सगुण एवं निर्गुण उपासना में अन्तर

प्रश्नमहाराजजी! सगुण एवं निर्गुण उपासना में क्या अन्तर है? ऐसी धारणा है कि तुलसी व मीरा इत्यादि सगुण उपासक थे और कबीर व जायसी इत्यादि निर्गुण, जबकि अभी आपके श्रीमुख से यह सुनने में आया कि कबीर अपने चिन्तनकाल में रामनाम का आधार लिए थे।

उत्तरदेखो, यह प्रश्न आज मानव-समाज के अन्दर एक विवादग्रस्त विषय के रूप में है; किन्तु इस जगत् में निर्गुण उपासना नाम की कोई वस्तु नहीं है। निर्गुण कोई उपासना नहीं है बल्कि सन्तों की एक रहनी है। लक्ष्य प्रत्यक्ष होते ही वह गुणातीत हो जाता है अर्थात् गुणों के बन्धन से छूट जाता है और उसके बाद की रहनी निर्गुण है। सन्त कबीर ने वैदिक तत्त्व को इतने सूक्ष्म तरीके से और इतने गोपनीय रूप में दर्शाया है कि वह लोगों की समझ के बाहर की वस्तु हो गई है। यही एकमात्र कारण है कि प्रायः कबीर को लोग निर्गुण उपासक की संज्ञा दिया करते हैं। यदि हम कबीर की प्रारम्भिक अवस्था पर दृष्टिपात करें तो-

साहब का घर दूर है, जैसे पेड़ खजूर।

चढ़ै तो चाखै रामरस, गिरै तो चकनाचूर।।

साहब कहीं दूर हैं और स्वयं कहीं अलग। उस दूरी को तय करने के लिए चढ़ना और गिरना लगा ही हुआ है और सगुण क्या होता है? निर्गुण स्थिति में अपने से अलग कोई सत्ता नहीं होती। पुनः आगे कहते हैं कि-

राम न रमसि कवन दण्ड लागा।

मरि जइबे का करिबे अभागा।। (कबीर)

राम का भजन क्यों नहीं करता, इसमें क्या तेरा कुछ खर्च हो रहा है? रे अभागे! मर जायेगा तब क्या होगा?

रा और म के बीच में कबिरा रहा लुकाय।

‘रा’ और ‘म’ दो अक्षरों के अन्तराल में कबीर ने अपने मन को खड़ा कर लिया था। कबीर नाम के प्रभाव से भलीभाँति परिचित थे। बैखरी से मध्यमा, पश्यन्ती और परावाणी के उतार-चढ़ाव के मर्म को वे अच्छी तरह जानते थे। जैसा कि-

जप मरे अजपा मरे, अनहदहूँ मरि जाय।

सुरति समानी शब्द में, ताहि काल ना खाय।।

जप मरे कब? जब अजपा पकड़ में आ जाय। अजपा मरे कब? जब अनहद पकड़ में आ जाय। अनहद मरे कब? जब सुरति शब्द के साथ तद्रूप हो जाय अर्थात् शब्द में समा जाय। जब सुरति शब्द में प्रवेश पा जाती है तब वहाँ काल नहीं पहुँच पाता। इसलिए नाम को आधार बनाते हुए अग्रिम सोपान दर्शाते हैं। वही कबीर क्रमशः आगे चलकर जब उस इष्ट को पा गये तो कहते हैं कि-

अवधू बेगम देश है मेरा।

जहाँ न उपजे मरे न बिनसे, नाहिन काल का फेरा।

तहाँ न ईश्वर जीव न माया, पूजक पूज्य न चेरा।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो, नहिं तहँ द्वैत बखेड़ा।।

अर्थात् मुझसे भिन्न कोई सत्ता नहीं, यही निर्गुण ब्रह्म का स्वरूप है। गोस्वामीजी भी इसी प्रकार अपने उपासनाकाल में रोते-गाते, चलते-फिरते प्रार्थना के परिणामस्वरूप जब आराध्य देव को पाते हैं तो-

जब द्रवै दीनदयालु राघव, साधुसंगति पाइये।

सपनेहुँ नहीं सुख द्वैतदरसन बात कोटिक को कहै। (विनय0, 136)

भगवत्-कृपा से सन्त की रहनी आई, स्वप्न में भी दुःख का आभास नहीं, कौन करोड़ों बातों को कहे। अब आखिर कबीर ही कौन लाठी मारते हैं, बस यही तो कहते हैं कि द्वैत का बखेड़ा नहीं है। गोस्वामीजी भक्ति के पूर्तिकाल में यही निर्णय देते हैं कि-

रघुपतिभगति करत कठिनाई।

कहत सुगम करनी अपार जानै सोइ जेहि बनि आई।।

भगवान की भक्ति कहने में सरल और करने में अत्यन्त कठिन है। जानता वही है जिसका लहान बैठ जाता है। पुनः कहते हैं कि छोटी मछली गंगा की धारा के विपरीत चल लेती है जबकि बड़ा हाथी बह जाता है। इसी प्रकार भक्ति भी एक कला है। भक्ति की पूर्तिकाल में इसकी पराकाष्ठा का चित्रण करते हुए कहते हैं कि-

सकल दृश्य निज उदर मेलि, सोवै निद्रा तजि जोगी।

सोइ हरिपद अनुभवै परम सुख, अतिसय द्वैतबियोगी।। (विनय0, 167)

सम्पूर्ण दृश्य को समेटकर हृदय में केन्द्रित कर लेते हैं और निद्रा का त्याग कर सुप्त हो जाते हैं। यह स्थिति जिसकी भी आ गयी, वही भगवान का दर्शन करता है। भला वे हैं कैसे? अतिसय द्वैत बियोगी– जहाँ द्वैत की कल्पना नहीं है। जब गोस्वामी जी पाये तो किस रूप में, कि मुझसे भिन्न कोई सत्ता नहीं। सन्त कबीर भी इसी रहनीवाले थे। मीरा रोती एवं विनय करती रही, परन्तु उपलब्धि के बाद किस प्रकार राणा को ललकार कर कहती है-

राणा जी मैं तो गिरिधर रंगवा राती।

सबके पिया परदेश बसत हैं, लिखि लिखि भेजत पाती।

मेरे पिया मेरे हिये बसत हैं, नहि कहुं आवत जाती।।

राणा जी, मैं गिरिधर के रंग में रंग गयी हूँ। दूसरों के प्रियतम परदेश में निवास करते हैं और पत्र लिख-लिखकर भेजते हैं। मेरे प्रियतम मेरे हृदय में निवास करते हैं।

उपासना के तीन अंग होते हैं- ध्याता (साधक), ध्येय (लक्ष्य) और ध्यान (लक्ष्य को पकड़ने की युक्ति)। इन तीनों में से यदि एक भी खण्डित है तो उपासना नहीं बनती। ध्याता नहीं है तो भजेगा कौन? ध्याता है और भजनेवाली वस्तु ध्येय (ईश्वर) नहीं है तो भजेगा किसको? यदि ये दो वस्तुएँ हैं और उपासना की युक्ति नहीं है तो भी उपासना नहीं बनती। यह हम पहले ही बता चुके हैं कि निर्गुण कोई उपासना नहीं है। कबीर सगुण से चलकर निर्गुण में आये, जो सन्तों की एक रहनी है। तुलसी भी ठीक इसी प्रकार सगुण से चलकर निर्गुण में आ गये। निर्गुण ब्रह्म का चित्रण करते हुए सन्त कबीर कहते हैं-

सबहि सन्त हैं राम के, सबहि राम के आस।

सरगुण राम प्रसाद भै, निर्गुण पलटत दास।।

सभी सन्त राम के हैं और सभी को राम की ही आशा है। सरगुण (सगुण) जब परावाणी साध्य की अवस्था में आ जाती है तो भगवान जो हैं, जिस प्रभाववाले हैं, जिन विभूतियों व गुणधर्मों से युक्त हैं आदि समक्ष दिखाई पड़ने लगते हैं। यदि इन वाणियों की प्रक्रिया सद्गुरु से उपलब्ध नहीं है तो सगुण नाम की कोई वस्तु नहीं है और जब प्रत्यक्ष हो गया तो- जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई। (मानस, 2/126/3)

जो उसको जानता है वह उसी में फना हो जाता है। गोस्वामीजी के शब्दों में सेवक सदा के लिए खो जाता है और स्वामी ही शेष बच रहता है। अन्त में कहते हैं- निर्गुण पलटत दास’- उस दास की रहनी निर्गुण है, न कि निर्गुण कोई उपासना।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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