पिवत नाम रस प्याला

पिवत नाम रस प्याला

पूज्य गुरु महाराज का यह अत्यन्त प्रिय भजन था। सती अनुसुइया आश्रम, चित्रकूट धाम, उत्तर प्रदेश, भारत! वनप्रान्त वन्य पशुओं से भरे-पूरे जंगल में आपका निवास था। दो-चार साधकों के मध्य आप प्राय: इस भजन की साधनापरक पंक्तियों पर बल दिया करते थे। इसे धीरे-धीरे गुनगुनाया करते कि पिवत नाम रस प्याला, मन मोर हुआ मतवाला।’ भगवत्पथ में मन लगाने के चार प्रमुख आश्रय हैं– नाम, रूप, लीला और धाम। गोस्वामी तुलसीदासजी ने इनका क्रम-निरूपण इस प्रकार किया है–

देखिअहिं रूप नाम आधीना।

रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना।।

रूप बिसेष नाम बिनु जानें।

करतल गत परहिं पहिचानें।। (मानस, १/२०/४-५)

प्राय: लोग कहते हैं कि ध्यान में मन नहीं लगता। शुरू-शुरू में ध्यान में मन लगेगा भी नहीं; क्योंकि ध्यान के लिए आपके पास अभी वह योग्यता नहीं है। ध्यान के लिए पहले नाम-जप और नाम से वह स्वरूप आपके हृदय में प्रकट होगा तब ध्यान की योग्यता आ जाती है। जब स्वरूप पकड़ में आ गया तो लीला का क्रम आता है। लीला का आशय है कि भगवान अपनी पहचान देना शुरू कर देंगे। शनै:-शनै: वह आप में दृष्टि बनकर प्रसारित होंगे और सामने तो स्वयं हैं ही। भगवान कैसे भजन कराते हैं, उठाते-बैठाते साधना-पथ में अग्रसर कराते हैं– भगवान के इस प्रसारण का नाम लीला है और उनके द्वारा प्रसारित लीला देखते-देखते लीलाधारी का स्पर्श कर लिया, तहाँ धाम अर्थात् स्थिति। धाम का आशय है स्थिति।

इन चारों आश्रयों में सबसे प्रमुख और आरम्भिक साधना का चरण है नाम। स्तरभेद से नाम में बड़ा अन्तर है–

राम नाम में अन्तर है। कहीं हीरा है कहीं पत्थर है।

किसी ने चौबीस घण्टे श्रम किया और कंकड़ हाथ लगा, किसी ने उतना ही श्रम किया और हीरा हाथ लग गया। एक ही नगीने से घर-द्वार, सवारी-साधन, इज्जत-प्रतिष्ठा– सब कुछ व्यवस्थित हो गया। आरम्भ में इस नाम को जपते हैं, मन ही नहीं लगता–

माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख माहिं।

मनवाँ तो चहुँ दिसि फिरे, यह तो सुमिरन नाहिं।।

माला हाथ में घूम रही है, जीभ मुँह में चल रही है, राम-राम कह रही है लेकिन जिस मन को जपना चाहिए वह तो चारों तरफ भटक रहा है। यह तो सुमिरन नाहीं’– यह सुमिरन की सही स्थिति नहीं है। लेकिन अभ्यास तो यहीं से होता है। गोस्वामी जी प्रोत्साहित करते हैं–

भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।

नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।। (मानस, १/२७/१)

भाव से, कुभाव से, क्रोध अथवा आलस्य से कैसे भी नाम का उच्चारण करें, रावण की तरह क्रोध से या कुंभकर्ण की तरह आलस्य से, जिस किसी भी प्रकार से नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।’; क्योंकि नाम का टेढ़ा-मेढ़ा स्वल्प अभ्यास भी आपको नाम की वास्तविक धारा में प्रवेश दिला देगा। नाम-जप में अन्तर है तो क्या; कुछ न सही, तब भी कंकड़ तो हाथ लगेगा। ऐसा नहीं कि कुछ मिला ही नहीं, कुछ तो मिला। यही कंकड़ एक दिन हीरा की आभा (क्वालिटी) पा जायेगा और जब नाम पकड़ में आ गया तो नाम के जागृत होते ही हृदय में वह स्वरूप प्रकट हो जायेगा तो ध्यान धरते बन जायेगा। भगवान उठाने-बैठाने और योगक्षेम करने लग जाते हैं तब,

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।

ताहि भजनु तजि भाव आना।। (मानस, ५/३३/३)

भजन छोड़कर उसको कुछ अच्छा लगता ही नहीं। सृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे वह देखे या सुने; क्योंकि उससे भी सूक्ष्म और बड़ी वस्तु वह हृदय में पा गया। इसी स्तर का सन्त कबीर का यह भजन है। कबीर का चिन्तन इसी स्तर से गुजर रहा था, नाम में मस्ती मिल रही थी। भजन इस प्रकार है–

पिवत नाम रस प्याला, मन मोर भयो मतवाला।।

बिन कर चले जपे बिन जिह्वा, ऐसी अजपा माला।

हरदम दम दम तार टूटे, पिवत बंक करि नाला।।

मन मोर भयो…….।।

नाम रसायन जोइ पियो है, सोइ भयो मतवाला।

पंडित ज्ञानी पिवै जानें, झूठ बजावत गाला।।

मन मोर भयो…….।।

त्रिकुटी मध्ये ध्यान लगावे, लिये शब्द कर भाला।

छूट जात जम का डर तबहीं, निकट आवत काला।।

मन मोर भयो…….।।

गैब नगर में डंका बाजे, सदगुरु भयो दयाला।

किरपा दास मगन होइ बैठे, खुलि गये अनुभव ताला।।

मन मोर भयो…….।।

सन्त कबीर कहते हैं कि नामरस का प्याला ज्यों-ज्यों पीता हूँ, मेरा मन मदमस्त होता जा रहा है। सामान्यत: मन बड़ा चंचल है। वह एक दिशा में कभी रुकता ही नहीं; किन्तु नाम के अभ्यास से अब वह एकदम मतवाला होता जा रहा है। जड़ी-बूटी सूँघने पर सर्प जैसे केंचुआ-जैसा शिथिल होकर गिर पड़ता है, आज हमारे मन की वही दशा है। उसे नाम की खुमारी चढ़ गयी है जैसे मंसूर को चढ़ी थी, नानक को चढ़ी थी–नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात

नाम तो सभी जपते हैं किन्तु सबमें ऐसी मस्ती दिखायी तो नहीं देती। आपने कैसे जपा जो मस्ती छा गयी?

बिन कर चले जपे बिन जिह्वा, ऐसी अजपा माला।

अधिकांश लोग माला के सहारे जप करते हैं। एक सौ आठ दानों की माला को अँगूठे और अनामिका की सहायता से घुमाते हैं और सुमेरु से लौटकर पुन: सुमेरु तक आते हैं। किसी ने गुरु महाराजजी से पूछा, ‘महाराज! जपने में सुमेरु पार क्यों नहीं करते?’ महाराज जी ने समझाया– जपने के विधि-विधान मात्र इतने के लिए हैं कि जप में सचेतावस्था बनी रहे। फिर महाराज जी विनोद में कहते थे– सुमेरु पार करोगे तो जप की गिनती भूल जाओगे। इसलिए एक ओर से जपते-जपते गये, पुन: लौटकर दूसरी ओर से गये, सुमेरु पर जमा कर दिया। इतना राम-नाम हो गया कि सुमेरु पहाड़ जितना हो गया। इसलिए बीचवाले बड़े दाने का नाम सुमेरु है।

माला के सहारे जप करना सुविधाजनक है। जिस तरह शिशु कक्षा के बच्चों को गिनती सिखाने के लिए गोलियों से गूँथा हुआ स्लेट दिया जाता है, बच्चे एक-एक गोली खिसकाकर गणना सीख लेते हैं; लेकिन वही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो गोलियों से गिनती नहीं करते। अंक उनके मस्तिष्क में ढल जाते हैं। जैसे उनसे काम लेना चाहिए, वे मौखिक भी प्रयोग करने लगते हैं। इसी प्रकार मन बड़ा चंचल है। इसे अभ्यास कराने के लिए माला से जप किया जाता है, जिह्वा भी जप में सहयोगी है। किन्तु दोनों ही माध्यमों में मन भागता ही रहता है, जैसा अभी कहा गया– माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख माहिं।’– जुबान राम-राम कहती रहेगी, हाथ से माला के दाने खिसकते रहेंगे और मन भागता रहेगा; किन्तु इससे उन्नत स्तर पर बिन कर चले’– बिना माला के जप चलता रहता है, जपे बिन जिह्वा’– जुबान से उच्चारण नहीं हो रहा है फिर भी जप चल रहा है। यह अजपा माला है। यह कैसे जपी जाती है?

हरदम दम दम तार टूटे, पिवत बंक करि नाला।

बंकनाल श्वास को कहते हैं। यह नासिका से आई मस्तिष्क में गयी, जिसे ब्रह्माण्ड कहते हैं, उसके पिछले भाग को मूर्धा कहते हैं। उसका स्पर्श करते हुए यह श्वास रीढ़ की हड्डी अर्थात् मेरुदण्ड से होते हुए नाभिकमल में पहुँच जाती है, फिर वहाँ से लौटकर उसी मार्ग से पुन: नासिका से बाहर हो जाती है। श्वास तो पाँव के तलवों और हाथ की हथेलियों में है। जहाँ वायु नहीं, स्पन्दन नहीं, वह अंग निष्क्रिय हो जायेगा। प्रश्नोपनिषद् में इसकी विशद चर्चा है। वायु सर्वत्र है; किन्तु शरीर में इसके आने-जाने का मुख्य मार्ग है नासिका से ब्रह्माण्ड, मेरुदण्ड, नाभिकमल और लौटकर उसी रास्ते से बाहर।

अजपा श्रेणीवाले जप का उतार-चढ़ाव श्वास पर है। आप पहले शान्त बैठ जायँ। देखें, श्वास कब अन्दर गयी, कब लौटकर आयी। मन को द्रष्टा के रूप में खड़ा कर दें। इस श्वास को देखा भर करें कि यह कब आयी और कब लौटकर गयी। दो-चार बार जब देखने की क्षमता आ जाय तब धीरे से उसमें चिंतन से नाम ढाल दें। श्वास अन्दर गयी तो ओम्, बाहर आयी तो ओम्। यदि आप राम जपते हैं, श्वास गयी तो ‘रा’, बाहर आयी तो ‘म’। कुछ दिन सचेत होकर इसे जपना पड़ेगा। इस प्रकार श्वास को देखने की क्षमतावाले जप का नाम है पश्यन्ती श्रेणी का जप! आज आप श्वास में सुरत को लगाते हैं तो सुरत कभी-कभी खण्डित हो जाती है, मन इधर-उधर चला जाता है; किन्तु क्रमश: एक समय ऐसा आता है कि एक बार सुरत लगाया तो रिनक धिनक धुन अपने से उठे’– एक धुन प्रसारित हो गयी। श्वास तैल-धारावत् एक दिशा में प्रवाहित हो गयी। ओम्-ओम्-ओम् यह स्वाँस में सहज प्रवाहित हो गयी, मन शान्त सम होकर उसे देखा भर करे। जहाँ यह मन श्वास में धारावाहिक हो जाता है उसका नाम है अजपा। यह अजपा माला चलती ही रहती है– बिन कर चले जपे बिन जिह्वा, ऐसी अजपा माला।’ इसे सुबह-शाम जपें– ऐसी बात नहीं है। हरदम दम दम तार टूटै’– यह हर पल, दम दम माने पल-पल जपते रहें–

स्वाँस स्वाँस पर राम कहु, वृथा स्वाँस मत खोय।

ना जाने यहि स्वाँस का, आवन होय होय।।

न जाने अगली स्वाँस आयेगी या नहीं! अत: एक भी स्वाँस व्यर्थ न चली जाय। यह अजपा माला बंकनाल अर्थात् श्वास से जपी जाती है। जहाँ अजपा जागृत हो गयी फिर तो नाम जपने का नशा हो जाता है। मन करता है रात-दिन इसे नशे जैसा पीते ही रहो, किसी दूसरी ओर ताकने का मन नहीं करता, बात करने का मन नहीं करता। सन्त कबीर कहते हैं कि इसे पीकर मेरा मन उन्मत्त हो गया है। हम ही पीते हैं, ऐसी बात नहीं है। यह सबके लिए सुलभ है।

नाम रसायन जोइ पिया है, सोइ भयो मतवाला।

यह रसायन है। कायाकल्प कर देने की क्षमता है इसमें। जिसने भी इसका सेवन किया, वही मतवाला हो गया अर्थात् इसका दरवाजा सबके लिए खुला है; किन्तु–

पंडित ज्ञानी पिबे जाने झूठ बजावत गाला।

जो पाण्डित्यपूर्ण विश्लेषण करनेवाले हैं कि विष्णुजी क्षीरसागर में रहते हैं, लक्ष्मीजी हमेशा श्रद्धा से सेवा करती हैं, ब्रह्म आकाश में रहता है, वह मैं हूँ, एकरस आत्मा हूँ– ये पीना नहीं जानते। व्यर्थ ही प्रलोभन देते रहते हैं; क्योंकि श्वास का जप किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष से ही संभव होता है, सीधा कहने से समझ में नहीं आता। महापुरुष के उपदेश के अनुसार आप आरम्भ करें। जब श्रद्धा से डोरी लग जायेगी तो वह जो वाणी से कहते हैं, हृदय से पढ़ाने लगेंगे। तब समझ में आ जायगा कि कितना मैं श्वास में लग पाता हूँ और कितना नहीं! अगली पंक्ति में बताते हैं–

त्रिकुटी मध्ये ध्यान लगावे, लिये शब्द कर भाला।

त्रिकुटी के मध्य में ध्यान लगाने का विधान है। जब श्वास को देखें तो सुरत अर्थात् मन की दृष्टि त्रिकुटी में हो, लेकिन साथ-साथ भगवान चाहते क्या हैं? वह जो वाणी देते हैं, वह अपौरुषेय वाणी कहती क्या है? उसका भाला लेकर चिन्तन में डटो अर्थात् वह जैसा कहें, उसके अनुसार चलो, अपनी बुद्धि से नहीं। ऐसा नहीं कि दो घण्टे बैठ गये तो भजन हो गया। भगवान जितना स्वीकृति दें, उतना भजन है, अन्यथा नहीं है। शब्द अर्थात् परमात्मा की अपौरुषेय वाणी उतरे, वह हमारी सार-सम्हाल करे, उसके निर्देशन को समझकर उसके अनुसार विकारों को काटते हुए आगे बढ़ें, श्वास में लगें, ध्यान त्रिकुटी में लगायें।

एक त्रिकुटी तो भौंह के मध्य के स्थान का नाम है। दूसरी त्रिकुटी तब है जब सत्-रज-तम तीनों गुण कूटस्थ हो जायँ। मन में न सात्त्विक उद्वेग उत्पन्न हो, न राजसी और न तामसी। तीनों गुणों से उपराम होकर मन को केवल श्वास में लगायें। यह कब कितना लगा, इसके लिए लिए शब्द कर भाला’–ईश्वरीय शब्द जो अविरल प्रवाहित रहता है, उसे समझें, उसके सहारे लगें। निर्देशन के अनुसार श्वास में लगने से–

छूटि जात जम का डर तबहीं, निकट आवत काला।

मन मोर भयो…….।।

तुरन्त यमराज का भय समाप्त! काल करीब आयेगा नहीं– काल खाय कलप नहिं ब्यापै, देह जरा नहीं छीजे।’ लेकिन यह श्वास का भजन भगवान के आदेश के अनुसार ही चलता है। वह क्या शब्द देते हैं, उसे समझो। कभी भगवान कहेंगे कि अब श्वास से तुम्हारा मन भागना चाहता है तो तुरन्त सजग होकर, घसीटकर श्वास में लगाओ। कभी-कभी भगवान समर्थन देंगे कि अब श्वास बिल्कुल ठीक है। इस प्रकार अपौरुषेय वाणी का अवतरित होना शब्द कहलाता है। उसका शस्त्र लेकर लगो तभी भजन होगा क्योंकि ‘(मन) बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै।’ (विनयपत्रिका, पद ८९) यह अयुक्त मन तभी वश में होता है जब प्रेरक के रूप में स्वयं प्रभु उतर आयें, आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जायँ और आपका मार्गदर्शन, रोकथाम करने लगें। जब काल का भय नहीं रह गया तब अन्तिम स्थिति क्या है? वह स्थिति मिलती कब और कहाँ?

गैब नगर में डंका बाजे, सदगुरु भये दयाला।

गैब माने अप्रत्यक्ष आकाश, अन्तर्देश। गो नाम मनसहित इन्द्रियाँ। इसके अन्तराल में नगरों का एक जाल बिछा है। कहने के लिए दस इन्द्रियाँ और एक मन हैं लेकिन इसका पट-पसार इतना लम्बा जितना विधाता की सृष्टि–

असन बसन पसु बस्तु बिबिध बिधि सब मनि महँ रह जैसे।

सरग, नरक, चर-अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे।। (विनयपत्रिका, पद १२४)

जैसे बहुमूल्य मणि में असन माने भोजन, बसन माने वस्त्र, धन-धाम, इज्जत-प्रतिष्ठा सब विद्यमान हैं, ठीक उसी प्रकार मन के अन्तराल में स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक सब विद्यमान हैं। मन में कभी स्वर्ग का डंका बजता है, कभी नरक का, तो कभी अनन्त योनियों में भ्रमण का; किन्तु जब त्रिकुटी के ध्यान में सुरत स्थित हो गयी, अपौरुषेय वाणी शब्द का शस्त्र लेकर साधक चला तो यम का भय तुरन्त समाप्त हो गया और इन्हीं इन्द्रियों, मन के अन्तराल में जहाँ स्वर्ग-नरक के डंके बज रहे थे, अब उसी गैब नगर में भगवान के डंके बजने लगे। किन्तु यह साधना उन्हीं के पास होती है जिन पर सदगुरु भये दयाला’; क्योंकि सद्गुरु की कृपा के बिना साधना पूर्ण होती ही नहीं। इस कृपा के साथ ही,

किरपा दास मगन होइ बैठे, खुलि गये अनुभव ताला।

मन मोर भयो…….।।

जब दास पर कृपा हो गयी तो वह तोष पा जाता है। तोष के लिए उसके पास होता है अनुभव। अनु कहते हैं अतीत को और भव माने संसार। संसार से अतीत करा देनेवाली विशेष जागृति जिसका नाम है अनुभव, उसकी ताली, कुञ्जी खुल गयी। निवृत्ति देकर अनुभव भी शान्त हो जाता है। नहिं तहँ पुनि विज्ञान बिहाना।’– आगे शेष कोई सत्ता बची ही नहीं, फिर क्या समझाएँ। साधक भी विलग नहीं रहा, किसे समझायें? तभी सम्भव है जब सदगुरु भये दयाला’–जब सद्गुरु की कृपा हो।

परमहंस आश्रम अनुसुइया में कभी-कभी ख्यातिलब्ध विद्वान्, विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर, प्रोफेसर पहुँच जाते थे। साथ आनेवाले उनका परिचय देते– महाराज! आप दर्शनशास्त्र के विशेषज्ञ हैं। कबीर पर आपका अधिकार है। महाराजजी उनसे कहते थे– हो! जंगल में हमलोग कहाँ सुनने को पायें। अच्छा हुआ आ गया। कुछ मोहूँ के सुनाओ। वे लोग जो जानते थे, कुछ उल्टा-सीधा आरम्भ करते; किन्तु थोड़ी देर में ही कह उठते– महाराजजी! हमलोग आपसे कुछ सुनने आये हैं। संसारभर का दर्शनशास्त्र हमलोगों ने पलट दिया लेकिन साधन-भजन समझ में नहीं आता। महाराजजी उन्हें कहते थे– हो! ठीक कहत हो। सब बात सब कोउ जानत है। लोग पढ़त हैं, लिखतौ जात हैं। न जाने का लिखत हैं? लेकिन साधन-भजन ही एक ऐसी वस्तु है जो लिखने में नहीं आती। यह तो किसी अनुभवी सद्गुरु के द्वारा किसी-किसी अनुरागी अधिकारी के हृदय में जाग जाया करती है। ऐसा नहीं कि किसी को गुरु बना लिया तो भजन जग जायेगा। केवल अनुभवी सद्गुरु के द्वारा भजन की जागृति संभव है। वह न तो लिखने में आती है और न वाणी से कहने में।

इस पर वह कहते– महाराजजी! आपकी कृपा बनी रहे। महाराजजी कहते– जाओ, दो–ढाई अक्षर के किसी नाम ओम् अथवा राम का जप करते रहो। चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते नाम याद आया करे। इसके लिए सुबह-शाम बीस मिनट समय अवश्य दिया करो। यह नियम खण्डित न हो और साँझौ-बिहान पाँच मिनट मोर रूपवौ देखा करो। दो मिनट भी यदि तुम मेरा स्वरूप हृदय में पकड़ लोगे तो जिसका नाम भजन है, मैं तुम्हें यहाँ बैठे-बैठे दे दूँगा और तुम घर बैठे पा भी जाओगे। भक्ति सद्गुरु की देन है।

पूज्य गुरुदेव भगवान की शरण में अनुसुइया आश्रम में महाराजजी द्वारा निर्दिष्ट साधन और टूटी-फूटी सेवा करते लगभग साढ़े तीन महीने में ही एड़ी से चोटी तक मेरा पूरा शरीर एक-एक इञ्च पर फड़कने लगा। उसी के अनुरूप दृश्य भी दिखाई देने लगे। हमें चिन्ता हुई कि कोई बीमारी हो गयी। हमने महाराजजी से कहा कि ‘‘मेरा पूरा शरीर एड़ी से चोटी तक तड़–तड़ फड़क रहा है, कुछ दृश्य भी दिखाई पड़ रहे हैं। हमें कोई बीमारी तो नहीं हो गयी?’’ इस पर महाराजजी हँसे, बहुत प्रसन्न हुए और कहा– ‘‘बस बेटा! राम-रावण युद्ध शुरू हो गया। जब रावण मारा जाई, राम का राज्याभिषेक होई तबै ई बन्द होई। बेटा, भजन जागृत हो गया। इष्टदेव आज से रथी हो गये।’’ अस्तु, किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के द्वारा ही अनुभव जागृत होता है, सीधा कोई तरीका नहीं है।

जब भगवान साधक को अपना लेते हैं, वह सो सकता है लेकिन तब भी भगवान उसे देखते रहते हैं, वह नहीं सोते। जब तक साधक जाग्रत है तो उसके श्वास-श्वास पर, संकल्प-विकल्प पर भगवान का शिकंजा इतना कड़ा हो जाता है कि एक विपरीत संकल्प हुआ तुरन्त जैसे डण्डे की मार पड़े– इतनी कड़ी ताड़ना मिलने लगती है। साधक तो एक नाथा हुआ बैल है। बैल क्या जाने, हल कैसे जोता जाता है। हल तो हलवाहा जोतता है। यद्यपि भार बैल के ही कन्धे पर है फिर भी जितना खेत जोत उठता है, हलवाहे की देन है जो पीछे लगा रहकर उसका दिशा निर्देशन करता रहता है। ठीक इसी प्रकार साधक क्या जाने कि भजन कैसे होता है? भजन तो भगवान कराते हैं और जिस माध्यम से कराते हैं, वह है शब्द! वह जब कृपा करते हैं, साधक के हृदय से रथी हो जाते हैं तो आकाश से बोलते हैं, शून्य से बोलते हैं, पशु-पक्षी-वृक्ष से, सर्वत्र से बोल सकते हैं; क्योंकि वह सर्वत्र हैं।

यदि यह शब्द हृदय में जागृत नहीं है तो निवृत्ति दिला देनेवाला, नशा प्रदान करनेवाला भजन अभी नहीं है। यदि वह नशा चाहिए तो सनेह से एक नाम को पकड़ो, उसका खूब जप करो। एक परमात्मा को पकड़ लो; क्योंकि भगवान एक से सवा कभी हुआ ही नहीं। ये तमाम देवी-देवताओं की उपासना साधना और श्रद्धा जगाने का पूर्वजों का आरम्भिक तरीका मात्र था। श्रद्धा जग गयी तो समर्पण एक परमात्मा के प्रति हो जाना चाहिए। दृढ़ संकल्प होकर उन एक के प्रति समर्पित होकर लग जाओ। उनसे प्रार्थना करो कि प्रभो! हम आपके हैं, हानि-लाभ आप जानें। सद्गृहस्थी का जो कार्यभार हमें मिला है, हम निर्वाह कर रहे हैं। यह फुलवारी आपकी है, यह घरबार आपका ही है और फिर चलते-फिरते नाम में लगे रहो। श्रद्धा से, समर्पण के साथ लगे भर रहो। थोड़े ही समय में मल-आवरण-विक्षेप जो आपके हृदय पर आच्छादित है, माया का वह परदा हलका हो जायेगा। जहाँ यह आवरण हलका हुआ, भगवान बताने लगेंगे कि तुम्हारे गुरु महाराज कहाँ बैठे हैं। वे जिस सिंहासन पर होंगे या जिस दलदल में लोटते होंगे, आपको मिल जायेंगे और आपको उन पर विश्वास भी हो जायेगा और जब सद्गुरु मिल ही गये तो सदगुर मिलें जाहिं जिमि, संसय भ्रम समुदाइ।’ (मानस, ४/१७)– सारा सन्देह दूर हो जायेगा। जो अपौरुषेय वाणी आज कहानी बनकर रह गयी है, वह हृदय में प्रत्यक्ष होने लगेगी। लेकिन नशा प्रदान कर देनेवाली साधना तभी जागृत होगी जब सतगुरु भये दयाला।’

एक बार देवताओं ने शनिदेव से कहा– कहिये शनि महाराज! आपमें कितनी शक्ति है? शनि बोले– सृष्टि में ऐसा कोई प्राणधारी नहीं है जिसे मैं प्रभावित न कर दूँ। देवता बोले– हनुमान को जरा प्रभावित कर देखो। शनिश्चर घबड़ाया लेकिन डींगे बहुत हाँक चुका था, इसलिए हनुमानजी के शरीर में प्रविष्ट हो गया। हनुमान ने जामवन्त से कहा– जामवन्त जी! दो दिन से शरीर बहुत भारी है। थोड़ी ही देर में नाम जपने से भी उच्चाटन होने लगता है, बात क्या है? जामवन्त जी ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान् थे। उन्होंने गणना कर कहा– हनुमानजी! आपके ऊपर तो शनिश्चर चढ़ा है। हनुमान बोले– वही शनिश्चर जिसे लंका में रावण ने बाँधकर उलट दिया था; जो उसके ऊपर पाँव रखकर ही कहीं आता-जाता था; जिसे हमने सीधा करके मुक्त किया था? जामवन्त ने कहा– हाँ, हाँ, वही! हनुमान ने कहा– तब तो वह बड़ा कृतघ्न निकला। अच्छा, कहाँ है वह? जामवन्त ने कहा– आपके सम्पूर्ण शरीर में, शिर के ऊपर भी!

हनुमान ने कहा– धन्यवाद जामवन्त जी! अब हम शनिश्चर का स्वागत करते हैं। उन्होंने उठा लिया एक भारी-भरकम पहाड़ और अपने शिर पर रख लिया। एक पर्वत पूँछ में लपेटकर लटका लिया। कुछ देर तक तो शनिश्चर ने सहन किया। आधे घण्टे में वह लगा चिल्लाने– बचाओ, बचाओ! हनुमान बोले– भाई! मैं किसे बचाऊँ? तुम हो कौन? सामने आओ। शनिदेव ने कहा– पहले पहाड़ तो फेंको। यदि इसी प्रकार बीस मिनट और रह गये तो हमारा कण्ठ भी बन्द हो जायेगा। हम पुकार भी नहीं पायेंगे। हनुमानजी ने पहाड़ फेंका तो शनिश्चर भी शरीर से निकलकर किनारे खड़ा हो गया। चरणों में गिरते हुए उन्होंने कहा– भगवन्! क्षमा करें। देवताओं ने चिट्टा-पट्टी देकर हमें आपके पास भेज दिया था। हनुमान ने कहा– देखो आज से भगवान के भक्तों के पास कभी मत जाना। अत:,

हरि भक्तन के पास आवे भूत प्रेत पाषंड।

शनिश्चर, न देवी न देवता, जादू न टोना, मंत्र न तंत्र; हरिभक्तों के पास यह आ ही नहीं सकता। हनुमान ने कहा– दूसरों को भी लगना तो केवल उन्हें दृष्टि से प्रभावित करना, किसी के शरीर में मत घुसना। तब से शनि ग्रह हो चाहे मंगल, राहु हो चाहे केतु, जादू हो चाहे टोना, भूत हो चाहे प्रेत; आप समर्पण के साथ एक प्रभु का नाम जपना आरम्भ कर दें। जहाँ भगवान की भक्ति रहती है वहाँ धूत-पोंगड़ा, यह मायिक षड्यन्त्र नहीं चल पाते, सब शान्त हो जाते हैं–

जोग लगन ग्रह बार तिथि तुलसी गनत काहि।

राम दाहिने जाहिं जब सकल दाहिने ताहिं।।

समाज में प्रचलित है कि यात्रा या शुभ कार्य करने के लिए योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि– इन पंचाङ्गों का विचार किया जाता है कि तिथि अनुकूल है या नहीं। तुलसीदास कहते हैं– इनकी कोई जरूरत नहीं है। यदि भगवान अनुकूल हैं तो दलदल में चलने पर भी पाँव फूलों पर पड़ेंगे– चलत कुमग पग परत खाले’– कुमार्ग में चल दोगे तब भी तुम्हारा पाँव गड्ढे में नहीं पड़ेगा। केवल भगवान अनुकूल होने चाहिए।

भगवान की अनुकूलता का एक ही लक्षण है कि प्रभु शब्द (वाणी) प्रदान करने लगे। उनकी अनुकूलता का प्राथमिक साधन है नाम-जप! वैदिक ऋषियों ने जप के लिए ओम् शब्द को चुना, जैसा कि आदिशास्त्र श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का निर्देश है। कालान्तर में जितने मत-मतान्तर फैले, उन सबने अपनी पहचान के लिए नये-नये मंत्र बनाये; किन्तु आरम्भ में ओम् से ही उच्चारण किया। किसी ने कहा ‘ॐ नम: शिवाय’ तो किसी ने ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’। कहीं ‘ॐ ह्री क्लीं चामुण्डायै विच्चे…’ तो कहीं ‘ॐ भूभुर्व स्व:…’; किन्तु मध्यकालीन भारत में गीताशास्त्र रखने, पढ़ने पर प्रतिबन्ध लगा तो ओम् उच्चारण के अधिकार-अनधिकार का विवाद देख भक्तिकालीन सन्तों ने, कबीर, नानक, तुलसी इत्यादि ने ओम् के स्थान पर राम नाम जपने का निर्देश दिया। प्राचीन संस्कृत भाषा का स्थान हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं ने ले लिया था इसलिए इन महापुरुषों ने ओम् के ही पर्याय के रूप में राम शब्द पर बल दिया। राम का आशय है– जो सबके भीतर रमण करता हो। ओम् में ओ का आशय है वह अविनाशी परमात्मा, अहं माने आप स्वयं, अर्थात् वह परमात्मा जिसका निवास आपके हृदय में है। दोनों का अर्थ एक ही है। इसलिए महापुरुषों ने संस्कृत भाषा के शब्द ओम् का अनुवाद राम कर दिया, न कि राम कुछ और है।

वास्तविकता तो यह है कि भगवान अनिर्वचनीय हैं। उनका तो कोई नाम ही नहीं है। वह सम्पूर्ण विभूतियों से युक्त हैं अत: विभु; सबका भरण-पोषण करते हैं इसलिए प्रभु; अन्त:करण के अंतराल में है इसलिए आत्मा; सबमें रहते हुए सबसे परे हैं इसलिए परमात्मा….! अब आप गणना करते ही चले जायँ। कभी इस योग्यता का नाम तो कभी उस विभूति का नाम। भगवान का कोई एक सम्पूर्ण नाम तो है ही नहीं; प्रभु का परिचायक कोई भी दो-ढाई अक्षर का नाम जप सकते हैं, फिर वही नाम स्वाँस से जपना पड़ेगा। यदि श्रद्धा में आपका लक्ष्य प्रभु हैं तो जपते रहें, प्रभु सम्हाल लेंगे।

।। श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-4’ से उद्धृत)

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