श्रीकृष्ण एक योगी थे
प्रश्न– महाराजजी! कुछ लोग कहते हैं कि रास रचानेवाले श्रीकृष्ण और गीता के उपदेशक श्रीकृष्ण भिन्न–भिन्न थे। दोनों एक हो नहीं सकते। कुछ लोग कहते हैं, वे मनुष्य नहीं बल्कि सोलह कला के पूर्ण अवतार थे, साक्षात् भगवान थे। वास्तव में श्रीकृष्ण कौन थे?
उत्तर– श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व विवाद का शीर्षक बना हुआ है। यादव लोग उन्हें अपनी बिरादरी का मानते हैं। नृत्य-संगीत विशारद उन्हें अपना प्रणेता कहते हैं। अंग्रेज उन्हें कुशल कूटनीतिज्ञ के रूप में देखते हैं, तो भारत की अधिकांश जनता उन्हें भगवान के रूप में पूजती है अतः आपकी जिज्ञासा स्वाभाविक है कि श्रीकृष्ण कौन थे?
वस्तुतः श्रीकृष्ण एक योगी थे। योग ही वह क्रिया है जिस पर चलकर साधक परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। ‘ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मैव भवति’, ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ (मानस, 2/126/3)- भगवान को जानते ही योगी भी भगवान हो जाता है। उसका सेवक एवं जीव-भाव तिरोहित हो जाता है और स्वामी ही सदा-सदा के लिए शेष बचता है। ‘अयम् आत्मा ब्रह्म’, ‘तत्त्वमसि’, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ इत्यादि ऋचाओं में इसी रहस्य की अभिव्यक्ति हुई है।
1- गीता के सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने भी इसी तथ्य का समर्थन किया है। वे कहते हैं कि अनेक जन्मों के पश्चात् अन्त के जन्म में तत्त्व-साक्षात्कार को प्राप्त हुआ ज्ञानी मेरा साक्षात् स्वरूप है-
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।। (7/18)
ज्ञानी तो मेरा साक्षात् स्वरूप ही है, भगवन्मय है। क्योंकि वह मेरे में ही अच्छी प्रकार स्थित है। ऐसे ज्ञानी भक्तों और श्रीकृष्ण की स्थिति में कोई अन्तर (श्रीकृष्ण के शब्दों में) नहीं है। कहना न होगा, श्रीकृष्ण एक योगी ही थे, महात्मा ही थे और तत्त्वज्ञ महात्मा ही भगवान होता है। भक्ति के द्वारा ही कोई भी मनुष्य भगवान हो सकता है।
2- महात्मा श्रीकृष्ण ने गीताशास्त्र में यत्र-तत्र सर्वत्र अपना परिचय दिया है। टीकाओं में न जाकर योगेश्वर श्रीकृष्ण की मूलवाणी पर दृष्टिपात करें तो श्रीकृष्ण के स्वरूप को लेकर भ्रान्ति नहीं होगी। गीता के तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने प्राप्तिवाले महापुरुष के लक्षण बताये और फिर ऐसे महात्माओं के समकक्ष अपने को भी घोषित किया। वे कहते हैं कि जो पुरुष मेरे द्वारा निर्धारित किये हुए कर्म को नहीं करता (उल्लेखनीय है कि श्रीकृष्ण केवल आराधना को ही कर्म मानते हैं- ‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।’ (गीता, 3/9) वह पापायु पुरुष व्यर्थ जीता है किन्तु जो पुरुष आत्मा में ही रत, तृप्त तथा सन्तुष्ट है, उसके लिए कर्मों की अर्थात् आराधना की आवश्यकता नहीं है। उस पुरुष द्वारा इन कर्मों को किये जाने से न कोई लाभ है और न छोड़ने से हानि ही है। इस स्थिति को बिना कर्म किये कोई नहीं पाता। जनक इत्यादि भी इसी कर्म (आराधना) को करके परमसिद्धि को प्राप्त हुए। ऐसे पुरुष केवल लोकशिक्षण अथवा लोक-कल्याण के निमित्त ही स्वयं कर्म में बरतते हैं।
इतना कहने के पश्चात् श्रीकृष्ण ऐसे महात्माओं से अपनी तुलना करते हैं- कौन्तेय! मुझे भी प्राप्त होने योग्य किंचित् मात्र वस्तु अब अप्राप्य नहीं है अर्थात् मैं भी आत्मतृप्त हूँ। महात्माओं की ही तरह मुझे भी अब कर्म करने की आवश्यकता नहीं है फिर भी पीछेवालों के हित की इच्छा से मैं भली प्रकार कर्म में बरतता हूँ। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने महापुरुषों से अपनी तुलना करते हुए संकेत दिया कि मैं भी एक योगी हूँ।
3- दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह आत्मा अपरिवर्तनशील, न सूखनेवाली, न जलने-गलनेवाली, नित्य, व्यापक, अचल और सनातन है। इसी आत्मा को साक्षात् जानना ही सनातन-धर्म है। किन्तु ऐसी आत्मा सबमें है तो खोजा किसे जाय? श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा को इन विभूतियों से युक्त तत्त्वदर्शियों ने देखा। साधारण लोगों को आत्मा के यह गुण दिखाई नहीं पड़ते। प्रायः शोक, सन्ताप और मृत्यु का कारण माया ही दिखाई पड़ती है। किन्तु श्रीकृष्ण आत्मा को इन विभूतियों के साथ जानते हैं अतः वे तत्त्वदर्शी महापुरुष हैं, योगी हैं।
4- अध्याय चार में कर्म एवं उसके परिणामस्वरूप ज्ञान की प्रक्रिया सीखने के लिए निर्देश दिया- अर्जुन! तत्त्वदर्शी महात्माओं की शरण में जाओ। उन्हें दण्ड-प्रणाम करो, उनकी सेवा करो, वे तुममें ज्ञान और साधन जागृत करेंगे। वस्तुतः अनुरागी ही अर्जुन है। श्रीकृष्ण ने भविष्य में आनेवाली पीढ़ी, योग-परम्परा एवं होनेवाले साधकों का ध्यान अपने शास्त्र में रखा। वे जानते थे कि आज तो यह अनुरागी मेरी शरण में है किन्तु हजारों वर्ष पश्चात् भविष्य में जो अनुरागी होंगे, वे किसकी शरण लेंगे? अतः अनुरागियों को उन्होंने तत्त्वदर्शी महात्माओं की शरण में जाने की सलाह दी। पहले तो अर्जुन को तत्त्वदर्शियों के पास जाने को कहा। जब स्वयं भगवान ही सामने खड़े थे तो तत्त्वदर्शियों की शरण में जाने को क्यों कहा? क्योंकि श्रीकृष्ण स्वयं एक योगी थे। अठारहवें अध्याय में सबके हृदय में ईश्वर का निवास बताते हुए उस ईश्वर की शरण में जाने को कहा और अन्त में ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।’ (गीता, 18/65) कहकर अपने शरण में आने को कहकर स्पष्ट कर दिया कि तत्त्वदर्शी महात्मा और श्रीकृष्ण का स्तर एक ही है।
5- अध्याय चार में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मेरे दिव्य जन्म-कर्म को जो तत्त्व से जानता है वह मुझे ही प्राप्त होता है और ऐसे बहुत से पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं। ‘बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।’ (गीता, 4/10)- बहुत से तत्त्वदर्शी महात्मा श्रीकृष्ण के समकक्ष स्थिति के हैं। इसे और स्पष्ट कहा जाय तो कहना होगा- श्रीकृष्ण भी एक तत्त्वदर्शी महात्मा ही थे।
6- चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘चार्तुवर्ण्यं मया सृष्टम्’- चारों वर्णों की सृष्टि मैंने की। तो क्या मनुष्यों को चार भागों में बाँट दिया? श्रीकृष्ण कहते हैं, नहीं, ‘गुणकर्मविभागशः’ (गीता, 4/13)- गुणों के माध्यम से कर्म को चार श्रेणियों में बाँटा। योगेश्वर श्रीकृष्ण आराधना को ही कर्म मानते हैं जिसके द्वारा परमतत्त्व परमात्मा तक की दूरी तय होती है। श्रीकृष्ण ने इसी चिन्तन-क्रम को गुणों के आधार पर चार सोपानों में बाँटा और कहा कि इनके कर्ता मुझ अव्यक्त स्वरूप को अकर्ता ही जान। प्रश्न उठना स्वाभाविक था कि आप करते हैं फिर भी अकर्ता कैसे बने रहते हैं? कर्मों से आप लिपायमान क्यों नहीं होते? श्रीकृष्ण समाधान करते हैं कि कर्मों के फल में मेरी स्पृहा भी नहीं है। कर्मों अर्थात् आराधना का फल है शाश्वत परमात्मा में विलय। परमात्मा अलग होता तो कदाचित् स्पृहा भी होती; किन्तु वह परमात्मा भी मुझसे विलग नहीं है अतः कर्मों में मेरी स्पृहा भी नहीं है। जिस भोजन को आप करते हैं उससे भी श्रेष्ठ भोजन देखकर खाने की इच्छा अवश्य होगी; किन्तु परमात्मा से श्रेष्ठ, जिससे आगे कोई सत्ता है ही नहीं, वह हमें प्राप्त है तो हम ढूँढे़ किसे? इसलिए मेरी स्पृहा नहीं है।
इतना ही नहीं, उपर्युक्त योग्यता के साथ जो भी मुझे जानता है उसे भी कर्म नहीं बाँधते। ‘एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः’ (गीता, 4/15)- पहले के मुमुक्षु पुरुषों ने इसी आशा से कर्म का आचरण किया। अर्जुन! तू भी इसी प्रकार कर तो कर्मों से नहीं बँधेगा। जैसे श्रीकृष्ण वैसा ही अर्जुन या कोई भी साधक बन सकता है। अतः श्रीकृष्ण भी एक योगी ही थे।
7- अध्याय नौ में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं उस परम का स्पर्श करके परमभाव में स्थित हूँ; किन्तु मेरी स्थिति को न जाननेवाले मूढ़लोग मुझे तुच्छ कहते हैं, ‘न कुछ’ कहकर पुकारते हैं, किन्तु दैवी सम्पद् से युक्त विवेकीजन मुझे श्रद्धा से जपते हैं। ‘पत्रं पुष्पं फलं तोयम्’ (गीता, 9/26) जो कुछ भी वे अर्पित करते हैं उसे मैं ग्रहण करता हूँ और उनका परम कल्याण करता हूँ।
महापुरुष और क्या होते हैं? वे भी साधारण मनुष्य के स्तर से शनैः-शनैः उत्थान करते-करते परम का स्पर्श करके परमभाव में स्थित होते हैं। आसुरी सम्पद्वाले उन्हें तुच्छ कहकर सम्बोधित करते हैं; किन्तु दैवी सम्पद्वाले अनन्य श्रद्धा से उन्हें अपने आपको समर्पित करते हैं।
8- तेरहवें अध्याय में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन! यह शरीर ही क्षेत्र है, जिसमें भले-बुरे संस्कारों के बीज जन्मान्तरों तक फल देनेवाले हैं। शरीर के तीन भाग हैं- स्थूल, सूक्ष्म और कारण, इन्हें और इनके साथ परमपुरुष को साक्षात्कार के साथ जो जान लेता है वह क्षेत्रज्ञ है- ऐसा उन मनीषियों ने कहा है जो क्षेत्र के तत्त्वज्ञ हैं। अर्जुन! तू भी मेरे को क्षेत्रज्ञ जान। यहाँ श्रीकृष्ण पहले तो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विभाजन करते हैं, फिर उनकी जानकारीवाले महात्माओं को क्षेत्रज्ञ बताकर स्वयं को भी क्षेत्रज्ञ के रूप में प्रकट करते हैं। अतः सिद्ध है कि श्रीकृष्ण भी एक योगी थे, महात्मा थे।
9- अठारहवें अध्याय में अर्जुन ने श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हुए पूछा- महाबाहो! संन्यास और त्याग के तत्त्व को मैं पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ। तब योगेश्वर श्रीकृष्ण बोले-अर्जुन! बहुत से पण्डित काम्य कर्मों के त्याग को ही संन्यास कहते हैं (कर्म का तात्पर्य आराधना है) अर्थात् जिस आराधना के पीछे लौकिक आशाएँ छिपी हों, उन कामनाओं के त्याग को ही संन्यास कहते हैं। अनेक विचार-कुशल पुरुष कर्म-फल के त्याग को ही त्याग कहते हैं। कई मनीषियों का विचार है कि सभी कर्म दोषयुक्त हैं अतएव त्याज्य हैं, तथा दूसरे विद्वान् ऐसा कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म किसी भी काल में त्यागने योग्य नहीं हैं। हे अर्जुन! उस त्याग के विषय में तू मेरे निश्चय को भी सुन! त्याग तीन प्रकार का कहा गया है। यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं। यज्ञ, दान और तप तीनों विवेकी पुरुषों को भी परम पवित्र करनेवाले हैं।
यहाँ श्रीकृष्ण ने धर्म एवं साधना के नाम पर प्रचलित विचारधाराओं की समीक्षा की और अपना मत भी प्रतिपादित किया। प्रचलित सभी विचारधारायें दोषपूर्ण नहीं थीं, उनमें से एक धारा यथार्थ भी थी कि बहुत से मनीषियों का कहना है कि यज्ञ, दान और तपरूपी कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं। उन्हीं मनीषियों के निर्णय को पुष्ट करते हुए श्रीकृष्ण ने भी अपना निश्चय सुनाया कि यज्ञ, दान और तपरूपी कर्म किसी काल में त्यागने योग्य नहीं हैं। अर्थात् जैसे वे मनीषी वैसे ही योगेश्वर श्रीकृष्ण! श्रीकृष्ण उन्हीं के निर्णय को स्वीकार करते हैं। अतः स्पष्ट है, श्रीकृष्ण उन्हीं में से एक हैं, योगी हैं।
10- गीता के समापन पर एकाग्रचित्त संजय ने भी श्रीकृष्ण का परिचय योगेश्वर कहकर दिया-
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुर्वा नीतिर्मतिर्मम।। (गीता, 18/78)
योगेश्वर उसे कहते हैं, जो योगी हो और दूसरों को भी योग प्रदान करने की जिसमें क्षमता हो, योग पर जिसका स्वामित्व हो। यही पूर्णता तथा पूर्णयोगी के लक्षण हैं। स्पष्ट है, श्रीकृष्ण भी उनमें से एक हैं, एक योगी हैं।
वस्तुतः मानव-मन की एक बड़ी कमजोरी है कि वह अच्छाइयों पर चलने से कतराता है, तरह-तरह के बहाने ढूँढ़ लेता है। श्रीकृष्ण के सद्गुणों को अपने में ढालने की अपेक्षा यह कहकर सन्तोष करना चाहता है कि श्रीकृष्ण तो अपौरुषेय थे, अलौकिक थे। जिन कार्यों को उन्होंने किया, मैं कैसे कर सकता हूँ? वे पुरुष नहीं भगवान थे, अवतार थे। मनुष्य भगवान को जानता नहीं बल्कि मान लेता है, जबकि श्रीकृष्ण आपका आह्वान करते हैं, प्रोत्साहित करते हैं कि बहुत से साधक मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं। आप भी उन्हीं रास्तों का अनुसरण करें और कल्याण के भागी बनें।
प्रश्न– महाराजजी! क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के प्रकरण को और अधिक स्पष्ट किया जाय।
उत्तर– देखिये, अध्याय तेरह में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की व्याख्या करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।। (गीता, 13/1)
अर्जुन! यह शरीर ही क्षेत्र है। इसमें बोया हुआ भला और बुरा बीज संस्कार-रूप में उगता है और जन्मान्तरों तक फल देता है। इसको जो साक्षात् जानता है उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं; ऐसा उसके स्वरूप को जाननेवाले महर्षियों ने कहा है। हे अर्जुन! मुझको भी सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ ही जान। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विभाजन और तत्त्वतः उनकी जानकारी का नाम ही ज्ञान है।
यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कुछ भी रट लेने का नाम ज्ञान नहीं है बल्कि स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों शरीरों का निरोध और निरोध के साथ ही उस परमपुरुष की प्रत्यक्ष अनुभूति का नाम ही ज्ञान है। प॰चमहाभूतों (क्षिति, जल, गगन, पावक, समीर) से निर्मित स्थूल शरीर एवं मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार से सृजित सूक्ष्म शरीर तथा चेतना से निर्मित कारण शरीर यह सब क्षेत्र है। ये जब तक रहेंगे तब तक शरीर किसी-न-किसी रूप में विद्यमान रहेगा। इस क्षेत्र का पार पाकर उस शाश्वत पुरुष, परमतत्त्व की अनुभूति और उसमें स्थिति का नाम ज्ञान है। प्रकृति और पुरुष के विभाजन की जानकारी ही ज्ञान है।
श्रीकृष्ण के ही शब्दों में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की यह परिभाषा उन महापुरुषों ने दी जो इसके जानकार थे। जो भी इसे जानता है, क्षेत्रज्ञ है। वे महापुरुष क्षेत्रज्ञ थे और ‘अर्जुन! मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ।’ अर्थात् श्रीकृष्ण भी एक महात्मा थे, योगी थे। जो क्षेत्र में फँसता नहीं बल्कि उसका संचालक है।
प्रश्न– महाराजजी! हर व्यक्ति अलग–अलग क्षेत्रज्ञ बनता है अथवा क्षेत्रज्ञ बनने पर सम्पूर्ण जीवों के शरीर को जान लेता है?
उत्तर– क्षेत्रज्ञ अलग-अलग नहीं होते। विकारों सहित प्रकृति और पुरुषत्व की साक्षात् अनुभूति जो भी कर लेता है, वह क्षेत्रज्ञ बन जाता है। ऐसा महापुरुष परमात्मा में स्थित है जो सम्पूर्ण जीवात्माओं का केन्द्र है, मूल है, उद्गम-स्थल है। इसलिए कोई आत्मा कहीं से चिन्तन करती है, ऊपर उठती है तो तत्क्षण वह क्षेत्रज्ञ उसको संचार प्रदान करेगा, दिशा-निर्देशन करेगा। वह एक साथ सहस्रों को जानता, उनके मनोगत भावों के अनुसार उन्हें निर्देशित करता है। एक साथ उनके भावों को तौलता है। फल के साथ उनका उत्थान करते हुए अपने क्षेत्रज्ञ रूप में स्थितिपर्यन्त उन्हें चलाता है। यही उस क्षेत्रज्ञ की सर्वज्ञता है। हजारों लोग याद करें अथवा अनन्त, क्षेत्रज्ञ एक साथ सबमें संचारित हो जायेगा। उसे कुछ करना नहीं पड़ता; क्योंकि वह सबके मूल केन्द्र में स्थित है। महापुरुषों की यह विशेषता है कि जिस साधक ने उन्हें हृदय से पकड़ा, तत्क्षण उसकी आत्मा से जागृत होकर, अभिन्न होकर उसका पथ-संचालन करने लगते हैं और क्रमशः प्रकृति के द्वन्द्वों से निकालते हुए शनैः-शनैः उत्थान कराते हुए क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विभाजन तथा तत्त्व की अनुभूति साधक को भी करा देते हैं। फिर तो साधक भी क्षेत्रज्ञ हो जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, मैं ही क्षेत्रज्ञ हूँ- ऐसा नहीं है; अपितु जो भी जान लेता है वह क्षेत्रज्ञ है। मैं क्षेत्रज्ञ हूँ तो आप भी बन सकते हैं। मानव अथवा जड़-चराचर ही अष्टधा मूल प्रकृति, पंचमहाभूत- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और चेतना का विकार है। क्षेत्रज्ञ इन सभी को जानता है, इसका संचालक भी है।
प्रश्न– महाराजजी! जड़ में चेतन की अनुभूति कैसे होगी?
उत्तर– जड़ हमारी दृष्टि में जड़ है किन्तु स्वयं में चेतन है। पत्थर आपकी दृष्टि में जड़ है किन्तु स्वयं में चेतना से ओतप्रोत है। अब तो आपका विज्ञान भी स्वीकार करता है। वस्तुतः सबके मूल ब्रह्म में स्थित महापुरुष जहाँ भी दृष्टि डालता है ‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’ ही दिखाई देता है। ‘सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरे धनु बाना।।’ (मानस, 2/130/7)- उसकी दृष्टि में न स्वर्ग स्वर्ग के रूप में रहता है और न नरक नरक के रूप में। जहाँ भी दृष्टि पड़ती है, उसी परमतत्त्व परमात्मा का प्रसार ही दृष्टिगोचर होता है। यही क्षेत्रज्ञ की स्थिति है। गीता में भी इस स्थिति का चित्रण है-
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।। (गीता, 5/18)
जो विप्र हैं अर्थात् परब्रह्म से आप्लावित हैं, उनकी विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण और चाण्डाल; कुत्ता, हाथी और गाय सब में समान दृष्टि रहती है। उनकी दृष्टि में न गाय धर्म है न कुत्ता अधर्म है। न विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण कोई श्रेष्ठता रखता है, न चाण्डाल कोई हीनता रखता है। शरीर, चमडे़, रंग और मस्तिष्क पर महापुरुष दृष्टि ही नहीं डालते हैं। उनकी दृष्टि सीधे उनकी आत्मा पर पड़ती है जो उसके अन्दर भी संचारित है।
प्रश्न– किन्तु महाराजजी! कुतिया चाहे अपने बारहों स्तनों से दूध दे और गाय चाहे दूध न भी दे फिर गाय तो गाय और कुतिया तो कुतिया ही रहेगी। दोनों समान कैसे हो सकते हैं?
उत्तर– देखिये, वाल्मीकि पहले चाण्डाल थे, लोग ऐसा ही उन्हें कहते हैं। किन्तु महापुरुषों ने उन्हें चाण्डाल और डाकू के रूप में नहीं देखा। उन्हें तुरन्त दिशा दी और ‘बालमीकि भये ब्रह्म समाना।’ (मानस, 2/193/8)- ब्रह्मर्षि के रूप में परिणत हो गये। इस प्रकार उन महापुरुषों की दृष्टि आत्मा पर ही रहती है और जब भी आत्मा उनकी ओर झुकाव लेगी वे तुरन्त उसे पकड़कर स्थूल-सूक्ष्म-कारण पर्यन्त शरीरों में निराई प्रारम्भ कर देते हैं। शनैः-शनैः उसकी आत्मा से अभिन्न होकर रथी बन जाते हैं; फिर तो ‘जाके रथ पर केसो। ता कहँ कौन अँदेसो।।’ उत्थान करते-करते उस शाश्वत तक की दूरी तय करा देते हैं। वह साधक भी क्षेत्रज्ञ बन जाता है। श्रीकृष्ण भी इसी प्रकार क्षेत्रज्ञ थे, योगी थे।
तुम अपने अन्तराल में उस अधिकार का अर्जन करो तथा ऐसे महापुरुषों की मन, वचन, कर्म से शरण ग्रहण करो, तुम भी प्रेरणा-स्रोत उसी शाश्वत स्वरूप को क्रमशः पाओगे; और यह कुतिया तथा गाय तो भिन्न श्रेणी के जीव हैं। किन्तु शूद्र, जिन पर शूद्रत्व लादा गया तथा ब्राह्मण, ईसाई सभी एक ही मानव हैं। यह उदाहरण ही तुम लोगों ने गलत उठाया है।
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)