बन्दगी हो तो उस शान की बन्दगी
प्रवचन से पूर्व पूज्य महाराजश्री निम्नांकित पंक्तियों को एक-एक कर गुनगुनाते गये, भक्तजन इसे दुहराते रहे–
ॐ जय गुरुदेवम् जय गुरुदेव……
ॐ अशरण शरण शरण प्रभु लेव……
ॐ जय गुरुदेवम् जय गुरुदेव……
गुरु राखइ जो कोप विधाता……
गुरु रुठे नहिं कोउ जग त्राता……
गुरु के वचन प्रतीति न जेही……
सपनेहु सुगम न सुख सिधि तेही……
ॐ जय गुरुदेवम् जय गुरुदेव……
(पुण्य सलिला जाह्नवी के रमणीय वाम पार्श्व में अवस्थित श्रीकृष्णानन्द, श्री भगवानानन्दजी महाराज जैसे ऋषियों की तपस्थली श्री परमहंस आश्रम जगतानन्द, बरैनी, मीरजापुर–उत्तर प्रदेश को सन् १९७० से १९९५ ई० तक पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी महाराज के सान्निध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आश्रम से लगभग पाँच–सात सौ मीटर पूर्व गंगा तट पर ही हनुमानजी का वह प्राचीन मन्दिर है जहाँ बरैनी ग्राम निवासी प्रसिद्ध कथावाचक मानस मर्मज्ञ पं० रामकिंकरजी उपाध्याय हनुमज्जयन्ती के अवसर पर एक सप्ताहपर्यन्त श्रीरामकथा का भव्य आयोजन करते थे जिसमें उपस्थित होकर दूर–दूर तक के कथावाचक, भजन–कीर्तन गायक–वादक तथा अखिल भारतीय कथा रसिक श्रोतागण अपने को धन्य मानते थे। नीरव रात्रि में उनका गायन, प्रवचन ध्वनिविस्तारक यन्त्र के माध्यम से आश्रम तक सुनायी पड़ता था और पूज्य महाराजश्री भी उन वैदुष्यपूर्ण प्रवचनों और भावपूर्ण भजनों को सुनने का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे। वहाँ जबलपुर–मध्य प्रदेश से एक सूफी गायक प्राय: प्रतिवर्ष पधारते थे तथा लोगों के आग्रह पर यह पद सुनाया करते थे जो साधनापरक होने के कारण पूज्य महाराजश्री को भी प्रिय था।)
बन्दगी हो तो उस शान की बन्दगी,
सर झुके और जमाना बदलता रहे।।
जो हैं बेहाशी में होश में आयेंगे,
गिरनेवाले भी खुद ही सँभल जायेंगे।
चाँद ढलता रहे दिन निकलता रहे,
तुम न बदले जमाना बदलता रहे।
अब्र रोता रहे चाँद हँसता रहे,
हम न बदले जमाना बदलता रहे।।
बन्दगी हो तो………
सामने मेरे आयें वे तो इस तरह,
उनका परदा रहे मेरा दीदार हो।
पास चिलमन के बैठे रहें इस तरह,
हुस्न छन छन के हममें समाता रहे।।
बन्दगी हो तो………
आरजू–ए–सुकूँ इश्क की मौत है,
इश्क पारा है पारा मचलता रहे।
उनके कदमों पै ये सर झुका ही रहे,
हुक्म उनका दिलोजाँ पै चलता रहे।।
बन्दगी हो तो………
प्राय: लोग भजन-पूजन करते ही रहते हैं किन्तु उसका परिणाम समझ में नहीं आता। यह अंधभक्ति किस काम की। हम इधर भक्ति करें, उधर सुनवाई हो तब सही हो। जब पुकार सुननेवाला कोई नहीं फिर तो यह एक जीवन काटना है, कोई भजन नहीं है। भजन का तात्पर्य होता है कि हम जितना करें, प्रभु की ओर से उतनी सुनवाई भी हो। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– जो मुझे जैसा भजता है, मैं भी उसे वैसे ही भजता हूँ। भक्त मेरी तरफ दो कदम बढ़ाता है तो उसकी ओर दो कदम मैं भी बढ़ाता हूँ,
जहाँ भगत मेरो पग धरे, तहाँ धरूँ मैं हाथ।
पाछे लागा सदा रहूँ, कबहूँ न छाड़ूँ साथ।।
आर्षग्रन्थों के अनेकानेक कथानकों से इसी तथ्य की पुष्टि होती है। द्वापर की घटना है। महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। भीम ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा– ‘‘भगवन्! इतनी अपार दौलत खर्च कर जो यज्ञ हो रहा है, यह सफल हुआ, इसकी क्या पहचान है?’’ भगवान श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘भीम! सर्वोपरि महापुरुष जब यहाँ जूठन गिरा देंगे, आकाश में घण्टे बज उठेंगे, तब जान लेना कि यज्ञ सम्पन्न हुआ।’’ तत्काल चारो दिशाओं में रथ दौड़ाये गये। जितने भी विख्यात महात्मा थे, सब आ गये। सबने विधिवत् भोजन-प्रसाद ग्रहण किया किन्तु घण्टे नहीं बजे।
भीम ने कहा– ‘‘भगवन्! अब?’’ भगवान बोले– ‘‘इनसे भी श्रेष्ठ कोई महात्मा बच गया है।’’ लोगों ने कहा– ‘‘भगवन्! व्यास आये, समास आये, देवल ऋषि आये, धौम्य आये, शुक आये, नारदजी भी आ गये हैं; अब इनसे श्रेष्ठ संसार में कौन बचा है?’’ भगवान ने कहा– ‘‘काशी के सूपा भगत।’’ भीम तुरन्त रथ लेकर चल पड़े। उन्हें चिन्ता थी, यह यज्ञ जल्द खतम हो तो शिकार में जाऊँ! मस्त स्वभाव के भीम काशी पहुँचे। उन्होंने देखा– गंगा-स्नान कर धोती कंधे पर रख चन्दन लगाये भक्तलोग सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे। भीम ने सोचा, संतों का हाल तो भगत लोग ही जानते हैं। इनसे पूछ लिया जाय।
उन्होंने कहा– ‘‘भक्तजनो! महान सन्त सूपा भगत कहाँ निवास करते हैं?’’ सब के सब बिगड़ खड़े हुए। उन्होंने कहा– ‘‘तू राजा-महाराजा-राजकुमार होकर किसके झाँसे में आ गये? वह तो डुमार है, चाण्डाल है, नीच है, अधम है। वह न तो राम-राम जपता है, न कानों से सुनता है। जब कहो कि ‘बाबा, राम-राम कहो’, वह घण्टे बजाकर भाग जाता है। सैकड़ों चितायें यहाँ नित्य ही जलती रहती हैं किन्तु उसे मौत भी नहीं आती कि काशी का पाप तो कम हो जाता।’’ सबने बड़ी खरी-खोटी सुनाया। भीम की श्रद्धा आधी हो गयी किन्तु वह आया ही उन्हीं के लिए था। वह उनका पता लगाते पहुँचा। वह सन्त गंगा तट की बालुका में पड़े हुए थे।
भीम ने सोचा, अब इसको कौन-सा निमन्त्रण दूँ? यह जहाँ तस्मई-मालपुआ का नाम सुनेगा, स्वयं ही उठकर भागने लगेगा। उसने कहा– ‘‘बाबाजी! चलिये, महाराज युधिष्ठिर के यहाँ यज्ञ हो रहा है, आपका निमन्त्रण है। मालपुआ है, दूध-दही की नदियाँ बह रही हैं।’’ उन महापुरुष ने देखा, एड़ी से चोटी तक सामने एक उद्दण्ड खड़ा है। न दण्ड न प्रणाम! वह बोले– ‘‘भैया! हमारी जाति ठीक नहीं है।’’
भीम को बड़ा गुस्सा लगा। महान चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर का निमन्त्रण! मैं महापराक्रमी भीम इसे लेने आया। अब इस अघोरी का नखरा तो देखो! यह कहता है जाति अच्छी नहीं है। अरे, वह तो हम काशी में प्रवेश करते ही जान गये थे कि तुम कितने पानी में हो। इसके खा लेने से भी कौन-सा कल्याण होगा? भीम लौट गये।
भगवान ने कहा– ‘‘अर्जुन! तुम जाओ, अन्यथा यज्ञ को अधूरा ही समझो।’’ अर्जुन काशी आया। उन सन्त के चरणों में सादर प्रणाम किया, उन्हें उठाकर रथ में बैठाया, उन्हें लेकर चला आया। उन्होंने भी भोजन किया किन्तु घण्टे नहीं बजे। द्रौपदी ने कहा– ‘‘भगवन् अब?’’ श्रीकृष्ण ने कहा– ‘‘किसी की अश्रद्धा हो गयी होगी?’’ तब द्रौपदी ने कहा– ‘‘भगवन्! अश्रद्धा तो मुझे ही हो गयी है। हमने सोचा, इतने चोटी के महापुरुष आ रहे हैं इसलिए हमने स्वयं रातभर श्रम करके भोजन बनाया। हमने जीवन में जो भी पाककला सीखी थी, प्रसाद बनाने में सबकुछ उड़ेल दिया। यहाँ यह महाशय सभी व्यंजन एक साथ मिलाकर पशुओं के चारे की तरह बना लिया, जो कुछ इन्हें खाना था खा लिया और थाली सरका दी। मेरे बनाये पकवानों की इन्होंने कद्र नहीं की।’’ श्रीकृष्ण बिगड़े– ‘‘द्रौपदी! तुम्हारे पकवानों की प्रशंसा राजालोग करेंगे। यह तो महात्मा हैं। यह पकवान खाते ही नहीं। सूखी रोटी और पक्वान्न इनके लिए बराबर हैं। ‘शरीरमाद्यम् खलु धर्म साधनम्’– सर्वप्रथम शरीर ही धर्म का साधन है, माध्यम है। ‘तन बिनु भजन वेद नहिं बरना।’ इसीलिए शरीर को रखने के लिए यह इसे थोड़ी-सी खुराक दे दिया करते हैं। स्वाद की ओर इनका चित्त है ही नहीं।’’
द्रौपदी को आश्चर्य हुआ, दुनिया में ऐसे लोग भी हैं कि पकवान खायें और पता न चले। उसे बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने पुन: विधिवत् भोजन बनाया और खिलाया। सूपा भगत ने दो ग्रास खाकर ज्योंही हाथ धोया, आकाश में घण्टा बज उठा, यज्ञ सम्पन्न हो गया। अस्तु, भगवान अपने भक्त को पहचानते हैं। उन्हें रिझाने के लिए प्रदर्शनी लगाने की कोई जरूरत नहीं है।
मस्जिद चढ़ कर मुल्ला कूके, क्या तेरा साहिब बहरा है।
चिउँटी के पग नूपुर बाजे, वह भी साहब सुनता है।।
ना जाने तेरा साहिब कैसा है?
आपके चित्त में कैसा भाव है? कब अभाव है? आप संकल्प बाद में करते हैं, वह पहले से ही जान जाते हैं। इसलिए,
बन्दगी हो तो उस शान की बन्दगी,
सर झुके और जमाना बदलता रहे।
बन्दगी में इतनी कशिश हो कि इधर हमारा शिर झुके और उधर जमाना अर्थात् समय बदल जाय, दुर्दिन सुदिन में बदल जाय। द्रौपदी के जीवन में भी विपत्ति आयी। महान पराक्रमी पाँचों शूरवीर पति गर्दन लटकाये बैठे थे, वयोवृद्ध भीष्म इत्यादि शुभचिन्तक भी जमीन झाँक रहे थे। जब कोई सहारा नहीं रहा तो उसने भगवान को पुकारा। साड़ियों का अम्बार लग गया और लाज भी बच गयी। अत: पूजा ही हो तो उस प्रभाव की हो कि हम पूजा करें और मन में जो इच्छा हुई उसी के अनुरूप व्यवस्था हो जाय। यही है ‘बन्दगी हो तो उस शान की बन्दगी’।
द्रौपदी ने भगवान को पुकारा किन्तु वहीं पर एक भक्त ऐसा भी था जिसने अपनी सुरक्षा के लिए भगवान को नहीं पुकारा और व्यवस्था हो गयी। दुर्योधन का एक अंतरंग नाई था। उसका नाम था नंदा। प्रात: युवराज को सजाकर राजसभा के लिए तैयार करना उसका काम था। आजकल शहरों में जो ब्यूटीपार्लर चलते हैं, यह आविष्कार युवराजों का चलाया हुआ है, बहुत पुराना है। नन्दा भी साज-सज्जा विशेषज्ञ था।
एक दिन बड़े सवेरे वह ड्यूटी पर जा रहा था। अभी वह घर से निकला ही था कि पाँच-सात सन्तों पर दृष्टि पड़ गयी। उसने उन्हें सादर नमन किया और उनकी सेवा में लग गया। उन्हें नहलाते-धुलाते, खिलाते और विदा करते तीन बज गये। अब उसे याद आया, मैं सुबह ड्यूटी में जा रहा था, अब तो तीन बज गये। वह दुर्योधन बड़ा दुष्ट है। मृत्युदण्ड से नीचे आज तक उसने किसी को कुछ दिया ही नहीं। आज मौत निश्चित है। फिर उसने सोचा, आज यह शरीर सन्तों की सेवा में काम आ गया। एक दिन तो इस क्षुद्र शरीर को छूटना ही था। वह उत्साह से राजमहल की ओर चला।
राजद्वार पर ही दुर्योधन मिल गया। उसने कहा– ‘‘अरे नन्दा! तुम लौटे कैसे?’’ नन्दा ने विचार किया, मैं तो आया ही नहीं था। यह व्यंग बोल रहा है। कुछ कोड़े मारकर छोड़ देता तो प्राण बच जाते। इतने में पाँच-सात मंत्री उधर से गुजरे। वह बोले– ‘‘नन्दा! तुम वापस क्यों आये, अभी तो गये हो। कुछ भूल गये क्या? नन्दा! आज तुम्हारे शरीर में वह मोहिनी थी कि हम देखते ही रह गये। हमलोगों की पलक हट ही नहीं रही थी।’’
दुर्योधन बोला– ‘‘नन्दा! तुमने हमारी सेवा जीवनभर की किन्तु आज तुम्हारे हाथों के स्पर्श में जो आनन्द था, जो आह्लाद प्राप्त हो रहा था, मैं उसे भूल नहीं पा रहा हूँ। तुम मुझसे वरदान माँग लो।’’ नन्दा समझ गया कि मुझ क्षुद्र के प्राण को बचाने के लिए आज मेरे प्रभु को इस नीच, अधम और तुच्छ प्राणी के पाँव दबाने पड़े। उसके प्रेमाश्रु छलक आये। वह बोला– ‘‘युवराज! वर ही देना है तो मुँहमाँगा दो। दुर्योधन ने कहा– नन्दा! मैंने कर्ण को राजा बनाया है, दूसरा तुम्हें भी मैं राजा बना सकता हूँ। तुम चाहो तो सरसब्ज पंजाब प्रान्त ही माँग लो।’’ नन्दा ने अपना त्यागपत्र लिखा और कहा– ‘‘युवराज! मेरा त्यागपत्र स्वीकार करें। आज से मैं भगवान के अतिाfरक्त अन्य किसी की सेवा नहीं करूँगा।’’ धीरे-धीरे अन्य लोग भी समझ गये– ‘आप बने हरि नाई नन्दा।’
द्रौपदी ने करुण क्रन्दन किया कि ‘प्रभो! बचाओ।’, भगवान ने व्यवस्था कर दी। नन्दा ने कहा भी नहीं कि बचाओ, फिर भी भगवान ने पहले ही सुरक्षा प्रदान कर दी। यह थी हृदय की पुकार! नन्दा का सिर झुक गया था उन चरणों में। कोई नहीं जानता था कि यह भी भक्त है; किन्तु भगवान तो हृदय की जानते हैं इसलिए ऐसी व्यवस्था दे देते हैं कि,
जो इच्छा करिहहु मन माहीं।
हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।। (मानस, ७/११३/४)
मन में जो इच्छा कर लोगे कि यह चाहिए, भगवान के कृपाप्रसाद से कुछ भी असंभव नहीं रह जाता; वैसी व्यवस्था हो जायेगी। इस स्थिति के महात्मा जहाँ भी रहते हैं, जहाँ से गुजरते हैं, उनके दर्शन से, स्पर्श से, वाणी से सबमें ईश्वरीय संस्कारों का सूत्रपात् हो जाया करता है।
जो हैं बेहोश होश में आयेंगे।
गिरनेवाले भी खुद ही सँभल जायेंगे।।
जो बेहोश हैं, होश में आ जायेंगे। सारा संसार बेहोश है–
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा।
देखिअ सपन अनेक प्रकारा।। (मानस, २/१२/२)
मोहरूपी रात्रि में सबलोग अचेत पड़े हुए हैं। वे रात-दिन जो दौड़-धूप करते हैं, मात्र स्वप्न देखते हैं। कोई सपना घड़ी-दो घड़ी का होता है, यह साठ-सत्तर साल का है; फर्क इतना ही है। पुन: लौटकर कोई नहीं देखता कि हमारी अर्जित मान-मर्यादा, पद-प्रतिष्ठा का क्या हुआ!
एहि जग जामिनि जागहिं जोगी।
परमारथी प्रपंच बियोगी।। (मानस, २/१२/३)
इस जगत्-रूपी रात्रि में जहाँ सभी प्राणी निश्चेष्ट पड़े हुए हैं, संयमी पुरुष जग जाता है। इनके जागृति की प्रथम शुरुआत ऐसे महापुरुषों के दर्शन-स्पर्श और सान्निध्य से है अर्थात् ‘जो हैं बेहोश वे होश में आयेंगे’।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं– ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी’ (२/६४)– इस जगत्-रूपी रात्रि में सभी प्राणी अचेत पड़े हैं, जैसा चीर-फाड़ घर में लोग लेटे रहते हैं। उनके पेट पर कैंची चल रही है – बेहोश तो बेहोश! इसमें संयमी पुरुष जग जाता है– ‘जो हैं बेहोश वे होश में आयेंगे’– वे सचेत हो जायेंगे, ईश्वरीय पथ पर अग्रसर हो जायेंगे। वे अपने रास्ते को समझने लगेंगे। कभी-कभी लोग भगवत्पथ की कठिनाइयों से हताश हो जाते हैं कि यह तो बड़ा कठिन है, इस प्रकार जो लड़खड़ा गये हैं, वे हैं गिरनेवाले! वे ‘गिरने वाले भी खुद ही सँभल जायेंगे।’ इस पथ पर चलते हुए जिनकी श्रद्धा डगमगा गयी थी, वह पुन: सचेत होकर सँभल जायेंगे। उनकी श्रद्धा पुन: स्थिर हो जायेगी। ऐसी स्थितिवाले साधकों में भगवान का पूर्ण प्रकाश तो नहीं रहता, किन्तु चाँद जैसी क्षीण आभा रहती है।
चाँद ढलता रहे, दिन निकलता रहे।
चन्द्रोदय रात्रि में होता है। ‘या निशा सर्वभूतानां’– जगत् एक रात्रि है। जगत्-रूपी रात्रि में परमात्मा का क्षीण प्रकाश ही चन्द्रोदय है जिसमें रास्ते की पहचान हो सकती है, साँप-बिच्छू-गड्ढा-खूँटी दिखाई देते हैं। परमात्मा के इस क्षीण आलोक में जब-जब हमने पुकारा, भगवान ने सुनवाई कर ली किन्तु हमें तो पूर्ण प्रकाश की ओर चलना है। यदि हम राही हैं तो ‘चाँद ढलता रहे, दिन निकलता रहे।’ बन्दगी और प्रार्थना में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि हो। और इस प्रकार चलते-फिरते–
तुम न बदले जमाना बदलता रहे।
यदि तुम विचलित नहीं होगे, टेक लगाकर अडिग रह लोगे तो ‘जमाना बदलता रहे’– आपका समय बदलता चला जायेगा, दुर्दिन भी सुदिन में परिवर्तित होते जायेंगे।
अब्र रोता रहे, चाँद हँसता रहे।
अब्र कहते हैं बादल को! यह बादल है अविद्या का। जब तक अविद्या का अंधकार है, चिदाकाश में बादल छाया है, संस्कारों का आवर्त शेष है, जीव रोता ही रहेगा। संसार ‘दु:खालयं अशाश्वतम्’ है। यहाँ रुदन है, आँसू हैं, कहीं तृप्ति नहीं है। ‘राजा दुखिया परजा दुखिया, साधू के दु:ख दूना।’ लोग गुरु महाराज से पूछते थे– ‘‘सरकार! आपको क्या दु:ख है?’’ गुरु महाराज कहते थे– ‘‘लोग यहाँ आकर अपना दु:ख बताने लगते हैं तो उनके दु:ख से हम भी दु:खी हो जाया करते हैं।’’ यही है–
राजा दुखिया परजा दुखिया, साधु के दु:ख दूना।
आशा तृष्णा सब घट व्यापी, कोई महल ना सूना।।
आशा और तृष्णा सबके हृदय में व्याप्त हैं, कोई भी इनसे बचा नहीं। अविद्या का यही परदा, यही बादल जीव को रुला रहा है। दमिश्क शहर कभी यहूदियों की राजधानी थी। वहाँ के बादशाह ने स्वप्न देखा– मौत का पंजा उसके पीठ पर पड़ा। उसने कहा– ‘‘तुम बड़े वेग से मेरे पास आओ, ठीक समय पर, ठीक जगह पर।’’ बादशाह ने आँख घुमाकर मौत को देख लिया। वह काँप गया, सिहर उठा, निद्रा में ही बड़े जोर की चीख निकल गयी। तुरन्त खतरे का सायरन बज उठा, फौज तैयार हो गयी। सेनापतियों ने पूछा– ‘‘जहाँपनाह! किधर से खतरा?’’ बादशाह ने अपने स्वप्न को बताया– मौत का पंजा! सबकी गर्दन लटक गयी। कोई बाहरी शत्रु होता तो उस पर हमला करते। यहाँ लड़ें किससे?
सोच-विचारकर सेनापतियों ने कहा– ‘‘जहाँपनाह! इस महल में जरूर कुछ न कुछ है। आप ऐसा करें कि किसी वेगशाली घोड़े से इस महल से जितना हो सके, दूर निकल जाइये।’’ घोड़े का चयन भी सेनापतियों ने ही किया। उस पर चढ़कर बादशाह रात्रि के दो बजे ही महल से निकल पड़ा, भागता रहा। दोपहर की चिलचिलाती धूप में भी वह रेगिस्तान पार करता रहा। शाम होते-होते वह वृक्षों के एक हल्के-से झुरमुट में पहुँचा। अब न घोड़े में ही दस कदम चलने की ताकत रह गयी थी और न सवार में ही उसे हाँकने की ताकत शेष थी। वह घोड़े से उतरकर एक वृक्ष के तने का सहारा ले निढाल होकर बैठ गया। उसने सोचा– वाह! अब तो हम बहुत दूर आ गये। इतने में मौत का पंजा पीठ पर पड़ा। मौत ने कहा– ‘‘ठीक! तुम बड़े वेग से आये, ठीक समय पर आये और ठीक जगह पर आये।’’ बादशाह के प्राण पखेरू उड़ गये।
इसी प्रकार रावण! ‘भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।’ (मानस, १/१८२-क) लेकिन एक औरत की कमी लेकर बेचारा मर गया। कोई अरबपति है तो दु:ख भी उसी स्तर का; गरीब के पास गरीब स्तर का दु:ख। कबीर कहते हैं– ‘यह संसार बहुत दुख खानी। तब बचिहौ जब रामहिं जानी।।’ धरती से आकाश तक कब्जा कर लो तब भी रुदन ही हाथ लगेगा। ‘अब्र रोता रहे’– सब जगह रुदन है; किन्तु ‘चाँद हँसता रहे’ जहाँ प्रभु का क्षीण भी प्रकाश है, भजन जागृत है, इष्टदेव रथी हैं, वहाँ भक्त सदैव आह्लादित रहता है–
जे जन भींगे राम रस, विकसित कबहुँ न रूख।
अनुभव भाव न दरसिये, तेहि नर सुख न दु:ख।।
जो कोई भी जन, जो सेवक राम के रस में सराबोर हो गया, वह सदैव विकसित रहता है। ‘कबहुँ न रूख’– उसके जीवन में उदासी आती ही नहीं। किन्तु हमारे भावों के साथ-साथ अनुभव न दिखाई पड़े, भगवान हृदय से योगक्षेम न प्रदान करें कि अब यह गलत है, यह सही है, इधर पाँव मत रखो, यह संकल्प गलत है, अब यह बन्द करो; जब तक वह ऐसा न पढ़ायें तब तक उस सेवक के लिए न सुख है न दु:ख है। वह साधारण जीवमात्र का भोग भोग रहा है।
‘अब्र रोता रहे’– चिदाकाश की बदली भले ही रुलाती रहे, ‘चाँद हँसता रहे’– क्षीण प्रकाश ही सही, यदि साधना जागृत है और ‘हम न बदले’– टेक के साथ लगे ही रह गये, तो ‘जमाना बदलता रहे’– परिस्थितियाँ अनुकूल होते देर नहीं लगती। मीरा को जहर दिया गया, शूली पर लिटाया गया, सर्प से कटवाया गया, देशनिकाला दिया गया। प्रह्लाद के साथ क्या नहीं हुआ? दहकते हुए स्तम्भ से उसे चिपकाया गया; किन्तु वह अपनी टेक से विचलित नहीं हुआ। माया परीक्षा ले सकती है, मिटा नहीं सकती। साधक की केवल श्रद्धा स्थिर रहनी चाहिए और साधना-अभ्यास में कमी नहीं आनी चाहिए। यदि हम अपनी साधना से, समर्पण से विचलित नहीं हुए तो दुर्दिन सुदिन में बदल जायेगा,
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई।। (मानस, ५/४/२)
विष अमृत में परिवर्तित हो जायेगा, अथाह भवसागर गोपद जितना रह जायेगा,
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।
राम कृपा करि चितवा जाहीं।। (मानस, ५/४/३)
गरुड़जी! सुमेरु पहाड़ सिर पर आनेवाला होगा तो आयेगा अवश्य! किसी ने उसे आपके ऊपर फेंका नहीं है। वह किसी युग-जमाने की आप ही की कमाई है। वह संस्कारों की रील में था इसलिए आ रहा है। वह आयेगा जरूर! यदि वह न आये तो आप पता ही कैसे पाओगे कि ऐसी विपत्ति भी आनेवाली थी, लेकिन विपत्ति का सुमेरु भी रजकण होकर, भारहीन होकर निकल जायेगा। आपकी समय-सारिणी ही बदल जायेगी।
भगवान दर्शन देते हैं। चिन्तन का स्तर उन्नत होने पर भगवान सामने प्रकट होते हैं। गुरु महाराज से लोग पूछते थे– ‘‘महाराज! क्या भगवान मिलते हैं?’’ वह बताते थे– ‘‘हाँ हो! अधिकारी होई तो अवश्य मिलेंगे। अधिकारी को न मिले तो वह प्राण दे देगा। मिलेंगे क्यों नहीं! हमें मिलकर ही सान्त्वना दिया है, स्थिति दिया है भगवान ने। वह अवश्य मिलेंगे; केवल विरह वैराग्य चाहिए, टेक चाहिए।’’
सामने मेरे आयें तो इस तरह
उनका परदा रहे मेरा दीदार हो।
प्रभु यदि मेरे सामने आयें तो इस खूबी से आयें, इस ढंग से आयें कि उनका परदा भी बना रहे किन्तु मुझे उनका दीदार होता रहे। उस परदे से जो स्वरूप निखरकर आये, वह हमारा हो। क्या है उनका परदा?
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन:।। (गीता, २/२४)
भगवान अच्छेद्य हैं, उन्हें शस्त्र नहीं काट सकते। वह अदाह्य हैं, अग्नि उन्हें जला नहीं सकती। वह अक्लेद्य हैं, जल उन्हें गीला नहीं कर सकता। अशोष्य हैं, वायु सुखा नहीं सकती। आकाश उन्हें अपने में समाहित नहीं कर सकता। वह शाश्वत हैं, सनातन हैं, कण-कण में व्याप्त हैं। इन विभूतियों का तो परदा रहे और उस परदे में से जो स्वरूप निखरकर आये, वह हमारा हो अर्थात् भगवान की भगवत्ता हममें प्रवाहित होती जाय। अन्त में होता भी ऐसा ही है कि ‘जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।’ (मानस, २/१२६/३) किन्तु साधक में धैर्य होना चाहिए, स्थिरता होनी चाहिए।
पास चिलमन के बैठे रहें इस तरह
हुस्न छन छन के हममें समाता रहे।
झीने परदे को चिलमन कहते हैं, चिक कहते हैं। साधक का कर्त्तव्य होता है कि वह चिलमन के पास, प्रभु के परदे के पास इस सचेतावस्था में बैठे कि ‘हुस्न छन छन के हममें समाता रहे’– प्रभु की प्रभुता छन-छन हममें संचारित होती जाय, हम उससे आप्लावित होते जायँ। ‘सर झुके औ जमाना बदलता रहे’– अभी राजस्थान से एक भाविक का फोन आया। हमने पूछ लिया– ‘‘खेती-बाड़ी कैसी है?’’ वह बोले– ‘‘जमाना अच्छा है, इस साल बहुत फसल है तो जमाना अच्छा है।’’ जमाना माने समय! बन्दगी में इतना भाव हो कि आपकी परिस्थितियों में सुधार होता जाय। प्राय: लोग भजन करते हैं किन्तु सुननेवाला कोई नहीं, तब तो उत्साह भंग हो जायेगा। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि भगवान से मनौती करते फिरे। भगवत्पथ में माँगना नहीं चाहिए। जीव में क्षमता ही नहीं कि वह सत्य या कल्याण को माँग सके। वह जब माँगेगा, अपने लिए फन्दा माँग लेगा। नारद देवर्षि पद पर थे। एक बार उन्होंने भी माँगा तो अपने लिए बेड़ियाँ माँग लिया। वह तो भगवान ही रक्षक थे, उन्होंने नारद को बचा लिया। इसीलिए अगली पंक्ति में है–
‘आरजू–ए–सुकूँ इश्क की मौत है’
आरजू अर्थात् मिन्नत, निवेदन कि प्रभो! हमें यह सुख मिल जाय, वह हो जाय, वह ठीक हो जाय, सुकून मिल जाय– सुख के लिए निवेदन– यह तो इश्क की हत्या है। इश्क अर्थात् प्रेम, श्रद्धा। यह तो प्रेम की मौत है। एक भक्त ने कहा–
मैं अगर माँगू तुझे कुछ न देना तुम मुझे,
वरना मैं आशिक नहीं, मजदूर ही रह जाऊँगा।
प्रभो! प्रभो मैं कदाचित् भूल कर बैठूँ, आपसे कुछ माँग ही लूँ किन्तु आप देने की भूल मत करना। हमें आप कुछ देना ही नहीं अन्यथा मैं आपका आशिक नहीं, मजदूर हो जाऊँगा। दिनभर किसी ने श्रम किया और शाम को कुछ माँग लिया, यह तो–
जप तप करके स्वर्ग कमाना, यह तो काम मजूरों का।
देना सब कुछ लेना कुछ नहीं, बाना झाँकर झूरों का।।
जप किया, तप किया और कहा– प्रभो! स्वर्ग दे दो। यह तो मजदूरों का कार्य है, बड़े निचले स्तर की बात है। यहाँ तो मन-वचन-कर्म से सर्वस्व समर्पण कर दो और बदले में कुछ भी मत माँगो। और बाना कैसा हो? भगवान चाहे टाट में रखे या ठाठ में; यही है ‘बाना झाँकर झूरों का’। कभी मुट्ठी भर चना, कभी घी घना तो कभी चनउ मना। जिस भी ढंग से भगवान रखें, वही वेष अच्छा होता है। वही देश अच्छा होता है जिसमें वैराग्य की भली प्रकार रक्षा हो सके अन्यथा वहाँ से तुरन्त हट जाना चाहिए। इसलिए यह सुख मिले, वह सुख मिले– कुछ माँग ही लिया तो प्रेम की हत्या हो गयी। प्रेमी माँगता कुछ नहीं। वह मन-वचन-कर्म से समर्पण कर बदले में प्रेमास्पद को प्रसन्न देखना चाहता है। वह कुछ माँगता नहीं बल्कि सर्वस्व सौंप देता है।
इश्क पारा है पारा मचलता रहे।
पारा अत्यन्त चंचल होता है, पकड़ में नहीं आता। उसे जमीन पर गिराएँ, मिट्टी में लिप्त नहीं होता। पानी में उसे डालें, वह अलग ही रहेगा। वह सदैव हिलता रहता है, मचलता रहता है। प्रेम भी पारे की तरह है। मन के अंतराल में प्रेम का पारा सँजोया गया है किन्तु थोड़ी सी ठेस लगने पर वह इधर से उधर घूम जाता है। बच्चे के पेट में दर्द हुआ तो कहेंगे– प्रभो! अब तो यही ठीक कर दो। प्रेम इतना नाजुक होता है। वह मचलता रहता है। अब हम अपनी वृत्ति में प्रेम को कैसे बनाये रखें? इस पर कहते हैं–
उनके कदमों पे ये सिर झुका ही रहे,
हुक्म उनका दिलो जाँ पै चलता रहे।
उन प्रभु के चरण-कमलों में ‘यह सर झुका ही रहे’, कभी उठे ही न। श्रद्धा बहकने न पाये। ऐसा नहीं कि– भगवन्! यह ठीक नहीं, यह ठीक। तब तो आपका सिर उठ गया। समर्पण भाव सदैव बना ही रहे और ‘हुक्म उनका’– भगवान आदेश देते हैं। उनका हुक्म अन्त:करण पर और उसकी भी गहराई पर निरन्तर चलते रहना चाहिए।
हुक्मे अन्दर सब कोइ हुक्मे बाहर न कोय।
नानक हुक्मे जे बुझे हउ मैं कहै न कोय।।
हुकुम के अन्दर सबको रहना है। हुकुम के बाहर जानेवाला कहीं कभी कुछ पाता ही नहीं। ‘हुक्मे बाहर न कोय’ कुछ है ही नहीं। नानक कहते हैं– जो आदेश को पहचान ले तो ‘हउ मैं कहे न कोय’– मैं भी कुछ हूँ, कोई नहीं कहेगा। वह जानता है कि कर्त्ता-धर्त्ता तो प्रभु स्वयं हैं।
गुरु महाराज कहा करते थे– उस जगह भगवान ने हमें पतित होने से बचा लिया। वहाँ भगवान ने हमको यह कहा, भगवान ने वह कहा। पाँच-सात दिन ऐसा सुनने के पश्चात् हमने पूछा– ‘‘महाराज! क्या भगवान बातें करते हैं?’’ वह बोले– ‘‘हाँ हो! भगवान ऐसे ही बतियावत हैं जैसे हम-तुम बैठ के बतियाईं। घण्टों बतियाईं और क्रम न टूटे। किन्तु इसके लिए विरह-वैराग्य चाहिए, अनुराग चाहिए, लौ चाहिए। हर समय नाम-रूप-लीला-धाम में कहीं न कहीं सुरत लगी ही रहे। मन को छुट्टी मत दो। भजन से छुट्टी दोगे तो यह मन माया में ही तो जायेगा। मन एक ऐसा यंत्र है कि कभी छुट्टी लेता ही नहीं। जहाँ इसने भजन छोड़ा तो स्वत: माया में कार्य करने लगेगा। ज्यों-ज्यों लौ (लगन) में डूबोगे, त्यों-त्यों भगवान तुमसे बातें करेंगे। वह तुम्हें उठायेंगे-बैठायेंगे, भजन करायेंगे, भजन सिखायेंगे और बेटा! तुम्हें वे निर्विघ्न ले चलेंगे। फिर तो ‘काल न खाय कलप नहिं व्यापे देह जरा नहीं छीजे।’’
इतना सुनकर हम उदास हो गये। भजन तो जैसे-तैसे हम कर लेंगे लेकिन बात करने के लिए भगवान को कहाँ पाये? पन्द्रह मिनट के बाद गुरु महाराज बोले– ‘‘काहे घबड़ात है, तोहूँ से बतियैहैं!’’ आश्वासन तो मिल गया किन्तु भूखा तो तभी सन्तुष्ट होता है जब कुछ पेट में जाय।
तीन महीने बीत गये। इसके बाद भगवान का प्रेरणास्रोत जब आरम्भ हुआ, हमने सोचा हमें कोई रोग हो गया। तुरन्त जाकर हमने गुरु महाराज से कहा– ‘‘गुरु महाराज! एँड़ी से चोटी तक आधा-आधा इञ्च पर पूरा अंग फड़कता है, कभी दाहिना कभी बायाँ। यह क्या है? हमें कोई बीमारी तो नहीं हो गयी? कुछ दृश्य भी आने लगे हैं।’’ गुरु महाराज बहुत खुश हुए। वह बोले– ‘‘बेटा! आज से भगवान ने तुमसे बात करना शुरू कर दिया है। राम-रावण युद्ध अब शुरू हो गया। अब रावण मारा जायेगा, रामजी का राज्याभिषेक होगा तभी छुटकारा मिलेगा। बीच में कहीं विराम नहीं है। तू टेक के साथ लग भर!’’ धीरे-धीरे भजन की जागृति आ गयी।
गुरु महाराज ने आगे बताया– जब भगवान रथी हो जाते हैं, वे सर्वत्र से बोल सकते हैं – शून्य से, पेड़ से, उड़ते हुए पक्षियों से, चलते हुए व्यक्तियों से, पृथ्वी के अन्दर से – कहीं से भी बोल सकते हैं। क्योंकि वह सर्वत्र हैं। गुरु महाराज ने भगवान के बताने के कई तरीके बताये। वह सब उनकी आज्ञा है। उनकी आज्ञा का उल्लंघन किया ही नहीं जा सकता। सच पूछो तो आज्ञापालन ही भजन है, लेकिन साधकों से कभी-कभी आज्ञा का उल्लंघन हो ही जाता है अथवा भगवान ही और ठुकाई-पिटाई करके खरा उतारने के लिए करवा लेते हैं।
एक समय की घटना है। दिगम्बर वेष में निराधार विचरण के समय गुरु महाराज अयोध्या के समीप जंगल के एक छोटे से गाँव मधवापुर में एक पेड़ के नीचे बैठे थे; क्योंकि भगवान ने वहीं चतुर्मास व्यतीत करने का संकेत दिया था। गुरु महाराज वहाँ सात दिन तक बैठे रह गये। जिन्होंने देखा, सोचा पागल है। स्कूल जानेवाले छोटे-छोटे बच्चों ने भी आपको देख लिया। वे विद्यालय जाते समय गुरु महाराज के ऊपर पत्थर फेंकते, लौटकर आते समय भी वे पत्थर फेंका करते। यह स्वागत सातों दिन चलता रहा। क्रमश: लड़के प्रगल्भ हो चले। एक लड़के ने गुरु महाराज के समीप आकर पत्थर मारा जो उनकी पीठ में लगा। महाराज ने सोचा– अब तो ढीठ होते जा रहे हैं। वह उठकर बड़ी जोर से बिगड़े– धत् तेरी लड़कन-फड़कन की! लड़के दो-दो, तीन-तीन आपस में उलझकर पगडण्डियों पर गिरते-पड़ते, रोते-चीखते घर पहुँचे– पगला मारा, पगला मारा।
पचीसों आदमी लाठी लेकर दौड़ पड़े। वे आपस में बोले– पहले लड़कों को गिन लो, कोई मर तो नहीं गया। वे आपस में ही योजना बनाते यह कहते हुए दौड़े– देखो, भागने न पाये, घेर लो। घेरा छोटा करते-करते वे महाराज के समीप तक आ गये। उन्होंने सोचा था कि यदि इसने कोई काण्ड किया होगा तो शोर सुनकर भागने लगेगा। किन्तु महाराजजी शान्त भाव से बैठे ही रहे। वे लाठी महाराजजी के शिर तक ले आते और कहते– बोल, तू पागल है या साधु?
महाराजजी की निर्भीकता और शान्ति देख लोगों ने अनुमान लगाया कि कहीं यह सन्त न हों। पदारथ काका साधुसेवी हैं, उन्हें बुलाओ। वह पहचान करेंगे। उन ठाकुर साहब को बुलाया गया। आते ही उन्होंने साष्टांग दण्डवत् कर कहा–
एक बार हरि घोड़ा भये, ब्रह्मा भये लगाम।
चाँद सुरुज रबिका भये, चढ़ि गये चतुर सुजान।।
गुरु महाराज ने आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया। उन्होंने कहा– ‘‘भगवन्! इस दोहे का अर्थ बताने की कृपा करें।’’ महाराज ने कहा– ‘‘देखिये, जो सर्वस्व को हर लेते हैं उन्हें हरि कहते हैं। भगवान शुभाशुभ हर लेते हैं और बदले में अपना स्वरूप प्रदान कर देते हैं इसलिए उनका एक नाम हरि है। हरि स्वयं घोड़ा बनकर मन के अन्तराल में प्रवाहित हो जायँ। बुद्धि ही ब्रह्मा है, बुद्धि लगाम है। चाँद और सूर्य · इड़ा और पिङ्गला– यह श्वास का नाम है। ये रकाब हैं जिन पर पैर रखकर घोड़े पर चढ़ा जाता है। इस श्वास-प्रश्वास का यजन करते हुए ‘चढ़ि गये चतुर सुजान’– जो चतुर हैं, वास्तविकता के ज्ञाता हैं, वे इस पर चढ़ जाते हैं। जो श्वास का भजन नहीं जानता, महापुरुष लोग ऐसे महात्मा को अपनी कुटिया में दो रोटी भी नहीं देते।’’ महाराज ने उन्हें भजन की विधि थोड़ा समझा दिया।
अब वह वयोवृद्ध ठाकुर साहब गाँववालों पर बहुत बिगड़े– ‘‘सात दिनों से एक महापुरुष यहाँ भूखे-प्यासे बैठे हैं, तुमलोगों ने कोई ध्यान नहीं दिया। तुमलोगों के गाँव का नाश हो जायेगा। जल्दी करो, दूध लाओ।’’ अब कोई दूध तो कोई दही ले आया। लोगों ने अनुरोध कर महाराजजी के लिए कुटिया बना दी। पूरा गाँव महाराजजी की सेवा में लग गया।
उन सेवकों में से एक मिश्राजी थे। वह जंगल विभाग में फारेस्टर थे। वह हर दूसरे-तीसरे दिन अपनी बैलगाड़ी में लकड़ी भरकर महाराजजी की कुटिया पर गिराकर कहते– ‘‘महाराजजी! सर्दियों में धूना मैं तपाऊँगा।’’ गुरु महाराज चतुर्मास के पश्चात् सर्दियों में भी वहीं रुके रह गये। धूने के लकड़ी की व्यवस्था मिश्राजी करते और महाराजजी के यहाँ गाँवभर ने धूना तापा।
गर्मी आयी भी न थी कि गाँव में हैजा फैल गया। दो लाश इस गाँव से, दो लाश उस गाँव से; लोग मरने लगे। एक ने महाराजजी से कहा– ‘‘महाराजजी! मिश्राजी तो मर गये।’’ महाराजजी चौंके– ‘‘मर गये?’’ पुन: व्यथित हो वह भगवान को उलाहना देने लगे– ‘‘का हो भगवान! जे के मरि जाये का रहा ओके हाथ से हमार सेवा काहे करवायो? अरे ओके हाथ से सेवा करवावै के चाहत रहा जौन जिन्दा रहत! फिर साधू की सेवा करै से का फायदा?’’ उन्होंने सेवकों की ओर मुड़कर कहा– ‘‘क्यों रे! मिश्राजी सचहूँ के मरि गये। पता तो लगा!’’ लड़के दौड़कर गये, उनका समाचार आकर बताया कि उन्हें मरणासन्न जानकर चारपाई से नीचे उतारकर जमीन पर लिटा दिया गया है। उनके हाथों से एक बछिया का दान भी करा दिया गया है। उनकी श्वास कभी रुक जाती है, कभी लौट आती है। महाराज ने कहा– ‘‘अच्छा! इस धूनी से विभूति उठाओ और ले जाकर उनके घरवालों को दे दो। यदि मिश्राजी जीवित रहते विभूति पा जायँगे तो नहीं मरेंगे।’’
ठाकुरों के दो लड़के विभूति लेकर दौड़ते हुए मिश्राजी के गाँव गये। किन्तु मिश्राजी के घर में जाने की उन्हें हिम्मत नहीं पड़ रही थी। हैजा के कीटाणु वायु में उड़ते रहते हैं; जिसको छू जायँ उसे भी हैजा हो सकता था। इसलिए वे लोग दूर से ही आवाज लगाने लगे। रात के आठ बज रहे थे। घर में रोना-पीटना लगा था। आवाज सुनकर मिश्राजी के लड़कों ने रोना बन्द कराया, इन बच्चों के पास आये। बच्चों ने विभूति देकर कहा कि महाराजजी ने भेजा है। यह विभूति उन्हें खिलाकर लौटकर हमें बताओ कि जीवित रहते वे विभूति पा गये या नहीं? महाराज ने कहा है कि ‘जियत विभूति पा जाइ तो मरी ना!’
लड़के ने विभूति खिला दिया, मिश्राजी के शरीर में लगा भी दिया और लौटकर उन बच्चों को बताया– ‘‘भाई! आशा तो नहीं है लेकिन खुशी की बात है कि महाराज की विभूति मुँह में चली गयी।’’ दोनों लड़कों ने लौटकर महाराजजी को बताया कि वे जीते जी विभूति पा गये। महाराजजी धूना चेताकर बैठ गये। उन लड़कों से कहा– ‘‘भागो, अब घर जाओ।’’ दो-चार अन्य ग्रामीण भी महाराजजी के पास बैठे थे, उनसे भी उन्होंने कहा– ‘‘अब आपलोग भी जाओ।’’ उन सबने महाराजजी को प्रणाम किया और आश्रम से निकल आये।
रास्ते में उनलोगों ने विचार किया– रोज तो हमलोग महाराजजी के पास नौ बजे तक बैठते थे, आज इन्होंने हम सबको पहले ही भगा दिया। महाराज ने चैलेन्ज भी बहुत बड़ा दिया है कि जीवित रहते विभूति पा जायेंगे तो मिश्राजी मरेंगे नहीं। वैसे मिश्राजी बचेंगे तो नहीं। विभूति ही तो दिया है। यह कोई दवा तो है नहीं, राख ही तो है। लगता है आज महाराज भाग जायेंगे इसीलिए सबको हटा दिया है। अब मिश्राजी मरें चाहे जियें; यार! महात्मा अच्छे हैं, हमलोग इन्हें जाने नहीं देंगे। ऐसा करते हैं कि हममें से दो-दो लोग बारी-बारी से रातभर पहरा दें। जब महाराज भागने लगेंगे तो इनके पैरों पर गिरकर इन्हें मनायेंगे, रोकेंगे, जाने नहीं देंगे। दो-दो आदमियों की ड्यूटी लग गयी। दो लोग रुक कर, शेष खा-पीकर आने को कहकर चले गये।
उन सबके चले जाने के पश्चात् महाराजजी पुन: धूना ठीक करके, लेटकर श्वास में लग गये। पहरा देनेवाले धीरे-धीरे झोपड़ी के पास तक यह देखने आते कि महाराज निकल तो नहीं गये! उनके समीप आते ही महाराजजी की श्वास भारी होने लगती। महाराजजी उठकर बैठ जाते, धूना ठीक करने लगते, आश्वस्त होकर पहरेवाले दूर चले जाते तो श्वास पुन: ठीक हो जाती। महाराज पुन: लेट जाते। दूसरे पहरेदार समीप आते तो महाराजजी की श्वास पुन: भारी होने लगती। महाराजजी पुन: उठकर बैठ जाते और कहते– क्या बवाल है यहाँ पर? कोई जंगली जानवर तो नहीं है? प्रपंच-प्रपंच क्यों आ रहा है श्वास में? महाराजजी पुन: धूना खोदते, खाँसते। वे लोग दुबककर झाड़ी की ओट में हो जाते, अन्य लोगों को बताते कि अभी हैं। रातभर में तीन टुकड़ी पहरेदारों की आई। हर बार लोगों ने महाराजजी को खाँसते, धूना ठीक करते देखा।
धीरे-धीरे प्रात: के चार बज गये। गाँव से सेवा करनेवाले अन्य लोग आने लगे। कोई महाराजजी के पात्र में जल भरकर रख रहा है तो कोई झाड़ू-बुहारू कर रहा है, कोई गाँजे की चिलम सजा रहा है। धीरे-धीरे पूरा गाँव ही महाराजजी के सामने आकर दण्ड-प्रणाम कर बैठ गया। भीड़ में कोई किसी से बोल नहीं रहा था। थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ लोग सड़क की ओर जाकर देख लेते कि मिश्राजी के गाँव से कोई आता तो उससे पूछते कि वह मरे या नहीं!
इतने में एक आदमी बोल पड़ा– ‘‘अरे महाराज! मिश्राजी तो वह चले आ रहे हैं बैलगाड़ी में बैठकर। उनका लड़का बैलों को हाँक रहा है।’’ इतना सुनते ही सारी भीड़ एक झटके में सड़क पर आ गयी। मिश्राजी आये। उनके साथ ही सब के सब पुन: महाराजजी के समक्ष यथास्थान बैठ गये। मिश्राजी महाराजजी को प्रणाम कर बोले– ‘‘महाराज! आप कब आ गये? रातभर आप हमारे पास बैठकर सिर से पाँव तक हाथ फेरकर कहते रहे- ‘तू घबड़ा न! मैं आ गया हूँ। तू मरिहै न।’ मैं टुकुर-टुकुर आपको देख रहा था और आप बैठकर मेरे ऊपर हाथ फेर रहे थे, सान्त्वना दे रहे थे। लगभग पाँच बजे थोड़ी देर के लिए हमारी आँख लग गयी। इतने में आँख खुली तो आप नहीं थे। आप कब चले आये?’’
पहरा देनेवालों ठाकुरों ने कहा– ‘‘अरे! महाराज तो रातभर यहीं धूना खोद रहे थे। हमलोगों ने पहरा दिया है, देखा है, यह तो यहीं थे।’’ सारा प्रकरण सुनकर महाराज बोले– ‘‘धत् तेरी धूर्तों की! रातभर हमारा भजन चौपट कर दिया। जब तुमलोग इतना अविश्वासी हो तो अब हमें यहाँ पर नहीं रहेंगे।’’ धूने से लकड़ी निकाल बाहर रख महाराजजी उठे और चल पड़े। गाँववालों ने बहुत प्रार्थना किया, क्षमा माँगा, पैरों पर गिर पड़े। येनकेन प्रकारेण वे लोग महाराजजी को रोकने में सफल हो गये।
मधवापुर में दो-चार मरती-जीती विस्मयकारी घटनायें और भी घटित हुईं। महाराजजी ने सोचा– आरम्भ में जब हम गाँव के पास रहकर भजन कर रहे थे, लोग कहा करते थे– यह भजन नहीं कर रहे हैं। इन्हें टी.बी. हो गयी है, घड़ी टल रही है, जब न मर जायँ। अब तो सधुआई में चार चाँद लग गया है, काफी दम आ गया है। चलें, एक बार गाँववाली उस कुटिया में भी चलें। लोग देख तो लें कि हम सचमुच के साधु हैं, रोगी नहीं हैं।
मन में ऐसा संकल्प उठते ही भगवान ने मना किया कि जाना मत! एक महीने तक मन लगातार गाँव जाने के लिए तुड़ाता रहा, भगवान बराबर मना करते रहे। इन्हीं दिनों एक भक्त घोड़े के बालों का चँवर बनाकर महाराजजी को दे गया। महाराजजी ने सोचा– यह चँवर गुरु महाराजजी को दे आयें। यह ठीक रहेगा। गुरु महाराज का एक पैर टूट गया है, उसमें घाव है। इस चँवर से महाराजजी घाव पर बैठनेवाली मक्खी उड़ाया करेंगे और गाँववाले भी देख लेंगे कि हम रोगी नहीं बल्कि सचहूँ के साधु हैं। इन विचारों पर भी महाराजजी को अपशगुन होता रहा, भगवान मना करते रहे फिर भी महाराज रामकोला जानेवाली ट्रेन में बैठ गये।
रेलगाड़ी रामकोला स्टेशन पर पहुँच गयी। भगवान ने आदेश दिया, आकाशवाणी हुई– ‘ठीक है, आ तो गये हो लेकिन प्लेटफार्म पर पाँव मत रखना, नहीं तो तुम्हारे सभी करम हो जायेंगे।’ महाराजजी दरवाजे का सिकचा पकड़कर गाड़ी से बाहर सिर निकालकर देखने लगे कि गाँववाला कोई तो हमें देख ले कि यह साधु हैं और ठीक-ठाक हैं, स्वस्थ हैं। लेकिन भगवान की ऐसी व्यवस्था कि अपने ही गाँव का स्टेशन, पूरे गाँव से महाराजजी परिचित थे, किन्तु उस दिन गाँव का एक भी व्यक्ति स्टेशन पर नहीं था। लगभग बीस मिनट तक रेलगाड़ी रुकी रही, रुकने के निर्धारित समय से बहुत देर तक रुकी रही, किन्तु महाराजजी का परिचित एक भी व्यक्ति दिखाई न पड़ा।
अंतत: ट्रेन चल पड़ी। महाराजजी ने सोचा– आगे तो कहीं जाना नहीं है। चलो, यहीं उतर जाते हैं, शायद कोई मिल जाय तो हमें देख तो लेगा, कुटिया पर नहीं जायेंगे। ट्रेन ने गति पकड़ ली थी फिर भी महाराज उतर पड़े। कुछ चोट भी लगी, ट्रेन निकल गयी। तभी महाराजजी के शरीर से उन्हीं की आकृति का एक पुतला निकला और बोला– ‘‘जाओ, घर जाओ! तुम साधु नहीं हो सकते।’’ तब तक एक दूसरा पुतला निकला। इसी प्रकार तीसरा पुतला निकलकर बोला– ‘‘जाओ, देखो वह घर दिखाई दे रहा है।’’ महाराज एकदम काँप गये। वह कूदकर रेलवे पटरी के दूसरी ओर हो गये; क्योंकि जिस ओर खड़े थे, वह उनके गाँव की भूमि थी, दूसरी ओर दूसरा गाँव था। महाराज ने सोचा कि हो सकता है भगवान इतने से ही मान जायँ, लेकिन अपशकुन होता ही रहा। महाराज जिधर मुँह था, उधर ही बढ़ने लगे, भगवान से प्रार्थना करने लगे– ‘‘भगवन्! अब भी हमको किसी ने नहीं देखा है। अब मैं गाँव की ओर मुँह भी नहीं करूँगा और यहाँ जीवनपर्यन्त नहीं आऊँगा।’’ महाराज आगे बढ़ने को हुए तो पुन: डाट पड़ी कि अब भागने से कुछ नहीं होगा। महाराज जब श्वास पकड़ने का प्रयास करने लगे तो भगवान बोले– ऊहूँ भजन मत करो। तुम साधु हो ही नहीं सकते। दिन के चार बजे से रात के ग्यारह बजे तक महाराज वहीं खेत में खड़े रह गये, कोई पास में नहीं आया। आँसू बह रहे थे। जब आगे बढ़ने की सोचते, मना होने लगता, भगवान कहते– ‘‘ना! तुम घर जाओ।’’
महाराजजी ने देखा कि भगवान आगे बढ़ने नहीं दे रहे हैं तो धीरे-धीरे चलकर अपनी कुटिया में आकर बैठ गये। पहले जब महाराज कुटिया में भजन करते थे, एक काला कुइरा (काना) कुत्ता वहाँ रहने लगा था। महाराजजी के जाने के पश्चात् भी वह अपनी ड्यूटी पर वहाँ बैठा था। वह दौड़कर महाराजजी के चरणों में लोटने लगा और गाँव की ओर भागा। वह पाँच बार महाराजजी के पास आया और पाँच बार गाँव में उनलोगों के पास गया जो महाराजजी के पास आते थे। वह उनकी चारपायी पर कूद जाता, उनकी रजाई खींचता। लोगों ने सोचा– आज कुइरा बड़ा प्रसन्न है। कहीं सन्तजी तो नहीं आ गये? कुतूहलवश लोग कुटिया पर आये तो सन्तजी को आँसू बहाते पाया। रोते-रोते महाराजजी की दुर्दशा हो गयी। महाराज डेढ़ साल तक कुटिया में बैठे रहे, भगवान से विनय करते रहे– ‘‘प्रभो! घर तो नहीं जाऊँगा। हमसे बड़ा अपराध हुआ जो आपकी आज्ञा का उल्लंघन किया। घर तो नहीं जाऊँगा चाहे प्राण निकल जायँ।’’
डेढ़ वर्ष पश्चात् भगवान ने सुनवाई की। भगवान ने पूछा– ‘‘अब तो कभी नहीं आओगे?’’ महाराज बोले– ‘‘कभी नहीं।’’ अनुभव में ही भगवान ने कहा– ‘‘थूको और चाटो।’’ भगवान ने जमीन पर थुकवाया और उन्हीं से चटवाया। अनुभव में आदेश मिला– ‘‘इसी वक्त निकल जाओ।’’ उस समय रात के दो बजे थे। महाराज सचेतावस्था में आये, तुरन्त उठे और चल दिये। उतनी रात्रि में भी गाँव के एक व्यक्ति ने महाराज को जाते देख पूछा– ‘‘सन्तजी, कहाँ?’’ महाराजजी बोले– ‘‘अब जा रहे हैं।’’ वह बोला– ‘‘भल! तोके यही शोभा है। अरे, जब साधू हो गये तब क्या रोनी सूरत लेकर गाँव में पड़े हो। कहीं बहि-बिलाय जात्यौ।’’ महाराजजी निकल गये।
हमलोगों को वह सचेत करते थे– ‘‘हो! भगवान कहें कि यहाँ पाँव रखो तो दो इञ्च भी दायें-बायें मत रखो। सीताजी ने सीमा-रेखा का उल्लंघन किया तो लंका में भोगना पड़ा– ‘रेख लाँघि सिय बाहर आई। विधिवश करम काल कठिनाई।।’ (विश्रामसागर) प्रभु जो सीमा निश्चित कर दें, उस रेखा का उल्लंघन किया ही नहीं जा सकता।’’ यही है ‘हुक्म उनका दिलों जाँ पै चलता रहे।’
भगवान ऐसे ही बातें करते हैं जैसे हम-आप बैठकर घण्टों बातें करते हैं। यह सबके लिए सुलभ है। यह कोरी कहावत नहीं है, लेकिन यह जागृति किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के द्वारा होती है। ऐसे महापुरुष की टूटी-फूटी सेवा करने से उनके निर्देशन में टूटी-फूटी साधना पार लगने से वह जागृति आ जाती है। इसके पश्चात् साधक जितना डूबकर लगेगा, भगवान उतना ही उसके साथ रहेंगे। जब तक यह जागृति नहीं है तब तक सही मात्रा में पूर्ण निवृत्ति दिला देनेवाला भजन अभी आरम्भ ही नहीं हुआ। इसके पहले हम भजन के नाम पर जो भी श्रम करते हैं, भजन की प्रवेशिका के लिए प्रयत्न मात्र है। भजन जागृत हो जाने पर,
बन्दगी हो तो उस शान की बन्दगी,
सर झुके औ जमाना बदलता रहे।
साधक ने कुछ निवेदन कर ही दिया तो वैसी व्यवस्था हो जाती है। एक महात्मा ऐसी ही अवस्था से गुजर रहे थे, सिद्ध हो गये। वह मन में जो सोचते, वही हो जाता। एक बार वह एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठे थे। चबूतरे पर धूप थी। उन्होंने सोचा– बैठने की यह जगह तो ठीक है। यह डाल थोड़ी बढ़ जाती तो यहाँ छाया हो जाती। रात्रिभर में डाल बहुत बढ़ गयी। प्रात: महात्मा ने देखा– अरे, इतनी लम्बी! कहीं गिर जाय तो हम दबकर मर भी सकते हैं। डाल गिरी, वह दबकर मर भी गये। ‘व्युत्थाने सिद्धय:’– सिद्धियाँ वास्तव में होती हैं किन्तु कैवल्य की प्राप्ति में उतना ही बड़ा विघ्न है जितना काम-क्रोध-लोभ इत्यादि। महाराजजी कहते थे– ‘‘हो, हम गाँववालों को सधुअई दिखाने गये थे, सबने हमारी रुलाई देखी। व्यंग भी सुनने को मिला कि जब साधु हो गये तो कहीं बहि बिलाय जात्यौ।’’ साधक को भगवान की आज्ञा का उल्लंघन कभी नहीं करना चाहिए।
।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-5’ से उद्धृत)