प्रश्न– महाराजजी! भगवत्–पथ में इतने सम्प्रदाय क्यों हैं? कुछ लोग साम्प्रदायिक भेद से विरोध क्यों करने लगते हैं?
उत्तर– महाराजजी ने उन्हें समझाते हुए कहा कि भगवत्-पथ में कोई सम्प्रदाय नहीं होता, बल्कि कहीं साधन बुद्धि के क्षेत्र में चल रहा है तो कहीं इष्ट के क्षेत्र में, कहीं मनन की प्रवेशिका का प्रयत्न है तो कहीं योग की रहनी का। अवस्था-भेद से आकृतियाँ भिन्न-भिन्न दिखाई देती हैं। हाँ, साधक को अपनी श्रेणी स्वीकार करते हुए आगे के लिए यथाशक्ति प्रयास करना चाहिए। महापुरुषों के यहाँ जाति-विशेष, रंग-विशेष और सम्प्रदाय-विशेष नहीं होते बल्कि अधिकारी के गुण-दोषों का मूल्यांकन होता है।
प्रकृति में विभाजन होता है, परमपुरुष में नहीं। मानवीय दर्शन में जिसे ब्रह्म कहा जाता है वह अजन्मा, अलख और कण-कण में है। उसके स्फुरण के बिना कोई साँस नहीं ले सकता। यहाँ तक कि पत्ता भी नहीं हिल सकता; परन्तु वह रूप-रंग विहीन है। खुदा और सुप्रीम गॉड की भी यही विशेषताएँ हैं। केवल भाषाओं के भेद से नाम पृथक्-पृथक् हैं। भाषा-भेद से रूढ़िग्रस्तता का फँसाव अविवेकी एवं सन्दिग्ध पुरुषों की ही देन है। जैसे- किसी को प्यास लगी है तो अंग्रेजीवाला ‘वाटर’, फारसीवाला ‘आब’, हिन्दीवाला ‘पानी’ और संस्कृतवाला ‘जल’ कहकर माँगेगा, परन्तु पीने को वही तरल पदार्थ जल ही मिलेगा। अब हम उस इष्ट का नाम किसी भी भाषा में लें, लेकिन वह उसी स्वरूप में मिलेगा। नाम तो केवल उसकी प्रवेशिका है। उन प्रभु के पथ में आनेवाले स्तर तो महापुरुष की शरण में रहकर साधना करने से ही उपलब्ध हो सकते हैं कि भजन का क्या रूप है एवं भजन कैसे होता है?
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)