पानी बिच मीन पियासी
पानी बिच मीन पियासी, हो! मोहिं सुन सुन आवत हाँसी।।
आतम ज्ञान बिना नर भटके कोई मथुरा कोई कासी।
जैसे मृगा नाभि कस्तूरी बन बन फिरत उदासी।।
रे मोहिं सुन सुन……
जल बिच कमल कमल बिच कलियाँ तापर भँवर निवासी।
सो मन बस तिरलोक भयो सब यती सती सन्यासी।।
रे मोहिं सुन सुन……
जाका ध्यान धरैं विधि हरि हर मुनि जन सहस अठासी।
सो तेरे घट माहिं विराजै परम पुरुष अविनाशी।।
रे मोहिं सुन सुन……
है हाजिर तोहि दूर दिखावै, दूर की बात निरासी।
कहै कबीर सुनो भाई सन्तो, गुरु बिन भरम न जासी।।
रे मोहिं सुन सुन……
कबीर एक महापुरुष हुए हैं। काशी में लहर तालाब पर एक शिशु के रूप में वे पड़े मिले। नीरू और नीमा नामक एक जुलाहा दम्पति ने उनका पालन-पोषण किया। संघर्षों में पले-बढ़े कबीर अंतत: महापुरुष हो गये। उनका जीवन इस तथ्य का द्योतक है कि माता-पिता की भूलों से संतान के ईश्वर-पथ में कोई रुकावट नहीं आती। यही नहीं अपितु जितने भी वरिष्ठ महात्मा हुए हैं, अधिकांश सामाजिक कुलीनता में उनका कोई स्थान नहीं; किन्तु समाज के चोटी के महापुरुषों में उनका सर्वोपरि स्थान है। ऐसे ही एक महापुरुष थे कबीर!
कबीर के चिन्तन का नाम राम था। उनके आराध्य राम थे। उनकी अटपटी भाषा-शैली लोगों के समझ में नहीं आयी तो लोगों ने कहा– यह तो उलटवाँसी है। उलटवाँसी का तात्पर्य है– परस्पर विरोधी कथन करना; जिसके बहुत से अर्थ निकल सकते हों। आप कहें वह सही, हम कहें वह सही, कोई कुछ कहता है वह भी सही! मान लें किसी को काशी जाना है। कोई कहता है– पूरब जाओ, कोई बताये पश्चिम चलो, कोई उत्तर तो कोई दक्षिण जाने का सुझाव दे रहा है। यदि आपने काशी से विपरीत दिशा में चलना आरम्भ कर दिया तो बहुत संभव है कि इस जीवन में आप काशी पहुँचे ही न। इससे बड़ा अनर्थ क्या हो सकता है? अर्थ उसे कहते हैं जो सारी भ्रान्तियों से उठाकर हमें प्रशस्त पथ पर खड़ा कर दे जिससे पथ में अनर्थ न रह जाय।
कबीर का छोटे से छोटा भजन भी ईश्वर-पथ की अलग-अलग अवस्थाओं का चित्रण है, किसी न किसी सन्देह का निवारण है; जैसे– भगवान रहते कहाँ हैं? जिसका हम भजन करते हैं, वह मालिक कहाँ मिलेगा? पूर्वजों ने भगवान को कहाँ पाया?
भगवान रहते कहाँ हैं?– इस प्रश्न का उत्तर कबीर ने भी दुहरा दिया है जो भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में बताया था। गीता के आरम्भ में भगवान श्रीकृष्ण पहले तो अर्जुन से बोले ही नहीं। प्रचलित मान्यताओं के सम्बन्ध में अर्जुन प्रश्न करता रहा, भगवान उत्तर देते रहे; किन्तु अठारह अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते अर्जुन में भली प्रकार समझने की पात्रता आ जाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– अर्जुन! जानते हो, भगवान कहाँ रहता है? स्वयं उन्होंने ही बताया–
ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता, १८/६१)
अर्जुन! ईश्वर सम्पूर्ण भूत अर्थात् प्राणियों के हृदय देश में निवास करता है। वह इतना समीप है, हृदय के अन्दर है फिर भी लोग उसे क्यों नहीं देख पाते? भगवान कहते हैं– लोग मायारूपी यन्त्र में आरुढ़ होकर भ्रमवश भटकते ही रहते हैं, इसलिए नहीं देखते। ईश्वर हृदय में है तो हम शरण किसकी जायँ? अगले ही श्लोक में भगवान कहते हैं–
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (गीता, १८/६२)
अर्जुन! उस हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ। ‘सर्वभावेन’– सम्पूर्ण भाव से जाओ। ऐसा नहीं कि थोड़ा-सा भाव संकटमोचन में, थोड़ा मैहरदेवी में, थोड़ा भाव पशुपतिनाथ में; हम तो बारह आना लीक हो गये, हमारी श्रद्धा तो कई स्थलों में बिखर गयी। इस प्रकार पूजन करने से कल्याण नहीं होता क्योंकि वह सत्य, वह तत्त्व तो एक है। इसलिए तुम सम्पूर्ण मनोयोग से, सम्पूर्ण भाव से, मन-क्रम-वचन से हृदयस्थित ईश्वर की शरण जाओ। मान लें हमने सारी मान्यताएँ तोड़ीं, शरण चले ही गये तो उससे लाभ ही क्या? भगवान कहते हैं– ‘तत्प्रसादात्परां शान्तिम्’– तुम परमशान्ति प्राप्त कर लोगे और ‘स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्’– उस निवास-स्थान को पा जाओगे जो शाश्वत है, अजर-अमर है। तुम्हारा घर रहेगा, तुम्हारा जीवन रहेगा, समृद्धि रहेगी। इस प्रकार गीता का भगवान हृदय में निवास करता है।
इसी तरह रामचरितमानस के आरम्भ में गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा–
भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्याम् विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्त:स्थमीश्वरम्।। (बालकाण्ड, मंगलाचरण, २)
मैं भवानी और शंकर की वन्दना करता हूँ जो श्रद्धा और विश्वास के रूप हैं। हमें श्रद्धा लानी है, विश्वास स्थिर करना है। उनके बिना सिद्धजन भी हृदय में स्थित ईश्वर को नहीं पहचान पाते हैं। अब, हम उन भवानी-शंकर को कहाँ ढूढ़ें जिनमें हमें श्रद्धा लानी है? मंगलाचरण के अगले श्लोक में कहते हैं–
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्र: सर्वत्र वन्द्यते।। (बालकाण्ड, मंगलाचरण, ३)
मैं ‘गुरुं शंकररूपिणम्’– सद्गुरु जो शंकरस्वरूप हैं, उनके चरणों की वन्दना करता हूँ जिनके आश्रित हो जाने पर टेढ़ा चन्द्रमा भी परम कल्याणकारी हो जाता है, वन्दनीय हो जाता है। ‘मन ससि चित्त महान’– मन ही चन्द्रमा है। यह बड़ा टेढ़ा है। यह कभी भोग में तो कभी रोग में, पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकता रहता है। यह टेढ़ा चन्द्रमा– विकारोन्मुख मन जिनका आश्रय लेने पर सिमटकर सीधा और परम कल्याणकारी फल देनेवाला हो जाता है, वह सद्गुरु ही शिव हैं। अनादिकाल से ही शिव सद्गुरु के प्रतीक हैं। इन शिवरूपी सद्गुरु की कृपा के बिना सिद्धजन भी हृदय में स्थित ईश्वर को नहीं जानते। तुलसीदासजी का भी ईश्वर हृदय में है। गीता के अतिरिक्त नयी बात उन्होंने भी कुछ नहीं कहा। जब किसी ने उस परमात्मा को पाया तो हृदय-देश में ही पाया। कबीर ने भी उस परमात्मा को पाया तो हृदय-देश में– ‘सब घट मेरा साइयाँ’। इस पद में भी कबीर वही कहते हैं कि परमात्मा की शोध में कोई पानी तो कोई पत्थर में; पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकते रहते हैं। आश्चर्य तब होता है कि पानी लबालब भरा हो और कोई एक घूँट के लिए प्यासा मरता हो। यही दशा इस मानव की है; जैसे–
पानी बिच मीन पियासी, हो! मोहिं सुन सुन आवत हाँसी।
पानी के बीच में मछली और प्यासी मरे; भला इससे बड़ी हास्यास्पद, जगहँसाई की बात क्या हो सकती है? संतों की दृष्टि में जल दो प्रकार का होता है– एक तो भक्तिजल और दूसरा विषयवारि।
राम भगति जल मम मन मीना।
किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।। (मानस, ७/११०/९)
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बिषय–बारि मन–मीन भिन्न नहिं होत कबहुँ पल एक। (विनयपत्रिका, पद १०२)
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जो संतोष–सुधा निसि–बासर सपनेहुँ कबहुँक पावै।
तौ कत बिषय बिलोकि झूँठ जल मन–कुरंग ज्यों धावै।। (विनयपत्रिका, पद १६८)
यदि किसी को सन्तोषरूपी सुधा मिल जाय, ‘आनन्द–सिन्धु मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा। मृग–भ्रम–बारि सत्य जिय जानी। तहँ तू मगन भयो सुख मानी।।’ (विनयपत्रिका, पद १३६/२)– आनन्दरूपी सिन्धु के मध्य में तुम हो, चारों तरफ ब्रह्मपीयूष है, बीच में तुम हो। पानी के अन्दर हो और प्यासे मरते हो, रेगिस्तान में जल के भ्रम में मृग की तरह अतृप्त विषयों में दौड़ रहे हो। रेगिस्तान में मैदानी क्षेत्रों की तुलना में गर्मी अधिक पड़ती है। वहाँ घने छायादार वृक्ष नहीं है, केवल तपती हुई रेत है। तापमान बढ़ने के साथ बालू में से ऊष्मा की भयंकर लहरें उठने लगती हैं। उन लहरों को देखकर जल का भ्रम होने लगता है। प्यासा मृग सोचता है कि दूर वहाँ पर पानी बह रहा है, चलें पी लें। दौड़कर वहाँ जाने पर दूसरी ओर उतनी ही दूर पर लहरें दिखायी देती हैं। मृग जल समझकर उधर भागता है, फिर तीसरी तरफ जल दिखायी पड़ा तो आँख मूँदकर उधर भागा। लगभग बारह बजे दोपहर से वह दौड़ना आरम्भ करता है और दो-ढाई बजते-बजते उसके पाँव ऊपर, गर्दन और शरीर जमीन पर आ जाते हैं। वह जल की आशा में ही दौड़ते-दौड़ते मर जाता है। इसी का नाम है मृगतृष्णा का जल! मृगमरीचिका!
गोस्वामीजी कहते हैं– ‘तौ कत विषय बिलोकि झूँठ जल’– यह विषय का जल झूठा है, नश्वर है, फिर भी ‘मन कुरंग ज्यों धावै’– यह मन मृग की तरह भ्रान्तिवश दौड़ रहा है। माताओं के आँख को मृगलोचनी, मृगनयनी की संज्ञा दी जाती है। मृग की आँखों का आयतन बड़ा अवश्य होता है लेकिन प्रतीत होता है कि उन्हें दिखाई कम देता है; क्योंकि चूहा भी जब जंगल में आग देखता है बिल में घुस जाता है, खरगोश भयंकर गर्मी में झाड़ी में दुबक जाता है, हर जानवर छिप जाता है, आदमी भी किसी छाया की शरण ले लेता है; किन्तु सबसे बड़ी आँखवाला मृग वहीं पहुँचता है जहाँ ऊष्मा की लहरें उठ रही हैं। सीताजी भी धोखा खा गयीं, मृगलोचनी जो थीं। अत: कवियों की यह उपमा माताओं के लिए उपयुक्त प्रतीत नहीं होती। अस्तु मृगतृष्णारूपी विषयवारि। ब्रह्मपीयूष हृदय में। परमात्मा के लिए ‘मानस’ में कहा गया– ‘सबके उर अंतर बसहु, जानहु भाउ कुभाउ।’ (२/२५७)– परमात्मा सबके अंतराल में है फिर भी ‘पानी बिच मीन पियासी’– यह हृदयवाला ब्रह्मपीयूष हम कैसे जानें? कबीर कहते हैं–
आतम ज्ञान बिना नर भटके, कोइ मथुरा कोइ काशी।
‘आतम ज्ञान’– यह नहीं कि आत्मा की बातें करें; जैसे– आत्मा शुद्ध है, बुद्ध है, निर्लेप है। ज्ञान का चित्रण गीता में जितना स्पष्ट है, अन्यत्र कहीं नहीं है।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थ दर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।। (गीता, १३/११)
अर्जुन! आत्मा के आधिपत्य में निरन्तर चलना– यह है ज्ञान की निम्नतम सीमा, ज्ञान की जागृति! उस आत्मा के ही संरक्षण में चलते-चलते परम तत्त्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन और दर्शन के साथ मिलनेवाली अनुभूति ज्ञान है तथा इसके अतिरिक्त सृष्टि में जो कुछ है, अज्ञान है। जब आपकी श्रद्धा इतनी अटूट हो कि भगवान आपकी आत्मा से जागृत होकर मार्गदर्शन करने लगें, आपको सोते से जगायें, भजन में बैठायें, भजन करायें, खतरे से अवगत करायें– यह है वास्तविक ज्ञान में प्रवेश। जब भगवान रथी हो जाते हैं, चिन्तन में आपकी लौ लगी है, आप मजनू की तरह चिन्तन में डूबे हों और यहाँ सर्प पड़ा है तो भगवान कह देंगे– खड़े हो जाओ। वह सर्प निकल गया तो भगवान कह देंगे– आगे बढ़ जाओ। इस प्रकार जैसा गीता में है– ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ (गीता, ९/२२)– वे योग की सुरक्षा का भार स्वयं वहन करने लगते हैं। जब तक आत्मा जागृत नहीं होती, यह ब्रह्मपीयूष समझ में ही नहीं आता।
पूज्य महाराजजी की शरण में जब कोई साधक पहुँचता तो महाराज उसे नाम कैसे जपें, रूप कैसे देखें, ब्रह्मविद्या क्या है?– सब बता दिया करते थे। इसके साथ ही साधक को कितना सोना, कब जागना, उठना-बैठना इत्यादि संयम भी समझा दिया करते थे। आरम्भिक एक साधक को भी महाराजजी ने यह सब कुछ बता दिया था। उन साधक को गुरु महाराज की सेवा में रहते दो-तीन महीने बीत गये। एक दिन गुरु महाराज ने उनसे पूछा– ‘‘क्यों रे! कुछ अजूबा दिखाई देत है?’’ उन्होंने बताया– ‘‘अभी तो ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला।’’ गुरुदेव ने पूछा– ‘‘मोर रूपवा देखत है?’’ नीचे गर्दन कर उन साधक ने कहा– ‘‘हूँ!’’ गुरु महाराज बोले– ‘‘सार कहत हैं ‘हूँ’। क्यों रे, मोर रूपवा देखत तो मोरेउ भीतर खटकत। हमें तो तोरे अन्दर अन्धकार दिखाई दे रहा है।’’ वास्तविकता यह थी कि वह साधक गुरु महाराज की सेवा में आने से पूर्व पाँच वर्ष तक वैष्णव सन्त रह चुके थे। तीर-धनुषवाले रामजी के चित्र से उनका बड़ा प्रेम था। इसलिए जैसे-जैसे महाराजजी ने अपना स्वरूप देखने को कहा था, वह हृदय में रामजी का वह चित्र देखने का प्रयास करते। गुरु महाराज को लगा कि ऐसे इसका जाल नहीं टूटेगा।
एक दिन गुरु महाराज ने अनुभव में उन्हें पढ़ाना आरम्भ किया। वह साधक भजन में बैठे थे। सामने रामजी का चित्र था। उसी समय गुरु महाराज आ गये। महाराज ने कहा– ‘‘देख क्या है रामजी के पास? यह मुकुट ही न!’’ मुकुट जैसे सजीव होकर चित्र से निकलकर महाराजजी के शिर पर लग गया। महाराज ने कहा– ‘‘और क्या है? यह धनुष!’’ वह धनुष भी महाराज के हाथ में आ गया। महाराज ने कहा– ‘‘तरकश और पीताम्बर!’’ वह भी महाराजजी से लिपट गया। महाराज बोले– ‘‘अब मनिहै? देख, यदि तुम्हें सचमुच भगवान की जरूरत है तो हमारा स्वरूप देख। तुम भगवान को पा जाओगे। और यदि सीधा भगवान को ढूँढ़ोगे तो यह चित्र तो कलाकारों के बनाये हुए हैं, ढूँढ़ते ही रह जाओगे।’’ उस दिन से उनका भ्रम टूट गया। वह गुरु महाराज का स्वरूप देखने लगे और पन्द्रह दिनों के अन्दर ही उनका भजन जागृत हो गया।
बात भी ठीक थी। प्राचीन युग-जमाने के कलाकार न जाने कैसी-कैसी मूर्तियाँ, कैसे-कैसे चित्र बनाते थे। अजन्ता-एलोरा के चित्र, मथुरा शैली, कांगड़ा शैली, राजस्थान शैली में चित्रकारों के अपने-अपने मानक हैं। राधा या सीता के सौ-पचास साल पुराने चित्रों से आज उन्हीं के चित्रों से तुलना कीजिये, आप बहुत बड़ा अन्तर पायेंगे। वाराणसी के विख्यात पेन्टर भोलानाथ आश्रम के भक्तों में से थे। उनकी तीन पुत्रियाँ थीं। उनकी ठोढ़ी पतली, ऊपर से उभड़ा हुआ था। वह जब-जब किसी देवी का चित्र बनाते, अपनी बेटियों का ही चित्र बना डालते थे। किसी के नीचे वह लिख देते राधिकाजी; किन्तु वह रहती थी उनकी अपनी ही पुत्री। कलाकारों के दिमाग में जो बैठ गया, सो बैठ गया।
वस्तुत: परमात्मा यदि परमधाम है तो सद्गुरु उसका प्रवेशद्वार, साधना की जागृति, पूर्तिपर्यन्त मार्गदर्शक, सब कुछ है। इस आत्मा की जागृति किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के बिना हो ही नहीं सकती। गुरु महाराज की शरण में आने से पूर्व हमारा भी श्रीकृष्ण के विराट् स्वरूप से लगाव था, केवल इसलिए कि हमारी पूजा में कोई देवता छूट न जाय। इसीलिए आरम्भ में गुरु महाराज के स्वरूप का ध्यान न कर हम विराट् स्वरूप देखने का प्रयास करते थे। दो-ढाई महीने के पश्चात् गुरु महाराज ने कहा– ‘‘क्यों रे! कुछ दिखाई दिया?’’ हमारी समझ में ही नहीं आता था कि यह क्या पूछ रहे हैं? जो साधना बतायी गयी है, वह तो हमें याद है किन्तु ‘दिखाई दिया’ क्या होता है? अग्रज सतीर्थों के अनुभवों से हमने साधन-विधि का परिमार्जन किया, महाराजजी को देखने लगे। साढ़े तीन महीना बीतते-बीतते एड़ी से चोटी तक मेरा सारा शरीर फड़कने लगा, तड़-तड़-तड़-तड़! जैसे किसी ने मेरे शरीर में कोई मशीन फिट कर दिया हो। आधा-आधा इञ्च पर फड़कन होने लगा। हमने गुरु महाराज को बताया कि हमारे शरीर में कभी दाहिनी ओर तो कभी बायीं ओर अचानक फड़क जाता है और हारमोनियम की रीड से भी तेज चलता है, उसी के अनुरूप कुछ चित्र भी आ रहे हैं। कहीं कोई बीमारी तो नहीं हो गयी?
गुरु महाराजजी बोले– ‘‘हूँ!’’ वह खूब हँसे, बोले– ‘‘बस बेटा! राम-रावण युद्ध शुरू हो गया। अब रावण मारा जायेगा, रामजी का अभिषेक होगा, तभी तुम्हें इससे छुटकारा मिलेगा, बीच में कहीं विराम नहीं है। आज से भजन जागृत हो गया। अब भगवान ने तुम्हें पढ़ाना शुरू कर दिया है। जिस श्रेणी के तुम हो, उसी श्रेणी की पढ़ाई तुम्हें पढ़ा रहे हैं। ज्यों-ज्यों स्तर उठता जायेगा, आगे की पढ़ाई मिलती जायेगी, उसी के अनुरूप तुम्हारी दृष्टि भी खुलती जायेगी, एक दिन परमात्मा को देख लोगे।’’ यही है भजन की जागृति का रहस्य कि जिस परमात्मा की हमें चाह है और जिस सतह पर हम बैठे हैं, हमारी पुकार ऐसी हो कि वह प्रभु हमारे स्तर पर उतर आयें, आत्मा से अभिन्न होकर खड़े हो जायँ और हमारा मार्गदर्शन करने लगें। उनके निर्देशन को समझना और उसका अक्षरश: पालन करना, उसके अनुसार आचरण करना भजन कहलाता है। यह निर्देशन, यह जागृति न लिखने में आता है, न वाणी से कहने में आता है। यह केवल किसी अनुभवी सद्गुरु के द्वारा जागृत हो जाया करता है। इस जागृति के बिना भीतर भी कोई भगवान हैं– यह बात नहीं समझ में आती। इसलिए–
आतम ज्ञान बिना नर भटके कोइ मथुरा कोइ काशी।
प्यास तो हम सबको है। हम उनकी अनुकम्पा चाहते हैं, उनका दर्शन चाहते हैं, मोक्ष भी चाहते हैं। प्यास तो है लेकिन लोग भटक रहे हैं। कोई उसे मथुरा में ढूँढ़ रहा है तो कोई अन्य तीर्थों में। जहाँ नहीं है लोग वहाँ ढूँढ़ रहे हैं।
जैसे मृगा नाभि कस्तूरी बन बन फिरत उदासी।
मोहिं सुन सुन आवत हाँसी।।
मृग की नाभि में कस्तूरी हुआ करती है। जब मृग युवा होता है, कस्तूरी फूट जाती है, रिसने लगती है। उससे इतनी सुगंध फैलती है कि मृग उन्मत्त होकर खोजने लगता है कि इतनी मधुर गमक है कहाँ? कभी वह सोचता है कि गन्ध उस वृक्ष से आ रही है तो उधर भागकर जाता है। वायु के झोकों से उसे कभी दूसरी ओर से गन्ध आती प्रतीत होती है तो वह उधर ही दौड़ता है। जहाँ भी वह जाता है, उसे निराशा, उदासी ही हाथ लगती है। यदि कभी धोखे से ही घूमकर सूँघ लिया, उस गंध को अपने अन्दर ही पा जाता है, मस्त होकर बैठ जाता है। इसी प्रकार भगवान सबके हृदय में हैं। जैसे मृग वन-वन निराश भटकता है, उसी प्रकार कोई उसे मथुरा में तो कोई काशी में ढूँढ़ रहा है। इस अनर्थ का कारण क्या है? आत्मज्ञान की जागृति का अभाव! एक रूपक के माध्यम से सन्त कबीर इस जागृति को समझाने का प्रयास करते हैं–
जल बिच कमल, कमल बिच कलियाँ, तापर भँवर निवासी।
महापुरुषों ने संसार को समुद्र कहा है। गोस्वामीजी के अनुसार–
भव सिंधु अगाध परे नर ते।
पद पंकज प्रेम न जे करते।। (मानस, ७/१३/१०)
अथाह भवसागर! आपके चरणों में जो प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागर में पड़े रहते हैं किन्तु जिन्हें चरणों में प्रेम हुआ, भगवत्कथा जागृत हो गयी तो यही अथाह भवसागर भवसरिता बन जाता है– ‘करउँ कथा भवसरिता तरनी।’ (मानस, १/३०/४)। साधना और सूक्ष्म होने पर, ‘यह चरित जे गावहिं हरि पद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।’ (मानस, १/१९६/१६)– वही भवसिन्धु हो गया भवसरिता, वही सिमटकर हो गया भवकूप और साधन पराकाष्ठा पर पहुँचा तो, ‘नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं।’ (मानस, १/२४/४) समुद्र का आयतन घटते-घटते अंतत: समुद्र ही सुख गया जैसे यहाँ कोई गड्ढा था ही नहीं। यही सन्त कबीर की इन पंक्तियों में है–
‘जल बिच कमल’– संसार एक समुद्र है जिसमें विषयरूपी वारि भरा है। जल के अन्दर कमल रहता है। पानी की बौछारें कमल के पत्तों के ऊपर से निकल जाती हैं किन्तु न कमलपत्र को भिंगो पाती हैं न पंखुड़ियों को। जल से निर्लेप! इसी प्रकार संसाररूपी समुद्र में जब कमलवत् रहने की क्षमता आ जाती है, उस समय ‘कमल बिच कलियाँ’– कमल के अन्तराल में पराग होता है, ‘ता पर भँवर निवासी’– ईश्वरीय पराग खिलते ही मनरूपी भँवर उस पर निवास करने लगता है।
‘सो मन बस त्रैलोक भयो सब’
ऐसे मन के वश में तीनों लोक हो जाता है। सात्त्विक, राजस और तामस– त्रिगुणमयी प्रकृति! ये सब उसके नियन्त्रण में हो जाती हैं। वह ‘यती सती सन्यासी’– वह यती है, उसका यत्न पूर्ण है; वह सती है, उसकी वृत्ति सत्य से जुड़ी है और सन्यासी– वह सर्वस्व का न्यास करके स्थित है। अगली पंक्ति में वे कहते हैं–
‘जाका ध्यान धरें विधि हरि हर’
जिस परमात्मा की आपको चाह है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश जिसका ध्यान धरते हैं और ‘मुनि जन सहस अठासी’– एक समय नैमिषारण्य में अठासी हजार ऋषि, अच्छी रहनी के महात्मा निवास करते थे; वे ऋषिगण जिसका ध्यान धरते थे, ‘सो तेरे घट माहिं विराजे’– वह परमात्मा तुम्हारे हृदय में निवास करता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– ‘हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’ (गीता, १८/६१); यही गोस्वामीजी कहते हैं–
व्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी।
सत चेतन घन आनन्द रासी।। (मानस, १/२२/६)
वह ब्रह्म परम सत्य, असीम आनन्द की राशि है। भला वह भगवान रहते कहाँ हैं?
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी।
सकल जीव जग दीन दुखारी।। (मानस, १/२२/७)
ऐसा परमात्मा सबके हृदय में निवास करता है। ‘अविकारी’– कुछ भी करो, कुछ भी पीओ, कुछ भी पहनो, वह द्रष्टा के रूप में है, उन विकारों से लिपायमान नहीं होता। जैसे प्रकाश में चाहे गीता पढ़ लो, चाहे कालीन बुनो, चाहे कसाईखाना खोल लो; प्रकाश का काम तो केवल प्रकाश देना है। इसी प्रकार वह परमात्मा द्रष्टा के रूप में है। अब वह हृदयवाला परमात्मा मिलेगा कैसे? तो,
नाम निरूपन नाम जतन तें।
सोइ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।। (मानस, १/२२/८)
नाम का निरूपण करो कि नाम है क्या? उसे जपा कैसे जाय? क्योंकि–
राम नाम में अंतर है। कहीं हीरा है, कहीं पत्थर है।
हमने-आपने चौबीस घण्टा परिश्रम किया, फिर भी कंकड़ ही हाथ लगा। उसका करोगे भी क्या! कहीं कीचड़ में ठोंक-ठाँक दोगे। किसी ने उतना ही श्रम किया और हीरे हाथ लग गये। तब फिर पूछना ही क्या है! जरूरत की हर वस्तु आ जायेगी। इसलिए पहले नाम का निरुआर करो, निराकरण करो कि नाम जपा कैसे जाता है और जब समझ काम कर जाय, तब यत्न करो, वह प्रकट हो जायेगा। इस प्रकार गोस्वामीजी का ईश्वर हृदय में रहता है। यही कबीर ने कहा–
सो तेरे घट माहिं विराजे, परम पुरुष अविनाशी।
वह तुम्हारे हृदय के अन्दर निवास करता है। वह परम पुरुष है, अविनाशी है। ‘है हाजिर तोहे दूर बतावें’– वह है तो बिलकुल हृदय के अन्दर लेकिन जब कहीं जाकर पूछो तो कहेंगे कि भगवान बद्रीनाथ में हैं; फिर किसी से पूछिये तो वह कहेगा– नहीं, मक्का चले जाओ। एक तो हाजी कहलाओगे, फिर सब ठीक हो जायेगा। कोई कहता है– वह तो येरूसेलम में है। किसी का परमात्मा ननकाना साहब में तो किसी का लुम्बिनी में! कहीं कुछ नहीं है। कबीर कहते हैं– वह ‘है हाजिर’– पास में है, ‘तोहें दूर दिखावें’– तुम्हें वहाँ इशारा कर रहे हैं किन्तु दूर जहाँ भी जाओगे, निराशा ही हाथ लगेगी। कुछ और पा सकते हो किन्तु उसे तो नहीं पाओगे। हाँ, पुण्य जरूर बढ़ेगा क्योंकि शोध के दौरान चिन्तन तो उसी का कर रहे हो।
कहे कबीर सुनो भाई साधो, गुरु बिन भरम न जासी।
मोहिं सुन सुन आवत हाँसी।
कबीर कहते हैं– सन्तो! ध्यान दो। सद्गुरु के बिना यह भ्रम कभी दूर नहीं होगा।
राखइ गुर जौं कोप बिधाता।
गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।। (मानस, १/१६५/६)
तकदीर रूठ जाय, विधाता मुकद्दर में दुर्भाग्य लिख दें, गुरु बचा लेंगे। उस पथ पर चला देंगे जिससे भाग्यरेखा बनती है और यदि गुरु उपलब्ध नहीं हैं तो भगवान नाम की कोई वस्तु नहीं है जबकि भगवान ही एक सत्ता है जो अविनाशी हैं, सर्वत्र व्याप्त हैं। होंगे, लेकिन हमारे दर्शन, स्पर्श और प्रवेश के लिए नहीं हैं; क्योंकि वह जागृति किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के द्वारा ही होती है।
कागभुसुण्डि भक्ति की खोज में सैकड़ों ऋषियों के यहाँ गये। मस्तक टेककर सादर सबको प्रणाम किया। उनका उपदेश सुना, उन्हें प्रणाम कर आगे बढ़ गये, कहीं कोई प्रश्न नहीं किया किन्तु महर्षि लोमश के आश्रम में वे पहुँचे तो उन्हें आशा बँधी कि यह सही रास्ता दिखा सकते हैं। उन्होंने अपना प्रश्न रखा– भगवन्! सगुण ब्रह्म की उपासना हमें बताये किन्तु,
ब्रह्म ज्ञान रत मुनि विज्ञानी।
मोहिं परम अधिकारी जानी।।
लागे करन ब्रह्म उपदेसा।
अज अद्वैत अगुन हृदयेसा।। (मानस, ७/११०/२-३)
वह ब्रह्म का उपदेश करने लगे। वह अज हैं, अजन्मा हैं, अद्वैत हैं, तुमसे भिन्न नहीं हैं। वह गुणातीत हैं, सबके हृदय में निवास करनेवाले हैं–
मन गोतीत अमल अबिनासी।
निर्बिकार निरवधि सुखरासी।। (मानस, ७/११०/५)
वह मन और इन्द्रियों से अतीत हैं, मल से अतीत हैं, अविनासी हैं।
सो तैं ताहि तोहि नहि भेदा।
वारि वीचि इव गावहिं वेदा।। (मानस, ७/११०/६)
वह तुम हो, तुझमें और उनमें कोई अन्तर ही नहीं है, जैसे– जल और उसकी लहरियाँ कहने को दो हैं लेकिन दोनों जल ही हैं। कागभुशुण्डि ने अनुरोध किया–
राम भगति जल मम मन मीना।
किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।।
सोइ उपदेश कहहु करि दाया।
निज नयनन्हि देखउँ रघुराया।।
भरि लोचन बिलोकि अवधेसा।
तब सुनिहउँ निरगुन उपदेसा।। (मानस, ७/११०/९-११)
पहले मैं नेत्र भरकर देख लूँगा तब मैं ब्रह्म हूँ या परमात्मा हूँ– सब स्वीकार कर लूँगा।
मुनि पुनि कहि हरि कथा अनूपा।
खंडि सगुन मत अगुन निरूपा।। (मानस, ७/११०/१२)
लोमशजी ने सगुण मत का खण्डन किया और निर्गुण का विस्तार से वर्णन किया–
तब मैं निर्गुन मत कर दूरी।
सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी।। (मानस, ७/११०/१३)
मैंने निर्गुण मत का प्रतिवाद करते हुए सगुण पक्ष का निरूपण किया–
उत्तर प्रति उत्तर मैं कीन्हा।
मुनि तन भये क्रोध के चीन्हा।। (मानस, ७/११०/१४)
उत्तर-प्रति उत्तर से लोमश महाराज नाराज हो गये, कहने लगे– क्या कौवे की तरह काँव-काँव लगा रखा है–
सठ स्वपच्छ तव हृदयँ बिसाला।
सपदि होहि पच्छी चंडाला।। (मानस, ७/१११/१५)
तुम्हे अपने पक्ष का बड़ा हठ है, जाओ पक्षियों में चाण्डाल कौआ हो जाओ। लोमशजी ने श्राप दे डाला और कागभुशुण्डिजी कौआ हो भी गये।
तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।
सुमिरि राम रघुबंस मनि, हरषित चलेउँ उड़ाइ।। (मानस, ७/११२ क)
मैंने उन मुनि के चरणों में सादर प्रणाम किया और हरष के साथ उड़ चला। हमने सोचा– वाह भगवान! आपने अच्छी कृपा की। पृथ्वी पर चलने में कितनी कठिनाइयाँ! कहीं काँटे तो कहीं खूँटी न गड़ जाय। नदी, नाल, छोटे-छोटे जीव कहीं पैरों के नीचे न आयें। कहीं कुत्तों के काटने का भय! यह उड़ने की शक्ति देकर आपने कृपा ही तो की है। अब आकाश मार्ग से ही पहुँचेंगे काशी, फिर प्रयाग, फिर आश्रम! उन्मुक्त विचरण का अच्छा अवसर मिला। भगवान शंकर का आशीर्वाद तो है ही– ‘कवनेउँ जनम मिटिहि नहिं ग्याना।’ (मानस, ७/१०८/८)– कौवा बना दें या उल्लू, रहेंगे तो वहीं। उधर लोमशजी का मन परिवर्तित होने लगा–
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन।
उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।।
कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी।
लीन्ही प्रेम परिच्छा मोरी।।
मन बच क्रम मोहि निज जन जाना।
मुनि मति पुनि फेरी भगवाना।। (मानस, ७/११२/१-३)
कृपासिंधु प्रभु ने लोमशजी की बुद्धि को भुलावे में डालकर मेरे प्रेम की परीक्षा ली कि यह ब्रह्म से संतोष करता है या मुझे ढूँढ़ता है। जब भगवान ने मुझे मन-क्रम-वचन से अपना सेवक समझ लिया तो मुनि की बुद्धि को पलट दिया। वह पछताने लगे–
अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई।
सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई।। (मानस, ७/११२/५)
उन्होंने बड़े आदर के साथ मुझे बुला लिया और–
मम परितोष बिबिधि बिधि कीन्हा।
हरषित राममंत्र तब दीन्हा।। (मानस, ७/११२/५)
उन्होंने मुझे सान्त्वना दी, प्रसन्न होकर मुझे राममंत्र दिया। इसके पश्चात् ‘बालक रूप राम कर ध्याना’– ध्यान की विधि बताया, ‘रामचरित मानस तब भाषा।’ (मानस, ७/११२/९)– ब्रह्मविद्या की कथा सुनाया, भजन की क्रमबद्ध विधि बतायी और बहुत सारा आशीर्वाद भी दिया। इस कथानक से स्पष्ट हो गया कि निर्गुण नाम की संसार में कोई उपासना नहीं है। वह तो मुनि की बुद्धि का एक छलावा था।
वस्तुत: भगवान एक हैं और उन्हें पाने की विधि भी एक है। जो चित्त संसार में इधर-उधर भटक रहा है उसे समेटकर भगवान की ओर मोड़ दो। शरीर से आप कहीं भी रहें; खाना खाते, पानी पीते, शौच जाते, उठते-बैठते हर परिस्थिति में नाम याद आया करे। भगवान जानते हैं कि यह मुझे पुकार रहा है। वह यह भी जानते हैं कि इसको क्या चाहिये! भविष्य में आप जो चाहेंगे, मिलेगा और मोक्ष तो मिलना ही मिलना है। ईश्वर-पथ में यदि श्रद्धा से डोरी लग गयी, भगवान आत्मा से जागृत अर्थात् रथी हो गये, आत्मा से ज्ञान प्रसारित होने लगा फिर तो माया में कोई शक्ति नहीं कि उसको नष्ट कर दे और उन्हीं के निर्देशन में चलते-चलते दो-चार जन्मों के अन्तराल से आप वहीं पहुँच जायेंगे जिसका नाम परम गति है, परम धाम है। इसलिए ‘राम भगति जल मम मन मीना’ सबका मन भक्तिरूपी जल में मछली की तरह है किन्तु भक्ति शुरू करें तो कहाँ से करें? भगवान मिलेंगे तो कहाँ मिलेंगे?– इन प्रश्नों को लेकर समाज में बड़ी भ्रान्तियाँ हैं। काशी में आप पायेंगे कि शाम होते-होते सभी मन्दिरों में घण्टे घनघना उठते हैं। एक ही परिवार में माँ दुर्गाजी की पूजा करने जा रही हैं, पापा विश्वनाथजी की पूजा में जा रहे हैं, बेटा संकटमोचन जा रहा है….. परिवार में दस सदस्य हैं तो दस भगवानों की पूजा हो रही है। कहीं भगवान भी दस हुए हैं!
यह माना कि जितने भी मन्दिर हैं, कोई निरर्थक नहीं है। हनुमानजी सही हैं, दुर्गाजी सही हैं। यह सभी हमलोगों के पूर्वज हैं, भगवत्स्वरूप को प्राप्त महापुरुष हैं। यह आकृतियाँ उन्हीं की हैं। उनसे आशीर्वाद लो, मस्तक टेको, प्रणाम करो लेकिन भजन वैसे ही करो जैसा भगवान ने अपने श्रीमुख से आदेश दिया है। वह आदेश है गीता। गीता आप सबका धर्मशास्त्र है। इसकी यथावत् व्याख्या ‘यथार्थ गीता’ का अनुशीलन करें।
सन्त कबीर ने इस पद में कहा कि ‘गुरु बिन भरम न जासी’। इसका आशय यह नहीं है कि दौड़कर जिस किसी को गुरु बना लें; क्योंकि–
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता।
सतसंगति संसृति कर अंता।। (मानस, ७/४४/६)
जब तक पुण्य का समूह वर्तमान में साथ नहीं देता, सन्त अथवा सद्गुरु नहीं मिलते। नहीं मिलने का अर्थ यह नहीं है कि वे दिखाई ही नहीं देते। संत, सद्गुरु या स्वयं भगवान ही सामने खड़े हों, लोग चार खरी-खोटी अवश्य सुनायेंगे कि देखिये, यह कैसा रूप बनाकर खड़े हैं; क्योंकि हमारे पास संत-सद्गुरु को पहचाननेवाली आँख ही नहीं है। जिन आँखों से संत या सद्गुरु पहचाने जाते हैं, वह दृष्टि पुण्यमयी है। पुण्य जहाँ जागृत हुआ तो सन्त या सद्गुरु जिस सिंहासन पर बैठे होंगे या जिस दलदल में लोटते होंगे, आप ही वहीं पहुँच जायेंगे अथवा वहीं आपके पास आ जायेंगे। आपको विश्वास भी हो जायेगा, आपका मार्गदर्शन भी होने लगेगा।
अयोध्या के पास सरयू नदी के बायें किनारे के समीप मधवापुर में आश्रम की एक शाखा है। साधनकाल में गुरु महाराज ने वहाँ निवास किया था। आश्रम के समीपवर्ती गाँव की घटना है। आज से पन्द्रह-बीस वर्ष पहले की बात है। पहले गाँवभर की गायें यादव लोग चराया करते थे। उन दिनों जंगल में एक शेर आ गया था। गाँववालों ने चरवाहे को सचेत किया– देखो! जंगल में शेर आ गया है। उसने उस गाँव की दो भैंस मार दी है। वहाँ उसने एक पड़वा तोड़ दिया। उस जगह दो बैल मारे गये। तुम सावधान रहकर गायों को चराना, कहीं वह इन पर न टूट पड़े।
चरवाहे ने एक दिन लाठी बदल दिया। उसने लोहा लगा डंडा लिया, पगड़ी बाँधा और चल पड़ा। उसे यह भी नहीं मालूम था कि शेर होता कैसा है? फिर भी वह प्रत्येक परिस्थिति के लिए तैयार था। दोपहर का समय था। गायें नदी में पानी पीकर वृक्षों के नीचे विश्राम कर रहीं थी। अयोध्या का परिवेश! संयोग से एक वैष्णव महात्मा भटकते हुए उधर आ निकले। उन्होंने ठाकुरजी को सामने रख दिया, तुलसी-दल चढ़ाया और शङ्ख उठाकर अचानक बजा दिया। गायें बिदककर इधर-उधर भागने लगीं।
चरवाहे ने समझ लिया कि जानवर तो गया। यह भैंस तोड़ देता है। यदि यह हमारी ओर घूम गया तो हम क्या कर लेंगे! दबे पाँव वह उन महात्मा के पीछे गया, उन्हें लोहबंदा मारा। एक ही वार में उनके प्राण-पखेरू उड़ गये, फिर भी उसने दो-तीन प्रहार और किया, कहीं पलट न पड़े। गायों को समेटकर वह दोपहरी में ही घर पहुँच गया। लोगों ने पूछा– गायें तो शाम को छ: बजे आती थीं, तू आज तीन बजे ही इन्हें लेकर क्यों आ गया?
उसने कहा– ‘‘आज हमने उस जानवर को, जो जंगल में लगता था, हमने साफ कर दिया।’’ लोगों ने उससे पूछा– ‘‘कैसा था वह जानवर?’’ उसने बताया– ‘‘गले बरारी तीन ताग’– वह गले में तीन लर की रस्सी लपेटे हुए था। ‘पनिचिखवा मारेउँ गऊ घाट’– वह रह-रहकर पानी को चख लेता था (आचमन कर लेता था), गायघाट पर हमने उसे मार डाला।’’ लोगों ने पूछा– ‘‘गायों को उसने क्या नुकसान पहुँचाया?’’ उसने कहा– ‘‘जाके फूँके ते झूर हाड़ नरियाइ। सो भला गइया कस न धरि खाय।’– जिसके फूँक मारने से जब सूखी हड्डी गुहार लगाने लगती है, गाय में तो हाड़-माँस है, खून है; वह गायों को भला क्यों न खा लेता?’’ लोगों ने सोचा– लगता है, इसने किसी ब्राह्मण या साधु को मार डाला। जाकर देखा, एक सन्त मरे पड़े थे। सबने मिलकर विधिवत् उनकी अत्येष्टि किया, उनकी समाधि बनवायी और दस गाँव के यादव परिवार मिलकर साल में एक बार वहाँ पूड़ी और खीर बनाकर चढ़ाते हैं।
उस चरवाहे के पुरोहित को इस घटना की जानकारी हुई। उन्होंने सोचा– यह है तो मजे में लेकिन कभी कुछ दिया-लिया नहीं। वह उसके यहाँ गये और कहा– ‘‘यजमान! तुमने बहुत बड़ा पाप किया है। तुम्हें लगी है ब्रह्महत्या! तुम तो रौरव नरक में जाओगे।’’ उसने कहा– ‘‘गुरुजी! हमने तो अपनी समझ से उपकार ही किया है, गायों की रक्षा के लिए प्राण पर खेल गये। धोखा हो गया। अब हम क्या करें? कोई उपाय है?’’
पण्डित ने कहा– ‘‘उपाय क्यों नहीं है! तुम प्रयागराज जाओ, त्रिवेणी में स्नान करके आओ और हमसे कथा सुन लो। भैंस, दो गाय और दो बैल दान कर देना। यह पहले ही मेरे घर पहुँचा देना। कथा सुनने के बाद एक सीधा दे देना। बस, तुम्हारा सब माफ हो जायेगा।’’ वह प्रयाग स्नान कर, पशुओं का दान देकर बोला– ‘‘अब?’’ पण्डित ने कहा– ‘‘अपनी मालकिन से कह देना कि आँगन में थोड़ा लीप दे जहाँ कथा होगी। यह सामान बाजार से ले आ।’’ सारी व्यवस्था हो गयी।
पण्डितजी कथा कहने बैठे। उन्हें याद आया कि इसने एक साधु को मार डाला है, इसका कौन ठिकाना! कहीं हमीं से न लिपट पड़े। ऐसा करते हैं कि इसे वाक्य-दो वाक्य समझा देते हैं। उन्होंने उससे कहा– ‘‘देख, जो मैं कहूँ, वही करिहे।’’ उसकी समझ में आया कि ‘जो मैं कहूँ, वही कहिहे।’ उसने स्वीकृति में गर्दन हिलाया– ‘‘हाउ।’’ पण्डितजी ने कहा– ‘‘ले पैंती पहन।’’ वह भी बोला– ‘‘ले पैंती पहन।’’ पण्डितजी बोले– ‘‘ठीक से बैठ जा। उसने भी कहा– ‘‘ठीक से बैठ जा।’’ पण्डितजी ने कहा– ‘‘देख, शान्ति से कथा सुनी जाती है।’’ उसने भी यही दुहरा दिया। अब पण्डितजी बोले– ‘‘चुप रहो।’’ उसने भी कह दिया– ‘‘चुप रहो।’’
पण्डितजी को क्रोध आ गया। उन्होंने उस चरवाहे को एक थप्पड़ मार दिया। उसने भी पण्डितजी को एक थप्पड़ मार दिया। पण्डितजी लड़ पड़े। वह भी लड़ पड़ा। पण्डितजी का पाँव लीपे हुए चौके से बाहर चला गया। उसकी पत्नी देख रही थी कि कथा शुरू हो गयी है। अब कथा पूरे शबाब पर आ रही है। उसने लीपी भूमि से बाहर पाँव देखा तो उठकर गयी, पण्डितजी की टँगड़ी पकड़कर चौक पूरी भूमि में कर दिया और बोली– ‘‘पण्डितजी! होश में कथा कहो। जब सारी कथा लीपी गयी जमीन से बाहर हो जायेगी तो हमारे लीपने से क्या फायदा! पहले आपने बताया होता तो हम दस हाथ और लीप देती। हमें क्या पता कथा में कितनी जगह लीपी जाती है।’’ दो एक-बार चरवाहे ने पण्डितजी को और ढकेला। किसी तरीके से पण्डितजी छूटे तो पोथी-पत्रा छोड़कर घर भागे। घर में पहुँचकर उन्होंने अपनी पत्नी से कहा– ‘‘हम तो सोचे कथा में कुछ देगा लेकिन वह तो मेरी जान के ही पीछे पड़ गया।’’
इधर चरवाहा भी छूटकर हाथ से चलनेवाला पंखा लेकर अपने शरीर पर हवा करते बोला– ‘‘कथा में तो बड़ा बल पड़ता है। हम तो समझते थे कि कथा कोई सरल-सा कार्य है! क्यों? पण्डितजी दिन में दो-चार कथा कह लेते हैं; कैसे जी रहे हैं? पण्डित को बड़ा बल पड़ा होगा। अब जा, उन्हें कायदे से सीधा दे आ।’’ मालकिन आटा-दाल के साथ सवा किलो शुद्ध घी एक परात में लेकर पण्डितजी के घर गयी और कहा– ‘‘लो पण्डित सीधा।’’ पण्डित जले-भुने बैठे ही थे। उन्होंने उठाया डण्डा और उसकी खूब पिटाई किया। किसी तरह वह भी छूटी तो गिरते-पड़ते घर पहुँची। चरवाहे ने कहा– ‘‘दे आई सीधा?’’ उसने कहा– ‘‘हाँ दे आयी। तुम कहत रह्यौ कि कथा सुनने में बड़ा बल पड़ता है किन्तु सीधा देने में उससे चौगुना बल हमें पड़ा है।’’ तब भी दोनों ही नहीं समझ पाये कि मारपीट हुई या कथा हुई है?
जाका गुरु है आँधरा, चेला निपट निरंध।
अन्धम अन्धहिं ठेलिया, दूनउ कप परन्त।।
इसीलिए गुरु करै जानि के, पानी पीए छानि के, रास्ता चले देखि के और जीवन में कोई ऐसा काम न कर दे, बिना विचारे न कर डालें कि आजीवन सोचनीय हो जाय, कभी चित्त से न उतरे। वस्तुत: गुरु एक स्थिति है। ‘नास्ति तत्त्व: गुरोर्परम्’ गुरु परम तत्त्व परमात्मा है। जिसने उस तत्त्व को विदित कर लिया, वही तत्त्वदर्शी है, वही सद्गुरु है। ऐसे ही सद्गुरु के लिए कबीर कहते हैं– ‘गुरु बिन भरम न जासी।’।
।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-5’ से उद्धृत)