महाभारत युद्ध की ऐतिहासिकता और अध्यात्म

महाभारत युद्ध की ऐतिहासिकता और अध्यात्म

भारतीय मनीषियों ने शास्त्र को सदैव दो दृष्टियों से लिखा है– एक इतिहास को कायम रखना जिससे लोग पूर्वजों के पदचिह्नों पर चलते हुए मर्यादित जीवन जी सकें, संस्कृति का निर्वाह करते हुए सुखमय जीवन-यापन कर सकें; लेकिन केवल सुखमय जीवन-यापन कर लेने मात्र से कल्याण सम्भव नहीं है क्योंकि मानव-जीवन जन्म और मृत्यु के बीच का एक पड़ाव ही तो है इसलिए किसी ने जीवन को सुव्यवस्थित काट ही लिया तो इसमें उसका कल्याण कदापि नहीं है। इसिलिए मनीषियों ने शास्त्र-रचना का दूसरा दृष्टिकोण अध्यात्म अपनाया। हर जीव माया के आश्रित है। इसे माया के चंगुल से निकालकर आत्मा की अधिकृत भूमि में खड़ा कर देना, आत्मा को जागृत कर परम तत्त्व परमात्मा तक की दूरी तय करा देना, परमात्मा का दर्शन, स्पर्श और उसमें स्थिति प्रदान कर देना जीव का परम कल्याण है जिसका नाम है भक्ति! भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– अर्जुन! न तो मैं वेद से, न यज्ञ से, न दान से, न तप से ही प्राप्त होनेवाला हूँ बल्कि,

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।

ज्ञातुं   द्रष्टुं     तत्त्वेन  प्रवेष्टुं     परन्तप।। (गीता, ११/५४)

अनन्य भक्ति के द्वारा मैं इस प्रकार प्रत्यक्ष देखने के लिए, जैसा तुमने देखा है, स्पर्श करने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए भी सुलभ हूँ। इस प्रकार इस तड़पती हुई जीवात्मा को परम श्रेय पद दिला देना ही भारतीय मनीषा का प्रधान दृष्टिकोण रहा है। विश्व में युद्ध होते ही रहे हैं – चाहे वह महाभारत हो, राम-रावण युद्ध हो अथवा पुराणों में वर्णित प्रत्येक उपाख्यान – सबकी संरचना इन्हीं दोनों दृष्टियों से हुई है। महापुरुषों ने वास्तव में घटित इन प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं के उदाहरणों द्वारा अन्तरंग साधना के वैदिक तत्त्वों को प्रस्तुत किया है। महाभारत का भीषण संग्राम नि:सन्देह हुआ किन्तु इस युद्ध के नायक भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि जिस सुख के लिए यह युद्ध लड़ा जा रहा है, वह सुख जीतनेवाले को भी नहीं मिलेगा इसलिए उन्होंने आध्यात्मिक दर्शनशास्त्र के रूप में एक ऐसा युद्ध बताया जिसमें एक बार विजय मिल गयी तो शाश्वत विजय–जिसके पीछे हार नहीं, सदा रहनेवाला जीवन–जिसके पीछे मृत्यु नहीं, सदा रहनेवाली शान्ति–जिसके पीछे अशान्ति नहीं। इसके लिए भगवान ने धर्मशास्त्र गीता प्रसारित कर अर्जुन इत्यादि पात्रों को प्रत्येक मनुष्य में निहित आन्तरिक क्षमताओं के प्रतीक के रूप में लेते हुए आन्तरिक युद्ध का सूत्रपात् कर दिया और शाश्वत सत्य को प्राप्त करने का द्वार सबके लिए खोल दिया। अन्त:करण की दो वृत्तियाँ पुरातन हैं। एक है दैवी सम्पद् जो परमदेव परमात्मा तक की दूरी तय कराकर, उनका दर्शन, स्पर्श और उनमें प्रवेश दिलाकर परमात्मा में ही विलीन हो जाती है; और दूसरी है आसुरी सम्पद् जो प्रकृति के अन्धकार में भटकाती ही रहती है, जिसमें आवागमन का अन्तहीन चक्र है जो रुकता कभी नहीं, पहुँचाता कहीं नहीं, जिसमें जीव क्लेश पर क्लेश ही पाता है। जीव को इस भटकाव से निकालकर उस अविनाशी पद को देनेवाली साधना पद्धति गीता है।

धन-ऐश्वर्य से मदान्ध लोग समझाने से भी नहीं समझते। सर्वस्व दाँव पर लगाकर लड़ते-लड़ते विजयश्री मिली तब समझ में आया कि यह भी एक धोखा ही था। उस समय मनुष्य समझने लायक होता है। यही महाभारत युद्ध के विजेता युधिष्ठिर के साथ भी हुआ। इस युद्ध के उपरान्त वह ३६ वर्षों तक सिंहासन पर बैठे किन्तु उनके आँसू एक पल के लिए भी नहीं रुके। एक दिन जब उन्होंने सुना कि भगवान श्रीकृष्ण ने धरा-धाम का त्याग कर दिया, वह सिंहासन से उठे और चुपचाप हिमालय की ओर चल पड़े।

दुर्योधन का एक भाई युयुत्सु इस युद्ध के आरम्भ में युधिष्ठिर की ओर आकर कहने लगा– भैया! धर्म आपके पक्ष में है, मैं आपकी ओर से लड़ूँगा। युधिष्ठिर ने उससे कहा– तुम्हें लड़ने की क्या आवश्यता! तुम समझदार हो, शिविर की व्यवस्था देखो। युद्ध के पश्चात् भी वह जीवित था। युधिष्ठिर को जाता हुआ देख वह बोला– भैया! कहाँ चले? कोई उत्तर नहीं मिला। उसने पुन: कहा कि इस रत्नजटित सिंहासन पर कौन बैठेगा? युधिष्ठिर ने कहा– तू बैठ ले। उसने कहा– यह हमें नहीं चाहिये। युधिष्ठिर ने कहा– इसी के लिए लगभग छ: अरब शूरवीर मर गये। रक्त की सरिता के ऊपर रखे इस सिंहासन पर बैठकर देख तो ले कि इसमें कितना सुख है। उसने कहा– यह उसे किसी काल में भी नहीं चाहिये।

युधिष्ठिर ने कहा– तू इस पर बैठता तो मुझे प्रसन्नता होती किन्तु यदि यह तुम्हें नहीं चाहिये तो परीक्षित कहीं होगा, उसे बता देना। वह बैठेगा तो ठीक, और नहीं बैठेगा तब भी कोई हानि नहीं है। कौन नश्वर के पीछे आँसू बहाता फिरे…। ऐसा कहते हुए भाईयों और द्रौपदी सहित महाराजा युधिष्ठिर ध्यान-संयमपूर्वक गीतोक्त पथ पर आयुपर्यन्त के लिए हिमालय की ओर निकल गये, उस युद्ध-पथ पर बढ़ गये जिसमें विजय होने पर शाश्वत विजय है। ज्योतिर्मय परमात्मा की साधना-पद्धति है गीता!

‘महाभारत युद्ध हुआ’–यह ऐतिहासिक सत्य है किन्तु वह युद्ध तो आया और गया जबकि सदा रहनेवाला जीवन, सदा रहनेवाला सत्य गीता का यही उपदेश है। यह धर्मशास्त्र है। स्वयं भगवान ने गीता को शास्त्र कहा– इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ। (गीता, १५/२०)– अर्जुन! यह गोपनीय से भी अति गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। इसका जो यथावत् पालन करेगा उससे प्रिय मेरा सृष्टि में कोई नहीं होगा। उसी गीता का यथावत् भाष्य ‘यथार्थ गीता’ है। आप सब इसका अनुशीलन कर परमश्रेय के भागी बनें।

।। ओम् ।।

Q & A
×