योगविधि ही यज्ञ है?

योगविधि ही यज्ञ है, जगत् हवनसामग्री है

प्रश्नमहाराजजी, भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, यज्ञ सम्पूर्ण पापों से निवृत्ति दिलाता है। (गीता, 3/13) यज्ञ की पूर्तिकाल में यज्ञकर्ता पुरुष सनातन ब्रह्म का दर्शन पाता है और उसी ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है (गीता, 4/31)। यज्ञ तो होते ही रहते हैं किन्तु सनातन ब्रह्म जैसा सर्वोत्कृष्ट परिणाम देखने को नहीं मिलता। अतः यज्ञ का स्पष्ट स्वरूप बताने की कृपा की जाय?

उत्तर महाराजजी ने बताया, ‘‘हो! भगवान ने स्वयं यज्ञ का रूप समझाया है। गीता के अनुसार योगविधि यज्ञ है, दैवमेवापरे यज्ञम् (गीता, 4/25)- जिसमें बहुत से योगी अपने हृदय में दैवी सम्पत्ति को अर्जित करते हैं। अन्य बहुत से योगी इन्द्रियों के बहिर्मुखी प्रवाह को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं। साधना और उन्नत हो जाने पर-

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।

आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्नति ज्ञानदीपिते।। (गीता, 4/27)

सम्पूर्ण इन्द्रियों की चेष्टाओं को, प्राणों के व्यापार को, ज्ञान से प्रकाशित हुई आत्मा में संयमरूपी योगाग्नि में हवन करते हैं। आत्मा के मिलन का नाम योग है। साधना और उन्नत हुई तब वही योगी श्वास को प्रश्वास में तथा प्रश्वास को श्वास में हवन करते हैं अर्थात् वे श्वास से जप करते हैं। साधना और उन्नत हो जाने पर श्वास-प्रश्वास की गति को रोककर प्राणायाम के परायण हो जाते हैं। न हृदय के अन्तराल में किसी संकल्प का अभ्युदय होता है और न बाह्य वायुमण्डल के संकल्प अन्दर प्रवेश कर पाते हैं। प्राणों के व्यापार पर विराम लग जाना- प्राणायाम मन की निरोधावस्था है। इस निरोध के साथ ही यज्ञ का परिणाम निकल आता है। वह सनातन ब्रह्म का दर्शन और प्रवेश पा जाता है।

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।

नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।। (गीता, 4/31)

प्रश्न यह है कि यज्ञ करने का अधिकार किसे है? अगली ही अर्धाली में कहते हैं कि यज्ञरहित पुरुष के लिए पुनः मनुष्य शरीर सुलभ नहीं है तो परलोक कैसे सुलभ होगा? अर्थात् यज्ञ करने का अधिकार मानव-तन को है। उनका जन्म चाहे जहाँ हुआ हो – उत्तरी ध्रुव में, अरब, आस्ट्रेलिया या भारत में- इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता।

इस प्रकार योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने यज्ञ के तेरह-चौदह बिन्दुओं पर प्रकाश डाला, जैसे- आरम्भ में किसी यज्ञस्वरूप तत्त्वदर्शी महापुरुष के प्रति समर्पण, उनके स्वरूप को हृदय में पकड़ना, उन महापुरुष के द्वारा ही साधन को आगे बढ़ाना, दैवी सम्पद् को हृदय में अर्जित करना, जो परमदेव परमात्मा के देवत्व तक की दूरी तय करा दे।

देवत्व अर्जित करने के लिए संयम आवश्यक है। इसलिए इन्द्रियों की बहिर्मुखी प्रवृत्तियों को संयमाग्निषु जुह्वति(गीता, 4/26)- संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं। आप एकान्त में बैठे हैं, किन्तु कोई शब्द इत्यादि कान में पड़ते हैं तो उनके आशय को बदलकर योगपरक बनाकर ग्रहण कर लेना और जब ईश्वरीय अनुभूति का संचार हुआ तो योगाग्नि में हवन, श्वास-प्रश्वास का जप, प्राणों के व्यापार का निरोध, निरोध के साथ ही यज्ञ का परिणाम सनातन शाश्वत ब्रह्म-दर्शन, स्पर्श और स्थिति यह सब यज्ञ है।

इस यज्ञ में कहीं भी अग्नि नहीं जलती और न ही तिल, यव (जौ) का हवन या किसी बाह्य सामग्री की आवश्यकता ही होती है। आवश्यकता है तो केवल अपने ही मन के संयम की; क्योंकि संसार मन के अन्तराल में ही विद्यमान है। और जहाँ निरुद्ध मन का भी विलय हुआ, संसार विलीन हो जाता है-इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।। (गीता, 5/19) उन पुरुषों द्वारा जीवित अवस्था में (मृत्यु के पश्चात् नहीं) सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया, जिनका मन समत्व में स्थित हो गया। समत्व की स्थिति और संसार के जीतने में क्या सम्बन्ध? वस्तुतः ब्रह्म निर्दोष और सम है, इधर साधक का मन भी निर्दोष और सम की स्थितिवाला हो गया इसलिए वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। संसार से सम्बन्ध-विच्छेद और ब्रह्म से सम्बन्ध जुड़ जाता है। अतः वह शाश्वत सनातन ब्रह्म के दर्शन के साथ ही उसमें स्थित हो जाता है।

सात्विक पुरुष इसी यज्ञ को समर्पण के साथ श्रद्धापूर्वक करते हैं। राजसी पुरुष इसी यज्ञ को कामना व दम्भ से युक्त होकर करते हैं; किन्तु तामसी पुरुष यज्ञ के नाम पर कुछ गढ़ लेते हैं। नाम तो यज्ञ ही रहता है किन्तु यज्ञ रहता नहीं। ‘‘आसुरी वृत्ति को प्राप्त पुरुष कहता है- मैं यज्ञ करूँगा, दान करूँगा, यश को प्राप्त करूँगा। वह शास्त्रविधि से रहित नाममात्र के यज्ञ को दम्भपूर्वक करता है। किन्तु अर्जुन! वह अन्तर्यामी रूप से अपने और दूसरे के हृदय में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करनेवाला होता है, न कि भजता है। ऐसे क्रूरकर्मी, पापाचारी, नराधमों को मैं बारम्बार आसुरी योनियों में गिराता हूँ।’’ (गीता, 16/17) मनुष्य से शत्रुता करके लोग बच भी जाते हैं किन्तु यहाँ तो भगवान से ही शत्रुता हो गयी। ऐसे आसुरी स्वभाववाले क्या बच जायेंगे? भगवान कहते हैं- नहीं! वे क्रूरकर्मी हैं, पापाचारी हैं। भले ही यज्ञ का नाम दे रखा हो वस्तुतः वे घोर पाप का आचरण करनेवाले हैं। वे नराधम अर्थात् मनुष्यों में अधम हैं। ऐसे लोग भगवान को प्राप्त न होकर उत्तरोत्तर निम्न योनियों में ही गिरते हैं। उत्तरोत्तर अधम योनियों में पतन ही नरक है।

अतः यज्ञ के नाम पर कुछ भी कर डालना यज्ञ नहीं है। यज्ञ एक निश्चित विधि है। वह भगवान के श्रीमुख से गीता में अभिव्यक्त है। किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के द्वारा ही उस यज्ञ का सूत्रपात होता है, उसकी जानकारी होती है, इसलिए सन्तों की संगति करनी चाहिए। किसी अच्छे महापुरुष का शरण-सान्निध्य, घड़ी-आध घड़ी उनकी टूटी-फूटी सेवा से भजन की जागृति और यज्ञ में प्रवेश मिल जाता है।

।। ओम् ।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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