अनेकों प्रश्न ऐसे हैं

अनेकों प्रश्न ऐसे हैं….

उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति।

पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति।।

(रामचरितमानस, अरण्यकाण्ड, मंगलाचरण)

हे पार्वती! राम का गुण अत्यन्त गूढ़ है, रहस्यमय है। उसे समझकर पण्डित और मुनि तो वैराग्य को प्राप्त हो जाते हैं, सृष्टि में राग छोड़कर भगवान की राह में अनुरक्त हो जाते हैं और उसी चरित्र को पढ़कर, देखकर, सुनकर पावहिं मोह बिमूढ़– अत्यन्त मूढ़जन मोह को प्राप्त होते हैं। लेख एक किन्तु परिणाम दो! इसी प्रकार,

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे।

जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।। (रामचरितमानस, २/१२६/७)

प्रभु के चरित्र को देख-सुनकर मूर्ख मोह को प्राप्त होते हैं किन्तु बोधसम्पन्न पुरुष सुखी होते हैं। चरित एक और परिणाम दो! वस्तुत: रामचरितमानस एक विलक्षण आध्यात्मिक ग्रन्थ है। जब यह लिखा गया तो इसके रचनाकार गोस्वामीजी ने इसके कहने-सुनने पर प्रतिबन्ध लगा दिया–

यह न कहिअ सठही हठसीलहि।

जो मन लाइ न सुन हरिलीलहि।। (रामचरितमानस, ७/१२७/३)

यह कथा शठ से, हठधर्मी से और जो मन लगाकर न सुनता हो, उससे नहीं कहनी चाहिए।

कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि।

जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।। (रामचरितमानस, ७/२७/४)

लोभी, क्रोधी और कामी से यह कथा नहीं कहनी चाहिए। जो भगवान का भजन न करता हो, उससे भी नहीं कहनी चाहिए। आप ही विचार करें, यहाँ इतने लोग बैठे हैं; क्या आप सबमें लोभ नहीं है? मोह नहीं है? राग-द्वेष, काम-क्रोध नहीं है क्या? यदि ये विकार सबमें हैं तो कथा कही किससे जाय? इसी प्रकार,

अनेकों प्रश्न ऐसे हैं जो दुहराये नहीं जाते।

बहुत उत्तर भी ऐसे हैं जो बतलाये नहीं जाते।।

सारा सत्संग आपको सुनने को मिलेगा; किन्तु कुछ ऐसे प्रतिबन्ध हैं जो कहने में नहीं आते। वे केवल साधकों के लिये हैं। भूमि तैयार नहीं है, उसमें बीज डाल दें तो बीज नष्ट हो जायेगा। ऋतु आने से पहले वृक्ष भी फल नहीं देते। ठीक इसी प्रकार ईश्वर-पथ की कुछ ऐसी साधनायें हैं, पहले आप का हृदय उर्वर हो जाय तभी उन्हें करने का प्रभाव है अन्यथा कोई लाभ भी नहीं है। इसी प्रकार बहुत से उत्तर ऐसे हैं जो समय से पूर्व बताये नहीं जाते। इसी आशय का यह भजन है जिसका साधनात्मक उपयोग भी है–

अनेकों प्रश्न ऐसे हैं जो दुहराये नहीं जाते,

जो दुहराये नहीं जाते।

बहुत उत्तर भी ऐसे हैं जो बतलाये नहीं जाते,

जो बतलाये नहीं जाते।

अनेकों प्रश्न……………..

इसी कारण अभावों का सदा स्वागत किया मैंने,

कि घर आये हुए मिहमान लौटाये नहीं जाते,

लौटाये नहीं जाते।

अनेकों प्रश्न………….

हुआ क्या आँख में आँसू जो बाहर नहीं निकले,

बहुत से गीत ऐसे हैं कि जो गाये नहीं जाते,

कि जो गाये नहीं जाते।

अनेकों प्रश्न……………..

बनाना चाहता हूँ स्वर्ग तक सोपान सपनों का,

मगर चादर से ज्यादा पाँव फैलाये नहीं जाते,

फैलाये नहीं जाते।

अनेकों प्रश्न…………

संसार में बहुत से प्रश्न ऐसे भी हैं जो पुन:-पुन: नहीं पूछे जाते। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने नियत कर्म के क्रियान्वयन के प्रश्न को इसी प्रकार का बताया। उन्होंने कहा– अर्जुन! वायुरहित स्थान में रखे हुए दीपक की लौ सीधे ऊपर जाती है, उसमें कम्पन नहीं होता। योगी के अच्छी प्रकार से जीते हुए चित्त की भी यही परिभाषा है। यह सुनकर अर्जुन विचलित हो गया। उसने कहा– भगवन्! मन तो वायु से भी तेज चलनेवाला है। इसका रुक पाना तो लगभग असंभव है। अत: शिथिल प्रयत्नवाला किन्तु श्रद्धावान पुरुष आपको न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है? कहीं वह छिन्न-भिन्न बादल की तरह नष्ट-भ्रष्ट तो नहीं हो जाता? कभी-कभी छोटी-सी बदली आकाश में आती है जिससे न तो पानी ही बरसा, न वह लौटकर मेघों से ही मिल पाती है; देखते ही देखते वह हवा के झोकों में विलीन हो जाती है। इसी प्रकार शिथिल प्रयत्नवाला बेचारा न तो आप में मिल पाया और न संसार में भोग ही भोग पाया। कहीं वह छिन्न-भिन्न बादल की तरह नष्ट-भ्रष्ट तो नहीं हो जाता? मन का रुक पाना तो असम्भव-सा लगता है। भगवान ने कहा– नहीं, अर्जुन!

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।। (गीता, ६/३५)

नि:सन्देह मन वायु से तेज चलनेवाला है किन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा यह भली प्रकार स्थिर हो जाता है। जहाँ तक साधक के नष्ट होने का प्रश्न है, ईश्वर-पथ में बीज का नाश नहीं है। इस पथ पर यदि दो कदम भी चलते बन गया तो अगले जन्म में तीसरा कदम ही आगे बढ़ेगा और पड़ेगा। माया में ऐसा कोई यन्त्र नहीं है जो प्रयत्नशील पुरुष को घसीटकर पुन: अपने में समेट ले।

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्। (गीता, २/४०)

इस धर्म का स्वल्प अभ्यास भी जन्म-मृत्यु के महान भय से उद्धार करनेवाला होता है। इस क्रिया के प्रभाव से हर जन्म में वह उस साधन को वहीं से आरम्भ करता है पिछले जन्म में जहाँ से साधन छूटा था। और,

अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्। (गीता, ६/४५)

अनेक जन्मों के परिणाम में वह वहाँ पहुँच जायेगा जिसका नाम परम गति है, परम धाम है। साधना के इस प्रश्न को हल होना ही होना है। इसे दुबारा पूछने की आवश्यकता नहीं रह जाती। इसलिए सोचनीय वह है जिसने भजन आरम्भ ही नहीं किया। किन्तु यदि किसी ने गीतोक्त साधना समझकर उस पर दो कदम रख दिया, उसका मोक्ष यद्यपि तत्काल नहीं हुआ लेकिन उसके लिये मोक्ष का आरक्षण भली प्रकार हो गया। दो-चार जन्मों का अन्तराल भले ही पड़ जाय, उसे मुक्त तो होना ही होना है। अगली पंक्ति में है–

बहुत उत्तर भी ऐसे हैं जो बतलाये नहीं जाते,

जो बतलाये नहीं जाते।

बहुत से उत्तर ऐसे भी हैं जो कहने में नहीं आते। गुरु महाराज के समक्ष एक बार ऐसा ही प्रश्न आया था। चित्रकूट के अनुसुइया आश्रम में महाराज जी के आरम्भिक दिनों की घटना है। कभी-कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर, प्रोफेसर या डीन वहाँ पहुँचते ही रहते थे। उन दिनों चित्रकूट से अनुसुइया तक आवागमन की समुचित व्यवस्था न थी। लोग जंगल-झाड़ियों को काटते-छाँटते, हाथियों या घोड़ों पर बैठकर प्रात: चलते तो आश्रम पहुँचते-पहुँचते शाम हो जाया करती थी। उन्हें लौटकर जाने का समय ही नहीं बचता था। रात्रि उन्हीं चट्टानों पर व्यतीत करनी पड़ती थी।

साथ में आनेवाले क्षेत्रीयजन उन सबका परिचय गुरु महाराज से कराते कि महाराज जी! आप कबीर पर अधिकारिक विद्वान हैं और आप दर्शनशास्त्र के विशेषज्ञ हैं…. और आप…. जितने लड़के पी एच-डी. के लिये शोध-प्रबन्ध लिखते हैं, आपकी ही कलम से उत्तीर्ण होते हैं। आप डीन हैं और यह वाइस चांसलर साहब हैं। महाराज जी कहते– हो, भल आये। हम यहाँ जंगल में पड़े हैं, कहाँ सुनने को पायें! कुछ हमें भी सुनायें। डॉ. रामकुमार वर्मा जी ने कबीर के एक प्रसिद्ध पद काहे री नलिनी तू कुम्हलानी, तेरे ही नाल सरोवर पानी।की दो-चार पंक्तियों का आशय बताया। गुरु महाराज कुछ नहीं बोले। डॉक्टर साहब भी मौन हो गये। पुन: उन्होंने निवेदन किया कि गुरु महाराज! हमलोग सुनाने नहीं, आपसे कुछ सुनने आये हैं, जानने आये हैं। संसार भर के दार्शनिक सिद्धान्तों को हमलोगों ने पढ़ा है। द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, सगुण-निर्गुण, बुद्धिवाद, विचारवाद, सुखवाद–सब कुछ हमलोगों ने देखा किन्तु भजन समझ में नहीं आता, साधना समझ में नहीं आती। हमलोगों को योग-साधना बताने की कृपा की जाय।

महाराज जी ने कहा– हो! साधना ही एक ऐसी वस्तु है जो वाणी से कहने में नहीं आती। अनिर्वचनीय है, वाणी से उसका निर्वचन किया ही नहीं जा सकता। भजन एक ऐसी क्रिया है जो किसी अनुभवी सद्गुरु द्वारा किसी-किसी अधिकारी के हृदय में जागृत हो जाती है, कर दी जाती है। कहने को तो आजकल दो-दो पैसे में वेदान्त बिकत है (उन दिनों गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद्भगवद्गीता पुस्तक दो-दो पैसे में मिलती थी।)। लोग उसे पढ़ते हैं और न जाने क्या लिखत भी जात हैं किन्तु भजन-साधना ही एक ऐसी धारा है जो न तो लिखने में आती है और न वाणी से कहने में ही आती है। यह तो सद्गुरु के द्वारा किसी अनुरागी साधक के हृदय में जागृत हो जाया करती है। यही है बहुत उत्तर भी ऐसे हैं जो बतलाये नहीं जाते।

बाल्यकाल से ही अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के साथ रहा फिर भी वह उन्हें समझ नहीं पाया। जब उन्होंने अर्जुन को दृष्टि दी तो वह क्षुद्र त्रुटियों के लिये क्षमा-याचना करने लगा, स्तुति करने लगा–

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।

त्वमव्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।। (गीता, ११/१८)

भगवन्! आप अक्षय धाम हैं, परम अक्षर हैं, जाननेयोग्य एकमात्र देव हैं। आप शाश्वत धर्म के रक्षक हैं, आप सनातन पुरुष हैं, आप परम सत्य हैं….. जबकि इसके पूर्व अर्जुन ने प्रश्न-परिप्रश्नों की झड़ी लगा दी थी। उसे समझ में तब आया जब उसे दृष्टि मिल गयी और दृष्टि भी वह जिसमें भगवान का ही आलोक रहता है। यही कुछ उत्तर हैं जो वाणी से कहने में नहीं आते।

एक महात्मा के पास एक भक्त पहुँचा। उसने निवेदन किया, ‘‘भगवन्! लोग कहते हैं कि भगवान ने आपको दर्शन दिया है। कृपया भगवान को हमें भी दिखा दें।’’ उन महात्मा ने कहा, ‘‘बेटा! वह वाणी का विषय नहीं है। भगवान अचिन्त्य हैं, अगोचर हैं।’’ महात्मा उसे बार-बार समझाते किन्तु वह कुछ न कुछ पूछता ही रह गया। एक दिन महात्मा ने ईंट का एक टुकड़ा उठाया और खींचकर शिष्य के सिर पर मारा। उसका सिर फूट गया। शिष्य प्रतिष्ठित परिवार का था। वह सीधा राजा के पास जाकर बोला, ‘‘अन्नदाता! उन महात्मा ने मेरा सिर फोड़ दिया।’’

वह महात्मा बुलाये गये। राजा ने कहा, ‘‘महात्मन्! हमारे इस राज्य में आप ही तो एक संत हैं। आज आपने इसका सिर क्यों फोड़ दिया?’’ उन संत ने कहा, ‘‘हमने किसी का सिर नहीं फोड़ा। हमने तो इसके प्रश्न का उत्तर दिया है।’’ राजा ने कहा, ‘‘यह ईंट मारना कौन-सा उत्तर है?’’ महात्मा ने कहा, ‘‘इससे पूछो कि दर्द होता है?’’ शिष्य बोला, ‘‘दर्द पूछते हैं, यहाँ जान जा रही है, प्राण जा रहे हैं।’’ महात्मा ने कहा, ‘‘वह दर्द हमें भी दिखाओ।’’ शिष्य ने कहा, ‘‘जिसे चोट लगती है, वही जानता है।’’ महात्मा ने उसे समझाया, ‘‘बेटा, इसी प्रकार भगवान जिसके हृदय में जागृत होता है, वही जानता है।’’

जिन देखा सो कहा नहिं, कहा सो देखा नाहिं।

रहिमन अगम बात के, कहन सुनन को नाहिं।।

वह अगम है, अनिर्वचनीय है तो वाणी से निर्वचन करने से कैसे आयेगा? वह अगोचर है तो इन इन्द्रियों से देखा कैसे जायेगा? इसीलिए जिन्होंने देखा, उसके बारे में कुछ कहा ही नहीं और जो उन परमात्मा के बारे में कुछ कहता है, उस गरीब ने अभी परमात्मा को देखा ही नहीं।

इसी कारण अभावों का सदा स्वागत किया मैंने।

भजन की जागृति वाणी का विषय नहीं है। वह तो अनुभवी सद्गुरु से जागृत हो जाया करता है। विचारणीय है कि जागृतिकाल में हमारे भजन का स्तर कैसा है? हम आरम्भिक स्तर के साधक हैं, मध्यम स्तर के हैं या उन्नत श्रेणी के? यदि जागृति आरम्भिक स्तर की है तो हमें वहीं से चिन्तन करना होगा। यह अवश्य है कि अभी रास्ता लम्बा है, अभाव है लेकिन क्रम-क्रम से चलते हुए ही उन्नत श्रेणियों में पहुँचा जा सकता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:।। (गीता, ३/३५)

अर्जुन! स्वभाव से उत्पन्न कर्म करने की क्षमता के अनुसार कर्म में लगना तुम्हारा दायित्व है, तुम्हारा स्वधर्म है। स्वभाव के अनुसार, कर्म करने की क्षमता के अनुसार कर्म में लगा हुआ पुरुष परम श्रेय को प्राप्त होता है जबकि उन्नत अवस्थावालों की नकल करनेवाला भय को प्राप्त होता है। भय प्रकृति में होता है, परमात्मा में नहीं। वह परमात्मा तो अभय पद है। प्रकृति में भटकनेवाला आवागमन को प्राप्त होता है। मान लें, कोई अल्पज्ञ श्रेणी का है, अभाव में है तो इस स्तर से ही क्रमश: चलकर वह परमश्रेय तक की दूरी तय करेगा, छलाँग मारकर नहीं। इसलिए अभावों का भी स्वागत करना होता है।

भजन जब जागृत होता है, भगवान साधक को उतना ही बताते हैं जैसी उसकी अवस्था होती है। वह क्रम-क्रम से बतायेंगे और साधक को उसी का पालन करना होगा। शिशु कक्षा के छात्र को उन्नत कक्षाओं में बैठा दें, वहाँ तो कुछ सीखने का प्रश्न ही नहीं है, वह शिशु कक्षा की पढ़ाई से भी वंचित हो जायेगा। उसने पढ़ा ही कब? इसलिए नकल करनेवाला भय को प्राप्त होता है। आरम्भिक अवस्था में अभाव तो है किन्तु इनका स्वागत करें; क्योंकि,

घर आये हुए मिहमान लौटाये नहीं जाते,

लौटाये नहीं जाते।

संस्कार घर आये हुए मिहमान हैं। ये हृदय के अतीत हैं। ये शुभ हों या अशुभ भोगने में अवश्य आते हैं। जैन विचारधारा के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर के साधनकाल की घटना है। वह जंगल में एक वृक्ष के नीचे बैठकर भजन कर रहे थे। समीपवर्ती गाँव का एक चरवाहा अपने बैल लेकर वहाँ आया। छाया और शान्ति देख वह वहीं बैठकर विश्राम करने लगा। बैल भी वहीं बैठ गये। थोड़ी देर पश्चात् वह उठा और बैलों को वहीं छोड़ जंगल में घूमने चला गया। कुछ समय पश्चात् वह लौटकर पुन: वहीं आ गया किन्तु वहाँ बैल नहीं थे। उसने पूछा– महाराज! हमारे दो बैल यहाँ बैठे थे, किधर गये?

महात्मा ध्यान में लीन थे, कुछ देखा ही नहीं था इसलिए कुछ बोले ही नहीं और पुन: ध्यानमग्न हो गये। चरवाहा उन बैलों को ढूँढ़ने जंगल में चला गया। बैल समीप ही चर रहे थे। वे पुन: आकर उन महात्मा के पास ही बैठ गये। बैलों को वहाँ शान्ति मिली। जब से उन्हें जुए में जोता गया था, तब से रात-दिन डण्डा उनके पीछे लगा ही रहता था। इन महापुरुष के पास का वायुमण्डल शान्त था। पशु-पक्षी वहाँ विश्राम करते थे। दो-चार घण्टे ढूँढ़ने के पश्चात् चरवाहा उसी वृक्ष के नीचे पहुँचा तो बैलों को वहीं बैठा पाया। उसे क्रोध आ गया कि बैल यहीं थे; किन्तु इस तपस्वी ने बताया नहीं। मुझे चार घण्टे परेशान किया। यह ऐसे बैठा है मानो सुनता ही नहीं, बहरा होने का स्वाँग कर रहा है। ठीक है, इसे बहरा ही बना देता हूँ।

चरवाहे ने कुश का पौधा उखाड़ा। उसने कुश की पैनी और ठोस जड़ भगवान महावीर के कान में ठूँस दी और सरौता लेकर ऊपर पत्तियों का भाग काट दिया जिससे कोई उँगलियों से पकड़कर कुश निकाल न ले। ‘लो अब कुछ नहीं सुन सकोगे’ बड़बड़ाता हुआ वह बैलों को लेकर वहाँ से चला गया। भक्तों की दृष्टि पड़ी। वे कुश निकालने लगे किन्तु वह नहीं निकला। लुहार बुलाया गया। उसने सँड़सी से पकड़कर कुश खींचा। कुश के साथ रक्त निकला। महावीर स्वामी के मुख से एक चीख भी निकली। इतने में उन्हें आकाशवाणी हुई– पिछले जन्म में तुम राजा थे। तुमने एक निरपराध व्यक्ति के कान में कील ठोंकने का आदेश दिया था, स्वयं उपस्थित रहकर उसे दण्ड दिलाया था। वह प्रायश्चित आज पूर्ण हुआ।

वास्तविकता तो यह थी कि चरवाहे ने वह कुश नहीं ठोंका। वह तो जन्म-जन्मान्तरों का बदला था। वह प्रायश्चित पीछा कर रहा था, संस्कार आया और घटना घट गयी। इसलिये अभाव हमारे हृदय के ऊँचे-नीचे संस्कारों के परिणाम हैं। इनका स्वागत करना चाहिए। क्रम-क्रम से साधना में लगें। ऐसा कोई संस्कार नहीं जो भजन से न कटे। ये घर आये हुए मेहमान की तरह हैं। ये लौटाने से नहीं लौटते। इन्हें अवश्य ही भोगना पड़ता है। महावीर स्वामी के भोगने में आया और चला भी गया। भजन की उन्नत अवस्था में कभी-कभी ये भजन से कट भी जाते हैं। भजन करनेवाले साधक के लक्षण क्या हैं?

हुआ क्या आँख में आँसू जो बाहर नहीं निकले।

जो साधक भावधारा में डूबकर भजन करते हैं, सांसारिक लोग समझ ही नहीं पाते कि यह भी सन्त हो सकते हैं या भजनानन्दी हो सकते हैं। भजन छिपकर करने का विधान है। साधक कब भजन करता है, पूज्य गुरु महाराज जी कहा करते थे, इसे बगल में बैठा हुआ व्यक्ति भी नहीं जान पाता जब तक वे स्वयं न बता दें। भजन प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। साधक की आँख में आँसू लबालब भरे होते हैं, किन्तु बाहर वे दिखाई नहीं देते।

मम गुन गावत पुलक सरीरा।

गदगद गिरा नयन बह नीरा।। (रामचरितमानस, ३/१५/११)

रोमांच हो, कण्ठ अवरुद्ध हो, आँखों से अश्रुपात् हो, विरही के यही लक्षण हैं। किन्तु साधना थोड़ी ऊपर उठ जाय तो बाहर ये लक्षण प्रकट नहीं होते। यही स्थिति नन्दा नाई की थी। कोई नहीं जानता था कि वह भी भगवद्भक्त है। वह युवराज दुर्योधन का नाई था। प्रतिदिन प्रात: युवराज को सजा-सँवार कर राजसभा के लिये तैयार करना उसकी चर्या थी। वह वेश-सज्जा का विशेषज्ञ था।

एक दिन बड़े सवेरे वह राजकुमार की सेवा के लिए घर से चला। अभी वह कुछ ही कदम चला था कि पाँच-सात सन्तों पर उसकी दृष्टि पड़ गयी। उसने उन्हें सादर दण्डवत् किया और उनकी सेवा में लग गया। उन्हें नहलाते-धुलाते, खिलाते-पिलाते और विदा करते दोपहर के तीन बज गये। सन्तों को विदा कर वह अपनी सेवा पर चला। उसे याद आया कि मैं तो नित्य की तरह प्रात: राजकीय सेवा में जा रहा था, इस समय तो अपराह्न हो चला है। यह भी क्या कोई नहाने-धोने का समय है! दुर्योधन बड़ा दुष्ट है। ऐसी भूल के लिए मृत्युदण्ड से कम उसने आज तक किसी को कुछ दिया ही नहीं। आज मेरी मौत निश्चित है।

विचारों ने करवट ली। उसने सोचा– भगवान की राह में आज यह शरीर जा रहा है, संतों की सेवा मिली, मैं कितना भाग्यवान हूँ। शरीर तो किसी न किसी निमित्त से जाना ही था। आज यह प्रभु की राह में जा रहा है। वह बड़ी प्रसन्नता के साथ राजमहल की ओर चल पड़ा कि बहुत हुआ तो प्राण ही तो जायेंगे। मुख्य द्वार पर ही दुर्योधन मिल गया। उसने आश्चर्य से पूछा, ‘‘नन्दा! तुम लौटे कैसे? अभी तो गये थे।’’ नन्दा ने सोचा– मैं तो आया ही नहीं था। लगता है, यह व्यंग्य बोल रहा है। कुछ कोड़े मार कर छोड़ देता, प्राण तो बच जाते।

तब तक दो-चार मंत्री भी उधर से निकले। मंत्रियों ने कहा, ‘‘नन्दा! तुम वापस कैसे आये? आज तो तुम्हारे चेहरे में वह मोहिनी थी कि हमलोगों को पलक हटाने का मन नहीं कर रहा था। मन करता था तुम्हें देखते ही रहें। क्या बात थी?’’ दुर्योधन ने कहा, ‘‘नन्दा! सेवा तो तुमने जन्मपर्यन्त की है किन्तु आज तुम्हारे हाथों के स्पर्श में जो आनन्द था, उसे मैं भूल नहीं पा रहा हूँ। मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मुझसे वर माँगो।’’ नन्दा समझ गया कि मेरे क्षुद्र प्राणों की रक्षा के लिये भगवान को इतना कुछ करना पड़ा। प्रभु को मेरा रूप बनाकर इस नीच के चरण दबाने पड़े। प्रेम से उसके अश्रु छलक आये। अश्रु तो सदैव थे किन्तु छलके उस दिन! वह गुप्त रूप से भजनानन्दी था। कोई नहीं जानता था कि यह इतना गहरा भजनानन्दी है कि भगवान रूप बनाकर इसके आगे-पीछे चलते हैं। प्रेमाश्रुओं को रोकते हुए वह बोला, ‘‘युवराज! पुरस्कार देना ही है तो जो माँगू, उसे दें।’’ दुर्योधन ने कहा, ‘‘ठीक है नन्दा! कर्ण को मैंने राजा बना दिया, दूसरा राजा मैं तुम्हें भी बना सकता हूँ। कोई भी सरसब्ज प्रान्त माँग लो।’’ नन्दा ने सविनय कहा, ‘‘युवराज! मुँहमाँगा देना चाहते हैं तो कृपया मेरा त्यागपत्र स्वीकार करें। आज से मैं केवल भगवान की सेवा करना चाहता हूँ।’’ नन्दा की आँखें आँसुओं से भरपूर थीं। ‘हुआ क्या आँख में आँसू जो बाहर नहीं निकले’– प्रदर्शनी लगाकर भजन नहीं किया जाता।

ईश्वर-पथ में भजन की जागृति अन्तर्जगत् की क्रिया है। अन्त:करण में भीतर ही भीतर वह साधना जागृत हो जाती है, ईश्वरीय गायन होने लगता है किन्तु वाह्य जगत् को उसका उच्चारण सुनायी नहीं पड़ता। नारद की वीणा का गायन निरन्तर चलता रहता था। नाम का जप करते-करते बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती के पश्चात् परावाणी के प्रवेश के साथ अन्तर्जगत् में एक रिनक-धिनक धुन स्वत: प्रवाहित होती रहती है– हर दम हरि जी का होत अवाजा। सुनिहै कोयलिया का सुने कागा।– हर समय हरि की आवाज होती रहती है, धुन प्रवाहित होती रहती है जिसे केवल कोयल ही सुन पाती है, कौआ उसे क्या खाक सुनेगा? यही भाव इन पंक्तियों में भी है–

मोहन अरु मोहन मस्तों के दिल का मिलता कुछ राज नहीं।

उर अन्दर बातें होती हैं, बाहर आती आवाज नहीं।।

भगवान और उनके मस्तों के, उनके अंतरंग भक्तों के दिल का रहस्य समझ में नहीं आता, उनके राज का पता नहीं चलता। दिल अन्दर बातें होती हैं– भगवान हृदय से ही जागृत होकर बातें करते हैं, बाहर आती आवाज नहीं– दूसरे लोग उसे नहीं सुन पाते। गुरु महाराज बताया करते थे, ‘‘हो, भगवान ने हमको आगरा में पतित होने से बचा लिया, देहरादून में उन्होंने कहा– ‘यहाँ रुको।’ उज्जैन में उन्होंने कहा– ‘तुम्हारे जैसा गुरु और चेला संसार में आज कोई नहीं है। तुम किस जत्थे में शामिल होने जा रहे हो?’ यहाँ यह कहा, वहाँ वह कहा।’’ कई दिन हमने ऐसा सुना तो पूछा, ‘‘गुरु महाराज! क्या भगवान भी बातें करते हैं?’’ वह बोले, ‘‘हाँ हो, भगवान ऐसे ही बतियावा करत हैं जैसे हम तुम बैठ के बतियाईं। घण्टों बतियाईं और क्रम न टूटे। सारे भरोसे छोड़कर उनमें डूबकर चिन्तन में लगने पर यह अवस्था सबके लिए सुलभ है।’’

यह सुनकर हम उदास हो गये। भजन तो जैसा बताया जायेगा, हम जैसे-तैसे कर ही लेंगे लेकिन बातें करने के लिये हम भगवान को कहाँ पायेंगे? लगभग पन्द्रह मिनट पश्चात् महाराज जी बोले, ‘‘काहे घबड़ात है, तोहूँ से बतियैहैं।’’ आश्वासन मिला, ढाढ़स भी बँधा लेकिन भूखा तो तभी संतोष करता है जब पेट में पाव आध सेर भोजन जाय। ठीक ढाई महीने पश्चात् वही जागृति मिल गयी। भगवान के द्वारा बातों का सिलसिला आरम्भ हो गया। हमने सोचा, यह हमें कोई बीमारी तो नहीं हो गयी? हमने महाराज जी से बताया कि सम्पूर्ण शरीर आधे-आधे इञ्च पर जोरों से फड़कता है। महाराजजी बोले, ‘‘बस बेटा, राम-रावण का युद्ध शुरू हो गया। अब रावण मारा जायेगा, राम का राज्याभिषेक होगा, तभी इससे छुटकारा मिलेगा, बीच में कोई विराम नहीं है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई शुरू हो गयी है, भजन जागृत हो गया है। बेटा! अब भगवान तोके कहै-सुनै लगे।’’ वास्तव में,

तुलसिदास बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै। (विनयपत्रिका, ८९)

यह अयुक्त मन तभी वश में होता है जब प्रेरक के रूप में स्वयं प्रभु रोकथाम करने लगें, मार्गदर्शन करने लगें। यही भजन की जागृति है।

तन तंत्री के ही तारों से, अनुराग राग बज जाते हैं।

आवाज सुनाई देती है, दिखलायी पड़ता साज नहीं।।

मोहन अरु मोहन मस्तों के…….

तन एक तंत्र है जिसमें आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ तन के तंत्र हैं। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार अन्त:करण के तंत्र हैं। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार से प्रभु में लगन लग गयी, इन्द्रियों ने बाहर झाँकना बन्द कर इष्ट की ओर देखना आरम्भ किया, बस इष्ट से तार जुड़ गया। अनुराग का राग बजने लगता है। यह एक ऐसी अवस्था है कि बहुत से गीत ऐसे हैं जो गाये नहीं जाते– गीत लगातार चलता रहता है, रिनक धिनक धुनिउठती रहती है। वही साधारण नाम बैखरी से मध्यमा, मध्यमा से पश्यन्ती और पश्यन्ती से जहाँ परा में प्रवेश किया तो एक धुन सुनाई पड़ने लगती है। वह ईश्वरीय गायन है। उसी को सामवेद भी कहते हैं; क्योंकि वह परमात्मा में समत्व दिलानेवाला गायन है। अन्त में साधक कहता है–

बनाना चाहता हूँ स्वर्ग तक सोपान सपनों का।

मैं स्वर्ग तक सपनों की सीढ़ियाँ लगाना चाहता हूँ। सपने की सीढ़ियों से आप कैसे चढ़ेंगे? संसार एक स्वप्न है–

उमा कहउँ मैं अनुभव अपना।

सत हरिभजनु जगत सब सपना।। (रामचरितमानस, ३/३८/५)

हे पार्वती! मैं अपना निजी अनुभव कहता हूँ कि सत्य हरि और हरि का भजन है। जगत् तो एक सपना है। एक सपना घड़ी-दो घड़ी का होता है जबकि यह सपना ७०–८० साल का है। और क्या है? अंत में सबकुछ यहीं छोड़कर जाना होता है। फिर कोई लौटकर यह परिवार, इन अर्जित मर्यादाओं को देखने नहीं आता। अगले जन्म में दूसरे ही माता-पिता, दूसरा ही परिवार और दूसरी ही प्रतिष्ठायें! इस प्रकार जगत् है तो एक स्वप्न, फिर भी इसी स्वप्न से मैं स्वर्ग का सोपान बनाना चाहता हूँ। वास्तव में ईश्वर-पथ की, भजन-पथ की सात भूमिकायें हैं। पहली है शुभेच्छा– शुभ के लिए इच्छा। दूसरा सोपान है सुविचारणा– उसी के लिये विचार-मंथन, चिन्तन। तीसरी सीढ़ी है तनुमानसी– साधक पहले वाह्य जगत् का चिन्तन कर रहा होता है, धीरे-धीरे जब चिन्तन पकड़ में आ जाता है तो वह बाहर से सिमटते-सिमटते मन में ही तनवाला हो जाता है। चिन्तन मन से होने लगता है। चौथी सीढ़ी है सत्त्वापत्ति– सत्य का पक्ष सुदृढ़ होता जाता है। पाँचवाँ सोपान असंसक्ति है अर्थात् वाह्य पदार्थों में आसक्ति नहीं रह जाती, संग-दोष से अलग रहना। छठीं भूमिका है पदार्थभावना– पदार्थ अर्थात् संसार का अभाव।

सरगु नरकु अपबरगु समाना।

जहँ तहँ देख धरे धनुबाना।। (रामचरितमानस, २/१३०/७)

न स्वर्ग स्वर्ग के रूप में रह गया जिसकी कामना करें, न नरक नरक के रूप में रह गया कि जिससे भयभीत हों। जहाँ भी दृष्टि पड़ी, आराध्य देव को उपस्थित पाया– जहँ तहँ देख धरे धनु बाना, ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्चित् जगत्यां जगत्– जगत् में जो कुछ भी है, सबमें ईश्वर का निवास पाया। सातवीं सीढ़ी है तुर्यगा! मन वेगवान है इसलिए पूर्व मनीषियों ने इसे अश्व की संज्ञा दी है। साधना की सातवीं कक्षा में पहुँचने पर मनरूपी अश्व पर सवार होने की क्षमता आ जाती है। अब जिधर हम चाहें मन को उधर ही लगा सकते हैं। अब मन हमें नहीं भगायेगा। इस अवस्था को पार करने पर स्थिति मिल जाती है। स्वप्नवत् संसार में योग की ये सात क्रमोन्नत भूमिकायें हैं, सोपान हैं। यह सोपान बनाना सभी चाहते हैं, ईश्वर-पथ में लगे हैं तो यह अवस्था भी आयेगी, स्वर में विचरण करने की अवस्था आयेगी, प्रकृति पुरुषोत्तम में परिवर्तित हो जायेगी किन्तु इस पथ पर क्रम-क्रम से चलना पड़ता है; क्योंकि,

मगर चादर से ज्यादा पाँव फैलाये नहीं जाते,

कि फैलाये नहीं जाते।

शरीर को ढँकने के लिए उतना ही पाँव फैलाना उचित है जितनी लम्बी चद्दर है। शीतकाल में कभी-कभी सवारी साधन न मिल पाने से यात्रीगण रेलवे स्टेशनों पर फँस जाते हैं। वे छोटा-सा रूमाल कभी कान में बाँधते हैं तो उसे कभी शिर पर लपेटते हैं। कुछ बड़ा गमछा है तो वे कभी लेटकर उसे पाँव में दबाते हैं तो कभी उसे शिर के नीचे दबाते हैं। उतना ही पैर फैलाना होता है, जितनी लम्बी चद्दर है; बाहर पाँव निकाले ही नहीं जा सकते।

बादशाह अकबर के पास एक बुनकर अच्छा-सा ऊनी चद्दर लेकर पहुँचा। चद्दर बादशाह को पसन्द आ गयी, यद्यपि वह बादशाह की लम्बाई से कुछ छोटी थी। अकबर ने कहा, ‘‘यह चद्दर हमें बहुत पसन्द है। हमें ठण्ड लग रही है। हम लेटकर इसे ओढ़ना चाहते हैं। हमें इसे उढ़ाओ।’’ मंत्रियों ने प्रयास किया किन्तु चद्दर छोटी होने के कारण कभी बादशाह का सिर तो कभी पैर खुला ही रह जाता था। बादशाह को क्रोध आ गया, ‘‘तुमलोग खाक मंत्री हो, बीरबल होता तो आज यह कष्ट न झेलना पड़ता।’’

मंत्री मुस्कराये कि जब चादर ही छोटी है तो इसमें भला बीरबल ही क्या कर लेगा? बादशाह ने आदेश दिया कि बीरबल को बुलाया जाय। मंत्रियों ने ही षड्यन्त्र कर उसे दरबार में आने पर प्रतिबंध लगवाया था, जबकि अकबर को बीरबल के बिना चैन ही नहीं मिलता था। बीरबल को बुलाया गया। बादशाह बोले, ‘‘बीरबल! हमें ठण्ड लग रही है। यह चद्दर हमें पसन्द है। इसे हमें शीघ्र उढ़ाओ।’’ बीरबल बोला, ‘‘जहाँपनाह! इसे शिर के नीचे दबाकर, मुँह में दबाकर रखिये, छोड़ियेगा नहीं।’’ उसने बादशाह के दोनों पाँव मोड़कर चद्दर के भीतर दबा दिया, शरीर को चारों तरफ से ढँक दिया। बादशाह ने कहा, ‘‘यह क्या गुस्ताखी करते हो?’’ बीरबल बोला, ‘‘उतना पाँव पसारिये, जितनी लम्बी सौर। जब ठण्ड लग रही है और यह चादर ही केवल एक सहारा है तो आपको यह करना ही होगा हुजूर!’’ मसला हल हो गया।

साधन में छलाँग मारकर स्वर्ग के सोपान तक आप नहीं पहुँच सकते। यदि आप क्रम-क्रम से चलेंगे तो शनै:-शनै: प्रकृति का दबाव कम होता जायेगा। ज्यों ज्यों दैवी चिन्तन ऊपर उठेगा, दैवी सम्पद् प्रवाहित होती जायेगी और परमदेव परमात्मा का आलोक मिल जायेगा। मगर चादर से ज्यादा पाँच फैलाये नहीं जाते…..फैलाये नहीं जाते।

भजन की एक अलग मस्ती होती है। उसके लिए अभी कोई शब्द बना ही नहीं है।

चरण कमल की मौज को, कहुँ कैसे अनुमान।

कहबे को शोभा नहीं, देखा ही परमान।।

संत कबीर कहते हैं कि भगवान के चरण कमल के ध्यान में जो मौज-मस्ती है, उसका कोई कैसे अनुमान लगा सकता है और कैसे उसे व्यक्त किया जा सकता है? कहने में उसका सौन्दर्य नहीं रह जाता। उसे तो देखना ही प्रमाण है। उसके लिये तो क्रमश: चलें, उस अवस्था को प्रत्यक्ष करें। वह वाणी का विषय नहीं है।

बहुत उत्तर भी ऐसे हैं जो बतलाये नहीं जाते,

जो बतलाये नहीं जाते।

भगवत्पथ में कुछ दूरी तक महापुरुष बताते हैं। अधिकांश अनुभवगम्य हैं। उसे भगवान ही प्रेरणा के द्वारा समझा दिया करते हैं, वाणी से नहीं बताते। अनेकों प्रश्न ऐसे हैं जो दुहराये नहीं जाते….जो दुहराये नहीं जाते।सांसारिक जीवन में भी ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं कि जिनका समाधान नहीं मिलता। माता कुन्ती ने कुतूहलवश महर्षि दुर्वासा के दिये हुए आशीर्वाद, मन्त्र का जप कर दिया। सूर्य चले आये। एक बालक गोद में डाल दिया। कुन्ती ने प्रार्थना की, ‘‘यह मुझे नहीं चाहिए। मैं कुमारी हूँ, समाज क्या कहेगा?’’ सूर्य ने कहा, ‘‘मैं मंत्र से बँधा हूँ। पुत्र तो तुम्हें लेना ही होगा। तुम्हारा कौमार्य सुरक्षित है। देवी! यह बालक महान पराक्रमी होगा।’’ फिर भी लोक-लज्जा एक बहुत बड़ी मर्यादा है। उस नवजात शिशु को गंगा में बहाना पड़ा।

विद्याध्ययन के उपरान्त कौरव-पाण्डव राजकुमारों की प्रतियोगिता में कर्ण ने अर्जुन के कौशल को चुनौती दी। कुन्ती ने अपने प्रथम पुत्र कर्ण को पहचान लिया। दर्शक-दीर्घा में ही वह मूर्च्छित हो गयी। महाभारत-युद्ध के दौरान वह एक बार कर्ण के पास गयी, उससे कुछ माँगा भी, किन्तु पाण्डव कर्ण की वास्तविकता से परिचित नहीं थे।

जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया, दिवंगत स्वजनों को युधिष्ठिर जलाञ्जलि देने लगे तो कुन्ती का धैर्य छूट गया। वह बोली, ‘‘बेटा युधिष्ठिर! कर्ण को भी जलाञ्जलि दो।’’ युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘माताजी! उस सूतपुत्र को भला मैं क्यों जलाञ्जलि दूँ?’’ कुन्ती ने वह वृत्तान्त आद्योपान्त कह सुनाया…मंत्र, मंत्र का प्रभाव, सूर्य से कर्ण का जन्म….। युधिष्ठिर मूर्च्छित हो चले, ‘‘उफ! आपने इतना बड़ा सत्य छिपा लिया। भाई के द्वारा भाई को मरवा डाला।’’ कुन्ती ने कहा, ‘‘बेटा! लोकलज्जा। भूल हो गयी, घटना घट गयी, उसे फिर दुहराकर सुधारा नहीं जा सकता।’’ देवी कुन्ती का प्रश्न ऐसा ही था। उस व्यथा से वह जीवनपर्यन्त तड़पती रही, घुटती रही किन्तु उसे अपना कोई समाधान नहीं मिला। इसी प्रकार अध्यात्म में साधना भी ऐसा ही एक प्रश्न है। इसमें आपसे दो कदम चलते बन गया तो आगे तीसरा ही पड़ेगा। आपका मोक्ष तो नहीं हुआ किन्तु मोक्ष का आरक्षण भली प्रकार हो गया। इसके पश्चात् माया में ऐसा कोई पराक्रम नहीं है, माया चाहकर भी आपको इस पथ से लौटा नहीं सकती, अपने में मिला नहीं सकती।

।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-6’ से उद्धृत)

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