ज्ञानयोग और कर्मयोग में अन्तर, दोनों में श्रेष्ठ कौन है?

ज्ञानयोग एवं कर्मयोग

प्रश्नमहाराजजी, ज्ञानयोग और कर्मयोग में क्या अन्तर होता है? दोनों में श्रेष्ठ कौन है?

उत्तर रणक्षेत्र में अपने ही परिवार को खड़ा पाकर अर्जुन युद्ध से कतराने लगा। उसने कहा कि अपने स्वजनों को मारकर मैं सुखी कैसे हो सकूँगा? तीनों लोकों के राज्य में तथा पृथ्वी के धनधान्य-सम्पन्न अकंटक साम्राज्य में भी मैं उस उपाय को नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखानेवाले शोक को दूर कर सके। अतः इतने के ही लिए मैं युद्ध नहीं करूँगा। इससे तो भिक्षा माँगकर खाना ही श्रेयस्कर है। हाँ, इसके आगे कोई सत्य हो तो मेरे प्रति कहिये, जिससे मैं परमकल्याण को प्राप्त हो जाऊँ। श्रीकृष्ण उसे समझाते हैं- अर्जुन! इस युद्ध में हारोगे तो भी देवत्व मिलेगा और जीतोगे तो महीम् स्थिति ही प्राप्त हो जायेगी। इस क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संघर्ष में दैवी सम्पत्ति अर्जित करते-करते यदि शरीर का समय समाप्त हो गया तो देवत्व तो मिलेगा ही, पार पा जाने पर उस महामहिम परमात्मा में स्थिति मिल जायेगी, जहाँ से महिमा प्रसारित होती है। अतः जय-पराजय, हानि-लाभ, सिद्धि-असिद्धि को समान समझते हुए युद्ध कर।

अर्जुन! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गयी। कौन-सी बुद्धि? यही कि अपने हानि-लाभ पर स्वयं विचार करते हुए युद्ध कर। युद्ध तो करना ही पड़ेगा। हानि-लाभ का स्वयं विचार करके साधन तो पूरा करना ही पड़ेगा। हाथ पर हाथ रखकर बैठने का नाम ज्ञानयोग नहीं है। बहुत से लोग साधन किये ही बिना कहते हैं, ‘‘मैं आत्मा हूँ, पूर्ण हूँ। आत्मा ही अजर-अमर और शाश्वत है’’- ऐसा चिन्तन करना ज्ञानयोग है, किन्तु श्रीकृष्ण ने जहाँ आत्मा को अजर, अमर, अपरिवर्तनशील इत्यादि बताया, वहाँ यह नहीं कहा कि यह ज्ञानयोग है। वहाँ तो श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि आत्मा को इन विभूतियों से युक्त केवल तत्त्वदर्शियों ने देखा। वह तो महापुरुष की स्थिति है, साधन नहीं। वह तत्त्वदर्शन है, ज्ञानयोग नहीं। वस्तुतः स्वयं पर निर्भर होकर कर्म करने का नाम ज्ञानयोग है। ‘मैं इस भूमिका में हूँ, भविष्य में उस सोपान से गुजरूँगा। यदि पार पाता हूँ तो महामहिम स्थिति अन्यथा देवत्व तो निश्चित ही है’- इस प्रकार अपने भविष्य को दृष्टिगत रखते हुए स्वयं निर्णय लेकर कर्म में प्रवृत्त होने का नाम ही ज्ञानयोग है।

अर्जुन! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गयी है। इसी को अब तू निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन, जिससे युक्त हुआ तू कमों के बन्धन का भली प्रकार नाश करेगा। गीता (2/40) में भगवान कहते हैं कि इस निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का नाश नहीं, अर्थात् बीज का नाश नहीं, सीमित फलरूपी दोष नहीं, इस कर्म से सम्पादित धर्म का स्वल्प आचरण भी महान जन्म-मरण के भय से उद्धार करने वाला होता है। इसमें निश्चयात्मक क्रिया एक है, परिणाम एक है, तो क्या जो बहुत सी क्रियाएँ करते हैं, वे भजन नहीं करते? भगवान कहते हैं- नहीं! अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है इसलिए वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं और दिखावटी शोभायुक्त वाणी में उसे व्यक्त भी करते हैं। उनके वाणी की छाप जिन-जिनके चित्त पर पड़ती है, उनकी बुद्धि भी नष्ट हो जाती है, न कि वे कुछ पाते हैं। ज्ञानयोग से तू जिस स्थिति को प्राप्त होगा, उसी को कर्मयोग के आचरण से भी प्राप्त कर सकेगा। दोनों का लक्ष्य एक है, क्रिया एक है। हाँ! करने का तरीका दो है। तो भला उस कर्मयोग में करना क्या होगा? ‘अर्जुन! कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। ऐसा समझ कि फल है ही नहीं, कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो।’- यही है कर्मयोग। इसमें साधक की अपनी कोई कामना नहीं रहती। वह इष्ट पर निर्भर होकर चलता है इसलिए इसे निष्काम कर्मयोग भी कहते हैं। इसमें अनुरागी अपने आराध्य के आश्रित होकर उनके हाथ में मात्र यंत्र बनकर चलता है। अनुरागी यह तो जानता है कि कभी-न-कभी पार अवश्य लगेगा किन्तु कब और कितना लगा?- इसे वह नहीं जानता। उसके द्वारा जो भी पार लगता है वह कर्ता की उपलब्धि नहीं, आराध्य की देन है।

अध्याय तीन में अर्जुन प्रश्न करता है कि भगवन्! निष्काम कर्मयोग की अपेक्षा आप ज्ञानयोग को श्रेष्ठ बताते हैं, तो फिर आप मुझे भयंकर कर्मों में क्यों लगाते हैं? अर्जुन को कर्मयोग में भयंकरता दिखाई पड़ी। ज्ञानयोग उसे सरल लगा; क्योंकि ज्ञानयोग में हारने पर देवत्व है। शरीर का अन्त हो जाने पर सफलता नहीं मिली तो देवत्व है, लाभ ही है और यदि जीत जाते हैं, शरीर के रहते मन के पूर्ण निरोध तक पहुँच जाते हैं तो सर्वस्व मिलता है। महामहिम स्थिति मिलती है। दोनों प्रकार से मिलना ही है। स्वतंत्र रहकर अपना हानि-लाभ समझते हुए चलना है, अतः अर्जुन को सरल लगा। निष्काम कर्मयोग में कर्म करते रहने का अधिकार है, फल की वासना न हो। ऐसा समझ कि फल है ही नहीं। कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो। निरन्तर कर्म करने के लिए तत्पर हो जाओ।

हाँ, एक झीना-सा प्रलोभन अवश्य है कि कभी-न-कभी कर्म-बन्धनों से मुक्त अवश्य हो जाओगे लेकिन जो कुछ समझाया गया उससे वर्तमान में तो कुछ मिलनेवाला नहीं है, फिर ऐसा कौन होगा जो अकारण खाक छानता फिरे। यद्यपि आगे यह निष्काम कर्मयोग महान् विभूतियों का आलोक दर्शानेवाला होता है; किन्तु क्षण-प्रतिक्षण की उपलब्धि से बेखबर साधक को प्रारम्भ मे यह निरस प्रतीत होता है। इसलिए अर्जुन ने कहा कि आप मुझे निष्काम कर्मयोग की भयंकरता में क्यों फँसाते हैं? निष्काम कर्मयोग अर्जुन को भयंकर लगा।

तब योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! दो प्रकार की निष्ठायें मेरे द्वारा पहले कही गयी हैं। पहले का आशय सतयुग या त्रेता में नहीं बल्कि अभी-अभी जो अध्याय दो में कह आये हैं- ज्ञानियों की ज्ञानयोग से और कर्मयोगियों की निष्काम कर्मयोग से; किन्तु किसी भी मार्ग के अनुसार कर्म को त्याग देने का कोई विधान नहीं है।

न तो ऐसा ही है कि कर्मों को आरम्भ न करके कोई निष्कर्मता की परमसिद्धि को प्राप्त कर ले और आरम्भ की हुई क्रिया को त्याग देने से भी कोई ज्ञानी नहीं होता। इसलिए ज्ञानयोग अच्छा लगे अथवा निष्काम कर्मयोग, कर्म तो करना ही होगा। गीता (6/1) में श्रीकृष्ण ने पुनः इस पर बल दिया कि कर्म और अग्नि को छोड़नेवाला ज्ञानी नहीं हो सकता। यहाँ उन्होंने केवल क्रिया को ही लिया है। कर्म किया ही नहीं तो कैसा निष्कर्मी?

श्रीकृष्णकाल में भी ऐसी भ्रान्ति प्रचलित थी इसीलिए उन्होंने निराकरण किया कि अकर्मण्यता कदापि निष्कर्मता नहीं है। क्योंकि कोई भी पुरुष क्षणमात्र कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता। प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा परवश होकर वह कर्म करता है। जब तक प्रकृति है, प्रकृति से उत्पन्न सत्, रज, तम तीनों गुणों का उतार-चढ़ाव है, तब तक उसी के अनुरूप कार्य होते ही रहेंगे। हाँ, जब यज्ञ की पूर्तिकाल में ज्ञानामृत का पान करनेवाला पुरुष शाश्वत सनातन ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है, वहाँ पर प्रकृति ही विलय हो जाती है, इसलिए उन्हें कर्म नहीं बाँधते। उस ज्ञानाग्नि में कर्म दग्ध हो जाता है। किन्तु जब तक प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक कर्म नितान्त आवश्यक है। इतने पर भी बहुत से लोग हठ से इन्द्रियों को रोककर मन से विषयों का चिन्तन करते हैं, श्रीकृष्ण कहते हैं- वे दम्भाचारी हैं, पाखण्डी हैं, धूर्त हैं। अतः ज्ञानयोग अच्छा लगे अथवा निष्काम कर्मयोग, कर्म तो हर दशा में करना ही होगा। दोनों के बीच क्रिया एक ही है, कोर्स एक ही है, डिग्री एक जैसी है। अन्तर इतना ही है कि निष्काम कर्मयोगी इष्ट पर निर्भर होकर, अपने को निछावर करके कर्म करता है और ज्ञानयोगी अपनी सदृशता से अपना बलाबल समझते हुए पूर्तिपर्यन्त उसी कर्म में प्रवृत्त रहता है। जब तक उस शाश्वत को न पा लें, कर्म में प्रवृत्ति अभीष्ट है।

जब कर्म करना ही होगा तो नियतं कुरु कर्म त्वं(गीता, 3/8)- अर्जुन! तू निर्धारित किये कर्म को कर! वह निर्धारित कर्म है क्या? यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः (गीता, 3/9)- यज्ञ की प्रक्रिया ही एक मात्र कर्म है। इसके अतिरिक्त दुनिया में जो कुछ किया जाता है क्या वह कर्म नहीं है? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, वह तो इस लोक का एक बन्धन है। इसी यज्ञ की प्रक्रिया को ज्ञानयोग में करना है और यही प्रक्रिया निष्काम कर्मयोग में भी करनी होती है। दोनों में वही यज्ञ किया जाता है। यज्ञ के अतिरिक्त दुनिया में जो कुछ भी किया जाता है वह इसी लोक का बन्धन है, कर्म नहीं; क्योंकि कर्म तो मोक्ष्यसेऽशुभात् (गीता, 4/16)- अशुभ अर्थात् संसार-बन्धन से छुटकारा दिलाता है, बाँधता नहीं।

अब अर्जुन ने भली-भाँति समझ लिया कि ज्ञानमार्ग हो अथवा कर्ममार्ग हो, दोनों ही प्रणालियों में कर्म तो करना ही होगा। क्रिया दोनों में एक ही है। तब उसने जानना चाहा कि दोनों में अच्छा कौन पड़ेगा? कौन-सा मार्ग सुविधाजनक रहेगा। उसने प्रश्न किया-

सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।

यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।। (गीता, 5/1)

भगवन्! कभी तो आप निष्काम कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं तो कभी ज्ञान-दृष्टि से कर्म की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से किसी को निश्चय करके कहिये, जिससे मैं परम कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, अर्जुन! परम कल्याण तो दोनों करनेवाले हैं। संन्यास अर्थात् ज्ञान-दृष्टि से कर्म और निष्काम कर्मयोग दोनों में से प्रत्येक परमकल्याण करनेवाला है; किन्तु ज्ञानयोग की अपेक्षा निष्काम कर्मयोग श्रेष्ठ है। अर्जुन! जो न किसी से द्वेष करता है, न किसी से आकांक्षा रखता है- ऐसा निष्काम कर्मयोगी सदैव संन्यासी समझने योग्य है। संन्यास, सांख्य अथवा ज्ञानयोग के द्वारा जिस परमतत्त्व को प्राप्त किया जाता है, निष्काम कर्मयोग के द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। दोनों एक ही स्थान पर पहुँचाते हैं। मूढ़लोग ही दोनों को अलग-अलग कहते हैं, न कि विवेकीजन। फलरूप में दोनों को जो एक देखते हैं उन्हीं की दृष्टि यथार्थ है। किन्तु अर्जुन! निष्काम कर्मयोग का आचरण किये बिना संन्यास का प्राप्त होना दुर्लभ है। ज्ञानयोग में क्रिया वही है जो निष्काम कर्मयोग की है। निष्काम कर्मयोग का आचरण किये बिना कोई ज्ञानी नहीं होता। कर्म तो वही करना ही होगा। भगवत्-स्वरूप का मनन करनेवाला योगयुक्त पुरुष तत्क्षण ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है। वह योगयुक्त अर्थात् ब्रह्म से संयुक्त पुरुष, जिसने इन्द्रियों और अन्तःकरण को विशेष रूप से जीत लिया है, कर्म करते हुए भी लिपायमान नहीं होता।

युक्त पुरुष करते हुए भी लिपायमान क्यों नहीं होता? श्रीकृष्ण कहते हैं- युक्तो मन्येत तत्त्ववित्(गीता, 5/8)- वह तत्त्व से संयुक्त है इसलिए देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूँघते, भोजन करते, सोते, श्वास लेते, त्याग इत्यादि से सारे कार्य करते ऐसी धारणा उसे उपलब्ध हो जाती है कि इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में ही प्रसारित हो रही हैं। यह युक्त पुरुष के लक्षण हैं। प्राप्ति के पश्चात् युक्त पुरुष की रहनी का चित्रण है। जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी उससे अलग रहता है, ठीक उसी प्रकार युक्त पुरुष संसार में रहते हुए भी उससे अलग रहता है। यह योगयुक्त पुरुष के लक्षण हैं, न कि ज्ञानमार्ग की साधना का चित्रण है। आजकल प्रायः लोग कहा करते हैं कि हम तो ज्ञानी हैं, हमारी इन्द्रियाँ अपने अर्थों में बरत रही हैं, हमारे लिए कोई कर्म नहीं है, इत्यादि। ऐसी भ्रान्तियाँ श्रीकृष्णकाल में भी थीं। उन्हीं पर कटाक्ष करते हुए श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यह योगयुक्त पुरुष के लक्षण हैं और युक्त एक स्थिति-विशेष है। युक्त पुरुष के लक्षण का दिग्दर्शन कराते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं-

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।

निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।। (गीता, 6/18)

विशेष रूप से वश में किया चित्त जिस समय परमात्मा में भली प्रकार स्थित हो जाता है उस समय सम्पूर्ण कामनाओं से निस्पृह पुरुष योगयुक्त कहा जाता है। ऐसा पुरुष कर्मों में लिपायमान नहीं होता। जब तक यह स्थिति नहीं मिल जाती, कर्म तो करना ही होगा। श्रीकृष्ण इस बिन्दु पर बार-बार बल देते हैं कि ज्ञानमार्ग में भी कर्म छोड़ने का विधान नहीं है।

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।

स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।। (गीता, 6/1)

फल के आश्रय से रहित होकर जो कार्यम् कर्म’- करने योग्य प्रक्रिया-विशेष को करता है वही संन्यासी है, वही योगी है। केवल अग्नि और क्रियाओं को त्यागनेवाला, कर्म को त्यागनेवाला न तो संन्यासी हो पाता है और न योगी ही हो पाता है ।

यं सन्न्यासमिति प्रार्हुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।

न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।। (गीता, 6/2)

अर्जुन! जिसे संन्यास कहते हैं उसी को तू योग जान; किन्तु कोई भी पुरुष संकल्पों का त्याग किये बिना संन्यासी अथवा योगी नहीं हो पाता। संकल्पों का उतार-चढ़ाव मन पर होता है। मन का निरोध होने पर ही संकल्पों का शमन सम्भव है। अब संकल्पों का निरोध कैसे हो? कहने मात्र से तो संकल्प छूट नहीं जाते। इसलिए श्रीकृष्ण उपाय बताते हैं-

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।। (गीता, 6/3)

योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले पुरुष को चाहिए कि कर्म करे। कौन-सा कर्म? ‘कार्यम् कर्म’, ‘नियत कर्म’ जो यज्ञ की प्रक्रिया है। काम, क्रोध, लोभ त्यागने पर ही जिसमें प्रवेश मिलता है। कर्म करते-करते योग की पराकाष्ठा पा लेने पर शमः कारणमुच्यते’- सर्वसंकल्पों का अभाव है। जिस समय इन्द्रियों के भोगों में पुरुष आसक्त नहीं होता और कर्म करने की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है, उस समय सर्वसंकल्प संन्यासी’- सभी संकल्पों का अभाव होता है। वही संन्यास है, वही योग है। बीच में न कहीं संन्यास, न योग ही है। अतः पुरुष को चाहिए कि अपनी आत्मा का उद्धार करे, उसे अधोगति में न पहुँचावे। सिद्ध है कि आत्मा का उद्धार होता है और पतन भी होता है। कर्म के द्वारा मनसहित इन्द्रियों का जिसने भली प्रकार निरोध कर लिया है उसके लिए उसी की आत्मा मित्र बनकर मित्रता में बरतती है, परमकल्याण करनेवाली होती है। जिसके द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ नहीं जीती गयी हैं, उसके लिए उसी की आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतती है, अधोगति और नीच योनियों में फेंकनेवाली होती है। अतः संन्यास अच्छा लगे अथवा निष्काम कर्मयोग, कार्यम् कर्म’- करने योग्य प्रक्रिया-विशेष तो करना ही होगा। इस प्रकार स्थान-स्थान पर श्रीकृष्ण ने दोनों मार्गों में कर्म की अनिवार्यता पर बार-बार बल दिया।

श्रीकृष्ण ने अपनी भक्ति पर बल देते हुए कहा- मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः(गीता, 11/55)- अर्जुन! मत्कर्मकृत्’- मेरे द्वारा निर्दिष्ट किया हुआ कर्म मेरे लिए ही कर। मत्परम्’- मेरे परायण होकर कर। मद्भक्तः’- मेरा अनन्य भक्त हो। किन्तु सङ्गवर्जितः’- संगदोष में रहते हुए इस कर्म का होना असम्भव है। असंग रहकर सम्पूर्ण भूत-प्राणियों में जो बैरभाव से रहित है वह मुझे प्राप्त करता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निष्काम कर्मयोग अपनाने का परामर्श दिया। तब अर्जुन ने प्रश्न किया (गीता, 12/1- एवं सततयुक्ता ये) कि भगवन्! इस प्रकार जो भक्त निरन्तर आपकी उपासना करते हैं और दूसरे, जो अव्यक्त अक्षर ब्रह्म की उपासना करते हैं, इन दोनों में उत्तम योगवेत्ता कौन है? अर्जुन अब भी यही सोच रहा कि जो श्रेष्ठ है उसी को पकडूँ। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि मेरे में मन को एकाग्र करके भजन- ध्यान में नित्ययुक्त’- निरन्तर लगे हुए श्रद्धा के साथ जो मुझ (सगुण परमेश्वर को) को भजते हैं, वे मेरे को योगियों में भी अति उत्तम योगी मान्य हैं। वस्तुतः श्रीकृष्ण एक योगी थे। साधकों को उन्होंने इंगित किया है कि परमात्मा के चिन्तन की अपेक्षा परमात्मा में स्थित ऐसे महापुरुष का भजन श्रेयस्कर है, जो साधक के समय में वर्तमान हों। ऐसे महापुरुष श्रीकृष्ण की तरह शरीर के आधारवाले होते हुए भी शाश्वत स्वरूप की उपलब्धि वाले होते हैं। उनके लिए शरीर तो रहने के लिए एक मकान मात्र होता है। ऐसे महापुरुषों के निर्देशन पर भजन में अग्रसर होना ही निष्काम कर्मयोग है। इसी को श्रीकृष्ण भी अतिश्रेष्ठ मानते हैं।

दूसरी ओर ज्ञानमार्गी, जो इन्द्रियों को अच्छी प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय, एकरस, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, परमात्मा को लक्ष्य बनाकर उसी कर्म में प्रवृत्त होते हैं; सर्वभूतहितेरताः (गीता, 12/4)- ऐसे महापुरुष मेरे को ही प्राप्त होते हैं, किन्तु क्लेशोऽधिकतरः तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।(गीता, 12/5)- उन पुरुषों के रास्ते में क्लेश अधिक हैं। कौन-सा क्लेश अधिक है? श्रीकृष्ण कहते हैं, देहवद्भिः– देहाभिमानियों को वह अव्यक्त गति प्राप्त होना दुःखपूर्ण है। ज्ञानमार्गी सोचता है, ‘आज साधना में मैं यहाँ पर हूँ, मैं इतनी मंजिल तय करूँगा, मैं स्वयं को प्राप्त करूँगा।’- इस प्रकार ‘मैं-मैं’ कहते वह लक्ष्य से बहुत दूर रह जाता है और उसके चारों ओर ‘मैं’ का आवरण तन जाता है। ज्ञानमार्गी अपने ही बल पर साधन में प्रवृत्त होता है और प्रायः वह देहाभिमान में परिणीत हो जाता है। ज्ञानमार्ग में यही विघ्न विशेष है।

किन्तु निष्काम कर्मयोग में जो मेरे आश्रित होकर सम्पूर्ण कर्मों को मेरे में समर्पण करके अनन्य भाव से निरन्तर ध्यायन्तः– ध्यान करते हैं, उपासते– मेरी उपासना करते हैं, तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्(गीता, 12/7)- उन्हें मैं संसाररूपी समुद्र से उद्धार कर देता हूँ। ऐसे लोगों की योगक्षेमं वहाम्यहम्(गीता, 9/22)- योग की रक्षा मैं स्वयं करता हूँ। इस प्रकार निष्काम कर्मयोग में सुविधा विशेष है क्योंकि अनुरागी की हार-जीत का दायित्व आराध्य पर होता है। अनुरागी मन, क्रम, वचन से निर्भर हो जाय फिर तो सारी जिम्मेदारी आराध्य देव की, उन महापुरुष की हो जाती है।

करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी।

जिमि बालक राखइ महतारी।। (मानस, 3/42/5)

अतः बन्धुओ! चिन्तन-क्रम में प्रवृत्त होने पर निष्काम कर्मयोग और ज्ञान-पथ दोनों आप की मुट्ठी में हैं, आपके लिए हैं। किसी महापुरुष के संरक्षण में, श्रद्धा आप्लावित नेत्रों से चिन्तन में लगे रहने पर आप निष्काम कर्मयोगी की संज्ञा पा जायेंगे। अथवा प्रण-प्रधान बुद्धि से हार्दिक साहस बटोरकर स्वयं निर्णय लेकर कर्म में प्रवृत्त रहने पर ज्ञानमार्गी कहलायेंगे। कर्म तो हर हालत में करना ही होगा। यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। उस कर्म के पालन करने की दो दृष्टियों (ज्ञानयोग तथा निष्काम कर्मयोग) का श्रीकृष्ण ने सविस्तार वर्णन मात्र किया है। जागृति के लिए तो अनुभवी महापुरुष के प्रति अनन्य श्रद्धा तथा उस क्रिया को आचरण में ढालने का चिरन्तन विधान है।

।। ओम्।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

Q & A
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