बहुरि न अइहैं कोऊ शूरों के मैदान में

बहुरि न अइहैं कोऊ शूरों के मैदान में

एक साधक का समर्पण कैसा होना चाहिए? सब भजन ही तो करते हैं, सब शरण ही तो आते हैं। सद्गुरु की शरण आये साधक के क्या लक्षण होने चाहिए? इस पर सन्त कबीर का एक भजन इस प्रकार है–

बहुरि न अइहैं कोऊ शूरों के मैदान में।।

शूरों के मैदान में कूरों का क्या काम है।

शूरे को शूरा मिले, तब पूरा संग्राम है।।

बहुरि न अइहैं…..।।

शीश राखि जो जूझा चाहे, यह कूरों का काम है।

रुण्ड लड़े सदगुरु के आगे, तब पूरा संग्राम है।।

बहुरि न अइहैं…..।।

बड़ीबड़ी बातें भोदूँ मारैं, दिल की जाने राम हैं।

कहे कबीर तेइ नर शूरा, जिन पर रीझे राम हैं।।

बहुरि न अइहैं…..।।

शूरवीरों की एक ऐसी रणस्थली है जहाँ पर एक बार कोई लड़ गया तो दुबारा लौटकर फिर कभी नहीं लड़ना पड़ता, जबकि सृष्टि में ऐसी कोई रणस्थली नहीं है जिसमें हजारों बार लड़ाइयाँ न हुई हों और आज भी होती जा रही हैं। सन्त कबीर ने एक ऐसा रणस्थल ढू़ँढ निकाला है कि एक बार उसमें कोई लड़ ले तो दुबारा उस मैदान में लड़ने के लिए नहीं आता। यह रणांगन है भक्ति का और भक्तिपथ शूरवीरों का रास्ता है, क्योंकि–

राम नाम दुर्लभ अति, औरन ते नहिं काम।

आदि अन्त अरु युगयुग, रामहिं ते संग्राम।।

राम-नाम अति दुर्लभ है। दुर्लभ है तो आप क्यों झंझट पालते हो? सन्त कबीर कहते हैं कि नहीं, झंझट में तो पड़ना पड़ेगा क्योंकि औरन ते नहिं काम– अन्य किसी भी विधि से कार्य की सिद्धि नहीं होगी। इसलिए कल्याण के लिए आदि अर्थात् भजन का आरम्भ और अन्त अर्थात् प्राप्तिकाल– इसमें चाहे युग-युग व्यतीत हो जायँ, यदि संग्राम है तो केवल राम से है। भक्तिपथ एक युद्धस्थल है।

आदिशास्त्र श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने आराधना को युद्ध की संज्ञा दी। अर्जुन ने प्रश्न किया– ‘‘भगवन्! यह मनुष्य न चाहते हुए भी किसकी प्रेरणा से पाप का आचरण करता है, बलपूर्वक जैसे उसे पाप में प्रवृत्त करा दिया गया है?’’ इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने बताया–

काम एष क्रोध एष रजोगुण समुद्भव:

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।

(गीता, ३/३७)

बलपूर्वक घसीटकर पाप कराने वाले काम और क्रोध भोगों से कभी तृप्त न होने वाले महान् पापी हैं। इस पथ के यही दुर्जय शत्रु हैं। इन्हीं से विवश होकर मनुष्य पाप का आचरण करता है। जैसे– धुएँ से अग्नि, मैल से दर्पण और जेर से गर्भ ढँका रहता है इसी प्रकार कामरूपी दुर्जय शत्रु के द्वारा यह आत्मा ढँका हुआ है। यह ज्ञान और विज्ञान का विनाश करने वाला दुर्जय शत्रु है। अपनी शक्ति को समझकर असंगतारूपी शस्त्र द्वारा इस दुर्जय शत्रु को मार डाल, युद्ध कर! जब शत्रु भीतर है तो बाहर कोई किसी से क्यों लड़ेगा? वास्तव में यह अन्त:करण की लड़ाई है। इसी का समर्थन ईश्वरपथ के प्रत्येक सच्चे महापुरुष ने किया है। सन्त कबीर ने भी कहा कि यह एक ऐसा रणस्थल है जहाँ एक बार विजय पा लिया तो शाश्वत विजय है। उसे लौटकर संसार में न तो आना है और न ही संसार उसका रणस्थल रहेगा; क्योंकि–

जेहि जानें जग जाइ हेराई।

जागें जथा सपन भ्रम जाई।।

(मानस, १/१११/२)

उसे जान लेने के बाद जगत् ही खो जाता है; जैसे– जग जाने पर स्वप्न-भ्रम समाप्त हो जाता है। संसार ही तो रणस्थल था, वही खो गया और भजने वाला उसी की स्थिति में आ गया, वह लौटकर आवागमन में नहीं आयेगा। यही है बहुरि न अइहै कोई शूरों के मैदान में।

शूरों के मैदान में कूरों का क्या काम है।– शूरवीरों के इस मैदान में कायरों के लिए स्थान नहीं है। मान लें इस क्षेत्र के लिए कोई शूरवीर तत्पर हो, सच्चा साधक हो, प्राणपण से लगनेवाला हो किन्तु यदि उसे सद्गुरु नहीं मिला तो सब व्यर्थ है इसीलिए शूरे को शूरा मिले तब पूरा संग्राम है।– शूर को जब कोई शूर मिलता है, उस रास्ते से गुजरा हुआ महापुरुष मिलता है, सद्गुरु मिल जाता है तभी संग्राम सम्पन्न हो पाता है।

गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई।

जौं बिरंचि संकर सम होई।।

(रामचरितमानस, ७/९२/५)

गुरु के बिना भवसागर कोई पार होता ही नहीं। यहाँ तक कि विधाता और शंकर की अवस्था वाला भी यदि गुरु से विछोह हो गया तो आगे की दूरी तय नहीं होगी। इसीलिए सन्त कबीर ने कहा–

कबिरा हरि के रूठते, गुरु के सरने जाय।।

कह कबीर गुरु रूठते, हरि नहिं होत सहाय।।

सन्त कबीर कहते हैं कि यदि हरि रूठ जाते हैं तो गुरु की शरण में जाना चाहिए। भगवान कैसे मनाये जाते हैं?– उस विधि को वह जागृत कर देंगे, उस पथ पर चला देंगे, भगवान पुन: अनुकूल हो जायेंगे; किन्तु यदि सद्गुरु ही उपलब्ध नहीं है अथवा रूठ गये हैं तब तो भगवान भी सहायक नहीं होते क्योंकि परमात्मा यदि परमधाम है तो भजन के आरम्भ से पूर्तिपर्यन्त सद्गुरु ही उस धाम के प्रवेशद्वार और मार्गदर्शक हैं। उस शूरवीर साधक को पूरा सद्गुरु उपलब्ध हो तब संग्राम होगा। सद्गुरु की शरण में जाने वाले शिष्य को कैसा होना चाहिए? इस पर कहते हैं–

शीश राखि जो जूझा चाहे, यह कूरों का काम है।

रुण्ड लड़े सदगुरु के आगे, तब पूरा संग्राम है।।

अपना शिर रखकर युद्ध करना कायरों का काम है। यदि शीश ही कट गया तो कोई कैसे युद्ध करेगा? शीश देने का अर्थ है अपना पूर्वाग्रह, अपनी समझ, अपनी सूझ-बूझ लगाना– इन सबका त्याग, समर्पण उन चरणों में करना होगा। इसके पश्चात् गुरु क्या निर्देश देते हैं, कौन-सी विद्या देते हैं, साधना की कौन-सी विधि प्रदान करते हैं उसे अपने मस्तिष्क में धारण करते हुए चलना है– यही शीश चढ़ाना है। गुरु कुछ कहता है शिष्य अपनी सूझ-बूझ से उसमें संशोधन कर लेता है, वह कभी कामयाब नहीं हो सकता। अपने पूर्वाग्रहों को त्यागकर, इस प्रकार शीश चढ़ाकर, केवल रुण्ड अर्थात् धड़ की तरह लड़ते रहो। रुण्ड में सोचने-विचारने की क्षमता नहीं रह जाती। शिष्य को रुण्ड की तरह लड़ना चाहिए, तभी सच्चा संग्राम है। कदाचित् हम शीश नहीं दे सके तब?–

बड़ी बड़ी बातें भोंदू मारें, दिल की जाने राम हैं।

कहै कबीर तेइ नर शूरा, जिन पर रीझे राम हैं।।

यदि शिष्य अपने पूर्वाग्रह बचाकर रखता है तो गुरु की विद्या किस मन में समायेगी? वह तो अभी अपनी बौद्धिक उड़ान में उलझा हुआ है। ऐसे लोग कितना ही ज्ञान बतायें, मूलत: वे भोंदू हैं। विद्यालय के मन्दबुद्धि छात्रों को भोंदू कहा जाता है। ऐसे छात्र बातें तो लम्बी-चौड़ी करते हैं किन्तु वह शिक्षा ग्रहण नहीं करते। साधन-क्षेत्र में इसी प्रकार पूर्वाग्रही शिष्य बातें तो ज्ञान की करते हैं किन्तु उनका क्रियात्मक पक्ष शून्य रहता है। कबीर के शब्दों में– ‘दिल की जाने राम हैं’- वह परमात्मा आपके हृदय की जानते हैं। पूज्य गुरुदेव कहते थे– जो साधक के हृदय में हो, वही जुबान पर भी होना चाहिए। बाहर कुछ, भीतर कुछ और, ऐसा साधक सफल नहीं होता– मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।(रामचरितमानस, ५/४३/५) इसलिए कहे कबीर तेइ नर शूरा, जिन्ह पर रीझे राम हैं।। कबीर कहते हैं– वही नर सच्चे शूरवीर हैं जिन पर प्रभु रीझ जायँ।

कबीर मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर।।

पाछे लागे हरि फिरें, कहत कबीर कबीर।।

जहाँ साधक का मन निर्मल हुआ, समर्पित हुआ– पाछे लागे हरि फिरें– नन्हे शिशु के चतुर्दिक जैसे माताएँ और उसके संरक्षक लगे रहते हैं कि इधर पाँव न रख, यह गन्दा है इसे मत छू, सीढ़ी पर न चढ़ो गिर जाओगे। वह आग पकड़ना चाहता है, माँ उसे उठाकर दूर कर देती है। ठीक इसी प्रकार भगवान योगक्षेम वहन करने लग जाते हैं। अस्तु, सच्चा शूरमा वही है जिस पर वह प्रभु रीझ जायँ, प्रसन्न हो जायँ।

गुरुनानक ने भगवान से कहा– प्रभो! मैं कुछ भी माँग बैठूँ, आप देना मत! केवल एक दया करें कि मैं आपको भा जाऊँ, प्यारा लगूँ। एक साधक का समर्पण ऐसा ही होना चाहिए। सद्गुरु की शरण में जब जायँ, अपनी सूझबूझ, समझ पर विराम लगा देना चाहिए। सद्गुरु जो विद्या दें उसे धारण करें और रात-दिन एक करके उसमें लग जायँ–

जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।।

सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।

यही रात-दिन लड़नेवाला सच्चा शूर है।

!! बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय !!

(अमृतवाणी भाग-1से उद्धृत)

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