प्रश्न- महाराजजी! अमृत का प्रभाव है कि जिसके ऊपर पड़ जाय, जिला दे किन्तु युद्ध की समाप्ति में अमृत-वर्षा से बानर-भालू तो जी उठे लेकिन निशाचरों पर उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा, क्या कारण है? जैसा कि-
सुधा बृष्टि भै दुहु दल ऊपर।
जिए भालु कपि नहिं रजनीचर।। (मानस, 6/113/6)
उत्तर- जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि मानस अन्तःकरण की लड़ाई है। अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ दैवी सम्पद् एवं आसुरी सम्पद् सब में हैं परन्तु उनकी जानकारी सबको नहीं है। किसी विरले प्रयत्नशील, पुण्यात्मा के हृदय में यह आत्मा प्रत्यक्ष होकर कार्य करने लगती है, तब दोनों प्रवृत्तियों का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। इनको केवल वाचिक निर्णय से ही हम नहीं पकड़ सकते। शब्द-संकेतों से तो केवल भगवत्-पथ की दिशा ही मिलती है। दैवी सम्पद्-आसुरी सम्पद्, विद्या-अविद्या, सजातीय-विजातीय आदि के रूप में महापुरुषों ने इन दोनों प्रवृत्तियों का नामकरण किया है। जैसा कि- ‘विद्या हि का ब्रह्मगति प्रदाया।’ अर्थात् विद्या उसे कहते हैं जो ब्रह्मगति को प्रदान कर दे। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का पारस्परिक संघर्ष ही राम-रावण युद्ध है, जिसमें मोहरूपी रावण, क्रोधरूपी कुम्भकरण, कामरूपी मेघनाद, लोभरूपी नारान्तक, प्रकृतिरूपी सूर्पणखा आदि आसुरी प्रवृत्तियाँ जब कार्यरूप ले लेती हैं तो इनकी संख्या अनन्त हो जाती है। उदाहरण के लिए, सबके मर जाने पर जब रावण युद्ध के लिए चला तो उसने अनन्त सेना का निर्माण कर लिया। तात्पर्य यह है कि यदि अविद्या का एक भी सदस्य जीवित है तो उसी का प्रसार हो जाता है।
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। (मानस, 7/120/9)
यह मोहरूपी रावण सकल व्याधियों का मूल होने से राजा है। दसों इन्द्रियों के मुख अपने-अपने विषयों की ओर खुले हैं इसलिए दशानन कहलाता है। जब विषयों से इन्द्रियों का निरोध हो जाय तो मोह का स्वरूप मिट जायेगा, जो सम्पूर्ण आसुरी सम्पत्ति को चलाता है।
दसों इन्द्रियों का दमन ही दशरथ है, जो दैवी सम्पत्ति को जन्म देता है। जिस समय भक्तिरूपी कौशल्या, कर्मरूपी कैकेयी, सुमतिरूपी सुमित्रा और साथ ही कुमतिरूपी मन्थरा (भगवत्-पथ की आधी दूरी तक चलनेवाला कुतर्क) आदि दैवी प्रवृत्तियों का जागरण हमारे हृदय में हो जाय, उसी समय विज्ञानरूपी राम, विवेकरूपी लक्ष्मण, भावरूपी भरत और सत्संगरूपी शत्रुघ्न आदि प्रगट हो जाते हैं। विश्वासरूपी विश्वामित्र एवं श्वास-प्रश्वास का जप ही शृंगी ऋषि हैं। मोह के पूर्णतया मिट जाने पर ही यह दैवी सम्पत्ति स्वस्थ होती है।
अमृत कोई तरल पदार्थ नहीं है कि उठाकर पी लिया जाय। ‘रस पीयूषा’ (मानस, 6/25/6)- अंगद कहते हैं कि रे बुद्धिहीन रावण! अमृत क्या कोई रस है? मृत कहते हैं नाशवान् या मरणधर्मा को और अमृत कहते हैं अविनाशी को। महापुरुषों के शब्दों में अमृत की स्थिति आत्मा व परमात्मा का एकताकाल है। इस एकताकाल में परमात्मा के अजर, अमर, शाश्वत, एकरस इत्यादि गुणधर्म आत्मा में प्रसारित होने लगते हैं। अतः मनीषियों ने आत्मा की इस अवस्थाकाल को अमृत अर्थात् मृत्यु से परे बताया है; किन्तु मोहजनित विकारों के रहते हुए आत्मा परमात्मा में स्थित नहीं होता। इस गुणवाला यह अमृत निशाचरों की जड़ रावण के मिट जाने पर ही मिला। मोह के सह-अस्तित्व विलय होने पर चिदाकाश से मायिक स्फुरण व तरंग शान्त हो जाती है। ऐसे निर्दोष चित्त में ही अमृत-संचार सम्भव है। यही कारण है कि विकारों के निर्लिप्त होते ही अमृत-तत्त्व का संचार हुआ जिसके परिणामस्वरूप अविद्या, आसुरी सम्पद् सदा के लिए विलीन हो गई एवं आत्मा की स्थिति दिलानेवाली विद्या (दैवी सम्पद्) अंशोंसहित विकसित हो गई। अधोगति में ले जानेवाली प्रवृत्ति का एक भी सदस्य जीवित है तो अमृत कैसा? वस्तुतः तत्त्व का संचार होने पर मृत्यु के कारण सदा के लिए मिट जाते हैं। पुनः अमृत का महत्त्व बताते हुए गोस्वामीजी कहते हैं-
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा।
मुएँ करइ का सुधा तड़ागा।। (मानस, 1/260/2)
यदि वारि के बिना शरीर चला गया तो मरने के बाद अमृत का कोई उपयोग नहीं है।
राम भगति जल मम मन मीना।
किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।। (मानस, 7/110/9)
राम की अभेद्य भक्ति ही जल है, जिसमें कि हे मुनीश्वर! मेरा मन मछली हो गया है। भला वह विलग कैसे हो सकता है? भक्तिरूपी जल के द्वारा ही वह अमृत-तत्त्व प्रत्यक्ष होता है। यदि जीते-जी भक्तिरूपी रस न प्राप्त कर सके तो मरने के बाद उस अमृत का कोई उपयोग नहीं है। कोई अनुभवी सद्गुरु रथी बन जाय तो भवरोग के लिए वैद्य और पार कर देने के लिए कर्णधार होगा। उसकी असीम कृपा के द्वारा ही अमृत-तत्त्व की उपलब्धि सम्भव है।
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