क्या नयना झमकावै

क्या नयना झमकावै

क्या नयना झमकावै, ठगिनिया क्या नैना झमकावै।

कबिरा तेरे हाथ न आवै, ठगिनिया क्या नैना झमकावै।।

रूपा पहिरि के रूप दिखावै, सोना पहिरि चमकावै।

गले डारि तुलसी की माला, तीन लोक भरमावै।।

ठगिनिया क्या……….।।

कद्दू काटि मृदंग बनाया, निब्बू काटि मंजीरा।

पाँच तुरैया मंगल गावैं, नाचै बालम खीरा।।

ठगिनिया क्या……….।।

उल्टा चिल्ली देत पैंतरा, कौआ तीर चलावे।

पेड़ चढ़े मछली फल खावे, बकुला भोग लगावे।।

ठगिनिया क्या……….।।

भैंस पद्मनी चूहा आशिक, मेढक ताल लगावे।

छतरी चढ़ि के मकरी नाचै, झींगुर बन्द लगावे।।

ठगिनिया क्या……….।।

चोलना पहिर के गदहा नाचै, ऊँट विसन पद गावै।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरु शरण बचावै।।

ठगिनिया क्या……….।।

आध्यात्मिक महापुरुषों ने सांसारिक वैभव और उसके प्रति मानव मन की आसक्ति को माया की संज्ञा दी है। सांसारिक रिश्ते-नाते और यहाँ की समृद्धि क्षणिक है, नश्वर है, छलावा है। इसलिए सन्त कबीर माया को महाठगिनी कहते हैं–

माया महाठगिनि हम जानी।

केशव के कमला होई बैठी, शिव के भवन भवानी।

पंडा के मूरति होइ बैठी, तीरथ में भइ पानी।

माया…….।।

माया ने देखा कि लोगों की मन्दिरों में श्रद्धा है तो वह वहाँ ढोंग बनकर बैठ गयी। लोगों की मान्यता है कि गुरु से कल्याण है तो गुरुओं की कतार लग गयी। माया सब जगह हाजिर है और यह केवल धोखा देकर भोलीभाली आत्माओं को, श्रद्धालुओं को अपने चक्कर में घुमा देती है, चौरासी लाख योनियों का चक्कर लगवा देती है। एक स्थान पर संत कबीर कहते हैं–

हरि ठग ठगत ठगौरी लाई।

हरि के वियोग कैसे जियहु रे भाई।।

हरि सबसे बड़े ठग! जहाँ कोई भजन-चिन्तन में आगे बढ़ा, वह अपने भक्त की परीक्षा के लिए ठगौरी (भुलावा, ठग विद्या, ठगने की कला) को आदेश देते हैं। पता लगाते हैं यह कितने पानी में है। वैसे माया का स्वयं में कोई अस्तित्व, स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं।

माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ।

नारि बर्ग जानइ सब कोऊ।।

पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी।

माया खलु नर्तकी बिचारी।। (रामचरितमानस, ७/११५/३-४)

भगवान को भक्ति प्यारी है। माया तो नाचनेवाली नर्तकी मात्र है लेकिन हैं दोनों भगवान की ही! माया ठगने के लिए ही है लेकिन ठगती है भगवान के संकेत पर! अत: साधक को इससे घबड़ाना नहीं चाहिए कि लोभ आया या मोह, राग आया या द्वेष; संग-दोष आया या सुविधा आई। यह तो भगवान का ही भेजा हुआ यन्त्र है, इसे अन्यथा न लें तो इससे शीघ्र ही पार पा जायेंगे। जहाँ इसे पराया, विजातीय समझेंगे, तहाँ तुरन्त द्वेष खड़ा हो जायेगा।

इस माया को लेकर सन्त कबीर के अनेक भजन हैं। एक पद में वह कहते हैं–

रमैया तोर दुलहिन लूटा बजार।

हे भगवन्! आपकी माया ने बना-बनाया, सजा-सजाया बाजार लूट लिया। किसको-किसको लूटा? कबीर बताते हैं–

विष्णु को लूटा महादेव लूटा, ब्रह्मा को लूटा लोटारलोटार।

रमैया…….।।

सुरपुर लूटा नागपुर लूटा, तीन लोक मचा हाहाकार।

रमैया…….।।

शृंगी की भृंगी करि डारी, पाराशर के उदर विदार।

रमैया…….।।

कनफूका चिदकाशी लूटी, लूटल योगेश्वर करत विचार।

रमैया…….।।

हम तो बचि गये साहब कृपा ते, सबद डोर गहि उतरे पार।

रमैया…….।।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, इस ठगिनी से रहो हुशियार।

रमैया…….।।

शब्द की डोर पकड़ कर हम पार हो गये। महापुरुष वाणी से तभी तक उपदेश देते हैं जब तक वह हृदय से जागृत नहीं हो जाते, आत्मा से अभिन्न होकर खड़े नहीं हो जाते। जहाँ वह आत्मा से उपदेश देने लगे तो वाणी का उपदेश मात्र दस-बीस प्रतिशत तक रह जाता है। शेष सभी उपदेश वह हृदय से देते जायेंगे। साधक उन्हें समझता जायेगा और आगे बढ़ता जायेगा। इसलिए हृदय में जो शब्द मिलता है, उसकी डोरी पकड़ो। शब्द में लव लगाओ, सुरत की डोरी शब्द में जोड़ दो, पार हो जाओगे।

भगवत्पथ ऐसा नहीं है कि– ऐसा करो तो ध्यान लग जायेगा; ऐसा कर लो तो समाधि लग जायेगी। ऐसा कुछ भी नहीं है; क्योंकि तुलसिदास (मन) बस होइ तबहिं जब प्रेरक प्रभु बरजै।– जब प्रेरक के रूप में स्वयं प्रभु खड़े हो जायँ, रोकथाम करें, साधक की सार-सम्हाल करें तभी यह अयुक्त मन वश में होता है अन्यथा साधक पता ही नहीं पाता कि कब माया काम कर रही है और कब वह साधना के पथ पर है? साधक इसे अलग ही नहीं कर पायेगा। मन का सोचा तो मात्र विकल्प होता है, बुद्धि का निर्णय एक तर्क मात्र है जबकि भगवान अतर्क्य हैं। वह मन-बुद्धि के द्वारा नहीं पहचाना जा सकता। इसलिए जिस सत्ता की हमें चाह है वह प्रभु आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जायँ, हम जिस सतह पर हैं वहाँ वह निकल आयें और अन्त:करण से मार्गदर्शन करने लगें। फिर साधक के जीवन में कोई सन्देह नहीं है। केवल आज्ञापालन करें, शब्द से सुरत की डोर जोड़ लें– यही है शब्द डोर गहि उतरे पार। रमैया तोर दुलहिन लूटा बजार।

भगवत्पथ में माता-पिता की कुलीनता अथवा हीनता का कोई योगदान नहीं है। वेदवाक्यों से मंत्रोच्चारपूर्वक ब्याह से जन्म हुआ या स्वच्छन्द विवाह से– इसकी भी कोई गणना नहीं है। यह तो सामाजिक व्यवस्था की मर्यादाएँ हैं, गौरवगाथाएँ हैं। शादी-विवाह के रीति-रिवाज हमारी पावन संस्कृति के अंग हैं। इनका पालन होना चाहिए किन्तु ईश्वर-पथ में यह संस्कृति नहीं लगती।

ऐसा ही कथानक शृंगी ऋषि का है जिनका उल्लेख महाभारत के वन पर्व और वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में मिलता है। विभाण्डक ऋषि घनघोर जंगल में तपस्या कर रहे थे। उनकी कुटिया के समीप की पगडंडी पर मृगों के झुण्ड के मध्य उन्हें एक नवजात शिशु मिला। ऋषि उसे ले आये, उसका पालन-पोषण करने लगे। शरीर-सौष्ठव के साथ ही बालक अत्यन्त प्रखर मेधा का था। ऋषि उसे जितना अध्ययन कराते, सब-का-सब उसे कण्ठस्थ हो जाता था। उसकी प्रगति से ऋषि बहुत सन्तुष्ट थे। उनका लक्ष्य था कि इसे मैं भगवान बनाकर दम लूँगा। वह उसकी साधना के विकास में लगे रहे। उस बालक के सिर पर एक जगह शृंग-जैसा उभार होने से ऋषि प्रेम से उसे शृंगी कहते थे।

शृंगी युवा हो चले थे। उस घोर जंगल में अपने अभिभावक पिता या यदा-कदा वहाँ पधारनेवाले ऋषियों के अतिरिक्त अन्य किसी को उन्होंने देखा तक न था। स्त्री जाति से उनका परिचय ही नहीं था। अखण्ड ब्रह्मचर्य से उनका सुगठित शरीर उद्भासित था। महान् तेजस्वी और क्रोधी ऋषि विभाण्डक सदैव उनकी रखवाली में रहते थे कि कोई उन्हें छल न ले।

शृंगी ऋषि की साधना लगभग पूर्ण हो चली थी। परमात्मा की प्राप्ति होना मात्र शेष था। उनकी परीक्षा की घड़ी आने लगी। विभाण्डक मुनि समझते थे कि अब खतरा मँड़रा रहा है। वह शृंगी को बार-बार सचेत करते थे कि अपने संयम-साधना के बाहर पाँव न रखना, न सुनना, न देखना।

उस समय अयोध्या नरेश दशरथ जी के मित्र, अंगदेश के राजा लोमपाद के यहाँ अकाल पड़ा हुआ था। ज्योतिषाचार्यों ने अकाल निवारण का उपाय बताया कि वन में शृंगी ऋषि रहते हैं। यदि उनका चरण आपके राज्य में पड़ जाय तो वर्षा होगी। राजा ने ऋषि को लाने के अनेक प्रयत्न किए किन्तु विभाण्डक ऋषि अनुमति ही नहीं देते थे।

मंत्रियों ने मुनि की अनुपस्थिति में उन्हें लाने की योजना बनायी। मुनि के श्राप के भय से कोई वहाँ जाने को तैयार ही न होता था। अन्तत: एक वेश्या ने यह चुनौती स्वीकार की। दो बड़ी नावों में कुटी बनाकर, बाग लगाकर, संत का वेष बनाकर, दाढ़ी जटा लटकाकर अपने साथ कुछेक नये उम्र की वाराङ्गनाओं को कमण्डलु पकड़ाकर, हाथ में माला देकर साथ में ले लिया।

दोपहर के समय जब विभाण्डक मुनि कंदमूल फल लेने जंगल में चले गये, उस नृत्यांगना ने साथ आयी हुई हावभाव में निपुण एक नवेली को साधुवेश में शृंगी ऋषि के पास भेजा। उसे ब्रह्मचारी बटु समझकर शृंगी स्वागतहेतु उठकर खड़े हो गये– भगवन्! ब्रह्मचारिन्! आपका किधर से आगमन हो रहा है? यह अर्घ्य, पाद्य स्वीकार करें; विराजें। उन्होंने चटाई बिछा दिया। नैवेद्य में जंगली फल रख दिया। उस नृत्यांगना ने उसे मुख में डाला तो मुख बिचका दिया। यह कैसा फल है? हमारे यहाँ तो बहुत मधुर फल होते हैं। देखते हैं, हमारे कमण्डल में होगा! उसने शृंगी ऋषि को एक रसगुल्ला कमण्डल से निकालकर पकड़ा दिया। जहाँ शृंगी ने उसे मुख में डाला, ऊपर का ऊपर नीचे का नीचे ताकते ही रह गये। वह बोले– ‘‘अरे! इतना मधुर फल!’’ अब तक उन्होंने कभी मिष्ठान्न चखा ही न था। जंगल में महापुरुषों की इच्छाएँ नहीं होतीं। बाल्यकाल से जैसा खानपान मिलता है वही वृत्ति बन जाती है। उन्होंने आश्चर्य से पूछा, ‘‘भगवन्! ये फल हैं?’’ नृत्याङ्गना ने कहा, ‘‘हाँ, हमारे यहाँ फलते हैं।’’ वह समझ गयी कि यह बहुत भोलेभाले हैं। उनसे कुछ बातचीत की और मुनि के आने से पहले ही नाव पर चली गयी। बगीचा-जैसी लगनेवाली नाव नदी के दूसरे किनारे पर चली गयी।

सायंकाल गुरुदेव विभाण्डक मुनि अपनी कुटिया पर पधारे तो शृंगी की भाव-भङ्गिमा बदली-बदली सी लगी। उन्होंने पूछा– ‘‘तबीयत तो ठीक है न? आज तुम्हारा चित्त कैसा उचटा-उचटा है? धूना व्यवस्थित नहीं है। आज कुटिया की सफाई भी नहीं हुई। तुम्हें हो क्या गया आज?’’ शृंगी ने कहा, ‘‘गुरु महाराज! क्षमा करें, अभी-अभी एक ब्रह्मचारी जी आये थे। उनका इतना सुन्दर रूप-स्वरूप था कि मन करता था उनको देखते ही रहें।’’ विभाण्डक मुनि ने पूछा, ‘‘कैसा रंग-रूप था?’’ शृंगी ने बताया, ‘‘सुवर्ण जैसा उनका शरीर, लम्बी किन्तु सुवासित जटायें, दाढ़ी अभी नहीं थी, सीना थोड़ा ऊँचा, वाणी बहुत मधुर!’’ मुनि ने कहा, ‘‘मूर्ख! वह ताड़का, सूपनखा जैसी कोई राक्षसी रही होगी। वह ब्रह्मचारिणी का वेष बदलकर तुम्हें ठगने आयी थी। यदि वह फिर कभी आती भी है तो उससे बात मत करना बल्कि उसे सँड़से से मारकर भगा देना।’’

दूसरे दिन विभाण्डक मुनि की अनुपस्थिति में वह नृत्याङ्गना पुन: आई। शृंगी उससे बोले ही नहीं, आज्ञाकारी सेवक ठहरा गुरु महाराज का! अब नृत्याङ्गना ने अपने वाक्चातुर्य का प्रयोग किया– ‘‘भगवन्! आज आपको हो क्या गया? आप स्वस्थ तो हैं न? ओह! मैं समझ रहा हूँ आप सोचते हैं कि मैं पतित हो जाऊँगा। भला आप ऐसे तपोधन का माया क्या कर लेगी?’’

शृंगी का मन भीतर से बोलने को व्यग्र था इसलिए वह बोले, ‘‘हाँ, माया मेरा कुछ भी नहीं कर सकती। ऐसा है कि गुरु महाराज नाराज होते हैं। कल कुटिया की सफाई ठीक से जो नहीं हो पायी थी लेकिन आप चिन्ता न करें, आज मैं सब सँभाल लूँगा।’’ इसी प्रकार दिनभर वार्तालाप चलता रहा। मुनि के आने का समय जानकर वह शीघ्रता से नाव पर निकल गयी। शृंगी ने कुटिया की दिनभर की व्यवस्था एक घण्टे में ही पूरा कर दिया।

गुरु महाराज थके-थके आये, आसन पर बैठ गये। उन्होंने कुटिया में साफ-सफाई देखा तो सोचा सब ठीक ही होगा। अभी कल ही तो समझाया था। अब रोज-रोज कौन माथापच्ची करे। उन्होंने आज की दिनचर्या के बारे में पूछा ही नहीं।

तीसरे दिन विभाण्डक मुनि के जाते ही वह नृत्याङ्गना आई और बोली– ‘‘भगवन्! हमारे गुरुदेव पधारे हैं। यहाँ समीप में ही उनकी नाव लगी है।’’ शृंगी ने कहा, ‘‘आपके गुरुदेव! वह तो बड़े ही महान् होंगे।’’ नृत्याङ्गना ने कहा– ‘‘चलें, केवल एक किलोमीटर पर ही तो हैं।’’ नाव पर नृत्याङ्गनाओं ने साधुवेश में शृंगी ऋषि का खूब स्वागत किया। स्वस्तिवाचन सभी सीखकर आई ही थीं और उनकी महन्थ जी, वह अधेड़ नृत्याङ्गना शान्त बैठी रह गयी। शृंगी ऋषि नमन करने लगे तो उसने कहा– ‘‘ऊँहूँ! आप-जैसे तपोधन को प्रणाम करने की आवश्यकता नहीं है। एक ही स्वरूप हैं। भगवन्! आप विराजें। प्रसाद ग्रहण करें।’’ कभी यह मिष्ठान्न तो कभी कुछ दूसरा! नाव में छोटे-मोटे वृक्ष लगा रखे थे। उनकी डाल पर मिठाइयाँ-मेवे टाँग रखे थे। उन देवियों ने अनुरोध किया– भगवन्! इस फल को तोड़िए, देखिये इस फल का स्वाद कैसा है? नाव वेगवती गंगा की धारा में चलती रही। बहलाते-फुसलाते वह लोग शृंगी ऋषि को अंगदेश ले आये।

अंगदेश के राजा के साथ अपार भीड़ ने शृंगी ऋषि का स्वागत किया। ज्योंही शृंगी ऋषि ने नाव के नीचे पाँव रखा, सचमुच बादल घिर आये, पानी भी बरसा। राजा बहुत प्रसन्न थे। वह सोच रहे थे– मैंने पूरा खजाना खर्च कर दिया लेकिन जनता के लिए कुछ भी तो नहीं कर सका, पानी नहीं बरसा सका। यह महापुरुष इतने महान् कि इनका चरण पड़ते ही पानी बरस गया। मैं इनकी क्या सेवा करूँ? उनके पास एक कन्या शान्ता थी जो महाराज दशरथ ने उन्हें गोद दे दिया था। उसी को उन्होंने ऋषि के चरणों में गिरा दिया और कहा– ‘‘भगवन्! हमने इसे आपको अर्पण कर दिया।’’ ऋषि ने पूछा– ‘‘यह कौन संत हैं?’’ राजा ने कहा– ‘‘यह संत नहीं, चरणसेविका है।’’ ऋषि ने पूछा– ‘‘सेविका क्या होती है?’’ राजा ने कहा– ‘‘अब यही आपको सबकुछ पढ़ा देगी।’’

इस प्रकार शृंगी की भृंगी करि डारी– शृंगी ऋषि का बना-बनाया बाजार चौपट हो गया। शृंगी को केवल भगवत्प्राप्ति होना ही शेष था लेकिन माया एक चकमा देकर लूट ले गयी। माया के कई हिस्से हैं– काम-क्रोध-मद-मत्सर! लेकिन भगवत्पथ में सन्तों के समक्ष एक स्तर ऐसा भी आता है  जहाँ माया कितना भी चक्कर क्यों न मारे, वह कुछ कर नहीं सकती।

पहले मीरा बिलखती थी, रोती थी, रात-दिन प्रार्थना कर रही थी। उधर राजपरिवार की ओर से भयंकर उपद्रव चल रहा था। एक दिन मीरा हृदय में भगवान का सम्बल पा गयी; तब मीरा बड़े उत्साह से खड़ी हो गयी। उसने राणा को स्पष्ट कह दिया–

राणाजी! मैं तो गिरधर रँगवा राती।

औरों के पिया परदेस बसत हैं, लिखलिख भेजत पाती।

हमरे पिया मोरे हिय में बसत हैं, नहिं कहुँ जाती न आती।

राणाजी! मैं तो गिरिधर के रंग में रंग गयी हूँ। सबके पिया परदेश जाते हैं, चिट्ठी-पत्री से सम्पर्क स्थापित करते हैं, लेकिन हमारे प्रियतम तो हमारे हृदय में निवास करते हैं, हमारी पल-पल की खबर रखते हैं। हमें उनसे निवेदन करने न कहीं जाना है न आना। अब तक आपने जो उपद्रव किया, क्षम्य था; किन्तु अब कुछ करने का दुस्साहस करते हैं तो चक्कर में पड़ जायेंगे। मैं तो क्षमा कर दूँगी, लेकिन भगवान ही आपको क्षमा नहीं करेंगे। अभी तक जो माया इतनी प्रचण्ड थी, उसी को मीरा ललकारकर खड़ी हो गयी।

यही दशा गोस्वामी तुलसीदास जी की भी थी। साधना के आरम्भ में वह भी देवी-देवता, तीर्थ, पेड़-पौधे सबसे प्रार्थना कर रहे थे। आँखों में आँसू और हृदय में ठाकुरजी को लटकाकर कुछ दिन वह भी घूमते रहे कि– प्रभो! मेरे मनरूपी मछली को पकड़ने के लिए आप अपनी कृपा की डोरी बनाइए। चरणचिह्न अंकुश को वंशी का काँटा बनाकर उसमें प्रेम का चारा लगाकर अपने पास खींच लें। ऐसी कृपा करें कि मेरा मन दूसरा कोई संकल्प ही न करे। मैं विषयों से भागने की सोचता हूँ किन्तु काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर, आशा-तृष्णा, वासना और इच्छाओं के भूत हमारे पीछे-पीछे चले आते हैं। मैं पैरों से चलता हूँ, ये हमारे मस्तिष्क में सवार होकर चलते हैं और ज्यों-ही मैं एकान्त में जाकर भजन में बैठता हूँ तो ये सभी विकार अपनी-अपनी गठरी खोलकर पहले ही रख देते हैं। फिर वही संकल्प, फिर वही विकारों का फिर वही क्रम आरम्भ हो जाता है। इसलिए प्रभो! मेरे मन को आप अपने चरणों में प्रेम के चारे से ऐसा चिपका दें कि यह फिर कभी विलग न हो। इस प्रकार तुलसी रात-दिन स्तुति कर रहे थे, विनय में ही उनका जीवन बीतता था; किन्तु एक दिन वह भी ललकार कर खड़े हो गये–

मैं तोहिं अब जान्यो संसार।

बाँधि न सकहिं मोहिं हरि के बल, प्रगट कपटआगार। (विनय-पत्रिका, १८८)

रे संसार! अब हमने तुझे भलीभाँति जान लिया है। अब तू मुझे बाँध नहीं सकता क्योंकि मुझे हरि का बल प्राप्त हुआ है। तू प्रत्यक्षत: कपट का घर है। दूसरे शब्दों में माया महाठगिनि– ठगना और कपट करना एक ही है। इतना ही नहीं,

ज्यों कदलीतरुमध्य निहारत, कबहुँ न निकसत सार।।

केले का वृक्ष छीलने पर छिलके पर छिलका ही निकलता है, उसमें ठोस लकड़ी कहीं है ही नहीं। इसी प्रकार रे संसार! तू ऊपर से चिकना-चिकना दिखता भर है, तेरे भीतर कोई सारतत्त्व नहीं है, तू नश्वर है, मैंने तुझे जान लिया है। अब तू मुझे नहीं बाँध सकता, अब मुझे हरि का सम्बल प्राप्त हो गया है।

हरि का यही बल अंगद को प्राप्त हुआ था। रावण की सभा में अकेला अंगद! किन्तु उसके हृदय में जहाँ प्रभु की अनुभूति का सञ्चार हुआ, दृश्य दिखायी पड़ा तो,

समुझि राम प्रताप कपि कोपा।

सभा माझ पन करि पद रोपा।।

जौं मम चरन सकसि सठ टारी।

फिरहिं रामु सीता मैं हारी।। (रामचरितमानस, ७/३३/८-९)

राम का प्रताप समझ में आते ही अंगद ने रावण की सभा में प्रण करके अपना पैर टिका दिया कि जो मेरे चरण को हिला भर देगा, राम लौट जायेंगे और मैं सीता को हार जाऊँगा! बहुत से राक्षसों ने अंगद के पैर को धरती से उठाने में एड़ी से चोटी तक का जोर लगा दिया किन्तु अंगद का पैर टस से मस नहीं हुआ। राक्षसों की असफलता देखकर मेघनाद उठा। मेघनाद अपने समय का सर्वोपरि योद्धा था। उसके साथ ही,

कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ।

झपटहिं टरे न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ।। (मानस, ७/३४ क)

क्या यह किसी बन्दर की साधारण-सी टँगरी थी? नहीं, यह एक आध्यात्मिक रूपक है, यौगिक रहस्य है। अनुराग ही अंगद है। अनुरागपूरित चित्त से जब साधक लगता है और उसके हृदय में जब भगवान के चरण स्थायित्व ले लेते हैं फिर कामरूपी मेघनाद और काममयी सैकड़ों प्रवृत्तियाँ भी उसे विचलित नहीं कर पातीं क्योंकि उसे हरि का बल प्राप्त है। अब क्रोधरूपी कुम्भकरण, अहंकाररूपी अहिरावण, लोभरूपी नारांतक और मोहरूपी रावण भी उसे तिल भर हटा नहीं सकते। आज आपका मन भजन में नहीं लगता। उसका कारण है आपमें अनुराग की कमी; किन्तु सतत अभ्यास से आपमें अनुराग की वह स्थिति आ जाय कि भगवान आपके हृदय में अपना बल प्रदान कर दें, अपना वरदहस्त रख दें, फिर सृष्टि में ऐसा कुछ नहीं है जो आपको विचलित कर सके। इसीलिए आरम्भ में दिन-रात प्रार्थना करनेवाले तुलसी एक दिन ललकार कर खड़े हो गये कि रे संसार! अब तू मुझे बाँध नहीं सकता क्योंकि मुझे हरि का संरक्षण प्राप्त हो गया है।

भगवत्पथ में एक स्तर ऐसा आता है कि जहाँ माया खलु नर्तकी बिचारी।(रामचरितमानस, ७/११५/४)– वह तो नर्तकी मात्र है। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।(रामचरितमानस,७/११५/७)– उस भक्त के ऊपर वह प्रभुत्व नहीं जमा सकती जिस पर भगवान का वरदहस्त है।

पूज्य गुरु महाराज जी कहते थे– हो! हम चाहीं कि पतित हो जाईं, हम हो ही नहीं सकेंगे। भगवान मोके होखे न देइहैं। यह है प्रभु का प्रताप! ठीक इसी स्तर का यह भजन है– ठगनिया क्या नैना झमकावै। कबिरा तेरे हाथ न आवै।

रे ठगिनी! अब आँखें क्या तरेरती है? घूरकर क्यों देख रही है? कबीर अब तुम्हारे चंगुल में फँसनेवाला नहीं है। हमने अब जान लिया है कि तू कैसे-कैसे आक्रमण करती है?

रूपा पहिरि के रूप दिखावै, सोना पहिरि चमकावै।

भगवत्पथ की दो बाधाएँ कामिनी और कंचन हैं। कामिनी में केवल काम-वासना ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण कामनाएँ आ जाती हैं और कंचन में आ जाता है सांसारिक पद-प्रतिष्ठा और वैभव! कभी रूप के माध्यम से तो कभी कंचन के माध्यम से माया आवरण खड़ा करती है।

सीताजी के पास कोई कमी नहीं थी। जनक जी ने वह दहेज दिया था जो विधाता के घर में नहीं था। उस चक्रवर्ती सम्राट दशरथ की पुत्रवधू जिसके लिए गोस्वामी जी कहते हैं– दसरथ धन सुनि धनद लजाई।उसको जंगल में एक मृग दिखाई दिया तो झूम गयी। वह बोली– राम! देखो न! सोने के सींग, खुर सोने का, चमड़ा सोने का! भगवान ने देखा, अब तो यह सोने के पीछे पड़ गयी। यह हमें भी भूल गयी, आदेश देने लगी। उन्होंने कृपा करके सीता को सोने की गढ़ी में ही भेज दिया– ले भोग सोना! सीता को रोने को आँसू नहीं मिला, एक-एक दिन काटे नहीं कटा। भला इन जड़ पदार्थों में सुख कहाँ? और यदि कामिनी और कंचन में साधक नहीं उलझा तो–

गले डारि तुलसी की माला, तीन लोक भरमावै।

माया संन्यासिनी का वेष बना लेगी या गले में तुलसी की माला डाल लेगी, पतला-सा तिलक भी लगा लेगी, हाथ में कमण्डल ले लेगी और भ्रमण करती हुई साधक के पास चली आयेगी। वह भगवान की एक-एक सरस कथा पर, एक-एक शब्द पर आँसू बहाने लगेगी। अयोध्या, वृन्दावन इत्यादि तीर्थों में ऐसी घटनाएँ होती ही रहती हैं। चित्रकूट में भी गुरु महाराज के समय में ऐसी घटना आयी थी।

कोलकाता विश्वविद्यालय की एक छात्रा बी.ए. पास कर दर्शनशास्त्र में परास्नातक की शिक्षा ग्रहण कर रही थी। उसके छ: भाई थे, उन सबका विवाह अच्छे परिवारों में हो गया किन्तु इस कन्या को कोई वर पसंद ही नहीं कर रहा था। कन्या गुणवती थी, केवल रंग कुछ साँवला था। भौजाइयों में से किसी ने एक बार विनोद में ताना मारा कि बाईजी ने ऐसा रूप-स्वरूप धारण कर अवतार लिया है कि कोई इन्हें पसन्द ही नहीं कर रहा है।

इकलौती बहन का घर में बहुत दुलार होता है। मान-सम्मान में पली वह छात्रा तैश में आ गयी। उसने कहा– देखती रहो, ऐसा पति लाऊँगी जो तुम्हारे पतियों को उठाकर पटककर चढ़ बैठे, साथ ही ज्ञानी हो और गुणी भी हो। वह घर से निकल गयी। भाइयों ने बहुत खोजा, वह मिली ही नहीं।

वह छात्रा सीधे अयोध्या पहुँची। वहाँ वह सर्वत्र महात्माओं का निरीक्षण करती रही, शास्त्रार्थ छेड़ती रही। वहाँ से वह वृन्दावन होते चित्रकूट पहुँच गयी। चित्रकूट में तीन दिन से तहलका मचा हुआ था। अनुसुइया में नित्य ही कोई-न-कोई उसकी खबर सुना जाता था। लोग बताते थे– महाराज जी! एक ऐसी बाई जी आई हैं जिसे देखते ही साधु-महात्मा अपनी कुटिया में घुसकर ताला बन्द कर लेते हैं। उसके सामने कोई शास्त्रार्थ में नहीं टिक पा रहा है। वह सभी महात्माओं को ललकारे पड़ी है।

उस समय महाराज जी की सेवा में ब्रह्मचारी जी (पूज्य धारकुण्डी महाराज) ही थे। उन्हें आश्रम के लिए सामान लाने चित्रकूट जाना था। गुरु महाराज ने कहा– देखिहे रे! वहाँ पर एक भवानी आई है, भड़रौ (तहलका) मचाये पड़ी है। ब्रह्मचारी चले गये। लौटते समय वह सिरसा वन से गुजरे। उस दिन सिरसा वन में एक बहुत ही अच्छे महात्मा परसराम जी धूना लगाये विराजमान थे। वह लम्बे-तगड़े महात्मा! ऊँचाई लगभग सवा छ: फीट। उनके पास पन्द्रह-सोलह मोटे-मोटे सेवक-शिष्य थे। दर्शन की वह छात्रा उस समय परसरामजी से प्रश्न-परिप्रश्न में उलझी थी– महाराज! घर क्यों छोड़ा जाता है? जब भगवान ‘मुझमें तुझमें खड्ग खम्भ में’ सब जगह हैं तो यह घर छोड़कर कौन-सी विशेषता आप लोग पाते हैं? इसी प्रकार कुछ-न-कुछ अनाप-शनाप वह पूछती लगी रही और वह बताते जा रहे थे, संघर्ष चलता ही जा रहा था। उसी समय ब्रह्मचारी जी उनके समीप से निकले।

ब्रह्मचारी जी को देखते ही परसराम जी ने दूर से ही ललकारा– आइए, आइए ब्रह्मचारी जी! देखिए, इनके गुरु महाराज परमहंस जी घनघोर जंगल में रहते हैं, बहुत बड़े तपस्वी महापुरुष हैं, सिद्धपुरुष हैं। आइए विराजिये ब्रह्मचारी जी! उस छात्रा ने ब्रह्मचारी जी को ऊपर से नीचे तक देखा। वह गोर-अंगार तो थे ही, डीलडौल भी था। छात्रा ने कहा– ठीक है! मेरे प्रश्न का उत्तर आप ही दें। उसने वही प्रश्न किया। आश्रम के साधुओं के पास जानकारी तो होती ही है। जब यह क्षमता यहाँ के भक्तों में पायी जाती है तो साधकों का क्या कहना! दस मिनट में ही ब्रह्मचारी जी ने उसके सभी प्रश्नों का समाधान कर दिया।

छात्रा ने कहा– देखा, यह है समाधान! यह था उत्तर! आपलोग तो व्यर्थ ही दो घण्टे से माथापच्ची कर रहे थे। जिस फूल को मैं ढूँढ़ रही थी, पा गयी। मुँह से निकल ही तो आया बेचारी के! परसराम जी ने कहा– हूँ!,

मम अनुरूप पुरुष जग माहीं।

देखेउँ खोजि लोक तिहुँ नाहीं।।

ताते अब लगि रहेउँ कुमारी।

मन माना कछु तुम्हहिं निहारी।। (रामचरितमानस, ३/१६/९-१०)

बचिएगा ब्रह्मचारी जी! अब यह फूल पा गयी है। ब्रह्मचारी जी उस समय लड़के ही थे, मारे संकोच के गड़ गये। वह सोच रहे थे कितने जल्द भाग लेते। परसराम जी से कहकर वह चलने को हुए तो वह छात्रा बोली– मैं भी आपके साथ चलूँगी। परमहंसजी के दर्शन करूँगी। ब्रह्मचारी जी ने कहा– देख, मेरे साथ न चल! नहीं तो वह बाबा तुझे काटकर नदिया में फेंक देंगे और हमारा भी जन्मभर के लिए आश्रम से पत्ता कट जायेगा। वह साधारण बाबा नहीं हैं। वह बोली– कोई बात नहीं! मैं अकेली ही आऊँगी। दर्शन के लिए तो मना हो ही नहीं सकता।

ब्रह्मचारी जी जब वहाँ से दो-ढाई सौ मीटर निकल गये तो वह छात्रा भी वहाँ से उठी, चप्पल पहना, चश्मा लगाया और पीछे लग गयी। ब्रह्मचारी जी ने घूमकर देखा कि वह आ रही है। उनकी चाल स्वत: तेज हो गयी। वह इतनी तेजी से सीधे गये कि उससे एक घण्टा पहले ही महाराज जी के पास पहुँच गये। जो घटना घटित हुई थी, सबकुछ बता दिया और यह भी कहा– महाराज जी! वह यहाँ भी आ रही है। महाराज जी ने कहा– जब इतना ज्ञान-ध्यान बूँके हो तो आयेगी ही। अब आ ही रही है तो आवे।

कुछ देर पश्चात् वह छात्रा भी आश्रम पहुँच गयी। उसने नम्रतापूर्वक बड़ी श्रद्धा से महाराज जी को प्रणाम किया, एक ओर बैठ गयी। महाराज जी से उसने कुछ पूछा। जब महाराज जी उपदेश करने लगे तब वह धीरे-धीरे खिसकते-खिसकते महाराज जी के आसन के समीप आ जाती। महाराज जी बिगड़े– भाग चुड़ैल कहीं की! चढ़ी चली आवत है! चल उधर बैठ। वह मुस्कुराकर कोने में बैठ जाती थी और धीरे से फिर कुछ पूछ लेती थी। जब महाराज जी कुछ बोलने लगते थे तो वह पुन: खिसकते-खिसकते महाराज जी के समीप आ जाती थी। महाराज जी उसे पुन: डाँटते थे। इस प्रकार उसने महाराज जी को बहुत परेशान किया। ब्रह्मचारी जी को तो भयंकर अपशकुन होने लगे। महाराज जी उसे घर लौट जाने को कहते थे लेकिन वह जाती ही न थी। महाराज जी ने आश्रम से उसे खाना-पीना देना बन्द करा दिया।

आश्रम से थोड़ी ही दूर पर अनुसुइया जी का एक मन्दिर था। उस समय महाराज जी के आश्रम और अनुसुइया मन्दिर के बीच जंगल था। उस मन्दिर का पुजारी उस छात्रा को रोटी दे दिया करता था। वह रात्रि में खा-पीकर अनुसुइया मन्दिर में रहती और बड़े सबेरे ही महाराज जी के पास प्रणाम करने आ जाती थी। महाराज पूछते भी– क्यों रे भवानी! कहाँ रही? वह कुछ बताती न थी, कहती थी– कृपा है गुरु महाराज की! धीरे-धीरे नौ दिन बीत गये।

दसवें दिन रात्रि में महाराज जी लेटे हुए थे। महाराज जी के आसन के पीछे चार-छ: इञ्च नीचे एक आदमी के आने-जाने लायक खाली फर्श थी। वह कोठरी में आने-जाने का रास्ता था। उसी में पाँव रखकर लोग आते-जाते थे। रात को बारह बजे वह छात्रा अनुसुइया मन्दिर से दबे पाँव आई और महाराज के आसन के पीछे निचले खाली जगह में लेट गयी। महाराज को अपशकुन होने लगा। वह उठकर बैठ गये। वह स्वगत कहने लगे– हूँ! बात क्या है? सीने में भयंकर धड़कन क्यों हो रही है? खतरा-खतरा फड़क रहा है, क्या है? शेर आ गया क्या? महाराज ने टार्च उठाकर देखा– कहीं कुछ भी नहीं था। जब महाराज उठकर बैठ गये तो उस छात्रा ने भी संकल्प-विकल्प करना बन्द कर दिया। इधर महाराज को भी अपशकुन होना बन्द हो गया। महाराज जी पुन: लेट गये।

कुछ देर पश्चात् वह छात्रा पुन: संकल्प-विकल्प करने लगी। महाराज बोले– फिर धड़कन! बात क्या है? कोई सरप-वरप तो पीछे नहीं आ गया? महाराज ने टार्च जलाकर पीछे की ओर देखा तो वह छात्रा लेटी हुई थी। महाराज हँसे और उठकर खड़े हो गये। साधनकाल में महाराज जी प्राय: दिगम्बर ही रहा करते थे किन्तु आश्रम में पहुँचने पर लोग मलमल का बारीक कपड़ा आग्रह करके पहना देते थे। वैसा ही एक वस्त्र महाराज जी ने लपेट रखा था। घुटने तक का वह अधोवस्त्र कभी आगे और कभी पीछे की ओर झूलता रहता था। यों कहा जा सकता है कि हमारे गुरु महाराज को ढंग से कपड़ा पहनना भी पसंद नहीं था क्योंकि वस्त्र तो भगवान ने छुड़ाया था। जैसे लपेट लिया वैसा ही पर्याप्त था। वह खड़े हुए और लपेटे हुए उस टुकड़े को खोलकर फेंकते हुए बोले– ‘‘देख! मोरे माथे तोर काम न चली। मैं सचहूँ के साधू हूँ। मोके भगवान साधू बनाये हैं।’’

महाराज ने छड़ी हाथ में उठा लिया और बिगड़े– ‘‘चुड़ैल कहीं की! हजार बार कहा, यहाँ जंगल से भाग जा…..।’’ छात्रा समझदार थी। छड़ी महाराज जी के हाथ में देखते ही वह समझ गयी कि अब मार पड़ेगी, वह सन्न से भाग गयी।

महाराज जी ने आश्रमीय सेवकों से कहा– देखो रे! वह चुड़ैल यहाँ आकर पड़ी थी। लोगों ने उसके दुस्साहस पर आश्चर्य व्यक्त किया। बड़े सवेरे वह पुन: चली आयी और ब्रह्मचारी जी से बोली– ‘‘बस! हमने अन्तिम परीक्षा ले लिया। हमें सच्चे महापुरुष के दर्शन हो गये। अब मैं कहीं नहीं जा सकती। मैं यहीं रहकर भजन करूँगी और गुरु महाराज की सेवा करूँगी। गुरु महाराज नंगे रहते हैं, मैं भी नग्न रहूँगी। क्यों गुरुभाई?’’ ब्रह्मचारी जी वहाँ से हटकर गुरु महाराज के पास चले गये।

उसी समय महाराज जी के दो गृहस्थ भक्त सेमरिया गाँव से आ गये। महाराज जी ने कहा– ‘‘क्यों पाँड़े! इसे पकड़कर गाँव ले जा और इसके घर भेज।’’ वे लोग उसे पकड़ने बढ़े तो उसने कहा– ‘‘मुझे छूना मत। मैं काली का अवतार हूँ। भस्म हो जाओगे।’’ वह लोग झिझके। महाराज जी ने कहा– ‘‘क्यों रे, जब मैं कहता हूँ तो तू कौन-सी काली से डरता है?’’ उन लोगों ने कहा– जो आज्ञा महाराज! फिर पाण्डे ने पकड़ा पखौड़ा और घसीट ले चला। महाराज जी ने कहा– ‘‘नहीं रे! सम्मान के साथ ले जा और चली जा बेटा! तुम्हारा इसी में कल्याण है।’’ उसने गुरु महाराज को प्रणाम किया और बोझिल मन से गाँव चली गयी।

जब वह छात्रा गाँव पहुँची तो गाँवभर की स्त्रियाँ एकत्र हो गयीं। उनमें कुतूहल था कि नौ दिन से जो महाराज को तंग कर रही थी, वही आई है। चले देखें कौन है? कैसी है? गाँव के स्त्री-पुरुष सभी एकत्र हो गये। उन सबके समक्ष उस छात्रा ने अच्छा उपदेश दिया। पहले तो उसने अपना परिचय दिया, फिर कहा– यह महाराज जी भगवान हैं। वह ब्रह्मचारी जी बड़े अच्छे महापुरुष होंगे। हमने बहुत भ्रमण किया लेकिन न हमने यह विद्या कहीं देखी, न संतों की ऐसी रहनी कहीं देखी। आप सभी भाग्यवान हो जो आपका यहाँ जन्म हुआ। मेरा दुर्भाग्य है कि मैं जा रही हूँ। गुरु महाराज का आदेश है कि ‘बेटा! घर में रहकर भजन कर, तुम्हें मदद मिलेगी।’ इसलिए आप सबसे विदा लेती हूँ। यही है– गले डारि तुलसी की माला, तीन लोक भरमावै।

संग ते जती कुमंत्र ते राजा। (रामचरितमानस)

गुरु महाराज जी कहते थे– हो! हम आश्रम में अपनी बहन को रहने की अनुमति दें, अपनी माँ को रखें या किसी बिटिया को रहने दें; लोग क्या जानेंगे? लोग तो यही कहेंगे कि बाबा मेहरिया रखे हैं। इसलिए यद्यपि शुद्धम् लोकविरुद्धम् न करणीयम्।– हालांकि शुद्ध है, निर्दोष है लेकिन कोई आचरण लोकदृष्टि के विरोध में है तो न करणीयम्– नहीं करना चाहिए। साधुता के प्रतिबन्ध इतने कठोर होते हैं। इसीलिए गुरु महाराज के इस निर्देश का पालन आज भी यथावत् है– ज्यों-का-त्यों कहीं कोई संशोधन नहीं। अग्रेतर पंक्तियों में सन्त कबीर बताते हैं कि जब माया येन-केन प्रकारेण कामयाब हो गयी तब क्या होता है?–

कद्दू काट मृदंग बनाया, नीबू काट मजीरा।

लौ ही लौकी है। माया भजन की लौ (इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति) ही काट देती है, सुरत की डोर भगवान में नहीं रह जाती। फिर चाहे आप भजन में बैठे ही क्यों न रहें, मृदंग बजता रहता है कि यह चाहिए, वह चाहिए। मन योजनाएँ बुनने लगता है। चित्तवृत्ति में तरंगें उठने लगती हैं और प्रभु के चिन्तन का जो नियम था, वह नियमरूपी नीबू भी कट जाता है। भजन में, नियम में कटौती होने लगती है, नियम से बैठने पर मजीरे की तरह टन्न-टुन्न कुछ आवाज आने लगती है, स्वाँस छूट जाता है। विकारों के संकल्प-विकल्प स्वाँस को दूषित कर देते हैं। साथ ही,

पाँच तुरैया मंगल गावैं– पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ– त्यागरूपी तुरैया, इन ज्ञानेन्द्रियों में पूर्ण त्याग की जो स्थिति थी, ये पाँचों– रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श जो बाहर देख रही थीं, त्याग द्वारा उसे अपने अन्त:करण में ही देखने का अभ्यास कर रही थीं, रूप हृदय में देख रही थीं, इष्ट की वाणी शब्द को समझ रही थीं– अब तक तो त्याग था किन्तु माया ने जब छेड़ ही दिया तो इन्द्रियों का संयम टूट गया। त्याग से संयुक्त पाँचों इन्द्रियाँ मंगल गावैं– पहले तो भजन कर रही थीं, अब ये अमंगल गायन करने लगती हैं, जिसमें अकल्याण है उसका चिन्तन करने लगती हैं।

जहाँ इन्द्रियाँ बाहर की ओर बहकीं तो नाचे बालम खीरा– बालम अर्थात् प्रियतम प्रभु के प्रति ख्यालरूपी खीरा नाचने लगता है, डगमगाने लगता है। सुरत वहाँ से लड़खड़ा जाती है, उसमें कम्पन पैदा हो जाता है। ऐसी दशा में,

उल्टा चिल्ली देत पैतरा, कौआ तीर चलावे।

चित्त ही चिल्ली है, चिल्होर है। यह सीधा भजन में लगा था, अब उधर से पलटकर पैंतरा भाँजने लगता है। संसार में वैभव विभूति का अन्वेषण करने लगता है कि आश्रम बना लें तो इतनी महिमा फैल जायेगी। कर्म ही कौआ है। यदि हम भजन में प्रवृत्त हैं तो करम या तकदीर में कैसा भी कुसंस्कार हो, कामयाब नहीं हो सकता, वह दबा रहेगा या क्षीण होकर समाप्त हो जायेगा; किन्तु ज्योंही चित्त पलटकर संसार में पैतरा भाँजने लगा तो उस करम संस्कार को खुलकर खेलने का अवसर मिल जाता है, प्रसुप्त संस्कार कामयाब होने लगते हैं, घटित होने लगते हैं। वे तीर मारने लगते हैं। वृत्ति और भड़कती जाती है।

पेड़ चढ़े मछली फल खावे, बगुला भोग लगावै।

भौतिक जगत् में पेड़ पर मछली कैसे चढ़ सकती है; किन्तु अध्यात्म में ऐसा ही है। संतों ने मन की उपमा मछली से दी है–

राम भगति जल मम मन मीना।

किमि बिलगाइ मुनीस प्रवीना।। (रामचरितमानस, ७/११०/११)

अब तक भक्तिरूपी जल में मन मछली की तरह था लेकिन जब चित्त माया में पैतरा भाँजने लगता है, मन संसाररूपी वृक्ष में फल ढूँढ़ने लगता है। अब संसार विटप नमामहे(मानस, ७/१२/५)– गीता में भी संसार को वृक्ष की संज्ञा दी गयी है–

 ऊर्ध्वमूलमध:शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।

 छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तंवेद स वेदवित्।। (गीता, १५/१)

ऊपर परमात्मा जिसका मूल है, नीचे कीटपतंगपर्यन्त प्रकृति जिसकी शाखा-प्रशाखा है, संसार ऐसा एक वृक्ष है। माया से आप्लावित मन अब कामना करके इसी संसार वृक्ष से फल प्राप्त करना चाहता है। संसार में शाश्वत कुछ भी नहीं है। जो कुछ होगा, क्षणिक होगा किन्तु मनरूपी मछली यही खाना चाहता है और बगुला भोग लगावै– ऊपर से तो साफ-सुथरा किन्तु भीतर से बकध्यानी प्रवृत्ति जागृत हो जाती है। साधु देखने में तो ठीक रहेगा किन्तु कहीं माल-पानी मिला तो चोंच अवश्य लग जायेगी। वह अवश्य फिसल जायेगा क्योंकि करम को तीर चलाने का अवसर मिल जायेगा। मायाग्रस्त ऐसा साधक जब संसार में ही कल्याण ढूँढ़ने लगा, बकध्यानी प्रवृत्ति आ गयी, ऐसे साधक को केवल एक वस्तु अच्छी लगती है–

भैंस पद्मिनी चूहा आशिक, मेढक ताल लगावै।

भ्रम ही भैंस है। साधक को संसार की भ्रान्तियाँ ही श्रेष्ठ लगने लगती हैं। जिस तरह नारियों में पद्मिनी को श्रेष्ठ माना जाता है उसी तरह माया से विवश साधक को भ्रम कल्याणकारी प्रतीत होने लगता है और चूहा आशिक– चित्त ही चूहा है, वह उत्तरोत्तर उस भ्रम में आसक्त होता जाता है। मेढक ताल लगावै– मनवै मेढक है। यह समय-समय पर टर्र-टर्र ताल लगाता रहता है। यह एक क्षण में साधुता की बातें करेगा तो दूसरे क्षण व्यवसाय-कारोबार की ओर चला जायेगा।

छतरी चढ़ि के मकरी नाचै, झींगुर बन्द लगावै।

ठगिनिया क्या……..

जहाँ इतनी गिरावट आयी तहाँ मायारूपी मकड़ी साधक के सिर पर चढ़कर अपना जाल बुन देती है, दिल खोलकर नृत्य करने लगती है। लोकगीतों में भी माया के लिए मकड़ी का प्रयोग देखने को मिलता है–

तोहके घेरले बाटइ ई माया, जैसे जाला मकड़ी।

उस समय झंझटरूपी झींगुर बन्द लगाने लगते हैं, माया को बढ़ावा देते हैं। तरह-तरह की झंझट उसके सामने आकर खड़े होते हैं जिनसे वह न निकल पाता है न भजन-चिन्तन के लिए सोच ही सकता है। अब साधुता में बचा क्या? इस पर कहते हैं–

चोलना पहन के गदहा नाचे, ऊँट विसन पद गावै।

वेशभूषा तो सन्त का है, चोला तो ठीक पहना है लेकिन है गधा। गधा जड़ता का प्रतीक है। रावण के अनेक सिरों में एक सिर गधे का था। इस साधक की भी यही दशा है। वह खूब नाचता है– कभी इधर फरेब रचता है तो कभी उधर रचता है, कभी यह तो कभी वह योजना बनायेगा, कभी लोककल्याण के नाम पर शिविर खोल देगा, कभी पत्रिका निकालेगा– कुछ न कुछ करता ही रहेगा किन्तु वह है गधा! मूढ़! जड़! उसके पास देने लायक कुछ भी नहीं है।

एक बार हम दिल्ली गये हुए थे। वहाँ हमें एक महात्मा मिले जो अपने को ब्रह्माण्ड गुरु कहते थे। उनका चैलेन्ज था– ‘जो उनकी घोषणाओं को गलत सिद्ध कर देगा उसे एक लाख रुपये वह ईनाम देंगे।’ एक पतली-सी पुस्तिका में वे घोषणाएँ थीं। हमने साथ चल रहे भक्तों से कहा– पूछ लो, इनके पास पहनने को कपड़ा है या लाख रुपया ईनाम ही देंगे। यही था चोलना पहन के गदहा नाचै। थोथा चना बाजे घना! करता कुछ नहीं था, कहता था– ‘मैं आत्मा हूँ, ब्रह्म हूँ।’; यही सब लिखा था उसकी घोषणाओं में! ऐसा साधक साधुता की प्रदर्शनी खड़ी कर देता है; लेकिन ऊँट विसन पद गावै– ऊँट अर्थात् उर, उसका हृदय व्यसनों का पद गा रहा है। किसी को अफीम खाने का व्यसन है, किसी को गाँजा-शराब पीने का व्यसन, किसी-न-किसी प्रकार का सांसारिक व्यसन उसके हृदय में लगा है। जब भ्रमपूर्ण विचार ही श्रेष्ठ लग रहे हैं तो वही व्यसन हैं।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरु शरण बचावै।

कबीर साहब कहते हैं– संतो! ध्यान से श्रवण करें। इस माया से मैं तो बच गया लेकिन सबके बचने का केवल एक मार्ग है– सत्गुरु की शरण ही इस ठगिनी माया से बचा सकती है।

द्वार धनी के पड़ि रहे, धक्का धनी का खाय।

कबहुँक धनी निवाजिहैं, जो दर छाँड़ि न जाय।।

धनी अर्थात् मालिक के दरवाजे पर पड़े रहो। मालिक ही है तो भूल-चूक के लिए डाँट पड़ेगी, धक्का मिलेगा। महाराज जी नाराज होते तो बोलते– बाँध बिस्तर! भाग यहाँ से! तोर बाप कमाय के लाये रहा, भोजन करै बैठ गया थरिया लेके? कभी-कभी किसी साधक को भोजन कराये बिना ही भगा देते थे। लेकिन वह जंगल में अन्यत्र जाता भी कहाँ? वह दाहिने-बायें कहीं हट जाता और शाम होने से पहले ही आश्रम चला आता था। फिर भी एक समय का उपवास तो हो ही जाता था। आश्रम में एक ही समय मध्याह्न में भोजन बनता था, शाम को भोजन नहीं बनता था। अब डाल का चूका बन्दर और पंगत का चूका साधु, दूसरे दिन ही अन्न से भेंट होती है।

महाराज जी दयालु भी बहुत थे। नाराज होने के दस-बीस मिनट में ही खुश हो जाते थे। फिर उस साधक को कुछ खिलाने-पिलाने को कह देते थे। कुछ न हो तो कह देते थे– ‘‘दे रे गुड़-सुड़! ठीक है, महीना में एक दिन उपवास जरूर करै का चाही। पेट की मशीन बन्द तो होती नहीं। उपवास करने पर मशीन पेट में बचे कचरे को जलाकर नीरोग बना देती है। उससे आरोग्य बढ़ता है, रोग पास नहीं आते। क्यों रे! बैरागी लोग साल में चौबीस एकादशी व्रत रहते हैं, उपवास करते हैं, तू एकौ न रहिहै।’’ इस प्रकार डाँट पड़ गयी, पेट में अन्न नहीं! भजन छोड़कर बचा ही क्या? पश्चाताप के साथ, स्मृति के साथ, चिन्ता के साथ लगने से भजन होता है। इस प्रकार महापुरुष के दरबार में धक्का भी मिलता है।

कबहुँक धनी निवाजिहैं, जौ दर छाँड़ि न जाय।

एक दिन ऐसा आयेगा कि धनी तुम्हें अपने संरक्षण में ले लेगा। तुम्हें अपना धाम मिल जायेगा, यदि उस धक्का-मुक्की से ऊबकर धनी का दरवाजा छोड़कर भाग नहीं जाते।

जब कभी कोई गृहस्थ भक्त गुरु महाराज के दर्शन को आता और हठ करने लगे कि महाराज! अब घर जाने का मन नहीं करता, तो महाराज जी उससे कहते थे– ‘‘हो! जाये का त पड़बै करी! बिना गये बनबौ ना करी! शरीरिया से यहूँ पड़े रहे से का होई? मनवा तो घर आवा-जावा करत है। लेओ, फिर जाओ! शरीरिया से कहीं भी रहो, मनवा से आवा-जावा करो। साँझौ-विहान मोर रुपवा मन से देखा करो। जिस दिन पाँच मिनट भी देख ले जइहै, वहि दिन जेकर नाम भजन है वह तुम्हें मैं यहाँ बैठे-बैठे दे दूँगा और तू पाऊ जइहै।’’ भजन कहने में नहीं आता, लिखने में नहीं आता, किताबों में भजन है ही नहीं। वह तो अनुभवी सद्गुरु के द्वारा किसी-किसी अनुरागी विरही साधक के हृदय में जागृत हो जाया करता है। कबीर कहते हैं कि ऐसे सद्गुरु की शरण ही माया से बचा सकती है।

‘रे ठगिनिया! क्या नैना झमकावै।’– ठगनेवाली नटिनी! अब क्या आँखें टेढ़ी-मेढ़ी करती है, ललचायी आँखों से क्या दृष्टिपात् करती है! ‘कबिरा तेरे हाथ न आवै’– कबीर अब तुम्हारे चंगुल में फँसनेवाला नहीं है। भगवत्-पथ में एक स्तर ऐसा आता है जहाँ माया रहती तो है किन्तु उस साधक पर भगवान का वरदहस्त भरपूर रहता है इसलिए माया करि न सकै कछु निज प्रभुताई। (रामचरितमानस, ७/११५/७)– वहाँ वह अपना प्रभुत्व नहीं जमा सकती। वहाँ माया नाचनेवाली नटी मात्र है। यह सब उनके लिए है जो गुरु के सहारे अहर्निश प्रतिज्ञाबद्ध होकर साधना, सेवा, चिन्तन में लगे रहते हैं और अन्तत: वे पा जाते हैं।

!! ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!

(अमृतवाणी भाग-3’ से उद्धृत)

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