अवतरण-विधि

अवतरणविधि

प्रश्न- महाराजजी! आपने बताया कि अवतार किसी योगी के हृदय में ही होता है; किन्तु मानस में पृथ्वी ब्रह्मा के पास गयी तब भगवान का अवतार हुआ। कृपया मानस के आधार पर बतायें कि अवतार किस प्रकार होता है?

उत्तर- देखिये, मानस में भी वही है जो गीता में है। एक समय पृथ्वी पर निशाचरों की वृद्वि होने लगी। खल, चोर, लम्पट, लोभी, जुआरी इतने बढ़ गये कि पृथ्वी अकुलाने लगी। परम सभीत धरा अकुलानी।’ (मानस, 1/183/4)- परम भयभीत होकर धरती उससे मुक्ति पाने के लिए छटपटाने लगी। पहले वह गाय का रूप धारणकर देवताओं के पास गयी। देवताओं और मुनियों ने कहा कि हम सहायता अवश्य करेंगे, किन्तु पूर्ण कल्याण करने की सामर्थ्य हममें नहीं है। ब्रह्मा के पास सभी गये। ब्रह्मा ने सब कुछ जान लिया कि ये क्यों आये हैं? इन्हें कितना कष्ट है? उन्होंने कहा, ‘‘देखो! हम कोई सीधा उपाय नहीं कर सकेंगे। तुम्हें युक्ति बताते हैं, तुम इस प्रकार भगवान की प्रार्थना करो, हम भी तुम्हारे साथ रहेंगे।’’ प्रार्थना की गयी तो भगवान की गगन वाणी से निर्देश मिला कि सभी देवता पृथ्वी पर उतर जायँ। पृथ्वी! तुम उसी तरह धैर्य के साथ मेरी प्रतीक्षा करो। हम तुम्हारा भार दूर कर देंगे। पूर्णतया मुक्ति दिला देंगे। बस इतनी ही तो बात है अवतरण की।

यह अवतरण-विधि विचारणीय है। क्या अमेरिका, इग्लैण्ड, भारत, जापान, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, समुद्र एवं पहाड़ों से घिरी यह पृथ्वी गाय का स्वरूप धारण करके गयी? नहीं, यह शरीर ही एक पृथ्वी है। कबीरदासजी कहते हैं-

धड़ धरती का एकै लेखा।

जो बाहर सो भीतर देखा।।

जो कुछ बाहर पृथ्वी पर दिखाई देता है, सब हृदय में देखने को मिला। विनयपत्रिका में गोस्वामीजी कहते हैं-

असन बसन पसु बस्तु बिबिध बिधि सब मनि महँ रह जैसे।

सरग, नरक, चर, अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे।। (वि0प0, 124)

बहुमूल्य मणि की कीमत में जिस प्रकार भोजन, वस्त्र, पशु और अनेक प्रकार की वस्तुएँ निहित हैं, ठीक इसी प्रकार स्वर्ग-नरक, चर-अचर अनेकानेक लोक मन के अन्तराल में छिपे हैं। बाहर तो मात्र मृत्युलोक है, भले ही उसका नाम हम भारत या अमेरिका रख लें; किन्तु मन के भीतर बहुत से लोक हैं, यहाँ तक कि परमतत्त्व परमात्मा का परमधाम भी इसी में निहित है। जिन महर्षियों ने इस मन का निरोध कर लिया, तत्क्षण उन्हें मन के अन्तराल में वह परमधाम भी मिला। इस प्रकार यह शरीर ही पृथ्वी है। छान्दोग्य उपनिषद्, अष्टम अध्याय के प्रथम खण्ड में वर्णन आता है कि जितना यह भौतिक आकाश है, उतना ही आकाश हृदय के अन्तर्गत है। द्युलोक और पृथ्वी दोनों लोक सम्यक् प्रकार से हृदय के भीतर ही स्थित हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु, सूर्य और चन्द्रमा, विद्युत और नक्षत्र तथा इस आत्मा का जो कुछ भी इस लोक में है और जो नहीं है, वह सभी सम्यक् प्रकार से हृदय में स्थित है।

इस शरीर के अन्तराल में दो प्रवृत्तियाँ हैं- एक दैवी सम्पद् और दूसरी आसुरी सम्पद्। एक सजातीय तथा दूसरी विजातीय। आसुरी सम्पद् अधोगति एवं नीच योनियों का सृजन करती है, तो दैवी सम्पद् परमकल्याण करनेवाली है एवं शाश्वत स्वरूपपर्यन्त दूरी तय कराती है। विनयपत्रिका में गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं,वपुष ब्रह्माण्ड सुप्रवृत्ति लंका’ (58)- यह शरीर ही सुव्यवस्थित ब्रह्माण्ड है जिसमें मायिक प्रवृत्ति ही लंका है। इसमें मोहरूपी रावण है, जो दशानन है। क्रोधरूपी कुम्भकर्ण, लोभरूपी नारान्तक, अहंकाररूपी अहिरावण, प्रकृतिरूपी सूर्पणखा इत्यादि आसुरी सम्पद् इस लंका में हैं। ये मोहरूपी प्रवृत्तियाँ अनन्त हैं। क्रोधरूपी कुम्भकर्ण, कामरूपी मेघनाद, लोभरूपी नारान्तक इत्यादि दुर्धर्ष योद्धाओं की समाप्ति के पश्चात् जब रावण दुर्ग से निकला तो वह भी अपार सेना लेकर निकला। सब तो मर गये थे फिर अपार कहाँ से आ गये? वस्तुतः मोह ही रावण है औरमोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहुसूला।।’ (मानस, 7/120/29) सम्पूर्ण भवरोग का मूल कारण मोह है। यदि मूल जीवित है तो उसमें शाखायें, डाल, तना, टहनियाँ, पत्ते सब कुछ विद्यमान रहते हैं। यदि मोह जीवित है तो सभी विकार उससे प्रस्फुटित हो जाते हैं। अतः मोह के रहते साधक यदि असावधान हुआ तो यह पनपकर साधक को अनन्त दिशाओं से आवृत्त कर लेता है। साधक अपने श्रेय-साधन से परावर्त हो जाता है- श्रृंगी को भृंगी करि डारी, पराशर के उदर विदार।’ भगवान से एक इंच की भी दूरी है, तब तक माया सफल हो जाती है।

रावण जब मर गया तो रहा कोउ कुल रोवनिहारा।’ (मानस, 6/103/10)- आसुरी सम्पत्ति सहअस्तित्व मिट गयी। मूलो नास्ति कुतो शाखा’– जब मूल ही कट गया तो बचेगा क्या? अब पत्ते, टहनियाँ, शाखायें झाड़ने की आवश्यकता नहीं है। वे तो स्वतः सूख जायेंगे। इस मोह के निर्जीव होते ही अमृत-तत्त्व का प्रस्फुटन होता है जहाँ मृत्यु का समावेश नहीं है। उस अमृत-तत्त्व के संचार में आसुरी प्रवृत्ति सदा-सदा के लिए शान्त हो जाती है तथा दैवी सम्पत्ति पूर्णतया विकसित हो उठती है-

सुधा वृष्टि भै दुहु दल ऊपर।

जिये भालु कपि नहिं रजनीचर।। (मानस, 6/113/6)

दूसरी ओर यह शरीर ही अवध है; क्योंकि इसमें अवध्य स्थिति का सूत्रपात होता है। इसके अन्तराल में दसों इन्द्रियों की निरोधमयी प्रवृत्ति ही दशरथ है-

राम नाम सब कोई कहै, दशरथ कहै कोय।

एक बार दशरथ कहै, कोटि यज्ञ फल होय।।

राम-नाम सभी कहते हैं, दशरथ कोई नहीं कहता। यदि एक बार कोई दशरथ कह दे तो करोड़ों यज्ञ का फल होता है। फल तो इतना बड़ा, फिर भी दशरथ-दशरथ कोई नहीं जपता। सब राम-राम ही जपते हैं। जपना भी चाहिए। वस्तुतः दसों इन्द्रियों की निरोधमयी प्रवृत्ति ही दशरथ है। दसों इन्द्रियों को संयत करके ‘राम’ का उच्चारण ही तो शुद्ध जप है। निरोध के साथ जप में करोड़ों यज्ञों का फल निहित है, किन्तु इन्द्रियाँ विषयोन्मुख हैं और जिह्वा राम-राम रटती है तो उसका यथार्थ प्रभाव नहीं होता। परमकल्याण तो नहीं ही होता; हाँ, पुण्य-पुरुषार्थ अवश्य बढ़ता है जो कल्याण करनेवाला होता है। अतः दसों इन्द्रियों की निरोधमयी प्रवृत्ति ही दशरथ है। पहले तो यह मन उधर ही दौड़ता है जहँ तहँ इंद्रिन तान्यो’ (विनय0, 88/1); किन्तु जब दसों इन्द्रियों की लगाम रथी के हाथ आ जाती है तभी पुरुष दशरथ बन जाता है।

इस प्रकार इसी शरीर के अन्तराल में दसों इन्द्रियों की निरोधमयी प्रवृत्ति दशरथ है। इसी में भक्तिरूपी कौशल्या है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। इसके कोश में लव अर्थात् लगन दिलानेवाली कौशल्या है। कर्मरूपी कैकेयी, सुमतिरूपी सुमित्रा, कुमतिरूपी मन्थरा, विज्ञानरूपी राम, विवेकरूपी लक्ष्मण; इस प्रकार यह दैवी सम्पत्ति भी अनन्त है। ब्रह्म आचरणमयी प्रवृत्ति ही वानरी सेना है जिसमें अनुरागरूपी अंगद, वैराग्यरूपी हनुमान, सुरतिरूपी सुग्रीव, साधनरूपी जामवन्त इत्यादि असंख्य वानर हैं।

बानर कटक उमा मैं देखा।

सो मूरुख जो करन चह लेखा।। (मानस, 4/21/1)

भगवान शंकर कहते हैं- उमा! मैंने वानरी सेना देखी। वह मूर्ख है जो उसकी गणना करना चाहता है। अर्थात् वानरी सेना अगणित थी। इधर अगणित वानरी सेना; उधर रावण की अनगिनत निशाचरी सेना। युद्धस्थल लंका। आज कुल पाँच लाख की जनसंख्या है वहाँ! छठें या सातवें लाख के लिए भी स्थान नहीं है। भारतीयों को वहाँ नागरिकता नहीं मिल रही है; क्योंकि स्थानाभाव है। उस समय करोड़, नील, पद्म तथा महाशंख से भी अधिक असंख्य निशाचर और असंख्य वानरी सेना थी। कहाँ टिके थे वे सब? लड़ते कहाँ थे? खाते कहाँ थे? क्या घटनाएँ नहीं घटीं?

घटनाएँ घटित हुईं, इसमें सन्देह नहीं है। अन्यथा इतिहास न बनता, दृष्टान्त न बनते। बाह्य घटनाओं के माध्यम से महापुरुषों ने अन्तःकरण की घटनाओं को भी इंगित किया। इन घटनाओं के माध्यम से महापुरुषों ने कुशलतापूर्वक जीवनयापन करने का मर्यादित उदाहरण प्रस्तुत किया; किन्तु सदाचारपूर्वक जी लेने मात्र से ही हमारा परमकल्याण सम्भव नहीं है। इसलिए मनीषियों ने ऐतिहासिक कथानकों के माध्यम से परमकल्याण की क्रियाओं का, अन्तःकरण के संघर्ष का तथा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के युद्ध का भी पथ प्रशस्त किया। वास्तव में शरीर ही ब्रह्माण्ड है, पृथ्वी है। इसके अन्तराल में चर-अचर, अनन्त लोक और असंख्य शरीर विद्यमान हैं। यह असंख्य निशाचरी और वानरी सेना एवं नाना प्रकार के शरीर मन में ही हैं-

मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये। (विनयपत्रिका, 124/4)

इस प्रकार शरीर में दैवी एवं आसुरी दोनों प्रकार की प्रवृत्तियाँ हैं। आसुरी प्रवृत्तियों से एवं मोह के द्वन्द्व से आकुल होकर मनुष्य तीर्थों में जाता है। देवताओं और मुनियों की शरण में जाता है। ऐसी ही विकलता मनु को हुई थी-

हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरि भगति बिनु।। (मानस, 1/142)

हृदय ग्लानि से भर गया और मनु निकल पड़े देवताओं और मुनियों की शरण में। नैमिषारण्य पहुँचे। नियम ही नैमिषारण्य है। नियम करने कहीं जाना नहीं पड़ता। केवल धेनुमति तीरा’ (मानस, 1/142/5)- इन्द्रियों को बुद्धि के अधीन करना पड़ता है। इसी प्रकार यह शरीररूपी पृथ्वी भी गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी’ (रामचरित मानस, 1/183/7), देवी-देवताओं की शरण में जाती है, तीर्थों का आश्रय लेती है। तीर्थों से प्रेरणा मिलती है, पुण्य-पुरुषार्थ बढ़ता है; सहयोग भी मिलता है परन्तु उतने से परमकल्याण सम्भव नहीं होता। मुनियों से उपदेश मिलता है, पुण्य और बढ़ता है, भजन की विधा बढ़ती है फिर भी इतने से ही परम कल्याण नहीं हो जाता। तीर्थों ने, मुनियों ने सहयोग दिया और पृथ्वी के साथ ब्रह्मा तक गये।

अहंकार सिव बुद्धि अज, मन ससि चित्त महान। (मानस, 6/15 क)

ब्रह्मा अर्थात् ब्रह्मस्थित महापुरुष, जिनकी बुद्धि मात्र यंत्र है, जिनके माध्यम से परमात्मा ही प्रसारित होता है, ऐसे ही महापुरुषों की वाणी का संकलन वेद है। इसीलिए वेद अपौरुषेय हैं, क्योंकि उन महात्माओं की वाणी से अव्यक्त पुरुष मुखरित होता है।

तीर्थों एवं मुनियों के उपदेशजनित पुण्य से शरीर ब्रह्मस्थित सद्गुरु तक पहुँचता है। उन्होंने देखते ही जान लिया कि साधक किस स्तर का है। ऐसे महापुरुषों के पास जब तक केवल शरीर से आते-जाते हैं, कल्याण सम्भव नहीं है। इसके लिए तो मनसहित इन्द्रियों का सर्वतोभावेन समर्पण अपेक्षित है। ब्रह्मा ने कहा, ‘‘हमसे भी कल्याण नहीं होगा। मैं विधि बताता हूँ, तुम चिन्तन करो, मैं भी तुम्हारे साथ ही रहूँगा। तुम्हारा निश्चित कल्याण होगा।’’

सद्गुरु साथ देने लगे। जहाँ चिन्तन में प्रविष्ट हुए, आकाशवाणी हुई। इष्ट से आदेश मिला, ‘‘तुम्हारा निश्चित कल्याण होगा। पृथ्वी पर (शरीर में) देवताओं को उतारो।’’ साधक मनसहित इन्द्रियों के अन्तराल में दैवी सम्पत्ति को शनैः-शनैः अर्जित करता है। जब दैवी सम्पत्ति पूर्णरूप से परिपक्व हो जाती है तहाँ भक्तिरूपी कौशल्या (भग इति सः भगति। भग अर्थात् प्रकृति से उपराम करा देनेवाली प्रक्रिया-विशेष का नाम भक्ति है। उस भक्तिरूपी कौशल्या) की गोद में विज्ञानरूपी राम का आविर्भाव होता है।

रमन्ते योगिनो यस्मिन् रामः’– जिसमें योगी लोग रमण करते हैं, उसी का नाम है राम। योगी दिन-रात किसमें रमण करते हैं?

जद्यपि ब्रह्म अखण्ड अनन्ता।

अनुभव गम्य भजहिं जेहि सन्ता।। (मानस, 3/12/12)

योगी अनुभव में रमण करते हैं। अनुभव भव से अतीत एक जागृति है, विज्ञान है; जिसके द्वारा परमात्मा के निर्देश प्राप्त होते रहते हैं। वही राम हैं जो पहले संचालक, पथ-प्रदर्शक के रूप में आते हैं। विवेकरूपी लक्ष्मण, भावरूपी भरत, सत्संगरूपी शत्रुघ्न सभी एक दूसरे के पूरक हैं। प्रारम्भ में संकेत, इष्ट का निर्देश बहुत संक्षिप्त एवं क्षीण रहता है। राम बालक रहते हैं। क्रमशः उत्थान होते-होते वह योगरूपी जनकपुर में पहुँचते हैं। जनक वह है जिसने जना, जन्म दिया। सृष्टि में शरीरों का जन्म माता-पिता से होता है, किन्तु निज स्वरूप का दिग्दर्शन एवं जन्म योग से ही होता है। योग से स्वरूप की अनुभूति होती है इसलिए वह जनक है। योगरूपी जनकपुर- जनक एकवचन है किन्तु यहाँ जनकपुर है; क्योंकि एकमात्र योग से ही अनन्त आत्माओं ने अपना स्वरूप पाया है और भविष्य में भी योग ही माध्यम है। योग का आश्रय पाकर राम शक्ति से संयुक्त हो जाते हैं, आसुरी प्रवृत्तियों का शमन करके सर्वव्यापक हो जाते हैं और फिर रामराज्य की स्थिति चराचर पर छा जाती है। योग की पकड़ आते ही अनुभव जागृत हो उठते हैं। जागृतिरूपी जयमाला मिलती है और अनुभवरूपी राम शक्तिरूपी सीता से संयुक्त हो जाते हैं। यह योग की प्रवेशिका है।

शनैः-शनैः राम शक्ति के साथ आगे बढ़ते हैं, व्यवधान आते हैं और जब मोह का समूल अन्त हो जाता है तो अमृतत्व की प्राप्ति हो जाती है, सुधावृष्टि होती है। अमृत कोई घोल पदार्थ नहीं है कि पानी की तरह वर्षा हो। अंगद ने रावण से कहा-

राम मनुज कस रे सठ बंगा।

धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।।

पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा।

अन्न दान अरु रस पीयूषा।। (मानस, 6/25/5-6)

बुद्धिहीन रावण! राम क्या मनुष्य हैं? गंगा क्या किसी नदी का नाम है? कामधेनु क्या किसी पशु का नाम है? काम क्या कोई धनुर्धर है? अमृत क्या कोई घोल पदार्थ है कि उठाकर पी लोगे या छिड़क दोगे? जब अमृत घोल पदार्थ नहीं है तो है क्या? वस्तुतः मृत नाशवान् को कहते हैं, जो मरणधर्मा हो। अमृत वह है जो अक्षय है, अक्षर है, शाश्वत है। परात्पर ब्रह्म ही अमृत है, जहाँ पहुँचकर यह मरणधर्मा मनुष्य पुनर्जन्म का अतिक्रमण कर जाता है।

उस अमृतत्व के संचार के साथ ही क्रमशः उत्थान करते-करते भक्त खो जाता है और राम ही शेष बचते हैं।

राम राज बैठें त्रैलोका।

हरषित भये गये सब सोका।। (मानस, 7/19/7)

उस अन्तःकरण में पूर्णरूपेण रामराज्य की स्थिति आ जाती है, जहाँ पर तीनों लोकों में भव-सम्बन्धी शोक-सन्ताप सदा के लिए मिट जाते हैं। तीनों लोकों में आवागमन का कोई स्थान नहीं रह जाता। उसके लिए सर्वत्र राममयी स्थिति आ जाती है। वह परमात्मा ही छा जाता है और उसी के अन्तराल में आत्मा लीन हो जाती है, द्रष्टा स्वरूप में स्थित हो जाता है। यही राम की पराकाष्ठा है और जहाँ से साधन प्रारम्भ होता है, उनका प्रगटीकरण होता है, वही अवतरण की निम्नतम सीमा है।

इस प्रकार अवतार किसी विरले योगी के हृदय की वस्तु है, न कि बाहर कहीं अवतार होता है। जिस पुरुष में वह अवतरित हो जाता है वह जीवात्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। उसके पश्चात् जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ सेवक सदा-सदा के लिए खो जाता है और स्वामी ही शेष बच रहता है, राममयी स्थिति ही शेष बचती है।

सरगु नरकु अपबरगु समाना।

जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। (मानस, 2/130/7)

न स्वर्ग स्वर्ग के रूप में और न नरक नरक के रूप में रह जाता है। जहाँ भी दृष्टि पडत़ी है, आराध्य देव का स्वरूप ही दिखाई पड़ता है। विलय के पश्चात् वह सत्ता अपने में ही दिखाई देती है। साईं सन्त अतीत’- अपने से भिन्न कोई सत्ता नहीं रह जाती। शाश्वत ही शेष बच रहता है। शरीर तो रहने का एक मकान मात्र रह जाता है। इसके पश्चात् महापुरुष जब तक संसार में रहता है, लोककल्याण के लिए ही उसका उपयोग है। स्वयं के लिए उसका कुछ भी उपयोग नहीं होता।

निर्विवाद है कि अवतार किसी विरले योगी के हृदय की वस्तु है। गीता में भी इसी अवतरण-प्रक्रिया का निरूपण है। बाहर पिण्ड-रूप में अवतार की खोज में भटकनेवाले भ्रम में हैं; क्योंकि अवतार दिव्य और अगोचर होता है। जो वस्तु मनसहित इन्द्रियों अथवा इन आँखों से दिखायी पड़े, वह माया है, अवतार नहीं-

गो गोचर जहँ लगि मन जाई।

सो सब माया जानेहु भाई।। (मानस, 3/14/3)

।। ओम् ।।

 (‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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