महाभारत का प्राण गीता और उसका क्षेत्र

गीता पर उपदेश देते हुए परमार्थ पथिकों के बीच श्री परमहंसजी

महाभारत का प्राण गीता और उसका क्षेत्र

महाभारत का युद्ध अत्यन्त मार्मिक एवं जनसमूह के लिए एक आदर्श है; किन्तु उसका रूप ही दूसरा है। इस संसार में मानव समय-समय पर विशाल समूहों में विभक्त होकर परस्पर लड़ता आया है। उदाहरण के लिए देवासुर-संग्राम आदि। इस संसार में मानव ने मायिक स्तर पर जब-जब कुछ आविष्कार किया, तब-तब परस्पर दुनियावी स्थितिवाले युद्ध के परिणामस्वरूप अपना सर्वस्व नाश कर दिया। उस सर्वनाश के अतिरिक्त जो अल्पसंख्यक बचे, उसे शान्ति कह लिया जाय, चाहे विवशता। अस्त्र-शस्त्र के प्राप्तिकाल में सन्तोष तो अवश्य होता है; किन्तु वे जब भी कार्यरूप में आते हैं तो मानव का कल्याण नहीं बल्कि सर्वनाश ही होता है।

इसी प्रकार कुछ विशेष आविष्कारों के आधार पर महाभारत के भयंकर युद्ध का प्रणिपात हुआ था, इसमें कोई सन्देह नहीं है। यह ऐतिहासिक युद्ध है जिससे हम जीवन में प्रेरणा लेते हैं; किन्तु आज हम लोगों के समक्ष उस महाभारत का चित्रण एक पुस्तक के रूप में है, जिसकी रचना महर्षि व्यास के द्वारा हुई है। महापुरुषों की रचना व्यवस्थापूर्वक जीने-खाने तक ही सीमित न रहकर बल्कि इस जीवात्मा के पूर्ण कल्याण के लिए होती है। पूर्ण कल्याण उसे कहते हैं, जिसे प्राप्त कर मानव कभी ईश्वर से विलग नहीं होता। भरत, महावीर, ऋषभ एवं बुद्ध आदि एक अच्छे सम्राट थे, जिनके पास जीविकोपार्जन सामग्री की कमी नहीं थी। ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं, जिनके सामने भी जीवन-सम्बन्धी भौतिक व्यवस्थाओं की समस्या नहीं थी; किन्तु एक अलक्षित अलौकिक वस्तु की कमी के कारण उन्हें साम्राज्य त्यागकर फकीर होना पड़ा। व्यावहारिक व्यवस्थावाले लाखों होंगे, तो परमार्थ चिन्तनवाला कोई एक। व्यावहारिक व्यवस्था का संचार उन पुरुषों में तो पाया जाता है जिनकी संख्या एक के मुकाबिले लाख है; किन्तु जिन परमार्थी पुरुषों की संख्या लाखों में एक है, वे कहीं से भी उपदेश प्रारम्भ कर मानव की सांसारिक प्रवृत्तियों को समेटते हुए क्रमशः परमार्थ-चिन्तन के प्रशस्त पथ पर खड़ा कर देते हैं। कारण कि उन्होंने चलकर देखा है कि अन्यत्र कल्याण सम्भव नहीं है।

अब आप उसी स्तर के महापुरुष योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी श्रीमद्भगवद्गीता को जरा विचार से देखें। कर्म की आवश्यकता पर बल देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि, हे अर्जुन! काम, क्रोध और लोभ ये तीनों नरक के मूल द्वार हैं, जिन पर आसुरी सम्पत्ति आधारित है। इन तीनों का त्याग कर देने पर ही वह क्रिया प्रारम्भ होती है जिसका परिणाम मोक्ष है, परमात्मा है। इस स्थिति में मनुष्य सुख-दुःख से उपराम हो जाता है अर्थात् ऐसे सुख की प्राप्ति होती है, जिसके पीछे दुःख नहीं है। सभी पढ़ते एवं इन शब्दों पर विचार भी करते हैं; किन्तु इन विकारों को छोड़ना नहीं चाहते। बहुत से ऐसे भी हैं जो विकारों से छूटने के लिए प्रयत्न करते हैं एवं विकल हैं; किन्तु इनसे पिण्ड छूटता नहीं। इसलिए महापुरुषों ने इनको दुर्जय शत्रु की संज्ञा दिया है। हे अर्जुन! काम और क्रोध जो रजोगुण से उत्पन्न होनेवाले हैं, इस पथ में यही मुख्य शत्रु हैं। असंगतारूपी शस्त्र, ज्ञानरूपी तलवार द्वारा इनको काट! ये काममय शत्रु भोगों से कभी भी न सन्तुष्ट होनेवाले एवं ज्ञान व विज्ञान को नष्ट करनेवाले अत्यन्त भयंकर एवं दुर्जय हैं। ये शत्रु ज्ञानियों के निरन्तर बैरी हैं। इसलिए युद्ध के लिए ‘उत्तिष्ठ’- खड़ा हो! अब आप ही बताइये, जब शत्रु अन्दर हैं तो बाहर झगड़ा करने से क्या लाभ? खैर यह युद्ध का प्रश्न आगे आयेगा। महापुरुषों के शब्दों में यह क्रिया तभी फल देती है जबकि विकारों का शमन हो जाता है। ऐसी ममत्व ग्रसित अवस्था में कल्याण की व्यवस्था कैसे सम्भव हो सकेगी। उसी का निदान करने के लिए महापुरुषों ने शास्त्रों को ऐसी खूबी के साथ रचा कि दुनियावी स्तर पर खड़ा मानव कल्याण की पूर्ण योग्यता प्राप्त कर सके। जैसा कि क्रोध का पूरक युद्ध, लोभ का पूरक उपार्जन व मोह का पूरक सम्बन्ध इत्यादि मन के फँसाव के जितने भी साधन हैं, सभी उपयुक्त हैं। आप खूब भोगिये परन्तु इष्ट पर दृष्टि रखते हुए, संयम के साथ। यह संयम मानव के लिए एक विशेष प्रशिक्षण है जिसके द्वारा सांसारिक प्रभाव क्रमशः दुर्बल हो जाते हैं और इष्टोपलब्धि की सही परिधि प्राप्त हो जाती है जहाँ से क्रिया का आरम्भ है। कर्मकाण्डियों द्वारा इसकी धज्जी-धज्जी उड़ा दी गई; किन्तु उसका वास्तविक स्वरूप इतना ही है कि सुबह-शाम पाँच-दस मिनट अवश्य अपने इष्ट के समक्ष हाजिर होना चाहिए। इष्ट का स्वरूप हृदय में स्मरण कर अति विनीत भाव से अपने आप को समर्पित कर दें और अग्रिम कार्य के लिए निवेदन करें कि भगवन्! मैं दिवस की तरह निरन्तर सांसारिक उलझनों में बहता जा रहा हूँ, आप ही मेरे एकमात्र रक्षक हैं। इसी प्रकार सोने के पूर्व भी कल्याण-विषयक उनके दर्शन की कामना करनी चाहिए और साथ ही साथ एक नाम, जैसे-राम, ओम्, शिव आदि जो प्रिय हो ले लें, फिर इसी नाम को चलते-फिरते, उठते-बैठते सभी समय में निरन्तर जपने का प्रयास करें। इस नाम-जप के लिए कोई स्थान अपवित्र नहीं होता।

याद रखें, इस प्रकार हमें मन के अन्तराल में यहाँ तक योग्यता प्राप्त करनी है कि हर समय नाम-यजन और समर्पण की भावना बनी रहे। बस आगे भगवान किसी- न-किसी रूप में रास्ता बताने लगते हैं। जहाँ कुछ भी आभास मिला तो समय का क्रम धीरे-धीरे बढ़ने लगता है और बढ़ते-बढ़ते निर्दोष साधन की अवस्था प्राप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में बाह्य क्रियाओं का रूप मिट जाता है। लोभ, मोह, क्रोध आदि से प्रेरित उपार्जन, सम्बन्ध व युद्ध की आवश्यकताएँ पूर्णतया मिट जाती हैं और आत्मा का परमात्मा से सम्बन्ध करानेवाले एवं पुरुष व प्रकृति के संघर्ष का विच्छेद करानेवाले वास्तविक आध्यात्मिक युद्ध का प्रादुर्भाव होता है। वह ईश्वर ही सच्चा सम्बन्धी है। वह परम हितैषी है, जो अपना ही अपरिवर्तनशील स्वरूप है। उसी की कृपा से सांसारिक प्रवृत्तियाँ व जन्म-मरण के बन्धन को काटनेवाले युद्ध का प्रवेश-द्वार मिल जाता है। बस गीता इसी स्तर के युद्ध की प्रवेशिका है। गीता में एक भी श्लोक ऐसा नहीं है जो मारकाट अथवा दुनियावी युद्ध का समर्थन करता हो। गीता में महाभारत का विरोध नहीं है; किन्तु मानव-उत्थान के इस पवित्र शास्त्र का अन्तरंग व सूक्ष्म भाग है। यह आवागमन के बन्धन को काटनेवाला युद्ध तभी सम्भव है, जब आप चिन्तन-कार्य को समझकर करें। यह चिन्तन में होनेवाला युद्ध है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि दुनिया में जन्म लेनेवाले मनुष्य दो प्रकार के होते हैं। पहला देवताओं-जैसा, दूसरा असुरों-जैसा। इस अन्तःकरण की दो पुरातन पार्टियाँ हैं, एक दैवी सम्पत्ति और दूसरी आसुरी सम्पत्ति। जब अन्तःकरण में आसुरी सम्पत्ति को दबाकर दैवी सम्पत्ति कार्य करती है तो मनुष्य देवताओं-जैसा हो जाता है और जब दैवी सम्पत्ति को दबाकर आसुरी सम्पत्ति कार्य करती है तो मनुष्य निशाचरों-जैसा हो जाता है। आसुरी सम्पत्ति अधम योनियों की तरफ प्रेरित करती है और दैवी सम्पत्ति परमतत्त्व परमात्मा की ओर। ‘‘अर्जुन! तू दैवी सम्पत्ति को प्राप्त हुआ है; कल्याण को प्राप्त होगा अतः शोक मत कर।’’

तत्पश्चात् दोनों सम्पत्तियों के लक्षण गिनाते हुए कहते हैं कि ज्ञान व योग की प्रक्रिया दान, दया, धर्म, अभय व अन्तःकरण की स्वच्छता, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी लगाव का न होना, मन का निरोध, चित्त का सर्वथा रुक जाना आदि दैवी सम्पत्ति हैं, जो यौगिक प्रक्रिया में प्रवेशिका से लेकर पराकाष्ठापर्यन्त आनेवाले स्थल-विशेष हैं। जिसके मूल चौबीस लक्षण बतलाये गये हैं और जिनका विस्तार सम्पूर्ण दैवी प्रवृत्ति है। उनका वास-स्थान मन है। ठीक इसी प्रकार आसुरी सम्पत्ति मन की ही एक प्रवृत्ति है जो नीच योनियों की तरफ प्रवाहित करती है और मानव को पतन की ओर ले जाती है अर्थात् लक्ष्य से विमुख रखती है। इसमें काम, क्रोध, द्वेष, दम्भ, पाखण्ड, शत्रुता, अनन्त आशा व व्यर्थ तृष्णा का संचार इत्यादि अधोमुखी प्रवाह ही आसुरी सम्पत्ति है। इनका भी वास-स्थान मन ही है। जब हम तत्त्व की खोज के लिए दैवी सम्पत्ति का संग्रह व पालन प्रारम्भ करते हैं, तब आसुरी सम्पत्ति बाधा के रूप में प्रगट हो जाती है। श्रृंगी इत्यादि जो करीब की स्थिति में थे, ऐसे बहुत से महात्माओं को बरबस इसी आसुरी सम्पत्ति से रुक जाना पड़ा। बस गीता का प्रतिपादित वास्तविक युद्ध यहीं से खड़ा होता है जिसको महापुरुषों ने विभिन्न नामों से समझा है, किन्तु गीता इन्हीं दो पार्टियों को धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र के नाम से प्रारम्भ कर सजातीय-विजातीय, विद्या-अविद्या, देव-असुर आदि कई नामों से पुष्ट कर लक्ष्य परमात्मा की परम आवश्यकता का निर्देश करती है। उसकी प्राप्ति के बाद गीता के शब्दों में पुनर्जन्म नहीं होता।

।। ओम्।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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