शिव तत्त्व
प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम।
जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम।।
मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर।
जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न।।
जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय।
तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस।।
काशी भोलेनाथ की नगरी है। यह तीनों लोकों से न्यारी है। काशी की बड़ी महिमा है। यह त्रिशूल के ऊपर बसी है। आज हम भगवान शिवजी पर चर्चा करेगें कि हमारे आर्षग्रन्थों में भगवान शिव का क्या स्वरूप है? शिव आदि योगेश्वर हैं। योग अनादि है। मनुष्य मात्र के लिए सुलभ किया तो भगवान शिव ने। शिव सच्चिदानन्द हैं।
सत्य वस्तु है आतमा, मिथ्या जगत पसार।
नित्यानित्य विवेकिया, लीजै बात विचार।।
सत्य है, शाश्वत है तो एक परमात्मा। हमारा चित्त जब उस सत्य से संयुक्त हुआ, सत्य और चित्त जहाँ एक हुआ तो तीसरी वस्तु प्रकट हो जाती है जिसका नाम है आनन्द। असीम आनन्द! शाश्वत आनन्द! यही सच्चिदानन्द का अर्थ होता है। कोई भी उस सत्य का स्पर्श करके शिवस्वरूप की, उस ज्योतिर्मय परमतत्त्व की अनुभूति प्राप्त कर सकता है जो केवल आनन्दमय है; दु:ख है ही नहीं। ऐसा आनन्द कि-
सुख–दुख से एक परे परमसुख, ता सुख रहा समाई।
कहते हैं कि नर्मदा का हर कंकड़ शंकर अर्थात् सृष्टि में जन्मनेवाले हर जीव के हृदय में शिव है। प्रकृति के सीमाओं से अतीत, कल्याणतत्त्व है। लेकिन वह शिव सोया हुआ है। अंगद जब बिगड़ा तो बोला– रावण! तू मुर्दा है। हम मुर्दों को क्या मारें? अन्यथा मैं ही तुम्हें मृत्युदण्ड दे सकता था। तो-
कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा।।
सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी।।
तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवत सव सम चौदह प्रानी।।
ये चौदह प्राणी शव के समान हैं। कौल माने वाममार्गी। कामबस– जो कामनाओं के अत्यन्त आधीन है। वाममार्गी-मुर्दा। कृपण है। जिसके पास वास्तव में वस्तु है और दे नहीं सकता, वह भी मुर्दा है। ‘बिमूढ़ा’– एक तो मूढ़ होता है, एक विशेष रूप से मूढ़ है, अत्यन्त अज्ञान में है वह है मुर्दा। और वही है तू। तू भगवान को भी नहीं समझ पा रहा है।
रावण के पास सोने की लंका थी। विधाता के सृष्टि की हर समृद्धि रावण के पास थी। किन्तु अंगद ने कहा कि रावण! तू दरिद्र है, मुर्दा है। तुम्हें मारने से हमें केवल अपयश मिलेगा। तुम भगवान के हाथ से मरोगे तो तुम्हारा उद्धार होगा।
इतनी समृद्धि के बावजूद भी रावण! तू दरिद्र है। अति दरिद्र! किन्चित् भी जिसके हृदय में प्रभु का सुमिरन न हो, वो अति दरिद्र। ‘अजसी’– तुम्हारे पास कोई ऐसा यश नहीं, जो कुछ है अत्याचार है।
आदि शंकराचार्य की उम्र १८ वर्ष थी। जब मण्डन मिश्र के पास पहुँचे तो मण्डन मिश्र बिगड़ खड़े हुए, बोले- कुतो मुण्डी? तुम्हारी उम्र तो अभी बहुत कम है, संन्यास तो वृद्धों के लिए है, बच्चों के लिए नहीं। मण्डन मिश्र की उम्र थी पचहत्तर वर्ष। शंकराचार्य बोले– आप अभी बालक हैं, आप अभी अबोध हैं, मैं वृद्ध हूँ। वृद्ध वह होता है जो ज्ञानवृद्ध हो, अनुभूतिवृद्ध हो। ये आयु के दिन पूरे करके बाल सफेद कर लेने से कोई बुजुर्ग नहीं होता।
‘अति बूढ़ा’- एक तो बूढ़ा होता है, वह मुर्दा ही है। किन्तु दूसरा जो जीवन काट ले गया गटरमस्ती में, आयु के क्षण पूरे हो गये फिर भी नहीं चेता, वह भी मुर्दा है- ‘अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा’।
सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी।।
तनु पोषक निंदक अघखानी। जीवत सव सम चौदह प्रानी।।
केवल तन पोषक, अपने आत्मा को अधोगति में ले जानेवाला निन्दक, जो पाप के खान हैं, पाप के परायण हैं।
जो आपको पूर्णत्व प्रदान कर दे, वो पुण्य कर्म कहलाता है। जो आपको पतन के गर्त की ओर ले चले वह पापकर्म कहलाता है। ‘जीवत सव सम चौदह प्रानी’- ये चौदह प्राणी जिन्दे अवश्य हैं किन्तु हैं लाश। केवल शव हैं।
जब तक दूषित संस्कार होगें तब तक जन्म-मृत्यु का पिण्ड नहीं छूटता। ‘पुनरपि जननम् पुनरपि मरणम्, पुनरपि जननी जठरे शयनम्।’- इस परिधि में भ्रमण करना पड़ता है इसलिए रावण! तुम मुर्दे हो।
वास्तव में शिव पहले शव थे। हमारी-आपकी तरह थे। इस प्रकार जो अचेत प्राणी हैं वह शव के समान हैं। जो आत्मा की जागृति से वंचित हैं, वह शव के समान हैं। हृदय में प्रेमरूपी पार्वती…. हृदय में, वृत्ति में प्रेम धाराप्रवाह जागृत हुआ तो इसको हिलायेगी-डुलायेगी, सचेत करेगी, भजन समझायेगी, ध्यान धरायेगी। कभी-कभी साधक ध्यान में अवश्य बैठा रहता है लेकिन मन गणित लगाता ही रहता है। चिदाकाश में मृतलोक का वातावरण खड़ा करके उनके बीच में टहलता रहता है। किन्तु यदि हृदय में प्रेम का प्रवाह है, तो विकारों को ढू़ँढ लेगा और उनको दूर करते हुए आपको ध्यानस्थ कर देगा। यदि प्रेम नहीं है तो भले ही आँख मूँदो, मन बहकता ही चला जायेगा। इसलिए पार्वती ने उस शव की स्थिति से उठाया, ध्यान में लगाया।
पार्वती ने देखा, शिव आकाश में मृतलोक की महिलाओं के साथ भ्रमण कर रहे थे अर्थात् ध्यान से चित्त हट गया। पार्वती ने मृतलोक की विभूतियों को तलवार से काट गिराया, उनका त्याग करवाया और पुन: ध्यान में लगा दिया। शनै:-शनै: शिव समाधिस्थ हो गये, शिवतत्त्व की स्थितिवाले हो गये।
शिव आपके हृदय में छिपा हुआ स्वरूप है। जो प्रकृति के सीमाओं से अतीत है, असीम तत्त्व है, उसका नाम शिव है। वह सबके घट में है, लेकिन पहले शव है। प्रेम के द्वारा जागृति, क्रमश: उत्थान और फिर स्थिति। यही शिव की परिभाषा भागवत में है।
शिव भूतनाथ थे। भूत माने जीवित प्राणी। इस सृष्टि में यदि जीवमात्र का कोई आधारस्थली है तो भगवान शिव, कल्याणतत्त्व में स्थित महापुरुष। शिव श्मशान में रहते हैं। लोगों ने दौड़कर श्मशान में कुटिया बना ली। शिव बाहर किसी श्मशान में नहीं रहता। आपके हृदय में भीड़ लगी है। कागभुसुण्डि को हजार जन्म लेना पड़ा सधुआई की शुरुआत के बाद। जड़भरत की मृग में जरा-सी आसक्ति हो गयी तो एक जन्म मृग का लेना पड़ा। न जाने कितनी योनियों में भ्रमण करना पड़े! ऐसी परिस्थिति में जब अभ्यास करते-करते-
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय:।। (१२/१७)
शुभ वे जो आपको अपने परमात्मा की ओर सहज स्वरुप की ओर ले चले, स्थिति दिला दे। अशुभ वे जो प्रकृति के गर्त में आपको भ्रमण कराये, आवागमन का चक्कर दिलवाये। शुभ और अशुभ – दोनों का जो परित्यागी है, वही भक्त मुझे प्रिय है। भजन करते-करते पहले अविद्या नष्ट होती है, आसुरी वृत्ति शान्त होती है। फिर आगे जब कोई सत्ता बची ही नहीं तो भजन करके किसको ढूँढ़ें? तब दैवी वृत्ति भी शान्त हो जाती है। यदि एक भी संस्कार बाकी है तो शिवस्वरुप की प्राप्ति नहीं। जैसा संस्कार है वैसा आपको जन्म लेना पड़ेगा। अन्तिम संस्कार भी जहाँ मिट गया तहाँ आपका हृदय, आपका अन्त:करण श्मशान है; न शुभ न अशुभ है। इस अन्तिम संस्कार के निरोध के साथ जो स्थिति मिलती है, उसका नाम परमात्मा है, ज्योतिर्मय, सहज प्रकाशमय परमतत्त्व है। उसी का नाम शिव है।
इस स्थिति वाले महापुरुष ने जहाँ-जहाँ शरीर त्यागा, वहाँ-वहाँ शिवलिंग की एक पिण्डी रख दी क्योंकि उन महापुरुषों का उपदेश एक ही था कि भजन एक परमात्मा का करना चाहिए। वह ज्योतिर्मय है, परमतत्त्व है। एक परमात्मा का चिन्तन करो। इतना ही शिवलिंग का अर्थ होता है। वह प्रकृति में रहते हुए प्रकृति से अतीत हैं। अन्तिम संस्कार भी मिट गया तो आपका धरातल, आपका अन्त:करण भली प्रकार श्मशान है। उस वक्त प्रकृति की सीमाओं से अतीत शिव तत्त्व का दर्शन, स्पर्श और स्थिति। फिर किञ्चित भी प्राप्त होने योग्य वस्तु अप्राप्त नहीं रहती। वही कैवल्य पद है। महापुरुषों ने विविध दृष्टियों से उसे सम्बोधित किया है।
– श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी जी शिव का स्वरूप बताते हैं–
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा।
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला।।
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।
गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला।।
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा।।
शिव पहले शव थे और फिर हो गये महेश्वर, उपद्रष्टा अनुमति देने लगा, भरण-पोषण करने लगे। भगवान का भोजन है भजन। उसके द्वारा जो पार लगा, उसे स्वीकार किया, बदले में ईश की स्थिति प्रदान कर दी। शिव हैं आपके हृदय में। वह आपका ही छिपा हुआ स्वरूप हैं। केवल एक प्रभु की ओर आप अपना कदम बढ़ाना शुरू भर कर दें तो आप पाओगे कि कोई हमें अनुमति दे रहा है। आप पायेंगे, हम कहीं गिरना चाह रहे हैं तो उँगली पकड़कर उठा रहे हैं। एक दिन लक्ष्य पर पहुँच जाओगे।
– शिव सद्गुरु हैं–
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्र: सर्वत्र वन्द्यते।।
बोधमय, नित्य ‘गुरुं शंकररूपिणम्’– सद्गुरु जो शंकरस्वरुप हैं, मैं उनके चरणों की वन्दना करता हूँ, जिनके आश्रित हो जाने पर टेढ़ा चन्द्रमा भी सीधा, परमकल्याणकारी फल देने वाला होता है।
‘मन ससि चित्त महान’– मन ही चन्द्रमा है। सबका मन टेढ़ा है। कभी काम में, कभी राग में, कभी द्वेष में, कभी भोगों में…. पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकता रहता है। ये विकृत मन, टेढ़ा चन्द्रमा भी सीधा, परम कल्याणकारी फल देने वाला होता है।
शंकर आदि योगेश्वर थे। योग अनादि है किन्तु मनुष्य मात्र के लिये सुलभ किया तो भगवान शिव ने। और ये शिवतत्त्व की प्राप्ति भी सद्गुरु के चरणों के प्रताप से है।
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू।।
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती।।
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी।।
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती।।
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू।।
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।।
सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।।
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान।।
पुण्यात्मा शंकरजी के शरीर में जो निर्मल विभूति (विभूति माने ऐश्वर्य) पायी जाती है, वह गुरु महाराज के चरण रज की देन है। शंकर पाप और पुण्य से परे होता है, और यहाँ पुण्यात्मा शंकर। वास्तव में आज का कोई पुण्यात्मा सद्गुरु के चरणों का आश्रय लेकर उस शिवतत्त्व को प्राप्त कर लेता है। शिव एक तत्त्व है। प्रकृति की सीमाओं से अतीत है, इसलिए शिवतत्त्व है।
शिव अवढरदानी हैं, जो चाहे कर दें। वे संसार से अतीत हैं। ‘सकल लोक बस्ती में बसाये, आप बसे वीराने में।’ अन्त में सब कुछ प्रदान कर देने की क्षमता है, वह गुरु महाराज के चरण रज की देन है। आज का पुण्यात्मा ही गुरु चरणों का आश्रय प्राप्त करता है। शनै:-शनै: प्रकृति की सीमाओं से अतीत शिव तत्त्व का दिग्दर्शन करता है, स्थिति पाता है।
आदि शंकराचार्य से एक शिष्य ने पूछा– ‘क: पूजनीयं’– भगवन्! संसार में पूजनीय कौन है? ‘शिवतत्त्वनिष्ठ:’- जो शिवतत्त्व में स्थित है वह महापुरुष। और शंकर शिव तत्त्व में स्थित थे। जो भी स्थित हो जाये, वह महापुरुष अर्थात् शिव सबके लिये सुलभ है। सभी प्राप्त कर सकते हैं। शंकराचार्य ने अपना निर्णय दिया कि हमारी स्थिति क्या है?
न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म:।
न बन्धुर्नमित्रं गुरुर्नैव शिष्य:
चिदानन्दरूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।
न माता न पिता, न गुरु न शिष्य, चित्त परम आनन्दमयस्वरुप है। मैं कल्याणस्वरुप, कैवल्यस्वरुप, शिवमात्र शेष हूँ। शिव एक स्थिति है, योग की एक चरमोत्कृष्ट अवस्था है।
— एक समय समुद्र मंथन हुआ तो चौदह रत्न निकले जिसमें विष भी था – हलाहल विष। सब उसकी तेज से जलकर गिरने लगे, आकाशचारी गिरने लगे। सबने मिलकर भोलेनाथ से अनुरोध किया तो पी गये। न पेट में गया और न बाहर पृथ्वी पर रहा, विष कंठ में धारण कर लिया। वास्तव में महात्माओं के भीतर राग-द्वेष नहीं होता। लोगों के हित के लिए ही वे वाणी से ताड़ना देते हैं। यही कण्ठ में विष धारण करने का आशय है।
— शिवरात्रि–
रात्रि कई हैं जैसे- मोहरात्रि, कालरात्रि, शीतरात्रि, नवरात्रि और शिवरात्रि। शिवरात्रि में शिव और पार्वती का विवाह हुआ था।
नारद ने कहा- लड़की तो सुलक्षणा है! इससे माता-पिता यश प्राप्त करेंगे। इतना ही नहीं, अम्बा, अम्बिका, जगदम्बा की उपाधियाँ होंगी। संसार इसकी पूजा करेगा। इसके वर-स्थान में जरा-सा दोष है। वह है-
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना।।
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख।। (मानस, १/६७)
माँ-बाप को कोई ठिकाना नहीं। घर उसके पास है ही नहीं। संसार से उदास, जोगी, जटाधारी, नंगा भटकनेवाला – ऐसा स्वामी इसको मिलेगा।
इतना सुनते ही पार्वती की माता तो एकदम नाराज हो गयी, बोलीं– मैं कन्या को लेकर कुएँ में कूद जाऊँगी लेकिन विवाह नहीं करने दूँगी। नारद जी ने समझाया– जो वर के लक्षण बताये, वह शिव में पाये जाते हैं। कदाचित् शिव वर के रूप में मिलें तो दोष भी गुण ही कहलाते हैं।
पार्वती ने सपना देखा– हाथ में पुस्तक लिये गौर वर्ण दो विप्र आये, उपदेश किया कि राजकुमारी! तुम तपस्या करो तो शिव प्राप्त हो जायेंगे। तो कठोर हृदय करके माता-पिता ने तपस्या के लिये छुट्टी दे दी। हिमालय की चोटियों में पार्वती लगी तपस्या करने।
भगवान् शिव ने सप्तर्षियों से कहा– जरा ठोक बजाकर देखो, श्रद्धा कैसी?, भाव कैसा? तो सप्तर्षि पहले आये तो बोले– अरे! तुम राजकुमारी होकर यह क्या कर रही हो? शिव तो महादरिद्र है। जटाधारी, सर्प और बिच्छू, एक बूढ़ा बैल….. उस घर में कौन सुख पाओगी? हम तुम्हारे लिये बढ़िया वर चुनकर लाये हैं। बैकुण्ठ निवासी, लक्ष्मीपति विष्णु। ऐश्वर्य और भोग छाया रहेगा। शंकर तो अवगुणों की पराकाष्ठा हैं। तब पार्वती ने कहा-
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।।
माना कि शंकर सारे अवगुणों की खान हैं और विष्णु सारे गुणों की पूँजी हैं लेकिन जिसका मन जिसमें रम गया, उसका उसी से प्रयोजन है। यदि वर-कन्या देखे बिना नहीं रहा जाता, अगुवाई किये बिना नहीं रहा जाता तो और किसी घर में चले जाइए। सप्तर्षियों ने मन ही मन प्रणाम किया और चले गये।
सप्तर्षि एक बार फिर लौटकर आये, वे बोले– तुम तपस्या क्यों कर रही हो? उस पगले के लिये इतनी तपस्या की क्या जरूरत है? पार्वती बोली– नारद जी का उपदेश है। वे बोले– वह महाकपटी है, महाधूर्त है। नारद का उपदेश सुनकर आज तक क्या किसी का घर बसा है?
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई।।
चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला।।
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी।।
हिरणाकश्यप का घर नारद ने बर्बाद कर दिया। दक्ष प्रजापति के दस हजार राजकुमारों को एक साथ जंगल का रास्ता पकड़ा दिया, फिर उन्होंने लौटकर घर का मुँह कभी नहीं देखा। पार्वती बिगड़ खड़ी हुईं कि-
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू।।
गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।।
नारद का उपदेश मैं नहीं त्याग सकती। सौ बार शंकर जी स्वयं आकर कहें, तब भी नहीं त्याग सकती। क्यों? क्योंकि गुरु के वचनों में जिसको विश्वास नहीं, उसके जीवन में सपने में भी न सुख है, न समृद्धि है, न परम गति है। वह सब ओर से भ्रष्ट हो जाता है।
सप्तर्षि बोले– शंकर जी ने कामदेव को जला दिया। ऐसे पति को लेकर क्या करोगी? शंकर तो एकदम मुर्दा! तब पार्वती फिर बिगड़ी कि–
तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा।
हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी।।
जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी।।
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा।।
आपकी निगाह में आज शंकरजी ने काम जलाया है। अब तक क्या भोगी थे?, रागी थे? हमारी दृष्टि में शिव सदा योगी, अकाम, अभोगी हैं। यही समझकर हमने शिव की आराधना की है, यही समझकर हमने वरण किया है। यदि हमार प्रण सच्चा है तो भगवान मेरे प्रण को अवश्य पूरा करेंगे।
वास्तव में शिव-पार्वती का विवाह किसी लड़का-लड़की का शादी-विवाह नहीं है। शिव आदि योगेश्वर थे। योग अनादि है लेकिन मानवमात्र के लिये सुलभ कराया तो भगवान शिव ने। शिव एक सद्गुरु हैं, आदि सद्गुरु। वे अकाम हैं, अभोगी हैं, सदा योगी हैं, पूर्ण हैं। ऐसे महापुरुष से यदि आप सम्बन्ध करना चाहते हैं तो प्रेम ही पार्वती है। प्रेममयी वृत्ति को सद्गुरु स्वीकार कर लेते हैं।
हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी।।
ऐसे आदि सद्गुरु शिव के साथ तद्रूप होने के लिये सक्षम कौन है? केवल पार्वती और वही ऐसे पति के लिये कार्य करेगा। संसारी भला क्यों कोशिश करेगा? तो आप हम, कोई भी सद्गुरु का गुरूत्व देखना चाहते हैं, प्राप्त करना चाहते हैं तो अपने हृदय में प्रेम की जागृति आवश्यक है।
— भगवान शिव ने निर्णय दिया–
एक बार देवता और पृथ्वी सब घबरा गये, ब्रह्मा के पास जाकर गिड़गिड़ाने लगे कि इस रावण से छुटकारा कैसे हो? ब्रह्मा बोले– यह तो परमात्मा ही कर सकता है। तो पूछा– प्रभु रहते कहाँ हैं?
पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।।
किसी ने कहा– वो बैकुंठ में रहता है, चलो वहीं चले। दूसरे ने कहा– नहीं, तू क्या जाने! वो क्षीर-सागर में रहते हैं।
तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।।
भगवान शिव कहते हैं– मैं उस समाज में था लेकिन बताने का अवसर ही नहीं मिला। जहाँ अवसर मिला तो हमने एक वचन कहा कि-
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।
अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।।
भगवान कण-कण में व्याप्त हैं। ‘प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।’ बैकुण्ठ में नहीं, क्षीर-सागर में नहीं, वे यहाँ भी विद्यमान हैं। उनको ढूँढ़ निकालने का उपाय केवल प्रेम है। हमने कहीं किताब में नहीं पढ़ा, कान से नहीं सुना; जाना है, उसे पहचाना है। वे प्रेम से प्रकट होते हैं।
पेड़ में सारे फर्नीचर विद्यमान हैं, कुछ भी बना लो। माचिस की तिली बनाओ, चाहे सोफासेट। लेकिन पेड़ काट के देखो, कुछ नहीं मिलेगा। दूध के हर बूँद में मक्खन है लेकिन नहीं मिलेगा, जब तक कि एक निश्चित प्रक्रिया के द्वारा अलग ना कर लें। तो परमात्मा सर्वत्र व्याप्त है, आपके हृदय में हैं, ऐसा हमने जाना है।
प्रेममयी प्रवृत्ति ही पार्वती है। आपकी वृत्ति में जब प्रेम प्रवाहित हो जाय तो कोई प्रलोभन नहीं कि आपको अलग कर दे। तो सद्गुरु के वचनों में विश्वास, इष्ट के प्रति दृढ़ आस्था, महान कष्ट आने पर भी जो अपनी टेक से अलग न हो। आपकी वृत्ति में जब प्रेम प्रवाहित है, तो ये सब क्षमता आ जाती है, वही एक दिन शिव तत्त्व को प्राप्त करता है। जो प्रकृति की सीमाओं से अतीत है, असीम तत्त्व है इसलिए उनका नाम शिव है। शिव आदि योगेश्वर हैं।
— सभी प्राणी मोह में आक्रान्त डूबे हुए हैं, सोये हुए हैं।
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।
सृष्टि सोई हुई है। आपकी वृत्ति में जब प्रेम प्रवाहित हुआ तो हिलेगा-डुलेगा, उत्थान होगा और शिवतत्त्व की स्थिति की उपलब्धि करा देगा।
शिव सदैव श्मशान में रहते हैं। हृदय में एक भी संस्कार बाकी है तो उस संस्कार के अनुसार आपको जन्म लेना पड़ेगा। श्मशान · अन्तिम संस्कार का भी अन्त। अन्तिम संस्कार का मिट जाना, (जब संस्कार ही नहीं तो जन्म आपको कौन देगा?) ऐसा जब हृदय का धरातल हो जाता है, इस क्षण के साथ शिव तत्त्व की उपलब्धि होती है। इसलिए शिव सदा श्मशान में रहते हैं।
शंकर और पार्वती का विवाह। ये सम्बन्ध सबके लिये है। सभी उस शिवतत्त्व को प्राप्त कर सकते हैं। ‘शंका अरि’ से शंकर। जो शंकाओं से अतीत है, शंकाओं से अलग जो स्थिति है। ‘स्वयंभू’- जो स्व-स्वरूप की स्थिति वाला है। ये शिव के ही नाम हैं।
— शिवरात्रि क्या है?
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।। (२/६९)
सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के लिये वह परमात्मा रात्रि के तुल्य है; क्योंकि दिखायी नहीं देता, न विचार ही काम करता है इसलिये रात्रि सदृश है। उस रात्रि में संयमी पुरुष भली प्रकार देखता है, चलता है, जागता है; क्योंकि वहाँ उसकी पकड़ है। योगी इन्द्रियों के संयम द्वारा उसमें प्रवेश पा जाता है। जिन नाशवान् सांसारिक सुख-भोग के लिये सम्पूर्ण प्राणी रात-दिन परिश्रम करते हैं, योगी के लिये वही निशा है।
रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी।।
जो योगी परमार्थ-पथ में निरन्तर सजग और भौतिक तृष्णाओं से सर्वथा नि:स्पृह होता है, वही उस इष्ट में प्रवेश पाता है। वह रहता तो संसार में ही है; किन्तु संसार का उस पर प्रभाव नहीं पड़ता। और ठीक गीता का ही अनुवाद है रामचरितमानस कि-
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।।
जगत एक रात्रि है। इस जगतरुपी रात्रि में जोगी जागता है। भला जागे हुए की पहचान क्या है?
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।।
विधाता का जहाँ तक प्रपंच है उससे विरति अर्थात् अलग-थलग हो जाते हैं।
जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा।।
इस जीवात्मा को जगा हुआ तब जानना चाहिए, जब सम्पूर्ण विषयों से वैराग्य उत्पन्न हो जाय। संसार एक रात्रि है जिसमें सब लोग निश्चेष्ट पड़े हुए हैं।
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।
मोह में निश्चेष्ट रात-दिन दौड़-धूप कर रहे हैं, मात्र स्वप्न देखते हैं। किन्तु जब प्रेम का प्रवाह हमारी वृत्ति में आया, उत्थान होते-होते जब परमात्मा का स्पर्श पाया, जहाँ विलय पाया, शिवतत्त्व की निष्ठा आयी तो–
‘ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।’ (ईशावास्योपनिषद्, १)- सर्वत्र ईश्वर का वास है, लेश मात्र भी कहीं जगत है ही नहीं। प्रकृति पुरुषत्व में परिवर्तित हो गयी।
सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।।
उस प्रेम का प्रवाह इतना उत्थान होते-होते, परीक्षाओं को पार करते हुए जहाँ शिव का स्पर्श किया…… प्रकृति के सीमाओं से अतीत, शंकाओं से मुक्त जहाँ उस निर्लेप, उस अविनाशी तत्त्व का स्पर्श किया, इसके साथ ही न स्वर्ग, स्वर्ग के रुप में रह जाता है, न नरक, नरक के रुप में रह जाता है जिससे हम भयभीत हों; और न बैकुण्ठ, बैकुण्ठ के रुप में रह जाता है जिसकी हम कामना करें। जहाँ दृष्टि पड़ी, अपने आराध्य देव को खड़ा पाया।
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं।।
ये सब दूरी तय होती है नाम के प्रभाव से। नाम यदि लेते बन गया, अथाह भवसागर सूख जाता है। मानस में है–
सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर।।
अमृत की वृष्टि होते ही बंदर-भालू जीवित हो गये, असुर नहीं जीवित हुए। आखिर वो गये कहाँ?
रामाकार भये तिन्ह के मन। मुक्त भए छूटे भव बंधन।।
वे सब राम के स्वरुप में परिवर्तित हो गये क्योंकि मरते समय सब राम नाम को लेकर मरे थे। ‘राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान।’ जब ये राम के आकार में परिवर्तित हो जाती हैं, ‘बिनु गोपाल ठौर नहिं कतहूँ नरक जात धौं काहें!’ तहाँ शिव की रात्रि हो जाती है, ये जगत परमात्मा का धाम हो जाता है। उस पुरुष के लिये रंचमात्र भी कहीं गड्ढा नहीं है, जहाँ फिसलकर वो गिर जाये, डूब जाय अर्थात् शिव एक चरमोत्कृष्ट अवस्था है, योग-साधना का परिणाम है। तो योगेश्वर भगवान शिव। वो आदि योगेश्वर शिव काशी में वास करते हैं। उस शिव तत्त्व को प्राप्त करनेवाला हर महापुरुष शिव तत्त्वनिष्ठ होता है। जहाँ भी शरीर छूटा, एक पिण्डी गाड़ दिया।
ये पिण्डी क्या है? महात्मा किसी के दरवाजे-दरवाजे जाकर उपदेश नहीं कर सकते। किसी जनपद में आये तो उनको उपदेश किया। उनके लिये परमात्मा की एक पाठशाला, एक पवित्र स्थान बना दिया। उसका नाम है ज्योतिर्लिंग, शिवलिंग।
लिंग माने होता है चिन्ह! स्कूल में पढ़ाया जाता है स्त्रीलिंग = जिसमें स्त्रियों के चिन्ह पाये जाते हैं। नपुंसकलिंग = जिसमें नपुंसकता के चिन्ह पाये जाते हैं। उसी प्रकार ज्योतिर्लिंग = सहज प्रकाशस्वरुप! गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-
न तद्भासयते सूर्यो न शशांके न पावक:।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।। (१५/६)
ज्योतिर्मय परमात्मा जो स्वयं प्रकाश स्वरुप है, जिसके अंशमात्र से सूर्य-चन्द्रमा भी रोशनी पाते हैं। ज्योतिर्मय परमात्मा का यह चिन्ह है, प्रतीक है। शिवलिंग का केवल इतना ही अर्थ होता है कि परमात्मा एक है, ज्योतिर्मय सत्ता एक है, उसके प्रति श्रद्धा लाओ।
कालान्तर में युग बीत गये तो भ्रान्तियाँ हो गयी। कोई कहता है, शिवलिंग इन्द्रिय का चिह्न है। ऐसा कुछ नहीं है। वो महापुरुषों ने एक चिह्न बनाया कि एक परमात्मा, एक ईश्वर। ‘ब्यापक एकु ब्रह्म अबिनासी।’ भगवान कण-कण में व्याप्त है लेकिन है एक। एक से सवा कभी हुआ ही नहीं। वो बृहद है इसलिए ब्रह्म। अविनाशी है, उसका विनाश हो ही नहीं सकता। ‘सत चेतन घन आनँद रासी।’ परम सत्य, असीम आनन्द की राशि। भला वह भगवान रहता कहाँ है?
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।।
ऐसा परमात्मा सबके हृदय में वास करता है। ‘अछत’… कलेजा काट के ऑपरेशन करो, अलग करके फेंक दो, वो जिन्दा रहेगा, उसको चोट नहीं लगेगी। ‘अबिकारी’– आप सियार, घोड़ा, गधा कुछ भी खाओ, आपके खान-पान से कोई प्रयोजन नहीं। वह द्रष्टा के रुप में है, हृदय में निवास करता है। ‘ब्यापक’ है किन्तु है एक। तो भला उसको ढूँढ़े कैसे?
नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।।
पहले तो नाम का निरूपन करो कि नाम है किस प्रकार? निरूपन माने निराई-गुड़ाई। किसान प्रतिकूल घास को निकालकर फेंक देता है और अनुकूल फसल को बचा लेता है। पहले निरूपन करो कि नाम का किस प्रकार जप किया जाय? क्योंकि–
राम नाम में अन्तर है। कहीं हीरा है कहीं पत्थर है।।
इतना बड़ा अन्तर। हम कहीं कंकड़ों में न उलझ जाए! पहले उसका निराकरण करो और जब समझ काम कर जाये, यत्न करो। तुम उसे पा जाओगे, हृदय वाला भगवान प्रकट हो जायेगा। तो- ईश्वर एक है, ब्रह्म एक है, ज्योतिर्मय तत्त्व एक है। परमानन्देश्वर…. परम आनन्द देने वाला ईश्वर एक है। एक परमात्मा का बोध कराता है, उस पवित्र स्थान पर जाकर हमें प्रार्थना करनी चाहिए। शिवलिंग यह पढ़ाता है कि भगवान एक हैं। इसके अलावा शिवलिंग का कोई प्रयोजन नहीं।
मंदिर ईश्वर का आध्यात्मिक पाठशाला होता है। मन्दिर में शान्त चित्त से बैठकर भजन करना चाहिए। सब जगह भजन में मन भी तो नहीं लगता। ताकि बच्चा-बच्चा एक परमात्मा की आध्यात्मिक विद्या से आप्लावित हो जाय, संस्कारी हो जाय इसलिए मन्दिरों का निर्माण महापुरुषों के द्वारा हुआ। कालान्तर में जब कभी वो भजन के प्रशस्त पथ पर आ जायेगा तो फिर मन्दिरों में नहीं, अपने हृदय में बैठकर ढ़ूँढ़ेगा। सुतीक्ष्ण ने हृदय में बैठकर ढूँढ़ा, अत्रि ने हृदय में बैठकर ढूँढ़ा, अगस्त्य ने हृदय में बैठकर ढूँढ़ा। कोई ऐसा महापुरुष नहीं मिला है जिसका भजन करने के लिये अलग से मन्दिर बना हो। बुद्ध पागलों की तरह जाकर बैठे पीपल के नीचे…. महावीर एक झाड़ी में…. गुरु महाराज भी एकान्त जंगल में…. वहाँ उन्हें उपलब्धि हो गयी। जब कभी किसी ने पाया तो हृदय देश में। तो हृदय को संसार के सम्बन्ध से निर्लेप बनाने के लिए एकान्त सेवन कोई करता नहीं। जब प्रभु हृदय से रथी हो जाते हैं तो करुणा करके, दया करके साधक को ले चलते हैं और भजन करवा लेते हैं।
तुलसिदास (मन) बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै।
यह अयुक्त मन तभी वश में होता है जब प्रभु प्रेरक के रुप में स्वयं परमात्मा उतर आए। आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जाय, हमारी रोकथाम करने लगें। बस समर्पण के साथ उस हृदयस्थ ईश्वर की शरण जाना होगा।
— बाल्मीकि के उपदेश– बाल्मीकि ने कहा-
पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।
जहँ न होहु तहँ देहॅु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।
सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।।
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।।
निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।।
तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।
जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु।।
भगवन्! उनका हृदय आपका घर है। इसलिये कुछ मत छोड़ो। जो पकड़ना है, जिसके लिये दुर्लभ मनुष्य शरीर मिला है, उसे पकड़ भर लो तो हम अपने रास्ते पर हैं, धर्म पर हैं।
जो शाश्वत है, अविनाशी है, जिनके तेज के अंशमात्र से सृष्टि का सृजन-पालन-परिवर्तन होता रहता है, जो सबको धारण किये हुए है, वही है धर्म। जो उसके लिये श्रद्धा समर्पण करता है वो है धार्मिक। सद्गुरु के आदेश का पालन है धर्माचरण। इसके लिये संघर्ष करना पड़ता है।
आगि आँच सहना सुगम सुगम खड्ग की धार।
नेह निबाहन एक रस महाकठिन व्यवहार।।
आग में कूद जाना आसान है। बहुत सी बालाएँ कूद जाती है। तलवार की नोंक पर लड़कर जूझ जाना आसान है- ‘सुगम खड्ग की धार’, किन्तु ‘नेह निबाहन एक रस, महाकठिन व्यवहार।’ यही पार्वती ने किया, एक दिन शिव को पा गयी। शिव को पाने पर शिव अलग नहीं रह गये। भगवान शिव ‘अर्धनारीश्वर’ हैं। जो पार्वती है वही शिव है। जो शिव है वही पार्वती है। भगवान जब अपनाते हैं तो अपने में समाहित कर लेते हैं, अपना स्वरूप दे देते हैं। यदि परमात्मा को पाना है तो पहले किसी शिव तत्त्वनिष्ठ सद्गुरु को पकड़ो।
रामचरितमानस में भगवान् राम ने बताया है। भगवान् राम की प्राप्ति के लिये भगवान शिव की भक्ति करनी पड़ेगी।
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं।।
शिव के चरण-कमलों में जिसकी प्रीति नहीं है, वह भगवान को स्वप्न में भी अच्छे नहीं लगते। भगवान उनकी तरफ देखना भी नहीं चाहते हैं।
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू।।
बिना छल का, कपट से रहित, मन-कर्म-वचन से ‘बिस्वनाथ’– (विश्व के जो नाथ हैं; सेवक नहीं हैं स्वामी हैं) उस शिव के चरण-कमलों में प्रीति – रामभगत का केवल इतना ही लक्षण है। तो हमने प्रीति तो मन-कर्म-वचन से विश्वनाथ के चरणों में किया और भक्ति पूर्ण हो गयी भगवान् रामजी की।
जेहिं पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।।
सत, रज, तम त्रिगुणमयी प्रकृति है। तीन मंजिला माया का महल – तामसी….. मध्यम राजसी…. और सात्त्विक देवलोकपर्यन्त इन त्रिगुणमयी प्रकृति को पार करके जो त्रिगुणातीत हैं वो त्रिपुरारी। प्रकृति पार है वो त्रिपुरारी। तीनों गुणों को अरि माने काटना…. समाप्त करके जो स्थित हैं ऐसा सद्गुरु कृपा न करे तो वह मेरी भक्ति नहीं प्राप्त कर सकता है। इसलिए-
संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।
शंकाओं से अतीत उन भगवान् शिव से जो विमुख है और मेरी भक्ति चाहता है वह नरकगामी है, मूढ़ है; बेचारे की बुद्धि बहुत हल्की है। किन्तु हम बहुत शिवप्रिय हों और भगवान को न चाहें तो? तब भी धोखा!
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास।।
शंकर का तो प्रिय, सदगुरु की शरण में लेकिन उनकी शरण जाके (हम सदगुरु की शरण क्यों जाते हैं? प्रभु को प्राप्त करने के लिए!) उन प्रभु को हम नहीं चाहते ‘मम द्रोही’…. और ‘सिव द्रोही मम दास’– और कहता है- भाई! हमारा गुरु तो परमात्मा है। राम का तो दास है और शिव का द्रोही। ‘ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास’- वे लोग एक कल्प माने एक जनम घोर नरक में वास करते है। ईश्वर-पथ में बीज का नाश नहीं है। सर्वथा नष्ट तो नहीं होंगे लेकिन एक कल्प अवश्य नरक में वास करेंगे। कल्प माने काया का परिवर्तन। सर्वथा नाश नहीं होगा।
एक गोपनीय वार्ता आज तक रहस्य में दबी रह गयी। भगवान राम कहते हैं- वह मेरा सिद्धान्त है, मुझे पाने की विधि है, सबको हाथ जोड़कर कहता हूँ। भला उस परमात्मा को हाथ जोड़ने की क्या आवश्यकता थी? बात ही कुछ अटपटी है। हठात् विश्वास भी तो नहीं होता कि हमारी तरह ये भी खाते-पीते, उठते-बैठते हैं तो महापुरुष कैसे हो सकते हैं? इसलिये परमात्मा राम ने बल देकर कहा-
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि।।
जो शंकाओं से अतीत है, शिवतत्त्वनिष्ठ है, उसके भजन के बिना मेरी भक्ति कोई प्राप्त नहीं कर सकता। तो यदि हमें परमात्मा को पाना है तो शंकर एक माध्यम है, सद्गुरु एक माध्यम है।
— पंचवटी में भगवान् श्रीराम जी से लक्ष्मण ने कहा- प्रभु! सुख का स्रोत क्या है? भगवान राम ने कहा- लक्ष्मण!
भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।।
अनुपम सुख की मूल तो भक्ति है। लक्ष्मण बोले– भगवन्! प्रदान कर दें। तो ‘मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।’- मिलेगी तब जब संत अनुकूल हों। जो भक्ति शिव दे रहे हैं, वहीं भक्ति संत दे रहे हैं।
फिर बताया की शिव के तन में जो विभूति है, वह सद्गुरु के चरण रज की देन है। सन्त जो संसृति का अन्त कर दे, वे अनुकूल न हो तो भक्ति नहीं। शंकर अनुकूल नहीं तो भक्ति नहीं। आज जिन्हें हम तत्त्वदर्शी, महापुरुष, परमहंस जो कुछ भी कहते हैं, पूर्ववैदिककाल में वो शिव थे, स्वयंभू थे, शंकर थे, संत थे। ये पर्यायवाची शब्द हैं।
यदि परमात्मा परम धाम है तो सद्गुरु ही साधना की जागृति, पूर्तिपर्यन्त पथ है, परमात्मा में प्रवेश का मेन गेट है, मुख्य द्वार है इसलिये- ‘संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि।’
तो शंकर आदि योगेश्वर हैं। शिव सबके पास हैं। ऐसे प्रकृति पार स्थितिवाले महापुरुषों के बाहर भी संसार विषयरुपी विष नहीं होता, और भीतर भी नहीं होता, लेकिन गले में होता है। गले से वो सांसारिक बाते करते रहते हैं। क्योंकि उनके पास सांसारिक लोग ही टकराते हैं, उनका बोध कराने के लिये। शंकर जी के भक्त सभी थे। भूतनाथ- भूत माने होता है प्राणी! जो भी प्राण धारण करके जिन्दा है, उसे भूत कहते हैं अर्थात् जीवित प्राणी।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (१८/६१)
अर्जुन! वह ईश्वर सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के हृदय-देश में निवास करता है। बहुत से लोग भूत माने मरने के बाद जो कल्पना करते हैं वह। वास्तव में भूत माने जीवित प्राणी, प्राण धारण करने वाला। हर प्राणधारी के हृदय में ईश्वर वास करता है। इतना समीप हृदय में है तो लोग देखते क्यों नहीं? बोले– मायारूपी यन्त्र में आरूढ़ होकर भ्रमवश लोग भटकते ही रहते हैं इसलिये नहीं देख पाते। अर्थात् हृदयस्थित ईश्वर की प्राप्ति के लिये प्राणियों का यदि कोई आधार है, रक्षक है तो वह है शिव। तो ईश्वर सबके हृदय में रहते हैं तो शरण किसकी जाये?-
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (१८/६२)
उस हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ। ‘सर्वभावेन’– सम्पूर्ण भाव से जाओ। थोड़ा भाव संकटमोचन, थोड़ा भाव पशुपतिनाथ, थोड़ा मैहर देवी….. हम तो बारह आना लीक हो गये। पूर्ण श्रद्धा से जाओ। मान लें, हमने सारी मान्यताएँ तोड़ी और शरण चले ही गये तो लाभ क्या? कहते हैं- ‘तत्प्रसादात्परां शान्तिं’- तुम परम शान्ति प्राप्त कर लोगे, ‘स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्’- उस स्थान को, उस घर को पा जाओगे जो शाश्वत है, अजर-अमर है। सदा तुम्हारा घर रहेगा, सदा तुम्हारा जीवन रहेगा। जिसके बाद जीवन में कभी अशान्ति नहीं होगी। इसलिए सबको भगवान के एक नाम का जाप, भजन-संकीर्तन करना चाहिए।
भगवान को खुश करने के लिये घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं। काम, क्रोध, मोह, लोभ…. कुछ मत छोड़ो। एक फैक्टरी और खोल लो, कोई फर्क नहीं। किन्तु एक बात याद रखो। जो एक है, अविनाशी है, घट-घट का वासी है, उस परमात्मा के प्रति श्रद्धा स्थिर करो; और प्रभु का जो बोध कराता है, दो-ढ़ाई अक्षर का एक नाम ॐ अथवा राम को चुन लो। भगवान का तो कोई नाम ही नहीं है। भगवान् अनाम हैं। ये उनके सम्बोधन हैं। जो उनका बोध कराता है, उस नाम को चुनो और उसका जाप करो। चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाना-खाते, पानी पीते, रोटी-बनाते, खुरपी चलाते जीवन के हर मोड़ पर नाम याद आया करे।
!! बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय !!
(‘अमृतवाणी भाग-8’ से उद्धृत)