कोई अपने में देखा साँईं सन्त अतीत

कोई अपने में देखा साँईं सन्त अतीत

आपका, हमारा, मानवमात्र का आदि धर्मशास्त्र गीता है। जनसाधारण के बीच से इस गीता के विस्मृत हो जाने का दुष्परिणाम यह हुआ कि कभी के जगद्गुरु रहे भारत में कुरीतियाँ यहाँ तक पनपीं कि एक भगवान के स्थान पर अनगिनत भगवानों की पूजा होने लगी। तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की पूजा के नाम पर भगवान हो गये तैंतीस करोड़। इतने से भी काम निकलता न देख लोगों ने गढ़ लिये भूत–भवानी और चुड़ैल। ये भी हो गये तैंतीस करोड़! जिन दिनों यह गणना हुई थी, उस समय भारत की आबादी थी तैंतीस करोड़। पहले हर आदमी का एक भगवान, फिर एक-एक के माथे पड़ गये दो भगवान। एक भूत और एक भगवान। इससे भारत के श्रद्धालु विखण्डित होते गये, जबकि सृष्टि में एक है तो भगवान। एक ही है उन्हें प्राप्त करने की विधि। मन-क्रम–वचन से जो आप संसार में लगे हैं, उसी को सब ओर से समेटकर एक भगवान में लग जायँ–

एक रात का जोर लगावै, छूट जाय भरमासा।

कहत कबीर सुनो भाई साधो आछत अन्न उपासा।।

धोबिया जल बिच मरत पियासा।।

भगवान के भजन का एक ही परिणाम है– दर्शन, स्पर्श और सदा रहनेवाले अमृतमय पद में स्थिति! अमृतमय अनन्त जीवन! प्रभु का भजन करने के लिए साधन है नाम और रूप। दो-ढाई अक्षर का कोई भी छोटा-सा नाम, जो सीधे उन प्रभु का परिचायक हो, जैसे– ओम् या राम; उसका जप करें। जप तो हम आप कर लेंगे किन्तु प्रभु का रूप? भगवान का रूप तो देखा नहीं। आप ध्यान कैसे धरेंगे? मूर्ति तो पत्थर काटनेवालों ने बनायी है। कलाकार को जो रूप पसन्द आ जाता है वही उनकी कृतियों में भी उभरकर आता है। उन्होंने भी भगवान को नहीं देखा। माता पार्वती की जिज्ञासा पर भगवान शिव ने भगवान के रूप-स्वरूप पर प्रकाश डाला जो रामचरितमानस में विस्तार से द्रष्टव्य है। संक्षेप में कथा इस प्रकार है–

माता पार्वती पिछले जन्म में सती नाम से जानी जाती थीं। सती शरीर में उनसे भोलेनाथ की आज्ञा की किंचित् अवहेलना हो गयी थी। उन्होंने वह शरीर त्याग दिया। हिमाचल नरेश के यहाँ उनका पुनर्जन्म हुआ। पर्वत पर जन्म लिया इसलिए उनका नाम पार्वती पड़ा। कठोर तपस्या से उन्होंने भोलेनाथ को पुन: प्राप्त किया। कैलाश शिखर के पास मानसरोवर की तलहटी में भगवान शिव और माता पार्वती के आसन लग गये। पार्वतीजी ने एक प्रश्न कर दिया–

रामु सो अवध नृपति सुत सोई।

की अज अगुन अलख गति कोई।। (मानस, १/१०७/८)

राम कौन? क्या वही राजा के लड़के जो पत्नी खो जाने पर विकल होकर रो रहे थे, जो अज्ञानियों की तरह लताओं, वृक्षों, पत्तियों से, मृगों से, पक्षियों से, भ्रमरों से उनका पता पूछ रहे थे या वह कोई अविनाशी, अजन्मा, अलख पुरुष है? इतना सुनते ही भोलेनाथ बिगड़ पड़े– पार्वती! ऐसा अनर्गल प्रश्न तुमने किया कैसे?

कहहिं सुनहिं अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच।

पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच।। (मानस, १/११४)

ऐसा प्रश्न तो अधम नर ही कर सकते हैं। धम अर्थात् धर्म! अ माने नहीं! जो धर्म से अनभिज्ञ हैं, वे कर सकते हैं। जिन्हें मोहरूपी पिशाच ने ग्रस लिया है, वे कर सकते हैं।

बातुल भूत बिबस मतवारे।

ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।। (मानस, १/११४/७)

जिन्हें बात करने का भूत सवार है वे भी विचार कर नहीं बोलते। वे कुछ न कुछ बड़बड़ करते ही रहते हैं। इतना ही नहीं,

जिन्ह कृत महामोह मद पाना।

तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना।। (मानस, १/११४/८)

जिन्होंने मोहरूपी मदिरा का पान कर लिया है, उनके भी कथन पर ध्यान नहीं देना चाहिए। भोलेनाथ ने देखा, इतनी डाँट-फटकार का भी इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। यह प्रश्न इनका है भी कि नहीं? तब उन्होंने ध्यान धर कर देखा। दो घड़ी पश्चात् उन्होंने ध्यान से चित्त को बाहर किया। बहुत प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने कहा–

राम कृपा ते पारबति, सपनेहुँ तव मन माहिं।

सोक मोह संदेह भ्रम, मम विचार कछु नाहिं।। (मानस, १/११२)

हे पार्वती! मैं समझता हूँ कि भगवान की कृपा से तुम्हारे अन्दर न शोक है, न मोह है, न संदेह है और न भ्रम ही है। यह प्रश्न तुम्हारा है ही नहीं, किन्तु यह समाज का प्रश्न अवश्य है। तुमने जो प्रश्न किया है, लोकहित के लिए किया है। इसलिए सुनो कि राम कौन हैं?–

आदि अंत कोउ जासु न पावा।

मति अनुमानि निगम अस गावा।। (मानस, १/११७/४)

परमात्मा जन्मा कब? वह जियेगा कब तक? उसका आदि और अन्त आज तक कोई नहीं पा सका, किन्तु अपने अनुमान से वेदों ने इस प्रकार गायन किया है कि भगवान कैसे हैं?

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।

कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।

आनन रहित सकल रस भोगी।

बिनु बानी बकता बड़ जोगी।। (मानस, १/११७/५-६)

वह बिना पैर के ही सर्वत्र चल रहा है, बिना हाथों के सर्वत्र कार्य कर रहा है, बिना मुँह के सभी रसों का भोक्ता है, जुबान है ही नहीं फिर भी वह प्रवक्ता है, बहुत बड़ा योगी है।

तन बिनु परस नयन बिनु देखा।

ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा।।

असि सब भाँति अलौकिक करनी।

महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।। (मानस, १/११७/७-८)

वह बिना शरीर के सबका स्पर्श करता है, नाक के बिना भी सूँघ लेता है, सभी गंधों को ग्रहण करता है। लोक में जो भी घटित होता है, उसमें भी अलग विधियों से उसके कृत्य अलौकिक हैं जिसकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता।

जेहि इमि गावहिं बेद बुध, जाहि धरहिं मुनि ध्यान।

सो दसरथ सुत भगत हित, कोसलपति भगवान।। (मानस, १/११८)

जिसको वेद और प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष इस प्रकार गायन करते हैं, वे हैं दशरथ के पुत्र! वही हैं भक्तों के हितैषी! वही हैं कोशलपति भगवान! कोश कहते हैं खजाने को, सम्पत्ति को। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। वही आपका निज धन है। यह धन एक बार मिल गया तो आपका निश्चित रूप से कल्याण करके ही दम लेता है। उस कोष के मालिक हैं भगवान। वेद और प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष कहते हैं कि भगवान बिना पैरों के चलता है, बिना शरीर के स्पर्श कर लेता है, बिना आँखों के देखता है। बुलाओ फोटोग्राफर और कहो कि उसका चित्र खींचे! कलाकार उसका चित्र बनाये! बनाओ न ऐसी मूर्ति जो बिना शरीर का हो!

जाहि धरहिं मुनि ध्यान– किन्तु मुनि लोग ऐसे ही भगवान का ध्यान धरते हैं। देखा है नहीं, दिखाई पड़ना भी नहीं, पता नहीं ध्यान कैसे धर लेंगे? वास्तव में रामायण में ध्यान की विधि का वर्णन स्थान-स्थान पर है।

बालक रूप राम कर ध्याना।

कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना।। (मानस, ७/११२/७)

गुरु महाराज कहा करते थे कि पाँच साल का लड़का और स्वरूप में स्थित परमहंस एक-जैसे होते हैं। महापुरुष के शरीर की आकृति मात्र बड़ी है किन्तु मन:स्थिति एक बालक-जैसी है। क्या उस पाँच वर्ष के बच्चे में आप काम-क्रोध-लोभ-मोह या राग-द्वेष की कल्पना कर सकते हैं, ऐसा उसमें होता है? नहीं न! बस ऐसे ही महापुरुष का शरीर भर बड़ा है, वह बालक ही हैं।

रामचरितमानस का प्रसंग है। श्रीरामचन्द्रजी भाइयों सहित एक उपवन में विराजमान थे। उसी समय वहाँ सनकादिक (सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन) पधारे–

ब्रह्मानंद सदा लयलीना।

देखत बालक बहुकालीना।। (मानस, ७/३१/४)

इन चारों ऋषियों का जन्म सृष्टि के आदि में हुआ था। ये नारद से भी श्रेष्ठ थे। बहुत काल का होने पर भी उनकी मन:स्थिति बालकों-जैसी थी। महापुरुष वही है जिसने बालकों-जैसी अवस्था प्राप्त कर ली हो। चित्तवृत्ति का निरोध ही नहीं, विलय हो गया हो। यह होते हैं सद्गुरु! इनके स्वरूप का ध्यान करें।

रामचरितमानस के आरम्भ में ही ग्रन्थकार ने बताया कि यह कृति हमारी समझ में कब आयेगी? इसे पढ़ने का तरीका क्या है? वह बताते हैं–

श्रीगुर पद नख मनिगन जोती।

सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती।। (मानस, १/१/५)

गुरु महाराज के चरणों के नाखून की ज्योति मणि-माणिक्य के तुल्य है। इस पद नख का स्मरण करने से हृदय में दिव्यदृष्टि का संचार हो जाता है। इस प्रकार से होता क्या है?–

दलन मोह तम सो सप्रकासू।

बड़ें भाग उर आवइ जासू।। (मानस, १/१/६)

वह प्रकाश मोह से उत्पन्न अंधकार को समाप्त कर देता है। संसार में वह लोग भाग्यशाली हैं जिनके हृदय में गुरु के चरण आ गये हों। मान लें, किसी ने प्रयास किया, अभ्यास किया और सद्गुरु के चरण अपने हृदय में ले ही आया तो उससे लाभ क्या है? अपने ध्यान में गुरु का चरण उतार ही लिया तो उससे लाभ क्या है? इस पर वह कहते हैं–

उघरहिं बिमल विलोचन ही के।

मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।

सूझहिं राम चरित मनि मानिक।

गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।। (मानस, १/१/७-८)

चरण हृदय में आते ही हृदय के निर्मल नेत्र खुल जायेंगे, आवागमन = जन्म-मृत्यु का दोष और दु:ख मिट जायेगा। रामचरितमानस के प्रति सूझ पैदा हो जायेगी कि आखिर इसमें लिखा क्या है? गुपुत– जो लिखने में नहीं आ सका (हर बात लिखने में नहीं आती। सब कुछ लिखने के बाद तुलसीदासजी ने अन्त में आत्म-निवेदन किया है कि मैं उतना ही लिख पाया हूँ जितना अपने पुरुषार्थ से आकाश की माप करने निकली मक्खी कुछ दूर ही उड़कर गिर पड़े, इसीलिए गुप्त), प्रकट– जो लिखने में आया अथवा जो जेहि खानिक– उस परब्रह्म परमात्मा की खान में, उसके अन्तराल में जो भी रहस्य छिपे हैं, वह भी विदित हो जायेगा। कब? सद्गुरु के चरण हृदय में आ जायँ तब। मानस के मंगलाचरण में ही वह प्रार्थना करते हैं–

बन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।

यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्र: सर्वत्र वन्द्यते।। (मानस, बालकाण्ड, मंगलाचरण, श्लोक २)

मैं बोधमय, नित्य (अनित्य माने नश्वर, नित्य माने शाश्वत) बोधस्वरूप सद्गुरु की वन्दना करता हूँ। उनके आश्रित हो जाने से टेढ़ा चन्द्रमा भी सीधा, परम कल्याणकारी फल देनेवाला होता है।

मन ससि चित्त महान। (मानस, ६/१५)– मन ही चन्द्रमा है। ईश्वरीय आलोक जब फूटता है तो इसी मन में प्रकट होता है, प्रसारित होता है। मन ही चन्द्रमा है किन्तु चन्द्रमा, मन बड़ा टेढ़ा है। यह राग में, द्वेष में, पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकता ही रहता है। विकृत वासनाओं में आकण्ठ डूबा हुआ यह मन सीधा और परम कल्याणकारी फल देनेवाला हो जाता है जब यह सद्गुरु के आश्रित हो जाता है। सद्गुरु ही शंकर हैं। सद्गुरु एक साँचा है जिसके अनुरूप ढलते ही जो गुरुत्व सद्गुरु में है, शिष्य में भी आ जाता है। गुरु भी वह जो बालवत् हों। यह नहीं कि तुम गुरु हम चेला।और दोऊ नरक में ठेलम ठेला।गुरु एक क्वालिटी है, गुरु एक स्थिति है। कोई विरला लगनशील विरही साधक ही साधन कर गुरु-स्तर तक पहुँच पाता है। आजकल लोक-व्यवहार में दसियों हजार गुरु प्रतिदिन बनते-बिगड़ते रहते हैं। पण्डित के घर में किसी का जन्म हो गया तो लोग कहते हैं– का गुरु! पण्डा के घर में भी ‘का गुरु’। हाँ, जन्म-जन्मान्तरों का आपका पुण्य साथ दे तो सद्गुरु छप्पर फाड़कर मिल जाते हैं। सद्गुरु की प्राप्ति अनेक जन्मों के सुकृत का परिणाम है, वैसे उनकी प्राप्ति दुर्लभ है। आवागमन से निवृत्ति दिलानेवाले भजन की जागृति के लिए ध्यान सद्गुरु का ही करना होगा–

कबीर गुरु मुख चन्द्रमा, सेवक नयन चकोर।

आठ पहर निरखत रहे, गुरु चरनन की ओर।।

इसी आशय का एक भजन है–

कोई अपने में देखा।क्या देखा? साईं सन्त अतीत। पूरा पद इस प्रकार है–

कोई अपने में देखा, साईं सन्त अतीत।

कोई अपने में…….

साधन करे न जोग कमावै, जटा धरै न सीस।

संयम करे नहीं व्रत साधे, न मन इन्द्रिय जीत।।

कोई अपने में…….

आगे आगे राह देत हैं, पाछे राखें नीत।

ना हाँ कहे नहीं ना बोले, है दोउन के बीच।।

कोई अपने में…….

जाग्रत स्वप्न संग मा डोले, है सुषुप्ति से मीत।

तुरिया पद में आप विराजै, कर निश्चय परतीत।।

कोई अपने में…….

कह पुरुषोत्तमदास अबै लगि, बीत गई सो बीत।

सहज प्रकाश प्रकाशक सबका, कर सोहं से प्रीत।।

कोई अपने में…….

कोई अपने हृदय में देखने लगा। किसे? साँईअर्थात् मालिक को। संत अर्थात् जिसके संशयों का अन्त हो चुका हो। अतीतअर्थात् जो सत्-रज-तम – इस त्रिगुणमयी प्रकृति से अतीत हो गया हो, ऐसे महापुरुष को किसी ने अपने हृदय में देखा।

प्राय: लोग कहते हैं कि गुरु महाराज का स्वरूप हृदय में नहीं आता, लाख प्रयत्न करने पर भी नहीं आता। बात तो सही है। वस्तुत: साधना के आरम्भ में ही लोग सद्गुरु के स्वरूप को अपने हृदय में देखने की कामना करने लगते हैं, किन्तु ध्यान साधना का आरम्भ नहीं, परिणाम है। आश्रम से प्रकाशित एक पुस्तिका ‘अनछुए प्रश्न’ में ध्यान के सम्बन्ध में विस्तार से समझाने का प्रयास किया गया है। जैसा कि गीता अध्याय छ: में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि योगी एकान्त देश का सेवन करते हुए आशा और संग्रह का त्याग कर चित्त और इन्द्रियों को संयत करने के पश्चात् पवित्र स्थान पर स्थिर आसन से शरीर, शिर और ग्रीवा को एक सीध में रखते हुए मुझमें चित्त लगाये। अध्याय १८/५१-५५ में उन्होंने बताया कि साधक शब्दादिक विषयों के त्याग, एकान्त देश के सेवन, स्वल्पाहार, शरीर और इन्द्रियों के संयम के पालन, ध्यान द्वारा पराभक्ति को प्राप्त होता है। यहाँ भी ध्यान से पूर्व उन्होंने अनेक योग्यताओं का उल्लेख किया है। योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि भी यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार और धारणा के पश्चात् ही ध्यान का क्रम बताते हैं। युक्ताहार-विहार पर लोग विचार ही नहीं करते, सीधे ध्यान की बात करने लगते हैं।

सन्त सत्पुरुषों के पास जाने पर भी आपको अपने में देखना चाहिये कि आचरण में कुछ सुधार हो रहा है या नहीं? बुराइयाँ कम हो रही हैं या बढ़ रही हैं? अपने परिजनों, पास-पड़ोस, साथियों और समाज की समस्याओं को कम करने में आपका कितना योगदान है? क्या आप आयु में बड़ों का आदर और छोटों से स्नेह करते हैं? आपके रहन-सहन, खान-पान और पहनावे में कितनी सादगी है? सुख-सुविधा के साधन जीवन-यापन के लिये अनिवार्य हैं, आवश्यक हैं, आरामदायक हैं या विलासितापूर्ण हैं? इनके संग्रह की वृत्ति है या त्याग की? आपकी जीविका परिश्रम और ईमानदारी पर आधारित है या अन्याय, छल-कपट, विश्वासघात, चोरी-बेईमानी या हत्या-तुल्य मिलावटी नकली वस्तुओं के व्यापार से उपार्जित है? क्या आप मादक वस्तुओं का सेवन करते हैं? मनोरंजन के लिये नृत्य और गायन देखने-सुनने में कितनी अभिरुचि है? सुगन्धित वस्तुओं का कितना प्रयोग करते हैं? आपकी शय्या कितनी कोमल या कठोर है? कितना समय शरीर को सुख देने और कितना समय भगवान को दे पाते हैं? अपने स्तर के अनुसार नाम, रूप, लीला और धाम की साधना में आपका समय उत्तरोत्तर बढ़ रहा है या घटता जा रहा है? इस प्रकार अपने में देखते रहने से इन्द्रियों का दमन और मन का शमन होता जायेगा। आचरण में सुधार होते ही हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम की अभिवृद्धि होगी। एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर करें। भगवान यदि परम धाम हैं तो सद्गुरु उसमें प्रवेश का द्वार हैं। उनको अपने हृदय में देखने का अभ्यास करें। अभ्यास करते-करते यदि कोई उन्हें अपने हृदय में मिनट-दो मिनट देख ले गया तो साधक की साधनात्मक जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। यह दायित्व भगवान स्वयं ले लेते हैं।

साधन करे न जोग कमावै जटा धरै न सीस।

आप जो साधना कर रहे थे, जोग कमावै– योगाभ्यास द्वारा दैवी सम्पद् अर्जित कर रहे थे, जटा धरै न सीस– वेश-भूषा, साधुता की रहनी के प्रति सतर्क थे, जटा रखते थे, वेश था; सद्गुरु का स्वरूप हृदय में आते ही साधन करने, सावधानी बरतने या वेशभूषा इत्यादि की चिन्ता करने की आपकी जिम्मेदारी समाप्त हो गयी।

संयम करे नहीं व्रत साधे, न मन इन्द्रिय जीत।

ऐसे साधक को अब संयम की चिन्ता भी नहीं रहती। साधना का एक समय होता है कि इतने बजे उठो, इतने समय तक चिन्तन में बैठो, इस समय स्नान, उस समय भोजन…..यह टाइम-टेबल भी याद नहीं रखना है। न मन इन्द्रिय जीत– न मन को जीतने का उपक्रम करो, न इन्द्रियों को जीतने में सतर्कता बरतो। यदि कोई अपने में त्रिगुणातीत संत महापुरुष का स्वरूप देख ले गया तो इन सबके लिये साधक की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। कारण कि फिर वह मार्गदर्शन करने लगते हैं।

आगे आगे राह देत हैं, पाछे राखे नीत।

अब तक साधक अपने विवेक और बुद्धि से भजन कर रहा था, किन्तु सद्गुरु का स्वरूप हृदय में आ जाने के पश्चात् अब वह आगे का रास्ता और कोर्स बतायेंगे कि इधर चल, अब साधना ठीक है, अब क्रम सही है, अब तुम्हारी श्वास स्थिर है या अब यह विघ्न आनेवाला है, इस विघ्न को काटने का तरीका क्या है? अब वह बताने-पढ़ाने लग जाते हैं। उनके निर्देशों का पालन ही भजन है। अब तक जो भजन बौद्धिक स्तर पर हो रहा था, अब वह सद्गुरु की प्रेरणा के आधार पर होने लगता है। पाछे राखे नीत– सद्गुरु उतना ही बताते हैं जितना साधक का स्तर है। उसके कुछ आगे-पीछे का हाल बताते हैं, शेष सब गोपनीय रखते हैं। जो-जो परिस्थितियाँ आगे आयेंगी, उनसे कैसे बचाना है, साधक को उनसे कैसे निकालना है–यह नीति वह अपने पास रखते हैं, उसे नहीं बताते। इसीलिए साधक घबड़ाकर पूछ बैठता है कि प्रभो! अभी कितनी देर है? तो,

ना हाँ कहे नहीं ना बोले, है दोउन के बीच।

साधक की जिज्ञासा पर वह बताते नहीं, न इनकार ही करते हैं। दोनों के बीच से ही साधक को ले चलते हैं। एक बार एक भिक्षु ने गौतम बुद्ध से पूछा– ‘‘भन्ते! अब कितनी देर है?’’ बुद्ध ने कहा– ‘‘किस विषय में?’’ वह बोला– ‘‘आपकी तरह मैं भी तथागत हो जाऊँ, अरिहंत हो जाऊँ!’’ बुद्ध ने कहा– ‘‘अरे, अरे! अभी पूछा तो क्षम्य है क्योंकि अभी तुम अनजान हो, अनभिज्ञ हो। भविष्य में ऐसा कभी मत पूछना अन्यथा तीन दिन में प्राप्ति होनी है तो तीन जन्म भी लग सकते हैं। तुम साधन ही कब कर रहे थे? तुम तो बैठे-बैठे मन में गणित लगा रहे थे। जिस मन से साधना करनी है वह तो गणित लगा रहा है। इसलिए वत्स! तुम केवल कर्म करो, प्रवृत्त रहो, बस!’’ कभी-कभी साधक पूछते हैं तो भगवान हाँ भी नहीं करेंगे, बतायेंगे भी नहीं। और अधिक घबड़ाने पर पीठ ठोंक देंगे कि धैर्य धारण कर। साधक की यह अवस्था जाग्रत और स्वप्न स्तर की साधना तक ही है।

जाग्रत स्वप्न संग में डोले, है सुषुप्ति से मीत।

संसार में लोग जागते-सोते रहते ही हैं। यह जगना नहीं। जीव का आध्यात्मिक जागरण तब होता है–

जानिअ तबहिं जीव जग जागा।

जब सब बिषय बिलास बिरागा।। (मानस, २/९२/४)

इस जीवात्मा को जगा हुआ तब समझना चाहिये जब उसे सम्पूर्ण विषय-विलास से वैराग्य हो जाय। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं–

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। (गीता, २/६९)

जगत्रूपी रात्रि में सभी प्राणी अचेत पड़े हैं, निश्चेष्ट पड़े हैं। जैसे चिकित्सक इंजेक्शन लगाकर किसी को बेहोश करता है, उसी तरह सब बेहोश पड़े हुए हैं। इनमें से संयमी पुरुष जग जाता है। गीतोक्त साधना समझकर जब वह संयम-साधना में प्रवृत्त होता है तो वह जग जाता है। इस जागृति के पश्चात् सद्गुरु साथ में रहने लगते हैं। आप सो सकते हैं किन्तु भगवान नहीं सोते। आत्मा कभी नहीं सोती और न यह मन ही सोता है। निद्रावस्था में भी भगवान साथ रहते हैं। भगवान जब बताना शुरू करते हैं तो जाग्रत ही नहीं, स्वप्न जगत् को भी अपना लेते हैं। वह आपको उठते-बैठते, खाते-पीते बताते हैं, भजन में बैठने पर बताते हैं और स्वप्न में भी बताते हैं। प्रभु एक पल भी नहीं सोते। स्वप्न-संसार को भी वह अपने हाथ में ले लेते हैं, यन्त्र बना लेते हैं। ऐसा योगी, ऐसा भक्त कभी स्वप्न नहीं देखता। वह जो कुछ देखता है, भविष्य देखता है, होनी देखता है। किन्तु ज्यों ही सुषुप्ति अवस्था आयी तो ‘है सुषुप्ति से मीत’।

सुप्त कहते हैं सोये हुए को। संसार में लोगों को नींद आ गयी, सो गये, हो गया सुप्त! यह शरीर की निद्रा है। अध्यात्म में सुषुप्ति का आशय है जब शरीर जागता रहे और मन सो जाय। यह भजन की अत्यन्त उन्नत अवस्था है। जब शरीर जागता हो, आँखें खुली रहें, मन में भले-बुरे उद्वेग शान्त हो जायँ, वृत्ति शान्त प्रवाहित हो, ‘ओम्…ओम्…ओम्…’ की ध्वनि प्रवाहित हो जाय, अन्य कोई संकल्प उठे ही न। यह है वास्तविक ‘सुषुप्ति’, शुभ में शयन करना। इस अवस्था में भी भगवान एक मिनट के लिये बेहोश करके कुछ दिखा देंगे, बता देंगे। वह ध्रुव अकाट्य होता है। इसका नाम है सुषुप्ति सुरा-सम्बन्धी अनुभव। जाग्रत और स्वप्न अवस्था में भगवान साथ-साथ लगे रहते हैं, सद्गुरु का स्वरूप साथ-साथ रहता है। सुषुप्ति अवस्था में वह मित्र हो जाते हैं, अर्जुन की तरह वह सखा हो जाते हैं। फिर वे गोपनीय कुछ भी नहीं रखते। उनसे आप जो भी जानना चाहेंगे, वह सब कुछ स्पष्ट करने लगेंगे। जो उनमें है, वह आपके समक्ष होगा। मित्र के लक्षणों पर गोस्वामी तुलसीदास जी प्रकाश डालते हैं–

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।

तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।

निज दुख गिरि सम रज करि जाना।

मित्रक दुख रज मेरु समाना।।

जिन्ह कें यह मति सहज न आई।

ते सठ कत हठि करत मिताई।। (मानस, ४/६/१-३)

अपना पहाड़ के समान दु:ख रजकण के समान और मित्र का रज के समान दु:ख सुमेरु की तरह महसूस हो। जिन्हें ऐसी बुद्धि नहीं है, वे धूर्त हठ करके पता नहीं क्यों मित्रता करते हैं! सुषुप्ति अवस्था में भगवान मित्र बनकर साथ-साथ क्रीड़ा करते हुए चलते हैं। साधना की अत्युच्च अवस्था में जीवात्मा की चौथी अवस्था आ जाती है–

तुरिया पद में आप बिराजै, कर निश्चय परतीत।

जाग्रत और स्वप्न अवस्था में साधक से भूल होने पर वह धक्का खा जाता है, परिणाम भुगतना पड़ता है; किन्तु सुषुप्ति की मित्रवत् अवस्था में भगवान उसे गिरने ही नहीं देते। इससे भी आगे तुरीयावस्था में पहुँचते ही साधक मनरूपी तुरंग पर असवार हो जाता है। मन पर स्वामित्व मिल जाता है। मन की भागदौड़ शान्त हो जाती है। इसके पूर्व इधर-उधर भागनेवाला मन अब स्थिर हो गया, मन ने स्थायित्व ले लिया– ऐसा निश्चयपूर्वक विश्वास कर लेना चाहिए। इसके आगे तुरियातीत महापुरुष की रहनी है। अन्तिम पंक्ति में सन्त उसी ओर संकेत करते हैं–

कह पुरुषोत्तमदास अबै लगि, बीत गई सो बीत।

अब तक आपकी जो आयु, जितनी साधना व्यतीत हो गयी, उसका लेखा-जोखा करने में समय मत गँवाओ। वह समय लौटकर आयेगा भी नहीं। हाँ, भविष्य तुम्हारी मुट्ठी में है। उस स्वर्णिम भविष्य के लिए वर्तमान का सदुपयोग कर लो; क्योंकि,

सहज प्रकाश प्रकाशक सबका, कर सोहं सो प्रीत।

वह परमात्मा सहज ही प्रकाशस्वरूप है। सबके अन्दर वह प्रकाशित है। सबके अन्दर उस प्रकाश की जागृति का विधान है। वह प्रकाशित कैसे हो? इसके लिए सन्त कहते हैं कि ‘सोहं’ से प्रेम करो। साँस आयी तो ओम्, गयी तो ओम्। जो ओ अहं है, वही सो अहं है। ओ माने वह अविनाशी परमात्मा, अहम् माने आप स्वयं। जिसका निवास सबके हृदय में है।

सबके उर अन्तर बसहुँ जानत भाव कुभाव।

गीता-समापन से पूर्व भगवान ने अर्जुन से स्वयं पूछा कि जानते हो अर्जुन! ईश्वर कहाँ रहता है? उन्होंने स्वयं ही बताया–

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (१८/६१)

अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय-देश में वास करता है। हृदय के अन्दर! इतना समीप! तब लोग उसे देखते क्यों नहीं? लोग मायारूपी यन्त्र में आरूढ़ होकर भ्रमवश भटकते ही रहते हैं, इसलिये नहीं जानते। ईश्वर हृदय में है तो शरण किसकी जायँ? तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।– इसलिये हे भरतवंशी! उस हृदयस्थ ईश्वर की शरण में जाओ, सम्पूर्ण भाव से जाओ। मान लें हमने सारी मान्यतायें तोड़ीं; भैरव बाबा, चौरा माई की पूजा छोड़ी और हृदयस्थ ईश्वर की शरण चले ही गये तो उससे लाभ क्या होगा? भगवान कहते हैं– तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।(गीता, १८/६२)– उसके कृपा-प्रसाद से तू परमशान्ति को प्राप्त कर लोगे और उस धाम, उस घर को पा जाओगे जो शाश्वत है, अजर-अमर है। वहाँ तुम्हारा निवास रहेगा और रहेगा तुम्हारा अनन्त जीवन!

यही सन्त कह रहे हैं कि सहज प्रकाश प्रकाशक सबका– वह परमात्मा सहज प्रकाशस्वरूप है, ज्योतिर्मय है और न केवल स्वयं ज्योतिर्मय है, वह सबके हृदय में प्रकाशक है, प्रकाश प्रसारित करनेवाला है। उसका प्रकाश हम-आप कैसे प्राप्त करें? इसके लिए कर सोहं से प्रीत। सोऽहम्, ओऽहम्, ओम् एक ही हैं। आज की तारीख में ‘सोऽहम्’ शब्द बदनाम हो चुका है। ‘सोऽहम्’ शब्द को लेकर सम्प्रदाय चलने लगे। आज घर छोड़ा, दो-तीन महीने में सम्प्रदाय की बोली-भाषा, थ्योरी रट लिया। तब तक तो वे अपने को साधक और जीव मानते हैं और सिद्धान्त रट लिया तो कहने लगें ‘सोऽहम्’– मैं वही हूँ शुद्ध-बुद्ध आत्मा! विकारों से निर्लेप!

साधुवेशधारी एक नवयुवक हमसे मिला। हमने उससे पूछा– ‘‘भजन में क्या करते हो?’’ उसने बताया कि उसके गुरुजी ने कहा है ‘सोऽहम्’ कहा करो। हमने पूछा– ‘‘उससे तुम्हारा काम चल गया?’’ उसने बताया– ‘‘पहले जब घर छोड़ा था, विरक्ति और नाम-जप में बड़ा मन लगता था। अब गुरु महाराज कहते हैं तू भजन ही मत कर। तू वही है परम तत्त्व परमात्मा परब्रह्म।’’ हमने पूछा– ‘‘तब क्या हुआ?’’ उसने बताया– ‘‘महाराज! इससे मेरी विकलता बढ़ गयी है। दिन काटे नहीं कट रहा है। एक दिन प्रात: चार बजे गंगा-स्नान कर मैं रामायण खोलकर पढ़ने लगा। गुरुजी ने सुन लिया। वह बोले– ‘को आय रामायण पढ़त है?’ उनके एक शिष्य ने बताया– ‘रामदास।’ गुरुजी ने बुलाया और कहा– ‘करे! मोरेउ उपदेस से तोर अज्ञान नष्ट नहीं भा! तैं ही है वह पारब्रह्म परमात्मा! फेंक दे रामायण पानी में! ‘सोऽहम्’।’’ इस प्रकार एक भ्रान्ति पनप गई। यदि आचरण नहीं है तो ‘जटा फकीरऊ, चाल-चलन गृहस्थऊ।’

‘स’ माने वह परमात्मा और ‘अहम्’ माने आप स्वयं। यह यौगिक शब्द है। इससे भी प्राचीन है ओम्। गीता कहती है– अर्जुन! ओम् का जप कर और ध्यान मेरे स्वरूप का कर। इसका अभ्यास इतना उन्नत हो कि त्यजन्देहं– देहाध्यास का त्याग हो जाय। जिस पल अभ्यास इस ऊँचाई पर पहुँचेगा, ततो याति परां गतिम्– तत्क्षण तुम परम गति प्राप्त कर लोगे। यहाँ यह सन्त कह रहे हैं कि उन सहज प्रकाशक को प्राप्त करने के लिए कर सोहं से प्रीत– ओम् का जप करें। चलते-फिरते, उठते-बैठते, हर समय नाम याद आया करे। सुबह शाम आधा घण्टा बैठकर आप सब नाम-जप में समय अवश्य दिया करें। खुरपी चलाते, लड़का खिलाते, दुकान करते – हर परिस्थिति में नाम का स्मरण बना रहे। एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर कर नाम जपें।

यदि परमात्मा परमधाम है तो सद्गुरु भजन की जागृति, पूर्तिपर्यन्त पथ-प्रदर्शक और प्रवेश द्वार हैं। यदि तुम गीता के अनुसार नियम-संयम करते रहोगे तो भगवान ही तुम्हारा गुरु ढूँढ़कर तुम्हें दे देंगे कि देख बेटा! वह हैं तुम्हारे गुरु महाराज!

संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही।

चितवहिं राम कृपा करि जेही।। (मानस, ७/६८/७)

विशुद्ध सन्त उन्हें मिलते हैं, प्रभु जिसे करुणा कर एक निगाह देख लें। वे तब देखेंगे जब तुम उनसे प्रेम करोगे। इसके लिये नाम का जप करो।

आचरण और अभ्यास ही काम आता है। इसलिए ‘कर सोहं से प्रीत’– एक प्रभु में श्रद्धा स्थिर कर श्वास से नाम जप में प्रीति करें। केवल ‘सोऽहमस्मि’ या ‘अहं ब्रह्मास्मि’ कहने मात्र से कुछ नहीं होगा। यदि आप नाम जपते हैं तो भगवान सर्वत्र से सुनते हैं, सर्वत्र से देखते हैं। उनसे हम कुछ छिपा भी नहीं सकते। उनके अंक में तो यह सृष्टि चल रही है इसलिए निश्छल भाव से उनका सुमिरण करो। जब शुद्ध हृदय से नाम-जप में लौ लग जायेगी तो भगवान सद्गुरु का परिचय दे देंगे।

नास्ति तत्त्व: गुरो: परम्– गुरु चमड़ी का नाम नहीं है। अविनाशी तत्त्व है, वही परम गुरु है। जिसमें वह स्थित है, वही गुरु का गुरुत्व है। वहीं से वह स्वरूप प्रेरणा करने लगता है, भजन पढ़ाने लगता है। वह ज्योति-दर्शन और परम तत्त्व में स्थिति दिला देता है; किन्तु यह है प्रयोगात्मक!

मेरा गाया गायेगा सो तीन लोक भरमायेगा।

मेरा गाया गूँथेगा सो तीन लोक से छूटेगा।।

केवल कथन करनेवाला स्वयं भ्रमित है, दूसरों को भी भटकाने का कार्य करता है जबकि गुरु की कथनी को जो आचरण में ढालता है, वही तीनों लोक में सुलझा हुआ पुरुष है, इसलिए आप सब भगवान का भजन करें। भगवान परम धाम हैं तो गुरु महाराज भजन की जागृति। प्रभु के चरणों के ध्यान के स्थान पर सद्गुरु के चरणों के ध्यान का ही विधान है। लेकिन गुरु वह है जो संस्कारों से अतीत हो। केवल कहने-सुनने से परिणाम नहीं मिलता, अभ्यास करने पर सब कुछ सुलभ है।

।। ॐ श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-7’ से उद्धृत)

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