मनुष्य की उत्पत्ति केसे हुई?

प्रश्न मनुष्य की उत्पत्ति कैसे हुई?

उत्तर :- गीता मानव का आदि धर्मशास्त्र है। कल्प के आदि में, सृष्टि के आरम्भ में इसका प्रादुर्भाव हुआ है। यह परमात्मा के श्रीमुख की वाणी है, अपौरुषेय वाणी है। उस समय श्रुतज्ञान था। एक से दूसरा सुनता था, अपनी स्मृति में धारण करता था इसीलिए इस ज्ञान को स्मृति कहा जाता था। यही गीता आदि ‘मनुस्मृति’ है।

गीता में भगवान कहते हैं, ‘‘अर्जुन! त्रिगुणमयी प्रकृति गर्भ को धारण करनेवाली माता है और मैं ही परमचेतन बीजरूप से पिता हूँ, अन्य सभी तो निमित्त मात्र हैं। मनुष्य की उत्पत्ति परमात्मा से है। अध्याय १५ में भगवान कहते हैं-

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।

मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। गीता, १५/७

अर्जुन! यह आत्मा मेरा विशुद्ध अंश है – उतना ही पावन जितना स्वयं भगवान। मनसहित इन्द्रियों के व्यापार को लेकर यह आत्मा एक शरीर को त्यागकर नवीन शरीर धारण कर लेता है। वायु गंध के स्थान से जिस प्रकार गन्ध को ग्रहण कर दूसरे स्थान पर वही खुशबू फैला देता है उसी प्रकार भूतादिकों का स्वामी आत्मा जिस शरीर को त्यागता है उसको त्यागते समय मनसहित इन्द्रियों के कार्य-कलाप को लेकर अगले नवीन शरीर में प्रवेश कर जाता है, वहाँ इन्हीं मनसहित इन्द्रियों के माध्यम से पुनः इन्द्रियों के विषयों में प्रवृत्त हो जाता है; किन्तु,

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।

विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः।। गीता, १५/१०

शरीर छोड़कर जाते हुए को, पुनः शरीर धारण करते हुए को, पुनः विषयों में प्रवृत्त होते हुए को विमूढा नानुपश्यन्ति– मूढ़ लोग नहीं जानते, केवल ज्ञानरूपी नेत्रवाले ही भली प्रकार देख पाते हैं।

यहाँ मनुष्य की उत्पत्ति एक परमात्मा से ही है; क्योंकि मनसहित इन्द्रियों का व्यापार पशुओं में, पक्षियों में, जड़ वनस्पतियों में नहीं होता। मनसहित इन्द्रियों के व्यापार को लेकर यह आत्मा मानव-शरीर त्यागकर दूसरे शरीर को धारण करता है। सात्त्विक गुण के कार्यकाल में मृत्यु को प्राप्त पुरुष उन्नत देवयोनि प्राप्त करता है, देव अर्थात् दैवी सम्पद् से सम्पन्न विशुद्ध धर्मपरायण पुरुष के रूप में अवतरित होता है। राजसी गुण के कार्यकाल में मृत्यु को प्राप्त पुरुष सामान्य मानव होता है और तामसी गुण की बहुलता में मृत्यु को प्राप्त पुरुष पशु-पक्षी, कीट-पतंग इत्यादि अधम योनि प्राप्त करता है। यही इस शरीर का गन्ध है जिसे लेकर यह आत्मा अन्य शरीरों में स्थानान्तरित होता है। इसी को भगवान ने गीता के पन्द्रहवें अध्याय के दूसरे श्लोक में कहा, कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके– मनुष्य कर्मों के अनुसार बन्धन तैयार करता है। मनुष्य का इस शरीर से उस शरीर में परिवर्तन की प्रक्रिया को हृदय स्थित आत्मा ही नियन्त्रित करता है, जो मेरा विशुद्ध अंश है।

सृष्टि के आरम्भ में ज्योतिर्मय परमात्मा है। उसका ज्योतिर्मय अंश सूर्य कहलाता है, इसीलिए भगवान कहते हैं कि इस अविनाशी योग को मैंने कल्प के आदि में सूर्य से कहा। सूर्य ने वही उपदेश अपने पुत्र आदि मनु से कहा। मनु ने वह ज्ञान अपनी याद्दाश्त में धारण कर लिया और उसे सुरक्षित रखने के लिये अपने पुत्र इक्ष्वाकु से कहा, इक्ष्वाकु से राजर्षियों ने जाना। इस प्रकार परमात्मा के ज्योतिर्मय अंश से ही वह गीतोक्त ज्ञान प्रसारित हुआ। उसके द्वारा मनु ने जाना, मनु से इक्ष्वाकु और इक्ष्वाकु से राजर्षियों ने जाना। इस महत्त्वपूर्ण काल से यह ज्ञान सृष्टि में लुप्त हो गया था, याद्दाश्त चित्त से उतर गयी थी। योग तो अविनाशी है, कभी नष्ट नहीं होता। हाँ, हमारी समझ से ओझल हो गया था। हमारी याद्दाश्त खो गयी थी।

भगवान ने अर्जुन से कहा, ‘‘वही पुरातन योग मैं तेरे प्रति कहने जा रहा हूँ।’’ अनेक प्रश्न-परिप्रश्न के पश्चात् अर्जुन ने कहा- नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा– अच्युत! मेरा मोह से उत्पन्न अज्ञान नष्ट हो गया, मैं स्मृति को प्राप्त हुआ हूँ, मैं आपके आदेश का पालन करूँगा। हताश अर्जुन ने धनुष उठा लिया और युद्ध में प्रवृत्त हो गया। उसे विजय मिली। सम्पूर्ण धर्मात्मा युधिष्ठिर राज्याभिषिक्त हुए, धर्मसाम्राज्य स्थापित हो गया और एक धर्मशास्त्र के रूप में गीता पुनः, पूर्ववत् प्रसारित हो गयी।

महर्षि वेदव्यास ने श्रुतज्ञान की परम्परा से अलग हटकर पूर्व के समस्त ज्ञान को लिपिबद्ध कर दिया- चारों वेद, भागवत, महाभारत, ब्रह्मसूत्र और गीता। अंत में स्वयं ही उन्होंने बताया कि इनमें शास्त्र कौन है। ‘गीता सुगीता कर्त्तव्या’ गीता भली प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है। यह भगवान पद्मनाभ के श्रीमुख से निःसृत वाणी है तो अन्य शास्त्रों में उलझने की क्या आवश्यकता है? किमन्यै: शास्त्रविस्तरैः– अन्य शास्त्रों के विस्तार में जाने की क्या जरूरत है? यह अकेले ही सम्पूर्ण शास्त्र है। और इस गीताशास्त्र के अनुसार मनुष्य की उत्पत्ति परमात्मा से है।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत) * * *

Q & A
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