प्रश्न– महर्षि विश्वामित्र राम को अधिकारी पाकर वह कौन–सा मंत्र प्रदान किये, जिससे भूख–प्यास नहीं लगती थी। क्या कलियुग में इस प्रकार का मंत्र नहीं प्राप्त किया जा सकता?
उत्तर– मान लिया कि तुम्हारी दृष्टि में आज कलियुग है और तब नहीं था। अब जरा विचार करो कि मंत्र में क्या गुण थे? मंत्र में इतनी क्षमता बतायी गयी है कि वह भूख-प्यास दोनों से रक्षा करती थी, परन्तु उनकी पालन-क्रिया न तो महर्षि विश्वामित्र में ही पायी गयी और न राम में ही। जैसा कि मंत्र के आदान-प्रदान के कुछ समय उपरान्त जब जनक की यज्ञस्थली में पहुँचे तो-
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी।
लगे कहन कछु कथा पुरानी।। (मानस, 1/236/5)
पहले महर्षि विश्वामित्र ने भोजन-प्रसाद ग्रहण किया तत्पश्चात् पुराण अर्थात् प्राचीन कथाओं को विस्तृत ढंग से कहना प्रारम्भ किया। राम के लिए जनकपुर की बात छोड़ ही दी जाय क्योंकि वे वहाँ के प्रमुख अतिथि थे। वनवासकाल में ही देखिये, कहीं कोल-भीलों के कन्द-मूल फल खाये और कहीं महर्षियों का आतिथ्य स्वीकार किये। उस त्रेता-जैसे शुद्ध युग में जब उन मंत्रज्ञ महापुरुषों के ऊपर उस मंत्र का कोई प्रभाव न रहा तो कलियुग-सतयुग आदि युगधर्मों के माध्यम से प्रश्न का हल असम्भव-सा है। अब मंत्र में शायद पौष्टिकता की कमी रही हो तो ऐसी भी बात नहीं थी।
अतुलित बल तनु तेज प्रकासा। (मानस, 1/208/8)- वह मंत्र इसी तन में अतुलनीय शक्ति प्रदान करनेवाला था। अब वस्तुओं की कल्पना व शरीरों की निर्बल- सबल आकृतियों पर दृष्टि डालने से इसका अर्थ नहीं मिलेगा। यह मानस है, यह किसी योगी के अन्तःकरण में घटित होनेवाले उस व्यापक राम की पकड़ का तारतम्य है। मानस कहते हैं मन को, जो साधना की सही स्थिति में मिलनेवाली अवस्था-विशेष है। विज्ञानरूपी राम अर्थात् जिस परमात्मा की हमें चाह है जब वही हृदय से रथी बनकर पथ-प्रदर्शन करने लगता है और जिस स्तर पर हम खड़े हैं, वहीं से प्रेरक बनकर उठाने लगता है तब साधक का विश्वास दृढ़ हो जाता है इसी का नाम विज्ञान है। विश्वासरूपी विश्वामित्र अर्थात् जब विश्वासपूर्ण यज्ञ का आरम्भ हुआ तो तर्कनारूपी ताड़का, स्वभावरूपी सुबाहु और मन का मैलरूपी मारीच आदि मारे जाते हैं। इष्ट के आदेशों में विश्वास दृढ़ होने पर ही तर्कनारूपी ताड़का समाप्त होती है और वहीं से श्वास-प्रश्वास का यज्ञ सुचारु रूप से चलता है। जब तक इष्टदेव हृदय से रथी होकर विश्वास नहीं दिला देते कि बेटा तुम तो निमित्त मात्र हो, कर्ता-धर्ता तो मैं हूँ, तब तक यजन (यज्ञ) नहीं हो पाता। जब यज्ञ की प्रक्रिया तर्कनाओं से उपराम हो जाती है तो अनन्त बल देकर ही शान्त होती है अन्यथा नहीं। प्रकृति का बल भी तो महापुरुषों द्वारा तौल लिया गया है। अनन्त या अतुलित बल उस परमात्मा में है जिसमें शुभाशुभ जगत् हवन-सामग्री के रूप में है। वह भजन-क्रम, जप, यज्ञ अथवा भजन की विधि तर्कनाओं से ऊपर उठकर विश्वास या प्रेरक के बल का आश्रय पा जाती है। फिर वही मंत्र एवं यजन (यज्ञ) उस परमात्मा को पैदा करनेवाला होता है जिसकी उपलब्धि के बाद किसी प्रकार की क्षुधा या तृष्णा नहीं रह जाती। बाहर जैसा कि हम ढूँढ़ते हैं, उसका इस स्थल पर कोई उपयोग नहीं है। कलियुग की विकलता को देखकर शंकरजी द्रवित हो गये और उद्धार की पूर्तिहेतु इस कथा का निर्माण किया। जब कलियुग में उद्धार की विशेष सम्मति है, तब प्रभाव क्यों नहीं होगा?
देखो, भोजन दो प्रकार का होता है। जितनी खाद्य सामग्रियाँ हैं, वे केवल स्थूल शरीर का पोषण करती हैं, उनका आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है। आत्मा को पूर्ण पुष्टि एवं तृप्ति प्रदान करनेवाला भजन ही भोजन है। भजन के द्वारा ही वास्तविक अन्न मिलता है जिसको पाकर यह आत्मा परमात्म-स्वरूप अमृत से पूर्ण तृप्त हो जाती है। यह केवल इसी मंत्र (भजन) द्वारा सम्भव है। साधारण भजन अतुलनीय सत्ता परात्पर ब्रह्म की उपलब्धि नहीं करा सकता। इसलिए ब्रह्म से प्रेरित पूर्ण विश्वास से युक्त एवं तर्कनाओं से उपराम हो जाने पर वह मंत्र अतुलनीय सत्ता परमात्मा को दिलाने की क्षमता रखता है।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)