श्रीकृष्ण–परिचय
महायोगेश्वर श्रीकृष्ण भी इसी स्थिति से संयुक्त एक महापुरुष हैं। उन्होंने स्वयं अपना परिचय योगामृत प्रसारिणी वाणी ‘गीता’ शास्त्र में दिया है, जिसका तात्पर्य है कि श्रीकृष्ण एक योगप्रदाता महापुरुष हैं। महर्षि व्यास ने भी इसका समर्थन मुक्तकण्ठ से यथार्थतः परम पुरुष के परिवेश में किया है; किन्तु सूर, चैतन्य, जयदेव इत्यादि बहुत से रसिक भक्तों एवं कवियों ने विभिन्न भाषा तथा भावों में योगेश्वर श्रीकृष्ण के पावन चरित्र को उद्धृत करते हुए भगवत्ता की पुष्टि की है। योगक्रिया की जागृति से प्रत्येक साधक ने उन महान् ऐश्वर्यसम्पन्न पुरुषों को इसी परिवेश में पाया है। उन्हें परात्पर ब्रह्म, परमात्मा का किंवा अवतार कहा है। वैसे यथार्थतः सत्य वही है, जो योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी से निःसृत है। योगेश्वर श्रीकृष्ण के पावन मुख से प्रसारित एवं निःसृत वाणी गीता से विदित होता है कि वे आत्मस्थित महापुरुष हैं। भक्त अर्जुन का कल्याण-सम्पादन करते हुए उन्होंने अपनी शाश्वत वाणी से अनेक भ्रान्तियों का निवारण किया, जैसे- सनातन, शाश्वत, अजर, अमर, आत्मा तथा परमात्मा का भेद और स्थिति, वर्ण-व्यवस्था तथा वर्णसंकर का स्वरूप, कर्म तथा अकर्म, ज्ञानमार्ग तथा योगमार्ग के कर्म का विश्लेषण, मानव के दो रूप, यज्ञ तथा कर्म की अभिन्न प्रणाली इत्यादि। इसके साथ ही उन्होंने अपने वास्तविक स्वरूप से भी अवगत कराया कि हे अर्जुन! मैं भी एक महापुरुष के समान अवस्था-विशेषवाला हूँ। परमात्म-तत्त्वमयी स्थितिवाले महापुरुष की विशेषताओं (जैसे आत्मा में ही तृप्त अभिन्न तथा परिपूर्ण पावनता) से तुलना करते हुए स्पष्ट शैली में बताया कि मैं एक महापुरुष हूँ- जैसा कि गीता के अध्याय ३ में श्लोक १६ से २३ तक (क्रियात्मक तथा बोधगम्य शैली में हृदयंगम करें) द्रष्टव्य है-
‘‘जो पुरुष मेरे द्वारा निर्धारित किए हुए यज्ञ-कर्म को नहीं करता, वह पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है; किन्तु जो पुरुष आत्मा से परिपूर्ण, सन्तुष्ट तथा तृप्त है और आत्मरत है, उसके लिए कभी कर्मों की आवश्यकता नहीं है। उस पुरुष द्वारा इस कर्म-विशेष के किये जाने से न कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि ही है। किन्तु इस आत्मवत् स्थिति-विशेष को बिना कर्म किये कोई नहीं पाता। जनक इत्यादि महर्षिगण भी इसी कर्म-विशेष को करके ही परमसिद्धि (नैष्कर्म्य) को प्राप्त हुए। ऐसे महापुरुष लोक-शिक्षा एवं पीछे चलनेवालों के हित की शुभेच्छा से कर्म में ही बरतते हैं। कौन्तेय! मुझे प्राप्त होने योग्य किंचिन्मात्र वस्तु भी अब अप्राप्त नहीं है, फिर भी पीछेवालों के हित की इच्छा से मैं भी भली प्रकार कर्म में बरतता हूँ। यदि मैं सावधान होकर कर्म में न बरतूँ, तो यह समस्त प्रजा (समाज) ही वर्णसंकर तथा नष्ट-भ्रष्ट हो जाय और मैं इस प्रजा को नष्ट करनेवाला दोषी बनूँ।’’
टिप्पणी– प्रत्येक जीवात्मा का शुद्ध वर्ण एवं उसकी आकृति परब्रह्म परमात्मा ही है जो आत्मा एवं परमात्मा का संयोग होने पर सम्भव है। अतः उस यज्ञ-कर्म के विस्मृत हो जाने पर पुरुष वर्णसंकरता के गर्त में पहुँच जाता है। उस कर्म-विशेष एवं यज्ञ-कर्म की जागृति पूर्ण महापुरुष से सम्बन्ध रखती हुई प्रवाह रूप लेती है।
वस्तुतः मानव-मस्तिष्क एक नियम-विशेष से आबद्ध है। सम्मानित महापुरुष जो आचरण कार्यरूप से प्रमाणित कर जाता है उसी का वह अनुसरण करता है। इसलिए महापुरुषों को चाहिए कि स्वयं के लिए किंचिन्मात्र आवश्यकता न होने पर भी पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिए भली-भाँति यज्ञ-कर्म करें और उनसे करावें। उन अज्ञानियों की क्रिया में भ्रम उत्पन्न न करें।
स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण ने आत्मस्थित महापुरुषों से तुलना करते हुए अपना परिचय दिया कि मैं एक महापुरुष हूँ। वे कहते हैं कि, ‘‘मेरे लिए कोई कर्म लागू नहीं है।’’ इसी प्रकार, ‘‘स्वरूप में स्थित, आत्मा ही में सन्तुष्ट पुरुष के लिए भी कर्म आवश्यक नहीं है। मैं भी पीछेवालों के हित की इच्छा से कर्म में भली प्रकार बरतता हूँ और वे महापुरुष भी पीछेवालों के कल्याणार्थ कर्म करते एवं पीछेवालों के हित की इच्छा से ही आराधना में बरतते हैं।’’ कर्म का अर्थ आराधना है।
अध्याय ९ में ११ से १५वें श्लोक तक तथा अध्याय ७ में ब्रह्मविद्या का विज्ञान सहित परिचय देते हुए; स्वयं सबसे अलग स्थित होने पर भी यौगिक प्रभाव से सबके सम्पर्क में रहने का परिचय देते हुए कहा कि, ‘‘दोष-दृष्टिवाले मेरे को ऐसा न समझकर अपनी उलटी ही कल्पना करते हैं। सर्वभूतों के महान् ईश्वर, मेरे ऐसे स्थित अथवा परमभाव को न जाननेवाले मूढ़लोग मुझे तुच्छ कहकर पुकारते हैं। मनुष्य-शरीर का आधारवाला होने से मुझ महान् आत्मा को साधारण मनुष्य मानते हैं- ऐसा कहनेवाले वृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञानवाले तथा भ्रमित चित्तवाले पुरुष मोहित करनेवाली आसुरी तथा राक्षसी वृत्ति धारण किये रहते हैं; परन्तु हे अर्जुन! दैविक प्रकृति और यथार्थ दृष्टिवाले जो महात्माजन हैं वे सनातन, अविनाशी समझकर अनन्य भाव से मुझे भजते हैं। देखिये यहाँ पर स्वयं भगवान ने मनुष्य-शरीर के अन्दर रहनेवाली अपनी मानसिक गति को महान् ईशत्व में तथा परमतत्त्व में स्थित बताते हुए स्पष्ट कर दिया कि मैं एक योगी हूँ। योगी भी शरीर के आश्रित स्थित रहता है और मैं भी शरीर के ही आधारवाला हूँ।
गीता की समाप्ति पर एकाग्रचित्त संजय ने भगवत्तत्त्व को अक्षरशः समझा और उसी के प्रभाव से अपने आपको कृतार्थ तथा परलोकवासी भी बनाया। उसी संजय ने भगवान श्रीकृष्ण का पूरा-पूरा परिचय ‘योगेश्वर श्रीकृष्ण’ एवं योगैश्वर्य से अलंकृत करते हुए दिया। जो स्वयं योगी हो और योग प्रदान करने की जिसमें क्षमता हो, उसे योगेश्वर कहते हैं। महाभारत की समाप्ति पर पुनः गीता के विषय में चर्चा चलने पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि, ‘हम तो भूल गए।’ अर्जुन को भी अब उसका स्मरण नहीं रह गया था; क्योंकि पूर्णता के बाद वस्तु-स्थिति के साथ साधनीय जानकारियाँ भी उस पूर्णत्व के परम आनन्द में तद्रूप तत्त्वस्वरूप ही हो जाती हैं, लेकिन अन्य के लिए विधान है। संजय नहीं भूला था। उसने साफ-साफ भगवान का परिचय देते हुए कहा-
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।। (गीता, १८/७८)
योगेश्वर अर्थात् योग के ईश्वर, जिन्हें योग पर स्वामित्व प्राप्त हो। यही पूर्णता तथा पूर्ण योगी के लक्षण हैं। इसलिए भगवान ने कहा कि महात्माओं की शरण जाओ। उन्हें भली-भाँति दण्डवत्-प्रणाम कर उन्हीं के नियम का अनुकरण करो, जिससे वे प्रसन्न हो जायँ। उनके पीछे अपने आप को हवन कर दो। वे तत्त्व को जाननेवाले तेरे को उसी तत्त्व का उपदेश करेंगे और तुमको अपने तत्त्व की ओर खींचेंगे। अनुरागी ही अर्जुन है और वह महापुरुष जानते हैं कि आज यह अनुरागी तो मेरी शरण में है, लेकिन दो सौ साल बाद (भविष्य में) जो अनुरागी होंगे, वे किसकी शरण लेंगे? अतः किसी योगेश्वर की शरण में जाओ; क्योंकि श्रीकृष्ण योगेश्वर थे।
श्रीकृष्ण ने भविष्य में आनेवाली पीढ़ी, योग-परम्परा का एवं होनेवाले साधकों का पूरा ख्याल अपने शास्त्र में रखा है, जैसा कि वे पहले बता आये हैं कि मेरे लिए कोई कर्म शेष नहीं है, फिर भी पीछेवालों की हित की इच्छा से कर्म करता हूँ। इसी प्रकार तत्त्वदर्शी योगी के लिए भी कोई कर्म शेष नहीं रहता, फिर भी पीछेवालों को चलाने के लिए वह कर्म में बरतता है।
नोट – योगेश्वर श्रीकृष्ण आराधना को ही कर्म मानते हैं।
महापुरुष स्वयं में पूर्ण, अवतार के ज्ञाता तथा पूर्ण ब्रह्ममयी स्थितिवाले होते हैं। वे शरीर कदापि नहीं हैं। हाँ, जब शरीर का जीवनकाल शेष रहे और योगी का योग-साधन मूल का स्पर्श कर ले, तभी ऐसी ब्रह्ममयी स्थिति सम्भव है। ऐसा पुरुष परमात्ममयता में सदा समाहित, सदैव परम का दिग्दर्शन कर परम भाव में स्थित परमात्मा का स्वरूप है; किन्तु इस शाश्वत सत्ता का पावन विधान एवं विशेषता सदैव से रही है कि उस परमात्मा के परम भाव का प्राकट्य नर-तन के आधारवाला है।
नोट – मानवों में नर एक स्थिति–विशेष है, स्त्री–पुरुष कोई भी नर हो सकता है। नर–शरीर में आत्मा से जागृत होकर अवतार की भूमिका में परमात्मा का प्रसारित होना ऐसे महापुरुषों से ही सम्भव है।
ऐसी स्थितिवाले महापुरुषों का संरक्षण ही समर्पित मानवमात्र के अन्तःकरण में क्रमशः विभिन्न आश्चर्यों को प्रगट करते हुए, अवतरण के मध्य स्थितियों से अवगत कराते हुए, अजर-अमर-शाश्वत ब्रह्म के प्रत्यक्ष दिग्दर्शन के साथ ही अवतार के परम पावन स्थिति से अलंकृत करता है। यह क्रम सदैव चलता ही रहेगा, अतः अवतार अनन्त काल तक अनन्त नर-तन में होते रहेंगे- यही महापुरुषों के पावन जीवन से सुबोध मिलता है।
आत्मा से परिपूर्ण, परमात्म-स्वरूप, महान् तपोधन सद्गुरुओं से उस परमात्मा के अवतार का विधान है। महापुरुष शाश्वत स्वरूप, अजर-अमर स्थिति से परिपूर्ण तथा उससे भी परे बेगम, अनिर्वचनीय रूप-राशि से अलंकृत होते हुए भी भाविक भक्तों के परम बोध के लिये ही अवतार का सृजन करते हैं। मानव उनसे अलग हो जाता है, तो अवतारजनित तृप्ति का स्रोत नहीं मिलता, इसलिए उन परमहंसस्वरूप महानतम पुरुषों की सतत आवश्यकता की पुष्टिहेतु महापुरुषों के अन्तःस्थल में अवतार की अभिव्यक्ति हुई है। वह परमात्मा से कार्यरूप दिलानेवाले परमस्रोत का कारण है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्वरूप में स्थित महापुरुषों की रहनी से अपनी समानता करते हुए अपना परिचय दिया कि, ‘‘मैं एक महापुरुष हूँ तथा काल से परे परमभाव में स्थित हूँ।’’ अतः श्रीकृष्ण शाश्वत सत्ता में स्थित महापुरुष हैं; किन्तु शास्त्र की वाणी में अवतार से सम्बोधित हुए। ठीक इसी प्रकार आत्मा में परमात्मा का दिग्दर्शन पानेवाले प्रत्येक महापुरुष श्रीकृष्ण के अनुरूप ही स्थितिवाले होते हैं। यद्यपि आदि शंकराचार्य के बाद कतिपय रूढ़िगत परिपाटियों ने अवतारों को चौबीस की संख्या देकर वास्तविकता प्रदर्शित करने की भावना पर विराम लगा दिया, तथापि वास्तविक स्थितिवाले मनीषियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा, जैसा कि कबीर, नानक, चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस इत्यादि के जीवन-वृत्त में पाया जाता है। उन पूर्वापर चौबीस अवतारों में भी मत्स्य, वाराह, कच्छप, नृसिंह, गजेन्द्र उद्धार इत्यादि पाँच-छः अवतारों के अतिरिक्त प्रायः महात्माओं को ही अवतरित विभूतियों का श्रेय प्राप्त है। उदाहरणार्थ महर्षि कपिल, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार तथा नारद सभी अवतार हैं। प्रह्लाद के लिए अवतार का प्रसारण पूर्णतः नारद की ही देन थी।
नोट– जिन्होंने प्रकृति के समस्त दग्ध वातावरण से रक्षा करते हुए भक्त प्रल्हाद को अपने अंक में उठा लिया।
अवधूत महर्षि दत्तात्रेय तथा अवधूत ऋषभदेव उन चौबीस अवतारों में अवतार-विशेष थे। उन महापुरुषों में क्षमता थी कि किसी भी वर्ण-व्यवस्था का प्राणी क्यों न हो, अधिकार की स्थिति पाते ही भाविक भक्तों के अन्तःकरण में स्वयं को जागृत कर देते थे।
नोट– १. स्वयं का तात्पर्य योगेश्वर श्रीकृष्ण इत्यादि महापुरुषों के अनुसार वह महापुरुष और परमात्मा एक दूसरे के पर्याय हैं।
२. ऋषभदेव में श्रद्धा रखनेवाला प्राणी मात्र शुद्ध सनातनधर्मी है। ऋषभदेव सनातन–धर्म के अवतार–विशेष हैं, अन्य नहीं। यह जैन है, बौद्ध है, सनातनी हैं– इत्यादि मत–मतान्तर के अन्तर माया डालती है (मायिक देन है)। जब तक जीव है, झगड़ना स्वभाव है।
परशुराम, वामन तथा बुद्ध भी अवतार-विशेष हैं। अधिकांश विश्व में चर्चित बुद्ध, साधन की विभिन्न भूमिकाओं पर चलकर मन की निर्बीज अवस्था में निज स्वरूप का दर्शन तथा व्यापक अहं का साक्षात् कर बोध हो जाने पर बुद्ध कहलाए। ठीक यही उपलब्धि महामानवेतर महापुरुष भगवान वामन तथा परशुरामजी की है।
नोट – १. सिद्धार्थ (बुद्ध) का जन्म राजपरिवार में हुआ। जन्म के साथ ही ज्योतिषियों ने बताया कि इनमें तो योगी के लक्षण हैं। इस घोषणा के साथ ही माता–पिता ने बालक को सत्पुरुषों से बचाने की चेष्टा की। प्रायः भजन की सम्भावना पाकर प्रत्येक माता–पिता मोहवश ऐसी ही व्यवस्था करते हैं। रोग, वृद्धावस्था के कम्पन, मृत्यु का ताण्डव देखकर सिद्धार्थ बाल–बच्चों को छोड़कर अर्द्धरात्रि में सत्य की खोज में निकल पड़े। प्रायः भगवान के प्रत्येक तीव्र अनुरागी अथवा योग–संस्कारयुक्त, योगभ्रष्ट मानव के सामने यही स्थिति पैदा हुआ करती है। सिद्धार्थ साधना में प्रवृत्त हो गये। उन्होंने ‘संन्यास’, ‘त्याग’ पथ का अनुकरण किया और परम विवेकी कहलाए; किन्तु परम शान्ति केवल कहानी बनकर रह गई। सिद्धार्थ ने अपनी साधना में हठ को स्थान दिया एवं विरह–पूरित हृदय से अनवरत साधना करने लगे। परम की पिपासावाली यह साधना सफलता का कारण बनी। बुद्ध ने अपने अन्तःकरण में परम चेतन का प्रतिबिम्ब पा लिया। पूज्य गुरुदेव भगवान कहा करते थे, ‘विरह–वैराग्य के बिना वह सत्य (शाश्वत प्रभु) नहीं मिलता।’ अधिकांश महापुरुषों ने विषम परिस्थितियों में ही परम पथ पर चलकर उस शाश्वत सत्य को पाया है।
२. गौतम बुद्ध भी चौबीस अवतारों में से एक हैं। उनकी सेवा करनेवाला सनातन–धर्म से विलग नहीं है। प्रत्येक सनातनधर्मी की पराकाष्ठा, शाश्वत दिग्दर्शन का परिणाम, स्वरूप का बोध बुद्ध है। केवल भाषा–भेद है, अन्यथा बौद्ध सनातन महासत्य की पिपासा रखता है।
प्रश्नोत्तरी में आचार्य शंकर भी कहते हैं- ‘बौद्धाद्धिको यस्तु विमुक्तिहेतुः।’
यह शाश्वत परब्रह्म ही सर्वोपरि सत्ता-विशेष है। साधना के परिणामस्वरूप इन शुभाशुभ से परे की स्थितिवाले अनन्यतम महापुरुष आत्मतत्त्व की विकलतावालों के लिए परात्पर ब्रह्म की अवतार प्रसारिणी अलौकिक कला के रूप में सभी युगों में प्रमाणित हुए हैं। जिनकी प्रामाणिकता निरापद तथा शाश्वत सत्य है। उन्हीं विशिष्ट परमात्म-तत्त्ववेत्ता पुरुषों में महात्मा ईसा, महर्षि व्यास, आदि राजा पृथु (राजयोग के आदि प्रणेता), यज्ञ (परमात्मा प्रेरक के रूप में आत्मा से प्रसारित होकर जैसे चराचर जगत् के अस्तित्व को दग्ध कर शाश्वत रूप में परिलक्षित हो जाता है वह ब्रह्म यज्ञजनित उपक्रम) भी अवतार की प्रतिष्ठा है, जो शाश्वत सत्य का उत्प्रेरक है।
यही अवतार मत्स्य, कच्छपादि की क्रियात्मक शृंखला में पाया जाता है। हयग्रीव तथा नर-नारायण भी उन्हीं (श्रीकृष्ण, ऋषभ आदि) अवतरित विभूतियों की पावन परम्परा में हैं। प्राचीन लेखन-शैली के इन अवतारों एवं तत्पश्चात् पूर्णत्व प्राप्तिवाले सत्पुरुषों में किसी प्रकार का अन्तर नहीं है; किन्तु अन्तर्दृष्टिहीन (आत्मा के बोल न समझनेवाले), कोरी वाग्विलासिता एवं काल्पनिक विचारों ने ही मात्र चौबीस अवतारों को रूढ़िगत भ्रान्तियों में बाँधा है। वास्तविकता से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। चिरन्तन विधान यह है कि आत्मतृप्त, आत्मस्थ, विदितात्मा पुरुष में सदैव वह क्षमता विद्यमान है, जिससे भाविकों में परमात्मा की पिपासा तथा विशुद्ध लगन के जागृत होते ही वे महापुरुष अवतार का प्रत्यक्ष प्रकाश तथा प्रभु की अनवरत पीयूष-धारा का कृपा-प्रसाद दे दिया करते हैं।
प्रकारान्तर से अवतार दो हैं- एक व्यापक ब्रह्म को शून्यावस्था से जागृत करके अवतार की प्रक्रिया-श्रेणी से गुजारते हुए, परम में निरोध कर स्थायी आलोक से आलोकित करनेवाले अवतार-प्रेरक हैं। दूसरे, अवतार से प्राप्त होनेवाली स्थितियों का अवलोकन है। दूसरे शब्दों में, इन अवतारों में एक तो ब्रह्मस्वरूप महापुरुष हैं, जो शरीर के आश्रित रहकर भी परम शान्त एवं सम हैं, ऐसे महापुरुष जागृति प्रदान करनेवाले अवतारों के प्रेरक और जन्मदाता हैं।
दूसरे प्रकार के अवतार वे हैं, जो कथा-प्रसंग के रूप में पाये जाते हैं, जिनका वैयक्तिक स्वरूप नहीं है, यथा- मत्स्य, वाराह, कच्छप, यज्ञ, गजेन्द्र उद्धारक हरि एवं नरसिंह इत्यादि। इनका कोई बाह्य स्थायी पिण्ड नहीं है। विचारकाल में भी ये चित्रित नहीं होते। इनका क्रियात्मक विश्लेषण है। ये सब बाह्य भूतों के विषय न होकर हृदय-देश में उभड़नेवाले परमात्मा के वास्तविक प्रतिबिम्ब हैं, जिनका प्रभाव, प्रसार साधक सीधे स्वयं पाता है। इनका कार्यक्षेत्र विशद है तथा योग के माध्यम से अनुशासित पुरुष के लिए ही सर्वथा सम्भव है। भाविकों को स्वयं (कैवल्यपद) की अनुभूति कराने के लिए यह सार्वभौम स्थित आत्मा का साक्षात् कराता है तथा जब तक साधक को शाश्वत सत्ता में खड़ा नहीं कर देता, तब तक उत्तरोत्तर स्थितियों को उठाता, शुभ वचन बोलता, उत्तरोत्तर अलौकिक शक्तियों से साधक का मन बहलाता, मन के अन्तराल को गति देता हुआ सुहृद् का भार वहन करता है।
मानस शीर्षस्थ अविनाशी (‘स्वरूप’) श्रीराम भी इसी परिधि में हैं, जो अलौकिक मर्यादा के स्रष्टा, अनिर्वचनीय सत्ता के प्रसार-विशेष हैं।
महापुरुष के परिवेश में उपर्युक्त तथ्य सत्य का प्रेरक, सर्जक तथा महापुरुष का बोधक है। योग की पराकाष्ठा के परिणामस्वरूप ज्ञानामृत के भोक्ता (जिन पुरुषों के लिए प्राप्त होने योग्य परमात्मा अप्राप्त नहीं है) सहज प्राप्त परात्पर ब्रह्म से अभिन्न हैं। ऐसी साकार अवस्थावाले कैवल्य धाम, चिन्मय पुरुष, शाश्वत के सादृश्य से अवतार का प्रकाशन करते हैं। इसी विशेष अवस्थावाले पुरुष में सद्गुरु का विशेषण पाया जाता है। इन आत्मस्थित ब्रह्मवेत्ताओं में शाश्वत, अनिवर्चनीय, अलख के अवतरण का प्रवाह संयोग मात्र से होता है। हृदय से उनका स्पर्श करते ही उनका संरक्षण मिलने लगता है। वे महापुरुष प्रयास न करें तब भी शाश्वत के अवतरण का यह प्रवाह भाववश्यता से स्वतः होता रहता है; क्योंकि वे अभिन्न हैं। महापुरुष अपनी पहचान स्वयं देता है। यह बात दूसरी है कि इसे वह जन्मान्तरों से देता आया है या अब देगा अथवा स्वयं से प्रेरित करेगा। पुण्य की वृद्धि करके अधिकारी की स्थिति प्राप्त करना आपका उत्तरदायित्व एवं कार्य है।
यह बौद्धिक विषय नहीं है, अतः कल्पनाओं की हलचल से उन्हें समझा नहीं जा सकता। वह आनन्दानुभूति तो इष्ट के जागृत होने से तथा हृदय-देश में इष्ट के द्रवित होने से ही सम्भव होती है। प्रारम्भ में पूज्य गुरुदेव भगवान के मुखारविन्द से निःसृत उपदेशों को सुनकर मैं उलझन में पड़ जाया करता था। आज से पूर्व मस्तिष्क में यह बात आती ही नहीं थी कि भगवान भी अदृश्य रूप से बोलते या सँभाल करते हैं।
एक बार श्री गुरुदेव भगवान कह रहे थे- ‘‘मोके भगवान पढ़ावा करत हैं। हो! ई शरीरिया पढ़ी-लिखी नाहीं है। आत्मा अंग्रेजियो बोलत है और मैं सुनत समझत जात हूँ। मोरे में कहीं शंका हुई कि भगवान उत्तर देत हैं। (अर्थात् संकल्पों के साथ रहा करते हैं। संकल्प पीछे होता है, वे पहले ही चला करते हैं।) यदि मैं पतित होना चाहूँ तबौ न होइ पइहौं, भगवान मोके होखे ना देइहैं।’’ (अर्थात् यदि मैं पतित होना चाहूँ तो भी नहीं हो सकूँगा, क्योंकि भगवान रोक लेंगे।)
इस पर मैंने निवेदन के स्वर में पूछा कि प्रभु! क्या भगवान भी बोलते हैं? तो बोले- ‘‘हाँ हो! तोहूँ से बोलिहैं, काहे घबड़ात हौ, दिनै टरत है।’’ इसके पश्चात् गुरुदेव भगवान ने बताया कि भगवान भक्त का संचालन जब तक नहीं करने लगते, तब तक भगवत्-पथ का आरम्भ ही नहीं होता। साधक जो पार हो जाता है, वह उन आराध्य की देन है। अतः वे सदैव साथ रहकर संचालन किया करते हैं। इस प्रकार पूज्य गुरुदेव भगवान श्री परमहंसजी सक्रिय शैली में क्रमशः अवतार के आलोक में प्रवेश दिलाने तथा उसमें व्यापक स्थिति के साथ ही अवतार का शान्त हो जाना, समत्व में विलय-सा हो जाना, भक्त की स्थिति में मिल जाना स्वीकार किया करते थे- अर्थात् भक्त के विलीनीकरण के पश्चात् परम के स्पर्श के साथ ही अवतार की स्थिति में बदलकर वह अवतरित सत्ता भी भिन्न नहीं रह जाती, बल्कि ऐसे पुरुष में भीतर-बाहर तथा सर्वत्र सहज परमात्मा ही परिपूर्ण रहता है।
नोट– यह अवतार अधिकार की योग्यतावाले किसी विरले योगी के हृदय में होता है। अतः प्रथम चरण में अत्यन्त सूक्ष्म परिवेश में साधना को सद्गुरु प्रस्फुटित करता तथा क्रमशः कण–कण (सर्वत्र) में स्थित सर्वभूतों में समाहित आत्मस्वरूप का दर्शन कराता हुआ, सब में अनादि मूल अनिर्वचनीय ब्रह्म ‘अहम्’ की स्थिति में नियुक्त कर अपने तद्रूप ही आत्ममयी स्थिति प्रदान कर देता है। वही सम्पूर्ण भूमिकाओं का दिग्दर्शन कराता हुआ विश्ववास, परमचेतन भगवान के अलौकिक क्षेत्र में द्रष्टा जीवात्मा को सहज स्वरूप की स्थिति दिलाते हुए, उस स्थिति में स्वयं भी प्रतिष्ठित रहता है। अतः अवतार किसी योगी के हृदय की वस्तु है। वे सद्गुरु भी विरले ही हैं जो जीव को जागृत करते हैं। अतः नर–तन अर्थात् शुद्ध हृदय के अधिकारी की स्थिति प्राप्त करें। तीव्र अनुरागी के लिए अवतार की मान्यता सभी युगों में समान रूप से है–
सो केवल भगतन हित लागी। (मानस, १/१२/५)
राम भगत हित नर तनु धारी। (मानस, १/२३/१)
भक्त का तन ही नर-तन है। भक्त के हित के लिए भगवान भक्त के उस तन को ग्रहण कर लेते हैं, जिसके मनःस्थल में मायारूपी नारी का प्रभाव नहीं होता। योगेश्वर श्रीकृष्ण की ही वाणी गीता (अध्याय ४) में दृष्टिपात करने से स्वभावतः स्पष्ट हो जाता है कि अवतार किसी यौगिक प्रक्रिया में होनेवाला परमतत्त्व परमात्मा का आलोक प्रसारण है, अतः उस कृपा (आराधना) की जागृति के साथ ही सर्वसुलभ है। योग में निश्चित क्रिया एक है। इस सन्दर्भ में अनेक टीकाओं एवं मतान्तरों में न जाकर अक्षरशः अब उन (योगैश्वर्यसम्पन्न) श्रीकृष्ण की वाणी ‘यथार्थ गीता’ के आलोक में देखें।
।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)