‘गो’ प्रकरण
प्रश्न– महाराजजी! आप कहते हैं कि अवतार योगी के लिए है, किन्तु ‘मानस’ में तो गाय के लिए अवतार हुआ। गाय के शरीर में देवताओं का निवास है। गाय हमारा धर्म है। क्या गो–रक्षा के लिए अवतार नहीं हुआ?
उत्तर– हिन्दू-धर्म में गाय के महत्त्व पर प्रायः आन्दोलन हुआ करता है। आज सर्वत्र माँग उठ रही है कि भारत में गो-वध बन्द किया जाय। लाखों भावुक इसके लिए प्राणों की आहुति दे चुके हैं। एक समय हिन्दू-धर्म के प्रचारक बम्बई पहुँच गये। भाविकों ने सत्संग में समस्या रखी कि जब भी धर्म-परिवर्तन होता है, हिन्दुओं को ही फोड़ा जाता है। हिन्दू ही मुसलमान बने, ईसाई भी हिन्दू ही बने। क्यों न हम लोग भी अन्य धर्मावलम्बियों को हिन्दू-धर्म में प्रवेश दें। प्रचारक ने कहा, ‘‘मुसलमानों को हिन्दू तो बनाया जा सकता है; किन्तु उनके पेट में जो गो-मांस चला गया है, उसका क्या होगा?’’
भाविकों ने कहा, ‘‘महाराज! अनर्थ तो हो ही गया। अब उपाय क्या है?’’ धर्म-प्रचारक ने कहा, ‘‘एक उपाय है। सम्पूर्ण तीर्थों की वे पैदल तीर्थयात्रा करें, पुनः काशी में यज्ञ इत्यादि के द्वारा उन्हें शुद्ध करके हिन्दुओं की एक अलग जाति बनाकर रखा जा सकता है।’’ अब किसे पागल कुत्ते ने काटा है कि भारत भर की पैदल यात्रा करे? दूसरे धर्म में भी भोजन मिलता ही है, वस्त्र और मकान हैं ही, धर्म के नाम पर भी कुछ-न-कुछ करते ही हैं- हिन्दू-धर्म में कौन-सा आकर्षण विशेष है; जबकि जातीय समानता भी मिलने से रही। अन्य जाति के रूप में उपेक्षित होकर रहना कौन चाहेगा?
वस्तुतः ऐसी मान्यताएँ हिन्दू-धर्म के यथार्थ स्वरूप को न जानने के कारण ही हैं। मनीषियों की व्यवस्थाओं, मर्यादा पुरुषोत्तम राम, योगेश्वर श्रीकृष्ण के निर्देशों एवं आचरण से ही यह जान सकना सम्भव है कि शास्त्रों का यथार्थ सनातन स्वरूप क्या है? मानस में उल्लेख है कि हनुमान जब सीतान्वेषण-हेतु लंका गये तो सर्वप्रथम एक ऊँचे शिखर पर चढ़कर शत्रु की गतिविधियों को परखा। उन्होंने देखा कि विशालकाय निशाचर नगर के चारों ओर पहरा दे रहे हैं। कहीं मल्लयुद्ध-कला का अभ्यास कर रहे हैं तो ‘कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।’ (मानस, 5/36 छन्द) कहीं भैंस, मनुष्य, गाय, गधा और बकरों को अधम निशाचर खा रहे थे। वे गाय खाते थे, उनके पेट में गो-मांस भी था। उससे भी अधिक महत्त्व रखनेवाले विप्रों का मांस भी उनका आहार था फिर भी रावण से संत्रस्त होकर जितने भी निशाचर राम की शरण में आये, उनको राम ने स्थान दिया। विभीषण, उनके मंत्री, रावण का विश्वस्त गुप्तचर- सबको राम ने अपने यहाँ स्थान दिया। ऐसा स्थान नहीं कि तुम आज से हिन्दू तो हो गये, किन्तु शूद्र रहोगे बल्कि उन्हें गले लगाया और अयोध्या की भरी सभा में ‘भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।’ (मानस, 7/7/8) घोषित किया। राम के हृदय में जो स्थान भरत का था उतना ही बड़ा स्थान उन निशाचरों का भी था। यद्यपि वे गो-मांस भक्षी थे, विप्र-मांस भी उनका भोजन था फिर भी राम ने सगे भाई से बढ़कर उन्हें माना। उन्हें वही स्थान दिया जो सगे भाई का होता है। इस प्रकार वे भी शुद्ध सनातनधर्मी हुए। राम की तो घोषणा है कि पुरुष हो, नारी हो अथवा नपुंसक, चराचर का कोई भी जीव जो कपट तजकर सर्वतोभावेन मुझे भजता है वह मुझे परमप्रिय है। चराचर का अर्थ भारत ही नहीं होता, विश्व का कोई भी प्राणी सनातन-धर्मी हो सकता है। तुलसीदासजी की मान्यता है कि ‘स्वपच सबर खस जमन जड़ पाँवर कोल किरात।’ (मानस, 2/194) भी नाम के प्रभाव से परम पावन हो जाते हैं तथा चौदहों भुवनों में अत्यन्त सम्मानित बन जाते हैं। अतः सनातन-धर्म में सबका अधिकार है। जो अन्यथा कहते हैं वे सनातन-धर्म को नहीं जानते बल्कि सनातन-धर्म के नाम पर किसी रूढ़ि के शिकंजे में फँस गये हैं। भला जान-बूझकर कौन फँसना चाहेगा?
प्रश्न खड़ा होता है कि हमारे धर्म में गाय कब से आयी? धर्मप्रेमियों के एक समूह से हमने पूछा कि धर्म के स्थान पर गाय कब आयी? उन्होंने कहा- अनादिकाल से! हमने जानना चाहा कि शास्त्रों में कोई उल्लेख है। उन्होंने बताया- ‘‘श्रीकृष्ण गाय चराते थे।’’ हमने कहा कि यादव परिवार में पालन-पोषण हुआ तो गाय न चराते तो हाथी-घोड़ा कहाँ से पाते? जिस परिवार में जन्म होता है, बचपन में वैसी ही व्यवस्था भी मिलती है। रैदास को चमड़ा मिला था, मीरा को सिंहासन मिला था और राम को धनुष-बाण मिला था, तो क्या धनुष धर्म है? बड़े होने पर श्रीकृष्ण ने गाय नहीं चरायी। हमने प्रश्न रखा कि क्या और भी कोई प्रमाण है? इसके पश्चात् उनके पास कहने को कुछ नहीं था। हाँ, हठधर्मिता अवश्य थी। सन्देह की दृष्टि से देखने अवश्य लगे कि गाय के विरुद्ध कहनेवाले ये कहीं मुसलमान तो नहीं हैं?
क्या गाय वस्तुतः धर्म है? उपनिषद् के ऋषियों का कहना है कि सृष्टि में धर्म है तो मानव है। उनका निर्णय है- ‘गुह्यं ब्रह्मतदिदं ब्रवीमि। न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किचिंत्।।’ बड़े रहस्य की बात कहता हूँ कि मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। मनसहित इन्द्रियों की दरार पाट ली जाय, इन्द्रियों की त्रुटियों का निवारण कर लिया जाय तो मनुष्य के रूप में परमात्मा देखा गया। योगेश्वर श्रीकृष्ण का भी यही उपदेश है कि आत्मा ही शत्रु तथा आत्मा ही मित्र है। जिस पुरुष के द्वारा इन्द्रियाँ जीती गई हैं, उसके लिए उसी की आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बरतती है, परमकल्याण करनेवाली होती है तथा जिस पुरुष के द्वारा इन्द्रियाँ नहीं जीती गई हैं, उसी की आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतती है, अधोगति तथा नीच योनियों में फेंकनेवाली होती है। अतः अर्जुन ! तू इन इन्द्रियों को सब ओर से समेटकर मेरा ही चिन्तन कर। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि तू मेरे स्वरूप को प्राप्त होगा अर्थात् जैसा स्वरूप श्रीकृष्ण का है, उसी स्वरूप में अर्जुन भी स्थित होगा। स्पष्ट है कि मानव ही परमधर्म परमात्मा तक पहुँच सकता है। देवता तक इसी नर-तन से आशावान् हैं। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे हमारा धर्म नहीं हो सकते। परमधर्म तो परमात्मा ही है।
फिर गाय का इतना महत्त्व क्यों है? वैदिककाल से ही गाय का विशिष्ट स्थान रहा है। द्वापरकाल तक भैंस का दूध दुहा जा सकता है, ऐसी कल्पना भी नहीं थी। महाभारतकाल में भीष्म एवं द्रोण के पश्चात् दुर्योधन की व्यूह-व्यवस्था भंग होने लगी तो कर्ण को मुख्य सेनापति बनाया गया। कर्ण ने कहा कि मैं अर्जुन को मार सकता हूँ किन्तु सारथी श्रीकृष्ण-जैसा होना चाहिए। विचार-विमर्श हुआ, तो पता चला कि वैसा रथ-संचालन तो शल्य ही कर सकते हैं। शल्य का आह्नान हुआ। दुर्योधन ने प्रस्ताव किया- ‘‘राजन्! हमारे हित के लिए आप कर्ण का सारथित्व सँभालें।’’ शल्य बहुत बिगड़ा, बोला- ‘‘मुझे कायर और कर्ण को बहादुर समझते हो? हमारा हिस्सा निर्धारित कर दो, शाम तक सबको काटकर स्वदेश लौट जाऊँगा।’’ वह मद्र देश (मद्रास) का राजा था। बोला- ‘‘मैं मूर्धाभिषिक्त राजा हूँ। यह कर्ण तुम्हारे टुकड़े पर पलनेवाला है। मैं इसका सारथी नहीं बन सकता।’’ ऐसा कहकर शल्य उठ खड़ा हुआ और जाने लगा। दुर्योधन ने क्षमा माँगी और बोला-‘‘राजन्! मेरा यह प्रयोजन नहीं था। बात यह थी कि आप-जैसा सारथी कोई नहीं है। एक आप हैं और दूसरे श्रीकृष्ण! और योद्धा तो आप-जैसा कोई है ही नहीं। आप श्रीकृष्ण से भी अधिक शक्तिशाली हैं।’’ शल्य लौट पड़ा, बोला-‘‘इतने राजाओं के बीच में तुमने मुझे श्रीकृष्ण से भी शक्तिशाली कहा है। अतः मैं तुम्हारे हित के लिए कर्ण का सारथित्व भी करूँगा किन्तु मैं जो भी कड़वी बात कहूँ, कर्ण उसे सहन करे; क्योंकि मैं नरेश हूँ और यह सूत-पुत्र तुम्हारे टुकड़ों पर पलनेवाला है।’’ कर्ण ने भी दुर्योधन के हित में यह शर्त स्वीकार की।
युद्धभूमि में जब शल्य ने कर्ण को कड़वी-कड़वी बातें सुनाना प्रारम्भ किया तो कर्ण से न रहा गया। उसने शल्य से कहा, ‘‘तुम उस नीच जाति के लोगों के राजा हो जहाँ लोग लहसुन को दूध से खाते हैं। हमारे यहाँ सभी लोग स्वच्छ एवं साफ-सुथरे हैं। तुम्हारे यहाँ भेड़, बकरी, गधी और ऊँटनी का दूध पीते हैं।’’ स्पष्ट है कि बकरी के दूध का आविष्कार था, भेड़ के दूध का आविष्कार था, गाय-गधी और ऊँटनी के दूध का प्रचलन था किन्तु ‘भैंस’ का भी दूध होता है, ऐसा कहीं उल्लेख नहीं मिलता।
भैंस और भैंसे जंगली जानवर अवश्य थे। आज भी जंगली भैंसे हैं जिनका शिकार होता है। वनवासकाल में एक दिन भीम शिकार खेलने गये। कुछ समय पश्चात् महाराज युधिष्ठिर को अपशकुन होने लगा। युधिष्ठिर को लगा कि भीम संकट में हैं। ऋषियों को साथ लेकर युधिष्ठिर भीम की शोध में निकल पड़े। रास्ते में उनको भीम द्वारा आहत एवं मृत सैकड़ों शेर मिले, सैकड़ों भैंसे पड़े मिले, गैंडे मिले, जंगली हाथी भी मिले। इन्हीं चिन्हों का अनुकरण करते हुए वे वहाँ पहुँचे जहाँ अजगर-वेश में नहुष से लिपटा भीम निश्चेष्ट पड़ा था। युधिष्ठिर ने नहुष के प्रश्नों का समाधान कर भीम की जीवन-रक्षा की। इस प्रसंग में भीम द्वारा मारे गये भैंसों का उल्लेख है। भैंसे, शेर तथा हाथी जंगली जन्तु थे। दुधारू पशुओं में भैंस का उल्लेख महाभारतकाल तक नहीं पाया जाता। इसीलिए गाय पूजनीय थी क्योंकि दूध देनेवाले पशुओं में वही सर्वश्रेष्ठ थी।
गोधन गजधन बाजिधन और रतन धन खान।
जब आवै सन्तोष धन, सब धन धूरि समान।।
कृषि-कार्य करने के लिए गो का विशेष महत्त्व था। उस समय विराट के पास गोधन सबसे अधिक था जिससे दुर्योधन आदि नरेश स्पर्धा किया करते थे। बैलों से खेती होती थी, आज की तरह ट्रैक्टर नहीं थे। दूध, दही, घी, अन्न, खाद इत्यादि अत्यन्त उपयोगी वस्तुओं के उत्पादन का एकमात्र आधार गाय थी। अतएव गाय सर्वश्रेष्ठ धन थी और धन की पूजा तो होती ही है।
गजधन– हाथी एक धन था। युद्धों में टैंक के स्थान पर हाथियों का समूह बढ़ा दिया जाता था। किले का फाटक तोड़ने के लिए तथा सैनिकों को विचलित करने के लिए हाथी ही एकमात्र साधन था। रास्ता बनाने के लिए, पेड़ों को गिराने के लिए तथा सवारी एवं श्रृंगार के लिए भी उसका महत्त्व था। इसलिए हाथी की भी पूजा होती थी। उसका स्थान टैंकों और तोपों ने ले लिया तो हाथी को अनावश्यक चारा कौन खिलाए? पहले उसी की पूजा होती थी। आज भी उसका अस्तित्व है किन्तु क्षीण होता जा रहा है। या तो कुछ लोग भीख माँगते समय ‘गणेशजी’ कहकर उसकी पूजा कराते हैं अथवा विवाह या कुछ पर्वों पर गजशाला पूज ली जाती है। गज की पूजा समाप्त होती जा रही है; क्योंकि वह अब धन के स्थान से च्युत होता जा रहा है।
बाजिधन– घोड़ा एक धन था। प्रारम्भ में आवागमन के तीव्रतम साधन में उसकी गणना थी। राजा-महाराजाओं के पास जितने अधिक घोड़े और रथ होते थे, उतने ही सम्पन्न समझे जाते थे। मोटर, हवाई जहाज इत्यादि सुलभ तीव्र साधनों के समक्ष घोड़ा भी महत्त्वहीन हो चला है। प्रारम्भ में घोड़ा की पूजा होती थी क्योंकि धन था। अब वह भी धन के स्थान से च्युत हो चला है इसलिए उसकी पूजा का प्रचलन भी अस्तित्व खोता जा रहा है।
‘रतनधन’ की पूजा पहले भी होती थी और आज भी होती है। सोना, जवाहरात आज भी अपने स्थान पर हैं। उनका स्थानापन्न कोई दूसरा स्वरूप सामने नहीं आया। उनसे भी उपयोगी द्रव्य अभी आविष्कार में नहीं हैं। इसलिए वे धन के स्थान पर यथावत् हैं। दीपदान के समय लक्ष्मी-पूजन की प्रथा अब भी है।
इस प्रकार प्राचीनकाल में गाय की पूजा इसलिए होती थी कि वह सर्वश्रेष्ठ सम्पत्ति थी। विराट इत्यादि जिन राजाओं के पास अधिक गोधन था, उनका विशेष महत्त्व था। दूसरे नरेश भी गोधन लूटकर अपनी सम्पत्ति बढ़ाने की ताक में रहते थे। प्राचीन शिक्षा में गोचारण भी अनिवार्य विषय था। राजकुमार भी गाय चराते थे, जिससे गोधन की गतिविधियों से अवगत हो जायँ और उनकी रक्षा कर सकें। आज गाय की अपेक्षा भैंस दूध की अधिक पूर्ति करती है। कृषि भी ट्रैक्टरों पर आधारित होने लगी है। बैल उपेक्षित होते जा रहे हैं। विदेशों में तो बैल से खेती करने की कल्पना भी नहीं रह गई। खाद की समस्या भी दूसरी तरह से हल हो रही है। रासायनिक उर्वरक आवश्यक हो रहे हैं। इस प्रकार गाय अब धन के स्थान से च्युत हो रही है किन्तु अन्त में च्युत हुई इसलिए अभी घाव ताजा है। प्राचीन प्रथा को तोड़ते संकोच लग रहा है। सहन नहीं हो रहा है कि वह हमारा धर्म नहीं है। वस्तुतः गो धन थी इसलिए पूजा होती थी, न कि वह हमारा धर्म या उसका अंग है। भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में गाय की पूजा होती थी क्योंकि वह धन थी। वैदिक वाङ्मय में, धर्मशास्त्रों में स्थान-स्थान पर गो-रक्षा का निर्देश है। उस साहित्य में मनसहित इन्द्रियों को ‘गो’ कहा जाता था। ‘मानस’ में भी इसी आशय से ‘गो’ का प्रयोग है।
गो गोचर जहँ लगि मन जाई।
सो सब माया जानेहु भाई।। (मानस, 3/14/3)
इन्द्रियाँ और इन्द्रियों के विषयों में जहाँ तक मन कल्पना कर सकता है, उसे माया जानना चाहिए। जिन महापुरुषों ने मनसहित इन्द्रियों को संयमित कर लिया, उन्होंने तत्क्षण परम धर्म परमात्मा में प्रवेश पा लिया। काम, क्रोध, मद, लोभ इत्यादि के द्वारा इन्द्रियाँ विकृत होती हैं, विषयों में बिखर जाती हैं, नष्ट हो जाती हैं- यही इन्द्रियों का वध है, यही गो-वध है। विवेक, वैराग्य, नियम, संयम, ध्यान और समाधि द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ केन्द्रित होती हैं। यही गो-रक्षा है।
अतः ‘गो-वध बन्द करो’, ‘गो-रक्षा करो’ तभी धर्म की जय होगी, परमधर्म परमात्मा पर विजय मिलेगी। गो-रक्षा पर ही धर्म निर्भर है। यदि हमें परमधर्म की चाह है तो गो-रक्षा करें, उन्हें संयत करें। यदि इन्द्रियाँ विकृत हैं तो आप परमात्मा की पूजा नहीं कर सकेंगे। मनसहित इन्द्रियों के निरोध के साथ ही उस पूजन का विधान है। इसलिए गो-रक्षा सनातन-धर्म का सर्वोपरि अंग है।
साधना के सही दौर में पड़कर जब मन इष्ट के चरणों में लगते-लगते अतिसूक्ष्म होने लगता है, तहाँ ब्रह्म-पीयूष का स्रोत योगी के हृदय में मिलने लगता है। यह आनन्द-स्रोत ही नन्दिनी है। यही इन्द्रियाँ जब पूर्णतः साध ली जाती हैं, उस अवस्था में यही कामधेनु हो जाती है। इन्द्रियाँ जब तक विषयोन्मुख दौड़ती हैं, इच्छित वस्तुओं के लिए मन दौड़ता रहता है, पूर्ति नहीं होती; किन्तु मनसहित इन्द्रियाँ जब सिमटकर इष्ट के तद्रूप अचल स्थिर ठहर जाती हैं, उस समय इच्छायें शक्ति से संयुक्त हो जाती हैं, फिर तो ‘जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।।’ (मानस, 7/113/4) उस समय कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता और अन्त में जब यह द्रष्टा जीवात्मा अपने परमात्म-स्वरूप में स्थित हो जाता है उस समय कामना ही नहीं रह जाती। ‘पाप पुण्य की करे न आसा। सो पहुँचे रघुनायक पासा।’ उससे श्रेष्ठ आगे कुछ सत्ता ही नहीं है तो कामना किसकी करे। ऐसा पुरुष पूर्णकाम होता है।
इस प्रकार योगशास्त्रों में ‘गो’ का तात्पर्य इन्द्रिय ही होता है। मनसहित इन्द्रिय-समूह को विकृत न करें, इनका संयम करें, गो-रक्षा करें। जब हम वासनाओं से इन्द्रियों की रक्षा करने में सक्षम होंगे, परमधर्म परमात्मा विदित हो जायगा। इसलिए यदि धर्म की आवश्यकता है तो गो-रक्षा करें; किन्तु ऐसा नहीं कि किसी पशु का पीछा कर बैठें। यदि पूर्वजों ने किसी पशु का पीछा किया हो तो आप करें। किन्तु धर्मग्रन्थों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता। पशु के रूप में गाय, बैल, हाथी तथा घोड़ों की पूजा करना ‘धर्म’ नहीं है। गाय का महत्त्व सामाजिक एवं आर्थिक उपादेयता के कारण था और धन तो आज भी पूजा जाता है।
आर्थिक महत्त्व की दृष्टि से गायों का सम्वर्धन विदेशों में भी रहा है। मुहम्मद साहब ने कुरान शरीफ में लिखा है कि गाय पालतू पशु है, यह मारने की चीज नहीं है, इसकी रक्षा करो। ‘कुरआन’ का दूसरा सूरा ‘अलबकर’ है। गाय को अरबी में ‘बकर’ कहते हैं। वहाँ भी इन्द्रियों के दमन का निर्देश है। जिसे अल्पज्ञ ‘गोकुशी’ मान लेते हैं। वहाँ विचित्र गाय का उल्लेख है- जो न खेत जोतती हो, जिस पर जुआ न रखा गया हो, जो खेत को पानी न देती हो, एक रंग की हो, किसी दूसरे रंग की मिलावट न हो, सुनहले रंग की हो, ऐसी गाय को ईश्वर के निमित्त मारना है। यहाँ भी इन्द्रियों द्वारा विषय-सेवन का निरोध कर विशुद्ध अन्तःकरण से उन्हें ईश्वर में लगा देने मात्र का निर्देश है। मुहम्मद साहब ने गाय के दूध और माँ के दूध को समान माना है और गायों की रक्षा पर बल दिया है। बकरीद का पर्व और उसमें गायों को काटना कुरान में कहीं नहीं लिखा है। किंवदन्ती है कि ईश्वर ने रसूल से उसकी प्रिय वस्तु माँगी। उसने अपने पुत्र की बलि दी तो पुत्र के स्थान पर ‘बकरा’ हो गया, लड़का बच गया। किन्तु कुरान में बकरीद की चर्चा तक नहीं है। खाने-पीने का एक तरीका धर्म के नाम पर चल पड़ा।
मुसलमानों ने भारत पर आक्रमण किया तो गाय के प्रति हिन्दुओं की कमजोरी को भाँप लिया। महमूद गजनवी, मुहम्मद गोरी तथा बाबर आदि सभी ने किसी-न-किसी रूप में गायों को आगे करके आक्रमण किया। स्वस्तिवाचक पुजारियों के निर्देश पर धर्मभीरु क्षत्रियों ने गोमाता की रक्षा के लिए शस्त्र नीचे रख दिये। मुट्ठीभर मुसलमानों ने गाय की ओट से निशाना लेकर पहले तो सैनिकों को मारा, पण्डितों को पकड़कर मुसलमान बना लिया और हिन्दुओं की भावनाओं को उत्पीड़ित करने के लिए गायों को भी भूनकर पचा लिया, जिसका इतिहास साक्षी है। मुसलमानों ने ऐसा जो किया उनका दोष नहीं है, दोष तो हमलोगों का है जो हमने धर्म को नहीं समझा और धर्म के नाम पर रूढ़ि पूजी जाने लगी। अतः पशु-पूजा, वृक्ष-पूजा, नाग-पूजा जैसी रूढ़ि न अपनावें। धर्म का वास्तविक रहस्य एवं उसकी क्रिया समझने के लिए किसी तत्त्वदर्शी महात्मा की शरण में जायँ।
यदि भगवान के अलावा और कोई धर्म हो तो आप ही बतावें। क्या गीता, क्या रामायण, क्या उपनिषद्, क्या योगदर्शन, सब में साधनाओं की ऊँची-नीची अवस्थाएँ तो ध्रुव अकाट्य है। इन अवस्थाओं का चित्रण तो अवश्य मिलेगा किन्तु वह अलग-अलग धर्म नहीं है।