धोबिया जल बिच मरत पियासा
तीर्थाटन साधन समुदाई।
जोग बिराग ग्यान निपुनाई।।
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना।
संजम दम जप तप मख नाना।।
भूत दया द्विज गुर सेवकाई।
बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई।। (रामचरितमानस, ७/१२५/४-६)
सम्पूर्ण तीर्थों का भ्रमण, सम्पूर्ण साधनों का समुदाय, योग और वैराग्य, ज्ञान में दक्षता, गुरु की सेवा, आचार्य की सेवा, द्विज की सेवा,
जहँ लगि साधन बेद बखानी।
सब कर फल हरि भगति भवानी।। (रामचरितमानस, ७/१२५/७)
सब का फल केवल एक हरि की भक्ति है। परम प्रभु भगवान का एक नाम हरि है। वे जिस जीव पर अनुकम्पा करते हैं, उसका शुभाशुभ सर्वस्व हरण कर लेते हैं और बदले में अपना स्वरूप प्रदान कर देते हैं। इसी तरह,
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ज्ञाता।
सोइ महि मंडित पंडित दाता।।
धर्म परायन सोइ कुल त्राता।
राम चरन जाकर मन राता।। (रामचरितमानस, ७/१२६/१-२)
आज एक उलझा हुआ प्रश्न है कि धर्म क्या है? धर्म के विषय में भ्रान्तियाँ बनी हुई हैं। न जाने लोगों ने क्या-क्या धर्म गढ़ रखा है; किन्तु रामचरितमानस का उत्तरकाण्ड ऐसी ही समस्याओं का उत्तर है, सारे प्रश्नों का समाधान है। सभी प्रश्नों का समाधान करते हुए उन महापुरुष ने बताया कि धार्मिक कौन है? धर्म क्या है? मानस की उक्त पंक्तियों में है कि वही सर्वज्ञ है, सब कुछ जाननेवाला है, विशेषज्ञ है, गुणी है, ज्ञाता है, पंडित है, दानदाता है – उसके पास देने लायक सामग्री है, वह धर्मपरायण है, कुल का रक्षक है; कौन? ‘राम चरन जाकर मन राता।’– राम, उन परम प्रभु के चरणों में जिसका मन अनुरक्त है।
नीति निपुन सोइ परम सयाना।
श्रुति सिद्धान्त नीक तेहिं जाना।। (रामचरितमानस, ७/१२६/३)
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई।
जाकें पद सरोज रति होई।। (रामचरितमानस, ७/४८/८)
वह नीति में निपुण है, ‘परम सयाना’– समाज का सबसे सुलझा हुआ पुरुष है, वेदों का सिद्धान्त उसने भली प्रकार जाना है (भले ही वह पढ़ा-लिखा न हो), वह क्रिया में दक्ष है। कौन? ‘जाके पद सरोज रति होई।’– राम – उन परम प्रभु के चरण-कमल में जिसका मन अनुरक्त है।
सो कुल धन्य उमा सुनु, जगत पूज्य सुपुनीत।
श्री रघुबीर परायन, जेहिं नर उपज बिनीत।। (रामचरितमानस, ७/१२७)
हे पार्वती! वह सारा कुल कृतार्थ है, धन्य है, जिस कुल में किसी एक का राम – उन परम प्रभु के चरणों में अनुराग पैदा हो जाय। इसलिए उन प्रभु के चरणों में श्रद्धा स्थिर करो और जो उन्हें पुकारता हो, ऐसे दो-ढाई अक्षर के नाम का जप करो। ऐसा करनेवाला क्रिया को न जानते हुए भी क्रियावान् है और धर्म को न जानते हुए भी शुद्ध धार्मिक है; अन्यथा कितना भी पापड़ बेलें, कुछ भी हाथ लगनेवाला नहीं है।
रामचन्द्र के भजन बिनु, जो चह पद निर्बान।
ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ विषान।। (रामचरितमानस, ७/७८ क)
राम – एक परमात्मा के भजन के बिना जो कल्याण चाहता है, वह बिना सींग-पूँछ का पशु है। उसमें और बैल में अन्य कोई अन्तर ही नहीं है। भला इससे अधिक कोई क्या खरी-खोटी कहेगा! अच्छे-भले, खाते-पीते मनुष्य को पशु कह दिया। इन्हीं सन्दर्भों में सन्त कबीर का एक छोटा-सा भजन प्रस्तुत है–
जल बिच मरत पियासा…..
रे धोबिया जल बिच मरत पियासा।।
जल में ठाढ़ चिन्हत नहिं मूरख, अच्छा जल है खासा।
अपने घर का मरम न जाने, करे धोबियन की आसा।।
रे धोबिया…..
छन में धोबिया रोवै धोवै, छन में होत उदासा।
अपने हाथ से बरि के रसरिया, अपनी गटइया में फाँसा।।
रे धोबिया…..
साँचा साबुन लेइ न मूरख, है संतन के पासा।
दाग पुराना छूटत नाहीं, धोवत बारह मासा।।
रे धोबिया…..
एक रात का जोर लगावै, छूटि जात भरमासा।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, आछत अन्न उपासा।।
रे धोबिया…..
कबीर एक महापुरुष हुए हैं, जैसा कि अनादिकाल से होते आये हैं – सप्तर्षि, सनकादि ऋषि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, बाल्मीकि, सूर, तुलसी इत्यादि। इन्हीं में से एक इकाई कबीर भी थे। अधिकांश महापुरुषों के जीवन-चरित्र से ज्ञात होता है कि ईश्वर-प्राप्ति के इस पवित्र पथ में माता-पिता की कुलीनता का सहयोग नहीं दिखाई पड़ता। ईसा गर्भ में थे जब उनकी माँ मरियम का विवाह हुआ; किन्तु वह महापुरुष हो गये। ऋषि शृंग मृगों के झुण्ड में शिशु रूप में मिले थे; विभाण्डक ऋषि ने उनका पालन-पोषण किया। उन्हीं के द्वारा सम्पादित यज्ञ से भगवान राम का जन्म हुआ। वेदव्यास एक मत्स्यपालिका के पुत्र थे, वह भी कुँआरी कन्या से! स्पष्ट है कि भगवत्पथ में माता-पिता की सामाजिक प्रतिष्ठा से कोई सहयोग प्राप्त नहीं होता।
ऐसे ही परिवेश में सन्त कबीर भी थे। काशी के लहर तालाब के किनारे एक नवजात शिशु रुदन कर रहा था। नीरू और नीमा नामक जुलाहा दम्पति की दृष्टि शिशु पर पड़ी। संयोग से उन्हें कोई संतान न थी। उन्होंने उसे बड़े प्यार से पाला और परिवार की परम्परा के अनुरूप उस शिशु का पवित्र नाम कबीर रखा।
लड़का जब थोड़ा सयाना हुआ तो लगा काशी की गलियों में चक्कर लगाने। इस मन्दिर से उस मन्दिर। फिर वह सन्तों के मठ में जाने लगा। एक मठ बच्चे को पसन्द आ गया; वह था स्वामी रामानन्दजी का पवित्र आश्रम। वह प्रतिदिन आश्रम में जाकर खड़ा रहता था। आश्रम के शिष्य उसे धमकाते, भगाते; आपस में कहते– ‘‘यह जुलाहा बड़ा ढीठ है। इसे जब देखो, यहीं खड़ा रहता है। जा, भाग जा!’’
कबीर ने देखा कि गुरुजी तो कुछ नहीं बोलते, यह शिष्य ही उसे भगाते हैं। किसी युक्ति से गुरुजी से मिला जाय और उनसे दीक्षा ली जाय। उसने निरीक्षण करना आरम्भ किया कि गुरुजी की दिनचर्या क्या है? ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात।’ उस बालक की बुद्धि में एक योजना आ गयी। गुरुजी ब्रह्मबेला में गंगा-स्नान को जाते हैं। स्नान के लिए वह घाट की सीढ़ियों से नीचे उतरते हैं। कबीर उन्हीं सीढ़ियों पर रात्रि को ही लेट गये। सीढ़ियाँ उतरने के क्रम में रामानन्दजी का पैर कबीर के पेट पर पड़ा। रामानन्दजी के मुख से स्वाभाविक ही ‘राम-राम’ निकल पड़ा। उन्होंने झुककर कबीर को उठाया, ‘‘बच्चा! राम-राम कहो।’’ कबीर ने कहा, ‘‘हाँ गुरु महाराज! राम-राम, राम-राम! गुरुजी, हम मंत्र पा गये।’’
रामानन्दजी ने कहा– ‘‘तो यह तू है कबीर! गुरुमंत्र पाने के लिए तूने इतना प्रयास किया।’’ कबीर ने कहा, ‘‘जी महाराज! आज आपकी कृपा हो गयी।’’ रामानन्दजी सस्नेह बोले, ‘‘तू तो बड़ा लगनी है। आश्रम आओ, सेवा करो। अब तुम्हें कोई नहीं रोकेगा।’’ इस प्रकार उस आश्रम में कबीर को प्रवेश मिल गया। वैसे तो रामानन्दजी के सहस्रों शिष्य थे लेकिन उनमें कबीर सर्वोपरि निकले।
इस प्रकार जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों की रील जब साथ देती है तो कोई फुटपाथ पर ही क्यों न जन्मा हो, भगवत्पथ पर अग्रसर हो जाता है। इस पथ में किसी कुलीनता का सहयोग पूर्व ऋषियों की जीवनी देखने से समझ में नहीं आता है और न ही ऐसा कहीं आपके शास्त्रों में ही है। रामचरितमानस में है कि राज्याभिषेक के पश्चात् भगवान राम ने पुरवासियों की एक सभा बुलायी और कहा,
सुनहु सकल पुरजन मम बानी।
कहउँ न कछु ममता उर आनी।। (मानस, ७/४२/३)
जनपद के निवासीगण! ध्यान से सुनें। इसमें मेरा अपना कोई स्वार्थ नहीं है। कदाचित् कोई अनीति मेरे मुख से निकल जाय तो आप नि:संकोच मुझे रोक देना, मैं मान जाऊँगा। उन्होंने कहा क्या?–
बड़ें भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन्हि गावा।।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।
पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।। (मानस, ७/४२/७-८)
बड़े भाग्य से यह मानव-तन मिला है। (भले ही वह लहर तालाब पर फेंका क्यों न मिल गया हो। बाल्मीकि की तरह कोल-भील या जंगली जातियों में ही क्यों न जन्मे हों, सबको बड़े भाग्य से मानव-तन मिला है।) क्या विशेषता है इस तन में? यही कि यह साधन का धाम है, यह मुक्ति का दरवाजा है। साधन माने बस पकड़ना नहीं या परिवार के लिए आटा-दाल जुटाना नहीं है। साधन वह है जो आपको मोक्ष प्रदान कर दे। उसके लिए विवेक, वैराग्य, श्रद्धा, समर्पण जो चाहिए, वह सब कुछ इस मानव-तन में देकर प्रभु ने जन्माया है। ऐसे दुर्लभ तन को पाकर जिसने अपना परलोक नहीं सुधारा,
सो परत्र दुख पावइ, सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि ईश्वरहि, मिथ्या दोष लगाइ।। (मानस,७/४२/३)
वह जन्मान्तरों में दु:ख पाता है, सिर पीटकर पश्चाताप करता है और काल, कर्म, ईश्वर को व्यर्थ ही दोष देता है। मानव तन उपलब्ध है और परलोक नहीं सँवारा तो सब दोष उसी का है। भौतिक सम्पत्ति कोई कितना कमाकर रख लेगा? और कब तक उपभोग करता रहेगा? क्योंकि–
एहि तन कर फल बिषय न भाई।
स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।। (मानस, ७/४३/१)
हम-आप अधिक से अधिक स्वर्गिक ऐश्वर्य संग्रहीत कर लेंगे; और क्या कर लेंगे? किन्तु स्वर्ग भी स्वल्प, थोड़ा। उसका अन्त दु:खद होता है। स्वर्ग भी कालान्तर में आपके लिए दु:ख का आरक्षण है। स्वर्ग से खिसकनेवाले अजगर के शरीर में चले गये। इसका दु:ख नहीं होगा क्या? नश्वर कभी शाश्वत नहीं होता। शाश्वत एकमात्र भगवान के भजन में सहायक है तो दुर्लभ मानव-तन! इसमें सामाजिक कुलीनता का सहयोग कदापि नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्। (गीता, ९/३३)
सुखरहित, क्षणभंगुर! प्रतिक्षण परिवर्तित हो जा रहा है, भंग होता जा रहा है यह शरीर! कल जो फुदकते हुए बालक थे, आज बाल पक गये। इतने नश्वर मानव-तन को पाकर मेरा भजन कर! आपके धर्मशास्त्र गीता के अनुसार भजन का अधिकार उन सबको है जिन्हें मानव तन मिला है। ऐसे ही कबीर लहर तालाब पर मिले और एक महापुरुष के रूप में परिवर्तित हो गये।
कबीर की वाणी प्रथम दृष्ट्या समझ में नहीं आती। देखें–
बूझो बूझो पंडित अमरित बानी।
बरसे कम्बल भीगे पानी।।
—
अवधू! ऐसा ज्ञान न देखा।
पहिले मोरी माई मरि गई, पीछे जनम हमार।
बाबा चले हैं ब्याह करन को, हमहूँ चले बरियार।।
अवधू ऐसा ज्ञान न देखा……
क्या ऊटपटांग कह दिया! किसी ने कहा– यह कबीर की उलटबाँसी है; तो किसी ने कहा– उन्होंने निर्गुण कथन कर दिया। वह निर्गुण उपासक थे जबकि सृष्टि में निर्गुण नाम की कोई उपासना होती ही नहीं, न है और न भविष्य में ही कभी हो सकेगी। उपासना जब चलती है तो सगुण से चलती है और जब परिणाम देती है, जब विलय दिलाती है, स्थिति दिलाती है तो गुणातीत में। वह साधक को प्रकृति के गुणों से अतीत कर देती है। निर्गुण प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष की अवस्था है, न कि कोई उपासना। कबीर भी सगुण उपासक थे। उनकी साखी है–
साहिब का घर दूर, ज्यों लम्बा पेड़ खजूर।
चढ़े तो चाखे राम रस, गिरे तो चकनाचूर।।
उन परमात्मा प्रभु का घर बड़ी दूर है। उन्होंने उदाहरण दिया लम्बे खजूर के पेड़ का। ‘चढ़े तो चाखे राम रस, गिरे तो चकनाचूर।’ भगवान कहीं अलग हैं, अपने कहीं अलग है, चढ़ना और गिरना लगा हुआ है। आप ही विचार करें, सगुण उपासक के और क्या लक्षण होते हैं? यही तो कि भगवान अलग हों, हम अलग हों और शोध बाकी हो। कबीर भी इस दूरी को तय करने के लिए चिन्तित थे। उन्हें इस रास्ते में आनेवाली रुकावटें दिखायी पड़ीं–
माया महा ठगिनि हम जानी।
तिरगुन फाँस लिये कर डोले, बोले मधुरी बानी।
इसने छोड़ा किसी को भी नहीं। साधक को राह से भटकाने के लिए यह हर जगह प्रस्तुत रहती है–
केसव के कमला ह्वै बैठी, शिव के भवन भवानी।
पंडा के मूरत ह्वै बैठी, तीरथ में भई पानी।।
माया से आतंकित कबीर ने एक दिन अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया। उन्होंने पाया क्या? निर्गुण रहनी!
अवधू बेगम देस है मेरा।
तहाँ न उपजे मरे न बिनसे नहिन काल का फेरा।
संतो! अब मैं जिस देश में विचरण कर रहा हूँ वह बेगम है, अचिन्त्य है, अगोचर है, मन-बुद्धि से अतीत है, इनकी गम (पहुँच) से परे है इसलिए भगवान के देश को बेगम देश कहते हैं। वहाँ उत्पत्ति नहीं, विनाश नहीं है।
तहाँ न ईश्वर जीव न माया पूजक पूज्य न चेरा।
वहाँ ईश्वर है ही नहीं, माया भी नहीं है। पूजने योग्य कोई सत्ता नहीं है और पूजनेवाला कोई पथिक भी नहीं है। आप ही विचार करें, वहाँ पूजा कौन करेगा और किसकी करेगा? अंतत: कुछ बचा या नहीं?
कहत कबीर सुनो भाई सन्तों, नहिं तहँ द्वैत बखेरा।
कबीर कहते हैं, संतो! ध्यान दें। वहाँ द्वैत का बखेड़ा ही नहीं है। वहाँ तो केवल मैं हूँ, मेरा अस्तित्व है। मुझसे भिन्न कोई सत्ता नहीं है। तुलसीदास को संसार जानता है कि वह सगुण उपासक थे; किन्तु अन्त में स्थिति पाने पर उन्होंने कहा–
जब द्रवै दीन दयालु राघव साधु–संगति पाइये।
—
सेवत साधु द्वैत–भ्रम भागै। श्री रघुबीर चरन लय लागै।।
—
पावै सदा सुख हरि–कृपा संसार आसा तजि रहै।
सपनेहुँ नहीं सुख द्वैत दरसन बात कोटिक को कहै।। (विनयपत्रिका, पद १३६)
भगवान की असीम अनुकम्पा से संतों के समान स्थिति मिलती है जहाँ सपने में भी द्वैत का आभास नहीं, दर्शन नहीं होता। कौन करोड़ों दलीलें देता फिरे? तुलसी कहते हैं– द्वैत का दर्शन नहीं; कबीर कहते हैं– द्वैत का बखेड़ा नहीं। स्पष्ट है कि हर महापुरुष सगुण से चलता है और दर्शन-स्पर्श के साथ जब स्थिति मिलती है तो गुणातीत में, प्रकृति के गुणों से अतीत! अत: निर्गुण एक रहनी है, चरमोत्कृष्ट अवस्था है; न कि कोई आराधना या चिन्तन-पद्धति। कबीर सगुण उपासक थे। उनके चिन्तन का नाम ‘राम’ था।
जीव सिव सब प्रकटे वे ठाकुर वे दास।
कबीर और जाने नहीं इक राम नाम की आस।।
इधर अपार जीवों की शृंखला, उधर शिव अर्थात् कल्याण तत्त्व की मान्यता है। ‘कबीर और जाने नहीं इक राम नाम की आस।’ कबीर को आशा है तो केवल रामनाम से है; किन्तु,
राम नाम में अंतर है, कहीं हीरा है कहीं पत्थर है।
—
राम नाम दुर्लभ अति औरन ते नहिं काम।
आदि अन्त अरु जुग जुग रामहिं ते संग्राम।।
रामनाम बहुत कठिन है, ‘अति दुर्लभ’! तो छोड़िये, क्यों झंझट में पड़ते हैं? मत जपें रामनाम! कबीर कहते हैं– नहीं, जपना तो पड़ेगा। ‘औरन ते नहिं काम।’– अन्य किसी प्रक्रिया से आपकी कार्यसिद्धि नहीं होगी, कल्याण नहीं होगा इसलिए ‘आदि अंत अरु जुग जुग रामहिं ते संग्राम।’– ‘आदि’ अर्थात् भजन की शुरुआत, ‘अंत’ प्राप्तिकाल; इसके बीच चाहे जन्म-जन्मान्तर लग जाय, संघर्ष है तो राम से। राम से लड़ोगे तो रामत्व पा जाओगे और जीवों से लड़ोगे तो बदले प्राप्त कर लोगे। जपना तो पड़ेगा ही। रामनाम की जागृति कब है?
जे जन भींगे राम रस, बिगसित कबहुँ न रूख।
अनुभव भाव न दरसिये, तेहिं नर सुक्ख न दु:ख।।
जो कोई भी जन, कोई भी सेवक जो राम के रस में सराबोर हो गया, वह ‘बिगसित’– सदैव प्रफुल्लित रहता है। ‘कबहुँ न रूख’– उसके जीवन में रूखापन या उदासी कभी आती ही नहीं। किन्तु क्या प्रमाण है कि कोई राम के रस में भींगे हुए हैं? ‘अनुभव भाव न दरसिये, तेहिं नर सुक्ख न दु:ख।’– यदि संकल्पों के साथ अनुभव न मिले, भाव के साथ-साथ अनुभव नहीं मिल रहा है, उस साधक के लिए न सुख है, न दु:ख है। उसका रामनाम जपना प्रवेशिका के लिए प्रयत्न मात्र है, नाम अभी जागृत नहीं हुआ है। आशय यह कि संकल्पों का वेग यदि विजातीय प्रवृत्ति की ओर जा रहा है तो भगवान रोकें कि, ऊहू! भूल कर रहे हो, सावधान! जब चिन्तन सही दिशा में हो तो भगवान बतायें कि मन कितना प्रतिशत लग रहा है। मन में वृत्ति के प्रवाह के साथ-साथ यदि भगवान अनुभूति न दें, सार-सम्हाल न करें, उस पथ पर न ले चलें तब तक न सुख है न दु:ख; क्योंकि नाम अभी जागृत नहीं हुआ।
भव कहते हैं संसार को, अन कहते हैं अतीत को! इस प्रकार संसार से अतीत करनेवाली, संसार का निषेध करनेवाली विशेष जागृति का नाम अनभव है। उस जागृति का लक्षण यह है कि जिस सतह पर खड़े होकर हम परमात्मा को पुकार रहे हैं, हमारी पुकार, हमारी चाह ऐसी हो कि प्रभु हमारी सतह पर उतर आयें और हमारी आत्मा से अभिन्न होकर खड़े जो जायँ, हमारा मार्गदर्शन करने लगें। परमात्मा की अपौरुषेय वाणी के प्रसारण का नाम अनभव या अनुभव है। यही कबीर की साखी का आशय है कि यदि हमारे भावों के साथ वह परमात्मा अपनी अनुभूति प्रसारित न करें तो साधक के लिए न सुख है, न दु:ख है। जब अनुभव प्रसारित होने लगें तो नाम जागृत हो गया।
इस संसार को कबीर ने दु:खों की खानि कहा है–
यह संसार दु:खों की खानी।
तब बचिहो जब रामहिं जानी।।
आदिशास्त्र गीता में भी संसार को ‘दु:खालयमशाश्वतम्’ (८/१५) कहा गया है। कबीर गीता ही तो पढ़ रहे हैं कि संसार दु:खों का घर है। जो आज है, कल नहीं रहेगा। ‘फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना।’ वह दु:खों की खानि है। जैसे कोयले की खदान में चाहे जितनी गहरी खुदाई करो, कोयला ही मिलेगा। कोयले की क्वालिटी अच्छी-खराब हो सकती है किन्तु मिलेगा कोयला ही। ‘तब बचिहो जब रामहिं जानी।’– इस दु:ख से तभी बचोगे जब राम को जान लोगे।
हमरे देखत सकल जग लूटा।
दास कबीर राम कहि छूटा।।
देखते ही देखते प्रजा से लेकर चक्रवर्ती सम्राट तक लूट लिये गये किन्तु दास कबीर राम का आश्रय लेकर इस माया के चंगुल से छूट गया। एक अन्य स्थल पर कबीर ने कहा कि संसार में लोग परस्पर कुशल पूछते हैं–
कुशल कहत कहत जग बिनसे, कुशल काल की फाँसी।
कह कबीर एक राम भजे बिन, बाँधे जमपुर जासी।।
बुजुर्गों से उनकी कुशलक्षेम न पूछें तो वह दु:खी हो जाते हैं। वह सोचते हैं हमारी इतनी उम्र हो चली और इसने हमें पूछा तक नहीं! यदि किसी ने पूछ लिया कि– दद्दा! ठीक है? कुशल है? वह कहने लगते हैं– हाँ बचवा! बहू बड़ी होनहार मिल गयी है, साक्षात् लक्ष्मी है, हमारी नींद बाद में खुलती है, चाय पहले ही लाकर रख देती है। किसी ने और पूछ लिया– क्यों बाबा! कुशल तो है? वह कहेंगे– हाँ बेटा! पनत पैदा हुआ है, बेटे का प्रमोशन हो गया है। हमें भी वृद्धा-पेंशन मिल रही है। यह कुशल…..वह कुशल…..कहते-कहते लोग मरते जा रहे हैं। यह कुशल नहीं, काल का फेंका हुआ फन्दा है। पौत्र-प्रपौत्र देखते-देखते हम हो गये निन्यानबे साल के! वह क्षण आ गया जो इस शरीर की आयु का अन्तिम क्षण है। पौत्र का मुख तो हमने देखा लेकिन जिसके लिए यह दुर्लभ तन मिला था, उसके लिए तो हमने सोचा ही नहीं। दो कदम चले नहीं, इतने में प्राण-पखेरू उड़ गये।
कह कबीर एक राम भजे बिन बाँधे जमपुर जासी।
एक परमात्मा के चिन्तन का उपदेश कबीर ने दिया। उसी एक परमात्मा का चिन्तन तुलसी ने दिया। एक परमात्मा के ही चिन्तन पर पूरी गीता खड़ी है। इतना ही नहीं, विश्व में जिसने भी धर्म की परिभाषा दी है, गीता का ही थोड़ा-थोड़ा अनुवाद लिया है कि एक ईश्वर ही सत्य है, उसके अतिरिक्त सबकुछ नश्वर है। भले ही वह महापुरुष पढ़ा-लिखा हो या फुटपाथ पर मिला हो, वह संसार के चाहे जिस परम्परा में खड़ा हो, अन्त में सिमट कर एक ही भाषा बोलेगा, एक ही निष्कर्ष पर पहुँचेगा, दूसरा कुछ वह कह ही नहीं सकता। यदि वह दूसरा कुछ कहता है तो उसने अभी पाया नहीं।
उड़ि माखी तरुवर को लागी बोले एकै बानी।
यह मनरूपी मक्खी, हैजा फैलानेवाली, रोग की जड़ मक्खी क्रमश: उत्थान करते-करते ‘ऊर्ध्वमूलमध:शाखम्’ (गीता, १५/१) जब मूल परमात्मा का स्पर्श पा जाता है, तो ‘बोलै एकै बानी’– वह कहता है कि ईश्वर एक है। ऐसा महापुरुष समाज में दरार नहीं डालता। ऐसे ही महापुरुषों में से एक इकाई कबीर भी थे। उनके चिन्तन का नाम राम! उनके आराध्य एक इष्ट राम थे। सगुण उपासक थे कबीर।
जब कबीर अपनी स्थिति में आ गये तो चर्चा का विषय हो गये– कबीर साहब बहुत अच्छे महापुरुष हैं; उन्होंने कहा तो कुछ नहीं लेकिन हमारा कल्याण हो गया; यह विपत्ति टल गयी; उनकी वाणी में ओज है; हमारे रास्ते की रूकावटें दूर हो गयीं; वह बड़े पहुँचे हुए महात्मा हैं…..। कबीर ने सुना तो बिगड़ पड़े– क्या कबीर-कबीर की रट लगाये पड़े हो?
कबिरा कबिरा क्या कहे, सोधो सकल सरीर।
आसा तृष्णा बस करे, सोई दास कबीर।।
कबीर अच्छे! कबीर महात्मा! क्या व्यर्थ की रट लगाये हो? ‘सोधो सकल सरीर’– सकल शरीर अर्थात् शरीर कई हैं। एक तो स्थूल शरीर जो पंचभौतिक पदार्थों से निर्मित पिण्ड है। इसके अन्तराल में सूक्ष्म शरीर है जो मन का संसार है। उसके भी अन्तराल में कारण शरीर है। यह परमात्मा की वह प्रशक्ति है जिसके द्वारा जीवन शक्ति के रूप में प्रवाहित है। परमात्मा के तेज के अंशमात्र से सृष्टि का सृजन, पालन और परिवर्तन है। सबका कारण तो वह है। क्रमश: स्थूल, सूक्ष्म और कारण– इन तीनों शरीरों की शोध कर लो किन्तु आशा और तृष्णा के रहते हुए यह शोध सम्पन्न नहीं होती। हाँ, ‘आसा तृष्णा बस करे सोई दास कबीर।’ इतना हमने किया, इतना आप ही कर लें तो आप भी कबीर हैं। महापुरुष एक स्थिति है, न कि वह हो गये और अब कोई होगा ही नहीं। गुरु जिसको अपनाता है तो जिस गुरुत्व में स्वयं निमग्न है, शनै:-शनै: उसी स्थिति को दिलाकर गुरु ही बना देता है, चेला ही बनाकर नहीं छोड़ देता। कबीर प्रोत्साहन देते हैं कि इतना ही मैंने किया है, इतना ही तुम करो तो तुम भी कबीर हो जाओगे।
कबीर के पदों में कुछ पद तो भजन की आरम्भिक अवस्था के द्योतक हैं, कुछ में साधना में मिलनेवाली विभूतियों का चित्रण है, कहीं प्राप्तिकाल और कुछ में प्राप्ति के पश्चात् संतों की रहनी का चित्रण है; किन्तु प्रस्तुत भजन चेतावनी और साधकों का उद्बोधन है–
जल बिच मरत पियासा।
रे धोबिया जल ही में मरत पियासा।
धोबी वस्त्रों का मैल साफ करता है। कैसा भी दाग हो, धोबी छुड़ा देता है किन्तु वस्त्रों का रंग धोबी भी नहीं छुड़ा पाता। इसी तरह कबीर ने सद्गुरु को धोबी की उपमा दी है– ‘सतगुरु धोबिया से परिचय नाहीं।’ अन्त:करण में मल-आवरण विक्षेप के संस्कार, कर्मों के दाग की धुलाई कर जीवात्मा को उसके विशुद्ध स्वरूप का दर्शन, स्पर्श और उसमें स्थिति दिलाने में यदि कोई समर्थ है तो सद्गुरु है। सद्गुरु ही धोबी है। किन्तु सद्गुरु भी शिष्य को कुछ देते नहीं, शिष्य के ही गड़े हुए धन को उसे बता देते हैं। वह मार्गदर्शन करते चलते हैं कि यह रास्ता है, इधर प्रकाश है। जहाँ भी साधक लड़खड़ाने लगता है वहाँ उसे प्रोत्साहन देते हैं किन्तु चलना तो साधक को ही पड़ता है इसलिए साधना की जागृति के पश्चात् शिष्य भी धोबी है। यदि शिष्य चलने ही वाला नहीं है तो गुरु क्या करेगा?
ऊपर भरे, नीचे झरे, उनका गुरु गोरख क्या करें?
– – –
आपै मूल फूल फुलवारी, आपै सींचनहारा।।
आप स्वयं धोबी हैं। पहले सद्गुरु धोबी हैं। उनकी शरण-सान्निध्य-सेवा से साधना जहाँ जागृत हुई, आप भी धोबी हैं, आपको अब स्वयं चलना पड़ेगा किन्तु बहुत से साधक साधना समझकर भी दायें-बायें समय काटते रहते हैं। उन्हें प्यास है, तड़प भी रहे हैं किन्तु साधना में समय नहीं दे पाते। ऐसे ही साधक को लक्ष्य कर कबीर कह उठते हैं– ‘जल बिच मरत पियासा।’ एक जल है विषयवारि तो दूसरा है ब्रह्मवारि।
जो संतोष–सुधा निसिबासर सपनेहुँ कबहुँक पावै।
तौ कत बिषय बिलोकि झूँठ जल मन कुरंग ज्यों धावै।। (विनयपत्रिका, १६८)
अध्यात्म-पथ के संतों ने दो रस बताये– एक तो विषय-रस, दूसरा ब्रह्मपीयूष! यह ब्रह्मपीयूष सबके हृदय में है। उसी में साधक खड़ा है और उसी की प्यास से मर रहा है; क्योंकि ‘जल में ठाढ़ चीन्हत नहिं मूरख’– वह जल में ही खड़ा है किन्तु जड़तावश उसे पहचानता ही नहीं है जबकि चारों ओर ‘अच्छा जल है खासा’– पर्याप्त स्वच्छ जल है।
अपने घर का मरम न जाने, करे धोबियन की आसा।
एक तो यह सांसारिक घर है जहाँ हम छप्पर डालकर रहते हैं, मनुष्य जहाँ निवास करता है; किन्तु मृत्यु के पश्चात् ‘सोइ पुर पाटन सो गली, बहुरि न देखा आइ।’ इस घर को कोई लौटकर देखने भी नहीं आता। एक घर है आपका हृदय। उसे घट भी कहते हैं, घर भी कहते हैं। व्यक्ति अपने घट का, अपने अन्दर का रहस्य ही नहीं जानता कि घट में क्या है? स्थिति क्या है? वृत्ति किधर प्रवाहित है? उसकी जाँच-पड़ताल नहीं करता, स्वयं जागृत नहीं है और ‘करे धोबियन की आसा। रे धोबिया….’– वह अन्य धोबियों की आशा करता है कि कोई महापुरुष कर दे, दिखा दे, हमें करना न पड़े। यदि बिना किये मिलता तो भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को कर्म का उपदेश क्यों करते? उन्होंने कहा– ‘‘अर्जुन! बिना कर्म किये न किसी ने पाया है और न ही भविष्य में कोई प्राप्त कर सकेगा; किन्तु कर्मों के परिणाम में जिन्हें आत्मा विदित है, जो आत्मतृप्त है, आत्मस्थित है उस पुरुष के लिए किञ्चित् भी कर्त्तव्य शेष नहीं है और न प्राप्त होने योग्य कोई वस्तु अप्राप्त ही है इसलिए तू कर्म कर।’’
साधन तो साधक को ही करना पड़ेगा जबकि अधिकांश साधक स्वयं अपने हृदय का विश्लेषण नहीं करते कि चिन्तन में कितना लग पा रहा हूँ?; कितना समय किस चिन्तन में व्यतीत हो रहा है?; और ‘करे धोबियन की आसा’ कि कोई कृपा करके दे देगा। आरम्भिक स्तर का साधक ऐसा ही सोचता है; किन्तु लगन सभी साधकों में होती है।
छन में धोबिया रोवै धोवै, छन में होत उदासा।
एक क्षण में वह प्रार्थना में लग जाता है– भगवन्! क्या हम ही एक ऐसे हैं कि हमारी सुनवाई नहीं होगी? ‘तू दयालु दीन हौं, तू दानि हौं भिखारी।’ (विनयपत्रिका, ७९) विनय करने लगता है। दूसरे ही क्षण वह उदास हो जाता है कि पता नहीं भगवान हैं भी या नहीं! मेरे जैसे पापी की पुकार क्यों सुनेंगे? वह बहाने ढूँढ़ने लगता है।
अपने हाथ से बरि के रसरिया, अपनी गटइया में फाँसा।
रे धोबिया…..
उसने अपने ही हाथों कर्म की रस्सी बनाकर अपने ही गले को फँसा लिया है और अब व्यर्थ ही टालमटोल कर रहा है। कर्म ही एक ऐसी रस्सी है जिसमें सभी जीव बँधे हुए हैं–
करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फलु चाखा।। (मानस, २/२१८/४)
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके। (गीता, १५/२)
महाभारत में कथा आती है कि जब द्रौपदी का स्वयंवर हो गया, पाण्डवों की खुशी का वारापार नहीं था। अर्जुन और भीम द्रौपदी को लेकर माता कुन्ती के पास गये और कहा– ‘‘माताजी! आज बड़ी उत्तम भिक्षा पाये हैं।’’ कुन्ती ने बिना देखे ही कह दिया– ‘‘ठीक है, पाँचों भाई आपस में बाँट लो।’’ कुन्ती ने घूमकर देखा तो पूछा– ‘‘यह देवी कौन हैं?’’ भीम ने कहा– ‘‘यह काम्पिल्य की राजकुमारी हैं।’’ कुन्ती ने कहा– ‘‘ओह! इस देवी को तुमलोगों ने भिक्षा बताया। माँ से भी विनोद किया तुमलोगों ने! ठीक है, अब बाँटकर दिखाओ।’’
भीम और अर्जुन इस नयी व्यवस्था में परेशान थे कि युधिष्ठिर आ गये। दोनों भाइयों ने अपनी भूल और माताजी की आज्ञा से उन्हें अवगत कराया, बोले– ‘‘भैया! कोई उपाय करो।’’ धर्मात्मा युधिष्ठिर ने कहा– ‘‘माताजी का आदेश हमलोगों ने कभी टाला ही नहीं।’’ तब तक वहाँ भगवान श्रीकृष्ण भी आ गये। उन सबने कहा– ‘‘प्रभो! हमें इस संकट से बचाइए।’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘हूँ! बुआ के वचन का पालन तो करना ही होगा।’’ सबने कहा– ‘‘प्रभो! आप भी यही कह रहे हैं।’’
श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘इस समस्या का उत्तर तो स्वयं द्रौपदी है। पिछले जन्म में अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर इसने शिव की आराधना की। भोलेनाथ जब प्रसन्न हुए तो इसने वरदान माँगा– ‘‘भगवन्! ऐसा पति दें जो सम्पूर्ण धर्मात्मा हो।’’ शिव ने कहा– ‘‘एवमस्तु!’’ इसने पुन: कहा– ‘‘वह सबसे बलशाली हो।’’ उन्होंने कहा– ‘‘तथास्तु!’’ इसने पुन: कहा– ‘‘भगवन्! वह सबसे बड़ा धनुर्धर हो।’’ भोलेनाथ ने कहा– ‘‘ठीक ऐसा ही होगा!’’ इसने पुन: कहा– ‘‘भगवन्! वह सबसे सुन्दर हो।’’ शंकर ने कहा– ‘‘जैसी तुम्हारी इच्छा!’’ इसने कहा– ‘‘भगवन्! वह विद्वान और विनयी हो।’’ भगवान ने कहा– ‘‘अच्छा! अच्छा!! सब होगा।’’ और अन्तर्धान हो गये। भोलेनाथ का पहला वरदान हैं युधिष्ठिर – सम्पूर्ण धर्मात्मा! उनके दूसरे वरदान के रूप में भीम हैं; इनसे बलशाली इस समय संसार में कोई नहीं है और न इनके जीवनकाल में कोई होगा। तीसरा वरदान सबसे बड़े धनुर्धर के रूप में अर्जुन हैं। चौथा वरदान अप्रतिम सौन्दर्यसम्पन्न नकुल हैं और पाँचवाँ वरदान हैं सहदेव जो विद्वान भी हैं, विनयी भी हैं। द्रौपदी! अपने कर्मों का भार तो उठाना ही पड़ता है। तुम्हें वरदान माँगते समय ही यह ध्यान में रखना चाहिए था कि पाँचों उत्तम गुण किसी एक व्यक्ति में सम्भव ही नहीं है। तुम्हें एक पति की आवश्यकता थी लेकिन तुमने पाँच बार माँगा, भोलेनाथ ने पाँच बार ‘तथास्तु’ कहा। ये वही पाँच वरदान हैं। अब भोलेनाथ के आशीर्वाद को मिटा सको तो देख लो।’’
समाधान हो गया। ‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।’– कर्म शुभ हों या अशुभ, उनका परिणाम भुगतना ही होता है। यही है ‘अपने हाथ से बरि के रसरिया, अपनी गटइया में फाँसा। रे धोबिया! जल बिच मरत पियासा।’ सारांशत: आपका विशुद्ध स्वरूप अविनाशी, चिन्मय, शाश्वत और परम चेतन है। आपका वह स्वरूप छिपा हुआ है। बीच में कुछ पर्दे पड़े हैं, दाग लगे हुए हैं। आप उन कर्मों के लेख या संस्कारों को धोने में सक्षम हैं। उन दागों की धुलाई कर अपने विशुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर सकते हैं; किन्तु कल पर टालते रहते हैं, इसलिए जल में खड़े रहकर भी आप उसे पहचान नहीं पा रहे हैं। अपने हृदय का विश्लेषण न कर धोबियों से आशा लगाये बैठे हैं। कबीर यह भी बताते हैं कि ऐसा भी नहीं है कि हम-आप भजन न करते हों। सभी भजन करते हैं किन्तु उन्हें सही तरीका मालूम नहीं है।
साँचा साबुन लेइ न मूरख, है सन्तन के पासा।
बाजार में नकली साबुनों की भरमार है। सच्चा साबुन संत कबीर की दृष्टि में वह है जिससे अन्त:करण के दाग धुल जायँ, जिससे विशुद्ध स्वरूप का दर्शन, स्पर्श और स्थिति मिल जाय। लेकिन जड़तावश हम उसे लेते ही नहीं– ‘साँचा साबुन लेइ न मूरख’। कहाँ मिलेगा वह साबुन? ‘है सन्तन के पासा’– वह तो सन्तों के पास ही है।
सती अनुसुइया आश्रम चित्रकूट में कभी-कभी विश्वविद्यालय के बुद्धिजीवियों का समूह पहुँच जाया करता था। क्षेत्रीय भाविक उनका परिचय गुरु महाराज को देते– ‘‘भगवन्! यह वाइस-चान्सलर हैं, यह प्रोफेसर हैं। दर्शनशास्त्र पर आपका अधिकार है। जितने भी बच्चे पी-एच.डी. पास करते हैं, आप ही की कलम से होता है।’’ कुछ देर तक तो वह लोग अपनी जानकारी के अनुसार कुछ कहते थे, पुन: वे सब महाराज जी से अनुरोध करते– ‘‘महाराज! हमने द्वैत-अद्वैत-विशिष्टाद्वैत और विश्व के दार्शनिकों का मत-मतान्तर पढ़ा है किन्तु साधन समझ में नहीं आता। हम लोग भजन कैसे करें, कृपया साधन बता दीजिए।’’
गुरु महाराज उनसे कहते थे– ‘‘हो! सब बात सब कोई जानत है। दो-दो पैसे में वेदान्त बिकत है। लोग पढ़ते हैं और लिखते भी चले जा रहे हैं। न जाने वे क्या पढ़ते हैं और क्या लिखते हैं? किन्तु भजन ही एक ऐसी वस्तु है जो कलम से लिखने में नहीं आती है और न वाणी से कहने में ही आता है। यह तो किसी अनुभवी सद्गुरु के द्वारा किसी-किसी अनुरागी के हृदय में जागृत हो जाया करती है। भजन एक जागृति है।’’
जप तप नियम जोग निज धर्मा।
श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा।।
ग्यान दया दम तीरथ मज्जन।
जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन।। (मानस, ७/४८/१–२)
सब कर फल हरि भगति सुहाई।
सो बिनु संत न काहूँ पाई।। (मानस, ७/११९/१८)
जप, तप, नियम, वेद में वर्णित नाना प्रकार के शुभ कर्म, ज्ञान, दया, इन्द्रियों का दमन, तीर्थों में मज्जन इत्यादि जहाँ तक सृष्टि में धर्म के लक्षणों का वेदों और सत्पुरुषों ने वर्णन किया है, उन सबका फल एकमात्र हरि की भक्ति है और ‘सो बिनु संत न काहूँ पाई।’ बगैर सन्त के आज तक किसी ने पाया ही नहीं।
रामचरितमानस से ही एक अन्य उद्धरण लें। भगवान राम पंचवटी में हैं। लक्ष्मण ने छलहीन कुछ प्रश्न रखा कि ‘‘भगवन्! माया क्या है? ब्रह्म क्या है? जीव क्या है? ईश्वर क्या है? और सुख का स्रोत क्या है?’’ भगवान ने कहा–
भगति तात अनुपम सुख मूला।
मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।। (मानस, ३/१५/४)
हे तात! भक्ति अनुपम सुख का मूल है, ‘अनुपम’ अर्थात् जिसकी कोई तुलना नहीं, कोई उपमा नहीं है। लक्ष्मण ने अनुरोध किया– प्रभो! उसे प्रदान कर दें। भगवान ने कहा कि वह तो ‘मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।’– वह मिलेगी तभी जब सन्त अनुकूल हों। संत का मिलना पर्याप्त नहीं है बल्कि जब वह अनुकूल हों तभी भक्ति मिल सकती है। इसीलिए साधन-भजन ही एक ऐसी वस्तु है जो न तो लिखने में आती है और न ही वाणी से कहने में आती है। वाणी से तो दिन-रात हम-आप सुनते ही रहते हैं कि श्वास का चिन्तन ऐसे करो, ध्यान ऐसे धरो, समाधि का यह स्वरूप है…. इत्यादि। जीवनपर्यन्त पढ़ते, सुनते और लिखते रहें; किन्तु भजन तो संतों की सेवा से ही जागृत होगा।
आदिशास्त्र गीता में अर्जुन ने इसी प्रश्न को रखा कि भगवन्! उस चरमोत्कृष्ट ज्ञान को मैं कैसे प्राप्त करूँ? भगवान श्रीकृष्ण ने कहा–
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन:।। (गीता, ४/३४)
अर्जुन! किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के पास जाकर, निष्कपट भाव से सेवा और प्रश्न-परिप्रश्न कर तू उस ज्ञान को प्राप्त कर। स्वयं भगवान अर्जुन के समक्ष थे, उन्हें अर्जुन को किसी तत्त्वदर्शी के पास भेजने की क्या आवश्यकता थी? वस्तुत: गीता-आलोकप्रदाता भगवान श्रीकृष्ण भी एक महायोगेश्वर हैं। वह परम तत्त्व परमात्मा में स्थित और परमात्मा स्वरूप हैं। वह जानते थे कि आज का साधक तो मेरे समक्ष है किन्तु भविष्य की पीढ़ी को कहीं सन्देह न हो जाय कि श्रीकृष्ण तो गये, विभूतियाँ भी उन्हीं के साथ गईं, अब हम कैसे प्राप्त करें? उक्त श्लोक में भगवान का आशय है कि तत्त्वदर्शन एक स्थिति है। जिसने भी उस परम तत्त्व परमात्मा को विदित कर लिया, वह तत्त्वदर्शी है। जैसे श्रीकृष्ण, वैसे ही वह महापुरुष! इसलिए उन्होंने अर्जुन को माध्यम बनाकर कहा– किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के पास जाओ। वे तत्त्व के ज्ञाता तुझे उपदेश करेंगे।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। (गीता, ४/३५)
उनसे जान लेने के पश्चात् जीवन में तुझे भ्रम नहीं होगा कि यह रास्ता सही है अथवा वह रास्ता। कोई सन्देह नहीं रह जायेगा और तुम पा जाओगे।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति।। (गीता, ४/३८)
अर्जुन! ज्ञान के समान पवित्र करनेवाला नि:सन्देह सृष्टि में कुछ भी नहीं है, किन्तु वह मिलेगा कहाँ? ‘तत्स्वयं’– उसे तू स्वयं योग के आरम्भ में नहीं, योग के मध्य में नहीं, योग की परिपक्व अवस्था में ‘आत्मनि विन्दति’– हृदय-देश में साक्षात् करोगे। इस प्रकार धर्मशास्त्र गीता के अनुसार भजन की जागृति किसी तत्त्वदर्शी से है। यही कबीर कह रहे हैं कि ‘साँचा साबुन लेइ न मूरख’– सच्चा साबुन अर्थात् शाश्वत उपचार जो अन्त:करण के स्वरूप को धोकर परमतत्त्व का साक्षात् करा दे, उसे विदित करा दे; यह तो जड़तावश हम ले नहीं पाते। ‘है सन्तन के पासा’– वह सन्तों के पास है। सद्गुरु से ही भजन की जागृति है।
दाग पुराना छूटत नाहीं, धोवत बारह मासा।
रे धोबिया……
पुराना दाग, जन्म-जन्मान्तरों के संस्कार, इनका पुरातन दाग ‘छूटत नाहीं, धोवत बारह मासा।’ सभी अहर्निश अपनी समझ से धुलाई ही तो कर रहे हैं। कभी कोई एकादशी व्रत रहता है, तो कहता है कि अब अपना घर-बार देखो। आज है मंगलवार, आज हम संकटमोचन का दर्शन करेंगे। कोई कहता है– आज कारबार बन्द, हम गंगा-स्नान करेंगे। कभी कोई व्रत तो कभी कोई अनुष्ठान! हर व्यक्ति धुलाई करने में ही लगा है किन्तु पुरातन दाग छूट नहीं पा रहा है; क्योंकि वह सच्चे साबुन का प्रयोग नहीं कर रहा है। वह साबुन केवल सन्तों के पास है। अन्य-अन्य तरीकों से बारहों महीने धुलाई करते रहें, पुरातन दाग नहीं छूटता। उसके लिए तो सद्गुरु ही धुलाई करने में समर्थ धोबी हैं और उनकी साधना समझकर चलनेवाला अनुरागी पथिक भी धोबी है। अन्त में यह महापुरुष निर्णय देते हैं कि भजन में किया क्या जाता है?
एक रात का जोर लगावे, छूट जात भरमासा।
सन्त कबीर कहते हैं कि यदि एक रात का जोर इस पथ में लगाते हो तो आपका भरम और आशाएँ समाप्त हो जायेंगी। एक रात्रि तो पृथ्वी पर ग्रहों की गति से है। उत्तरी गोलार्द्ध पर दिन के एक बजे हैं तो दक्षिणी गोलार्द्ध में रात्रि के एक बजे होते हैं। किन्तु आध्यात्मिक परिवेश में जगत् ही एक रात्रि है–
‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।’ (गीता, २/६९)
अर्जुन! इस जगत्-रूपी रात्रि में सभी प्राणी निश्चेष्ट पड़े हैं। जैसे बेहोश व्यक्ति के ऊपर सर्प ही फेंक दो, वह कोई प्रतिक्रिया नहीं करेगा। इसी प्रकार जगत्-रूपी रात्रि में सभी प्राणी निश्चेष्ट पड़े हैं। इनमें संयमी पुरुष जग जाता है। यही रामचरितमानस में है–
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा।
देखिअ सपन अनेक प्रकारा।। (मानस, २/९२/२)
मोहरूपी रात्रि में सब शयन कर रहे हैं। जो रात-दिन दौड़-धूप कर रहे हैं, मानो स्वप्न देख रहे हैं, संसार ही तो जुटा रहे हैं।
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना।
सत हरि भजनु जगत सब सपना।। (मानस, ३/३८/५)
सब स्वप्न ही तो देख रहे हैं। एक सपना घड़ी दो घड़ी का होता है जबकि जीवन का सपना साठ-सत्तर साल का है। यह थोड़ा लम्बा है….और क्या? भगवान श्रीकृष्ण ने बताया था कि संयमी पुरुष जाग जाता है। जागने का तरीका है संयम! यही मानस में है कि–
एहि जग जामिनि जागहिं जोगी।
परमारथी प्रपंच बियोगी।। (मानस, २/९२/३)
इस जगत्-रूपी रात्रि में योगी जग जाता है। जगे हुए के क्या लक्षण हैं? ‘परमारथी प्रपंच बियोगी’– वह परम अर्थ परमात्मा के लिए प्रयत्नशील होता है। वह प्रपंच से उदासीन रहता है। घर-गृहस्थी के कार्य मात्र कर्त्तव्य समझकर औपचारिकतावश करता है, उसमें आसक्त नहीं होता। उसकी श्रद्धा का केन्द्र परमात्मा होता है, मुख्य ध्यान वह परमात्मा के लिए लगाता है।
यही संत कबीर का भी आशय है कि जगत् की मोहनिद्रा में हम जितना जोर लगाये पड़े हैं, मन-क्रम-वचन से भला-बुरा सोचकर, दाव-पेंच लगाकर, दूसरों की ऩजर बचाकर अपनी सारी शक्ति सुत बित लोक ईषणाओं में लगाते हैं, इन्हें उधर से समेटकर प्रभु के चरणों में, सुमिरण में, साधना में लगा दें। इस प्रकार उधर का जोर इधर लगाने से ‘छूटि जात भरमासा’– भरम और आसा सदा के लिए छूट जायेंगे। भ्रम समाप्त हो जायेगा और आगे कोई सत्ता बचेगी ही नहीं जिसकी हम आशा करें। यदि परमात्मा से भी आगे कुछ होता तो हम उसकी आशा अवश्य करते। मोहनिशा में लोग जोर कहाँ लगाते हैं? यह मातृ-ऋण, पितृ-ऋण, भातृ-ऋण, यह कर्त्तव्य, वह दायित्व! भगवान राम ने बताया–
जननी जनक बंधु सुत दारा।
तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।। (मानस, ५/४७/४)
जननी माने माता, जनक माने पिता, बंधु, सुत, धन, धाम, इज्जत-प्रतिष्ठा,
सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।। (मानस, ५/४७/५)
इन सबके प्रति ममत्व के जो धागे लगे हुए हैं, उनको समेटो और ममत्व के इन धागों की रस्सी बनाकर मन को मेरे चरणों में बाँध दो। ममता का संचार मन का प्रसारण है, यह ममता परमात्मा के प्रति हो जाय।
तजि मद मोह कपट छल नाना।
करउँ सद्य तेहि साधु समाना।। (मानस, ५/४७/३)
जो मद-मोह-छल-कपट त्यागकर मेरी शरण में आ जाता है, भगवान कहते हैं कि मैं तत्काल उसे साधु के समानान्तर स्थिति प्रदान कर देता हूँ। साध्य सुलभ हो जाता है। अत: वह जोर जो ममत्व के धागों में लगा है, उसे समेटकर भगवान के चरणों में लगायें। भगवान ने आपको जिस परिस्थिति में रखा है वह सारा काम-धंधा करें किन्तु नौकर की तरह निरपेक्ष रहते हुए! श्रद्धा और समर्पण प्रभु के चरणों में हो।
भजन के लिए घर छोड़ने की जरूरत नहीं है। भजन करने के लिए गृहस्थ या विरक्त का दरार नहीं है। केवल एक योग्यता चाहिए कि ‘बड़ें भाग मानुष तनु पावा।’ यदि दुर्लभ मानव-तन उपलब्ध है तो आपका कर्त्तव्य-पथ यही है। जिस परिस्थिति में प्रभु रखें, उसमें रहते हुए अपना मन प्रभु के चिन्तन में लगायें। शेष कार्य अपना कर्त्तव्य समझकर करें, ठीक उसी प्रकार जैसे कारखाने में कर्मचारी आते हैं, गोदाम में माल रखते हैं, निकालते हैं; सामान की क्षति या लाभ-हानि से उन्हें बहुत मतलब नहीं रहता; अवकाश ले लिया तो कारखाने की चिन्ता ही नहीं। ऐसे ही संसार एक कारखाना-जैसा है। इसमें जननी-जनक, धन-धाम, इज्जत-प्रतिष्ठा में ममत्व के धागे बिखरे पड़े हैं। ऐसे गृहासक्त मन को समेटते जायँ, प्रभु के चरणों में अधिक समय दें और गृहस्थी के कार्य भी करते रहें। एक पद में कबीर ने कहा है–
या विधि मन को लगावै, मन के लगाये प्रभु पावै।।
जैसे नटवा चढ़त बाँस पर, ढोलिया ढोल बजावै।
अपना बोझ धरै सिर ऊपर, सुरत बाँस पर लावै।।
या विधि…..
जैसे भुवंगम चरत बनहिं में, ओस चाटने आवै।
कबहूँ चाटि कबहुँ मणि चितवै मनि तजि प्रान गँवावै।।
या विधि…..
जैसे कामिनि भरै कूप जल, कर छोड़े बतरावै।
अपना रंग सखियन संग राचै, सुरत गगरि पर लावै।।
या विधि…..
जैसे सती चढ़त सत ऊपर, अपनी देह जरावै।
माता पिता कुटुम सब त्यागै, सुरति पिया पर लावै।।
या विधि…..
धूप दीप नैवेद्य अरगजा, ज्ञान की आरति लावै।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, फेर जनम नहिं पावै।।
या विधि…..
सारांशत: सांसारिक कार्यों में आसक्त न हों। हर कार्य करते समय प्रभु का स्मरण बना रहे। घर छोड़ा नहीं जाता, भजन की एक अवस्था आती है, घर अपने आप छूट जाता है। जन्म के समय दाँत नहीं उगते, दाढ़ी नहीं जमती; एक अवस्था पश्चात् दाँत भी उग आते हैं, दाढ़ी भी निकल आती है। इसी प्रकार अवस्था आने पर घर अपने आप छूट जाता है। भला कोई फलता-फूलता घर कैसे छोड़ देगा? फुदकते हुए बाल-गोपाल से विमुख कैसे हो जायेगा? लेकिन जब अवस्था आती है, भगवान वैसी व्यवस्था दे देते हैं और सब हो जाता है। आज हम जिनको देखे बिना जी नहीं सकते, जीना भी नहीं चाहते, समय आने पर आपके ही घर में आपके लिए जगह नहीं रह जायेगी, आप उधर देखना भी नहीं चाहेंगे, सब काल जैसे प्रतीत होंगे, यदि प्रभु प्रेरक के रूप में खड़े हो जायँ। अत: ‘एक रात का जोर लगावै’; अविद्या रात्रि है, ईश्वर प्रकाश है। मन-क्रम-वचन से जितनी शक्ति आप अविद्या में खर्च करते हैं, उसे केवल एक प्रभु के चरणों में लगा दें। फिर तो कोई सत्ता बचेगी ही नहीं जिसकी आप आशा करें; आप प्राप्त कर लेंगे।
कहत कबीर सुनो भाई सन्तो, आछत अन्न उपासा।
रे धोबिया….
कबीर कहते हैं– सन्तो! ध्यान दें। विशुद्ध अन्न परसा रखा हुआ है फिर भी जीव एक ग्रास के लिए तड़प रहा है। वह उपवास कर मर रहा है। शरीर की खुराक अन्न, रोटी-दाल इत्यादि है जिससे जीवनयापन होता है; किन्तु आत्मा की खुराक भजन है। भजन ही भोजन है जिसके द्वारा आत्मा शनै:-शनै: तृप्त और स्वरूपस्थ हो जाती है। फिर से कभी भूख नहीं लगती, कभी प्यास नहीं लगती। आगे कुछ है ही नहीं तो वह किसकी तृष्णा करेगा?
भजन न करने के लिए जीव तरह-तरह के बहाने गढ़ लेता है, जैसे अभी हम पवित्र नहीं हैं या यह जगह पवित्र नहीं है; किन्तु भगवत्पथ में किसी पवित्र जगह की जरूरत नहीं है। कमरे में फूल बिछाकर, इत्र छिड़ककर बैठें; यदि हृदय में श्रद्धा नहीं, समर्पण नहीं, भाव नहीं है, सुमिरण नहीं है, कण्ठ पर नाम नहीं है, स्मृति में प्रभु का चिन्तन नहीं है तो वह जगह अपवित्र है। मात्र बाहरी साज-सज्जा आगे कहीं न कहीं आपको पतन के गर्त में फेंक देगी।
इसलिए आप किसी भी परिस्थिति में क्यों न हों, चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाते-पीते, शौच जाते, खुरपी चलाते, गलीचा बुनते – हर काम करते प्रभु का नाम – ओम् अथवा राम – याद आया करे। वैदिक ऋषियों ने ओम् का जाप जपा। जब संस्कृत भाषा के पढ़ने, उच्चारण करने और ओम्-जप के अधिकार-अनधिकार पर कड़े प्रतिबन्ध लग गये तो भक्तिकालीन ऋषियों ने रामनाम के जपने पर बल दिया। दोनों शब्दों का आशय एक है, परिणाम एक है। ओ माने वह अविनाशी परमात्मा, अहं माने आप स्वयं; अर्थात् वह परमात्मा जिसका निवास आपके हृदय में है। इसी तरह राम– ‘रमन्ते योगिन: यस्मिन् स राम’– जिसमें योगी लोग रमण करते हैं, परमात्मा का वह अनुभव हृदय में जागृत होता है, वह राम जो सबके हृदय में रमण करता है। इस प्रकार दोनों शब्दों का आशय एक ही है। अन्तर इतना ही है कि भक्तिकालीन राम वैदिक ऋषियों के ओम् का अनुवाद है।
अत: विश्व के किसी भी भाषा के छोटे से दो-ढाई अक्षर के नाम का स्मरण सदैव बना रहे। कार्य करते समय नाम याद आया करे तो सोने में सुहागा है। सुबह-शाम बैठकर आधा घण्टा समय जप में अवश्य दें। वज्र पड़ रहा हो, घर में लाश ही क्यों न पड़ी हो, पाँच मिनट समय नाम-जप में अवश्य दें, नियम खण्डित न होने पाये। भगवान जानते हैं कि जीव मुझे पुकार रहा है। वह यह भी जानते हैं कि इसे क्या चाहिए, वह मिलेगा। भविष्य में आप जो चाहते हैं, वह भी मिलेगा और मोक्ष तो मिलना ही मिलना है। श्वास के रहते-रहते ईश्वर-पथ की साधना समझकर आपसे दो कदम रखते बन गया तो माया के पास ऐसा कोई यंत्र नहीं है कि आपकी की हुई साधना को मिटा दे। अगले जन्म में भी तीसरा ही कदम उठेगा और ‘अनेक जन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्’ (गीता, ६/४५)– अनेक जन्मों के परिणाम में आप वहीं पहुँच जायेंगे जिसका नाम परमगति है, परमधाम है। शोचनीय वह है जिसने साधना-पद्धति समझा ही नहीं। इससे भी अधिक शोचनीय वह है, जिसने साधना समझकर भी दो कदम चला ही नहीं। लेकिन जो दो कदम भी चल चुका, उसका मोक्ष हो गया। आज तो देखने को नहीं मिला लेकिन उसके लिए मोक्ष का आरक्षण भली प्रकार हो गया; क्योंकि,
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्। (गीता, २/४८)
इस गीतोक्त साधन का स्वल्प अभ्यास भी जन्म-मृत्यु के महान भय से उद्धार करनेवाला होता है। इसमें आरम्भ का नाश नहीं, बीज का नाश नहीं है। दो-ढाई अक्षर के नाम के जप का नियम बना लें। हर परिस्थिति में श्रद्धा और समर्पण के साथ नाम याद आया करे, चाहे उस समय कैसा भी कार्य आप क्यों न कर रहे हों; खुरपी चलाते, गाय-भैंस दुहते या शौच जाते समय भी नामजप किया जा सकता है।
हमारे पूज्य गुरु महाराज जी बताते थे कि जब वह शौच के लिए बैठ जाते (दिगम्बर वेश में तो वह विचरण ही करते थे। आज यहाँ हैं तो कल पता नहीं कहाँ?) तो मन लग जाता। वह दो-एक घण्टा उसी अवस्था में बैठे ही रह जाते और तब कहीं जाकर पानी छूते थे। इसी आशय का एक कथानक इस प्रकार है–
एक सेठजी थे। उनका मन भजन में लग गया। दुकान-दौरी सब चौपट होने लगी। घरवाले चावँ-चावँ करने लगे। तब सेठ ने अपने गुरु महाराजजी से कहा कि ‘‘गुरु महाराज! घरवालों ने तो जीना मुश्किल कर दिया है, क्या करें?’’ उन्होंने कहा– ‘‘बेटा! कहीं टेढ़-सोझ दुकान खोलकर बैठ जा, घरवालों को संतोष हो जाय।’’ सेठ ने एक ऐसी तंग गली में दुकान खोली जो बाजार से थोड़ा हटकर थी। उस गली में लोगों का आना-जाना बहुत कम रहता था। सेठ ने सोचा– घरवाले भी देख लें कि दुकान तो खोल रखी है और यहाँ तो कोई आयेगा नहीं, दिनभर बैठकर भजन करूँगा।
किन्तु भगवान का मन कुछ और ही था। उस गली में सेठ की ऐसी साख जम गयी कि पाँच साल का बच्चा ही क्यों न भेज दो, सेठ उसे भी कभी कच्चा माल नहीं दे सकते। क्षेत्र में उनके सत्यता की लहर दौड़ गयी। अब उसी दुकान पर दिनभर भीड़ लगी रहती। तौलते-तौलते सेठ आठ बजे रात्रि को ही दुकान बन्द कर पाते थे। सेठ अपने को कोसते कि भगवन्! मेरा कहाँ का पाप प्रकट हो गया! आपका नाम भूल जाना चाहता है।
ज्योंही आठ बजते, सेठ दुकान बन्द कर लोटा लेकर नाले की ओर शौच के लिए निकल जाया करते थे। उस समय फ्लश सिस्टम के बाथरूम नहीं थे, नित्यक्रिया के लिए लोग दूर एकान्त में निकल जाते थे। सेठ नाले में टट्टी भी फिरते जाते और नाम भी जपते रहते। दिनभर की छटपटाहट जब शान्त हो जाय, नाम जपने की खुमारी जब पूरी हो जाय तो वह बारह-एक बजे रात्रि को घर आते। उन्हें रूखा-सूखा जो भी भोजन ढँका मिलता, चुपचाप खाकर सो रहते और प्रात: पुन: अपनी दुकान पर उपस्थित हो जाते। घर पर भूलकर भी नामजप या भजन नहीं करते थे अन्यथा सेठानी सबसे कहने लगती कि बहिन! क्या बतायें। हमारे सेठ का माथा तो फिर खराब हो गया। पहले आँख मूँदते रहे, सुधर गये थे लेकिन अब तो फिर बिगड़ा चाहत हैं! सेठ जी अपना नामजप शौच के समय नाले में ही पूरा कर लेते थे।
एक दिन हनुमान जी की दृष्टि सेठ पर पड़ गयी। शौच के समय भगवान के पवित्र नाम का उच्चारण सुनकर उन्हें लगा कि यह बनिया-बक्काल की जाति मेरे भगवान का नाम भी अशुद्ध करने में लगा है। यह क्या जाने शुद्धि का नियम? इसे थोड़ी शिक्षा दे दूँ। उन्होंने पीछे से सेठ की पीठ में इस अंदाज से लात मारा कि यह मुँह के बल गिर जाय, दो-एक दाँत टूट जाय, इसे नसीहत मिल जाय; किन्तु बनिया टस से मस नहीं हुआ, नाम जप पूर्ववत् चलता रहा। अब हनुमान को रोष आ गया कि मेरे प्रहार से भी यह हिला तक नहीं, अब तो इसे समझाना ही होगा। उन्होंने दुपट्टा फेंका, शरीर को बढ़ाया और उछलकर सेठ को वह लात मारा जो कभी मेघनाथ की छाती में मारा था; किन्तु सेठ जस का तस! वह राम-राम-राम-राम जपता ही रहा।
‘उर प्रेरक रघुबंस विभूषन’ (मानस, ७/११२/१) तुरन्त हनुमानजी के हृदय में भगवान की प्रेरणा हुई। हनुमान चौंके, अरे! हमने किस कुपात्री को छू दिया। लो, हम भी अशुद्ध हो गये। अब तो भगवान की सेवा में भी विलम्ब हो जाना चाहता है। हनुमान का कीर्तिमान था कि भगवान की सेवा में उनसे कभी देर हुई ही नहीं। अर्द्धरात्रि को आदेश मिला कि संजीवनी लाना है तो सूर्योदय के पहले ही बूटी आ गयी। उन्होंने तत्काल सरयू में डुबकी लगाया और पवित्र होकर भगवान के दरबार में हाजिर हो गये।
आज तो वहाँ का दृश्य ही कुछ दूसरा था। भगवान की कराह से पूरा महल गूँज रहा था। हनुमान ने पूछा– ‘‘प्रभो! ऐसी कौन-सी बीमारी हो गयी जिसका उपचार राजकीय वैद्य के पास भी नहीं है।’’ भगवान ने कहा– ‘‘हनुमान जी! कुछ पूछिये मत, आज तो हम लात ही लात बहुत मारे गये।’’ हनुमान रोष में आ गये, बोले– ‘‘प्रभो! संसार में ऐसा कौन है जो आपके ऊपर लात उठाये? आप उसका नाम बता दें, मैं तत्काल उसका सफाया कर देता हूँ।’’ भगवान ने कहा– ‘‘हनुमानजी! आपने ही तो मारी थी लात।’’ हनुमान बोले– ‘‘प्रभो! इस सेवक से इतनी बड़ी भूल कैसे हो सकती है?’’ भगवान बोले– ‘‘क्या उस बनिये को मारा था?’’ हनुमान ने कहा– ‘‘प्रभो! किन्तु वह आपको कैसे लग गयी?’’ भगवान ने बताया–
जननी जनक बन्धु सुत दारा।
तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँधि बरि डोरी।।
अस सज्जन मम उर बस कैसे।
लोभी हृदय बसइ धनु जैसे।।
‘‘हनुमान जी! वह बनिया ममत्व के सारे धागे समेटकर मेरे चरणों में मन को बाँधकर जप कर रहा था। ऐसा सज्जन मेरे हृदय में निवास करता है। उसके कवच के रूप में तो मैं था। आपने उचक-उचककर जितने प्रहार किये, वह मुझे ही झेलने पड़े।’’
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी।
जिमि बालक राखइ महतारी।। (मानस, ३/४२/५)
शिशु की रक्षा जैसे मातायें करती हैं, उसी प्रकार मैं समर्पित भक्त की रक्षा करता हूँ। अत: भगवान की कृपा में कमी नहीं है, कमी है तो अपने अन्दर श्रद्धा की। इसलिए कबीर कहते हैं– ‘एक रात का जोर लगावै’। हम-आप कहाँ जोर लगाते हैं? जगत्-रूपी रात्रि में!
तुलसी मन तो एक है, चाहे जिधर लगाय।
भावै हरि की भक्ति कर, भावै विषय कमाय।।
जितना जोर हम-आप संसार में लगाते हैं, उसे समेटें। भजन में बहुत पापड़ नहीं बेलना पड़ता। सम्पूर्ण मनोयोग से भजन में लगें। जहाँ-जहाँ श्रद्धा बिखरी है, उसे समेटें और दत्तचित्त होकर मन-वचन-कर्म से श्रद्धा समेट कर भगवान के चरणों में चित्त को बाँध दें। जो जोर उधर लगाते हैं, इधर चरणों में लगा दें। ‘एक रात का जोर लगावै, छूट जात भरमासा।’– फिर भरम समाप्त, आशा समाप्त! आगे किसकी आशा करें, ऐसा कुछ बचता ही नहीं। परम प्रभु की प्राप्ति के पश्चात् आप पूर्ण तृप्ति प्राप्त कर लेंगे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो! आछत अन्न उपासा।
शुद्ध अन्न थाल में परस कर रखा हुआ है, फिर भी लोग उपवास कर रहे हैं। प्रभु तो केवल भाव के भूखे हैं– ‘भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।’– भगवान भाव के वश में हैं, सुख के निधान हैं, करुणासागर हैं। इसलिए कोई भी जगह भजन के लिए अपवित्र नहीं होती। हाँ, वातावरण का प्रभाव मन पर पड़ता है। जगह स्वच्छ होती है तो मन भी स्वच्छ होता है। इसलिए स्वच्छ जगह में सुबह-शाम बैठकर आधा घण्टा चिन्तन अवश्य करें।
आप सबका धर्मशास्त्र गीता है। यह दुर्बल मानव-तन को दिया गया उपदेश है। गीता में भगवान कहते हैं कि अत्यन्त दुराचारी भी यदि मुझे भजता है तो वह साधु मानने योग्य है। अर्जुन! यदि कोई सृष्टि के सभी पापियों से भी अधिक पाप करनेवाला है तब भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा नि:सन्देह पार हो जायेगा, भले ही वह अंगुलिमाल का उस्ताद ही क्यों न हो। गीता पाप का निवारण है। यह पापी और पुण्यात्मा में दरार नहीं डालती। इसलिए भूल जाइये कि आपने कितना पाप किया, क्या पुण्य किया? अपने मन को समेट कर प्रभु के चरणों में लगा भर दें। श्रद्धा के साथ, समर्पण के साथ नामजप करें। भगवान जानते हैं कि जीव किसे पुकार रहा है? इसे क्या चाहिए? सबकुछ मिलने लगेगा। हमलोगों ने भगवान को पुकारा ही कब? पता नहीं सब किस-किसको पुकारते रहते हैं जबकि गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं–
रामचन्द्र के भजन बिनु, जो चह पद निर्बान।
ग्यानवन्त अपि सो नर, पसु बिनु पूँछ विषान।। (मानस, ७/७८)
वारि मथें घृत होय बरु, सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ, यह सिद्धान्त अपेल।। (मानस, ७/१२२)
।। बोलिये, सियावर रामचन्द्रजी की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-5’ से उद्धृत)