विप्र एक स्थिति

विप्र : एक स्थिति

क्रियात्मक पथ पर चलकर ब्रह्म की अनुभूति करनेवाले ब्राह्मण हैं। वह क्रिया है केवल एक परमात्मा में निष्ठा।स्वामी अड़गड़ानन्द

भागवतमेंविप्र

श्रीमद्भागवत के समापन पर भगवान व्यास ने कहा, ‘‘हे परीक्षित! इस प्रकार मैंने केवल मनुवंश का संक्षेप में वर्णन किया है। जैसे मुनवंश की यह गणना है, वैसे ही प्रत्येक युग में ब्राह्मण, वैश्य और शूद्रों की वंश-परम्परा समझनी चाहिए।’’ इस ग्रन्थ से स्पष्ट है कि कुछ साहसी क्षत्रिय ही आगे चलकर ब्राह्मण बने। ब्राह्मण की उत्पत्ति क्षत्रियों से है; क्योंकि जब विधाता ने सृष्टि-रचना की तो सनकादि चार पुत्रों को उत्पन्न किया। विधाता ने उन लोगों से कहा कि तुम लोग सृष्टि-रचना करो। उन्होंने कहा, ‘‘नहीं, हमलोग ब्रह्म-चिन्तन करेंगे।’’ उन्होंने सृष्टि-रचना से इनकार कर दिया। यही चार सृष्टि के आदि ब्राह्मण कहे जाते हैं, जिनका कोई वंश नहीं चला। तदनन्तर ब्रह्मा ने क्षत्रिय श्रेणी के गुणधर्मों द्वारा मनु और शतरूपा को उत्पन्न किया, जिनकी तीन पुत्रियों की सन्तति से सारा संसार भर गया। प्रत्येक मन्वन्तर में ईश्वरभक्त मनु तथा उनकी वंशावली की गौरव-गाथा भागवत में है और इस दृष्टि से नृवंश तथा सम्पूर्ण भागवत क्षत्रियों का इतिहास है। मनु का वंशज होने से ही इन्हें मनुष्य या मानव कहा जाता है।

ईश्वर-पथ में साधना के चार सोपानों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में से मनु-सन्तान क्षत्रिय श्रेणी में कदाचित् ही हों किन्तु इतिहास में हजारों वर्षों से जो क्षत्रिय की परिभाषा चली आ रही है- शासन, सुरक्षा, युद्ध, पृथ्वी का भार सँभालना, शौर्य इत्यादि जो प्रचलित हैं, वे सब लक्षण इन मनु राजवंशों में भली प्रकार विद्यमान थे। जिनका ब्राह्मणत्व सिद्धि में प्रतिशत अधिक पाया जाता है।

मनु के दस पुत्रों में से पाँचवें पुत्र धृष्ट से धार्ष्ट नाम क्षत्रिय हुए। वे इस शरीर से ही ब्राह्मण हो गये (९/२/१७)। मनु के नवें पुत्र नरिष्यन्त की दसवीं पीढ़ी में अग्निवेश उत्पन्न हुए। ब्राह्मणों का अग्निवेश्यायन गोत्र उन्हीं से चला (९/२/२२)। क्षत्रिय मनु के चौथे पुत्र दिष्ट का पुत्र नाभाग अपने कर्म के कारण वैश्य हो गया; किन्तु उसी नाभाग की बारहवीं पीढ़ी में उत्पन्न मरुत्त पुनः चक्रवर्ती नरेश (क्षत्रिय) हो गये। इस प्रकार उन क्षत्रियों के ब्राह्मण तथा वैश्य बनने और पुनः क्षत्रिय बनने के उदाहरण भागवत में हैं।

मनु के तीसरे पुत्र शर्याति आचार्य बने। अंगिरा गोत्र के ऋषियों को यज्ञ में दूसरे स्तर का कर्म उन्होंने बतलाया था (९/३/१)। स्वायंभू मनु की चौथी पीढ़ी में उत्पन्न आठवें अवतार महाराजा ऋषभदेवजी के सौ पुत्रों में से दस राजा हुए, नौ संन्यासी हो गये तथा शेष इक्यासी कर्म में प्रवीण ब्राह्मण हो गये। लोग कहते हैं कि चरण से शूद्र, मुख से ब्राह्मण, जंघा से वैश्य और भुजा से क्षत्रिय होता है; किन्तु यहाँ एक ही माता-पिता की सन्तानों में से कुछ क्षत्रिय, कुछ संन्यासी तथा बहुसंख्यक ब्राह्मण हो गये। स्पष्ट है कि भागवत के अनुसार ब्राह्मण एक योग्यता है।

अपने पुत्रों को उपदेश करते हुए भगवान ऋषभ ने बताया कि पंचभूतों की अपेक्षा वृक्ष श्रेष्ठ हैं। वृक्षों से चलने-फिरनेवाले जीव श्रेष्ठ हैं। उनमें भी कीटादि की अपेक्षा ज्ञानयुक्त पशु श्रेष्ठ हैं। पशुओं से मनुष्य, उनसे प्रमथगण, उनसे भी गन्धर्व-सिद्ध-किन्नर श्रेष्ठतर हैं। उनसे भी असुर श्रेष्ठ हैं। असुरों से देवता, देवताओं से इन्द्र, उनसे भी ब्रह्माजी के पुत्र रुद्र, उनसे ब्रह्मा तथा ब्रह्मा की अपेक्षा मैं श्रेष्ठ हूँ; किन्तु ब्राह्मण मुझसे भी श्रेष्ठ हैं क्योंकि वे शम, दम, सत्य, दया, तप, तितिक्षा, अध्ययन और ज्ञान इन आठ गुणों से सम्पन्न हैं। इस तरह भागवतकार का निर्णय है कि जो ब्रह्म के परायण हैं वही ब्राह्मण हैं, न कि कोई जाति।

भागवत के चतुर्थ स्कन्ध में मनु-पुत्र धु्रव की चौथी पीढ़ी में उत्पन्न अत्याचारी राजा वेन का इतिहास है। उसके निःसन्तान मरने पर ऋषियों ने उसकी जंघा का मंथन किया। उससे जो पुरुष पैदा हुआ उसी के वंशज निषाद कहलाये। उसी वेन की भुजाओं के मंथन से पृथु और अर्चि उत्पन्न हुए। एक ही राजा से उत्पन्न ये तीनों सगे भाई-बहन थे। पृथु को योग्य समझ ऋषियों ने उसे पैतृक गद्दी पर बैठाया और निषाद को समुद्रपर्यन्त जंगलों का राज्य मिला। इस प्रकार निषाद क्षत्रिय वंश में उत्पन्न महाराज पृथु के सगे भाई क्षत्रिय हैं। निषादराज और निषादों का सामाजिक अवमूल्यन, जंगली रहन-सहन परवर्ती व्यवस्थाकारों की उपज है।

महाराज पृथु को प्रथम चक्रवर्ती सम्राट होने का गौरव प्राप्त है। उन्होंने धरातल का समतलीकरण किया, धरती को गौ बनाकर दुहा, प्रतिकूल बीजों को हटाकर अनुकूल बीजों को उगाया। खेती करना, पशुपालन, पेड़ों से उतरकर बस्तियों में रहना उन्होंने सिखाया। चौबीस अवतारों में महाराज पृथु भी एक अवतार हैं। एक बार उनकी सभा में सनकादि ऋषि पधारे। सम्पूर्ण सभा उनके स्वागत में उठ खड़ी हुई। ऋषि-चरणों में पृथु ने प्रणाम किया। सभा को सम्बोधित करते हुए महाराज पृथु बोले-

‘‘सभ्यगणो! जिस जनपद में आप-जैसे ब्राह्मण विचरते हों, वह जनपद धन्य है। दृष्टि-निक्षेप मात्र से जो दूसरों के अन्तःकरण में प्रसारित हो जाते हैं, ऐसे ब्राह्मणों का दर्शन दुर्लभ है। (दृष्टि पड़ने मात्र से ही अनुभवों का सूत्रपात कर देना पूज्य गुरुदेव भगवान की विद्या का सहज गुण था।) परब्रह्म को जानने के लिये जो श्रद्धापूर्वक इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, स्वाध्याय विरोधी विचारों का त्याग करते हैं, दीर्घकाल तक संयमपूर्वक समाधि का अभ्यास कर जो उस ब्रह्म को जानते हैं, ऐसे ब्राह्मणों की चरणधूलि मैं आयुपर्यन्त अपने सिर पर धारण करता रहूँ; क्योंकि जो भी धारण करेगा, सारे सद्गुण उसके पास अपने आप आ जायेंगे।’’

इस प्रकरण में ब्राह्मण उसे कहा गया जो एकमात्र ब्रह्म के लिए जप-तप, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, धारावाही चिन्तन, एकान्त-देश का सेवन, स्वाध्याय विरोधी विचारों का त्याग, योग-साधना, उसको तत्त्व से जानने के लिये समाधि द्वारा प्रयत्नशील हो। जिसने उसे जाना हो, वह ब्राह्मण है।

दशम स्कन्ध के इक्यावनवें अध्याय में कथा है कि इक्ष्वाकुवंशीय महाराजा मान्धाता के पुत्र राजा मुचुकुन्द के दृष्टि-निक्षेप मात्र से कालयवन भस्म हो गया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना दर्शन दिया, वर माँगने को कहा। मुचुकुन्द ने कहा- ‘‘मैं आपके चरणों की सेवा के अतिरिक्त कोई भी वर नहीं चाहता।’’ इसे स्वीकारते हुए भगवान ने कहा- ‘‘अगले जन्म में तुम ब्राह्मण बनोगे तथा मुझ परमात्मा को प्राप्त करोगे।’’

विचारणीय है कि जिसमें दृष्टि-निक्षेप मात्र से राक्षसों को भस्म कर देने की क्षमता है, ऐसे तपोधन को भी ब्राह्मणत्व अगले जन्म में मिल रहा है, तो क्या ब्राह्मणत्व इतना सरल है? स्पष्ट है कि ब्राह्मणत्व योग की पराकाष्ठा में प्राप्त होनेवाली स्थिति है। सदियों से जिनके लिये मन्दिरों के दरवाजे बन्द हैं कि मन्दिर में जाओ मत, शास्त्र पढ़ो मत, वेदवाक्य पर विचार करो मत, पेड़ के नीचे रहो, ठीकरों में खाओ, सत्कर्म तुम्हारे लिये नहीं- ब्राह्मण जन्मोगे तब करना- इतने कड़े प्रतिबन्ध लगे हैं कि सत्कर्म किया ही नहीं तो वे अगले जन्म में ब्राह्मण कैसे होंगे? यदि ऐसे आचरणहीन हमीं होंगे तो यह कुत्ता, सियार कौन होगा? उतनी बड़ी तपस्या के बाद श्रीकृष्ण ने आशीर्वाद दिया कि अगले जन्म में ब्राह्मणत्व प्राप्त करोगे। अतः ब्राह्मण एक स्थिति है। परब्रह्म परमात्मा जिसे विदित हो, जो उससे संयुक्त हो, उसमें भली प्रकार स्थितिवाला हो, वह ब्राह्मण है और उसकी शुरुआत सेवा से है।

सेवा का महत्त्व भागवत के तृतीय स्कन्ध में मैत्रेय ऋषि ने विदुरजी को बताया कि धर्म की सिद्धि के लिये भगवान के चरणों से सेवावृत्ति तथा उसके अधिकारी शूद्र का आविर्भाव हुआ- परमात्मा की तुष्टि के लिये। यहाँ स्पष्ट है कि श्रीहरि को सन्तुष्ट करना है, धर्म की सिद्धि करनी है तो सेवावृत्ति से आरम्भ करना होगा। शूद्र से ही भगवत्-पथ में प्रवेश है। वहीं ईश्वर की उत्पत्ति है। शूद्र ही श्रम है। यहीं से ईश्वरीय जागृति है। शेष तीन श्रेणियाँ तो मात्र उस पौधे का विकास है। फिर तो उस पौधे को बढ़ना ही बढ़ना है। नेहाभिक्रम नाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।(गीता, २/४०) इस ईश्वर-पथ में आरम्भ का नाश नहीं है। जब प्रभु प्रसन्न ही हो गये तो वह स्वयं प्राप्ति की विधि बतायेंगे। विधि जानकर जो चलता है, वह वैश्य है। भजन आरम्भ करने के लिए सभी को शूद्र से आरम्भ करना होगा और जो शूद्र हो गया उसी का ब्राह्मणत्व भी सुनिश्चित है। लगनशील साधक एक ही जन्म में इन चारों सोपानों का अतिक्रमण कर परमात्म-भाव को प्राप्त कर लेता है। ‘अर्जुन! तू सम्पूर्ण पापियों से भी अधिक पाप करनेवाला हो तब भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा निःसन्देह पार हो जायेगा।’ (गीता, ४/३६)

भागवत के दशम स्कन्ध में कथा है कि एक बार भगवान श्रीकृष्ण नारद, वामदेव, अत्रि, असित, कण्व, परशुराम, व्यास, शुकदेव, बृहस्पति, मैत्रेय तथा च्यवन इत्यादि ऋषियों के साथ ब्राह्मण श्रुतदेव के यहाँ पधारे। उन्होंने कहा, ‘‘ब्राह्मण जन्म से ही सब प्राणियों से श्रेष्ठ है, इसलिये श्रुतदेव! तुम इन ब्रह्मर्षियों को मेरा ही स्वरूप समझकर पूजा करो। ऐसे ब्राह्मणों के पूजन से ही मेरी पूजा होती है अन्यथा करोड़ों प्रकार से भी मेरी पूजा नहीं हो सकती।’’ यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने एक ब्राह्मण को ऐसे ब्राह्मणों की पूजा करने का निर्देश दिया जो जन्मना ब्राह्मण नहीं थे। सुधीजन विचार करें तो पायेंगे कि इन ब्रह्मर्षियों की सामाजिक कुलीनता, जातिगत वरिष्ठता नहीं थी। वे शादीशुदा माता-पिता की सन्तान भी नहीं थे। साधना की सही क्रिया से चलकर इन सबने क्रमशः सोपानों को पार किया, ब्राह्मण का जन्म पाया। यह स्वरूपात्मक जन्म निःसन्देह भाग्यवानों को ही मिलता है, किन्तु इस जन्म के होने में किसी कुलीन माता-पिता का सहयोग नहीं है। ब्राह्मण जाति तो होती ही नहीं- एक स्वरूप है, स्थिति है। वस्तुतः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भगवत्पथ के चार सोपान हैं, ये भगवत्पथ पर चलनेवाले पथिक की चार आन्तरिक अवस्थायें हैं। जो भी साधन करेगा यह जन्म पा सकता है और इस दृष्टि से इन ऋषियों में चाण्डाल भी ब्राह्मण बन सकता है।

द्वादश स्कन्ध में मार्कण्डेयजी की कथा है। भगवान शंकर ने उनसे कहा- ‘‘ब्राह्मण चित्त की एकाग्रता, तपस्या, स्वाध्याय, धारणा, ध्यान और समाधि के द्वारा हमारे वेदमय शरीर को धारण करते हैं इसीलिये हम तुम्हारे-जैसे महात्माओं की स्तुति और सेवा करते हैं, हमलोग तो ब्राह्मण को ही नमस्कार करते हैं।’’ इस प्रकरण में भी आत्मतृप्त, आत्मस्थित महात्मा को ही ब्राह्मण बताया गया है। इसीलिए जन्मना बहुत कुलीन न रहने पर भी नारद, वशिष्ठ, शुकदेव, व्यास, परशुराम, भरद्वाज, च्यवन इत्यादि विशुद्ध ब्राह्मण माने गये।

भागवत में तो स्थान-स्थान पर क्षत्रियों को तपस्या करते, ब्रह्मपद पाते, ब्राह्मण होते दिखाया गया है। महाराज पृथु के पौत्र बर्हिषद के प्रचेता नामक दस पुत्र नारदजी से उपदेश ग्रहण कर भगवद्-चिन्तन में लगे और ब्रह्मलीन हो गये। इन्हीं प्रचेताओं के पुत्र राजा दक्ष के ग्यारह हजार पुत्र नारदजी से उपदेश लेकर तपस्या में लग गये, जिनकी गाथा भागवत के षष्टम स्कन्ध में भली प्रकार है। अतः यह कहना अतिरंजित न होगा कि ब्राह्मणत्व का मार्ग इन क्षत्रियों से होकर है। वैसे तो सृष्टि के आदिपुरुष मनु तथा शतरूपा ही थे, जिनसे सभी की उत्पत्ति मानी जाती है। अतः मानव मात्र ब्राह्मण बन सकता है, फिर भी ब्राह्मण की योग्यता अर्जित करने में क्षत्रिय जाति के लोगों का प्रतिशत अधिक रहा है; क्योंकि समाज तथा राष्ट्र की रक्षा में जिस साहस और शौर्य के साथ उन्होंने कर्त्तव्य-निर्वाह किया, शीश दिया, उसी सचाई और ईमानदारी के साथ प्राणपण से ईश्वर-पथ पर लगना होता है इसीलिये ब्राह्मणत्व प्राप्ति में क्षत्रियकुमारों को अधिक सफलता मिली।

श्रीमद्भागवत परमहंस-संहिता है। वस्तुतः ‘परमहंस’ और ‘ब्राह्मण’ शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची हैं, इसीलिये इसमें स्थान-स्थान पर ब्राह्मणों की महिमा का गायन देखने को मिलता है। भागवत में ज्यादातर राजकुमार ही इस पद को प्राप्त हुए हैं तथा हर परिस्थिति में जन्म लेनेवाले इस पद को प्राप्त कर चुके हैं, जैसे- भरद्वाज। स्पष्ट है कि इस पद को कोई भी मनुष्य प्राप्त कर सकता है, वह चाहे जहाँ जन्मा हो, किसी भी वृत्ति से जीवनयापन करता हो। साधन समझकर आचरण करनेवाला ब्रह्म को जानकर ब्राह्मणत्व अर्जित कर सकता है।

बड़ें भाग मानुष तनु पावा। (मानस, ७/४२/७)- यहाँ मानव-तन का मूल्य है, किसी जाति कुल-विशेष का नहीं।

महाभारतमेंविप्रकी अवधारणा

भागवत के रचयिता भगवान वेदव्यास महाभारत के भी रचयिता हुए हैं, जिसमें यत्र-तत्र सर्वत्र विप्र का मौलिक चित्रण हुआ है। वनपर्व की कथा है कि एक बार महाराजा नहुष सौ अश्वमेध यज्ञ कर इन्द्र-पद को प्राप्त हुआ। अधिकार पाते ही वह मदान्ध हो गया। बोला, ‘‘जब मैं देवराज इन्द्र हूँ, तो महारानी शची मेरा वरण करें।’’ शची ने गुरुदेव बृहस्पति से प्रार्थना की। उन्होंने उपाय बताया कि नहुष ऐसी पालकी पर चढ़कर आये जिसमें सप्तर्षि जुते हों। शची का प्रस्ताव सुनकर नहुष ने वैसी ही व्यवस्था की। अगस्त्य, अंगिरा, वशिष्ठ इत्यादि ऋषियों से जुती हुई पालकी शची के महल की ओर बढ़ी। मिलन की आतुरता में नहुष उन महर्षियों को शीघ्र चलने के लिए ‘सर्प-सर्प’ कहता रहा फिर भी उनकी चाल में विशेष अन्तर न देख उसने अगस्त्य ऋषि को लात मारी, तो अगस्त्य ने शाप ही दे डाला कि जाओ, सर्प ही हो जाओ। तत्क्षण नहुष पालकी से गिर पड़ा। उसे अपनी भूल का ज्ञान हुआ। महर्षियों से विनय की, अपने उद्धार का उपाय पूछा तो उन्होंने बताया कि जब कोई तुम्हें ब्राह्मण की विशुद्ध व्याख्या बता देगा और उसे तुम स्वीकार कर लोगे तभी तुम्हारी इस शरीर से मुक्ति होगी। (ब्राह्मण की परिभाषा न जानने के कारण ही तो नहुष सप्तर्षियों से पालकी ढुलवाने का दुस्साहस कर बैठा था।)।

सप्तर्षियों ने बताया कि इस समय ब्राह्मण की यथार्थ व्याख्या करनेवाला भूतल पर कोई नहीं है। द्वापरयुग में तुम्हारे ही कुल के महाराज युधिष्ठिर वनवासकाल में तुम्हारे पास आयेंगे, वही तुम्हें ब्राह्मण की महिमा का उचित उपदेश करेंगे। उस महिमा को सुनते ही तुम इस सर्पयोनि से मुक्त होकर पुनः इन्द्र-पद प्राप्त कर लोगे। सर्प बोला- भगवन्! इतने दिनों तक मेरा जीवन-निर्वाह कैसे होगा? ऋषियों ने व्यवस्था दी कि दिन के चौथे प्रहर में जो कोई भी तुम्हारे अधिकृत क्षेत्र में आयेगा, वह कितना ही बलशाली क्यों न हो, तुम्हारा आहार बन जायेगा।

इन्हीं परिस्थितियों के बीच अजगर बना नहुष जंगल में दिन काट रहा था। इधर पाण्डवों का वनवास हुआ। पाण्डव तो कुटिया में रहते थे; किन्तु आखेटक भीम विचरण करता हुआ एक दिन उसी अजगर के पास पहुँच गया। अजगर ने भीम को सावधान भी किया कि समीप न आओ। तुम्हें देखकर मुझे दया लग रही है। समीप आओगे तो भूखा हूँ, पकड़कर खा लूँगा। भीम ने कहा, ‘‘क्षुद्र जन्तु! तू मुझे खायेगा?’’ भीम ने आक्रमण किया; किन्तु जहाँ अजगर का स्पर्श हुआ, भीम निश्चेष्ट होता गया।

उधर युधिष्ठिर को अपशकुन होने लगा। उन्होंने देखा कि अन्य सभी भाई तो हैं, केवल भीम दिखाई नहीं दे रहा है। लगता है कहीं संकट में है। पुरोहित ऋषि धौम्य को साथ लेकर वे भीम की खोज में निकल पड़े। भीम द्वारा मारे गये शेर, हाथी, भैंसों, गैंडों को देखते, भीम द्वारा उखाड़े गये पेड़ों का अनुकरण करते वे वहाँ पहुँचे जहाँ अजगर से लिपटा भीम शिथिल पड़ा था। युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘भीम! कोई साधारण जीव तुम्हें वश में नहीं कर सकता। अजगर के वेश में यह महाभाग कौन हैं?’’ भीम जो पहले ही परिचय जान चुका था, बोला- ‘‘यह हमलोगों के पूर्वज महाराज नहुष हैं जो इन्द्रपद से च्युत हुए थे।’’

युधिष्ठिर ने प्रार्थना की, ‘‘राजन्! आप कृपा करके हमारे भाई को छोड़ दें। इसके साथ हमलोग जंगल में निरापद विचरण करते हैं। जब तक हम वनवास में हैं आपकी भोजन-व्यवस्था करते रहेंगे।’’ सर्प बोला, ‘‘राजन्! मैं दूसरा भोजन कर ही नहीं सकता, ऐसा ही कुछ शाप है। कल तक खड़े रहे तो तुम्हें भी खा लूँगा।’’ युधिष्ठिर ने कहा- हजारों यज्ञ करनेवाले आपकी यह दुर्गति कैसे हुई? सर्प ने बताया कि विप्र-शाप से ऐसा हुआ है। युधिष्ठिर ने प्रश्न किया कि विप्रों का अपमान आप-जैसे महात्मा से कैसे हो गया? क्या आप ब्राह्मण की महिमा से अपरिचित थे? ब्राह्मण नाम सुनते ही अजगर को पूर्वजन्म की स्मृति हो आई। उसने कहा-

ब्राह्मणः को भवेद् राजन् वेद्यं किं च युधिष्ठिर।

ब्रवीह्यतिमतिं त्वां हि वाक्यैरनुमिमीमहे।। (१८०/२०)

सर्प बोला- ‘‘राजा युधिष्ठिर! यह बताओ कि ब्राह्मण कौन है और उसके लिये जानने योग्य क्या है?’’

सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंस्यं तपो दया।

दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृतः।। (१८०/२१)

नागराज! जिसमें सत्य, दान, क्षमा, सुशीलता, क्रूरता का अभाव, तपस्या और दया से सद्गुण दिखाई देते हों, वही ब्राह्मण कहा गया है।

शूद्रेष्वपि च सत्यं च दानमक्रोध एव च।

आनृशंस्यमहिंसा च दया चैव युधिष्ठिर।। (१८०/२३)

सर्प बोला- सत्य, दान, अक्रोध, क्रूरता का अभाव, अहिंसा और दया आदि सद्गुण तो शूद्र में भी हो सकते हैं?

शूद्रे तु यद् भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते।

न वै शूद्रो भवेच्छ्रूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः।। (१८०/२५)

यत्रै तल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः।

यत्रै तन्नभवेत् सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत।। (१८०/२६)

युधिष्ठिर ने कहा- ‘‘यदि शूद्र में सत्य आदि उपर्युक्त लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं तो वह शूद्र शूद्र नहीं है और वह ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है। सर्प! जिसमें ये सत्य आदि लक्षण मौजूद हों वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो उसे शूद्र कहना चाहिए।’’

युधिष्ठिर के इतना कहते ही अजगर का शरीर छूट गया। नहुष एक दिव्यपुरुष के रूप में उपस्थित हुए, पाण्डवों को विजय का आशीर्वाद दिया और चले गये। अतः ब्राह्मण योग-साधना सध जाने के पश्चात् की एक स्थिति है। जन्म से तो कोई ब्राह्मण हो ही नहीं सकता। महाभारत के ही सुविख्यात आख्यान यक्ष-प्रश्न में इसी निर्णय को परिपुष्ट किया गया है। यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा-

राजन् कुलेन वृत्तेन स्वाध्यायेन श्रुतेन वा।

ब्राह्मण्यं केन भवति प्रब्रूह्येतत् सुनिश्चितम्।।

हे राजन्! कुल-परम्परा, शास्त्र-श्रवण, स्वाध्याय और आचरण इनमें से किसके द्वारा ब्राह्मणत्व सिद्ध होता है? यह निश्चय करके कहिए।

शृणु यक्ष कुलं तात न स्वाध्यायो न च श्रुतम्।

कारणं हि द्विजत्वे च वृत्तमेव न संशयः।। (वनपर्व, ३१३/१०८)

युधिष्ठिर ने कहा, ‘‘हे यक्ष! न तो कुल-परम्परा (जन्म) से, न शास्त्र-श्रवण से, न स्वाध्याय से ही ब्राह्मणत्व सिद्ध होता है- ब्राह्मणत्व की सिद्धि का कारण मात्र आचार है। जिसमें इन्द्रियों का दमन हो, मन का शमन हो, भली प्रकार अन्तःकरण और मन की वृत्तियाँ शान्त हों, ध्यान और समाधि की क्षमता हो, वह ब्राह्मण है। इस संयम द्वारा जिसने ब्रह्म को जाना हो, वह ब्राह्मण है। साधन करके जो गुणातीत हो गया हो, वह ब्राह्मण है। अतः ब्राह्मण योग-साधना में प्रवृत्त पुरुष को मिलनेवाली अवस्था है।

यक्ष ने पुनः प्रश्न किया, ‘‘राजन्! ये लक्षण तो शूद्र में भी पाये जा सकते हैं?’’ युधिष्ठिर ने समाधान किया कि यदि ये लक्षण शूद्र में हैं तो वह शूद्र नहीं बल्कि ब्राह्मण है। यक्ष ने कहा कि इन लक्षणों से हीन ब्राह्मण भी पाये जाते हैं? युधिष्ठिर ने कहा कि तब वह ब्राह्मण नहीं, शूद्र है।

युधिष्ठिर उवाच

पठकाः पाठकाश्चैव ये चान्ये शास्त्रचिन्तकाः।

सर्वे व्यसनिनो मूर्खो य क्रियावान् स पण्डितः।। (३१३/११०)

पढ़नेवाले, पढ़ानेवाले तथा शास्त्र का विचार करनेवाले- ये सब व्यसनी और मूर्ख हैं। पण्डित तो वही है जो क्रियावान् है।

चतुर्वेदोऽपि दुर्वृत्तः स शूद्रादतिरिच्यते।

योऽग्निहोत्र परो दान्तः स ब्राह्मण इति स्मृतः।।

चारों वेद पढ़ा होने पर भी जो दुराचारी है, वह अधमता में शूद्र से भी बढ़कर है। जो यज्ञ में तत्पर तथा जितेन्द्रिय है, वही ब्राह्मण कहा जाता है।

अतः ब्राह्मणत्व जन्म लेने के पश्चात् सिद्ध किया जाता है। यक्ष ने (जो स्वयं धर्मराज थे) युधिष्ठिर के उत्तरों को प्रामाणिक स्वीकार किया, उनके भाइयों को जीवनदान दिया, आशीर्वाद दिया और चले गये। अतः सबको एक ब्रह्म-चिन्तन का आचरण करना चाहिए, जो ब्राह्मणत्व का स्रोत है।

श्रीरामचरितमानसमेंविप्रकी अवधारणा

भागवत के ही निर्णय का पल्लवन महाभारत में मिलता है; क्योंकि लेखक वही थे। गोस्वामी तुलसीदासजी ने इन्हीं के निर्णयों का अनुसरण रामचरितमानस में किया। भागवत में भगवान कहते हैं कि इन विप्रों की पूजा से ही मैं पूजित होता हूँ, ठीक यही गोस्वामीजी भी लिखते हैं-

मन क्रम बचन कपट तजि, जो कर भूसुर सेव।

मोहि समेत बिरंचि सिव, बस ताकें सब देव।। (३/३३)

जो कपट का त्याग करके मन-क्रम-वचन से पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के चरणों की सेवा करता है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश तथा सम्पूर्ण देवताओंसहित मैं परमात्मा उससे पूजित हो जाता हूँ। अक्षरशः वही निर्णय है, जो भागवत में है।

सर्वप्रथम गोस्वामीजी ने अवतार प्रकरण लिया तो बताया कि भगवान का अवतार होता है तो विप्र के लिये।

जब जब होइ धरम कै हानी।

बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी।

सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।। (१/१२०/६-७)

जब कष्ट पाती है धेनु (गाय), कष्ट पाती है पृथ्वी, कष्ट पाते हैं ब्राह्मण और देवता, तब-तब भगवान विविध शरीर धारण करके हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा। (१/१२०/८) इन सज्जनों की पीड़ा हर लेते हैं। अवतार लेकर क्या समझाते-बुझाते हैं कि इन्हें मत सताओ? तो कहते हैं- नहीं,

असुर मारि थापहिं सुरन्ह, राखहिं निज श्रुति सेतु।

जग बिस्तारहिं बिसद जस, राम जन्म कर हेतु।। (१/१२१)

उन असुरों को जान से मार डालते हैं- हृदय-परिवर्तन नहीं करते, देवताओं को आश्वस्त कर देते हैं।राखहिं निज श्रुति सेतु– वेद में जो भ्रान्तियाँ हैं उसे दूर करते हैं। श्रुति-सेतु पुनः प्रशस्त कर देते हैं और अपने विशद यश का विस्तार कर देते हैं। यही रामजन्म का हेतु है।

पंचभूतों में से एक जड़ पदार्थ पृथ्वी के लिए भगवान अवतार लेते हैं। न आकाश के लिए, न वायु के लिए; वह अवतार लेते हैं तो पृथ्वी के लिए। उस आविर्भाव का जो सुख-दुःख पृथ्वी को मिला, उसे वह जाने। आप पृथ्वी तो हैं नहीं! दूसरे बचे देवता। भगवान अवतार लेंगे भारत में किन्तु हित करेंगे देवताओं का। देवता जहाँ होंगे, उनका सुख-दुःख वे जानें। पशुओं में पशु-विशेष गाय तो हम हैं नहीं कि अवतार से हमें भी कुछ मिलता। मनुष्यों में एक वर्ग-विशेष ब्राह्मण मात्र के लिए ही अवतार होता है। संसार में तीन-चार सौ देश हैं, उनमें कहीं भी ब्राह्मण नहीं पाया जाता है। विश्व के मानचित्र में भारत बहुत ही छोटा! उसमें भी अनेकों जातियाँ! चार वर्ण! उसमें भी परमात्मा का आविर्भाव केवल मुट्ठी भर लोगों के लिए है- मनुष्यों में ब्राह्मण के लिए। अन्य लोगों के लिए परमात्मा का अवतार होता ही नहीं, तो हम जगत् को क्या उपदेश दे सकते हैं? यह भगवान तो एक कबीले का हो गया। संयोग से आप ब्राह्मण नहीं जन्मे, तो मनुष्य होना भी व्यर्थ चला गया। कदाचित् पुकारने से वह भगवान पैदा भी हो जाय, तो कुल्हाड़ी ही तो चलायेगा। जो लोग इनको सताते हैं वही असुर हैं। भगवान उनका हृदय-परिवर्तन करते नहीं, उन्हें मारने के लिए ही आते हैं, तो भला ऐसे भगवान को कोई क्यों भजेगा? जिनकी रक्षा वह करता है वे भजें। शेष दुनियावाले यदि भज ही लेंगे तो वह उठकर गर्दन ही तो काटेगा। ऐसे सोते शेर को कौन जगाये?

मानस ४/२६ में कहते हैं- निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ, सुर महि गो द्विज लागि। प्रभु अपनी इच्छा से ही अवतार लेते हैं; लेकिन उनकी इच्छा तब होती है जब सुर, महि, गो और द्विज पर संकट आता है। आगे चलकर भगवान केवल गो द्विज हितकारी जय असुरारी (१/१८५/छन्द)- मात्र गो और द्विज के हितैषी रह जाते हैं। मनुष्यों में भगवान ब्राह्मण वर्ण की पुकार सुनते हैं, जो केवल भारत में पाया जाता है। ऐसे भगवान से विश्व के अन्य मानवों को क्या लेना-देना? अन्य वर्ग और मज़हब उसके लिए क्यों आँसू बहाये? फिर भारत विश्वगुरु कैसे? अतः विचारणीय है कि वह द्विज कौन है जिनके लिए भगवान अवतार लेते हैं?

वास्तव में मानस का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि भगवान ‘गो द्विज हितकारी’ हैं; किन्तु जिस ब्राह्मण के लिए वे अवतरित होते हैं वह संसार में प्रचलित कोई जाति नहीं अपितु योग-साधना की स्थिति है, जैसा कि भागवत तथा महाभारत की पंक्तियों में आपने देखा। मानस के अनुशीलन से स्पष्ट है कि अवतार लेने से परिनिर्वाण के ग्यारह हजार वर्ष की अवधि में परमात्मा राम ने अपने श्रीमुख से न तो कभी गो-महिमा का गायन किया और न गो-संवर्द्धन की योजनाओं का सूत्रपात किया; न तो एक गोशाला खोली, न एक गाय लंका से छुड़ाया। जिस गो-हित के लिए अवतार लिया, उसका कभी नाम तक नहीं लिया कि अब हम आ गये हैं, तुम निश्चिन्त हो जाओ, तो कैसा गो-द्विज हितकारी?

परमात्मा ने जब अवतार लिया, जिन-जिन को तारा, वे सब के सब अधम निकले, उनमें कोई द्विज नहीं था। वनवास की ओर बढ़े तो मिला केवट-

लोक बेद सब भाँतिहि नीचा।

जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।। (२/१९३/३)

राम कीन्ह आपन जबही तें।

भयऊँ भुवन भूषन तबही तें।। (२/१९५/२)

केवट ने कहा कि समाज मेरी छाया भी नहीं छूता, ब्रह्मा ने भक्ति की रेखा हाथ में लिखी नहीं, लेकिन राम ने अपना लिया। तकदीर में नहीं लिखा है कोई बात नहीं, तकदीर में दो हाथ-पैरोंवाला मानव होना तो लिखा है, इतना काफ़ी है- बड़ें भाग मानुष तनु पावा। (७/४२/७) मनुष्य-शरीर उपलब्ध है तो केवल आप श्रद्धा से लग भर जायँ, पा जायेंगे। भगवान अनाथों के नाथ हैं, अधम उद्धारक हैं। आप लगें तो! केवट द्विज नहीं था। उसकी छाया पड़ जाने पर लोग स्नान करने पर पवित्र होते थे; किन्तु राम ने उसे अपनाया। यह नहीं कहा कि वहाँ दूर बैठ, बल्कि गले लगाया। तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।। (७/१९/३) अपने घर का दरवाजा ही राम ने उसके लिए खोल दिया। जो स्थान राम के हृदय में भरत के लिए था, वही उन्होंने केवट को दिया कि हमारा घर तुम्हारा घर है, आते-जाते रहना।

वनवासकाल में कोल-भीलों ने प्रभु की सेवा की। राम ने उन्हें भी अपनाया। गीधराज से मित्रता की- गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्ही जो जाचत जोगी। (३/३२/२) माँसाहारी अधम गीध की सेवाओं का उन्होंने मूल्यांकन किया। उसे वह गति दी, जो योगियों को दुर्लभ है। उसका दाह-संस्कार भगवान राम ने अपने हाथों से किया।

भगवान राम शबरी के आश्रम में गये। उसने अपना परिचय दिया- अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारी।। (३/३४/३) सबसे अधम कोल-भील आदिवासी, उसमें भी अधम नारी जाति, उसमें भी मैं बुद्धिहीन हर तरह से अधम हूँ। परमात्मा राम ने कहा- भामिनि! मैं तो केवल एक नाता जानता हूँ भक्ति का। भगतिवन्त अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी।। (७/८५/१०)- भक्तिमान् अत्यन्त नीच भी मुझे परमप्रिय है। भगवान भक्ति के रिश्ते से आते हैं न कि किसी जाति के रिश्ते से।

वाल्मीकीय रामायण के अनुसार जब राम ने शबरी को दर्शन दिया तो वह चरणों में गिर पड़ी। राम ने कुशलक्षेम पूछते हुए कहा- शबरी! तुम्हारी तपस्या सुचारु रूप से तो चल रही है। तुमने गुरुजनों की सेवा की थी, उसका फल तो मिल रहा है। जिन व्रतों को तुमने धारण किया था, उन नियमों का निर्वाह सुचारु रूप से हो तो रहा है। धर्म के नाम पर प्रचारित स्मृतियों में है कि शूद्र को भजन का अधिकार नहीं है जबकि राम शबरी की तपस्या, व्रत, नियम-संयम को दृढ़ा रहे हैं कि सुचारु रूप से तपस्या चल तो रही है। भगवान ने शबरी को परमगति प्रदान की, जबकि आये थे केवल द्विज के लिये।

तदनन्तर भगवान ने बन्दर और भालुओं को अपनाया। शरण में आने से पूर्व विभीषण ने हनुमान से पूछा कि भगवान क्या मुझ-जैसे निशाचर पर भी कृपा करेंगे? हनुमान ने विभीषण को सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा- कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।। (५/६/७); अस मैं अधम सखा सुनु, ….’ (५/७)- मैं इतना अधम हूँ फिर भी प्रभु ने मुझे अपनाया। तुम राजपरिवार के हो, तुम पर अवश्य कृपा करेंगे।

निशाचरों के अधम होने में कोई सन्देह ही नहीं है- अधम निसाचर लीन्हें जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई।। (३/२८/८) किन्तु जो भी निशाचर शरण में आये, प्रभु ने सबका कल्याण किया, सबको अपनाया। अवतार तो हुआ था विप्र के लिये; लेकिन राम ने उद्धार किया इन जनजातियों का, कोल-भीलों का, अधम निशाचरों का, आदिवासी वानर-भालुओं का, गीधों का, छाया निषिद्ध पुरुषों का- एक भी विप्र के सिर पर हाथ रखकर आश्वस्त नहीं किया। तारा अधमों को, जिनके लिए अवतार होता ही नहीं। वास्तव में यही द्विज हैं।

वस्तुतः अवतार किसी-किसी योगी के हृदय में होता है, बाहर नहीं। भगवान सचमुच विप्र हितकारी या द्विज हितकारी हैं; किन्तु यह द्विज कोई जाति नहीं, योग्यता है। जो ब्रह्म के परायण है वह विप्र है। ‘द्वि’ का अर्थ है द्वितीय, ‘ज’ का अर्थ जन्म- जिसने द्वितीय जन्म पाया है, भगवान उसके हितैषी हैं। एक जन्म तो वह है जो मल-मूत्र, पीव से सनी गर्भवास की अनन्त योनियों का भ्रमण है। यह शरीर छूटा तो पुनः दूसरा शरीर धारण कर लेंगे। इस प्रकृतिजन्य जन्म के विपरीत आत्मिक स्थिति का जन्म है, जब साधक उस ब्रह्म के भली प्रकार परायण हो जाता है, ईश्वरीय संकल्पों को अपने में धारण कर लेता है। एक बार ईश्वरीय संस्कारों का बीजारोपण हो गया तो उस बीज का कभी नाश नहीं होता। उस स्वल्प साधन के प्रभाव से वह हर जन्म में साधन ही करता है तथा कुछेक जन्मों के अन्तराल से वह वहीं पहुँच जाता है जो आत्मा का शुद्ध स्वरूप है। इसलिये जिसमें भी आंशिक आकार का बीजारोपण हो गया वह द्विज है, उसने द्वितीय जन्म पाया है।

जिसमें भी आत्मस्वरूप की जागृति है, वह द्विज है। भगवान उसके हितैषी हैं। जो भी परमात्मा की ओर अग्रसर हुआ, वह उसी की पुकार सुनते हैं, उसके लिये उतर आते हैं, उसका हित करते हैं। विप्र कौन है? जो ब्रह्म के परायण है। जो भी प्रभु के परायण अथवा आश्रित हुआ, प्रभु उसे देखते हैं, उसकी आत्मा से अभिन्न होकर उतर आते हैं। दूसरे शब्दों में-

सो केवल भगतन हित लागी।

परम कृपाल प्रनत अनुरागी।। (१/१२/५)

जो प्रणत हैं, समर्पित हैं, वही विप्र हैं। प्रभु उन पर अनुराग रखते हैं। राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किये साधु सुखारी।। (१/२३/१) भक्त के हित के लिए भगवान उस भक्त के शरीर को धारण कर लेते हैं। महापुरुषों की टूटी-फूटी सेवा के सौजन्य से जिस दिन से वे हृदय में जागृत हो जाते हैं, साधक सद्गुणों का अर्जन करने लग जाता है, उस दिन से वह वैश्य है, द्विजत्व की प्रवेशिका में है।

भगवान ने जिन-जिन को तारा, वे सब के सब विप्र थे। तारा था अधमों को क्योंकि वे सब विप्र थे। ‘मानस’ के अनुसार ब्राह्मण योगपथ की एक अवस्था है। भक्त के लिये अवतार, विप्र के लिए अवतार पर्यायवाची हैं। सृष्टि में कहीं भी मनुष्य है, प्रभु के लिए विरही होकर, प्रणत बनकर लगता है, उसी के लिये अवतार है। विप्र, द्विज, ब्राह्मण आपके हृदय की एक योग्यता का नाम है।

जब से भगवान राम ने होश सँभाला, विप्रों के उद्धार में ही लगे रहे। अभी वे सुकुमार बालक ही थे कि बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। (१/२०५/२)- महान् ज्ञानी मुनि विश्वामित्र यज्ञ-रक्षार्थ राम और लक्ष्मण को माँगने दशरथजी के दरबार में आये तो दशरथजी अधीर हो उठे। बोले- चौथेपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी।। (१/२०७/२) विप्रवर! आपने विचार कर वचन नहीं कहा। दशरथजी विश्वामित्र को भली प्रकार पहचानते थे, समकालीन नरेश थे, दशरथजी के रिश्तेदारों में से थे; किन्तु दशरथजी ने उन्हें विप्र कहकर सम्बोधित किया। विश्वामित्रजी ‘महामुनि ज्ञानी’ थे। जो मुनि है, जिसकी इन्द्रियाँ मौन हैं, ईश्वरीय जानकारी जिसमें प्रसारित है, वही विप्र है। विप्र एक स्थिति है।

वनवासकाल में भगवान राम विविध ऋषियों के आश्रम में पहुँचे। कहीं राम ने ऋषियों को नमन किया, कहीं चरण स्पर्श किया; किन्तु एक वरिष्ठ मुनि वाल्मीकि मिल गये। मुनि को राम ने साष्टांग दण्डवत किया- मुनि कहुँ राम दण्डवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रवर दीन्हा।। (२/१२४/१) उन विप्रश्रेष्ठ ने आशीर्वाद दिया। वाल्मीकि मुनि थे। जिसकी मनसहित इन्द्रियाँ मौन हैं, परमात्मा में समाहित हैं, वही व्रिप्र है। शरीर से देखा जाय तो भील जाति करनी कठिन, धर्म सुना नहिं कान। सद्गुरु के कारन मिला, विप्र रूप सम्मान।। कोल-भीलों में शादी-विवाह, उठना-बैठना, करनी से चाण्डाल, कुलीनता के कोई लक्षण नहीं; किन्तु सद्गुरु की कृपा से उन्हें विप्र का स्वरूप एवं सम्मान प्राप्त हुआ।

ऋषियों के आश्रम में विचरण करते भगवान आगे बढ़े, तो हड्डियों का ढेर दिखाई पड़ा। राम को बड़ी दया लगी। जिज्ञासा की तो मुनियों ने बताया, निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए।। (३/८/८) निशाचरों ने ऋषि-मुनियों को खाया है कि भजन क्यों करते हो? किसी दुराचारी को उन्होंने दण्ड नहीं दिया था अपितु भजन करनेवालों को खा गये। सुनकर भगवान के नेत्र भर आये। भुजा उठाकर तुरन्त उन्होंने प्रण किया-

निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह।

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि, जाइ जाइ सुख दीन्ह।। (३/९)

उन्होंने प्रण किया कि पृथ्वी को मैं निशाचरों से रहित कर दूँगा। एक-एक मुनि के आश्रम में जाकर आश्वस्त किया, उन्हें सुख दिया। वास्तव में मुनि ही विप्र हैं। जो ब्रह्म के परायण है, परमात्मा उसी के लिए आते हैं, वह प्रणतपाल हैं अन्य कोई विधा नहीं। विश्वामित्र विप्र हैं, वाल्मीकि विप्र हैं, समस्त मुनिगण विप्र हैं- जिनके अस्थि-पंजरों को देखकर उन्होंने निसिचर हीन करउँ महि की प्रतिज्ञा की, उसे पूरा किया, अवतार का प्रयोजन पूरा हुआ। वास्तव में यही विप्र हैं। धरउँ देह नहिं आन निहोरे। (५/४७/८)- अन्य किसी प्रकार की पुकार पर वह शरीर धारण नहीं करते। मानस के अनुसार परमात्मा का आविर्भाव मानवमात्र के लिये समान रूप से उपयोगी है। आप केवल श्रद्धा से पकड़कर देखें और पायें।

गोस्वामीजी ने द्विज-हितैषी को ही प्रकारान्तर से गो-हितैषी कहा है। ‘गो’ कहते हैं मनसहित इन्द्रियों को। गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।। (३/१४/३) जहाँ तक मन उड़ान भर सकता है, वह सब माया है। परमात्मा इन इन्द्रियों की सीमा से परे है। जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं। (४/९/छन्द) मुनिलोग इन्द्रियों को विषय-रस से शून्य करके ही ध्यान में प्रभु को देख पाते हैं। अपनी बुद्धि से साधक इन्द्रियों को वश में नहीं कर सकता। इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है, इसे पकड़कर प्रभु स्वयं संचालित करने लगते हैं तभी ये वश में होती हैं, तभी इन्हें पुनः इन्द्रियों का रूप धारण नहीं करना पड़ेगा, तभी सहज स्वरूप मिलेगा। इन्द्रियों को संयत करने के लिए ही भगवान का आविर्भाव होता है। माया गुन गो पार (१/१९२)- भगवान माया से परे हैं। माया का दूसरा स्वरूप है त्रिगुणमयी प्रकृति, इसीलिए भगवान गुणों से परे हैं। माया का तीसरा स्वरूप है इन्द्रियाँ, अतः प्रभु इन्द्रियों से परे हैं। माया से अतीत होना, गो से अतीत होना, गुणों से अतीत होना एक ही प्रक्रिया है। गो से अतीत हुए बिना कोई गुणों से अतीत नहीं हो सकता। गुणों से अतीत हुए बिना कोई माया से अतीत नहीं हो सकता। साधक के संयम की ये क्रमोन्नत अवस्थाएँ हैं। इनको पार करने पर ही भगवत्ता का दर्शन होता है, न कि गाय चराने से।

निशाचरों के आतंक से पृथ्वी त्रस्त हो उठती है तो प्रभु अवतार लेते हैं। धड़ धरती का एकै लेखा। जो बाहर सो भीतर देखा।। जो कुछ हृदय-देश में है, उसी का विस्तार बाहर पृथ्वी पर है। गोस्वामीजी ‘विनयपत्रिका’ (पद १२४) में लिखते हैं-

असन बसन पसु बस्तु बिबिध बिधि, सब मनि महँ रह जैसे।

सरग, नरक, चरअचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे।।

जिस प्रकार भोजन, वस्त्र, सुख-समृद्धि की व्यवस्थाएँ एक ही बहुमूल्य मणि के अन्तराल में निहित हैं, ठीक इसी प्रकार स्वर्ग, नरक, अपवर्ग इत्यादि मन के अन्तराल में रहते हैं। जब जिसका क्रम आता है मन उसे प्रकट करता रहता है। जब यह पृथ्वी ग्लानि से भर उठती है, साधक अपने बल पर बुराइयों से पार नहीं पाता तो प्रभु की शरण जाता है। प्रभु उसके हृदय में अपने अवतरण की रचना करते हैं, साधक की आत्मा से रथी बन जाते हैं और उसके शरीररूपी धरती का उद्धार करते हैं।

प्रभु अवतार लेते हैं ब्राह्मणों के लिए; किन्तु रक्षा करते हैं देवताओं की। अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ हैं- दैवी सम्पद् तथा आसुरी सम्पद्। परमदेव परमात्मा से मिलानेवाली दैवी सम्पत्ति को प्रभु स्थिरता प्रदान करते हैं, असुर मारि थापहिं सुरन्ह– प्रभु जब करुणार्द्र होकर उतर आते हैं तो आसुरी सम्पद् जो अवरोध है, उसे समाप्त कर देते हैं, दैवी सम्पद् स्थिर करते हैं। राखहिं निज श्रुति सेतु (१/१२१)- वैदिक पथ में जो भ्रान्तियाँ हैं उसे दूर कर देते हैं, श्रुति-सेतु को पुनः प्रशस्त कर देते हैं, अपने यश का विस्तार कर देते हैं- यही रामजन्म का हेतु है। अतः गो-हितैषी, द्विज-हितैषी, पृथ्वी-हितैषी, देव-हितैषी, सन्त-हितैषी, भक्त-हितैषी इन सबका एक ही अर्थ है, एक ही साधक की क्रमोन्नत अवस्थाएँ हैं।

विप्र के स्वरूप को लेकर समाज में भ्रान्तियाँ देखने को मिलती हैं। अनेक सहृदय विद्वान् भी इन प्रकरणों पर आक्षेप करते रहते हैं। उदाहरण के लिये डा. राममनोहर लोहिया ने कहा था- निःसन्देह रामचरितमानस सम्पूर्ण भारतीय समाज को एकता के सूत्र में गूँथ सकता है; किन्तु गोस्वामीजी से दो-एक भूल हो गई, जैसे- स्त्रियों की निन्दा और ब्राह्मणों के प्रति पक्षपात। लगता है उन महापुरुष से यह भूल करायी गयी है कि-

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना।

सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। (३/३३/२)

शूद्र ज्ञान और गुण में प्रवीण हो तब भी ताड़न योग्य है। वास्तव में मानस एक योगशास्त्र है, जिसे योगीजन ही यथार्थ जानते हैं और उनके निर्देशन में कोई क्रियावान् साधक ही उसे समझ सकता है। केवल भाषा-वैदुष्य किंवा बुद्धि के बल पर इसे कोई नहीं समझ सकता। अतः प्रखर विद्वान् होते हुए भी डाक्टर साहब का यह आक्षेप स्वाभाविक ही है।

भागवत में श्रुतदेव ब्राह्मण को भगवान ने समझाया था कि मेरे साथ आनेवाले ये महर्षि जगद्गुरु हैं, जगत् का कल्याण करते विचरण कर रहे हैं, इनकी चरण-पूजा से ही मेरी पूजा होती है। यही भगवान राम ने कबन्ध को बताया, यही शरणागत विभीषण को बताया कि ते नर प्रान समान मम, जिन्ह के द्विज पद प्रेम। (५/४८) सन्त-महिमा में नारद तथा भरत को भी यही समझाया कि मेरी पूजा करनी है तो विप्र की पूजा करो। प्रस्तुत है कबन्ध प्रकरण-

श्रीराम सीता की खोज में दण्डकारण्य से मतंग ऋषि के आश्रम की ओर बढ़े कि चौड़ी छातीवाले विशालकाय राक्षस कबन्ध पर उनकी दृष्टि पड़ी। कबन्ध अर्थात् धड़मात्र उसका स्वरूप था। पेट में ही दहकती हुई दो आँखें, दो विशाल भुजाएँ और बिना पैरों के लुढ़ककर चलनेवाले विकराल राक्षस ने श्रीराम और लक्ष्मण को एक ही हाथ से पकड़कर विवश कर दिया। लक्ष्मण अधीर हो उठे। श्रीराम ने उन्हें सान्त्वना दी। दोनों भाइयों ने मिलकर कबन्ध के हाथ काट डाले तथा शरीर को एक गड्ढे में डालकर उसमें आग लगा दी। राम के हाथों मरते ही कबन्ध ने दिव्य शरीर धारण कर लिया। उसने बताया-

दुरबासा मोहि दीन्ही सापा।

प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।। (३/३२/७)

भगवान राम को कबन्ध की यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने कहा- ‘गन्धर्व! तुमसे यह भूल कैसे हो गई? तुम तो ज्ञानी थे, विप्र का अपमान कैसे कर बैठे?’’ गन्धर्व ईश्वरीय पथ का वह गायक है, श्वास का तार जिसकी पकड़ में आ गया हो। ऐसा साधक प्रायः उच्छृङ्खल हो जाता है। इतने को ही उपलब्धि मानकर वह महापुरुषों का अपमान करने की भूल कर बैठता है। कुछ ऐसी ही भूल कबन्ध से भी हुई थी। श्रीराम ने उसे अपना धर्म समझाया-

मन क्रम बचन कपट तजि, जो कर भूसुर सेव।

मोहि समेत बिरंचि सिव, बस ताकें सब देव।। (३/३३)

मन, कर्म और वचन से छल-कपट त्यागकर जो विप्र के चरण-कमलों की सेवा करता है, ब्रह्मा, शिव और चराचर देवताओं सहित मैं परमात्मा उसके वश में हो जाता हूँ। केवल एक ही सूत्र याद रखना है, वह है विप्र के चरण-कमलों की सेवा। चिन्ता न करें, न तो आपसे कभी विंध्यवासिनी माई रुष्ट होंगी और न कभी कोई अन्य देवता। केवल विप्र के चरण-कमलों की पूजा करते रहें तो परमतत्त्व परमात्मा तक विदित हो जायेगा। इतना अवश्य याद रखें-

सापत ताड़त परुष कहन्ता।

बिप्र पूज्य अस गावहिं सन्ता।। (३/३३/१)

शाप देता हुआ, प्रताड़ित करता हुआ, अपशब्द कहता हुआ, शील और गुण दोनों से हीन होने पर भी विप्र पूजनीय है। तथा-

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना।

सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। (३/३३/२)

ऐसी मान्यता थी भगवान राम की; किन्तु जब ज्ञात हुआ कि सीता का अपहरणकर्त्ता रावण एक ब्राह्मण है, तो उसकी वह दुर्गति की कि रहा न कुल कोउ रोवनिहारा। (६/१०३/१०)- उस रावण के कुल में कोई जलदाता या आँसू बहानेवाला न बचा। लगता है इस मर्यादा के रचयिता भगवान स्वयं उस पर आरूढ़ नहीं हैं। राम उसे स्वयं मारते तो कदापि आपत्तिजनक न होता, क्योंकि समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। (१/६८/८) अथवा प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा।। (३/१६/१४) किन्तु राम के अनुयायी बन्दर-भालुओं ने रावण के वंश का मूलोच्छेदन कर डाला। यज्ञ करते रावण को लातों से मारा, उसकी नारियों के केश पकड़कर बाहर घसीटा। राम कम से कम अपने अनुयायियों से तो कहते कि ब्राह्मण पूजनीय है।

रावण चारों वेदों का प्रकाण्ड विद्वान् था, ज्योतिष का मर्मज्ञ था, ब्रह्मा के लेख को पढ़कर उसे अपनी आयु का ज्ञान था। निःसन्देह रावण गुणी था, यद्यपि शील का अभाव था। गुणों के अनुरूप उसका आचरण नहीं था। राम तो शील-गुण दोनों से हीन ब्राह्मण को भी पूज्य मानते थे। वे स्वयं अपने नियम का पालन नहीं करते। वस्तुतः गोस्वामी तुलसीदासजी कहना क्या चाहते हैं?

ब्राह्मणों में भी उत्तम कुल वाले महर्षि पुलस्ति के पुत्र विश्रवा का पुत्र था रावण। उसका छोटा भाई विभीषण राम की शरण में आया। उसे सन्देह था कि राम शरण देंगे अथवा नहीं? किन्तु राम ने अपना सिद्धान्त बताते हुए उसे आश्वस्त किया-

सगुन उपासक परहित, निरत नीति दृढ़ नेम।

ते नर प्रान समान मम, जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।। (५/४८)

जो मुझ सगुण का उपासक है, पर के हित में अनुरक्त है, वह नर मुझे अपने प्राणों के समान प्रिय है जिसका द्विज के चरण-कमलों में अटूट प्रेम है।

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें।

ताते तुम अतिसय प्रिय मोरें।। (५/४८/१)

विभीषण! तुम्हारे पास समस्त गुण हैं इसलिए तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो। मानस के मर्मज्ञजन विचार करें कि क्या विभीषण द्विज के चरण-कमलों का प्रेमी था? विभीषण अथवा उसके अनुयायी बन्दर-भालुओं में से किसी ने भी तो द्विज की सेवा नहीं की, तब यहाँ किस द्विज की सेवा पर राम बल दे रहे हैं?

वस्तुतः द्विज वह महापुरुष है जिसने द्वैत पर विजय पा लिया है। जो ब्रह्म-परायण है, आत्मसाक्षात्कार के लिए जो क्रियाशील है, वह ब्रह्मकुल में आ जाता है। साधना के पूर्तिकाल में जो ब्रह्म से परिपूरित है वही विप्र है, वही ब्राह्मण है, भूसुर है; महीसुर भी वही है। ऐसे महापुरुषों के लिए विधि-निषेध नहीं रह जाता। उसका मापदण्ड बाह्य क्रियाकलापों से नहीं अपितु आन्तरिक उपलब्धियों से होता है। उसकी वेशभूषा, उसका स्नान-ध्यान भी जनसाधारण से परे है। पूज्य महाराजजी कहते थे कि महापुरुष कब भजन करते हैं, इसे पास रहनेवाला साधक भी तब तक जान नहीं पाता जब तक वे स्वयं न बता दें। ऐसे महापुरुषों का आचरण साधकों के लिए निर्धारित आचरण से सर्वथा भिन्न होता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं-

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।

आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते।। (गीता, ३/१७)

जो पुरुष आत्मा में ही सन्तुष्ट, उसी में ओतप्रोत और उसी आत्मा में भली प्रकार स्थित है, उसके द्वारा कर्म किये जाने से न कुछ लाभ है, और यदि वह कर्म छोड़ दे तो न उसकी कोई हानि ही है; क्योंकि उसे जिस लक्ष्य को पाना था पा लिया है, उसी से आप्लावित है, उसी में स्थित है तो कर्म द्वारा अब किसे ढूँढ़े? अब तो ‘भजन हमार हरि करें, हम पायो विश्राम।’ ऐसे महापुरुष पेंशनीयर हो जाते हैं। महाराजजी कहते थे, ‘‘हो! मोके पेंशन मिल गई है, तुम लोग आपन देखो। बगैर किये कोई पायी न! भजनियाँ करै का परी।

बारि मथें घृत होइ बरु, सिकता ते बरु तेल।

बिनु हरि भजन न भव तरिअ, यह सिद्धान्त अपेल।। (७/१२२ क)

लेकिन हमार नकल मत करो।’’

किसी प्रोफेसर से कहा जाय कि वह रात दो बजे उठकर, बत्ती जलाकर पढ़े तो कितना हास्यास्पद होगा? महापुरुष के लिए विधान कुछ और ही है। सन्त कबीर ने उस रहनी पर प्रकाश डाला है-

अवधू बेगम देश है मेरा।

तहाँ न ईश्वर जीव न माया, पूजक पूज्य न चेरा।।

वहाँ ईश्वर-जीव का द्वैत नहीं है। पूजने योग्य कोई नहीं है, पूजनेवाला कोई नहीं। यही है विप्र! ऐसे ही महापुरुष थे जड़भरत। वे स्नान नहीं करते थे। ऐसे ही महापुरुष के सन्दर्भ में मानसकार लिखते हैं-

सापत ताड़त परुष कहन्ता।

बिप्र पूज्य अस गावहिं सन्ता।। (३/३३/१)

शाप देता हुआ, ताड़ना करता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी विप्र पूज्य है। महर्षि दुर्वासा का क्रोध प्रसिद्ध है। पूज्य महाराजजी भी कहा करते थे- ‘‘गाली देत न पावत शोभा! लेकिन करीं का? भगवान मोके आदेश दिये हैं कि गाली देइहै त कल्यान होइ जाई। कल फाँसी होनी है और आज मेरी छड़ी लग जाय तो फाँसी नहीं होगी, सजा चाहे जो हो जाय, इसीलिए ताड़ना देते हैं। नहीं तो मोके कहाँ शोभा है गाली देना।’’ ब्रह्म से परिपूरित ऐसे महापुरुष विप्र हैं, परमपूज्य हैं- सन्तों ने ऐसा गायन किया है। इनका आचार-विचार समाज से अलग रहता है। बाह्य आचरण को देखकर कोई उनकी अवहेलना न कर बैठे इसीलिए भगवान का आदेश है- पूजिअ बिप्र सील गुन हीना।

गुणातीत उस महापुरुष में कोई आचरण भी नहीं दिखाई पड़ता। तत्त्व विदित है, सत्ता अलग है ही नहीं तो किसके लिए आचरण करे? उनके पास अध्ययन भी नहीं है, उनकी वाणी ही वेद है। जिसमें न शील है, न गुण है और न आचरण है, वह शूद्र नहीं तो और क्या होगा? किन्तु मानसकार कहते हैं- नहीं, वह सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना। (३/३३/२)- वह शूद्र नहीं बल्कि ज्ञान-प्रवीण है। हृदय में ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है। उस साक्षात् के साथ आत्मा से ओत-प्रोत और आत्मस्थित होने के कारण वे प्रवीण हैं। वे शूद्र दिखायी भर पड़ते हैं, वस्तुतः वे परमपूज्य हैं। द्विज एक स्थिति-विशेष का नाम है।

सामाजिक परिवेश में जाति-प्रथा का निर्धारण चाहे जैसा हो; किन्तु धर्मग्रन्थों में ब्राह्मणत्व का निर्धारण जन्मना कभी नहीं रहा। वस्तुतः जो ब्रह्मपरायण है वह ऋषिकुल में आ जाता है। भजन के पूर्तिकाल में जो ब्रह्म से आप्लावित है, वही पूर्ण विप्र है। वही ब्राह्मणत्व की अधिकतम सीमा है।

वाल्मीकीय रामायण का प्रसंग है कि एक बार विश्वामित्रजी की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी आये, बोले- ‘‘आप ऋषि हुए।’’ विश्वामित्र को यह उपाधि अच्छी नहीं लगी। वह पुनः तपस्या में रत हो गये। देवताओं के साथ ब्रह्माजी पुनः आकर बोले- ‘‘आज से आप राजर्षि हुए।’’ फिर भी उनकी तपस्या को विराम नहीं मिला। ब्रह्मा ने उन्हें महर्षि की उपाधि दी, तब वे बोले- क्या आप मुझे जितेन्द्रिय ब्रह्मर्षि नहीं कहेंगे? ब्रह्माजी ने उत्तर दिया- अभी आप में वह क्षमता नहीं है। विश्वामित्र पुनः तपस्या में लग गये। तपस्या का धुआँ स्वर्ग तक पहुँच गया। ब्रह्मा पुनः देवताओं के साथ आये और बोले- विश्वामित्र! हठ छोड़ दें, आज से आप ब्रह्मर्षि हुए। विश्वामित्र ने निवेदन किया- ‘‘यदि मैं ब्रह्मर्षि हो गया तो वशिष्ठजी आकर प्रमाणित करें और वेद हमारा वरण करे।’’

ब्रह्माजी ने ‘तथास्तु’ कहा। वशिष्ठजी ने समर्थन दिया और वेद विश्वामित्रजी के हृदय में उतर आया। वेद कोई पुस्तक नहीं है कि अध्ययन से आ जाय। वस्तुतः जिस परमतत्त्व की हमें चाह है, चिन्तनकाल में उसी का विदित हो जाना ही वेद है। तब वह महापुरुष जानता है कि ईश्वर कैसे चलता है, कैसे सुनता है, कैसे रहता है? कर बिनु करम करइ बिधि नाना। (मानस, १/११७/५)- तो भला किस प्रकार? इसको वही जानता है जिसके हृदय में वेद उतर आया है, वही विप्र है। इस कथानक से भी यह स्पष्ट है कि ब्राह्मण कोई जन्म से नहीं होता अपितु तपस्या के द्वारा अर्जित उपाधि है। भागवत, महाभारत, भगवान वाल्मीकि तथा गोस्वामी तुलसीदासजी सबका निर्णय एक है।

वनवासी और विरही राम से नारद ने अपने मन की एक कसक का समाधान चाहा कि आपने मुझे विवाह क्यों नहीं करने दिया? भगवान ने बताया कि जैसे शिशु की रक्षा माता करती है, वैसे ही मैं अपने भक्त की रक्षा सदैव करता हूँ। नारदजी के मन में कौतूहल हुआ कि मुझमें वे लक्षण हैं भी अथवा नहीं, अतः उन्होंने पूछ लिया कि भगवन्! जिन सन्तों की आप रक्षा करते हैं उनके लक्षण क्या हैं? प्रभु ने बताया-

सुनु मुनि सन्तन्ह के गुन कहऊँ।

जिन्ह ते मैं उन्ह के बस रहऊँ।।

षट बिकार जित अनघ अकामा।

अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।। (३/४४/७)

सन्त काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मत्सर इन छः विकारों पर विजय प्राप्त किये रहते हैं। वे पाप से रहित, कामनाओं से रहित, पवित्र और सुख के धाम होते हैं। इसी सन्दर्भ में उन्होंने बताया-

बिरति बिबेक बिनय बिग्याना।

बोध जथारथ बेद पुराना।। (३/४५/५)

वे विरक्त हैं- किसी में कहीं लगाव नहीं, वे विवेकी हैं- अपने पथ का उन्हें यथार्थ बोध है। वे निरन्तर चिन्तनपरायण हैं।

जप तप ब्रत दम संजम नेमा।

गुरु गोविन्द बिप्र पद प्रेमा।। (३/४५/३)

जप-तप, संयम-नियम, गुरु गोविन्द तथा विप्र के चरणों में प्रीति इत्यादि सन्त के लक्षण हैं। विचारणीय है कि जो विरक्त है, घर छोड़ा, द्वार छोड़ा वह किस विप्र का चरण धारण करेगा? क्या किसी गृहासक्त का? नहीं, विश्वामित्र की तरह तपस्या में जिसने ब्राह्मणत्व अर्जित किया हो, वस्तुतः ऐसा विप्र ही सद्गुरु है। उसी के पास विश्व को कुछ सिखाने के लिए है।

राज्याभिषेक के पश्चात् भगवान राम एक बार अमराई में बैठे थे। भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान इत्यादि सेवा में थे कि सहसा चार ऋषि दिखाई पड़े। राम खड़े हो गये। पीताम्बर बिछाया। जब तक वह सब रहे, सेवकों के होते हुए भी राम स्वयं उनकी सेवा में रहते। यह देख भरतजी को कौतूहल हुआ कि इसी सन्त-वेष में माँ सीता की चोरी हुई, इसी वेष ने भाई लक्ष्मण की मृत्यु का भरसक प्रयास किया, फिर भी राम सेवा में खड़े हैं। भरत ने हनुमान के माध्यम से अनुमति ले प्रश्न रखा कि सन्तों की महिमा वेद-पुराण में है, आपने भी उनकी सराहना की है, उन सन्तों के लक्षण कैसे होते हैं? भगवान ने कहा, ‘‘भाई! सन्तों के लक्षण तो अगणित हैं। वे विषयों से विरक्त, गुण और भक्ति के निधान, मदरहित तथा अजातशत्रु होते हैं।

सम अभूतरिपु बिमद बिरागी।

लोभामरष हरष भय त्यागी।। (७/३७/२)

सीतलता सरलता मयत्री।

द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री।। (७/३७/६)

वे लोभ, अमर्ष, हर्ष तथा भय से रहित होते हैं। उनमें शीतलता है, सरलता है, सर्वत्र मैत्रीभाव है और द्विज के चरणों में अटूट प्रीति है। द्विजपद प्रीति ही धर्म की जन्मदात्री है। विचार करें, घर-द्वार छोड़कर एकान्तसेवी, परम विरक्त किस द्विज का चरण हृदय में धारण करे?

वस्तुतः द्विज एक स्थिति-विशेष है। यह सन्त की अवस्था है, परम से संयुक्त महापुरुष की अवस्था है। इन्हीं सन्तों को भूसुर, महीसुर, महिदेव इत्यादि उपाधियों से सम्बोधित किया गया है। मानस के मंगलाचरण में गोस्वामीजी ने सर्वप्रथम महीसुर के चरणों की वन्दना की-

बन्दऊँ प्रथम महीसुर चरना।

मोह जनित संसय सब हरना।। (१/३)

सर्वप्रथम मैं पृथ्वी के देवता विप्र के चरण-कमलों की वन्दना करता हूँ, जो मोह से उत्पन्न समस्त संशयों का हरण कर लेते हैं। यही है विप्र की परिभाषा! किन्तु जो स्वयं मोहाच्छादित है वह दूसरों का मोह क्या हरेगा? स्वयं दलदल में फँसा जीव दूसरों को क्या निकालेगा? जन्मना ब्राह्मणत्व का निर्धारण करनेवाले समाज के तथाकथित ठेकेदार क्या मोहजनित संशयों का शमन करने में सक्षम हैं? मानस में स्थान-स्थान पर महीसुर को सन्त का पर्याय माना गया है। ऐसे ही सन्त (सद्गुरु) की शरण तथा उनका सान्निध्य जब प्राप्त हुआ तो ‘बालमीकि भए ब्रह्म समाना।’ (२/१९३/८)- ऐसे ही द्विज की सेवा से वाल्मीकि, नारद, घटयोनि अगस्त्य, भरद्वाज इत्यादि त्रिकालज्ञ ब्रह्मर्षि पद पा गये, जबकि शरीर से ये सब बहुत कुलीन नहीं थे।

वस्तुतः ब्राह्मण, सद्गुरु अथवा ब्रह्मर्षि पर्यायवाची हैं। क्रियात्मक पथ पर चलकर ब्रह्म की अनुभूति करनेवाले ब्राह्मण हैं। वह क्रिया है केवल एक परमात्मा में निष्ठा। उस परमात्मा के शोध का स्थल है केवल अपना हृदय तथा शोध का विधान है केवल श्वास द्वारा परमात्मा के किसी दो-ढाई अक्षर के नाम राम अथवा ॐ का जप तथा उस नाम के अर्थस्वरूप किसी स्थितिवाले महापुरुष (सद्गुरु) के स्वरूप का चिन्तन एवं उनकी सेवा। इस क्रिया से चलकर आत्मस्वरूप में स्थित होनेवाले महापुरुष वर्ण से ऊपर उठ जाते हैं; किन्तु उन्हें विप्र के अतिरिक्त कहा भी क्या जाय? इसलिए इन स्वरूपस्थ महापुरुषों की उपाधि ब्राह्मण है।

गीता मेंब्राह्मणका स्वरूप

चार वेद, छहों शास्त्र, भागवत, महाभारत इत्यादि सब कुछ लिपिबद्ध करने के पश्चात् भगवान व्यास ने विचार किया कि इनमें मूलशास्त्र कौन है? उन्होंने स्वयं का सुविचारित मत बताया कि गीता भली प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है क्योंकि यह पद्मनाभ भगवान के श्रीमुख से निःसृत परमात्मा की वाणी है। अस्तु, अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता है? गीता में है-

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।

एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात् कृतकृत्यश्च भारत।। (१५/२०)

गोपनीय से भी यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। इसे जानकर तू ज्ञानवान् तथा कृतार्थ हो जायेगा। अतः हमारा मूलशास्त्र गीता है। शेष शास्त्र तो गीता की अनुकृति हैं। इस गीता में भी तीन-चार स्थानों पर ब्राह्मणत्व पर प्रकाश डाला गया है।

गीता के अनुसार ब्राह्मण एक स्थिति है। भगवत्-पथ में चार स्तर हैं- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। साधक को चारों स्तर पार करना पड़ता है। जिसने इस चिन्तन-पथ में प्रवेश नहीं किया वह शूद्र भी नहीं है। योगेश्वर ने कर्म को चार भागों में बाँटा, जो साधक के वर्ण का निर्धारण करते हैं। वह कर्म परमात्मा के दर्शन की साधना-पद्धति है। इसी चिन्तन-पथ का सर्वोत्कृष्ट स्तर ब्राह्मण है।

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।। (१८/४१)

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- इन चारों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किये गये हैं। स्वभाव परिवर्तनशील है। आज का उच्छृङ्खल स्वभाववाला कल सौम्य हो सकता है। वाल्मीकि तथा अंगुलिमाल जैसे व्यक्ति जीवन्मुक्त महापुरुष के रूप में बदल गये। अस्तु, गीता के अनुसार कर्म एक ही है- विहित कर्म, नियत कर्म जो आत्मदर्शन, योग-साधना की निर्धारित विधि है। इस क्रिया के आरम्भ में प्रत्येक प्राणी शूद्र है- परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्। (१८/४४) वह सेवा करे। दीर्घकाल तक सेवा के परिणामस्वरूप साधन सूक्ष्म होने लगता है। कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् (१८/४४) आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। इसका संग्रह गोरक्षा अर्थात् इन्द्रिय-संयम के साथ होने लगता है। क्रमशः शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।– शौर्य, तेज, पराक्रम, धैर्य, चिन्तन में दक्षता, आसुरी वृत्तियों से युद्ध में पीछे न हटने का स्वभाव, समर्पण, ईश्वरभाव, सब जीवों पर स्वामीभाव इत्यादि क्षात्रं कर्म स्वभावजम् (१८/४३)- क्षत्रिय श्रेणी के स्वभावजन्य कर्म हैं। जहाँ साधना और सूक्ष्म हुई तो वह कर्त्ता ब्राह्मण श्रेणी का हो जाता है।

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।। (१८/४२)

शम, दम, यम, नियम, तप, शुद्धता, ईश्वरप्रदत्त जानकारी अर्थात् विज्ञान, उस पर भली प्रकार चलने की क्षमता- यह ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं। जब यह दक्षता स्वभाव में ढल जाय, वह ब्राह्मण है। ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाले ये नौ गुण जिसमें स्वभाव से ही कार्यरत हैं वह ब्राह्मण श्रेणी का कर्त्ता है। ब्रह्म में प्रवेश और स्थिति के साथ ही वह किसी श्रेणी के कर्म का कर्त्ता नहीं रह जाता। जिसे पाना था पा लिया, जब आगे कोई सत्ता नहीं है तो क्रिया करके और किसे ढूँढ़े? आदि शंकराचार्य इसी स्तर पर पहुँचकर कह उठते हैं- न ब्राह्मणो न क्षत्रियः न वैश्यो न शूद्रश्चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्– अब मैं न शूद्र हूँ, न वैश्य हूँ, न क्षत्रिय हूँ, न ब्राह्मण हूँ- चित्त परम आनन्द स्वरूपमय है। मैं कैवल्यधाम, कल्याणस्वरूप शिवमात्र शेष हूँ। यह अवस्था सबको मिलनी है।

अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का था। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उसे ब्राह्मणत्व अर्जित करने की प्रेरणा दी-

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।। (२/४५)

अर्जुन! वेद तीनों गुणों तक ही प्रकाश कर पाते हैं। इसके आगे का हाल वे नहीं जानते। इसलिये तू तीनों गुणों से ऊपर उठ। बढ़ने की विधि बताते हैं कि निर्द्वन्द्वः– सुख-दुःख के द्वन्द्वों से रहित, नित्य सत्य वस्तु में स्थित, योगक्षेम को न चाहता हुआ, आत्मपरायण हो। हमीं बढ़ेंगे या कोई बढ़ा भी है? आगे बढ़ेंगे तो कहाँ पहुँचेंगे? इस पर कहते हैं कि जो वेद और गुणों से आगे बढ़ता है वह ब्राह्मण है-

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।

तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।। (२/४६)

सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर मनुष्य का छोटे जलाशय से जितना प्रयोजन शेष रहता है, अच्छी प्रकार ब्रह्म को जाननेवाले ब्राह्मण का वेदों से उतना ही प्रयोजन रह जाता है। अर्थात् जो वेदों से ऊपर उठता है, ब्रह्म को जानता है, वही ब्राह्मण है। श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! तू ब्रह्म को जान, ब्राह्मण बन। अतः पूर्ण जानकारी के साथ ब्राह्मणत्व मिलनेवाली एक स्थिति है। क्षत्रिय श्रेणी का अर्जुन इसका अधिकारी है। वास्तव में अनुरागी ही अर्जुन है। जिस घट में अनुराग होगा वह पा जायेगा और इस प्रकार से सभी सच्चे रूप में इस पथ के अधिकारी हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण अत्यन्त दुराचारी को भी भली प्रकार कल्याण का उपदेश देते हैं- गीता, ९/३०।

इस यौगिक आत्मदर्शन, ब्रह्मदर्शन की क्रिया को योगेश्वर कर्म कहते हैं। कर्म क्या है? अकर्म क्या है? विकर्म को भी भली प्रकार समझ लेना चाहिए। इसी सन्दर्भ में उसके अनुष्ठान का तरीका बताया-

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।। (४/१९)

अर्जुन! ‘यस्य सर्वे समारम्भाः’- जिस पुरुष के द्वारा सम्पूर्णता से आरम्भ की हुई क्रिया क्रमशः उत्थान होते-होते इतनी सूक्ष्म हो गई कि कामना और मन के संकल्प-विकल्प से ऊपर उठ गई (संकल्पों का चढ़ाव-उतार मन के ऊपर है, जब इसका केन्द्र मन ही समाप्त हो गया) तहाँ ज्ञानाग्नि दग्धकर्माणम्– जिसको नहीं जानता था और जानना चाहता था उसकी जानकारी हो जाती है। उस प्रत्यक्ष जानकारी का नाम ज्ञान है। उस ज्ञान की अग्नि में कर्म सदा-सदा के लिये जल जाते हैं। ऐसी स्थितिवाले को बोधस्वरूप महापुरुषों ने पण्डित कहकर सम्बोधित किया है। वह पूर्ण ज्ञाता है इसलिए पण्डित है। उस पण्डित की रहनी कैसी होती है?-

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।। (५/१८)

ज्ञान के द्वारा जिनका पाप शमन हो चुका है ऐसे ज्ञानीजन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण तथा चाण्डाल में; गाय, हाथी और कुत्ते में समान दृष्टिवाले होते हैं। उनकी दृष्टि में विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण न तो कोई विशेषता रखता है और न चाण्डाल कोई हीनता रखता है। न गाय धर्म है और न कुत्ता अधर्म। उनकी दृष्टि शरीर पर नहीं पड़ती बल्कि हृदयस्थित आत्मा पर पड़ती है। अन्तर इतना ही है कि कोई परमात्मा के अधिक निकट है तो कोई थोड़ा दूर; किन्तु हैं सभी उसी पद के प्रत्याशी। जिन विप्रों की चरणों की पूजा भगवान राम ने बतायी, उन सर्वज्ञ विप्रों का यही स्वरूप है।

भगवान महावीर

भक्ति-पथ में प्रवेश के साथ ही जीव का जो क्रमोन्नत विकास है, उसी का नाम वर्ण है। जो आकृति उभरकर सामने आती है उसी का चित्रण प्रत्येक महापुरुष की वाणी में मिलता है। अतः ढाई हजार वर्ष से भी अधिक समय पूर्व भगवान महावीर ने भी उसी सत्य को सम्बोधित किया जो पूर्वातिपूर्व वैदिक ऋषियों से लेकर वाल्मीकि, व्यास इत्यादि महापुरुषों ने कहा। जो गीता का उद्घोष है, भागवत का जो निर्णय है ठीक वही अनुभूति भगवान महावीर को तपस्या द्वारा प्राप्त हुई। ब्राह्मण के स्वरूप के सम्बन्ध में विचार अक्षरशः वही है जो उनके पूर्वपुरुष भगवान ऋषभ, भगवान श्रीकृष्ण के थे। ‘उत्तराध्ययन’ के ‘यज्ञीय सूत्र’ में अपने प्रिय शिष्य गौतम की अनेक शंकाओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए कहा-

)  जो प्रिय स्वजनादि के आने पर आसक्त नहीं होता और न जाने पर शोक करता है, जो आर्यवचन अर्हत् वाणी में रमण करता है उसे हम ब्राह्मण कहते हैं।

)  जो राग, द्वेष और भय से मुक्त है उसे हम ब्राह्मण कहते हैं।

)  जो देव, मनुष्य और तिर्यक् सम्बन्धी मैथुन का मन, वचन और शरीर से सेवन नहीं करता, उसे हम ब्राह्मण कहते हैं।

)  जिस प्रकार जल से उत्पन्न कमल जल से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार जो काम भोगों से अलिप्त रहता है, उसे हम ब्राह्मण कहते हैं।

जो रसादि में लोलुप नहीं है, जो निर्दोष भिक्षा से जीवन-निर्वाह करता है, जो गृहत्यागी है, जो अकिंचन है, गृहस्थी में अनासक्त है उसे हम ब्राह्मण कहते हैं।

जो स्वजाति की आसक्ति तथा बान्धवों को छोड़कर पुनः उसी में आसक्त नहीं होता, उसे हम ब्राह्मण कहते हैं।

) कर्म से ब्राह्मण होता है, कर्म से क्षत्रिय होता है, कर्म से वैश्य तथा कर्म से ही शूद्र होता है।

अर्हत् ने इस तत्त्वों का निरूपण किया है। इसके द्वारा जो साधक पूर्ण होता है, कर्मों से मुक्त होता है उसे हम ब्राह्मण कहते हैं।

जो अपना और दूसरों का उद्धार करने में समर्थ है उसे हम ब्राह्मण कहते हैं।

१०)     सच्चरित से ही सच्चा ब्राह्मण होता है। जाति से कोई मानव ब्राह्मण नहीं होता। न जाति से कोई क्षत्रिय है, न वैश्य है, न शूद्र है।

इस प्रकार भगवान महावीर की वाणी पूर्व महापुरुषों के पदचिन्हों का अनुसरण तथा गीता का अनुवाद मात्र है। राजकुमार तथा विज्ञ विद्वान् होते हुए भी जनता के लिए उन्होंने अर्द्ध-मागधी भाषा का प्रयोग किया। अन्तर केवल भाषा का है, भाव का नहीं। अतः सबको आत्मदर्शन के लिये सक्रिय होना चाहिए।

भगवान बुद्ध

महावीर स्वामी के समकालीन महामानव गौतम बुद्ध की महिमा का इतना प्रसार हुआ कि आधा विश्व उनका अनुयायी हो गया। वह राजकुमार थे, विद्वान् थे फिर भी उन्होंने बोलचाल की भाषा क्षेत्रीय पाली भाषा का प्रयोग अपने उपदेशों में किया। उन महापुरुष ने वही निर्णय दिया जो भागवत का है, जो गीता का है, उपनिषदों का है, परम्परागत महापुरुषों का है। अश्वघोष के बुद्धचरित में उनकी उक्ति है कि चालीस उपवासों के उपरान्त रात्रि के चौथे पहर में मैंने उस अविनाशी पद को पाया, जो मुझसे पूर्व के ऋषियों ने पाया था। मैंने सर्वज्ञता प्राप्त की। ठीक यही गीता में है कि आत्मा ही अविनाषी है। वही सर्वज्ञ है। हमने उस सर्वज्ञ पद को प्राप्त किया, उस अविनाशी पद को प्राप्त किया जो मुझसे पहले के महर्षियों ने पाया। गौतम के पहले क्या बौद्धधर्म था? तो गौतम के पूर्व ऋषि कौन थे? वही जो हमारे-आपके थे- वही राम, वही कृष्ण, वही वैदिक मनीषी। उनसे भिन्न गौतम के पास कुछ भी नहीं है। ईश्वर एक, पाने की विधि एक, अनुभूति एक, तो दूसरा कोई कहे भी तो क्या? आन्तरिक योग्यता के स्थान पर समाज में जन्मना वर्ण-निर्धारण की पनप रही प्रवृत्ति पर कड़ा प्रहार उनके उपदेशों में है।

मज्झिम निकाय के वासेट्ठ सुत्त (२.५.८) में कथा आती है कि एक बार वशिष्ठ तथा भरद्वाज दो छात्रों में वार्त्ता चल पड़ी कि ब्राह्मण कैसे होता है? एक जन्म से तो दूसरा कर्म से ब्राह्मण होना प्रतिपादित कर रहा था। जब दोनों एक दूसरे को समझा न सके तो भगवान बुद्ध के पास निर्णय के लिए गये। भगवान ने बताया कि जिस प्रकार कीट-पतंग, छोटे-बड़े चौपाये, रेंगनेवाले जन्तु, जलचर, आकाशचारी जीवों की पृथक्-पृथक् जातियाँ हैं इस प्रकार का भेद मनुष्य-मनुष्य में नहीं है। न केश में न सिर में, न कान में न आँख में, न मुख में न नासिका में, न पीठ में न पेट में, न गोप्य स्थान में, न मैथुन इत्यादि में ही जाति का कोई पृथक् चिह्न मिलता है। मनुष्यों में जो गोरक्षा से जीविका करता हो, वशिष्ठ! ऐसे को कृषक जानो, ब्राह्मण नहीं। मनुष्यों में जो पुरोहिती से जीता है उसे याचक जानो, ब्राह्मण नहीं। माता और योनि से उत्पन्न होने के कारण मैं उसे ब्राह्मण नहीं कहता। मैं ब्राह्मण उसे कहता हूँ जो अपरिग्रही है। कमल के पत्ते पर जल और आरे की नोंक पर सरसों की भाँति जो भोगों में लिप्त नहीं होता, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ। तप, ब्रह्मचर्य, संयम और दम इनसे ब्राह्मण होता है।

गुरु नानक

ठीक इसी प्रकार गुरु नानक अपने समय के सर्वोपरि महापुरुष थे। स्थिति मिलने के पश्चात् उन्होंने मक्का मदीना तक की यात्रा की थी। भाई मरदाना इत्यादि अनेक मुसलमान भी उनके शिष्य थे। उनका कथन है- एक नूर ते सब उपज्या है, कौन भला को मन्दा। अतः वह मानवमात्र में भेदभाव नहीं मानते थे। उनका विचार था कि बन्दे एक खुदाय के हिन्दू मुसलमान। झगड़ा राम रहीम करि लड़दे बेईमान।। सर्वव्यापी परमात्मा राम के वह अनन्य भक्त थे। उनकी वाणी है- राम नाम उर में गह्यो, ताके सम नहिं कोय। जा सुमिरत संकट कटै, दरस तिहारो होय।। जिसके हृदय में राम- नाम उतर आया, उसके समान कोई नहीं है। इसी राम-नाम के सुमिरन से प्रभु आपका दर्शन हो जाता है। उन्होंने वही शिक्षा दी जो सभी ऋषियों ने कहा है, जो सद्गुरुओं की शिक्षा है, सीख है फिर भी लोग गुमराह करने में लगे हैं कि सिख अलग धर्म है। ब्राह्मण के बारे में गुरु नानक ने कहा- योग शब्द गियान शब्द ते ब्राह्मण– ज्ञान शब्द, योग शब्द- इनका जो मर्म जानता है वह ब्राह्मण है। जो योग की विधि जानता है वह ब्राह्मण है। जानकर चलनेवाला है वह ब्राह्मण है। ब्राह्मण योगपथ की अवस्था है। ठीक वैसा ही निर्णय, जैसा शमो दमस्तपः शौचम् (गीता, १८/४२) इत्यादि गीता का निर्णय है।

भजन द्वारा अर्जित योग्यताओं की नकल में जन्म द्वारा निर्धारित सामाजिक जाति-पाँति को धर्म मान लेने का व्यामोह कुछ अंशों में श्रीकृष्णकाल में भी था। युद्ध के मैदान में अपने स्वजनों को देख अर्जुन काँपने लगा। युद्ध से विरत होने के लिए वह धर्म की दुहाई देने लगा कि कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। (गीता, १/४०)- भगवन्! कुलधर्म सनातन धर्म है। उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः। (गीता, १/४३)- जाति धर्म है, यही शाश्वत है। अर्जुन ने कुलक्षय, पिण्डोदक-क्रिया का लोप, वर्णसंकर इत्यादि चार-पाँच आशंकाओं को गिनाया, जिसमें उसने जाति का भी नाम लिया कि जाति धर्म है। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने हँसते हुए कहा कि कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। (गीता, २/२) तुझे इस विषम-स्थल में यह अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हुआ? जितना कुछ अर्जुन ने कहा था, भगवान ने उसे अज्ञान ठहराया। अर्थात् जाति का व्यामोह भी धर्म नहीं अज्ञान है। इसके पश्चात् भगवान ने धर्म की विशद व्याख्या दी, जिसके लिए देखें ‘यथार्थ गीता’।

संक्षेप में गीता (२/१६-२९) में योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। परमात्मा ही सत्य है, शाश्वत है, अजर-अमर-अपरिवर्तनीय और सनातन है; किन्तु वह परमात्मा अचिन्त्य और अगोचर है, चित्त की तरंगों से परे है। चित्त का निरोध करके उस परमात्मा को पाने की विधि-विशेष का नाम यज्ञ है। यज्ञ योग साधना की विधि है। इस यज्ञ को चरितार्थ करना, कार्यरूप देना ही कर्म है, दायित्व है। इसे भली प्रकार आचरण में लाना ही आपका धर्म है। इसी कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि-

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।। (गीता, २/४०)

अर्जुन! इस कर्मयोग में आरम्भ का नाश नहीं है। इस कर्मरूपी धर्म का किंचित् मात्र साधन जन्म-मृत्यु के महान् भय से उद्धार करनेवाला होता है अर्थात् इस कर्म को कार्यरूप देना ही धर्म है।

इस नियत कर्म (साधन-पथ) को साधक के स्वभाव में उपलब्ध क्षमता के अनुसार चार भागों में बाँटा गया है। कर्म को समझकर मनुष्य जब से आरम्भ करता है, उस आरम्भिक अवस्था में वह शूद्र है। क्रमशः विधि पकड़ में आयी तो वही वैश्य है। प्रकृति के संघर्ष को झेलने की क्षमता और शौर्य आ जाने पर वही व्यक्ति क्षत्रिय और ब्रह्म के तदू्रप होने की क्षमता, ज्ञान (वास्तविक जानकारी), विज्ञान – ईश्वरीय वाणी का मिलना, उस अस्तित्व पर निर्भर करने की क्षमता – ऐसी योग्यताओं के आने पर वही ब्राह्मण है। इसीलिए योगेश्वर श्रीकृष्ण (गीता, अध्याय १८/४६-४७ में) कहते हैं कि स्वभाव में पायी जानेवाली क्षमता के अनुसार कर्म में लगना स्वधर्म है। हल्का होने पर भी स्वभाव से उपलब्ध स्वधर्म श्रेयतर है और क्षमता अर्जित किये बिना ही दूसरों के उन्नत कर्म का परिपालन भी हानिकारक है। स्वधर्म में मरना भी श्रेयस्कर है; क्योंकि वस्त्र बदलने से बदलनेवाला तो बदल नहीं जाता। उसके साधन का क्रम वहीं से पुनः आरम्भ हो जायेगा, जहाँ से छूटा था। सोपानशः चलकर वह परमसिद्धि अविनाशी पद को पा लेगा।

इसी पर पुनः बल देते हैं कि जिस परमात्मा से सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई है, जो सर्वत्र व्याप्त है, स्वभाव से उत्पन्न हुई क्षमता के अनुसार उसे भली-भाँति पूजकर मानव परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अर्थात् निश्चित विधि से एक परमात्मा का चिन्तन ही धर्म है (१८/४६)।

धर्म में प्रवेश किसको है? इसे करने का अधिकार किसको है? इसे स्पष्ट करते हुए योगेश्वर ने बताया कि-

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।। (गीता, ९/३०)

अर्जुन! अत्यन्त दुराचारी भी यदि अनन्य भाव से मुझे भजता है (अनन्य अर्थात् अन्य न), मुझे छोड़कर अन्य किसी को भी न भजकर केवल मुझे भजता है तो क्षिप्रं भवति धर्मात्मा (गीता, ९/३१)- वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है, उसकी आत्मा धर्म से संयुक्त हो जाती है। अतः श्रीकृष्ण के अनुसार धर्मात्मा वह है जो एक परमात्मा में निष्ठा से लग गया है, धर्मात्मा वह है जो एक परमात्मा की प्राप्ति के लिए नियत कर्म का आचरण करता है, धर्मात्मा वह है जो स्वभाव से नियत क्षमता के अनुसार परमात्मा की शोध में संलग्न है।

अन्त में निर्णय देते हैं कि सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। (गीता, १८/६६)- अर्जुन! सारे धर्मों की चिन्ता छोड़कर एक मेरी शरण में हो जा। अतः एक परमात्मा के प्रति समर्पित व्यक्ति ही धार्मिक है। एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर करना ही धर्म है। उस एक परमात्मा की प्राप्ति की निश्चित क्रिया को करना धर्म है। इस स्थिति को प्राप्त महापुरुष, आत्मतृप्त महापुरुषों का सिद्धान्त ही सृष्टि में एकमात्र धर्म है। उनकी शरण में जाना चाहिए कि उन महापुरुषों ने कैसे उस परमात्मा को पाया? किस मार्ग से चले? वह मार्ग सदा एक ही है, उस मार्ग से चलना धर्म है।

धर्म मनुष्य के आचरण की वस्तु है। वह आचरण केवल एक है- व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। (गीता, २/४१) इस कर्मयोग में निश्चयात्मक क्रिया एक ही है- इन्द्रियों की चेष्टा और मन के व्यापार को संयमित कर आत्मा में (परात्पर ब्रह्म में) प्रवाहित करना (गीता, ४/२७)।

गीता के अनुसार धर्म की सही व्याख्या को मान्यता दी जाय तो उसके अन्तराल में विभिन्न जातियाँ फूलेंगी-फलेंगी, विकास करेंगी। पूर्वजों ने कोई गौरव अर्जित किया, कोई पदक पाया, वह सम्मान ही तो ये जातियाँ हैं। पूर्वजों के अर्जित सम्मान को त्यागने की आवश्यकता नहीं है, उस वंश-मर्यादा की रक्षा भी की जाय; किन्तु इसे ही शाश्वत-सनातन न कहें। शाश्वत-सनातन तो उसे ही कहें जिसे भगवान ने कहा, पूर्व महापुरुषों ने जिसे पाया। उसे समझने के लिए किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष की शरण में जायँ।

।। बोलिये सद्गुरुदेव भगवान की जय।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

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