही हनुमान है एवं भाव ही भरत है। हमारे भावों का दूषित हो जाना ही भरत का बाण है। जब हमारे भाव दूषित हो जाते हैं तो वही हमारे लिए घातक सिद्ध होते हैं। ऐसी स्थिति में वैराग्यवान पथिक गिर जाता है। यदि एकाध बार गिरने के बाद समझ काम कर गई तो वह प्रभु (सद्गुरु) जो दया के सागर हैं, सँभाल लेते हैं; किन्तु हमें उनकी परम दयालुता पर अटल विश्वास होना चाहिए। हम चाहे जिस परिस्थिति में हों, पर अपना नियम न छोड़ें। चाहे बुखार आ जाय, चाहे वज्र पड़ जाय, लेकिन नियम नहीं टाला जा सकता।

दिन दिन बढ़त सवायो– हमारे चिन्तन-क्रम में उत्तरोत्तर वृद्धि होनी चाहिए। प्रतिदिन सायंकाल एकान्त में बैठकर हमें यह हिसाब करना चाहिए कि आज मेरा भजन कितना है और कल कितना था। यदि किसी प्रकार की कमी रह गयी तो प्रयत्नपूर्वक चौबीस घंटे के अन्दर ही पूर्ण करें। इस प्रकार पूर्तिपर्यन्त हमें प्रयास करना है। हम जो सेवा करते हैं, उसका बहुत बड़ा महत्त्व है। आज हम एकान्त में जाकर बैठ गये। दस दिन भजन करेंगे, किन्तु ग्यारहवें दिन अवश्य भागना पड़ेगा। भजन करने की क्षमता हमलोगों में नहीं है, वह तो किसी स्थितिप्राप्त महापुरुष के द्वारा ही हृदय में प्रवाहित होती है अतएव उनकी सेवा एवं सान्निध्य परम आवश्यक है। इस प्रकार सेवा करते-करते मन के निरोध की धारा जो सद्गुरु के अन्दर सतत प्रवाहित रहती है, वही साधक में उतरने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप कुछ समय बाद हमारे अन्दर वह क्षमता आ जाती है जिससे कि पूर्ण सन्तोष का आभास होने लगता है।

।। ओम् ।।

 (‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

Q & A
×