प्रश्न– महाराजजी! अजर, अमर और शाश्वत आत्मा का हित कैसा?
उत्तर– विद्वत् समूह को सम्बोधित करते हुए महाराजजी कहते हैं कि जिस गीता में आत्मा को अजर, अमर और शाश्वत कहा गया है उसी शास्त्र में यह भी मान्यता है कि आत्मा को अधोगति एवं नीच योनियों में न पहुँचावें बल्कि अपनी आत्मा का उद्धार करें। इसका पतन न होने दें।
आत्मा वस्तुतः अजर, अमर एवं शाश्वत है; किन्तु यह तो किसी महापुरुष के द्वारा देखकर निर्णय किया गया है। गीता आत्मा की कोरी प्रशंसा नहीं करती बल्कि उसके स्वरूप को प्रत्यक्ष कराती है। इसलिए निर्णय दिया है कि तत्त्वदर्शियों ने ही इस आत्मा को देखा है। जब परमतत्त्व परमात्मा देखने में आ जाता है, तभी इन्हीं विभूतियों से युक्त यह आत्मा भी प्रत्यक्ष होता है। हम कहते भर हैं पर देखते तो नहीं। दिखाई तो यही शोक, सन्ताप एवं संसार देता है।
इस प्रकार भजन के मनन की युक्ति समझो और करो। जब कभी भी आत्मा दिखाई देता है तो इसी रूप में। भजन के सिवाय उसे देखने का कोई अन्य उपाय नहीं है।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)