महापुरुष

महापुरुष

योगी अवतार का प्रवेश है एवं मात्र योगी ही अवतार-विशेष का प्राकट्य तथा प्रशस्ति का मूल माध्यम होता है। अधिकारी के लिए परमात्मा से निःसृत अलौकिक अवतरण का आरम्भ इन्हीं महापुरुषों से होता आया है। परम के दिग्दर्शनवाले उन तपोधन सद्गुरुओं से संचालित होता हुआ, साधन-क्रम से सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित आत्मा का साक्षात्कार करता हुआ जब तक सबके मूलभूत परमात्म-स्वरूप में समाहित नहीं हो जाता, तब तक योगी माध्यम रहता है। वस्तुतः एकमात्र योगी अवतार का प्रवेश एवं विशद् परमात्मा की रश्मियों का संचार है। यदि महापुरुष का अन्तःसंयोग न हो, तो भगवान तथा अवतार नाम की किसी वस्तु का सृजन एवं स्रष्टा असम्भव है।

भगवान कभी नष्ट नहीं होते। वे तो सबकी जीवनधारा में व्यवस्थित एवं अपरिवर्तनशील सत्ता हैं जो कभी नष्ट नहीं होते। उनकी विद्यमानता तो सदैव एवं सर्वत्र है; किन्तु मनुष्य के उपभोग के लिये नहीं। परमात्मा एवं उनसे निःसृत वाणी के प्रसारण के एकमात्र माध्यम तत्त्वस्थित महापुरुष हैं। ब्रह्ममय ऐसे महापुरुष यद्यपि अवतार के कार्यक्षेत्र की पकड़ से सर्वथा निष्काम एवं परे होते हैं, तथापि अन्य (नर) पुरुषों के अन्तःकरण में अवतार का अलौकिक एवं चमत्कारपूर्ण कल्याण-सृजन करने के लिए पथ-प्रदर्शक बन जाते हैं।

इस सन्दर्भ में कबीर के जीवन-वृत्त से एक उदाहरण प्रस्तुत है- एक समय कबीर की भक्ति-भावना एवं हृदय-वेदना से उत्प्रेरित होकर गुरु और गोविन्द दोनों उनके समक्ष प्रकट हो गये (यह योग की पराकाष्ठा है)। कुछ समय के लिए कबीर विचाराधीन हुए कि नमन किसे करूँ?

बलिहारी गुरुदेव की, जिन गोविन्द दियो लखाय।

ऐसा विचार कर पहले उन्होंने स्वयं को गुरुदेव पर अर्पित किया; क्योंकि उन्हीं के प्रसाद से परब्रह्म का दिग्दर्शन सम्भव हुआ और कबीर तत्क्षण उसी रूप में प्रवेश पा गये।

तहाँ न ईश्वर जीव न माया, पूजक पूज्य न चेरो।

वहाँ न ईश्वर है, न जीव है और न माया ही है। वहाँ न कोई पूजने योग्य है और न छुट-पुट टहल करनेवाला चेला ही है। तब बचा क्या? अवधू बेगम देश है मेरा– वह अगम्य और अथाह है। वही तो मेरा स्वरूप तथा देश है।

ऐसे निर्लेप उपलब्धिवाले महापुरुष उस परम चेतनात्मा की उपलब्धि का सूत्रपात करते हैं, जो अवतार के परिवेश में आता है। उनके द्वारा उत्पन्न होनेवाली परमात्मा की पावन संचालिका शक्ति का नाम अवतार है। वे महापुरुष साधक के अन्तर्जगत् में परमात्मा की पावन शक्तियों का संचार उत्तरोत्तर विकसित करते हुए, सर्वत्र ब्रह्ममयता प्रदान करते हुए, उसका अस्तित्व मिटाकर अन्तर्धान हो जाते हैं, फिर तो वह योगी साधक नहीं रह जाता, अपितु मानवमात्र में उसे एक स्वरूप, शाश्वत सत्ता, प्रभु का ही प्रतिरूप दृष्टिगोचर होता है। इसी स्थिति-विशेष के सन्त कबीर हुए हैं।

(ऐसे महापुरुष शरीर को इच्छानुरूप चलानेवाले होते हैं, जैसा कि काकभुशुण्डि, कबीर, श्रीराम, श्रीकृष्ण इत्यादि महात्माओं के जीवन से प्रमाणित है। योग-विशेष की पराकाष्ठावाले प्रत्येक महापुरुष का यही स्वरूप है।)

महाप्रलय में भी जिनका नाश नहीं होता, उन काकभुशुण्डिजी ने गरुड़ का सन्देह निवारण करते हुए कहा कि ‘शरीर का त्याग अथवा बनाये रखना मेरी इच्छा पर निर्भर करता है।’- तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना।। (मानस, ७/९५/५)

अनुसुइया आश्रम स्थित परमपूज्य श्री परमहंसजी महाराज सत्संग में इस प्रसंग के आ जाने पर प्रायः कहा करें- ‘‘हो ! अब मोके मरै का नहीं है। यमराज एवं माया के बन्धन टूट गये, काल की फाँसी कट गई। भगवान मोके निवृत्ति दिए हैं। हाँ, कोई गोली मार देई तो सरीरिया त्याग करि देइहौं।’’ वाणी की चोट सबसे बड़ी चोट है। साधकों के मुख से वाणी निकल जाने पर मैं समझ लूँगा कि अब इन्हें मेरी आवश्यकता नहीं है, तब शरीर त्याग दूँगा।

अन्त में मेरे ही द्वारा लापरवाही से निकले शब्दों को माध्यम बनाकर दो-चार बार उन्होंने दुहराया कि ‘‘बोलिया का है, गोली के समान लागत है। मैं कैसे बताऊँ, छेदत चली जात है।’’- ऐसा कहकर हँसने लगे और मौन हो गये तथा उपदेश करने लगे। चार दिवसीय अनवरत सत्संग में सम्पूर्ण साधनपरायण पथिकों को सम्बोधित कर इस साधनीय उक्ति पर बल दिया कि-

राम राम राम जीह जौलौं तू न जपिहै।

तौलौं, तूँ कहूँ जाय, तिहूँ ताप तपिहै।। (विनय०, पद ६८)

जब तक राम का नाम जीह यानि जिह्वा से तुम लोग नहीं जपोगे, तब तक कहीं भी चले जाओगे तो भी ये ताप पिण्ड नहीं छोड़ेंगे। भान होगा कि यह इन्द्र हैं ऊपर बैठे हैं, मैं नीचे बैठा हूँ। इस प्रकार मन में ताप बना रहेगा। इसलिये सतत् जाप करो और श्वास पर दृष्टि रखो, और ठीक पाँचवें दिन समाधि की मुद्रा में पंचतत्त्व से निर्मित इस पार्थिव शरीर का परित्याग कर दिया।

।। ॐ।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

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