प्रश्न– महाराजजी! तीर्थयात्रा में जानेवाला हूँ परन्तु आपकी वाणी से विदित हुआ कि तीर्थ की योग्यता अन्दर में अधिक पायी जाती है। कृपा करके बतावें कि बाह्य तीर्थों का क्या महत्त्व है?
उत्तर– देखो, भगवत्-पथ की प्रत्येक क्रिया बाहर से चलकर अन्दर की ओर मोड़ लेती है। हर व्यक्ति बाहर खड़ा है इसलिए इन तीर्थों को छोड़ने का विधान नहीं है। जब भगवान ही कृपा करके अन्तरंग तीर्थों की ओर मोड़ते हैं, तब इनकी आवश्यकता नहीं रह जाती। जैसा कि-
जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं।
तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं।। (मानस, 1/33/6)
जिस समय अन्तःकरण में भगवान का अवतार व अवतारी कार्य संचारित हो जाता है, उस समय समस्त तीर्थ अन्तराल में प्रकट हो जाते हैं। बाहर की अपेक्षा अधिक विशेषता या महत्त्व अन्दर में हो जाने के कारण प्रायः उसकी आवश्यकता नहीं रह जाती। जैसा कि-
तीरथ गये एक फल, सन्त मिले फल चारि।
सतगुरु मिले अनन्त फल, कहैं कबीर विचारि।।
तीर्थ जाने से एक फल है कि पुण्य और पुरुषार्थ बढ़ता है (दर्शन, स्पर्श, इच्छा न होने पर भी देखादेखी दान इत्यादि का करना आदि पुरुषार्थ स्वाभाविक रूप से होने लगता है)। महापुरुषों की तपोभूमि होने के कारण वहाँ का वायुमण्डल शुद्ध रहता है। चूँकि महापुरुषों ने मन का निरोध कर साक्षात्कार कर लिया है, इसलिए वहाँ निरोध के परमाणु अधिक रहते हैं और विषय के कम। वहाँ बैठकर हम जब चिन्तन करेंगे तो घर की अपेक्षा मन अधिक लगेगा। यदि तीर्थों में सन्त-मिलन हो जाय तो चारों फल अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष- और कहीं सद्गुरु मिल जायँ तो अनन्त फल मिल जाता है। प्रकृति का अन्त महापुरुषों द्वारा हो चुका है, अनन्त तो परम ब्रह्म परमात्मा का नाम है, वह सुलभ हो जाता है।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)