गुरु ने पठाया चेला न्यामत लाना

गुरु ने पठाया चेला न्यामत लाना

गुरु ने पठाया चेला न्यामत लाना।

पहली न्यामत पानी लाना, कुआँ बावली के पास न जाना,

नदिया नाला छाँड़ि के चेला, तुम्बा भर के लाना।।

गुरु ने पठाया…..।।

दुसरी न्यामत आटा लाना, हाट बाजार के पास न जाना,

कूटा पीसा छाँड़ि के चेला, खप्पर भर के लाना।।

गुरु ने पठाया…..।।

तिसरी न्यामत लकड़ी लाना, जंगल झाड़ के पास न जाना,

सूखा गीला छाँड़ि के चेला, गट्ठर बाँध के लाना।।

गुरु ने पठाया…..।।

चौथी न्यामत कलिया लाना, जीव जन्तु के पास न जाना,

जिन्दा मुर्दा छाँड़ि के चेला, हण्डी भर के लाना।।

गुरु ने पठाया…..।।

पाँचवीं न्यामत भगती लाना, वेद किताब के पास न जाना,

कहत कबीर सुनो भाई साधो, निर्मल होके आना।।

गुरु ने पठाया…..।।

सन् १९५५ के व्यतीत होने में दो महीने रह गये थे जब हम पूज्य गुरु महाराज की शरण में अनुसुइया आये थे, उन आरम्भिक दिनों में यह भजन और इसका आशय महाराज जी से सुनने को मिला था।

गुरु का शाब्दिक अर्थ है अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलनेवाला। यही वैदिक ऋषियों की कामना भी है– तमसो मा ज्योतिर्गमय। तत्त्वदर्शियों के लिए प्रयुक्त होनेवाले इस शब्द का प्रयोग कालान्तर में शिक्षा-दीक्षा देनेवाले आचार्यजनों, कुल-पुरोहितों किंवा सभी आदरणीयों तथा समवयस्कों के सम्बोधन तक होने लगा जिससे इस शब्द का वास्तविक आशय धूमिल पड़ गया।

प्राचीन भारत में शिक्षा-दीक्षा गुरुकुल प्रणाली पर आधारित थी। विद्यार्थी आचार्य को गुरु कहते थे। वे अपने लिए तथा गुरुजी के लिए भी समाज से भिक्षा ले आया करते थे। शिक्षा पूर्ण हो जाने पर शिष्य द्वारा आचार्य गुरु को दक्षिणा देने की परम्परा थी। देश, काल, परिस्थिति एवं मानव-स्वभाव की दुर्बलताओं से विवश आचार्य गुरु कभी-कभी विचित्र दक्षिणाएँ माँग बैठते थे; जैसे– आचार्य द्रोण ने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि पांचाल नरेश द्रुपद को हमारे चरणों में गिरा दो। एकलव्य से दक्षिणा में उन्होंने अँगूठा ही माँग लिया। आचार्य गुरु शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री के हठ पर एक राजकुमारी को दासी बना डाला। आचार्य वरतन्तु ने शिष्य कौत्स से चौदह हजार स्वर्ण मुद्राएँ माँग लिया। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अपने शिष्य गालव से ८०० श्यामकर्ण घोड़ों की माँग कर दी जिसकी आपूर्ति में उन्हें छठी का दूध याद आ गया। इन्हीं कठिनाइयों को देखते हुए आजकल शुल्क और वेतन पर आधारित शिक्षा प्रणाली प्रचलित है जिसमें गुरु-दक्षिणा का औचित्य ही समाप्त हो गया।

दीक्षा देनेवालों को भी गुरु कहने की परम्परा है जो दैवी शक्तियों की प्रसन्नता के लिए मंत्रों की दीक्षा देते हैं। किसी सम्प्रदाय में मंत्र के लिए हजार-पाँच सौ रुपये की दक्षिणा निर्धारित है, तो कहीं कम शुल्क से भी काम चल जाता है। गोरखपन्थ में दीक्षित योगियों को जीवन में एक बार अपने परिवार से भी भिक्षा ले आना होता है।

कुलगुरुओं को भी गुरु कहने का प्रचलन है। यह उपरोहित या कुलगुरु परिवार की महत्त्वपूर्ण घटनाओं पर घर-घर जाकर और तीर्थगुरु तीर्थों के माध्यम से लोकमंगल का विधान करते और गृहपतियों से पुष्कल दक्षिणा प्राप्त करते हैं।

काशी क्षेत्र में गुरु शब्द समवयस्कों के दैनिक व्यवहार में भी प्रयुक्त होता है। ठंढाई-प्रेमी एक दूसरे से मिलने पर पूछते हैं– ‘का गुरु छनल!’ ठंढाई पी लेने पर कहेंगे– ‘का गुरु गँठल।’ किन्तु गुरु शब्द का वास्तविक प्रयोग उन महापुरुषों के लिए है जो शिष्य को परमात्मा तक की दूरी तय कराते हैं, भवसागर से पार कराते हैं–

गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई।

जौं बिरंचि संकर सम होई।। (मानस, ७/९२/५)

इसीलिए अन्य आदरणीयों से पृथक् करने के लिए आध्यात्मिक गुरुओं को सद्गुरु कहा जाता है जो सत् एकमात्र परमात्मा की शोध में सहायक हैं। इन सद्गुरुओं के यहाँ भौतिक वस्तुओं की भेंट नहीं लगती। उनके पास लगता है मन का समर्पण! सद्गुरुओं के यहाँ केवल श्रद्धा लगती है।

एक अच्छे महापुरुष थे। उनके पास एक भक्त युवक आया। उसने निवेदन किया– ‘‘भगवन्! मुझे भजन की विधि प्रदान करें, ब्रह्मविद्या का उपदेश करें। मैं आपके आदेश का पालन करूँगा।’’ महात्मा ने कहा– ‘‘ठीक है! तुम गंगा-स्नान करके आओ, फिर ले लो विद्या।’’ गंगा समीप ही थी। युवक चला गया।

आश्रम में एक भंगिन झाड़ू लगा रही थी। गुरु महाराज ने कहा– ‘‘बेटा! एक नवयुवक साधु बनने आया है। वह स्नान करने गया है, अभी आता होगा। तू इस ढंग से झाड़ू लगा कि धूल-गर्दा उड़कर उसके ऊपर गिरे। लेकिन भाग जाना, वह पत्थर मार सकता है।’’ उस नवागन्तुक के शरीर पर ज्योंही गर्द पड़ी, वह बड़ी जोर से बिगड़ा– ‘‘चुड़ैल कहीं की! नालायक! इतनी भी समझ नहीं है कि कोई भला आदमी आ रहा है तो झाड़ू लगाना थोड़ी देर के लिए बंद कर दे।’’ उसने दो-चार पत्थर खींचकर मारा; किन्तु भंगिन सावधान थी, वह अगल-बगल हट गयी। उस व्यक्ति ने पुन: स्नान किया, गुरुदेव को प्रणाम किया। गुरुजी बोले– ‘‘हूँ! भूँकता है और काटता भी है। जाओ, अभी एक वर्ष तक किसी एक नाम का जाप करो, उसके पश्चात् आना। अभी तुममें दीक्षा लेने की पात्रता नहीं है।’’

आगन्तुक की लगन सच्ची थी। एक वर्ष के उपरान्त वह पुन: गुरुजी के पास आया। उन्होंने कहा– ‘‘गंगा-स्नान कर आओ।’’ युवक के जाते ही गुरुजी ने उसी सफाईकर्मी से कहा– ‘‘बेटा! देखो, वह पुन: आया है। ऐसा कर, इस ढंग से झाड़ू लगा कि दो-एक सींक उसके पाँव से छू जाये। डरना नहीं, वह पत्थर तो नहीं मारेगा किन्तु लगता है अभी हल्ला बहुत करेगा।’’

वह बेचारा गंगा-अवगाहन करके बहुत बच–बचा के चल रहा था कि उस भंगिन ने झाड़ू की सींक छुआ ही तो दिया। वह बिगड़ा– ‘‘नालायक, बदतमीज कहीं की! इतने पवित्र आश्रम में ये अशिष्ट लोग पता नहीं कहाँ से आ गये?’’ उसने बड़ी खरी-खोटी सुनाया, पुन: स्नान कर गुरुजी से निवेदन किया– ‘‘भगवन्! कृपया शरण में रख लें।’’

उन महात्मा ने कहा– ‘‘हूँ! तुम्हारा मन काटता तो नहीं, अभी भूँकता बहुत है। जाओ, एक वर्ष और उसी नाम का जप करो, फिर आना।’’ एक वर्ष के पश्चात् वह आया, स्नान करने गया। उन महात्मा ने उस भंगिन से कहा– ‘‘बेटा! टोकरी में पत्तियाँ भर ले, कोई गंदी चीज न रहे। जब वह सीढ़िंयाँ चढ़ने लगे, चबूतरे के ऊपर से कचरे की टोकरी अचानक झटके से उसके सिर पर फेंक देना।’’ भंगिन ने वैसा ही किया। तब वह युवक हाथ जोड़कर बैठ गया– ‘‘माताजी! दो वर्ष धक्का खाते हो गया। निमित्त आप ही थीं। क्षमा करें, हमसे बड़ी भूल हुई। हमें देखकर चलना चाहिये था।’’ उसने पुन: स्नान किया, गुरु महाराज को प्रणाम किया। उन्होंने कहा– ‘‘हाँ बेटा! अब तुम्हारा मन रिक्त हो गया है। अब तुम वस्तु लेने लायक हो गये हो।’’ इसके पश्चात् उस साधक द्वारा साधना अच्छी पकड़ में आ गयी। इसलिए सद्गुरु की शरण में जाने पर तन-मन का समर्पण आवश्यक है। मस्तिष्क में जितना पुराना कचरा है, फेंक दें।

इसी प्रकार एक अन्य कथानक है। एक युवक किसी संत के पास पहुँचा। वह बोला– ‘‘आपने हमारा नाम सुना ही होगा। मीडिया मेरे बारे में प्रसारण करता ही रहता है। मैं सभी विद्याओं का विद्वान् हूँ। भागवत, वेद, पुरान, कुरान सब मुझे कण्ठस्थ हैं। कृपया मुझे शरण में रख लें। वैसे, आपको कुछ बताना नहीं पड़ेगा। एक परम्परा है गुरु बनाने की, इसलिए आपके पास आया हूँ।’’ वह महापुरुष बिगड़े– ‘‘मूर्ख! जब तेरे मस्तिष्क में पहले से ही कचरा भरा पड़ा है, मैं अपनी वस्तु कहाँ दूँगा? तू रखेगा भी कहाँ? चलो, जैसा तू मुझे गुरु बना रहा है, वैसा ही चेला मैं तुझे मान लेता हूँ। मैं बद्रीनाथ यात्रा पर जा रहा हूँ, तू भी मेरे साथ चल।’’ एक पुराने सेवक और इस नये शिष्य के साथ गुरु की यात्रा प्रारम्भ हुई।

पगडण्डियों का रास्ता! उस जमाने में पैदल चलकर चार-छ: महीने में लोग बद्रीनाथ धाम पहुँच पाते थे। यत्र-तत्र रुकते महीने–डेढ़ महीने बीत गये। रास्ते में एक गाँव पड़ा। गुरु महाराज ने गाँव के बाहर कुएँ के समीप एक घने वृक्ष के नीचे आसन लगाया। शिष्य ने भोजन का प्रबन्ध किया। कुछ खा-पीकर गुरु-शिष्य सभी चिन्तन-भजन में बैठ गये। अकस्मात् किसी नारी का करुण-क्रन्दन सुनाई पड़ा। वह विद्वान् शिष्य उठकर आवाज की दिशा में जाने लगा। गुरु महाराज ने कहा– ‘‘बेटा! कहाँ जा रहे हो?’’ शिष्य ने कहा– ‘‘गाँव से किसी के रोने की आवाज आ रही है।’’ गुरु महाराज ने कहा– ‘‘बेटा! कहीं सोहर, कहीं गाना-बजाना तो कहीं कोई चल बसता है तो लोग विलाप करते हैं; यह तो लगा ही रहता है। यही तो तू छोड़कर आया है। इसी का नाम संसार है। यह तो होता ही रहेगा, तू बैठ। कर भजन!’’ शिष्य बोला– ‘‘आप पढ़े-लिखे तो हैं नहीं; आप क्या जानें वेदशास्त्र में परोपकार की कितनी महिमा लिखी है! उसमें है, कोई दु:खी हो तो उसकी अवश्य सहायता करनी चाहिए– परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।। (मानस, ७/४०/१)’’

गुरु महाराज मना करते ही रह गये। वह शिष्य गाँव गया। उसने देखा– एक पण्डितजी मर चुके थे, पंडिताइन बैठकर रुदन कर रही थी। पण्डितजी का व्यवहार अच्छा न था। गाँवभर ने रुदन सुना किन्तु सान्त्वना देने और अर्थी उठाने कोई भी नहीं आया। ब्रह्मचारी जी ने कहा– तुम चिन्ता मत करो पंडिताइन! मैं आ गया हूँ। मैं सब देख लूँगा। उन ब्रह्मचारी ने गाँववालों को फटकारा– ‘‘बैर और प्रेम जीवन तक ही शोभा देता है। अब मरे हुए से विरोध छोड़ो।’’ समझाने-बुझाने से गाँव के सभी लोगों ने मिलजुलकर शव का अन्तिम संस्कार किया। दिवंगत आत्मा की शान्ति हेतु ब्रह्मचारीजी भी गाँववालों को कथा-पाठ सुनाने लगे।

प्रात:काल तक शिष्य के न लौटने पर गुरु महाराज बद्रीनाथ की यात्रा पर निकल गये। शिष्य गाँववालों को कथा सुनाता रहा। तेरह दिनों तक चली कथा के समापन पर गाँव के लोगों ने इतनी अधिक सामग्री अर्पित किया कि धूमधाम से पण्डितजी के त्रयोदशाह के बाद भी चार-छ: बोरे गेहूँ, शक्कर, घी-तेल इत्यादि बच रहा। पंडिताइन ने देखा कि बाबाजी तो बड़े काम के हैं; पण्डित के रहने पर कभी एक बोरी अनाज घर में देखने को न मिलता था। उसने सोचा– इन्हें किसी युक्ति से रोक लेना चाहिए। उसने उस विद्वान् युवक से कहा– ‘‘भगवन्! शास्त्रों में विद्वानों की महिमा बहुत सुनी थी, आज प्रत्यक्ष देख रही हूँ। कितनी सरस कथा आपने सुनाई। मन को बड़ी शान्ति मिली। हमारे पण्डितजी अपने पीछे छ:-आठ साल के दो बालक छोड़ गये हैं। स्वयं तो निरक्षर थे ही, बच्चों की शिक्षा का भी कोई प्रबन्ध नहीं कर पाये। गाँव के लोग विरोध में हैं ही। ये ब्राह्मण बालक भी निरक्षर ही रह जायेंगे। कृपा करें, इन अनाथ ब्राह्मण बालकों का यज्ञोपवीत कर इन्हें साक्षर बनायें। आप जैसा विद्वान् यहाँ कोई है भी तो नहीं।’’

प्रशंसा विद्वानों की कमजोर नस हुआ करती है। वह शिष्य फूलकर कुप्पा हो गया। वह बोला– ‘‘पण्डिताइन! तुम चिन्ता मत करो। यहाँ ही नहीं, मेरे-जैसा विद्वान् काशीपुरी और अवन्तिका में भी नहीं है। ठीक है, मैं इन बच्चों को पढ़ाकर दिखा दूँगा कि विद्वान् किसे कहते हैं!’’ अब वह विद्वान् शिष्य वहीं रुककर बच्चों को पढ़ाने लगा। ब्राह्मणी भी बच्चों को उनके संरक्षण में सौंपकर निश्चिन्त हो गयी।

लड़के मनोयोग से पढ़ने लगे। गुरुजी विश्राम करते तो लड़के चरण दबाते। लड़कों ने गुरुजी के चरणों को आपस में बाँटकर एक-एक चरण को अपना-अपना गुरु मान लिया था। एक दिन निद्रा के आवेग में बड़े बच्चे के हिस्से का पैर छोटे बच्चे के गुरु-पैर से छू गया। छोटे लड़के ने एक मुक्का मारकर उस पाँव को हटा दिया। बार-बार हटाने पर भी वह पाँव दूसरे पाँव पर चढ़ जा रहा था। छोटे लड़के ने कहा– तुम्हारे गुरुजी बड़े सुग्घर हैं जो हमारे गुरुजी को लात से मार रहे हैं। एक-दो बार तो उसने हटाया, फिर तैश में आकर छोटी-सी कुल्हाड़ी उठाकर बड़े भाई के हिस्सेवाले पैर पर प्रहार कर दिया। साधु बाबा जजककर उठे। तब तक दूसरा प्रहार हो चुका था जो उनके नाक और होठ से टकराया। नाक कट गयी। आक्रोश में उन्होंने पण्डिताइन को उलाहना दिया– ‘‘पंडिताइन! तुम्हारे बच्चे बड़े नालायक हैं, गँवार हैं। हमारी नाक काट दिये।’’ उसने कहा– ‘‘महाराज! हमने तो साल भर से बच्चों को आपको सौंप दिया था। विद्वान् बनाते-बनाते आपने उन्हें नालायक बना डाला। आपने ही उन्हें सिखाया-पढ़ाया तो भुगतेगा कौन?…’’ दो-चार खरी-खोटी उसने भी सुनाई। काज परे कुछ और है, काज सरे कुछ और।– यही लोकरीति है।

तब तक किसी ने कहा– कुएँ पर दो महात्मा आये हैं। गाँव के लोग उधर चले। वह शिष्य भी गया तो देखा– गुरु महाराज बद्रीनाथ की यात्रा से वापस आ गये हैं। नासिका के बल बोलते हुए उसने कहा– ‘‘अरे गुरु महाराज! हमारी तो नाक कट गयी।’’ गुरु महाराज ने कहा– ‘‘अपनी नाक जाकर वेद में ढूँढ़! तू तो विद्वान् है, यहाँ क्या करने चला आया?’’ शिष्य के गिड़गिड़ाने पर गुरु महाराज द्रवित हो गये, आदेश दिया– ‘‘अब यहाँ से चल, भजन कर!’’ संत कबीर ने ऐसे ही लोगों को लक्ष्य कर कहा था–

पढ़े लिखे कुछ बेद शास्तर, भरल गुमान बरन का।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, लानत ऐसे तन का।

कोई सफा न देखा दिल का।।

इसलिए जितनी भी सांसारिक विद्या है, सब रटंत विद्या है। यह रटंत विद्या वहाँ काम नहीं देती। वह विद्या, सद्गुरु की विद्या एक जागृति है। अपने मन को रिक्त कर, समर्पण करके जो उनके पास जाता है, उन्हीं के हृदय में वह विद्या प्रसारित हुआ करती है। इसी आशय का कबीर का एक भजन है जिसमें गुरु महाराज ने शिष्य से पाँच वस्तुओं की अपेक्षा किया है जो सब मिलाकर मन का समर्पण है–

गुरु ने पठाया चेला न्यामत लाना।

नेमत अरबी भाषा का स्त्रीलिंगीय शब्द है जिसका आशय उत्तम भोजन या उपहार है। गुरु ने कहा– यदि तुम्हें शिष्य बनना है तो हमारे लिए कुछ उपहार लेकर आओ। नियामत अर्थात् नवीन मत, नवीन सिद्धान्त लेकर आओ अर्थात् अपनाओ। पहले से मस्तिष्क में जो भरे हो, उसे त्याग दो। क्या लावें?–

पहली न्यामत पानी लाना।

पहली नियामत है कि पानी लाओ! लेकिन उसे कुएँ या बावली से मत लाना, नदी और नालों से मत लाना अर्थात् संसार में जो पानी मिलने के स्थल हैं, उनसे नहीं लाना। बाह्य पानी से इसका कोई प्रयोजन नहीं है और पानी लाना है। वास्तव में यह पानी है प्रेमा-भक्ति।

राम भगति जल मम मन मीना।

किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।। (मानस, ७/११०/९)

प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।

अभिअंतर मल कबहुँ न जाई।। (मानस, ७/४८/६)

रामभक्ति ही जल है। भक्ति में प्रेम ही पानी है। प्रेमरूपी पानी लाओ!

प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा परजा जेहिं रुचे, शीश देइ लै जाय।।

प्रेम बाजार में नहीं बिकता, बाड़ी में उत्पन्न नहीं होता। राजा हो चाहे परजा; शीश दे दो, प्रेम ले लो।

प्रेम बिकन्ता मैं सुना, जो सिर साँटे देय।

लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय।।

लोभी शीश नहीं दे सकता, प्रेम का केवल नाम लेता है। रामचरितमानस का प्रसंग है। राक्षसों के आतंक से एक बार पृथ्वी व्याकुल हो गयी। वह गाय का रूप धारण कर देवताओं के पास गयी, विधाता के पास गयी। विधाता ने जान लिया कि यह क्यों आयी है। किन्तु विचार किया कि मैं भी कुछ उपाय नहीं कर सकता–

ब्रह्मा सब जाना मन अनुमाना मोरहु कछू न बसाई।

जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई।। (मानस, १/१८३, छन्द)

जिसकी तुम दासी हो, वह अविनाशी है। हमारा-तुम्हारा रक्षक वही है, उस परमात्मा की शरण जाओ। इतना कहना तो आसान था कि ‘शरण जाओ’ लेकिन शरण जाने का तरीका, वह साधना-पद्धति किसी के पास नहीं थी, विधाता के पास भी नहीं थी। सब अनुमान लगाने लगे–

पुर बैकुण्ठ जान कह कोई।

कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।। (मानस, १/१८४/२)

किसी ने कहा– बैकुण्ठ जाओ, वहाँ परमात्मा मिलेंगे। किसी ने कहा– वह तो क्षीरसागर में रहते हैं।

तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ।

अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।।

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।

प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।। (मानस, १/१८४/४-५)

हे पार्वति! उस समाज में मैं भी था, वक्ताओं के कारण अवसर ही नहीं मिल पा रहा था। भोलेनाथ को समय मिला तो बचन एक कहेऊँ– उन्होंने एक सुझाव दिया कि भगवान बैकुण्ठ में नहीं रहते, क्षीरसागर में नहीं रहते। वह यहाँ भी विद्यमान हैं, सर्वत्र समान रूप से विद्यमान हैं। होंगे विद्यमान! हमारे किस काम के? हम कैसे दर्शन करें? तो, प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।– वह प्रेम से प्रगट हो जाते हैं। ऐसा हमने पढ़ा नहीं, सुना नहीं बल्कि मैं जाना अर्थात् मैंने साक्षात् किया है। जहाँ देवताओं ने प्रेमसहित स्तुति किया, तुरन्त सुनवाई हो गयी, आकाशवाणी हुई–

जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।

तुम्हहि लागि धरिहउँ नर वेसा।। (मानस, १/१८६/१)

डरो मत! तुम्हारे लिए मैं अवतार लूँगा, भार हरूँगा। इस प्रकार भगवान को खोज निकालने की पहली कुंजी है प्रेम। पहली नियामत, पहला नवीन विचार प्रेमरूपी पानी लेकर आओ। प्रेम नहीं है तो बिना प्रेम रीझत नहीं तुलसी नन्द किसोर। प्रेम ही पानी है और कर्म ही कमण्डल है।

कर्म क्या है? हर महापुरुष के अनुसार क्वा कर्म यत्प्रीतिकरं मुरारे।गीता के अनुसार योगविधि यज्ञ है, उस यज्ञ को क्रियान्वित करना कर्म है। कर्म माने आराधना! कर्म माने चिन्तन! यह चिन्तन सदा प्रेम से पूरित रहे।

दूसरी न्यामत आटा लाना, हाट बाजार के पास न जाना,

कूटा पीसा छाँड़ि के चेला, खप्पर भर के लाना।।

ख्याल ही खप्पर है। अनुरागरूपी आटा। इष्ट के अनुरुप लगाव में सदा ख्याल रहे, विचार अनुराग से भरपूर रहे, अन्य विचार न आवें– यही खप्पर भरकर लाना है ।

दूसरा नवीन सिद्धान्त है– आटा लाओ! अनुरागरूपी आटा। यह न तो कूटने से होगा, न पीसने से; यह न हाट में मिलेगा, न बाजार में। यह है अनुरागरूपी आटा।

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा।

किएँ जोग तप ज्ञान बिरागा।। (मानस, ७/६१/१)

आप करोड़ जप करें, तप करें, वैराग्य करें; यदि अनुराग नामवाली योग्यता नहीं है तो प्रभु नहीं मिलते! अनुराग नहीं तो भगवान नहीं। अर्जुन ने जब भगवान श्रीकृष्ण के विराट् स्वरूप का दर्शन कर लिया तब भगवान ने कहा– अर्जुन! तू शोक मत कर। जिस स्वरूप को तुमने देखा है, तेरे सिवाय पूर्व में न कोई देख सका है, न भविष्य में कोई देख सकेगा। तब तो गीता हमारे लिए व्यर्थ हो गई; क्योंकि ईश्वर के दर्शन की योग्यता अर्जुन तक ही सीमित थी। उसने कभी देख लिया था, दूसरों के लिए उसका क्या उपयोग? जबकि इसके पहले ही अध्याय चार में भगवान कह आये हैं– अर्जुन! ज्ञानरूपी तप से पवित्र हुए बहुत से लोग मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं। और यहाँ कहते हैं कि तेरे सिवाय किसी ने देखा नहीं और भविष्य में भी कोई देख नहीं सकेगा। किन्तु अगले ही श्लोक में वह कहते हैं–

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।

ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।। (गीता, ११/५४)

अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा; अनन्य माने अन्य न, किसी देवी-देवता को न भजकर जो केवल मुझे भजता है उसके द्वारा मैं इस प्रकार प्रत्यक्ष देखने के लिए, स्पर्श करने के लिए और तत्त्व से प्रवेश करने के लिए भी सुलभ हूँ। वास्तव में अनन्य भक्ति का नाम ही अनुराग है। सृष्टि में जो लगाव होता है इसका नाम है राग, आसक्ति; और इष्ट के अनुरूप जो लगाव है उसका नाम है अनुराग। यदि इष्ट के अनुरूप सीधा लगाव नहीं है तो भगवान नहीं मिलते। यही है अनुरागरूपी अर्जुन। यह दैवी सम्पद् का एक सशक्त अंग है। अनुरागविहीन न तो पूर्व में देख सका है, न तो भविष्य में देख सकेगा। गीता आपके अंत:करण की, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है; दैवी और आसुरी सम्पद् के संघर्ष का चित्रण है जिसमें अनुराग ही अर्जुन है। दूसरी नियामत, नवीन विचार अनुराग है। बिना लगन के हम प्रेम को स्थिर नहीं रख सकते।

तिसरी न्यामत लकड़ी लाना, जंगल झाड़ के पास न जाना,

सूखी गीली छाँड़ि के चेला, गट्ठर बाँध के लाना।।

लवरूपी लकड़ी! यह झाड़ या वृक्ष से प्राप्त नहीं होती, न यह गीली या सूखी ही होती है। मनसहित इन्द्रियों का ज्यों–ज्यों संयम सधता जायेगा, त्यों–त्यों यह गट्ठर बँधता जायेगा।

लव लागत लागत लागी। भव भागत भागत भागी।।

लौ लगते–लगते ही लगती है। महर्षि पतंजलि कहते हैं– यह दीर्घकाल तक श्रद्धा के साथ करते रहने से दृढ़ होता है–

साधक नाम जपहिं लय लाएँ।

होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।। (मानस, १/२१/४)

साधक लौ लगाकर जप करते हैं और अणिमादिक सिद्धि प्राप्त करते हैं। लगन अनिवार्य है। लगन मीरा की लग गई। उसे विष का प्याला दिया गया, शूली की शैया दी गयी, देश से निष्कासित किया गया किन्तु भगवान से उसकी टेक डिगी नहीं। इसका नाम है लगन, लौ। प्रह्लाद को पर्वत से गिराया गया, समुद्र में फेंका गया, आग में जलाया गया किन्तु उसकी लगन में फर्क नहीं आया। लौ वह कहलाती है कि इष्ट में सुरत टिकी रहे, श्रद्धा न डगमगाये। तीसरी नियामत लौरूपी लकड़ी लाना है। जब लगन भली प्रकार जागृत है तो उस लगन में अवरोध हैं मन की कालिमाएँ; इसलिए–

चौथी न्यामत कलिया लाना, जीव जन्तु के पास न जाना,

जिन्दा मुर्दा छाँड़ि के चेला, हण्डी भर के लाना।।

भुने या पके मांस को कलिया कहते हैं। मांस जीव-जन्तु के बिना मिलेगा नहीं। किन्तु इस पंक्ति में कहते हैं– जीव जन्तु के पास न जाना– जीवित या मृत पशु-पक्षी के पास नहीं जाना है। अब कलिया मिले कैसे? आध्यात्मिक सन्दर्भ में मन का कलुषित विचार ही कलिया है। हृदयरूपी हण्डी में भरकर कलुषित विचारों को गुरु महाराज के चरणों में समर्पित कर दो। यह मन जब अविद्या से संयुक्त होता है तो एकदम अंधकार की ओर ले जानेवाला होता है, प्रकृति की अनन्त योनियों में भटकानेवाला होता है। यही जब विद्या से संयुक्त होता है तो शुभ्र, पारदर्शी हो जाता है, ज्योतिर्मय परमात्मा की ओर ले चलनेवाला होता है। इसलिए जो सांसारिक वृत्तियाँ अभी तक पीछा कर रही हैं, उन्हें गुरु महाराज को समर्पित कर दें।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! संसार में मनुष्य केवल दो प्रकार का होता है– असुरों जैसा और देवताओं जैसा। मनुष्य की तीसरी कोई जाति होती ही नहीं। जिस हृदय में दैवी सम्पद् कार्य करती है वह देवताओं जैसा है; जिसमें आसुरी सम्पद् कार्यरत है वह असुरों जैसा है। आपका एक सगा भाई असुर तो दूसरा सगा भाई देवता हो सकता है। अर्जुन! सच पूछो तो भूत-प्राणियों के स्वभाव दो प्रकार के होते हैं– दैव और आसुर। दैवी सम्पद् विमोक्षाय(गीता, १६/५)– दैवी सम्पद् परम कल्याण के लिए होती है और आसुरी सम्पद् अधम योनियों में भरमाने के लिए होती है। अर्जुन! तू शोक मत कर। तू दैवी सम्पद् को प्राप्त हुआ है, तू मुझे प्राप्त होगा। आसुरी सम्पद्, अविद्या से युक्त, प्रकृति के घने अन्धकार से युक्त मन काला होता है। यह अपना गणित लगाता रहता है। इस करिया मन को मुझे समर्पित कर दो और जहाँ मन समर्पित किया तो अंदर विद्या, जिसका नाम है ब्रह्मविद्या – विद्या हि का ब्रह्मगति प्रदाया(प्रश्नोत्तरी, श्लोक १०)– विद्या उसे कहते हैं जिसके पास आये उसे घसीटकर ब्रह्मगति प्रदान कर दे। वह पात्र सद्गुरु के लायक हो जाता है।

गुरु कहते हैं– इस कलुषित मन को हमें दे दो और बदले में उस विद्या को ले लो जो तुम्हें सहज स्वरूप प्रदान करे। सद्गुरु के गुरुत्व को प्राप्त करने के लिए मन के कचरे को उन्हें समर्पित कर दो। ऐसा नहीं होना चाहिए कि गुरुजी कुछ और कह रहे हों और तुम अपने कचरे से प्रेरित होकर कुछ और ही कर रहे हो–

गुरु की आज्ञा उलंघि के, जो नर काहूँ जाय।

जहाँ जाय तहँ काल है, कह कबीर समुझाय।।

सद्गुरु की आज्ञा का उल्लंघन कर साधक यदि कहीं भी चला जाता है, साधक अपनी समझ से बहुत बढ़िया जगह जा रहा है, सुरक्षित स्थान को जा रहा है; किन्तु कबीर कहते हैं– वह तीर की तरह सीधे काल के मुँह में चला जा रहा है। साधक को भरमाया किसने? इसी कलुषित प्रवृत्ति ने! इसी को भेंट चढ़ा दो।

पाँचवीं न्यामत भगती लाना, वेद किताब के पास न जाना,

कहत कबीर सुनो भाई साधो, निर्मल होके आना।।

भक्ति किताबों से नहीं मिलती। ऐसा नहीं कि जन्मभर सुन्दरकाण्ड या हनुमान चालीसा ही पढ़ते रह गये और हो गयी भक्ति! जितने भी प्राप्तिवाले महापुरुष हुए हैं, प्राय: वे पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्हें भगवान पढ़ाते हैं। महापुरुष जब अपनी स्थिति पा जाता है, वह जो लेख प्रस्तुत करता है वह आँखों देखा हाल होता है। जब वह लिखने में आ जाता है उसी का नाम शास्त्र है। वह शास्त्र, वह किताब भी वहाँ काम नहीं देती; क्योंकि रोज साधना की स्थिति क्या है? क्या विघ्न आ रहा है? क्या निवारण है?–उसे भगवान पढ़ाते हैं। साधक की किताब उसके हृदय-देश में प्रतिदिन उतरती रहती है। इसलिए भक्ति तो लाना है किन्तु बाहरी किताबों तक सीमित मत रह जाना।

विभक्त माने होता है विभाजन। भक्ति का आशय है जुड़ना। जिस परमात्मा से बिछड़े हो, उनसे आपकी सुरत जुड़ जाय। जहाँ सुरत जुड़ गयी तो तीरथ अपना फल दे चुका। अब सुरत जुड़ी है तो डोर लगी रहे जब तक भगवान पीठ न ठोंक दें, जब तक भगवान यह न कह दें कि बेटा! यही है धाम और यह है तुम्हारा स्वरूप। यह स्वरूपवाला सर्टिफिकेट भगवान स्वयं देते हैं। यही सम्पूर्ण सत्य है। यही गीतोक्त साधन का सार है।

गुरु महाराज का कहना था– भगवान तुम्हें साधु कहें तो तुम साधु हो। और यदि भगवान न कहें तो दुनिया चाहे कितना ही फूल बरसाये, तुम्हें रोने को आँसू नहीं मिलेगा, कुछ भी नहीं पाओगे। आत्मा तुम्हें साधु कहे तो सब कुछ पा जाओगे, दुनिया कहे चाहे न कहे। यह सम्पूर्ण साधना गीता में सुरक्षित है। इसलिए कहत कबीर सुनो भाई साधो! निर्मल हो के आना। सद्गुरुओं के सामने जो दक्षिणा लेकर पहुँचना है वह है पहले प्रेमरूपी पानी, अनुरागरूपी आटा, लौरूपी लकड़ी। लौ लग गयी तो करोड़ ब्रज पड़े लेकिन लक्ष्य से दृष्टि न चलायमान हो। मन की कलुषित वृत्ति कलिया उन्हें अर्पित कर दो और बदले में गुरुदेव जो दें, उसे धारण कर लो। यही गुरु-दक्षिणा है।

महापुरुष कभी कुछ लेते ही नहीं। उनके न लड़के-बच्चे हैं और न नाती-पनाती। वे वस्तु लेकर क्या करेंगे? जो उनके समर्पित शिष्य हैं वही उनके पुत्र हैं। महापुरुष परहित कातर होते हैं। केवल समर्पण जहाँ किया, बदले में गुरु का गुरुत्व आप में प्रसारित हो जायेगा जो मोक्ष देकर ही दम लेता है।

गुरुपूर्णिमा सम्पन्न हो जाने पर अनुसुइया आश्रम से जब भीड़ लौट जाती तब भी पाँच-सात लोग रुके ही रहते थे। महाराज जी उन्हें दो-चार दिन तक तो कुछ न कहते, अंतत: कहते– ‘‘बेटा! जाना तो पड़ेगा। घरो जाय के पड़ी। घर-गृहस्थी भी देखे के पड़ी, बगैर देखे बनबौ न करी। जाओ घर!’’ दो-चार भक्त चले जायँ, फिर भी दो-तीन बच जाते।

महाराज जी दो-एक दिन उन्हें भी कुछ न कहते। जब वह समझते कि इनके मन में उच्चाटन हो रहा है तब उनसे कहते– ‘‘क्यों रे! मन तो घर भाग रहा है। जाओ शरीर से कहीं रहो, मन से आया-जाया करना। साझों-विहान पाँच मिनट मेरा रूप देख लिया करो। ओम्, राम या शिव में से किसी भी दो-ढाई अक्षर के नाम का जप कर लिया करो।……’’ [वैदिक ऋषि ओम् जपते थे। ओ अर्थात् वह परमात्मा, अहं अर्थात् आप स्वयं। जिस परमात्मा का निवास आपके हृदय-देश में है। यदि मुंबा देवी जपेंगे तो उनके दर्शन के लिए मुंबई पहुँच जायेंगे। यदि आप पशुपतिनाथ जपते हैं तो नेपाल चले जायेंगे क्योंकि वह नेपाल में निवास करते हैं किन्तु ओम् का आशय वह परमात्मा जिसका निवास आपके हृदय-देश में है। यदि उन्हें देखना चाहेंगे, वह बाहर कहीं नहीं मिलेंगे। आपको अपनी वृत्तियों को हृदय में समेटना पड़ेगा–

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।

मूर्ध्न्याधायात्मन: प्राणमास्थितो योगधारणाम्।। (गीता, ८/१२)

सम्पूर्ण इन्द्रियों के दरवाजों को संयमित कर, मन को हृदय-देश में स्थिर कर, अन्त:करण में योगविधि को धारण कर–

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।

: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।। (गीता, ८/१३)

अर्जुन! ओम् जो अक्षय ब्रह्म का परिचायक है, उसका जप करते हुए और मामनुस्मरन्– मेरे स्वरूप का ध्यान धरते हुए त्यजन्देहं– जो देहाध्यास का त्याग कर जाता है, स याति परमां गतिम्– तत्क्षण परमगति को प्राप्त हो जाता है। जिसका नाम परमतत्त्व परमात्मा है, उसी गति को प्राप्त हो जाता है। अत: जपते-जपते यदि हमारे मन में कामना हो गयी कि ओम् को देखें तो संयम करके हृदय-देश में जाना पड़ेगा। इसलिए जो भी नाम उस परमात्मा का परिचायक है, वह किसी भाषा में हो सकता है, वह दो-ढाई अक्षर का नाम जो सीधा उस परमात्मा को पुकारता हो, छोटा नाम इसलिए कि आगे चलकर नाम स्वाँस से जपा जाता है इसलिए ऐसे किसी नाम का जप कर, प्रात:-सायं मेरे स्वरूप का ध्यान धर] जिस दिन दो मिनट भी देख ले जाओगे, जिसका नाम भजन है, योग-साधना है, वह मैं तुम्हें यहाँ बैठे-बैठे दे दूँगा और तुम घर बैठे-बैठे पा भी जाओगे।’’ भजन एक जागृति है। सद्गुरु के द्वारा इस जागृति को प्राप्त करने के लिए उन्हें केवल मन का समर्पण कर दें, उनकी आज्ञा का पालन करें और उनके हाथ का यन्त्र बनकर चलें।

बाल्मीकि ने सप्तर्षियों को क्या गुरु-दक्षिणा दी थी? अंगुलिमाल ने भगवान बुद्ध को क्या दे दिया? जीवन के आरम्भिक वर्षों में बाल्मीकि दुर्दान्त दस्यु थे। एक आख्यान में है कि पहले उनका नाम रत्नाकर था। उन्होंने इतना डाका डाला कि डकैती का समुद्र बना दिया। कोई बड़ा विद्वान् होता है तो नाम पड़ता है विद्यासागर। वह डाकुओं के रत्नाकर हो गये। बड़े-बड़े राजा उसका पीछा करते ही रह गये, उसे कभी नहीं पा सके। लोगों ने उस जंगली रास्ते को ही छोड़ दिया जहाँ उसका अड्डा था।

कुछ काल पश्चात् सप्तर्षि वहाँ से गुजरे। वह झाड़ियों से झपटकर निकला, बोला– ‘‘खबरदार! जो कुछ भी लिये हो, रख दो।’’ महात्माओं ने हाथ उठाया– ‘‘आयुष्मान् भव! इन झाड़ियों में क्या कर रहे हो?’’ वह बोला– ‘‘उपदेश की जरूरत नहीं है। जो कुछ लिए हो, यहाँ पर रख दो।’’ महात्माओं ने कहा– ‘‘इतना जघन्य अपराध, जिसका परिणाम रौरव नरक है, क्यों कर रहे हो? किसके लिए कर रहे हो?’’

उसने कहा– ‘‘बाल-बच्चों के लिए। बाल-बच्चे न होते तो मैं यह धन्धा ही नहीं करता। मुझे अपने लिए किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है।’’ महात्माओं ने पूछा– ‘‘क्या बाल-बच्चे तुम्हारे इस पाप में भी भागीदार हैं?’’ उसने कहा– ‘‘क्यों नहीं! वे अवश्य भागीदार होंगे।’’ महात्माओं ने कहा– ‘‘पहले उनसे पूछ तो आओ।’’ उसने कहा– ‘‘वाह! रत्नाकर को भी चकमा। मैं पूछने जाऊँ और तुम हो जाओ फरार।’’ महात्माओं ने कहा– ‘‘बेटा, तुझे जैसे भी सन्तोष हो, कर डाल।’’

रत्नाकर ने चमकीली, मजबूत रस्सियाँ निकालीं। सातों को सात वृक्ष में बाँध दिया और घर की ओर बढ़ चला। वह चिन्ता में पड़ गया कि आज इन बाबा लोगों ने अच्छा फँसा दिया; किन्तु महात्माओं की बातों में दम है। बेटे को काँटा चुभता है तो कसक माता-पिता के दिल में होती है। बहुत से मासूम बच्चों को हमने माँ-बापविहीन किया है, यह पाप तो है। उसने अपनी पत्नी से पूछा– ‘‘मैं जो लूटकर लाता हूँ, इसमें बहुत-सी हत्याएँ हो जाती हैं। इस पाप का परिणाम रौरव नरक है। तुम इस पाप की भागीदार हो या नहीं?’’ पत्नी उस पर बहुत बिगड़ी– ‘‘तब तो अग्नि का फेरा देकर लाये थे। आपने कहा था– मैं सब आवश्यकताओं की पूर्ति करूँगा। हमने कब कहा था डाका डालो। भला काम क्यों नहीं करते हो? हम भी धरम-करम करते हैं। हम पाप के भागीदार नहीं हैं। काम आपका, दायित्व भी आपका।’’ बाल्मीकि को बड़ी ठेस लगी कि जब माल-पानी लाता था तो यही बीघाभर आगे दौड़कर चरण छूती थी, गठरी अपने शिर पर रख लेती थी, कहती थी– आप थक गये होंगे; आज यह अच्छी बाघिन हो गयी।

वह तुरन्त अपने वृद्ध पिता के पास पहुँचकर बोला– ‘‘पिताजी! क्या आप जानते हैं कि यह च्यवनप्राश, यह दूध और दवा-दारू कैसे आता है? मैं डाके डालता हूँ जिसमें बहुत-सी अप्रिय घटनाएँ घट जाती हैं, जिसका परिणाम रौरव नरक है। क्या इस नरक में आप भी भागीदार होंगे?’’ वह बुजुर्ग बहुत बिगड़े– ‘‘क्या जमाना आ गया है? कभी श्रवणकुमार जैसे पुत्र हुए जो अपने माँ-बाप को पापमुक्त कराने के लिए तीर्थभ्रमण कराते थे, तू ऐसा नालायक पैदा हो गया कि मुझे पाप परोस रहा है! मैं तो वैसे ही नरक भोग रहा हूँ। दिन किसी तरह बीत जाता है तो रात काटे नहीं कटती। जब पुरवइया हवा चलती है तो गठिया और भी जोर पकड़ लेती है। भाग यहाँ से!’’

उसने बच्चों से भी यही प्रश्न रखा तो उन्होंने कहा– ‘‘पाप-पुण्य अपने पास रखिए। खाने की कोई अच्छी वस्तु हो तो इधर बढ़ाइए और न हो तो जाइए।’’ अब तो उसका दिल टूट गया। अत्यन्त खिन्न और उदास होकर वह सन्तों की ओर चला। उसने जीवन में कभी कोई पुण्य नहीं किया था। आज पहली बार वह सन्तों को लूटने नहीं, उनका दर्शन करने चला–

संत मिलन को जाइये, तजि ममता अभिमान।

एक एक पग आगे बढ़े, कोटिन्ह यज्ञ समान।।

कभी का दुर्दान्त दस्यु, जंगल में श्रद्धा भाव से एक-एक कदम आगे बढ़ाते हुए ऋषियों के चरणों में गिर पड़ा– भगवन्! मेरे जैसे चाण्डाल का क्या उद्धार हो सकता है? सप्तर्षियों ने कहा– बेटा! तुम पापी नहीं हो, तुम अनजान थे। तुम्हें बोध ही नहीं था कि पाप क्या है, पुण्य क्या है? अनजाने में तो सर्प पर भी पाँव पड़ जाता है। खतरा भी हो जाता है। अब ऐसा करो कि तुम कहो– राम! वह जन्मभर का पापी, राम का नाम उसके मुख से निकलता ही न था। किसी तरह वह बोल पाया ‘म’। और कोशिश करो तो वह बोला ‘रा’। दोनों मिलाकर पढ़ो तो बोला– ‘मरा’। ऋषियों ने कहा– ठीक है, तुम ‘मरा’ ही कहते रहो। हमलोग लौटकर न आयें तब तक यहाँ से हटना मत। झील का पानी पीना, पत्तियाँ और कन्दमूल खाना। किसी की ओर देखना मत! केवल यह ‘मरा–मरा’ जपते रहना।

बारह वर्षों पश्चात् सप्तर्षि पुन: आये। उन्होंने देखा, दीमकों ने वहाँ बाँबी बना लिया था। उन्हीं के मध्य बाल्मीकि बैठे थे, समाधि लग गयी थी।

उलटा नामु जपत जगु जाना।

बालमीकि भये ब्रह्म समाना।। (मानस, २/१९३/८)

उन्होंने ‘मरा-मरा’ जपना आरम्भ किया था। यह उलटा नाम ‘मरा–मरा’ पता नहीं कब ‘राम-राम’ में बदल गया, राम ध्यान में और ध्यान समाधि में बदल गया– बालमीकि भये ब्रह्म समाना।

भगवान राम वनवासकाल में वन में गये। वहाँ ऋषि लोग भगवान से मिले। उनमें बहुत से ऋषि भगवान के चरणों में लेट गये। कुछ विभूतियाँ ऐसी थीं जहाँ प्रभु ने सादर हाथ जोड़कर नमन किया किन्तु जब बालमीकि के आश्रम में भगवान पहुँचे–

मुनि कहुँ राम दण्डवत कीन्हा।

आसिरबादु बिप्रवर दीन्हा।। (मानस, २/१२४/१)

जो बाल्मीकि जीवन के आरम्भिक वर्षों में जघन्य पापी थे, भजन कर उन्होंने ही विप्र की ही नहीं, विप्रवर की स्थिति प्राप्त कर ली। विप्र या वर्ण कोई जाति नहीं है, आपकी आकृति है। यदि भजन नहीं करते तो सभी जीव-स्तर के ही हैं, वर्ण कदापि नहीं। वर्ण साधक के साधना का स्तर है। (देखें– यथार्थ गीता, ४/१३)

।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-4’ से उद्धृत)

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