सन्तो! सहज समाधि भली

एक झेन फकीर ने अपने एक शिष्य को कागजों का पुलिन्दा दिया। जापान में महापुरुषों की एक प्रसिद्ध उपाधि है झेन फकीर! भारत में कुछ सन्तों को जैनमुनि कहा जाता है। लगता है जेन का ही अपभ्रंश झेन है; क्योंकि पूर्व महापुरुष सर्वत्र आते-जाते थे। पूर्वज दूर देशों में भी गये, एक धर्म का सन्देश दिया, आबाल-वृद्ध सबको अपने में दीक्षित किया। धर्म संकीर्ण कभी होता ही नहीं। यदि धर्म भी संकीर्ण है, कटता है, छँटता है, परिवर्तित होता है तो वह धर्म नहीं, धोखा है।

हाँ, तो जापान में एक झेन फकीर थे। उनकी उम्र पर्याप्त हो चली थी, वयोवृद्ध थे। उन महापुरुष का अन्तिम समय था। लगभग दो सौ विरक्त शिष्य उनके पास थे। भक्त-मण्डली भी समीप ही विराजमान थी। उन फकीर ने अपने शिष्यों पर दृष्टि डाली। एक शिष्य जो लगभग पार हो चुका था, उन्होंने उसको बुलाया और कागजों का एक पुलिन्दा उसे देते हुए कहा– ‘‘हमारे परदादा के दादा गुरु ने यह धरोहर अपने शिष्य को दिया, उनसे हमारे दादा गुरुजी को मिला। उन्होंने अपने अन्तिम समय में इसे हमारे गुरुदेव को दिया था और गुरुदेव ने कृपा करके मुझे दिया। वही थाती मैं तुझे सौंपना चाहता हूँ।’’ शिष्य बोला– ‘‘आपका आशीर्वाद पर्याप्त है। इसकी क्या आवश्यकता है?’’

झेन फकीर ने कहा– ‘‘कैसा मूर्ख है!’’ वह अपनी सत्रह-अठारह गुरु परम्परा तक गिन ले गये और कहा– ‘‘पूर्वजों की धरोहर है, इसे रख लो। जो उचित समझना, करना।’’ शिष्य ने प्रणाम करके कागजों का वह पुलिन्दा ले लिया और दहकते हुए धूने में डाल दिया। कागजों का पुलिन्दा जलने लगा, शिष्य हँसने लगा। गुरुजी भी बहुत हँसे और बताया– ‘‘इसमें कुछ भी नहीं था, केवल कागज थे। यह तुम्हारी परीक्षा थी। आज तुम इस परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। अब मैं इन शिष्यों का भार तुम्हें सौंपता हूँ।’’ वस्तुत:,

जब उतरि पुतरि भये पारा। तब सदगुरु कौन हमारा।।

जब भवसागर से पार हो ही गये तो क्या वहीं पड़े रहेंगे? फिर वहाँ पड़े रहने से कुछ मिलेगा क्या? ऐसा ही कथानक महाभारत का है। युद्ध समाप्त होने पर भगवान ने पूछा– ‘‘अर्जुन! हमने तुम्हें गीता सुनायी थी, वह क्या तुम्हें याद है?’’ अर्जुन ने कहा– ‘‘भगवन्! वह तो मैं भूल गया। आप ही मुझे याद दिला दें।’’ भगवान ने कहा– ‘‘अर्जुन! भूल तो मैं भी गया।’’ वास्तव में युद्ध जब पूर्ण हो गया, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई समाप्त हो गयी तो उस विद्या का भी उपयोग समाप्त हो जाता है; क्योंकि विद्या भी माया का ही एक अंग है।

मैं अरु मोर तोर तैं माया।

जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।। (मानस, ३/१४/२)

मैं हूँ, मेरा है, तू है, तेरा है– बस इतना ही माया है। इस भावना ने यावन्मात्र जगत् को पराधीन कर रखा है। इस माया के दो भेद हैं–

तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ।

बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।। (मानस, ३/१४/४)

इसके दो भेद हैं– विद्या और अविद्या।

एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा।

जा बस जीव परा भवकूपा।। (मानस, ३/१४/५)

इनमें से अविद्या अत्यन्त दुष्ट है। इससे आक्रान्त होकर, इससे विवश होकर जीव भवकूप में पड़ा है।

एक रचइ जग गुन बस जाकें।

प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।। (मानस, ३/१४/६)

माया का ही दूसरा रूप है विद्या। यह सत्-रज–तम तीनों गुणों को नियन्त्रित करने में समर्थ है। किन्तु यह विद्या हमारे पास कब आयेगी? प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।वह विद्या प्रभुप्रेरित है। जब तक भगवान हृदय से प्रेरणा न करें, प्रेरणा कर आपको अवगत न करायें कि प्रकृति के खोह-खंदक में तुम कहाँ तक हो, क्या अवरोध है, क्या निवारण है; तब तक विद्या आपके पास आयी ही नहीं, आप विद्वान नहीं हैं। विद्या और अविद्या प्रकृति के ही दो पहलू हैं– एक भवसागर में डुबानेवाली, एक तारनेवाली– वह है हरिप्रेरित। किन्तु जब युद्ध का अन्तिम निष्कर्ष निकल गया, सजातीय-विजातीय दोनों प्रवृत्तियाँ विलीन हो गयीं, तब विद्या के द्वारा किसको नियन्त्रित करें?

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय: (गीता, १२/१७)

वहाँ पर विद्या का भी कार्य पूर्ण हो जाता है। अर्जुन भी गीता भूल गये और भगवान भी भूल गये।

महाभारत के सन्दर्भ में एक कथानक है। जब युद्ध समाप्त हो गया, भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘अर्जुन! अपना धनुष लेकर रथ से नीचे उतर जाओ। इस पर से जो भी अस्त्र-शस्त्र लेना है, थोड़ा-बहुत ले लो और सब कुछ इसी पर छोड़ दो क्योंकि अब मैं रथ को त्यागनेवाला हूँ।’’ ज्योंही अर्जुन रथ से उतरकर दूर खड़ा हुआ, भगवान ने रथ छोड़ा, पूरा का पूरा रथ सुलगने लगा, धाँय-धाँय जलने लगा – घोड़े भी, रथ भी! रथ के साथ सभी दिव्यास्त्र भी समाप्त हो गये। अर्जुन ने कहा– ‘‘भगवन्! यह क्या हो रहा है?’’ भगवान ने कहा– ‘‘अर्जुन! इस रथ के ऊपर कितने दिव्यास्त्रों का प्रहार हुआ है। यह तो कब का जला हुआ था। इस पर मैं बैठा था इसलिए यह चल रहा था। अब मैंने इसे त्याग दिया इसलिए यह जल गया। तुम आग और कोयले पर चल रहे थे। बस, मेरे हटते ही सुलग गया।’’ कठोपनिषद् में है–

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।

बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च।।

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।

आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिण:।। (कठो.,१/३/३-४)

शरीर एक रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है। जब तक इस मन की लगाम भगवान अपने हाथ में न ले लें और स्वयं संचालन न करें तब तक क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई में, प्रकृति और पुरुष के खोह-खंदक पाटने में साधक असफल ही रहता है। यों समझ लें कि भजन जागृत ही नहीं हुआ। किन्तु उनके निर्देशन में, उनके संचालन से युद्ध का परिणाम निकल आया। अन्तिम शत्रु मोहरूपी दुर्योधन, उसकी भी जंघाएँ टूट गयीं। कोई लड़ने को बचा ही नहीं, तब सजातीय वृत्ति भी शान्त हो गयी, वह भी जल गयी। तत्क्षण यह रथ भी जल जाता है। शरीर के जन्म-मृत्यु का कारण भी जल जाता है। फिर तो जब तक शरीर की आयु शेष है, परहित के लिए होती है। उन महापुरुष का स्वयं के लिए कोई प्रयोजन नहीं होता। लड़ता तो साधक है लेकिन उसके द्वारा जो कुछ पार लग जाता है वह उन इष्टदेव की देन होती है। साधक तो केवल यंत्र है। निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् (गीता, ११/३३)– वह तो निमित्त मात्र बनकर चलता भर है।

महाभारत का ही प्रसंग है। जब युद्ध समाप्त हो गया, जो जीवित बचे थे, धीरे-धीरे वे अपने पराक्रम को सबसे अधिक आँकने लगे। भीम सोच रहे थे– सबसे बड़ा बलशाली तो मैं हूँ; क्योंकि अठारह दिनों तक एक पल भी मेरी हुँकार बन्द नहीं हुई। अर्जुन मन ही मन सोचने लगा– यह सब मेरे धनुर्वेद के हस्तकौशल और दिव्यास्त्रों के कारण संभव हो सका। सात्यकि अपने में ही अँकड़ रहे थे। अधिकांश शूरवीर अपने को ही सर्वाधिक पराक्रमी मनवाना चाहते थे।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘तुमलोग व्यर्थ ही आपस में निर्णय ढूँढ़ते हो। एक व्यक्ति ऐसा है जिसने सबका युद्ध देखा है। चलो उससे पूछ लिया जाय कि सर्वोपरि शूरवीर कौन है?’’ वे सभी उस विजय स्तम्भ के समीप चले गये जिसके ऊपर एक सिर रखा हुआ था। वह सिर घटोत्कच के पुत्र (भीम के पौत्र) का था। उस शिर से भगवान ने पूछा– ‘‘क्यों? तुमने युद्ध देखा?’’ उसने कहा– ‘‘हाँ, भगवन्! अच्छी तरह देखा।’’ पुन: पूछा गया– ‘‘बता सकते हो, इन योद्धाओं में सबसे अधिक शूरवीर कौन है?’’ उसने कहा– ‘‘कोई नहीं। अस्त्र-शस्त्र जो भी रहे हों, दिव्यास्त्र थे या ब्रह्मास्त्र– इन सभी अस्त्रों के आगे एक अदृश्य शक्ति चलती थी, वह पहले संहार कर देती थी, उसके पीछे निर्जीवों पर अस्त्र-शस्त्र गिरा करते थे। यह युद्ध उस अदृश्य सत्ता ने जीता है, अन्य किसी का कोई पराक्रम नहीं है।’’

अर्जुन ने यह निर्णय स्वीकार कर लिया; क्योंकि कर्ण-वध या जयद्रथ-वध में वह अपनी क्षमता देख चुका था। उसे एहसास हो चुका था कि मैं तो मात्र यंत्र के समान हूँ, कर्त्ता-धर्त्ता तो प्रभु स्वयं हैं। वह तो सन्तुष्ट हो गया लेकिन भीम को यह आकलन पसन्द नहीं आया। उसने सोचा– मेरे पौत्र ने मेरे पराक्रम को ठीक से नहीं देखा। वह तुरन्त छाती फुलाकर, भुजाएँ ऐंठते हुए गदा लेकर सामने से निकला जिससे भर निगाह देख तो ले और अपने निर्णय पर पुनर्विचार कर ले किन्तु बर्बरीक भी शूरवीर था। चाहे दादा ही क्यों न हों, किसी की अकड़ सहन नहीं कर सकता था।

उसने कहा– ‘‘हमारे दादाजी तो गदा लेकर व्यर्थ ही हूँ-हूँ करते रहे। इनकी गदा के आगे भी वही अदृश्य शक्ति चलती थी। वह हाथियों का संहार कर देती थी और उनकी लाशों के ऊपर इनकी गदा गिरा करती थी।’’ भीम को क्रोध आ गया कि इसे तो बड़ों का सम्मान करना भी नहीं आता। यह मेरे पुरुषार्थ की खिल्ली उड़ा रहा है। उसने घुमाकर एक गदा मार दिया जिससे बर्बरीक की खोपड़ी चकनाचूर हो गयी।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘भीम! तुमने यह क्या कर डाला? युद्ध का परिणाम पूछने के लिए ही हमने इसे इस दशा में रखा था। अब परिणाम जान लिया तो मैं इसे जीवित करना चाहता था। अब बताओ मैं किस प्रकार इसे जीवित करूँ? तुमने तो खोपड़ी ही चूर्ण कर दी।’’ भीम भी बहुत रोया क्योंकि पौत्र तो उसी का था। कहा गया है–

बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछिताय।

काम बिगारे आपना, जग में होय हँसाय।।

जो बिना विचारे कोई कार्य कर बैठता है, वह कार्य करने के पश्चात् जी भरकर पश्चाताप करता है। वह अपना कार्य तो बिगाड़ ही देता है, संसार में वह उपहास का पात्र भी बन जाता है। श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘भीम! अब तुमलोगों के वंश में कोई सन्तान है भी तो नहीं! (उस समय तक परीक्षित का जन्म भी नहीं हुआ था।) भीम! आज तो तुमने अपने ही वंश का मूलोच्छेद कर डाला।’’ भीम बहुत पछताये, क्षमायाचना की।

वास्तव में भगवत्पथ में मनुष्य एक यंत्र से अधिक कुछ भी नहीं है। अनुभवी सद्गुरु द्वारा जब आत्मा हृदय से जागृत हो जाती है, पूर्ण निवृत्ति दिला देनेवाली योग साधना उसी दिन से शुरू होती है। इसके पूर्व तो जैसा गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं–

माधव अस तुम्हारि यह माया।

सुनिय गुनिय समुझिय समुझाइय, दसा हृदय नहिं आवै।

जेहि अनुभव बिनु मोहजनित भव दारुन बिपति सतावै।। (विनयपत्रिका, ११६/२)

आप लाख कहो, लाख सुनो, लाख तरीकों से समझो, लाख समझाओ; जब तक वह अनुभव जागृत न हो, इष्ट हृदय से रथी होकर मार्गदर्शन न करें, योगक्षेम न करें तब तक आवागमन की असहनीय वेदना सताती ही रहेगी, पीछा करती ही रहेगी। इसका अन्य कोई उपाय है ही नहीं। अनुभव ईश्वर की अपौरुषेय वाणी के संचार का नाम है जो किसी सद्गुरु के द्वारा ही पथिकों के हृदय में जागृत हुआ करती है। भगवान साथ हैं तो साधक के पास सारा बल है और यदि वह साथ छोड़ दें तो साधक के पास कुछ भी नहीं रहता।

महाभारत का ही एक अन्य उदाहरण देखें! जीवन के अन्तिम क्षणों में भगवान श्रीकृष्ण को एक साधारण बहेलिये का बाण लग गया। जिन महापुरुष के ऊपर सृष्टि के तमाम दिव्यास्त्र गिरें, फिर भी उन्हें खरोंच तक नहीं आयी, वही भगवान मृग मारनेवाले एक आखेटक का बाण लगने से कराह रहे थे। वह एक बदला था जिसे उन्हें चुकाना था, किसी भक्त का गौरव रखना ही था, उसी में उस भक्त का उद्धार भी छिपा था।

युधिष्ठिर को इसकी सूचना मिली। उन्होंने अर्जुन से कहा– ‘‘श्रीकृष्ण कितना ही कहें, उनका वह बाण तुम मत निकालना अन्यथा वह हम सबका साथ छोड़कर अपने धाम को प्रस्थान कर जायेंगे। हमलोग अनाथ और अकेले पड़ जायेंगे। इससे उन्हें थोड़ी-बहुत पीड़ा हो सकती है किन्तु उनका जीवन तो बचा रहेगा।’’ अर्जुन उनके पास पहुँचा, देखा तो बोला– ‘‘प्रभो! यह महान संकट! यह हुआ कैसे?’’

श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘अर्जुन! यह सब तुम बाद में पूछ लेना, इस बाण से मुझे बड़ा कष्ट है, इसे निकाल दो।’’ अर्जुन ने कहा– ‘‘नहीं गोविन्द, महाराज युधिष्ठिर ने इसके लिए मुझे मना कर रखा है।’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘अर्जुन! हमें नहीं मालूम था कि तुम भी इतने कृतघ्न निकलोगे! अरे, हमने तुमलोगों को कितने संकटों से बचाया। लाक्षागृह के अग्निदाह से, युद्ध में कर्ण की विभीषिका से, जयद्रथ के समक्ष आत्मदाह से तुम्हारी रक्षा की। इस समय तो किसी से युद्ध भी नहीं है। तुम एक साधारण-सी कील भी नहीं निकाल सकते। हमें यह उम्मीद नहीं थी कि तुम्हारे जैसा मित्र भी इतना कृतघ्न होगा।’’

अर्जुन आज्ञाकारी सेवक तो था ही, उसने तुरन्त ही वह बाण निकाल दिया। भगवान की आँखें घूमने लगीं। अर्जुन ने यह देखा तो पूछा– ‘‘भगवन्! यह क्या?’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘अर्जुन! पृथ्वी पर मेरा समय पूर्ण हुआ। अब हमें जाना ही होगा।’’ कुछ देर तक तो अर्जुन विलाप करता रहा, फिर हाथ जोड़कर बोला– ‘‘सेवक के लिए कोई सेवा भगवन्!’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘सेवा तो है किन्तु है बड़ी दुष्कर।’’ अर्जुन ने सोचा– गाण्डीवधारी अर्जुन के लिए दुष्कर क्या होता है? उसने कहा– ‘‘भगवन्! आप आज्ञा तो करें।’’

श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘देखो, एक घड़ी में द्वारका समुद्र में डूब जायेगी इसलिए यहाँ की स्त्रियों और बच्चों को बाहर निकाल लो और उन्हें सुरक्षित हस्तिनापुर पहुँचाओ। थोड़ी भी लापरवाही की तो उनसे भी हाथ धो बैठोगे। देखो, मेरे पृथ्वी छोड़ते ही संसार में चोर-लुटेरों का आतंक बढ़ जायेगा, कोई तुम्हें लूट न ले। बाल-बच्चों की रक्षा करना, कहीं कोई उनका अपहरण न कर ले।’’ अर्जुन ने सोचा– मृत्यु से पहले सबकी बुद्धि लड़खड़ा जाती है। लगता है प्रभु की बुद्धि भी हताश हो गयी है। गाण्डीवधारी अर्जुन का नाम सुनकर ही बड़े-बड़े शूरवीर रास्ता छोड़ देते हैं। अब सृष्टि में ऐसा है ही कौन जो मेरे मुकाबले में खड़ा हो।

अर्जुन स्त्रियों-बच्चों को लेकर ज्योंही द्वारिका से बाहर निकले, ज्वार आया और सात-सात मंजिल की इमारतें जल से आप्लावित हो उठीं। पानी कम हुआ ही नहीं। खिन्न अर्जुन स्त्रियों-बच्चों को लेकर जंगली रास्तों से चले। कोल-भीलों की दृष्टि उन पर पड़ी। उन्होंने स्त्रियों को लूटना आरम्भ कर दिया, भगदड़ मच गयी। शोरगुल सुनकर अर्जुन ने देखा– लुटेरे सचमुच आ गये हैं। उसने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर ललकारा– ‘‘कौन है गाण्डीवधारी द्रोणशिष्य के सामने?’’ कोल-भील अर्जुन का उपहास करते हुए स्त्रियों का अपहरण कर ही ले गये। अर्जुन ने बहुत प्रयत्न किया किन्तु न दिव्यास्त्र याद पड़े न नारायणास्त्र। समस्त अबलाओं में से वह केवल कुछ को ही बचा पाया।

कबिरा नर को क्या बड़ा, समय होत बलवान।

भीलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन वही बान।।

मनुष्य में कोई बड़प्पन नहीं है। हाड़-मांस का यह शरीर कल बालक था, फुदकता हुआ, गुलफाम की तरह; जवानी आने पर शरीर में ऐंठन आयी, इतने में बाल पकने लगे, लड़खड़ाया और अन्त में आँखों में आँसू के सिवाय क्या बचता है? इसलिए समय बड़ा बलवान। भगवान यदि साथ हैं, उनका वरदहस्त आपके सिर पर है तो समय अनुकूल है। उनकी निगाह पलट गयी, वही कुसमय है। वही अर्जुन था, वही बाण थे; पास में नहीं था तो केवल उनका वरदहस्त नहीं था। भगवान को उसे अन्तिम शिक्षा देनी थी, उसे सम्हालना था। अर्जुन को अपनी क्षमता का गर्व हो चला था कि द्रोणशिष्य का नाम सुनकर कौन मेरे समक्ष टिकेगा। गाण्डीवधारी अर्जुन का नाम ही पर्याप्त है। किन्तु कोल-भीलों ने उसे कोई महत्व नहीं दिया। वास्तव में वह मनुष्य शुभ घड़ी और शुभ समय में होता है जिसके हृदय में भगवान के प्रति श्रद्धा और समर्पण है। वह भली प्रकार सुरक्षित है जिसके ऊपर उनका वरदहस्त है।

तदैव लगनं सुदिनं तदैव ताराबलं चन्द्रबलं तदैव।

विद्या बलं दैव बलं तदैव लक्ष्मीपतेऽङघ्र युगं स्मरामि।।

वही दिन शुभ है, वही लग्न शुभ है; दैवबल, ताराबल, सारा बल उसके साथ है; योग-नक्षत्र-ग्रह-वार सब उसके अनुकूल हैं, लक्ष्मीपति भगवान की जिसके ऊपर दृष्टि हो। भगवान श्रीकृष्ण की जब तक दृष्टि थी, अर्जुन अजेय था और जिस दिन भगवान ने उसे उसके भरोसे छोड़कर उसकी अन्तिम परीक्षा ली, अर्जुन हतप्रभ रह गया। अनुकूल समय वह है जहाँ आत्मा साथ दे, कुसमय वहाँ है जहाँ आत्मा शत्रु हो।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! दुनिया में न कोई शत्रु है, न मित्र। आत्मा ही शत्रु और आत्मा ही मित्र है। किस प्रकार? भगवान बताते हैं कि जिन पुरुषों के द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ जीत ली गयी हैं, उनके लिए उन्हीं की आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बरतती हैं, परम कल्याण करनेवाली होती हैं और जिन पुरुषों द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ नहीं जीती गयीं, उनके लिए उन्हीं की आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतती हैं, उन्हें अधोगति और नीच योनियों में फेंकनेवाली होती हैं। (गीता, ६/६)

इन इन्द्रियों को आप अपने बल से नहीं जीत सकते। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण सुझाव देते हैं कि सारे धर्मों की चिन्ता छोड़ एकमात्र मेरी शरण हो जा। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तू मुझमें निवास करेगा। (गीता, १८/६५-६८) भगवान एक से सवा कभी नहीं हुआ। उस एक परमात्मा के प्रति दृढ़संकल्प हो जाओ। वही आपके लिए शुभ घड़ी है, शुभ दिन है, शुभ लक्षण है। उसके लिए कुछ अशुभ होता ही नहीं। जो समर्पित भक्त होते हैं उनकी असाध्य मनोकामनायें भी पूर्ण हो जाती हैं और जो अपने बुद्धिबल या टेक से चलते हैं, विफल मनोरथ हो जाते हैं। अरब-खरबपतियों के महल ढहते हुए दिखाई पड़ते हैं, चक्रवर्ती सम्राटों का अस्तित्व विलीन हो जाता है।

महाभारत का प्रसंग है। भीम और अर्जुन की असाध्य प्रतिज्ञाएँ भी भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से पूर्ण हो गयीं। भीम ने प्रतिज्ञा कर ली कि युद्ध में दुर्योधन की जंघा तोड़ूँगा, नहीं तो पूर्वजों को अपना मुँह नहीं दिखाऊँगा। उसकी दूसरी प्रतिज्ञा थी– युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाऊँगा। ऐसे अनेक अवसर आये जब इन प्रतिज्ञाओं का निर्वाह समस्या बन गयी।

एक बार दुर्योधन ने पितामह भीष्म पर बहुत आक्षेप लगाया कि ‘‘पितामह! आप पाण्डवों को मारना ही नहीं चाहते अन्यथा आपके समक्ष पाण्डव हैं ही क्या?’’ भीष्म ने कहा– ‘‘मूर्ख! पाण्डव अबध्य हैं। वे भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा सुरक्षित हैं, उन्हें कोई नहीं मार सकता। मारे जाओगे तुमलोग। वैसे मैं पूरी शक्ति से युद्ध कर रहा हूँ, फिर भी तुमने लांछन बहुत लगाया है। जाओ, कल युद्ध समाप्त हो जायेगा, सेनासमेत पाण्डव समाप्त हो जायेंगे।’’

दूसरे दिन भीष्म ने नारायणास्त्र का प्रहार कर दिया। वह ऐसा अस्त्र था जिसका जितना ही प्रतिरोध करो, उतना ही प्रज्वलित हो उठता था। शस्त्र दिखानेवाले का ही वह वध करता था और जो उसे पीठ दिखा देता था, अस्त्र-शस्त्र रख देता, उस पर शस्त्र का प्रभाव नहीं पड़ता था। उससे बचने का अन्य कोई उपाय न था।

भगवान श्रीकृष्ण ने देखा तो बोले– ‘‘पाण्डवो! ध्यान से देखो। सामने वह कौन खड़े हैं?’’ पाण्डवों ने कहा– ‘‘पितामह।’’ श्रीकृष्ण ने पूछा– ‘‘कौन-कौन लड़ रहे हैं?’’ पाण्डवों ने बताया– ‘‘सारे कौरव तो खड़े होकर तमाशा देख रहे हैं, कोई लड़ ही नहीं रहा है। केवल पितामह शस्त्र लेकर खड़े हैं।’’ भगवान ने कहा– ‘‘वह तो हम सबके पूज्य हैं। उन्हीं की गोद में तुम सब पलकर बड़े हुए हो, उनसे क्या लड़ना! उनका सम्मान करो।’’ ‘‘प्रभु! कैसे सम्मान करें?’’ ‘‘उन्हें पीठ दिखा दो।’’ सबने पीठ दिखा दिया किन्तु भीम ने ऐसा नहीं किया। नारायणास्त्र पाण्डव सेना की परिक्रमा करते हुए भीम की ओर बढ़ा। भीम लगे गदा भाँजने। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘भीम! पीठ दिखाओ।’’ भीम ने कहा– ‘‘केशव! अपना उपदेश अर्जुन को दीजिए। मेरी प्रतिज्ञा है, युद्ध में पीठ नहीं दिखाऊँगा। मैं अपनी गदा से इस अस्त्र को तोड़ दूँगा या वीरगति को प्राप्त कर लूँगा।’’

ज्यों-ज्यों भीम गदा भाँजता गया, नारायणास्त्र प्रज्वलित होता गया। उसकी लपटों से भीम झुलसने लगे। भगवान ने देखा कि यह भोला-भाला भक्त संकट में है। वह दौड़कर गये और भीम को छाती से लगा लिया। एक ओर श्रीकृष्ण की पीठ तो दूसरी तरफ भीम की पीठ हो गयी। वह नारायणास्त्र भी उन दोनों की परिक्रमा कर लौट गया। उस दिन कोई मरा ही नहीं। असाध्य प्रतिज्ञा भी साध्य हो गयी। प्रतिज्ञा का आशय है मनोकामना! भीम की वह मनोकामना पूरी हो गयी; किन्तु उसके अपने बल से नहीं अपितु उसे जिसका भरोसा था, उसके बल पर– जाके रथ पर केशो, ता कहँ कौन अँदेशो।

भीम ने दुर्योधन की जंघा तोड़ने की जब प्रतिज्ञा की थी, वह एक ताकतवर इंसान मात्र था, हाड़-मांस का पुतला! किन्तु जब युद्ध में मुकाबला हुआ तो वह वज्र बन चुका था। गान्धारी ने कहा– ‘‘मेरे सभी पुत्र युद्ध में मारे गये। तुम अकेले बचे हो। स्नान कर मेरे पास वैसे ही आओ जैसे जन्म के समय थे। एकदम नग्न!’’ भगवान ने देखा, कहाँ क्या हो रहा है? रात्रि में दुर्योधन स्नान करके नंग-धड़ंग चला आ रहा था। भगवान उसे मार्ग में ही मिल गये, बोले– ‘‘युवराज! तुम्हारी यह दशा? युद्ध से घबड़ाकर तुम विक्षिप्त तो नहीं हो गये? तुम्हारा रूख महारानी गान्धारी के शिविर की ओर है। माँ की गोद में छिपने तो नहीं जा रहे हो?’’ दुर्योधन ने कहा– ‘‘हाँ, केशव! आज माताजी ने इसी रूप में मुझे आने का आदेश दिया है। वे मुझे आशीर्वाद देना चाहती हैं।’’

श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘मर्यादा तो तुम भरतवंशी न जाने कब से भूल चुके हो। तुम दुधमुँहे बच्चे नहीं हो। तुम्हारे लड़के हैं, नाती हैं, पनाती हैं। तुम शूरवीर हो। क्षुद्र प्राणों के लिए माताजी के सामने इस दशा में जाओगे? मर्यादा की हद हो गयी। जाओ, जाओ! माताजी को बहुत प्रतीक्षा नहीं करानी चाहिए।’’ दुर्योधन ने सोचा– ‘‘यह कह तो ठीक रहे हैं। भला इस दशा में माताजी के पास कैसे जाऊँ?’’ उसने कमर में कोई वस्त्र लपेट लिया। गान्धारी ने ज्योंही अपनी आँखों की पट्टी खोलकर देखा, दुर्योधन का सारा शरीर वज्र हो गया। गान्धारी ने पूछा– ‘‘यह कमर में क्या लपेट रखा है?’’ उसने बताया– ‘‘माताजी! मैं अब बड़ा हो गया हूँ, आपके सामने एकदम नग्न कैसे आता?’’ गान्धारी ने दीर्घ नि:श्वास लिया और बोली– ‘‘यदि तुमने बड़ों की आज्ञा ही मान ली होती तो आज यह युद्ध न होता। जाओ बेटा! वस्त्रों से ढँका इतना हिस्सा जैसा का तैसा रह गया। मेरी दृष्टि तुम्हारे जिन अंगों पर पड़ी है, वे वज्र हो गये; किन्तु इतना कमजोर रह गया।’’ दुर्योधन बोला– ‘‘उसकी चिन्ता न करो माँ! गदा-युद्ध में कमर के नीचे प्रहार होता ही नहीं।’’

व्यास सरोवर के तट पर दुर्योधन और भीम का गदा-युद्ध हुआ। थोड़ी देर तक दुर्योधन गदा लेकर लड़ता रहा किन्तु शीघ्र ही उसे आभास हुआ कि उसे तो चोट ही नहीं लग रही है। उसने गदा फेंक दिया और भीम का प्रहार कभी खोपड़ी पर, कभी उँगली पर तो कभी कन्धे पर झेलने लगा। अब वह वज्रकोटेड हो गया था। उसे पीटते-पीटते भीम थक गये, गिर-गिर उठने लगे। अर्जुन ने कहा– ‘‘भगवन्! दुर्योधन का पलड़ा भारी है।’’ भगवान ने कहा– ‘‘बनियों की भाषा मत बोलो अर्जुन! मझले भइया को उनकी प्रतिज्ञा याद दिला दो।’’ अर्जुन ने कहा– ‘‘प्रतिज्ञा तो जंघा तोड़ने की थी।’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘हाँ, हाँ, वही याद दिलाओ।’’ अर्जुन ने कहा– ‘‘नहीं केशव! यह अपराध मुझसे नहीं होगा। गदा-युद्ध कमर से नीचे होता ही नहीं।’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘तब ठीक है, युद्ध देखो।’’

भगवान ने मन ही मन कहा कि भक्तों के लिए हमें क्या-क्या नहीं करना पड़ता। वह बोल पड़े– ‘‘वाह मझले भैया! गजब का वार है तुम्हारा।’’ हलधर इस युद्ध के निर्णायक थे। उन्होंने कहा– ‘‘कृष्ण! क्यों शोरगुल करते हो! युद्ध देखो, युद्ध।’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘दाऊ भैया! जरा उधर तो देखो। मझले भैया का वह दाँव तो बड़ा ही सराहनीय है।’’ बलराम उधर देखने लगे। श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘हाँ मझले भैया!’’ ज्योंही भीम की दृष्टि श्रीकृष्ण की ओर गयी, उन्होंने जंघे पर मारने का संकेत किया। जाँघ पर प्रहार होते ही दुर्योधन धराशायी हो गया, भीम की प्रतिज्ञा पूरी हो गयी।

क्या वह प्रतिज्ञा पूरी हो पाती यदि भगवान बीच में न होते? इसलिए समर्पित भक्त ही सदा विजयी होता है, उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इसलिए आप सभी एक प्रभु का सुमिरन करो। भविष्य में आप जो माँगोगे, मिलेगा; और मोक्ष तो अतिरिक्त लाभ के रूप में है ही क्योंकि ईश्वर-पथ में आरम्भ का नाश होता ही नहीं। और निवृत्ति के पश्चात् महापुरुषों की रहनी कैसी होती है, इसके सम्बन्ध में कबीर के एक भजन के माध्यम से बताने का प्रयास करेंगे।

कबीर ने चित्रण किया–

संतो! सहज समाधि भली।

गुरु परताप भई जा दिन ते, सुरत न अनत चली।।

संतो! सहज…..

आँख न मूँदूँ कान न रूधूँ, काया कष्ट न धारों।

उघरे नयना साहिब देखूँ, सुन्दर रूप निहारों।।

संतो! सहज…..

जहँ जहँ जाऊँ सोइ परिकरमा, जो कुछ करउँ सो पूजा।

भीतर बाहर एकहिं देखा, भाव मिटा सब दूजा।।

संतो! सहज…..

शब्द निरंतर मनवा राता, मलिन वासना त्यागी।

सोवत जागत कबहुँ न बिसरै, ऐसन तारी लागी।।

संतो! सहज…..

कह कबीर यह उनमुनि रहनी, सोइ प्रगट करि गाई।

सुख दुख से एक परे परम सुख, ता सुख रहल समाई।।

संतो! सहज…..

कबीर एक महापुरुष थे जैसा कि अनादिकाल से होते चले आये हैं, जैसे– सप्तर्षि, सनक, सनन्दन, वाल्मीकि, व्यास, नारद, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर….। उन्हीं में से कबीर भी एक थे। वह भी प्राप्तिवाले और उसी रहनीवाले महापुरुष थे। भगवत्प्राप्ति के सोपानों में एक उन्नत अवस्था है समाधि, जिसके लिए महर्षि पतंजलि योगदर्शन में कहते हैं–

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि:(योगदर्शन, विभूतिपाद, ३)

साधक जिस लक्ष्य का चिन्तन करता है, वह लक्ष्यमात्र रह जाय, ध्येयमात्र रह जाय; चित्त का निज स्वरूप शून्य हो जाय, चित्त का स्वरूप लक्ष्यमात्र रह जाय– इस अवस्था का नाम है समाधि। इसके पश्चात् परम चेतन का साक्षात् और उसमें स्थिति मिलती है। इसके पश्चात् महापुरुष की जो रहनी होती है, वह है सहज समाधि। जो स्वयंसिद्ध है, ‘विधि न बनाये हरि आप बनि आये’, जो सहज है, उसमें लागलपेट नहीं, बनावटी कुछ भी नहीं। सन्त कबीर ने जब उस स्थिति का चित्रण किया तो उन्होंने निर्णय दिया– संतो! सहज समाधि भली।– संतो! जो सहज है, जो स्वयंसिद्ध है, अनादि है, एकरस है, कण-कण में व्याप्त है, उस परम तत्त्व परमात्मा के साथ जो समत्व प्राप्त हुआ है, यह स्थिति सर्वोपरि है, इसके आगे कुछ है ही नहीं। यह समाधि आपको मिली कैसे? इसे बताते हैं– गुरु परताप– गुरु की प्रभुता जब हृदय में प्रेरणा करने लगी।

इस प्रताप की प्रेरणा के अवसर साधक के जीवन में आते हैं। रामचरितमानस में उल्लेख है– अंगद भगवान राम का दूत बनकर घोर निशाचरों के बीच लंका में गये। अतिकाय, अकम्पन, सुररिपु, दुर्मुख, मेघनाद, कुम्भकर्ण इत्यादि भयंकर निशाचरों की मण्डली में अकेला अंगद। पहले तो अंगद ने शान्तिपूर्वक वार्ता की किन्तु रावण ने जब बार-बार भगवान राम को तपस्वी, नालायक कहते हुए अपमानित किया कि राम अयोग्य थे इसलिए पिता ने उनको घर से भगा दिया, जो एक औरत की रक्षा नहीं कर सके वह युद्ध क्या खाक लड़ेंगे? अंगद तुहीं बालि कर बालक।तुम्हारा गर्भ क्यों नहीं गिर गया। बालि मेरा मित्र था। तुम जैसे बालि के पुत्र हो, वैसे ही मेरे पुत्र हो। तुम मेरे पक्ष में आ जाओ, मैं तुम्हें राज्य दिलाऊँगा। राम तो एकदम अयोग्य और साधारण-सा मनुष्य है। जब रावण ने भगवान को सामान्य मनुष्य कहा, उस भक्त से सहन नहीं हुआ। पहले तो उन्होंने रावण को कुछ खरी-खोटी सुनायी–

राम मनुज कस रे सठ बंगा।

धन्वी काम नदी पुनि गंगा।। (मानस, ६/२५/५)

रे मूर्ख बग्गड़ रावण! राम क्या साधारण मनुष्य हैं? गंगा क्या मात्र नदी है? काम क्या कोई धनुर्धारी योद्धा है?

सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा।

लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा।। (मानस, ६/२५/८)

बैकुण्ठ क्या कोई नगरी बसी है जहाँ जाकर अपना स्थान आरक्षित करा लोगे? फिर उस भगत ने भगवान का थोड़ा ध्यान धरा तो,

समुझि राम प्रताप कपि कोपा।

सभा माझ पन करि पद रोपा।। (मानस, ६/३३/८)

जब हृदय में भगवान का सन्देश मिल गया, प्रभु के प्रताप को जब अंगद ने समझा तो उसने प्रतिज्ञा करके अपना पद रोप दिया।

जौं मम चरन सकसि सठ टारी।

फिरहिं राम सीता मैं हारी।। (मानस, ६/३३/३)

रे मूर्ख! तुमसे से कोई भी मेरे चरण को यदि खिसका देगा तो राम लौट जायेंगे, समझ लेना सीता को मैं हार गया। वाह रे सेवक! आया था सेवा करने और स्वामी की धर्मपत्नी, जगज्जननी सीता को ही दाँव पर लगा दिया। उन्होंने अपने बल पर यह सब नहीं किया, उन्हें हृदय में प्रभु का प्रताप जो मिल गया। उस प्रताप के बल पर उन्होंने कुपित होकर पाँव जमीन पर रख दिया। एक-एक कर योद्धा उसे उठाने का प्रयास करते, एड़ी-चोटी का जोर लगाते और असफल होकर चुपचाप बैठ जाते–

कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ।

झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ।। (मानस, ६/३४-क)

मेघनाद के समान कोटिन्ह– करोड़ों योद्धा उठे, एक साथ उस बन्दर का चरण पकड़ा, उसे उठाकर फेंकना तो दूर की बात थी, उसे जमीन से तिल भर भी नहीं हिला सके। रावण के सारे योद्धाओं में सबसे बलशाली मेघनाद था, उसके समान करोड़ों योद्धा! सबने एक साथ चरण पकड़ा। क्या वह किसी बन्दर की साधारण-सी टँगरी थी? वास्तव में यह है मानस। यह किसी साधक के अन्त:करण का चित्रण है।

भूमि न छाँड़त कपि चरन, देखत रिपु मद भाग।

कोटि बिघ्न ते संत कर, मन जिमि नीति न त्याग।। (मानस, ६/३४-ख)

वह किसी बन्दर की टँगरी नहीं थी। अनुरागरूपी अंगद। आज आप भजन करते हैं तो मन नहीं लगता। साल-दो साल भजन करने पर भी आप शिकायत करते हैं कि मन नहीं लगता; क्योंकि जिस युक्ति से मन लगता है, उस युक्ति में आप कच्चे हैं। वह युक्ति क्या है?

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा।

किएँ जोग तप ज्ञान बिरागा।। (मानस, ७/६१/१)

आप करोड़ जप करें, तप करें, योग करें, वैराग्य करें किन्तु यदि अनुराग नामक योग्यता आपके पास नहीं है तो राम नहीं मिलते, मन नहीं लगता। राग माने आसक्ति। अनुराग माने इष्ट के अनुरूप लगाव। सबके ममत्व के धागों को आप समेटें और मन को इष्ट के चरणों में बाँध दें। इष्ट के अनुरूप राग, वृत्ति में प्रेम का प्रवाह– यही है अनुरागरूपी अंगद! आज मन नहीं लगता किन्तु अनुरागपूरित हदय से जब चरणों में चित्त लगा तो कामरूपी मेघनाद, क्रोधरूपी कुंभकर्ण, मोहरूपी रावण की काममयी करोड़ों प्रवृत्तियाँ भी आपको विचलित नहीं कर पायेंगी। अनुरागपूरित हृदय से जब चरणों में चित्त लग जाता है, चरण हृदय में स्थायित्व ले लेते हैं उस समय जैसे दर्पण में अपना मुँह दिखाई देता है, ऐसे ही गुरु के, इष्ट के, भगवान के चरण दिखाई देने लगते हैं। फिर काममयी करोड़ों प्रवृत्तियाँ भी साधक को विचलित नहीं कर पातीं, मन भी लग जायेगा। लेकिन यह तभी सम्भव है जब प्रभु का प्रताप आपके हृदय में दिखाई पड़े।

गुरु परताप भयो जा दिन ते– सद्गुरु का सीधा प्रताप जब हृदय में आया, जब वह प्रताप हृदय में प्रेरणा करने लगा तो सुरत न अनत चली। सुरत मन की दृष्टि का नाम है। जैसे आप अभी यहाँ बैठे हैं। अकस्मात् आपको लगे कि तिजोरी की चाभियाँ हम टेबल पर ही भूल आये हैं, कहीं लड़के लाख-पचास हजार इधर-उधर न कर दें। फिर आपका मन नहीं लगेगा। यहाँ छत्तीसों राग बज रहे हों पर आपको तिजोरी और चाभी दिखाई देगी। आपके कान खुले हैं, फिर भी यहाँ न सुनाई देगा और आँखें खुली होने पर भी न यहाँ का कुछ दिखाई देगा। दिखाई देगी चाभी। वस्तु नहीं है और वस्तु का चित्र दिखाई देने लगे, मन की इसी दृष्टि का नाम सुरत है।

एक दूसरा उदाहरण लें। यहाँ आप दत्तचित्त होकर प्रवचन में बैठे हैं। कोई किसी के कान में धीरे से कह दे कि उसका लड़का छत से गिरा, बेहोश हालत में अस्पताल गया। अनुशासन या मर्यादावश वह भले ही यहाँ से न उठे लेकिन यहाँ का कुछ भी न दिखाई पड़ेगा, न सुनाई पड़ेगा बल्कि उस बालक का एक-एक रोम दिखाई पड़ेगा; उस बालक की बरौनी कैसी, उँगलियाँ कैसी, दन्तावली कैसी। जबकि वस्तु सामने नहीं है और वस्तु का नक्शा खींच लें, उस मानसिक दृष्टि का नाम सुरत है। इसी सुरत को संसार से समेटकर चिन्तन में लगाया जाता है। यह सुरत कभी लगती है तो कभी उखड़ जाती है किन्तु जब हृदय से सद्गुरु का निर्देशन मिलने लगता है, उनका समर्थन मिलने लगता है तो सुरत न अनत चली– सुरत स्वरूप में टिक ही गयी, अन्यत्र गयी ही नहीं। इस सहज समाधि में भजन कैसे होता है? आरम्भ में भजन करते समय लोग आँख मूँदते हैं, कोई कान बन्द कर लेता है, लेकिन उस सहज समाधि में भजन का स्तर कैसा होता है?– इस पर सन्त कबीर कहते हैं–

आँख न मूँदूँ कान न रूँधूँ, काया कष्ट न धारूँ।

न तो आँख ही बन्द करता हूँ, न कान ही रूँधता हूँ और न काया को ही तपाता हूँ कि रात दो बजे से ही उठकर भजन में बैठ जाओ, इतना जगो, इतना सोओ। तब करते क्या हैं? वह बताते हैं–

उघरे नयनन साहिब देखूँ, सुन्दर रूप निहारूँ।

जब सुरत टिक ही गयी तो सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। (मानस, २/१३०/७)– न बैकुंठ बैकुंठ के रूप में रह गया जिसकी हम कामना करें और न नरक नरक के रूप में रह जाता है बल्कि जहाँ भी दृष्टि पड़ी, अपने आराध्यदेव को ही खड़ा पाया। जब सुरत अन्य कुछ देखती ही नहीं तो आँख बन्दकर हम किससे बचें? कौन-सा विपरीत शब्द है जिससे अपनी रक्षा के लिए हम कान बन्द करें? पहले साधना में श्रम होता था, अब श्रम भी नहीं रहा; सहज स्थिति मिल गयी। अब तो ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।(ईशा०, १)

ईश्वर के दर्शन और उसमें प्रवेश के साथ सर्वत्र ईश्वरमयी दृष्टि आ जाती है, किञ्चित् भी जगत् है ही नहीं तो रक्षा फिर किससे करें? इसीलिए–

आँख न मूँदूँ कान न रूँधूँ, काया कष्ट न धारूँ।

उघरे नयनन साहब देखूँ, सुन्दर रूप निहारूँ।।

जहाँ भी दृष्टि पड़ी, प्रभु के ही रूप का संचार दीख पड़ा। पूज्य महाराजजी कहा करते थे– ‘‘योगी कब भजन करता है इसे उसके पास में रहनेवाला भी नहीं जानता जब तक कि वह स्वयं न बता दे। तुमलोग सोचते हो मैं बातें करता हूँ किन्तु ऐसा है नहीं। मोर श्वास बाँस की तरह खड़ी है, वह सदैव स्थिर है। डोलत डिगै न बोलत बिसरे, अस उपदेस दृढ़ावै। मैं गले के ऊपर ही बातें किया करता हूँ।’’ यह थी सहज समाधि! प्रश्न उठता है कि सहज समाधि में आप तीर्थ-व्रत-परिक्रमा इत्यादि कुछ करते भी हैं? कबीर कहते हैं–

जहँ जहँ जाऊँ सोइ परिकरमा, जो कुछ करूँ सो पूजा।

भीतर बाहर एकहिं देखा, भाव मिटा सब दूजा।।

उसके साथ जिस क्षण समत्व मिला, जहाँ चला गया वही परिक्रमा, और जो कर डाला वही पूजा। भीतर हृदय में और बाहर जहाँ भी दृष्टि पड़ी, मगहर और काशी सर्वत्र उस इष्ट, एक ईश्वर का ही संचार देखा। दूसरा होने का भाव ही अविद्या माया है, जब उसका भाव ही मिट गया तो बचाव किससे करे?

महापुरुष जब दिवंगत हो जाते हैं, कालान्तर में उनकी क्रीड़ास्थलियाँ ही तीर्थ कहलाती हैं। सृष्टि में जितने भी तीर्थ हैं, महापुरुषों की देन हैं। उन्होंने जहाँ जन्म लिया, जैसे– ननकाना साहब; जहाँ तपस्या की, जैसे– सिमर शिखर; रामजी ने सेतु बाँधा तो वहाँ रामेश्वरम्; जिस चित्रकूट में उन्होंने तपस्या की वह भी तीर्थ; जहाँ-जहाँ उन्होंने उपदेश दिया, जहाँ परिनिर्वाण को प्राप्त हुए कालान्तर में वही तीर्थ कहलाये। जैसे– प्रयाग = पर और याग – प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी।– प्रकृष्ट यज्ञ की स्थली! यहाँ परम प्रभु का यज्ञ करनेवालों की युगों से कतार लगी है इसीलिए प्रयागराज तीर्थों का सम्राट हो गया है। मानस में गोस्वामीजी ने संतों को चलता-फिरता प्रयाग कहा है। येरूसलम में एक पहाड़ी है। उस पहाड़ी पर मूसा का पहला मंदिर बना था, अब उस मंदिर के भग्नावशेष हैं। उससे एक किलोमीटर की दूरी पर ईसा ने जन्म लिया, उपदेश दिया, उनका चर्च है। उसी से एक किलोमीटर की दूरी पर मुहम्मद साहब ने शरीर त्यागा था, वहाँ से जन्नत को नसीब हुए, वहाँ एक मस्जिद है। तीनों सम्प्रदायों के अनुयायी हमारा तीर्थ-हमारा तीर्थ कहकर रात-दिन झगड़ते रहते हैं। इसीलिए संत कबीर कहते हैं–

मेरा गाया गायेगा तो तीन लोक भरमायेगा।

मेरा गाया गूथेगा वो तीन लोक तर जायेगा।।

महापुरुष का कथन दुहरा देने मात्र से स्थिति नहीं मिलती। सच्चा शिष्य वही है जो उस कथनी को आचरण में ढाले। शीलवान सन्तों की बड़ी महिमा है।

साधुनाम् दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधव:

काले फलन्ति तीर्थानि सद्य: साधु समागम:।।

साधुओं का दर्शन पुण्य है, यह आपको पूर्णत्व की ओर ले जानेवाला है। तीर्थभूता ही साधव:’– भूतकाल के साधु आज के तीर्थ हैं, तीर्थस्वरूप हैं। तीर्थ अवश्य फल देते हैं लेकिन काले फलन्ति तीर्थानि– तीर्थ काल पाकर फल देते हैं, जबकि सद्य: साधु समागम:’– साधु का समागम तत्काल फल प्रदान करनेवाला होता है।

अब वे सन्त जो स्वरूप में स्थित, समाधिस्थ हैं, उन्हें तीर्थों का सहयोग नहीं चाहिए। वे जहाँ बैठ जायेंगे, वही तीर्थ हो जायेगा। इसलिए कबीर यहाँ कहते हैं– जहँ जहँ जाऊँ सोइ परिकरमा– वही परिक्रमा हो गयी। वे करते क्या हैं?

बर तर कह हरि कथा प्रसंगा।

आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा।। (मानस, ७/५६/७)

सुनहिं सकल मति बिमल मराला।

बसहिं निरन्तर जे तेहिं ताला।। (मानस, ७/५६/९)

अब वह लोगों की शंकाओं का समाधान करने लग जाते हैं। जैसा कि मानस में है– गरुड़ के सन्देह का कहीं निवारण नहीं हुआ। वह नारद के पास पहुँचे, ब्रह्मा के पास पहुँचे, भगवान शिव के पास पहुँचे। भगवान शिव ने उन्हें कागभुसुण्डि आश्रम भेजा। आश्रम में प्रवेश के साथ ही उनकी शंकाओं का समाधान होने लगा। उन्होंने जब काकभुसुण्डि की वाणी सुनी, तदनुसार थोड़ा अभ्यास बढ़ा तो वह सदा-सदा के लिए शंकाओं से मुक्त हो गये। ऐसा महापुरुष इच्छा करें तो किसकी; माया तो दिखाई नहीं देती इसलिए महापुरुष जब भी कामना करते हैं तो कल्याण ही करते हैं। वे प्राप्ति के पश्चात् दुनिया में जब तक होते हैं, लोकहित के लिए ही होते हैं। इसलिए ‘जो कुछ करूँ सो पूजा’। इसके अतिरिक्त वह कुछ कर भी तो नहीं सकते, वह कल्याणस्वरूप हैं।

भीतर बाहर एकै देखा, भाव मिटा सब दूजा।

वह महापुरुष टिके कहाँ रहते हैं? वे जीवित हैं, उनकी वृत्तियों में वेग है तो उनकी वृत्ति कहाँ रहती है?– इस पर सन्त कबीर बताते हैं कि–

शब्द निरन्तर मनवा राता, मलिन वासना त्यागी।

शब्द ही ब्रह्म है। उन महापुरुष के समक्ष अपौरुषेय वाणी सदा उतरती रहती है। उस शब्द में उनका मन निरन्तर रँगा रहता है। इसके सिवाय सृष्टि में जो कुछ भी है, मल में डुबोनेवाला है इसलिए मलिन वासनाओं को वह त्याग देते हैं। जागृत अवस्था में वह देखते रहते हैं कि भगवान का निर्देशन क्या है, वह उसे पकड़ते हैं और उसी में अनुरक्त रहते हैं। सोते समय भी उनकी यही दशा रहती है कि प्रभु एक पल के लिए भी विस्मृत न हों।

जागत सोवत कबहुँ न बिसरे, ऐसी तारी लागी।

जागते-सोते उन्हें कभी विस्मृत होता ही नहीं। उनकी दृष्टि सदैव शब्द पर रहती है कि वह अपौरुषेय वाणी क्या है? उसे समझो और भगवान की इच्छा का पालन करो। अंत में कबीर निर्णय देते हैं–

कह कबीर यह उनमुनि रहनी, सोइ प्रगट करि गाई।

उनमनी अवस्था भजन के मस्ती की एक अवस्था है। यह एक नशा है, तन्द्रा जैसी अवस्था है। मन के अन्तराल में सुरति की डोर सदैव लगी रहती है, सोइ प्रगट करि गाई– हमने उसी रहनी का चित्रण किया है। उस रहनी में आप पाते क्या हो? पुत्र-पौत्र सांसारिक वैभव तो दिखाई नहीं देता! आपको मिलता क्या है?

सुख दुख से एक परे परम सुख, ता सुख रहा समाई।।

सन्तो! सहज समाधि भली।

संसार के संयोग-वियोग से होनेवाले सुख तथा संयोग-वियोग से होनेवाले दु:ख से भी परे एक परमसुख की अवस्था है। उस उनमनी अवस्था में रहनेवाला महापुरुष उसी परम सुख, सहज सुख, शाश्वत सुख में निमग्न रहता है। संसार में आज किसी के पास इस बात का सुख है कि एक से दो फैक्ट्रियाँ हो गयीं। दो दिन बाद सूचना मिली कि फैक्ट्री में तो आग लग गयी, फिर दु:ख आ गया। बीमा से फैक्ट्री की क्षतिपूर्ति हो गयी तो किञ्चित् सन्तोष। यह सुख और दु:ख तो जन्म और मृत्यु के बीच के पड़ाव हैं। परम सुख इससे परे है जैसा कि मानस में है–

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी।

ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।। (मानस, ७/७१/७)

प्रकृति पार होने से भगवान पर कहलाते हैं। उस परम तत्त्व परमात्मा से संयुक्त होने से, जो सहज है, स्वयंसिद्ध है, सदा एकरस है, स्थिर है, उसके साथ जो समत्व प्राप्त हुआ, वह सर्वोपरि सुख है। भजन का परिणाम यही है। यहीं आकर मिलता है कि भजन में आनन्द है, सुख है। उस आनन्द की अनुभूति इसी स्तर पर आकर होती है। साधनाकाल में तो रात-दिन भजन, रात-दिन रगड़ करना होता है। उससे अन्त में एक ऐसा स्तर आता है कि परम सुख प्राप्त हो जाता है। ऐसा सुख जिसके पीछे दु:ख नहीं है, ऐसी शान्ति जिसके पीछे अशान्ति नहीं है और ऐसा जीवन प्राप्त हो जाता है जिसके पीछे मृत्यु नहीं है।

श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव से उनके एक शिष्य ने प्रश्न किया– ‘‘भगवन्! इतने बजे जगो, इतना ही सोओ, स्वल्पाहार करो, ऐसे बैठो– यह सब क्या है और यह कब तक चलेगा?’’ श्री परमहंसदेव ने कहा– ‘‘जब तक नदी उफान पर रहती है, मल्लाह दोहरा-तिहरा डाँड़-पतवार लगाकर बड़ी तत्परता से नाव खेते हैं; किन्तु वही नाव जब छिछले जल में आ जाती है, नाविक पतवार चलाना बन्द कर देते हैं, हल्का-सा पाल तान देते हैं, माझी गीत गाने लगते हैं, कोई मछली भूनकर खाने लगता है। इसी प्रकार जब तक कामिनी-कंचन की लहरे हैं, उखाड़-पछाड़ है, बेटा! ऐसा ही भजन करना पड़ेगा, रात-दिन एक करके लगना होगा और हल्के पानी में पहुँच जाओगे तब आनन्द ही आनन्द है। फिर तो भजन हमारा हरि करैं, हम पायो विश्राम।, भगवान देखें, वह सँभालें। केवल पाल भर ताने रहना। तत्पश्चात् यह अवस्था है सहज समाधि की। यह परम सुख भजन का परिणाम है।’’

भगवान श्रीकृष्ण ने जो स्थिति बतायी, वैदिक ऋषियों ने जो बताया, अनपढ़ अँगूठा छाप कबीर ने भी वही स्थिति बतायी कि भगवान एक, साधना-पद्धति एक, रास्ते में मिलनेवाली अनुभूतियाँ एक और परिणाम भी एक ही है। भक्त को चाहिए तो केवल टेक। आज श्रद्धा यहाँ है, कल वहाँ; आये दिन श्रद्धा बिखरती रहेगी तो यह स्थिति नहीं मिलेगी; क्योंकि,

व्यापकु एक ब्रह्म अबिनासी।

सत चेतन घन आनन्द रासी।। (मानस, १/२२/६)

भगवान कण-कण में व्याप्त हैं, भगवान एक हैं, परम सत्य हैं, चेतन हैं, मूढ़ नहीं हैं। आप श्वास बाद में लेते हैं, विचार बाद में करते हैं, वह पहले से जानते हैं, चैतन्य हैं, आनन्द की राशि हैं। ऐसे प्रभु रहते कहाँ हैं?

अस प्रभु हृदयँ अछत अविकारी।

सकल जीव जग दीन दुखारी।। (मानस, १/२२/७)

ऐसे परम प्रभु सबके हृदय में निवास करते हैं। किसी उपाय से उन्हें वहाँ से हटा दो, ऐसा भी सम्भव नहीं है। आप आपरेशन कर डालो, कलेजा काटकर अलग रख दो; वह बचे रहेंगे, उन्हें खरोंच तक नहीं लगेगी। वे अविकारी हैं, आपके विकारों से वे लिपायमान नहीं होते। वह द्रष्टा के रूप में हैं। प्रकाश में आप कसाईखाना खोल लें या भागवत पढ़ें, प्रकाश को आपके क्रियाकलाप से कुछ लेना-देना नहीं है। उसका काम है केवल प्रकाश देना।

हृदय में ऐसे प्रभु के होते हुए भी सारा जीव-जगत् दीन और दु:खी है। अब उस हृदय के प्रभु को पायें कैसे?

नाम निरूपन नाम जतन ते।

सोउ प्रकटत जिमि मोल रतन ते।। (मानस, १/२२/८)

पहले तो नाम का निरूपण करें कि नाम है किस प्रकार! निरूपण का अर्थ है विश्लेषण करना, निरुआरना, निराई करना। जिस प्रकार किसान खेत की निराई करता है, एक-एक पौधे को देखकर प्रतिकूल, विजातीय फसल को उखाड़ फेंकता है। खेत में केवल बोये हुए बीज की पौध रह जाती है, अनुकूल फसल वह रख लेता है। इसी का नाम है निराई करना। ठीक इसी प्रकार मन में नाम के अतिरिक्त अन्य संकल्प न रहने पाये। इस प्रकार जब समझ काम करने लगे तो नाम के लिए यत्न करो। राम नाम में अन्तर है, कहीं हीरा है, कहीं पत्थर है। यही नाम चार क्रमोन्नत विधियों से जपने में आता है। यह चारों सोपान यत्न करने से आते हैं। यत्न का अर्थ है प्रयास, अभ्यास। यह उन्नत अवस्था में अभ्यासजन्य है। नाम का निरूपण करें, अभ्यास करें, वह हृदयवाला प्रभु प्रकट हो जायेगा। ठीक उसी प्रकार जैसे रत्न की पहचान होने पर उसकी कीमत झलकने लगती है।

भगवान की पूजा में बहुत-कुछ सामग्री नहीं लगती। केवल मन, कर्म और वचन से श्रद्धा मात्र लगती है। गोस्वामीजी कहते हैं–

करम बचन मन छाड़ि छलु, जब लगि जनु न तुम्हार।

तब लगि सुख सपनेहुँ नहीं, किएँ कोटि उपचार।। (मानस, २/१०७)

दूसरी बात, साधकों को संग-दोष से सदैव सावधान होना चाहिए। संग-दोष से साधक नष्ट हो जाता है। संग ते जती कुमंत्र ते राजा।(मानस, ३/२०/१०)– कुमंत्रणा से बड़े-बड़े राजाओं के तख्त पलट जाते हैं। जिस प्रकार कुसंग आपको नष्ट कर सकता है, उसी प्रकार आपका शुभ संग किसी का उद्धार भी कर सकता है।

नगर के बाहर शान्त-एकान्त में एक अच्छे भजनानन्दी महात्मा की कुटिया थी। एक रात चोरों ने नगरसेठ के यहाँ सेंध लगायी जिसमें उन्हें बहुमूल्य आभूषण, सोने-चाँदी के बर्तन हाथ लगे। रत्नजटित जेवर, हीरा-मोती, ढेर सारा सोना और चाँदी। चोर बहुत खुश हुए, बोले– ‘‘जिन्दगी चोरी करते-करते बीत गयी, पचीसों बार राजकीय कर्मचारियों ने पकड़ा, पिटाई किया, गाँववालों की निगाह में हमलोग गिरे, सबने जलील किया, पेट कभी नहीं भरा। देखो न! आज कितना माल हाथ लगा है। यह तो चार-पाँच पीढ़ियों के खाने को पर्याप्त है।’’

इतने में दूसरा चोर बोला– ‘‘साथियो! अभी तो बारह भी नहीं बजे हैं। हमलोगों का असली समय तो बारह से दो बजे का होता है। चलो, एक हाथ और मारा जाय। आज साइत अच्छी है, योगिनी अनुकूल है तभी तो इतना माल मिला है।’’ वस्तुत: धन से किसी का मन नहीं भरता बल्कि धन मिलने से धन की हवस और भी भड़क उठती है। शेष चोरों ने भी कहा– ‘‘हाँ, हाँ! आज की शुरुआत बहुत अच्छी रही है। चलो, एक हाथ और मारा जाय।’’ एक ने कहा– ‘‘वह तो ठीक है लेकिन सिर पर यह बोझ अधिक है। एक मन से कम नहीं होगा। कोई साथी मिल जाता तो ठीक रहता।’’

संयोग से वह महात्मा रात्रि के बारह बजे भजन करते हुए टहल रहे थे। चोरों ने उन्हें भी कोई चोर समझ आव न देखा ताव, अपने सिर की गठरी महात्मा के सिर पर रखकर कहा– ‘‘क्या बौचट की तरह अभी तक घूम ही रहा है? यह गठरी ले चल। तुम्हें भी इसमें से हिस्सा मिलेगा।’’ महात्मा ने गठरी ले ली, उनके पीछे चलने लगे।

आगे एक बड़ा-सा घर दिखाई पड़ा। चोरों ने पुन: सेंध लगायी और घर का पिछला दरवाजा खोल लिया। सब भीतर गये। चारों ओर घूमकर चोर भुनभुनाने लगे– बाहर से देखने में कितना बड़ा मकान किन्तु भीतर चूहों तक के लिए भोजन का प्रबन्ध नहीं। कहीं पावभर आटा नहीं, चावल नहीं, नमक नहीं; इस घर में रहनेवाले आज न जाने क्या खाकर सोये होंगे!

महात्मा ने चोरों का भुनभुनाना सुन लिया। उन्होंने वह गठरी वहीं रख दी जो सिर पर थी। चोर बाहर निकले। पीछे-पीछे वह महात्मा भी चले। सभी नीरव एकान्त में मील-दो मील निकल गये; क्योंकि चोर माल का बँटवारा थोड़ा एकान्त में जाकर करते हैं। एक सूनसान स्थल पर पहुँचकर वे बोले– ‘‘यह दाँव तो खाली गया। चलो, पहले मिले हुए माल से इसे भी कुछ दे दिया जाय क्योंकि बेचारे ने गठरी तो ढोयी है।’’ वह नये साथी से बोले– ‘‘ला रे कहाँ है गठरी?’’

महात्मा बोले– ‘‘भैया! उस घर की दशा देखकर हमारे तो आँसू छलक आये, हृदय द्रवित हो गया। इतनी दया लगी कि हमने गठरी तो उन्हीं के घर में छोड़ दी।’’ चोर बिगड़ खड़े हुए– ‘‘इतना अधिक माल हाथ से निकल गया, तू कैसा चोर है? कौन है तू? तू चोर है भी या नहीं?’’ महात्मा ने कहा– ‘‘भाई! हम चोरों का क्या; आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों सही, कभी तो लहान बैठेगा। उन बेचारों को तो चोरी करना भी नहीं आता। चलो, कुछ दिन तो ठीक से जी खा लेंगे।’’

चोर लगे बिगड़कर बातें कहने और वह महात्मा उन्हें धीरे-धीरे सान्त्वना देने लगे। इसी बक-झक में सवेरा हो गया। चोरों में से एक ने उन महात्मा को पहचान लिया और बोला– ‘‘भागो यहाँ से! लगता है यह वह महात्मा हैं क्या? यह चोर नहीं हैं।’’ चोर भाग तो गये किन्तु चोरी बहुत बड़ी थी, दूसरे ही दिन वे पकड़ लिये गये। उनके हाथों में हथकड़ियाँ पड़ गयीं।

उन चोरों ने महात्माजी के पास संदेश भिजवाया– ‘‘गुरु महाराज! एक बार छूट जाते तो हम सभी आपकी कुटिया में झाड़ू लगाते। अब तो प्राण ही संकट में हैं।’’ वे छूट भी गये, झाड़ू भी लगाने लगे, उन महात्मा की शरण-सान्निध्य से अच्छे सन्त भी हो गये। सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। बाल्मीकि, अंगुलिमाल इत्यादि सत्संगति से सुधर गये। संगदोष यदि किसी को बिगाड़ सकता है तो सत्संगति से सुधार भी हो जाता है। यदि सच्ची शिक्षा है तो कोई किसी को क्या खाक बिगाड़ेगा? इसलिए संगति सदैव अपनों से बड़ों और उन्नत व्यक्तियों की करनी चाहिए। दुराचारियों की संगत करो ही मत।

एक बात और! वे बच्चे भाग्यवान होते हैं, प्रात: उठते ही जिसके कण्ठ पर भगवान का नाम ‘ॐ’ अथवा ‘राम’ हो। आँख खुलते ही माताजी, पिताजी और गुरुजनों का चरण-स्पर्श करें।

प्रातकाल उठि कै रघुनाथा।

मातु पिता गुरु नावहिं माथा।। (मानस, १/२०४/७)

यह हमारी संस्कृति है। रामजी भगवान ही थे। जड़ शरीरों को छूने की उन्हें क्या आवश्यकता थी। किन्तु वह मर्यादा पुरुषोत्तम थे, मर्यादा की स्थापना करने ही तो वह आये थे। उन्होंने भी गुरुजनों के वन्दन की मर्यादा का भली प्रकार पालन किया। उन्हें वनवास भी हुआ, वह राजकीय वैभव से वंचित कर दिये गये किन्तु गुरुजनों का आशीर्वाद फलीभूत हुआ, वह पुन: महाराजा हुए और आज भी वह पूज्य हैं। उनका चरित्रग्रन्थ रामायण ऐसा शास्त्र है जिसमें सींकभर प्रश्न की कहीं जगह नहीं है। कदाचित् कहीं प्रश्न खड़े हों तो प्रश्न वहाँ करना चाहिए जहाँ उत्तर मिलने की सम्भावना हो।

।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-5’ से उद्धृत)

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