अड़गड़ मत है पूरों का

अड़गड़ मत है पूरों का

सन्त कबीर का यह पद गुरुदेव भगवान समय-समय पर साधकों के हित में कहते थे। इस पद से मेरे व्यक्तिगत जीवन की एक घटना भी जुड़ी है जो मेरे नामकरण का भी निमित्त बनी। यद्यपि पूज्य गुरुदेव का सन् १९४७ के आरम्भ में ही अनुसुइया आगमन हो चुका था, फिर भी निवास की संतोषजनक व्यवस्था न थी। सैकड़ों वर्ष पूर्व निर्मित सिद्धबाबा की दो-तीन कोठरियों के भग्नावशेष थे। क्षेत्रीय जनता के अत्यधिक अनुरोध पर भी महाराजश्री ने वहाँ आश्रम निर्माण की अनुमति न दी; किन्तु कानपुर के समृद्ध भक्त श्री ओच्छवलाल जी पारिख तथा कर्वी के तत्कालीन एस.डी.एम. श्री एस.डी. चतुर्वेदी के विशेष आग्रह पर महाराज जी ने धूनी के ऊपर तीन टूटी-फूटी टीन की जर्जर चद्दरों के स्थान पर एक छोटा-सा धूना घर बना देने की अनुमति प्रदान कर दी जिससे वर्षा से धूना भींगने और बुझने से बच जाय।

उक्त महानुभावों ने स्तम्भ निर्माण हेतु ईंटें भेजीं जो आश्रम के समीपवर्ती ग्राम तक आ गयीं। ग्रामवासियों ने उत्साहपूर्वक श्रमदान कर उसे मंदाकिनी नदी के किनारे तक गिरा दिया। वहाँ से ईंटों को बाँस की टोकरियों में रखकर भक्तजन कहीं कमर, कहीं सीने, कहीं गले तक पानी में होकर मंदाकिनी पारकर आश्रम के समक्ष रखते जा रहे थे।

उस समय हमारी आयु लगभग २३ वर्ष रही होगी। अनुसुइया आये छ:-सात महीने हो चले थे। सन् १९५६ के संभवत: अगस्त माह में ईंटों को आश्रम में लाने का श्रमदान चल रहा था। हमने भी इस श्रमदान में अपना योगदान करने का निश्चय किया। गुरुदेव का निर्देश था कि मन को सदैव नाम या रूप में लगाये रखना चाहिए। इस निर्देश को ध्यान में रखकर श्रमदान में हम ऐसी एकान्तिक सेवा का अवसर खोजने लगे जिसमें दूसरों से वार्ता या सहयोग की अपेक्षा से नाम या रूप विस्मृत न हो। हमने देखा कि शिर पर ईंट ढोते समय ऊबड़-खाबड़ पथरीली नदी में बहुत-सी ईंट संतुलन बिगड़ने से गिर जाती थीं और धारा के साथ बहकर और गहरे जल में चली जाती थीं। हमने तलहटी में गिरी उन ईंटों को निकालने की सेवा चुनी जिसमें किसी के सहयोग की अपेक्षा नहीं थी। हम मन में नाम जप करते, डुबकी लगाते और जब स्वरूप पकड़ में आता तो ईंट लेकर ऊपर आ जाते। भजन के साथ सेवा का अच्छा अवसर मिल गया।

कुछ देर तक तो सब ठीक चलता रहा। जीवन के आरम्भिक वर्षों में तरणताल (स्वीिंमग पूल) में पचासों फीट ऊपर से जल में छलाँग लगाने (डाइव करने) का अभ्यास था। पूर्व अभ्यासवश हम शिर के बल पानी में डुबकी लगाते थे। पहाड़ी नदियों में नुकीले पत्थर स्थान-स्थान पर उभरे ही रहते हैं। एक बार शिर सीधा पत्थर से जा टकराया। शिर में घाव हो गया। ऊपर आने पर लोगों ने रक्त बहते देखा। उन्होंने पट्टी बाँध दिया। महाराज जी के पास हमें ले गये। लोगों ने बताया कि यह शिर के बल डुबकी लगा रहे थे। रक्त बहता देख गुरुदेव बोले– ‘‘मारो अड़गड़ है! गँवार कहीं का! लोग नदियों में पैर के बल जाते हैं। यह शिर के बल जा रहा था।’’ लोगों ने कहा– ‘‘हाँ, महाराज! एकदम गँवार है।’’ महाराज जी ने कहा– ‘‘नहीं रे, मैं देखत रहा हूँ। कैसा डूब-डूबकर ईंट निकाल रहा था। गँवार नहीं है, अड़गड़ है।’’

अब लोगों को एक विनोद मिल गया। वे मुझे अड़गड़ कहकर आनन्द लेते। आश्रम में अभी मेरा कोई सम्बोधन भी नहीं था, इसलिए लोग मुझे अड़गड़ कहकर बुलाने लगे। मैंने विचार किया– कोई मुझे अड़गड़ कहे या बग्गड़; यह तो भौतिक शरीर का एक सम्बोधन है। इससे भजन में कोई बाधा या सहायता तो मिलती नहीं। लोग कहते हैं तो कहें! महाराज जी ने यह संबोधन दिया, यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है; फिर भी इस शब्द का कुछ न कुछ अर्थ तो होगा ही! यह जिज्ञासा मन में बनी रही।

कुछ दिनों पश्चात् महाराज जी के किसी भाविक भक्त ने यह जिज्ञासा प्रकट की– महाराज जी! ‘अड़गड़’ नाम का अर्थ क्या होता है? महाराज उससे बहुत प्रसन्न हुए और बताया– अड़गड़ का अर्थ है कठिन, जटिल, दुरुह, अगम! रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा–

लच्छन धाम राम प्रिय, सकल जगत आधार।।

गुर बसिष्ठ तेहि राखा, लछिमन नाम उदार।।

(रामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १९७)

वशिष्ठ ने वैसा गुण देखा इसलिए उनका नाम लक्ष्मण रखा। इसी तरह अड़गड़– बढ़िया नाम है इसका। इसमें यही लच्छन है। हमें भी कुतूहल हुआ, यह कौन-से लक्षण की ओर इंगित कर रहे हैं? लगभग एक माह पश्चात् महाराज जी बोले– ‘‘हूँ! ईश्वरपथ में वही सबसे अच्छा माना जाता है जो अड़गड़ हो।’’ इस शब्द से सम्बन्धित सन्त कबीर का एक भजन पूज्य महाराज जी के मुखारविन्द से सुनने को मिला जो इस प्रकार है–

अड़गड़ मत है पूरों का, यहाँ नहीं काम अधूरों का।।

सच्चा साफ अमीरी रस्ता, सच्चे साहिब शूरों का।

कच्चा अरु मटमैला रस्ता, कच्चे कायर कूरों का।।

यहाँ नहीं…..।।

जप तप करके स्वर्ग कमाना, यह तो काम मजूरों का।

देना सब कुछ लेना कुछ नहीं, बाना झाँकर झूरों का।।

यहाँ नहीं…..।।

बड़ा देव गद्दी पर बैठा, तब क्या ढोना घूरों का।

मस्त हुआ जब अनहद सुनकर, तब क्या सुनना तूरों का।।

यहाँ नहीं…..।।

मुश्किल अगम पंथ का चलना, धारा खाँड़े छूरों का।

कहत कबीर सुनो भाई साधो! अगम पंथ कोई शूरों का।।

यहाँ नहीं…..।।

अड़गड़ पथ अर्थात् दुर्गम पथ! जिस रास्ते पर हम-आप कभी गये नहीं, जो गया लौटकर आया नहीं, सन्देशा दिया नहीं– ऐसे पथ से गुजरकर अपने स्वरूप, शाश्वत धाम तक पहुँचना है इसलिए यह पथ अड़गड़ है। प्रह्लाद के साथ क्या घटित हुआ, मीरा को कितना कष्ट मिला, इस पथ में बड़े अवरोध, खोह-खन्दक हैं इसलिए यह बड़ा कठिन, दुरुह पथ है।

अड़गड़ पथ है पूरों का– यह पूरों का पथ है। पूरा वह है जो सम्पूर्ण मन से लगता है। अधूरे वे हैं जो आधे मन से लगते हैं। कथा है कि उद्धव गोपियों को ज्ञान सिखाने पहुँचे। देखा कि गोपियाँ श्रीकृष्ण नाम का संकीर्तन कर रही हैं। उन्होंने सोचा– ये तो देवभक्ति कर रही हैं। हमारी दृष्टि में यह निचले स्तर की साधना है। उद्धव ने गोपियों को समझाया कि वे ज्ञान का आश्रय लें। ज्ञान नित्य है, शाश्वत है। गोपियों ने उद्धव को उत्तर दिया–

ऊधव मन न भये दस बीस।।

रह्यो एक सो गये स्याम संग, को अवराधै ईस।

ऊधव मन……।।

उद्धव जी! मन दस-बीस तो होता नहीं! हमलोगों के पास तो एक ही मन था, वह श्याम के संग चला गया। अब आपसे योग-साधना सीखने के लिए हम अलग से दूसरा मन कहाँ पायें? उद्धव ने देखा– साधना से जिस चित्त का निरोध किया जाता है, इन गोपियों का मन तो भगवद्-रस से आप्लावित है। इनकी स्थिति तो हमसे अत्यन्त उच्च है। गोपियों को आदर्श मान वह भी भक्ति के रस में डूब गये। इस प्रकार जो सम्पूर्ण मन से लगता है, वह पूरा है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी सम्पूर्ण मन से लगने की बात कही–

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।१८/६२।।

अर्जुन! उस हृदयस्थित प्रभु की शरण में जाओ, सर्वभावेन’- सम्पूर्ण भावों से जाओ। ऐसा नहीं कि कुछ भाव संकटमोचन में, थोड़ा विन्ध्यवासिनी में, किञ्चित् पशुपतिनाथ में हो गया। तब तो पचहत्तर प्रतिशत हम लीक हो गये, भटक गये, हमारा भाव बिखर गया। हृदयवाले ईश्वर के पास जाने के लिए अत्यन्त स्वल्प भाव ही बच पाया। इस भूल के कारण कल्याण कभी नहीं होगा। अत: सर्वभावेन– सम्पूर्ण भाव से तुम उसकी शरण जाओ। तत्प्रसादात्परां शान्तिम्– उसके कृपा-प्रसाद से अर्जुन! तुम परमशान्ति प्राप्त कर लोगे। यह अड़गड़ पथ जहाँ पहुँचाता है, वहाँ पहुँच जाओगे और उस स्थान को प्राप्त कर लोगे जो शाश्वत है। तुम रहोगे और तुम्हारा अनन्त जीवन! इस प्रकार पूरा वह है जो सम्पूर्ण हृदय से एक इष्ट में लगते हैं। पूर्ण समर्पण! अधूरे कौन? जो आधे मन से लगते हैं। एक सन्त ने कहा कि तुम एक साथ दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकते। ऐसा नहीं है कि तुम परमात्मा को खुश कर लो, साथ ही माया को भी प्रसन्न कर लो। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं–

तुलसी मन तो एक है, भावै जहाँ लगाय।

भावै हरि की भक्ति कर, भावै विषय कमाय।।

सारांशत: सम्पूर्ण भाव से जो लग गया, जिसने अपना शीश समर्पित कर दिया, पूर्वाग्रहों, मान्यताओं को त्यागकर गुरु के प्रति समर्पित हो गया, वही इस अत्यन्त जटिल और कठिन परमार्थ पथ पर सफल होगा। अग्रेतर सन्त कहते हैं कि यह रास्ता पूर्णत: सच्चा रास्ता है– सच्चा साफ अमीरी रस्ता, सच्चे साहिब शूरों का– यह सच्चा, पूर्णत: सत्यपथ है, स्पष्ट पथ है, सन्देहमुक्त पथ है। यह अमीरों का रास्ता है जो दैवी सम्पद् का अर्जन करने के लिए कटिबद्ध है। कल्पना करें, सन्त कबीर के समय में अमीरों का रास्ता, सुलतान और बादशाहों का रास्ता कितना सुविधासम्पन्न रहा होगा। उनके मार्ग पर पुष्पवर्षा होती थी। सामान्यजन उस मार्ग से नहीं चल सकते थे। उसी प्रकार इस अड़गड़ पथ पर उस ‘साहिब’ प्रभु के सच्चे और शूरवीर भक्त ही चल पाते हैं।

यह वीरों का पथ है। इसमें अपने मन से ही युद्ध करना है, अपने ही मन को मारना है– मन को मारि गगन चढ़ि जावे। अमरित घर की भिक्षा पावे। उजड़ा शहर बसावे।।। सन्त सहजो बाई कहती हैं–

मन मथि मरे न जीवे, जीवहिं मरण न होय।

सहज सनेही राम बिनु, भव पार न पावै कोय।।

मन को इतना मथो, नाम-जप में इतना लगाओ कि यह मर जाय। यह आशा और तृष्णा से रहित हो जाय। पुन: यह जीवित न हो तभी जीव मृत्यु से मुक्त हो सकता है। मन मिटा, यही भव-पार की अवस्था है; किन्तु राम से सहज स्नेह, हार्दिक लगाव के बिना कोई भव का पार नहीं पा सकता। कच्चा अरु मटमैला रस्ता, कच्चे कायर कूरों का।– जो सन्देहयुक्त हैं उनका रास्ता कच्चा, कीचड़युक्त और मटमैला है। उस पथ पर आगे का मार्ग दिखायी नहीं देता। अनुभवशून्य साधकों का रास्ता मटमैला है। ऐसा मार्ग कच्चे आधे-अधूरे मन से लगने वाले, कायर जो भजन की लपट से घबड़ाने वाले, मात्र बड़ी-बड़ी बातें करनेवाले, अपनी आत्मा को अधोगति में पहुँचाने वाले क्रूरकर्मी नराधमों का है।

ईश्वर-पथ में यदि आप प्रवृत्त होते हैं, मनोकामनाओं की पूर्ति अयाचित होने लगती है। अत: साधक को कुछ भी माँगना नहीं चाहिए। आप अपनी क्रिया करते भर जायँ। भगवान जानते हैं कि आपका हित किसमें है वह वही व्यवस्था देंगे, इसलिए फल उनकी कृपा पर छोड़ दें।

श्रीरामचरितमानस का आख्यान है कि नारद जी ने दक्ष प्रजापति के पुत्रों को उपदेश देकर विरक्त सन्त बना दिया जिससे रुष्ट होकर दक्ष ने नारद को श्राप दिया कि वह किसी स्थान पर अधिक समय तक न रुक सकें, लोगों को वैराग्य की ओर वह प्रेरित न कर सकें। श्राप से व्यथित नारद हिमालय की सुरम्य उपत्यका में भगवच्चिन्तन में डूब गये। भगवान की कृपा से श्राप का प्रभाव टल गया। वह अखण्ड समाधि की अवस्था तक पहुँच गये। उन्होंने काम पर विजय प्राप्त कर लिया। इस सफलता को उन्होंने अपनी उपलब्धि मान लिया। चिन्तन से विरत होकर वे इसके प्रदर्शन में प्रवृत्त हो गये। इसी क्रम में वह विश्वमोहिनी के स्वयंवर में जा पहुँचते हैं। कन्या के अलौकिक रूप एवं गुणों पर विमुग्ध नारद उससे विवाह के लिए आतुर हो उठे। सहायता लेने वह भगवान के पास गये। उन्होंने विचार किया– यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति– परमपद की इच्छावाले ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। अभी तक हमने अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया है। यदि आज विवाह की इच्छा व्यक्त करूँ तो प्रभु अवश्य मना करेंगे। विश्वमोहिनी वरमाला उसे ही पहनायेगी जो सबसे अधिक रूप-सौन्दर्यसम्पन्न हो। भगवान से अधिक सुन्दर कोई है भी नहीं; क्यों न मैं इनसे इनका रूप ही माँग लूँ! उन्होंने प्रभु का रूप माँग लिया। भगवान ने भी ‘तथास्तु’ कहते हुए अपने अनन्त रूपों में से एक रूप हरि अर्थात् बन्दर की आकृति प्रदान कर दिया। नारद अपनी योजना पर प्रसन्न हो रहे थे, उन्होंने कहा– ‘‘प्रभो! जिसमें हमारा हित हो, वही कीजिएगा।’’ भगवान ने आश्वासन दिया–

जेहि बिधि होइहि परम हित, नारद सुनहु तुम्हार।

सोइ हम करब न आन कछु, बचन न मृषा हमार।।

(रामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १३२)

आप हित की बात करते हैं, हमने आपका परम हित सोच लिया है। नारद प्रसन्न थे कि काम तो बन गया लगता है। वह वहाँ से सीधे स्वयंवर स्थल पहुँचे। सबने उठकर नारद जी को दण्ड-प्रणाम किया। नारद ने विचार किया कि मैं नारद तो हूँ नहीं, मेरा चेहरा भगवान का है तभी तो इतना तेज है कि सभी प्रणाम कर रहे हैं। भगवान शंकर के दो सेवक भी इस दृश्य का आनन्द ले रहे थे। वे व्यंग कर रहे थे– क्या अनुपम सौन्दर्य है! साक्षात् हरि हैं। अब तो राजकुमारी इनका ही वरण करेंगी। राजकन्या को नारद भयंकर आकृति के बन्दर जैसे दिखायी पड़े। जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली।। (रामचरितमानस, १/१३४/१)- क्रोधित राजकन्या ने उस पंक्ति की ओर देखा भी नहीं जिसमें नारद जी बैठे थे। एक ओर भगवान भी बैठे थे। कन्या ने उन्हें जयमाला पहनाया और उन्हीं के साथ चली गयी।

अब तो नारद जी बहुत तड़पे। इतना बड़ा आघात वह सहन न कर सके। उन्होंने झटपट भगवान को श्राप दे डाला। जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।। (रामचरितमानस, १/१३७/१)- भगवान ने अपनी माया का आवरण ही हटा लिया। लक्ष्मी नश्वर और राजकुमारी भी नश्वर– नहीं तहँ रमा न राजकुमारी। सत्य जो कुछ था और आगे था। जब नारद जी की उस पर दृष्टि पड़ी, वह भगवान के चरणों में गिर पड़े कि आपने मुझे बचा लिया। हमारा श्राप व्यर्थ चला जाय। भगवान ने कहा– वह भी मेरी इच्छा है– मम इच्छा कह दीनदयाला।

इस प्रकार भगवान के प्रति कोई समर्पित होकर चलता है तो प्रभु जानते हैं कि इस जीव का हित किसमें है, वह वही व्यवस्था करेंगे। इसलिए ईश्वर-पथ, इस जटिल पथ के पथिक को कभी माँगना नहीं चाहिए। फिर वह कभी धोखा नहीं खा सकता।

जप तप करके स्वर्ग कमाना, यह तो काम मजूरों का।

जप-तप-संयम सबकुछ करके बदले में किसी ने स्वर्ग ही माँग लिया, यह तो काम मजूरों का– उसने मजदूरी की और बदले में पा गया। स्वर्ग भी क्या है? स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदायी।– स्वर्ग बहुत अल्प और परिणाम दु:खदायी है।

कहहिं बेद इतिहास पुराना।

बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना।।

(रामचरितमानस, १/५/४)

दानव देव ऊँच अरु नीचू।

अमिअ सुजीवन माहुरु मीचू।।

(रामचरितमानस, १/५/६)

सरग नरक अनुराग बिरागा।

निगमागम गुन दोष बिभागा।।

(रामचरितमानस, १/५/९)

विधाता का प्रपंच गुण और दुर्गुणों से सना हुआ है। स्वर्ग-नरक, देवता-दानव ये विधाता के प्रपंच हैं। यदि हमने इनमें से कुछ माँगा तो हमने प्रपंच में से ही कुछ माँगा है। भोग की निम्नतम सीमा नरक तो अधिकतम सीमा स्वर्ग है; किन्तु वह भी स्वल्प और परिणाम में दु:खदायी है इसलिए–

देना सब कुछ लेना कुछ नहीं, बाना झाँकर झूरों का।

सर्वस्व का दान कर दें। अपनी दृष्टि का, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध और सारे संसार के मूल इस मन का भी दान कर दें। इसे इष्ट के चरणों में समर्पित कर दें। मन में क्षमता ही कहाँ है कि सत्य माँग ले।

गो गोचर जहँ लगि मन जाई।

सो सब माया जानेहु भाई।।

(रामचरितमानस, ३/१४/३)

कदाचित् मन-बुद्धि ने बहुत सोच समझकर कुछ माँग ही लिया तो वह माया के क्षेत्र का ही कुछ ऊँचा-नीचा स्तर ही तो माँगा। इसलिए सर्वस्व का समर्पण करें। यही है देना सब कुछ

इतिहास में कई प्रसिद्ध दानदाताओं के उल्लेख हैं। राजा मोरध्वज ने अपने पुत्र को ही आरे से चीर दिया, कर्ण ने कवच और कुण्डल दे दिया, राजा हरिश्चन्द्र ने स्वप्न में ही अपने राज्य का दान कर दिया। इससे भी बड़ा दान ऋषि अष्टावक्र ने राजा जनक से माँगा– मन का दान! यह सबसे बड़ा दान है।

एक दिन राजा जनक ने स्वप्न देखा कि वे भिक्षा माँग रहे हैं। प्रात: उन्होंने पाया कि वह यथावत् राज्य कर रहे हैं। उनके मन में कुतूहल हुआ कि इन दोनों दृश्यों में कौन सत्य है? यह प्रश्न उन्होंने विद्वानों तथा अनेकानेक महात्माओं से पूछा कि वह सत्य है या यह सत्य है? किन्तु सन्दर्भ-प्रसंग न जानकर कोई भी उत्तर न दे सका। इसी क्रम में महर्षि अष्टावक्र भी राजदरबार में पधारे। उनकी टेढ़ी-मे़ढी आकृति देख सभासद हँस पड़े। राजा को भी हँसी आ गयी। जब सबकी हँसी रुकी तो अष्टावक्र हँसने लगे। लोगों ने सोचा कदाचित् यह पागल हो। राजा जनक ने विनम्रता से पूछा– महाराज! आप हँसे क्यों? ऋषि ने कहा– पहले आप लोग अपने हँसने का कारण बतायें।

सभासदों ने बताया– ‘‘ऋषिवर! आपसे पूर्व अनेकानेक रूप-सौन्दर्यसम्पन्न महात्माजन यहाँ पधारे; किन्तु कोई भी राजा के प्रश्न का उत्तर नहीं दे सका। आपके हाथ पीछे की ओर मुड़े हैं, दाँत ऊपर को जा रहे हैं, आँखें तिरछी हैं, पाँव उलटे हैं। आपके तो अंग ही बेडौल हैं, आप क्या समाधान देंगे! इसीलिए हमलोगों को हँसी आ गयी।’’

अष्टावक्र ने कहा– ‘‘हमने सुन रखा था कि जनक की सभा ज्ञानियों की सभा है किन्तु आज देखा कि जनकसमेत उनकी पूरी सभा चमारों की है क्योंकि ये चमड़े की अच्छी पहचान-परख रखते हैं। शरीर का चर्म तो रहने के लिए एक वस्त्र है। न जाने सृष्टि में कैसी-कैसी आकृतियाँ हैं लेकिन जहाँ मैं स्थित हूँ, वह है आत्म-स्थिति! क्या आत्मा के दाँत ऊपर की ओर हैं, क्या उसकी दृष्टि तिरछी है, क्या पाँव पीछे मुड़े हुए हैं? वह तो शाश्वत, सनातन अपरिवर्तनशील है।’’ सभा में सन्नाटा छा गया।

राजा जनक ने क्षमायाचना कर अपना प्रश्न प्रस्तुत करने की अनुमति माँगी। अष्टावक्र ने कहा– ‘‘राजन्! पहले कुछ दान-दक्षिणा तो करें!’’ जनक ने कहा– ‘‘आप जो आज्ञा करें, प्रस्तुत है; यदि मेरे प्रश्न का उत्तर मिल जाय।’’ अष्टावक्र ने कहा– ‘‘जो आपके पास अपनी वस्तु है वही आप हमें दें।’’ राजा ने एक लाख गायें समर्पित किया किन्तु ऋषि ने अस्वीकार कर दिया। क्रमश: उन्होंने सम्पूर्ण राज्य अर्पित करने का प्रस्ताव किया। ऋषि ने कहा– ‘‘इससे भी बड़ी वस्तु आपके पास है।’’ जनक की समझ में नहीं आया कि यह चाहते क्या हैं। उन्होंने अनुरोध किया कि ऋषिवर ही बतायें। अष्टावक्र ने कहा– ‘‘राजन् ! आप अपना मन हमें दे दें।’’ राजा ने संकल्प लिया। अष्टावक्र ने उसे स्वीकार किया और एक किनारे बैठकर ध्यानस्थ हो गये।

जनक पूर्वाह्न से खड़े थे, अपराह्न हो आया। ऋषि ने उन्हें आसन ग्रहण करने तक को नहीं कहा। उन्हें किञ्चित् रोष हो आया कि हमने इनकी मुँहमाँगी वस्तु दे दी फिर भी ऋषि एक ओर बैठ गये, मेरे प्रश्न का उत्तर भी नहीं दिया। अकस्मात् जनक का ध्यान गया कि जब हमने मन ही दान में दे दिया तो यह संकल्प-विकल्प कहाँ से उठ रहा है। लगता है हमने अभी दिया ही नहीं, केवल कहा भर है। बस, जनक ने सोचना बन्द कर दिया। शाम होते-होते जनक का मन समाधि में परिणत हो गया। उस समाधि में ऋषि ने राजा के हृदय में प्रेरणा करके बताया कि जो स्वप्न देखा है कि भिखारी बनकर घूम रहे हो, न वह सत्य है और जगने पर जो राज्य कर रहे हो– यह भी सत्य नहीं है। सत्य आपका स्वरूप है जिसे थोड़ा और परिश्रम करके प्राप्त कर लो। इतना बोध होते ही जनक उन महापुरुष के चरणों में गिरे, उस रास्ते पर चलकर अपने युग के सर्वोपरि महापुरुष हुए। अमलात्मा महात्मागण भी जनक से ज्ञान लेने जाया करते थे। इस प्रकार मन का दान सर्वोपरि दान है। इसी को देना देना सब कुछ है। आपने अपना व्यवसाय दे दिया, शोरूम दे दिया– आपने कुछ भी नहीं दिया। आपके मन के अन्तराल में समूची सृष्टि भरी पड़ी है। इसलिए मन को ही समर्पित करें। इसका अर्पण शीश समर्पण करना है। यही सबकुछ देना है।

और लेना कुछ नहीं– बदले में माँगना कुछ नहीं, कोई कामना नहीं, याचना नहीं; निष्काम कर्म करते जायँ। बाना झाँकर झूरों का– ऐसे योगी का रहन-सहन कैसा होता है? उसका बाना कैसा होता है? वह न भगवाधारी होता है न तिलक-छाप-मुद्राधारी! वह किसी म़जहब-सम्प्रदाय का पृष्ठपोषक नहीं होता। कबीर ने कभी कथरी लपेटा, कभी कमरी तो कभी कोपीन मात्र। उनके लिए कोई प्रतिबन्ध नहीं रह जाता।

बड़ा देव गद्दी पर बैठा, तब क्या ढोना घूरों का।

सबसे बड़ा देव परमदेव परमात्मा हृदयरूपी सिंहासन पर बैठ गया तब क्या ढोना घूरों का– तब सांसारिक मान-प्रतिष्ठा, अर्जित उपाधियाँ, कुलीनता, म़जहब और परम्पराओं की क्या कीमत? सुतीक्ष्ण अच्छे भजनानन्दी महात्मा थे। उन्हें इस बात की बड़ी चिन्ता थी कि हृदय में स्वरूप स्थिर नहीं हो पाया। जब उन्होंने सुना कि राम इसी वन में आ गये तो वह अधीर हो उठे–

हे बिधि दीन बन्धु रघुराया।

मोसे सठ पर करिहहिं दाया।।

(रामचरितमानस, ३/९/४)

क्या प्रभु मुझ जैसे शठ पर दया करेंगे? मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं।।– मुझमें न भक्ति है, न ज्ञान है, न वैराग्य है। एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की।।– परमात्मा का एक ही स्वभाव है कि उन्हें वही प्यारा होता है जिसे दूसरे अन्य किसी का भरोसा नहीं है। इसलिए होइहैं सुफल आज मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन।।– आज मेरे नेत्र अवश्य सफल होंगे। वह बीच रास्तें में ही बैठ गये, चिन्तन में डूब गये। अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।।– अत्यन्त प्रेम देखकर भगवान मुनि के हृदय में ही प्रकट हो गये। उनके मन के सिंहासन पर भगवान ने अपना स्थान ग्रहण कर लिया। इसी को कबीर कहते हैं, बड़ा देव गद्दी पर बैठा– सर्वोपरि, जिसके आगे कोई नहीं, जब वही गद्दी पर बैठ गया तब क्या ढोना घूरों का– तब सांसारिक मान-प्रतिष्ठा का कोई मूल्य नहीं रह जाता।

भरत नामक एक नरेश थे। वह ऋषभदेव के पुत्र थे। एक दिन उन्होंने अपने प्रधान अमात्य से कहा, ‘‘मंत्रिवर! इस विशाल महेन्द्र पर्वत के उत्तुंग शिखर पर मेरा यशोगान उत्कीर्ण करायें।’’ मंत्री शिखर तक जाकर लौट आये और निवेदन किया, ‘‘महाराज! एक भी चट्टान ऐसी नहीं है जिस पर किसी न किसी नरेश का यशोगान न लिखा हो। आपकी आज्ञा हो तो उन्हें मिटा दें।’’ राजा ने स्वयं शिखर पर जाकर देखा तो एक से बढ़कर एक प्रशस्तियाँ– कोई दिग्विजयी तो कोई चक्रवर्ती नरेश, इतिहास में जिनका उल्लेख तक नहीं, किंवदन्तियों में जिनकी गाथा नहीं, जनमानस में जिनकी कल्पना भी न थी। राजा ने कहा– ये यशोगान भी व्यर्थ हैं। यह यश, मर्यादा, कुलीनता, लोकरीति, देशरीति– इन्हें क्या ढोना! ये नश्वर हैं जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है, जिन्हें मिट जाना है। यही कबीर कहते हैं– तब क्या ढोना घूरों का। और मस्त हुआ जब अनहद सुनकर– हद कहते हैं सीमा को, अनहद कहते हैं असीम को! जब साधक ने उस असीम अनन्त परमात्मा की आवाज सुन ली, उसी में आह्लादित हो उठा, तब क्या सुनना तूरों का– उसके पश्चात् सांसारिक वाद्ययन्त्रों, तूर्यघोष इत्यादि से उसका कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। अब सृष्टि में ऐसा कोई शब्द नहीं जो उसे रिझा सके, आकर्षित कर सके। उसके रीझने का तो वही शब्द है जो सर्वोपरि है, अनहद असीम-अनन्त है। अगली पंक्ति में कहते हैं–

मुश्किल अगम पंथ का चलना, धारा खाँड़े छूरों का।

यह अड़गड़ पथ अगम पंथ है, अगम्य है। यह मन, वाणी, इन्द्रियों से परे अगोचर पथ है; बुद्धि इसका अटकल नहीं लगा सकती। इसलिए यह पथ मनुष्य की क्षमता से परे है। इस पथ पर चलना बड़ा मुश्किल है। यहाँ खाँड़े और छूरों की धार पर चलने जैसा है। तुलसीदास के शब्दों में–

ग्यान पंथ कृपान कै धारा।

परत खगेस होइ नहिं बारा।।

(रामचरितमानस, ७/११८/१)

यह कृपाण की धार पर चलना है अत: दुष्कर है। महर्षि विश्वामित्र ने भजन आरम्भ किया, कई बार उत्थान-पतन का अवसर आया। माया कब घसीट ले, ज्ञात ही नहीं होता। इस अगम पथ पर चल कौन पाता है? इस पर कहते हैं–

कहत कबीर सुनो भाई साधो! अगम पंथ कोई शूरों का।

यहाँ नहीं काम अधूरों का।

सन्त कबीर हर साधु को अपना भाई कहकर सम्बोधित करते हैं। वह जानते हैं कि जिस रास्ते से चलकर मैंने यह स्थिति प्राप्त की है, यदि चलने वाला पथिक है तो उसी स्थिति को एक दिन प्राप्त कर लेगा, मेरे ही समकक्ष हो जायेगा, अस्तु उन्हें भाई की संज्ञा दी। उनसे उन्होंने कहा कि यह अगम पंथ किसी-किसी शूरवीर का होता है।

सूर समर करनी करहिं, कहि न जनावहिं आपु।।

बिद्यमान रन पाइ रिपु, कायर कथहिं प्रतापु।।

शूरवीर कहता नहीं, कर दिखाता है। भजन करने का भी ऐसा ही नियम है–

सुमिरन ऐसा कीजिए, जाने सुमिरनहार।।

या जाने करतार ही, ना जाने संसार।।

या तो भजन करने वाला जानता है या वह प्रभु जानते हैं। संसार जानने न पाये। संसार को दिखाने की क्या आवश्यकता है? यह प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। पूज्य गुरुदेव कहा करते थे– ‘‘भजन इतना गोपनीय होना चाहिए कि बगल में बैठनेवाला भी समझ न सके कि यह इस समय भजन कर रहा है। इस प्रकार रात-दिन भजन करना चाहिए।’’ यह अड़गड़ पथ, अगम पथ किसी शूरवीर के क्षेत्र की वस्तु है।

!! बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय!!

(अमृतवाणी भाग-1से उद्धृत)

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