पिया तोरी ऊँची रे अँटरिया

पिया तोरी ऊँची रे अँटरिया

पिया तोरी ऊँची रे अँटरिया, अब देखत चली।

ऊँची अँटरिया जरद किनरिया, लगी नाम की डोरिया।

चाँद सुरुज सम दियना बरत हैं, ता बिच भूली डगरिया।।

अब देखत…….।।

पाँच पचीस तीन घर बनिया, मनवा है चौधरिया।

मुन्शी है कोतवाल ज्ञान का, चहुँ दिसि लगी बजरिया।।

अब देखत…….।।

आठ कोठरिया नौ दरवाजा, दसवें में बन्द किवड़िया।

खिड़की बैठि गोरी चितवन लागी, लग गयी झाप झलरिया।।

अब देखत…….।।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, गुरु के बचन बलिहरिया।

चतुर लोग मिलि सौदा करिहैं, झंकत मुरख अनरिया।।

अब देखत…….।।

यह सन्त कबीर का एक भजन है। कबीर एक महापुरुष थे जैसा अनादिकाल से होते आये हैं। वह भजन तो एक परमात्मा का ही करते थे, लेकिन जब किसी ने पूछा, ‘हजरत! क्या कर रहे हो?’ तो वह कहते थे– मैं उस पिया को रिझा रहा हूँ– ‘प्रियतम मोसे रूठल हो’। परमात्मा को साईं, प्रियतम या पति कहकर सम्बोधित किया। प्रिय उत्तम स प्रियतम– वह प्रीति का सर्वोपरि माध्यम है। एक बार उससे सम्बन्ध जोड़ लेने के पश्चात् फिर कभी विछोह नहीं होगा। साईं का तत्सम स्वामी है ही। इसी प्रकार पति अर्थात् पत का रक्षक, मर्यादा का निर्वाह करनेवाला!

मीरा ने कहा– ‘मेरी पत राखो गिरधारी!’ मीरा के पति राणा भोजराज का देहावसान हो गया। तत्कालीन लौकिक रीति-रिवाज के अनुरूप लोगों ने उनसे अनुरोध किया– ‘‘आप पति के शव के साथ सती हो जाओ।’’ मीरा ने उत्तर दिया–

ऐसे पति को क्या बरूँ, जो जनमे मरि जाय।

मीरा अविनाशी बर्यो, सुहाग अमर होइ जाय।।

ऐसे पति का मैंने वरण ही कब किया जो जन्म ले और मर जाय! मीरा ने उस अविनाशी का वरण किया है जिससे सुहाग सदा के लिए अमर रहे।

औरों के पिया परदेस बसत हैं, लिख लिख भेजें पाती।

हमरे पिया हमरे हिय में बसत हैं, ना कहूँ जाती न आती।।

मीरा ने परमात्मा को पति सम्बोधित किया क्योंकि वही वास्तविक मर्यादा की रक्षा करते हैं। लोक-व्यवहार में किसी को दो खरी-खोटी सुना दें, उसकी इज्जत हल्की हो जाती है। आजकल देखा जाता है कि शादी-विवाह में लम्बा दहेज मिला तो इज्जत चौगुनी हो गयी। शरीर छूट गया तो इज्जत यहीं रह गयी। दूसरा शरीर मिला तो दूसरा ही संसार हो गया। यहाँ के सारे कीर्तिमान यहीं छूट गये। इसलिए यह संसार और इसकी मान्यताएँ सदैव असुरक्षित हैं– ‘सोई पुर पाटन सो गली, बहुरि न देखा आइ।’– फिर लौट के कोई नहीं देखता।

‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’– आपके हृदय में जो आपका स्वरूप है, सहज सुख की राशि है, अविनाशी तत्व है। ऐसा विशुद्ध स्वरूप होने पर भी हम-आप बारम्बार गर्भवास की यातना झेल रहे हैं, मल-मूत्र और पीव से सनी हुई अनन्त योनियों का भ्रमण कर रहे हैं। इस दयनीय दशा से उबार कर हमें मर्यादित स्वरूप प्रदान करने में परमात्मा ही सक्षम है। इसलिए परमात्मा को पत रखनेवाला होने से ‘पति’ कहकर सम्बोधित किया है। सन्त कबीर ने भी इस भजन में परमात्मा को पिया कहकर सम्बोधित किया कि ‘पिया तोरी ऊँची रे अँटरिया, अब देखत चली।’

इस भजन में ईश्वर-पथ के उस स्तर का चित्रण है जहाँ से ईश्वर का दरबार झलकने लगता है, ईश्वर की विभूति का आभास होने लगता है। कबीर कहते हैं– भगवन्! आपकी अट्टालिका तो बहुत ऊँचाई पर है– ‘प्रकृति पार प्रभु सब उर वासी।’– प्रकृति नीचे है, परमात्मा प्रकृति से परे है। आपका निवास आकाशवत् है, संकल्प-विकल्प से रहित शान्त और सम है। आप नहीं, अभी तो केवल आपके निवास-स्थल की झलक मिल रही है। इसी को ‘अब देखत चली’– अभी चलना शेष है।

यहाँ ‘अब’ शब्द साधक की आसन्न सफलता का द्योतक है, कार्य की पूर्ति का द्योतक है। उदाहरण के लिए किसी कन्या के विवाह का समय आया तो कहीं घर अनुकूल नहीं, कहीं वर अनुकूल नहीं। घर-वर मिला तो समधी रूठ गये ‘हमें मोटरसायकल दो, मारुति दो।’ किसी तरह से बीघा-बिस्वा बेंचकर कन्या का हाथ पीला करते बन गया तब भी समधी ऐंठ गये कि हमारे साथियों का स्वागत कम हुआ। किसी तरीके से दस कदम विदा करते बन गया तब बोले– अब जान में जान आई! जब कन्या का जन्म हुआ था तब नहीं; जब पढ़ाया-लिखाया, सर पर हाथ फेरा तब भी नहीं; जब शादी ढूँढ़ते थे तब भी नहीं; जब चार कदम विदा करते बन गया तब कहा कि ‘अब’ जान में जान आई! इस प्रकार तब और अब में पूरब और पश्चिम का अन्तर है। तब एक छोर है और अब दूसरा छोर!

जब कबीर लहरतारा तालाब पर मिले तब नहीं, जब दशाश्वमेध की सीढ़ियों पर लेटकर महापुरुष रामानन्द जी की शरण गये तब नहीं, जब माया से भयभीत थे कि ‘माया महा ठगिनी हम जानी’ तब नहीं, अब एक ऐसा स्तर आया कि ईश्वर की आकाशवत् रहनी प्रकृति से पार अँटरिया झलकने लगी। अब वहाँ तक की दूरी कैसे तय हो? इस पर कहते हैं–

‘जरद किनरिया’– जरद अर्थात् योग का अतिसूक्ष्म किनारा पकड़ कर ‘लगल नाम की डोरिया’– योग के अनेकों अंगों में सबसे प्रमुख नाम जप है। नाम में सुरत की डोरी लगाकर हम यहाँ तक की इस अटारी तक की दूरी तय करते हैं।

ज्योंही परमात्मा के निवास की झलक मिली, अटारी दिखाई देने लगी, विघ्न आने लगे। ‘चाँद सुरुज सम दियना बहुत हैं, ता बिच भूली डगरिया’– चाँद और सूर्य के समान बहुत-से दीपक दिखायी पड़े; उनकी चकाचौंध में रास्ता भटक गये। आप घोर अन्धकार में हो, यदि कहीं दीपक दिख जाय तो आप रास्ता पा जायेंगे। कबीर समीप पहुँचे तो चाँद और सूर्य के समान दीपक दिखायी पड़े। वह रास्ता भटक गये। यह कैसा विघ्न? गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं–

छोरत ग्रंथि जानि खगराया।

बिघ्न अनेक करइ तब माया।। (रामचरितमानस, ७/११७/६)

विद्या की गाँठ छोड़ते समय माया अनेक विघ्न करती है।

रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई।

बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई।। (रामचरितमानस, ७/११७/७)

माया ऋद्धियाँ प्रदान करती है, सिद्ध बना देती है। भगवान कभी सिद्ध नहीं बनाते। भगवान के दर्शन के साथ परमसिद्धि स्वत: है। उस महापुरुष की इच्छा भगवान ही पूरी करने लग जाते हैं। यह महापुरुष की स्वाभाविक रहनी है किन्तु आधे-अधूरे रास्ते में सिद्धि मिलती है तो यह छिटपुट चारा माया फेंकती है। उन ऋद्धियों-सिद्धियों के चकाचौंध में जहाँ साधक फँसा तहाँ–

ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा।

बुद्धि विकल भइ विषय बतासा।। (रामचरितमानस, ७/११७/१४)

ये ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ दीपक हैं। इसमें बहुत बड़े चतुर भी भूल जाते हैं। इन्हीं दीपकों की चकाचौंध में शृंगी ऋषि भूल गये, महर्षि पराशर भूल कर बैठे। सिद्धियों के झाँसे ने दिन का रात बना दिया। गंगा-प्रवाह में नाव स्थिर हो गयी, जल में रेत हो गया किन्तु दुर्जय शत्रु को नहीं जीत पाये। रिद्धियाँ-सिद्धियाँ, मान-सम्मान चाँद और सूर्य के समान आकर्षित करनेवाले दीपक दिखाई पड़े। ‘ता बिच भूली डगरिया’– इन्हीं की चकाचौंध में साधक भटक जाता है। जहाँ साधक ने स्वीकार किया कि यह हमारे द्वारा हो रहा है तहाँ ‘ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा’।

माया पतित करने भर के लिए सामने आती है। इसलिए जब ज्ञान है कि यह धोखा है, जो प्रकाश दिखाई दे रहा है क्षणिक है, माया का फेंका हुआ जाल है तो साधक सँभलेगा और पार हो जायेगा। ऊँची अटरिया दृष्टि से ओझल न हो जाय।

कबीर कहते हैं कि भगवन्! आपकी रहनी आकाशवत् है। आकाश कहते हैं पोल को, आकाश कहते हैं शून्य को। चित्त में जब भजन में रत संकल्पों की लहर पैदा हो जाय, विषय-वासना की लहर शान्त हो जाय, मन सम स्थिति में टिकने लगे तुरन्त प्रकृति से सम्बन्ध टूट जाता है; परमात्मा के धरातल पर पाँव पड़ जाता है, अटारी दिखाई देने लगती है। ऋद्धियों-सिद्धियों से बचनेवाला साधक परमात्मा के धाम पहुँच जाता है। अगली पंक्ति में सन्त कबीर कहते हैं– यह सौदा सबके लिए सुलभ है,

पाँच पचीस तीन घर बनिया, मनवा है चौधरिया।

पाँच तत्त्व ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’– जिनसे सबका स्थूल शरीर बना है और पचीस प्रकृति; जहाँ इनका समावेश हुआ जड़ तत्त्व गतिशील हो उठते हैं। इसके साथ ही त्रिगुणमयी प्रकृति– यही व्यापार स्थली है। इसलिए यह शरीर आपको मिला है। मन इसका नायक है। इसके माध्यम से आप उच्च अथवा निकृष्ट योनियों में जहाँ चाहें, जा सकते हैं क्योंकि मनुष्य कर्मों का निर्माता है, कर्मों के आश्रित कदापि नहीं।

इस व्यापार स्थली को अर्थात् पाँच तत्त्व, पचीस प्रकृति और इनके चौधरी मन को संयमित करने की क्षमता केवल ज्ञान में है इसलिए ज्ञान कोतवाल है, ईश्वरीय अनुभूति के संचार का नाम है ज्ञान! यह हरिप्रेरित है, मन का नियामक है। सबके अन्दर इस ज्ञान का सूत्रपात है, ज्ञान के पात्र सभी हो सकते हैं– ‘चहुँ दिसि लगल बजरिया’। ‘हम ही पाये हैं’, ऐसी बात नहीं है। आप भी वह सौदा ईश्वर की अटारी का दर्शन और प्रवेश पा सकते हैं।

‘आठ कोठरिया नव दरवाजा, दसवें में बन्द किवड़िया’– अष्टधा मूल प्रकृति अभी जिसका वर्णन कर आये हैं, पाँच तत्त्व और तीन गुण– यही आठ कोठरियाँ हैं– ‘आठ कोठरिया बहत्तर ताला, ता बीच जीव घूमे निरधारा।’ अष्टधा मूल प्रकृति के शुभाशुभ भोगों को भोगने के दरवाजे शरीर में नौ हैं– ‘नवद्वारे पुरे देही’ (गीता)– शरीर के नौ दरवाजे हैं। आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं, रसना आस्वादन करती है इत्यादि नौ दरवाजों से ही मन विषयों का सेवन करता है। जहाँ अष्टधा मूल प्रकृति और इनके नौ दरवाजे इन्द्रियों को संयमित किया, नाम में सुरत की डोर लगी– यहाँ तक कि साधना साधक को करनी होती है किन्तु दसवाँ द्वार है ब्रह्मरन्ध्र। जिस दरवाजे से ब्रह्म में प्रवेश पाया जाता है वह द्वार बन्द है क्योंकि भगवान मन और बुद्धि से परे हैं। मनुष्य के पास मन, बुद्धि और इन्द्रियों के अतिरिक्त है भी क्या? इस दरवाजे पर साधक का पराक्रम काम नहीं आता। वह द्वार कैसे खुले? तो–

खिड़की बैठि गोरी चितवन लागी।

माया के दो भेद हैं– विद्या और अविद्या। विद्या शुक्ल वर्ण है, गोरी है। जब चित्तवृत्ति अविद्या और मल-आवरण, विक्षेपयुक्त है इसका स्वरूप काला है; यह अन्धकार की ओर बढ़ानेवाली है। शरीर भजन नहीं करता। यह तो ‘साधन धाम’ भजन करने का घर मिला है। आप से या माताओं से जब भी भजन होगा, तुलसी या मीरा से, जब भी किसी से भजन पार लगा, इष्टोन्मुखी लगन जागृत हुई, उसने भजन कराया इसलिए लौ रूपी लड़की! यह इष्टोन्मुखी है तो निर्मल है, गोरी है, इसे नारी संज्ञा दी गयी है।

मनसहित इन्द्रियों का संयम करके इष्ट की आज्ञा का पालन करते साधक जब दसवें द्वार ब्रह्मरन्ध्र पर पहुँचा तो वहाँ टकटकी लगाकर लौ लगी ही रह गयी– भरत की तरह! जहाँ लौ लगी रह गयी, साधक हताश नहीं हुआ, श्रद्धा का तार नहीं टूटा तब भगवान इधर साधक में दृष्टि बनकर खड़े हो जाते हैं और सामने स्वयं प्रकट हो जाते हैं। आप नहीं भी समझेंगे तो समझा लेंगे, अपनी झाँप-झालर में ले लेते हैं, अपने में समाहित कर लेते हैं। ईश्वर-पथ में कुछ दूरी ऐसी भी है जिसमें भगवान स्वयं प्रवेश दे देते हैं, दसवें द्वार के अन्दर कर लेते हैं, ब्रह्म से संयुक्त कर लेते हैं, आत्म-स्वरूप की स्थिति प्रदान कर देते हैं जिसके पश्चात् कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता।

अन्त में सन्त कबीर एक रहस्य की बात उद्घाटित करते हैं कि यह सौदा मिलता कहाँ है? कैसे हम स्वाँस को पकड़ें? कैसे हम सम्पूर्ण योग-विधि सीखें? कैसे ज्ञान का संचार हो? कैसे नाम में सुरत की डोर लगे? इसकी जागृति का स्रोत क्या है? इन सबके लिए,

कहत कबीर सुनो भाई साधो, गुरु के वचन बलिहरिया।

आप सद्गुरु के वचन पर बलि चढ़ जायँ, अपना बल भूल जायँ। बल कई प्रकार के हैं–

अपबल तपबल और बाहुबल, चौथा बल है दाम।

सूर किसोर कृपा ते सब बल, हारे को हरि नाम।।

लोगों को अपना बल रहता है कि मैं ज्ञानी हूँ, ध्यानी हूँ, पढ़ा-लिखा हूँ। यह सब भूल जायँ और गुरु के वचनों पर डट जायँ।

गुरु की आज्ञा उल्लंघि के, जो नर कतहूँ जाय।

जहाँ जाय तहँ काल है, कह कबीर समझाय।।

कदाचित् कोई साधक गुरु के आदेश का उल्लंघन कर भटक गया, वह तीर की तरह सीधा काल के मुख में जा रहा है न कि कल्याण के लिए जा रहा है। प्राय: साधकों को भ्रम हो जाता है कि अब तो भजन कर लेंगे किन्तु यह धोखा है इसलिए ‘गुरु के वचन बलिहरिया’– गुरु जो भी आदेश दें, उनकी वाणी पर अपनी बलि चढ़ा दें। उनका मस्तिष्क, उनके विचार ले लें और अपना मस्तिष्क, अपना पूर्वाग्रह समर्पित कर दें। किन्तु सन्त कबीर कहते हैं, बलि चढ़ानेवाला हजारों में एक होता है–

चतुर लोग मिलि सौदा करिहैं, झंकत मुरख अनरिया।

पिया तोरी ऊँची रे अटरिया, अब देखत चली।।

चतुर लोग ही सौदा कर पाते हैं। आजकल सब चतुर ही तो बने हैं। नेता कहते हैं– हमने तो पहले ही दस लाख रुपया अलग रख लिया था, मैं जानता था कि चुनाव की हवा क्या होगी? व्यापारी कहता है– हमने बाजार-भाव देखकर वस्तुओं का संग्रह कर लिया था कि आगे भाव बढ़ने वाला है। सब चतुर ही तो बने हैं। तुलसीदास कहते हैं–

चतुराई चूल्हे पड़ी, घूरे पड़ा अचार।

तुलसी राम भजन बिन, चारों वरन चमार।।

वह चतुराई चूल्हे में जाय, उसमें आग लगे, वह आचार-सदाचार घूर में फेंक दिया जाय। यदि एक राम का भजन नहीं है तो चारों वर्ण चमार हैं, चमड़ी के व्यापारी मात्र हैं। परिणाम में किसी न किसी योनि में जाना पड़ेगा। ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्’– गर्भवास से छुटकारा नहीं मिलेगा।

अस्तु, चतुर लोग ही सौदा करते हैं। थोड़ा अनुरागी है, थोड़ा विवेकी, गुरु के प्रति समर्पित और एक परमात्मा की चाहवाला है, ऐसे चतुर लोग ही सौदा करेंगे और ‘झंकत मूरख अनरिया’– मूर्ख और अनाड़ी लोग तरसते रह जाते हैं।

इस सत्सङ्ग मण्डप में सब चतुर ही तो आये हैं। किसी की चतुराई में कोई कमी नहीं है। थोड़ी-सी कमी है तो साहस की! यह इन्द्रियाँ प्रमथन स्वभाववाली हैं। यह दुर्जय हैं। इन्हें संयमित करने के साहस की जरूरत है, तभी बेड़ा पार होगा।

कामनाओं की पूर्ति चाहना भगवत्पथ का बहुत बड़ा अवरोध है इसलिए भगवान से कभी कुछ माँगना नहीं चाहिए। भगवान जानते हैं कि आपकी परिस्थिति क्या है? जरूरतें क्या हैं? जितना वह आवश्यक समझते हैं, व्यवस्था भी देते हैं किन्तु नश्वर वस्तुओं के लिए दुराग्रह उचित नहीं है।

यूरोप में फ्रांस के राजा नेपोलियन बोनापार्ट की गणना विश्व के महानतम विजेताओं में होती है। उसने बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़ीं, पूरे यूरोप को रौंद दिया। उसकी मान्यता थी कि ‘असम्भव’ शब्द को शब्दकोष से हटा देना चाहिए। जीवन में उतार-चढ़ाव आते ही हैं। एक बार वह शत्रुओं से घिर गया। रूसी सेना के तीन सिपाही उसका पीछा कर रहे थे। उसके अंगरक्षक पीछे छूट गये थे। अकेला नेपोलियन भाग रहा था। भागते हुए वह एक दर्जी की दुकान पर पहुँचा। एक बूढ़ा दर्जी कपड़े सिल रहा था।

नेपोलियन ने उससे कहा– भाई दर्जी! मैं तुम्हारा सम्राट नेपोलियन हूँ। रूस के सिपाही मुझे जान से मार डालने के लिए पीछा कर रहे हैं। तुम मेरे प्राण बचा लो, मुझे कहीं छुपा दो। तुम जो भी माँगोगे, मिलेगा। दर्जी ने निगाह उठाकर उसकी ओर देखा और अपने पीछे आने का संकेत किया। भीतर सीलन भी अँधेरी कोठरी में एक टूटी-सी चारपाई पड़ी थी जिस पर फटा-पुराना मैला-कुचैला एक बिस्तर पड़ा था। दर्जी ने बिस्तर उठाया, नेपोलियन को चारपाई पर लेटने का संकेत किया। उसने नेपोलियन के ऊपर वह बिस्तर डाल दिया, कोने में रखे कतरनों का सारा ढेर लाकर उसके ऊपर डाल दिया और आकर पुन: सिलाई करने लगा।

मकानों की तलाशी लेते रूसी सैनिक दर्जी की दुकान में आ गये और पूछा– क्या तुमने किसी योद्धा को भागते देखा है? क्या तुमने सम्राट नेपोलियन को देखा? दर्जी ने नकारात्मक भाव से सिर हिला दिया। उस सिपाही ने एक हाथ लम्बा छुरा निकाल धमकाते हुए कहा– सच बता नहीं तो छुरा इस पार से उस पार हो जायेगा। एक सिपाही दर्जी को धमका रहा था, दूसरा बाहर निगाह रखे था और तीसरे को कुछ सन्देह हुआ तो उसने अपना छुरा निकालकर कतरन के ढेर में मारने लगा। उसका एक वार तो बिस्तर छेदकर नेपोलियन के सीने को भी छू गया। दबाव गहरा होता तो छुरा रक्त से लथपथ निकलता किन्तु ढेर में कोई हलचल न देख आश्वस्त हो अपने दोनों साथियों के साथ नेपोलियन को ढू़ँढते आगे बढ़ गया।

कुछ देर पश्चात् नेपोलियन कतरनों के उस ढेर से बाहर निकला और दर्जी से पूछा– क्या वे लोग निकल गये? दर्जी ने बताया– अब तक वे काफी दूर निकल गये होंगे? इतने में नेपोलियन के अंगरक्षक भी दौड़ते हुए आ गये। कृतज्ञ नेपोलियन ने उनसे बताया कि कैसे वह मौत से बाल-बाल बचा है। उसने दर्जी से कहा– भाई दर्जी! तुमने अपने सम्राट के प्राण बचाये हैं। इसके बदले मुझसे जो चाहे माँग लो जिससे तुम्हें जीवन में फिर कमाना न पड़े, किसी से माँगना न पड़े।

दर्जी बोला– जिस कोठरी में आपके प्राणों की रक्षा हुई है, वर्षा में टपकती है। उसकी मरम्मत हो जाय। नेपोलियन ने कहा– तुमने तो कुछ भी नहीं माँगा। तुम एक सम्राट से माँग रहे हो। तुम्हें एक अवसर और देता हूँ। दर्जी ने कहा– आजकल मेरी पत्नी के बाल बहुत झड़ रहे हैं, उसे एक बालदार टोपी मिल जाती। नेपोलियन ने सोचा, किस पागल से भेंट हो गयी? वह बोला– भाई! तुमने दो अवसर खो दिया। तुम्हें एक अन्तिम अवसर और देता हूँ। अब जी भरकर माँगो, अपने राजा से माँगो।

दर्जी बहुत सन्तोषी था। वह मुस्कुराया और बोला– जिस समय छुरा आपकी छाती को छू गया था, आपको कैसा लगा था? बतायें। नेपोलियन अचानक क्रोध में आ गया, बोला– सम्राट के मन का हाल जानना चाहते हो? इतनी बड़ी गुस्ताखी? सिपाहियो! इसे पकड़ लो और कल सवेरे वृक्ष से बाँधकर इसके सीने में छुरा भोंक देना।

सिपाहियों ने दर्जी को लपककर पकड़ा, उसे खींचकर ले जाने लगे। दर्जी गिड़गिड़ाया– भाई! हमें कुछ मत दो। हमने कोई अपराध नहीं किया है। हमने प्राण बचाये हैं। हमारे प्राण छोड़ दो। किन्तु उसकी कौन सुनता? उसे एक वृक्ष से बाँध दिया गया। रातभर वह दर्जी अपनी मृत्यु के एक-एक पल गिनता रहा। प्रात:काल सिपाही छुरा लेकर आया। एक-दो-तीन कहकर दर्जी के सीने पर छुरा भोंकते वह अचानक रुक गया। सफेद ध्वज लेकर घुड़सवार आता दिखायी पड़ा। घुड़सवार ने नेपोलियन का एक पत्र सिपाही को दिया। उसमें लिखा था– भाई दर्जी! तुम्हारे घर की मरम्मत हो गयी। टोपी भी तुम्हारी पत्नी के पास पहुँच गयी और जब मौत का छुरा मेरी छाती से छू गया था, मुझे अपने मन में कैसा लगा था, अब तुम समझ गये होगे। एक मनुष्य जब राजा से माँग नहीं सकता तो परमात्मा से कैसी याचना करेगा?

जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई।

बहु सम्पत्ति माँगत सकुचाई।। (रामचरितमानस, १/१४८/५)

महादरिद्र को कल्पतरु ही मिल जाय, फिर भी बहुत सारी सम्पत्ति माँगने में उसे संकोच होता है। जीव में कहाँ क्षमता है कि सत्य को समझे और माँग ले। जीव के पास है क्या? ‘गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।।’ (रामचरितमानस, ३/१४/३)– इन्द्रियों और इन्द्रियों के विषयों में जहाँ तक मन कल्पना करता है, बुद्धि निश्चय करती है ‘सो सब माया जानेहु भाई’। मन, बुद्धि और इन्द्रियों को छोड़कर और है ही क्या आपके पास? बुद्धि से आप किसी को अतीन्द्रिय ज्ञान की संज्ञा दें भी किन्तु वह है तो मन-बुद्धि का सोचा-विचारा। इसलिए भगवान से कुछ भी न माँगें। जो भी आप माँगोगे, सब मिलकर भी भगवान की विभूति का कण मात्र भी नहीं है। यदि माँगना ही है तो भगवान को ही माँग लें। प्रभु आयेंगे तो उनकी प्रभुता भी आपके चतुर्दिक छा जायेगी। ‘इच्छा राखे मोक्ष की, ताहि शिष्य पहचान’ (परमहंसजी की बारहमासी)– शिष्य की यही पहचान है कि उसे मोक्ष अर्थात् परमात्मा की प्राप्ति की ही इच्छा हो–

उर अभिलाष निरन्तर होई।

देखिअ नयन परम प्रभु सोई।। (रामचरितमानस, १/१४३/५)

!! ॐ श्री गुरुदेव भगवान की जय !!

(‘अमृतवाणी भाग-2’ से उद्धृत)

Q & A
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