सती

सती

उस परम पुरुष परमात्मा से, शाश्वत सत्य से जिसका स्वभाव जुड़ा है वह सती है। जो सत्यपरायण है, उसे सती कहते हैं।सतीयह शब्द स्त्रीलिंगीय है इसलिए कालान्तर में उभय प्रयोग संकुचित होकर स्त्रियों से जुड़ गया।स्वामी अड़गड़ानन्द

कार्तिक पूर्णिमा (५ नवम्बर, १९८७) के पावन पर्व पर त्यागी आश्रम, बिराँव कोट, वाराणसी के वार्षिक समारोह में स्वामी श्री अड़गड़ानन्दजी द्वारासतीविषयक भ्रामक प्रश्न का रहस्योद्घाटन।

बन्धुओ!

राजस्थान में जयपुर के समीप देवराला ग्राम में अठारह वर्षीया रूपकुँवर का अपने पति के शव के साथ चिता में जीवित जल जाने की घटना के पश्चात् सती-प्रथा भारत की बहुचर्चित समस्या बन गयी है। इस प्रकार जलने के दो उद्देश्य बताये जाते हैं- एक तो यह कि पति के साथ जल जाने पर अगले जन्मों में वही पति मिलेगा और दूसरी भावना है कि जलने पर पति-पत्नी को सीधे परमगति मिलती है, किन्तु दोनों बातें किसी समय की रूढ़ि की देन हैं।

महाकाव्यों और पुराणों में तीन-चार प्रकार की सतियों के उल्लेख मिलते हैं। एक तो अत्यन्त उत्तम कोटि की सतियाँ हैं, जिनका पति कभी मरा ही नहीं। दूसरी वे हैं जिन्होंने पति के आदेशों पर विचार किया- उचित समझा तो माना, नहीं समझा तो नहीं माना और वे भी परम सती हुईं। तीसरी वे हैं, जो एक से अधिक पतियों का वरण करके भी सती कहलाईं। चौथी कोई श्रेणी नहीं बल्कि एक भ्रान्ति विशेष है कि पति के साथ जलनेवाली ही सच्ची सती है। फिर भी जो मातायें-बहनें नहीं जलतीं, उन्हें क्या कहेंगे?

* माता अनसूया, नर्बदा, सावित्री इत्यादि अत्युच्च कोटि की सतियाँ रही हैं। उन्हें जो भी आदेश मिला, उसका पालन किया, जैसे- भयंकर अकाल की स्थिति में, जबकि दूर-दूर तक पानी का हर स्रोत सूख चुका था, पति की आज्ञा पर अनसूया जल लेने निकल पड़ीं, मंदाकिनी का अजस्र स्रोत प्रवाहित हो चला। एक परमात्मा के भजन द्वारा इन माताओं ने वह क्षमता अर्जित कर ली थी कि जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।। (मानस, ७/११३/४) भगवान ही उनकी इच्छा पूरी कर दिया करते थे। संसार की कोई अभीष्ट वस्तु इनकी इच्छा के विरुद्ध कोई भी (यहाँ तक कि काल भी) इनसे छीन नहीं सकता था। उस भजन का ही प्रभाव था कि सावित्री एवं नर्बदा ने अपने पति को मृत्यु से बचा लिया। सीता भी इसी कोटि की थीं। रावण ने सीता को राम का मायानिर्मित कटा सिर दिखाया, तो सीता शोकविह्वल होकर बोलीं कि अवश्य ही मुझसे कोई भूल हुई होगी अन्यथा मेरे जीवित रहते आप मारे न जाते। ऐसी सतियों का पति मरा नहीं बल्कि यह साधना की उत्कृष्ट अवस्था है, ये इसी स्तर पर थीं। पति के शव के साथ अनसूया, नर्बदा या सावित्री के जल मरने का उल्लेख नहीं मिलता।

श्रीरामचरितमानस में है- सती सिरोमनि सिय गुन गाथा। (मानस, १/४१/७)- साधारण और मध्यम श्रेणी की नहीं, सतियों की सिरमौर थीं सीता। उनकी रहनी देखें। जब राम वन जाने लगे तो सीता साथ जाने को उद्यत हो गईं। माता कौशल्या ने कहा- राम! तुम स्वयं सीता को समझा दो। यदि घर में रहती तो तुम्हारे पिता सुख से जीते, मुझे भी सहारा हो जाता। श्रीराम ने माता का परितोष किया और मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।। (मानस, २/६०/१) माँ के समक्ष नववधू से वार्त्तालाप करने में श्रीराम को संकोच हो रहा था (आज नहीं होता) फिर भी देखा कि समय माँग रहा है कि सबके सामने ही समझाऊँ। कदाचित् सीता ने न माना, तो लोग यही कहेंगे कि साथ ले जाने में राम का भी मन था। अतः बोले- राजकुमारी! मेरी सीख सुनो। दूसरा कोई भी विचार मन में लाओ ही नहीं, बल्कि-

आपन मोर नीक जौं चहहू।

बचनु हमार मानि गृह रहहू।।

आयसु मोर सासु सेवकाई।

सब बिधि भामिनि भवन भलाई।। (मानस, २/६०/३-४)

अपना ही नहीं, मेरा भी हित चाहती हो तो मेरी मानो और घर में रहो। मेरी आज्ञा है कि सास की सेवा करो। भवन में रहने पर ही तुम्हारा कल्याण है। किन्तु यह सुनकर सीता की आँखें भर आईं। पैर के अँगूठे से जमीन कुरेदने लगीं। बोलीं-

दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई।

जेहि बिधि मोर परमहित होई।।

मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं।

पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।। (मानस, २/६३/६-७)

आपने तो वही शिक्षा दी जिसमें मेरा हित है। क्योंकि ऐसा अवसर न कभी कौशल्या के सामने आया था, न राम को ही ऐसा अनुभव हो सकता था। अतः सीता की खोज थी कि पति-वियोग के समान संसार में कोई दुःख ही नहीं है।

भोग रोग सम भूषन भारू।

जम जातना सरिस संसारू।।

प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं।

मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।। (मानस, २/६४/५-६)

आपके बिना भोग रोग है, आभूषण भार है, कहीं कुछ भी सुखद है ही नहीं। अस्तु, पति के स्पष्ट आदेश पर भी सीता ने विचार किया और साथ लगी रहीं।

सुमन्त वन में पहुँचाकर लौटने लगे तो पिता का सन्देश सुनाया कि- सीता लौट आती तो मैं जी लेता। इसलिये तुम्हारा और राम का कर्तव्य है कि समझा-बुझाकर सीता को लौटाओ, तो पितु संदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना।। (मानस, २/९६/२)- करोड़ों उदाहरण देकर समझाया कि सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरहु त सब कर मिटै खभारू।। (मानस, २/९६/३)- सास-ससुर, गुरु, प्रियजन और जनपद के परिजन इन सबका मलाल मिट जाता, यदि तुम लौट जाती। करोड़ों विधि से समझाया। जबकि करोड़ गिनने में ही दो दिन लग जायेंगे, आजकल दस-पन्द्रह लाख की मतगणना में ही दिन बीत जाता है। इतना अधिक समझाया; किन्तु सीता नहीं मानीं तथा अपना परामर्श दिया-

प्रभु करुनामय परम बिबेकी।

तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी।। (मानस, २/९६/५)

सीता अयोध्या से चल चुकी थीं। आधी दूरी तय कर चुकी थीं। अतः साधिकार बोलीं कि आज आप यह क्या कह रहे हैं? आप तो परम विवेकी हैं, आपको हो क्या गया है? शरीर से अलग क्या छाया को रोका जा सकता है? चन्द्रमा से चाँदनी क्या अलग की जा सकती है? राम से प्रश्न कर बैठीं। पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई।(मानस, २/९६/७)- पति को प्रेमपूर्ण विनय सुनाया और नहीं लौटीं।

तीसरा प्रकरण वनवासकाल का है। राम पंचवटी में निवास कर रहे थे। एक कंचन मृग दिखाई पड़ा। सीता ने राम को प्रेरित किया कि इसे या तो जीवित पकड़ लायें, वनवास के पश्चात् अयोध्या में रनिवास की शोभा बढ़ायेगा अथवा इसे मृत ही लायें, इसकी छाल से मैं कुटी सजाऊँगी। वाल्मीकीय रामायण, अरण्यकाण्ड के तैंतालीसवें सर्ग में है कि सीता ने कहा- ‘‘यद्यपि नारी को आदेश नहीं देना चाहिये, यह भयंकर स्वेच्छाचार है और साध्वी स्त्रियों के लिये उचित नहीं माना गया है तथापि इस जन्तु के शरीर ने मेरे मन में विस्मय उत्पन्न कर दिया है। अतः आप शीघ्र जाइये।’’ यहाँ अपनी आवश्यकताओं के लिये सीता मचल जाती हैं।

अन्ततोगत्वा रावण मारा गया। सीता अयोध्या लौटीं तो एक धोबी ने आक्षेप किया। मुकदमे को तगड़ा बनाने के लिए अथवा भूल से उसने अपनी पत्नी को भी निकाल दिया। लोकरंजन के लिये राम ने सीता को वन में भेज दिया। महर्षि वाल्मीकि के प्रयासों से जब सीता का लोकापवाद दूर हो गया तो जनसभा के बीच राम ने स्वीकार किया कि सीता ने एक बार अग्नि-परीक्षा देकर अपनी निर्दोषिता का प्रमाण दिया था, जिससे मैंने उन्हें स्वीकार किया था; किन्तु जनमत से विवश होकर मुझे इन्हें त्यागना पड़ा था। अब सबके सामने सीता पुनः परीक्षा दें, तो मैं उन्हें साथ रख सकता हूँ। राम चाहते थे कि परीक्षा के पश्चात् सीता उनके सिंहासन की शोभा बढ़ातीं; किन्तु राम देखते ही रह गये और सीता पृथ्वी में समा गईं।

कहते हैं कि पृथ्वी के भीतर से एक सिंहासन निकला, सीता को बिठाया और लेकर चला गया। वस्तुतः यह कवियों की कथा-शैली है। प्रायः जितने भी महात्मा हैं, किंवदन्ती है कि उन सबके लिये विमान आया। मीरा देखते-देखते श्रीकृष्ण की मूर्ति में समा गईं। सन्त कवि तुकाराम ने इन्द्रायणी नदी में डूबकर शरीर त्याग दिया तो कहते हैं कि आकाश से विमान उतरा, उन्हें लेकर चला गया; जबकि पृथ्वी के गर्भ में न कहीं पाताल है, न आकाश में ही कोई लोक (बैकुण्ठ) बसा है, न वहाँ विमानों की कोई व्यवस्था है, न कोई आविष्कार और न कोई उद्योग! अस्तु, आरम्भ से लेकर अन्त तक सीता ने विचारपूर्वक निर्णय लिया। जो बातें उचित थीं, उन्हें भली प्रकार ज्यों-का-त्यों माना; किन्तु सब नहीं, फिर भी सती सिरोमनि सिय गुन गाथा। (मानस, १/४१/७) सीता सती थीं, क्यों?

सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं।

तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित।। (मानस, ३/५ ख)

पतिव्रता स्त्रियाँ तुम्हारे पद-चिन्हों का अनुकरण करेंगी, क्योंकि ‘तोहि प्रानप्रिय राम’- राम तुम्हें प्राण के समान प्रिय हैं। वास्तव में वही सती है, जिसकी श्रद्धा एकमात्र परमात्मा के चरणों में केन्द्रित है। परमात्मा ही सत्य है। जो इस सत्य से जुड़ा है वह सती है।

गोस्वामीजी भी कहते हैं धरमु न दूसर सत्य समाना। (मानस, २/९४/५) सत्य है क्या? तो ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनन्दरासी।। (मानस, १/२२/६) वह सर्वत्र है। एक है, कहीं दो हो गया तो दुनिया बस जायेगी, फिर तो सृष्टि हो गई! भगवान कैसा? अतः एक है, सबसे बड़ा है। उसका कभी विनाश नहीं होता। वही सत्य है। एक परमात्मा ही सत्य है। अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। (मानस, १/२२/७) वह परमात्मा हृदय-देश में वास करता है। उसके मनन-चिन्तन में जो समय देता है, वह वास्तव में सत्पथ पर है, सती है। सीता में यही विशेष गुण था कि राम उनको परमप्रिय थे। इसलिये सीता सती थीं अन्यथा आज भी तो स्त्रियाँ भली प्रकार आदेश और परामर्श देती हैं, उसी के अनुरूप आचरण करती हैं और अकारण लांक्षित होने पर धरती में समा जाती हैं- कोई मिट्टी का तेल छिड़क लेती है, कोई पंखे पर लटक जाती है, किन्तु यह सती का मापदण्ड नहीं है। सती का सतीत्व पति के सह-मरण की देन नहीं थी।

सीता राम को प्राण की तरह इसलिये नहीं मानती थीं कि राम के साथ उनका विवाह हुआ था, बल्कि उस सत्य के लिये मानती थीं कि जिसकी अभिव्यक्ति बृहदारण्यक उपनिषद् के दूसरे अध्याय, चतुर्थ ब्राह्मण के पाँचवें मन्त्र में महर्षि याज्ञवल्क्य के द्वारा मैत्रेयी के प्रति हुई है कि न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति, आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति। न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवति, आत्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति।…. न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति, आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति। अर्थात् अरी मैत्रेयी! पति के लिये पति प्यारा नहीं होता, आत्मा के लिये पति प्यारा होता है। स्त्री के प्रयोजन के लिए स्त्री प्रिया नहीं होती, आत्मा के लिए ही स्त्री प्रिय होती है। आत्मा के ही प्रयोजन के लिए सब कुछ प्रिय होता है। इसी को गोस्वामीजी ने सरल शब्दों में व्यक्त किया कि पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें। (मानस, २/७३/७) पति के नाते नहीं, राम के नाते मानिये।

नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेब्य जहाँ लौं।

अंजन कहा आँख जेहि फूटै बहु तक कहौं कहाँ लौं।। (विनय०, १७४)

सचाई तो यह है कि वह एक परमात्मा ही सबका वास्तविक पति है। वेद में है कि (हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। (ऋग्वेद, १०/१२१/१)। सभी भूत-प्राणियों का वही एक पति है। पत माने मर्यादा (इज्जत)- बारम्बार गर्भवास की अनन्त योनियों का चक्कर काटना, मल-मूत्र-पीव से सनी योनियों से गुजरना इससे बड़ी कौन-सी बेइज्जती हो सकती है? इससे बचकर निर्मल रूप प्रदान करने में जो समर्थ है, वह एकमात्र भगवान हैं। इसीलिये महापुरुषों ने ईश्वर को पति कहकर सम्बोधित किया और उसी की याद में एक सांसारिक रिश्ते को भी वही नाम दिया। राणा की मृत्यु पर मीरा से सती होने के लिये कहा गया, तो उसने इनकार कर दिया, बोली-

ऐसे पति को क्या बरूँ, जो जनमे मरि जाय।

मीरा अविनाशी बर्यौ, चुड़लो अमर होइ जाय।।

मीरा ने ही नहीं, पुरुष महानुभावों ने भी ईश्वर को पति माना है, चाहे वह सन्त कबीर रहे हों या सन्तकवि गोस्वामी तुलसीदास। ऋष्यमूक पर्वत पर वटुकवेशधारी हनुमान को श्रीराम ने जब कहा कि तुम मुझे लक्ष्मण से दूने प्रिय हो, तो देखि पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।। (मानस, ४/३/१)- हनुमान ने पति को अनुकूल समझा। हनुमान वानर जाति के एक पुरुष थे, कोई स्त्री नहीं; किन्तु उन्होंने पति को अनुकूल समझा। वास्तव में पति वह है जो अनन्त योनियों से उबारकर आपको ऐसा जीवन दे जो अनन्त हो, ऐसी शान्ति दे जो असीम हो। ऐसा केवल एक परमात्मा ही दे सकता है। इसलिये वही एकमात्र सच्चा पति है, स्वामी है।

वह परमात्मा कण-कण में व्याप्त है- ऐसा सुना जाता है, तो क्या हम पेड़ की पूजा करें? मिट्टी का ध्यान धरें? उस परमात्मा को पकड़ने की विधि क्या है? उसकी प्राप्ति का एक ही साधन है- उस परमभाव को प्राप्त, अव्यक्त का स्पर्श कर अव्यक्त स्थितिवाला महापुरुष (सद्गुरु), उनके बगैर उस परमात्मा में प्रवेश पाया नहीं जा सकता। ऐसा ही निर्णय है आपकी गीता का, रामचरितमानस का और प्रत्येक प्राप्तिवाले महापुरुषों का। परमात्मा यदि परमधाम है तो उसके प्रवेश का दरवाजा सद्गुरु है। इसलिये है तो परमात्मा ही पत रखनेवाला पति, लेकिन साधना में प्रवेश से लेकर पूर्तिपर्यन्त सद्गुरु ही उस परमात्मा की विधि हैं, वही उसकी कुंजी हैं। वही उसकी युक्ति बताते हैं, वही पत रखनेवाले हैं, इसलिए वही पति भी हैं। इसलिये अनसूया ने कहा-

मातु पिता भ्राता हितकारी।

मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।।

अमित दानि भर्ता बयदेही।

अधम सो नारि जो सेव न तेही।। (मानस, ३/४/५-६)

माता, पिता, भाई इत्यादि एक सीमा तक ही हित करनेवाले हैं; लेकिन असीम दान, अनन्त दान- जो कभी न घटे ऐसा शाश्वत दान देनेवाला तो पति ही है। विचार करें कि मरणधर्मा, अस्तित्वविहीन, ससीम सांसारिक पति कौन-सा असीम दान देगा? माँग और पूर्ति के नियमानुसार कभी समाज में लड़कियों का महत्त्व बढ़ जाता है, तो कभी लड़कों का। इनके बीच सम्बन्ध जोड़नेवाला शब्द है सम्भोग। जब दोनों ही एक दूसरे का समान भोग करते हैं तो कोई अधिक और कोई कम कैसा? मीरा तो लौकिक पति को मानती ही नहीं, कहती हैं-

झूठ सुहाग जगत का सजनी, होय होय मिट जासी।

मैं तो इक अविनाशी बरूँगी, जाहि काल नहिं खासी।।

वास्तव में बाहर कोई पति नहीं। असीम और अनन्त एक परमात्मा है, वही पति है। वही तो केन्द्र है, लक्ष्य है, अन्तिम परिणाम है। साधना के आरम्भ से पूर्तिपर्यन्त आत्मा से अभिन्न होकर साधक को ले चलनेवाले सद्गुरु ही पति हैं। इसलिये-

बृद्ध रोग बस जड़ धनहीना।

अंध बधिर क्रोधी अति दीना।।

ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना।

नारि पाव जमपुर दुख नाना।। (मानस, ३/४/८-९)

किसी को वृद्धावस्था में उपलब्धि मिली, तो वे महापुरुष अत्यन्त जर्जर वृद्ध हो सकते हैं, रोगी हो सकते हैं, जैसे- रामकृष्ण परमहंस को कैंसर था, हमारे गुरु महाराज के गुरु सत्संगी महाराज लँगड़े थे। दत्तात्रेय उन्मत्त और पिशाच की तरह रहते थे (जड़भरत की तरह)। जरूरी नहीं कि वे सिंहासन पर बैठते हों। हो सकता है कि वे धूल में लेटने के अभ्यस्त हों। काशी के हरिहर बाबा नेत्रहीन होते हुए भी अपने समय के पूर्ण महापुरुष थे। दयानन्द सरस्वती के गुरु बिरजानन्दजी भी प्रज्ञाचक्षु थे। वस्तुतः गुरु शरीर नहीं होता। ‘नास्ति तत्त्वो गुरोः परम्’- गुरु एक तत्त्व है। जो परमतत्व परमात्मा के दर्शन, स्पर्श और प्रवेशवाले हैं, जिन्हें तत्व विदित है और उसकी रहनीवाले हैं, गुरुत्व उनके अन्तराल में है, इसलिये साधनकाल में वह सद्गुरु ही पति है। वे किसी भी वेश में हों, उनका अपमान नहीं करना चाहिये। शाश्वत की ओर ले जानेवाले इन कर्णधारों से ही पत की रक्षा होती है। इनका अपमान करने से यमपुर में नाना प्रकार का दुःख झेलना पड़ता है। इस प्रकार सीता-अनसूया वार्ता का ‘पति’ रहस्यात्मक है, आध्यात्मिक है।

शास्त्र दो दृष्टियों से रचा जाता है- एक तो घटित घटनाओं के इतिहास को कायम रखना, जिससे लोग पूर्वजों द्वारा निर्धारित मर्यादा पर चल सकें और दूसरा है अध्यात्म, जो प्रकृति के द्वन्द्व से निकालकर आत्मा का आधिपत्य दिला सके। आज सब पर माया का आधिपत्य है। इस माया के चंगुल से निकालकर जो ईश्वर-पथ पर चला दे और आत्मा का आधिपत्य दिला दे, उसी का नाम अध्यात्म है, जिसमें प्रतीकों के माध्यम से आन्तरिक स्थिति का बोध कराया जाता है। महापुरुषों ने मन के अमूर्त भावों का समीकरण ऐतिहासिक घटनाओं से बैठाया है, अमूर्त को मूर्त उदाहरणों द्वारा समझाने की कृपा की है। अभी तक आपने ऐतिहासिक दृष्टि से देखा, अब आध्यात्मिक परिवेश में राम-कथा और सती-प्रसंग देखें जो आरम्भ होता है योगरूपी जनकपुर से। चित्त की चंचलता का क्रम ही चाप है, ध्यान ही धनुष है। शुद्ध ध्यान तब लगता है जब चित्त की चंचलता का क्रम ही टूट जाय। चित्तचढ़रूपी चाप को तोड़ते ही तुरन्त ध्यान की स्थिति बन गई। तहाँ शक्तिरूपी सीता, जो आपके हृदय में छिपी हुई है, वह आपकी शक्ति योग के इस स्तर पर आपसे जुड़ जाती है। शक्ति का संचार, शक्ति से सम्बन्ध हो जाता है।

राम वन गये तो सीता को आदेश दिया-

सुनह प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला।

मैं कछु करबि ललित नरलीला।।

तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा।

जौ लगि करौं निसाचर नासा।। (मानस, ३/२३/१-२)

मैं अब विलक्षण नरलीला करने जा रहा हूँ। जब तक यह नरलीला पूर्ण न हो, तुम पावक में निवास करो। ‘नरलीला’ है क्या? स्टेज पर खेली जानेवाली रामलीला? नहीं! ‘निसाचर नासा’- निशाचरों का नाश ही ‘नरलीला’ है।

निशा? एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। (मानस, २/९२/३) जगत् ही एक रात्रि है। या निशा सर्वभूतानाम् (गीता, २/६९)- यह संसार ही भयंकर रात्रि है। इस रात्रि की ओर हम-सबको प्रेरित करते हैं- मोहरूपी रावण, क्रोधरूपी कुम्भकर्ण, लोभरूपी नारान्तक, प्रकृतिरूपी सूपनखा। ये जगत्-रूपी रात्रि की ओर चलानेवाले हैं, इसलिये यही निशाचर हैं। जब तक मैं इन विकारों का अन्त न कर लूँ, तब तक तुम अग्नि में निवास करो। वास्तव में जब तक ये विकार शान्त नहीं होंगे, तब तक शक्तिरूपी सीता बाहर देखने को नहीं मिलेगी। तब तक योगाग्नि में प्रसुप्त रहा करती है। ज्यों-ज्यों योग का अनुष्ठान करेंगे, त्यों-त्यों वह शक्ति प्रस्फुटित होती जायेगी।

एक समय आया, सब निशाचर मर गये। अन्त में अकेला रावण जब चला तो अपार सेना लेकर चला। कुम्भकर्ण, घननाद इत्यादि दुर्धर्ष योद्धा तो मर गये थे, अपार अभी जीवित ही हैं, ये आये कहाँ से? वास्तव में मोहरूपी रावण! मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।। (मानस, ७/१२०/२९)- मोह सम्पूर्ण व्याधियों का मूल है जिससे अनन्त शूलों की सृष्टि होती है। इसलिये भले ही सब कुछ कट गया; किन्तु यदि मूल विद्यमान है तो शाखा-प्रशाखा, पत्ते, फूल सब कुछ पनप जायेंगे। इसी प्रकार सारे विकार समाप्त हों जायँ; किन्तु यदि मोह शेष है तो उसके अन्तराल में काम, क्रोध, लोभ, मद-मत्सर, राग-द्वेष इत्यादि सभी विकार प्रसुप्त हैं। इसीलिये रावण चला तो अपार सेना लेकर चला और जब शान्त हुआ तो रहा न कुल कोउ रोवनिहारा। (मानस, ६/१०३/१०) तत्क्षण अग्नि प्रज्वलित हो गई। फिर से सीता प्रगट हुई।

सर्वत्र राम का साम्राज्य छा गया- राम राज बैठें त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका।। (मानस, ७/१९/७) जन्म और मृत्यु तक का शोक मिट गया, लव-कुश पैदा हो गये। एक परमात्मा में लव लग गयी। अब अन्यत्र कहीं आसक्ति नहीं रही तो शक्ति का उपयोग क्या रहा? तहाँ फिर सीता पृथ्वी में समा गई। वास्तव में धड़ धरती का एकै लेखा। जो बाहर सो भीतर देखा।। इस स्तर पर शक्तिरूपी सीता शरीररूपी पृथ्वी में प्रसुप्त हो जाती है। रहती योगी में ही है, मर नहीं जाती, कहीं चली नहीं जाती; किन्तु उन योगी के स्वयं के लिए उसका उपयोग कुछ भी नहीं रह जाता। राम भी सरयू में शान्त हो गये। परमात्मा के अनुभवी सूत्रपात का स्वयं के लिए कोई उपयोग नहीं रहता किन्तु लोकहित के लिए रहता है, इसलिए राम भी सदैव रहते हैं। यजन से पूरित श्वास-क्रिया ही सरयू है, उसी में सदा विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण रामायण यौगिक शब्दकोष है। हमारे-आपके अन्तःकरण में घटित होनेवाली घटना है, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है; किन्तु इसका सूत्रपात है सद्गुरु की अन्तस्प्रेरणा द्वारा। उसी पर चलकर उस सत्य को पाने का विधान है। भजन शरीर नहीं करता वरन् इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति करती है, यही नारी है। यह सत्य से संयुक्त है तो सती है। अतः उस सत्य के लिये प्रयत्नशील स्त्री-पुरुष कोई भी साधक ही सच्चा सती है।

संसार से विरक्त योग-संन्यास में प्रयत्नशील पुरुष को ‘यति’ और इसी योग- साधना में दीक्षित स्त्रियों को ‘सती’ कहने की परम्परा थी। आज भी पूज्य महावीर स्वामी के अनुयायियों में यह नियम यथावत् है कि विरक्त स्त्रियों को सती कहते हैं। यति और सती दोनों के लिए नियम-संयम का पालन तथा दोनों की क्षमता भी एक है। मुहावरा है कि ‘जती सती का बोलबाला’। मानस में दोनों की एक-जैसी पहचान है- डगइ न संभु सरासनु कैसे। कामी बचन सती मनु जैसे।। (मानस, १/२५०/२)- दस हजार राजा उठाये किन्तु धनुष नहीं उठा, जैसे कि सती के मन में काम-विकार नहीं उठता। दूसरा अवसर है, जब अंगद का पाँव नहीं उठा तो उन महापुरुष ने बताया कि कोटि बिघ्न ते संत कर, मन जिमि नीति न त्याग। (मानस, ६/३४ ख)- जैसे काममयी करोड़ों विघ्न-बाधाओं से भी सन्त का मन चलायमान नहीं होता। दोनों स्थलों पर सती और सन्त के मन की समता बताई गयी। अस्तु, सत्पथ पर प्रयत्नशील स्त्रियाँ सती कहलाईं। जलना उनका मापदण्ड नहीं था।

* दूसरी कोटि की सती नारियों में महारानी मदालसा उल्लेखनीय हैं। महाराज ऋतध्वज (कुवलयाश्व) से उसने इस शर्त पर विवाह किया कि जो कुछ मैं करूँगी उसमें आप साथ देंगे। क्रमशः उन्हें तीन पुत्र हुए, मदालसा ने उन तीनों को शुद्धोऽसि, बुद्धोऽसि, निरंजनोऽसि कहकर, ब्रह्मविद्या का उपदेश देकर जंगल का रास्ता पकड़ा दिया।

समाज के वात्सल्य, स्नेह और प्रेम से पूरित रिश्तों का क्या अस्तित्व है? इस पर सती मदालसा ने अपने पुत्र को समझाते हुए बताया था कि-

तातेति किंचित् तनयेति किंचित् अम्बेति किंचित् दयितेति किंचित्।

ममेति किंचिन्नममेति किंचित् त्वं भूतसंघं बहुमानयेथा।।

यह पिता है, यह पुत्र है, प्रिय स्त्री, प्रिय पति- यह सम्बोधन नश्वर शरीर के व्यवहार चलाने के नाम हैं। शुद्धोऽसि रे तात न तेऽस्ति नाम– तेरा कोई नाम नहीं। तू तो शुद्ध, अविनाशी, अजर, अमर आत्मा है। विचार करें जब यह सभी रिश्ते नश्वर हैं, केवल व्यवहार चलाते हैं, तब इन नश्वर रिश्तों के पीछे कोई सती क्यों होगी?

माता मदालसा ने राजा के बहुत कहने और मन्त्रियों के अनुरोध पर अपनी चौथी सन्तान अलर्क को नाममात्र की राजनैतिक शिक्षा दी; किन्तु अपनी मूलशिक्षा आत्मज्ञान से उसे वंचित नहीं रखा। एक ताबीज (अँगूठी) में कुछ सन्देश अलर्क के लिये लिखा। मन्त्रियों को निर्देश दिया कि जब इसके ऊपर महान् संकट पड़े, कोई सहायक न रह जाय तो उस समय इसे ताबीज की याद दिलाना। राजा पर भी रानी की सद्विद्या का प्रभाव पड़ा। वे दोनों पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए वन को चले गये।

कालान्तर में अलर्क के सन्न्यासी अग्रज सुबाहु ने काशी नरेश की सहायता से पिता के राज्य पर अपना अधिकार जताया। अलर्क की सेना पराजित हुई। कोष रिक्त हो गया। सहायक न रहे तो मन्त्रियों ने मदालसा के अँगूठी की याद दिलाई, जिसमें संसार की निस्सारता एवं परमात्मा को ही सुख-शान्ति का स्रोत बताया गया था, जिसकी प्राप्ति का स्रोत सत्संग है। उन निर्देशों पर चलकर भगवान दत्तात्रेय की कृपा से अलर्क, सुबाहु तथा काशी नरेश ने भी परमशान्ति का वरण किया।

यह थी सती मदालसा की सत्यनिष्ठा। पति के अनुनय-विनय पर भी उसने अलर्क को सत्य से वंचित नहीं रखा। एक परमात्मा के प्रति कृतसंकल्प होने के कारण वह महासती कहलायी। उस सत्य से संयुक्त जिसकी चित्तवृत्ति है, वही सती है।

* तीसरी श्रेणी आती है तारा, मन्दोदरी, द्रौपदी, कुन्ती और अहिल्या की। ये पंचकन्या कही जाती हैं। ऐसा लगता है कि ये इतने प्रभावशाली कुल की थीं कि कवियों की हिम्मत ही नहीं पड़ी कि इन्हें कुछ कह दें तो पवित्र कन्या, पंचकन्या, सती इत्यादि कहते ही चले गये कि ये पाँचों चाहे जितना विवाह करें, सदैव कन्या रहेंगी अथवा पाँच पति तक ये क्षम्य थीं। अग्नि के समक्ष वेदी बनाकर भाँवर घूमने की वैदिक बाध्यता भी इनके लिए नहीं थी। द्रौपदी के पाँच पति थे। विवाह के पूर्व ही कर्ण की माँ बननेवाली कुन्ती ने अपने पति पाण्डु के निर्देश पर तीन देवताओं का आह्वान कर पाँच की संख्या पूरी कर ली। मन्दोदरी रावण एवं विभीषण तक ही सीमित रही और तारा बालि एवं सुग्रीव तक। अहिल्या ने दूसरे पर कदम रखा तो शाप मिला। पतिव्रता तो हर पति को समान मानती है। महाभारत में कथा आती है कि पाण्डव द्रौपदी के साथ हिमालय से स्वर्ग की ओर बढ़े। अकस्मात् भीम ने देखा कि द्रौपदी गलने लगी। अधीर होकर उन्होंने युधिष्ठिर से पूछा- ‘‘राजन्! यह द्रौपदी गल क्यों रही है?’’ तो धर्मराज ने बताया कि सुन्दरता के कारण नकुल को यह अधिक चाहती थी, इसी पाप से यह गल रही है। क्या पतिव्रता किसी पति को छोटा और किसी को बड़ा मानती है? मानती है तो पाप है। अहिल्या ने दूसरे ही पति को माना था। कदाचित् जानकर ही विचलित हुई तब भी इन्द्र को गौतम से कम क्यों मानती? फिर भी शाप मिला।

वस्तुतः ऐसा कुछ भी नहीं है। यह तो अच्छा हुआ कि पंचकन्याओं का आरक्षण समाप्त कर दिया गया कि अब छठीं कोई पंचकन्या नहीं होगी। एकल विवाह, बहु-विवाह, अनेक पति या पत्नी रखना सामाजिक व्यवस्थायें हैं। इनसे उस सतीत्व से कुछ भी लेना-देना नहीं है। महाभारत के आदिपर्व में पाण्डु ने कुन्ती को बताया कि पहले स्त्रियाँ स्वच्छन्द जीवन व्यतीत करती थीं। आरुणि उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु ने इसका विरोध किया, एक व्यवस्था दी, तभी से विवाह की प्रथा चल निकली। इस कथानक में सत्य का अंश चाहे जितना हो, बहुपति समाजों के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। यदि जलना ही सती का मानदण्ड है तो ऐसी स्त्रियों को इस सौभाग्य से वंचित होना पड़ेगा।

द्रौपदी, कुन्ती, अहिल्या, तारा और मन्दोदरी के सती होने में मूल कारण था- एक परमात्मा में दृढ़ संकल्प, प्रगाढ़ लगाव। तारा ने बालि को, मन्दोदरी ने रावण को जो उपदेश दिया, वह किसी महात्मा से कम नहीं है। कुन्ती में ऐसी निष्ठा थी कि जब-जब भगवान का स्मरण किया, वे आये। चीर-हरण के समय पाँच-पाँच पति द्रौपदी की रक्षा नहीं कर सके, रक्षा की तो भगवान ने। इन सबकी मुसीबतों में सहायता की तो भगवान ने की। अहिल्या को मुक्ति भगवान से मिली। उसकी श्रद्धा में इतना ठोस बल था कि परमात्मा को उसके पास तक जाना पड़ा। वे सब-की-सब उस सत्य पर आरूढ़ थीं, इसलिये सती कहलाईं।

भगवान राम के अनुसार नर तन एक दुर्लभ तन है, जिसका उपयोग भवसागर से तरने में है, परमात्मा को इसी शरीर से विदित करने में है। यह तन देवताओं को भी दुर्लभ है। किसी शव के पीछे जलाकर यह अमूल्य तन खो न दें। जिसलिए मिला है यत्न करें, यह फिर जल्दी नहीं मिलेगा।

वीरांगनाओं की शौर्यगाथा

* आजकल समाज में सती का जो अर्थ बहुचर्चित है, जिसके लिए झगड़े होते हैं, आचार्य प्रवर कुछ-न-कुछ कहा करते हैं अर्थात् पति के साथ चितारोहण, इस तथाकथित कोटि में माद्री का नाम उल्लेखनीय है। पाण्डु के अतिरिक्त अश्विनीकुमारों का उसने आह्वान किया था, जिससे नकुल और सहदेव पैदा हुए। पाण्डु की मृत्यु का कारण स्वयं को मानकर ग्लानिवश उसने पाण्डु के साथ चितारोहण भी किया; किन्तु शास्त्रकारों ने उसे सती नहीं कहा। लिखा है तत्रैनं चिताग्निस्थं माद्री समन्वारूरोह। (महाभारत, आदिपर्व ९५/६५) अर्थात् माद्री अपने पति के साथ चिता की अग्नि पर चढ़ गई; किन्तु सती कहा कुन्ती को। वास्तव में जब हम कभी मोहजाल में पड़कर मन का सन्तुलन खो बैठते हैं तो कुछ भी कर गुजरते हैं, अपने कृत्य को महिमा-मण्डित करने और उसका औचित्य सिद्ध करने का भी प्रयास करते-कराते हैं। माद्री ने यही किया।

* महाराजा दक्ष की एक कन्या का नाम ही सती था।

प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा।

सती नाम तब रहा तुम्हारा।।

दच्छ जग्य तव भा अपमाना।

तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना।। (मानस, ७/५५/२-३)

उनका विवाह शंकर से हुआ था। शंकर के आदेशों की अवहेलना करके जिन्होंने राम की परीक्षा लीं, अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिये पिता के यज्ञ में जल मरीं; किन्तु शंकर के साथ नहीं गईं। पुरुष भी स्त्रियों के लिये प्राण देते देखे गये हैं। प्रेम-विवाह की असफलता भी इस उन्माद का कारण रही है। स्वामिभक्ति में बहुत से पुरुष भी पुरुषों के लिये जले; जैसा कि ‘हर्षचरित’ में है कि हर्ष के पिता प्रभाकरवर्धन की मृत्यु पर कितने ही मित्रों, मन्त्रियों और दासों ने अपने को मार डाला। राजतरंगिणी (७/१३८०) में है कि एक माता अपने पुत्र के साथ सती हो गयी। यहाँ जरूरी नहीं कि सती पति के साथ ही जले। बहुत सम्भव है कि प्राणत्याग के लिये जितनी स्त्रियों ने दक्षकन्या सती की विधि का अनुकरण किया, व्यंग्य में उन्हें भी सती कहा गया हो। वास्तविक सती तो कोई विरला होगा, उनके अभाव में इन नाममात्र की सतियों को ही समाज ने सती के रूप में पहचाना।

* जलकर परमगति पाने का तरीका स्त्रीमात्र पर लागू नहीं होता; क्योंकि भारत के बाहर अधिकांश देशों में स्वच्छन्द विचरण-जैसा है। जब तक चाहा साथ रहे, जब चाहा अलग हो गये। स्त्री-पुरुष दोनों के ही तीन-तीन, चार-चार विवाह सामान्य बात है। ईसाइयों में तो ऐसा ही है। इस्लाम में भी स्त्री एक वस्तु है। तलाक, इद्दत, निकाह और मुताह की छूट है। बहु-पत्नीकता, बहु-भर्तृकता तथा पुनर्विवाह के रहते इन समाजों में सतीत्व सम्भव नहीं है।

रहा भारत में! तो समाज मोटे तौर पर चार वर्णों में बँटा हुआ है, जिसमें से शूद्र की स्त्री चारों वर्णों के लिये उपभोग की वस्तु है। वशिष्ठ धर्मसूत्र (१८/१८) के अनुसार, वह आमोद-प्रमोद के लिये होती ही है। पातिव्रत्य धारण करने का उन्हें अवसर ही कब दिया गया? जंगली कबीलों में मातृसत्तामक परिवार हैं। कुमायूँ-गढ़वाल मण्डल में भी ऐसा है कि एक स्त्री के कई पति होते हैं। वह किसकी मृत्यु पर जले? याज्ञवल्क्य-स्मृति के टीकाकार विश्वरूप ने बताया है कि शूद्र स्त्री चितारोहण भी नहीं कर सकती। उनके समाज में विधवा-विवाह, पुनर्विवाह प्रचलित है। उनका पति कभी मरता ही नहीं, एक मरा तो दूसरा तैयार हो गया। अतः सती होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

वैश्यों में भी ससम्मान विधवा-विवाह होता है। एक पति मरा तो दूसरा विवाह स्वाभाविक है। अतः जल मरने का प्रश्न वहाँ भी नहीं है; क्योंकि पति जिन्दा है। अपरादित्य ने अंगिरा, पैठीनसि इत्यादि धर्मशास्त्रकारों को उद्धृत करके बताया कि ब्राह्मणी विधवा के लिये सती होना मना है। विधवा पुनर्विवाह के लिये वेद में न केवल पुनर्भू शब्द है बल्कि अथर्ववेद (५/१७/७-९) में है- उत यत् पतयो दश स्त्रियाः पूर्वे अब्राह्मणाः ब्रह्मा चेत् हस्तमग्रहीत् स एव पतिरेकधा। ब्राह्मण एव पतिर्न राजन्यो न वैश्यः।। अर्थात् यदि कोई स्त्री पहले दस अब्राह्मण पति करे और अन्त में कोई ब्राह्मण उसका पाणिग्रहण करे तो ब्राह्मण ही उसका वास्तविक पति है, न कि क्षत्रिय या वैश्य। पाराशर-स्मृति में तो यहाँ तक छूट दी गई (अध्याय १०/६६) कि यदि ब्राह्मण की पत्नी घर छोड़कर कहीं अकेली गमन करे और सौ पुरुषों के पास जाकर भी लौट आये, तो सगोत्रियों द्वारा ऐसी स्त्री का बहिष्कार किया जाना चाहिए। पतिगृह में जाने पर भी वह घर उसी का माना जाता है, जिसके यहाँ वह आती-जाती है। इससे स्पष्ट है कि निन्यानबे तक उसका बहिष्कार नहीं होना है, तो वह क्यों जलेगी? महाभारत-युद्ध में ब्राह्मण द्रोणाचार्य की मृत्यु के पश्चात् उनकी पत्नी कृपी सती नहीं हुई।

प्रथा के रूप में स्त्रियों के जलने का आरम्भ क्षत्रियों से हुआ, जो परिस्थितिजन्य था; क्योंकि विजयी राजा विजित राजाओं और शूरवीरों की पत्नियों से भयंकर प्रतिशोध लेते थे, उन्हें बन्दी बनाकर ले जाते थे। राजपूतों ने जब देखा कि जिस मर्यादा की रक्षा के लिए वे लड़ रहे हैं, पराजय के पश्चात् उन्हीं स्त्रियों और छोटी बच्चियों तक की आहुति चिता में देने लगे। जन्म के समय ही कन्याओं का वध होने लगा। ऐसी कई घटनाएँ हुईं तो क्षत्राणियों ने कहा कि आप वीर हैं तो हम भी वीरांगना हैं, आप हमारी चिन्ता न करें। आप वीरगति पायेंगे तो हम स्वयं चितारोहण कर लेंगे। इस प्रकार सामूहिक जौहर या व्यक्तिगत जलने की प्रथा चल निकली। एक बार जब वह प्रथा जड़ पकड़ गयी तो व्यवस्थाकारों ने इसे सत्पथ करार कर बल दे दिया (राजाओं का विरोध करता भी कौन?) और जलने से मिलनेवाले पुण्यों की झड़ी लगा दी।

विचारणीय है कि जब अन्य किसी के लिये जलने का विधान नहीं, तो इन क्षत्रियों को ही नष्ट करने में क्यों लगे हैं? आप सबकी सुरक्षा के लिये शीश देते-देते जो अल्पसंख्यक हो गये, उन्हीं की आँख पर धर्म की पट्टी बाँधकर क्यों गुमराह किया जाता है?

* राजा-महाराजा जैसे उच्चवर्ग से जब यह प्रथा व्यापक रूप में निकली तो जनसामान्य में भी इसका जहाँ-तहाँ प्रभाव पड़ा। राजस्थान के बाद स्त्रियों के जलने की अधिक घटनाएँ बंगाल में हुईं, क्योंकि कुलीन परिवारों में विवाह करने का व्यामोह इतना अधिक था कि मृत्युशैया पर लेटा वृद्ध रईस भी सिन्दूर-दान करता था। एक-एक रईस के पत्नियों की संख्या सैकड़ों तक पहुँच जाती थी। बंगाल में उत्तराधिकार ‘दायभाग’ नामक पुस्तक से निर्धारित होता था, जिसमें पुत्रहीन विधवा को भी सम्पत्ति में पति के बराबर का अधिकार था, इसलिये पति के मरने पर परिवारवाले पत्नी के पतिभक्ति की इतनी अतिरंजित प्रशंसा करते थे कि वह चिता में भस्म हो जाया करती थी।

* न केवल विधवा के परिवारवाले, बल्कि इसे धर्म घोषित करनेवाले व्यवस्थाकार भी सम्पत्ति-मोह की भावना से ग्रस्त थे। गरुड़ पुराण में है कि चितारोहण के लिये जानेवाली स्त्री पहले ब्राह्मणों को दान दे, फिर देव-मन्दिर में जाकर अपना सारा आभूषण अर्पण कर दे। (१०/३६-४०) बृहद्नारदीय पुराण में है कि रजस्वला होने की दशा में स्त्री पति की चिता पर नहीं चढ़ सकती; किन्तु १७९० ई. में लिखित धर्मसिन्धु में है कि यदि स्त्री मासिक धर्म के पहले दिन तीस गाय, दूसरा दिन हो तो बीस गाय और तीसरे दिन दस गाय दान करे, तो ब्राह्मण उसे शुद्ध घोषित कर सकता है और वह उसी दिन चितारोहण कर सकती है। अस्तु, यह कोई धार्मिक विधान नहीं, अपितु शोषण का विधान है। सती चौराओं से चलनेवाली जीविका भी कम प्रेरक नहीं रही है।

* विश्वभर में स्त्रियों के शोषण का लम्बा इतिहास रहा है, स्त्री को जला मारना उसी की अभिव्यक्ति मात्र है। ईसाई विचारधारा में आठवीं शताब्दी तक पादरियों में इस प्रश्न पर मतभेद था कि स्त्रियों में आत्मा होती भी है या नहीं; क्योंकि ईश्वर ने स्त्रियों का निर्माण पुरुष के सीने की कोमल पसलियों से किया है। इस्लाम में भी स्त्री-पुरुष की समानता कहाँ, जब एक पुरुष कई-कई पत्नी रख सकता है? उन्हें खेत के समान माना गया है। नमाज उनके कान में न पड़ने पाये, वे मस्जिद में घुसने न पायें। धर्म को अफीम माननेवाले कितने ही साम्यवादी देशों में भी स्त्री-पुरुष में ही साम्य नहीं है, उन्हें मताधिकार प्राप्त नहीं है। संसार में सर्वत्र स्त्रियों को किसी-न-किसी रूप में यातनाएँ झेलनी पड़ी हैं। अकेले भारत में ही उन्हें पुरुषों के समान सम्मान मिला। भगवान शिव अर्द्धनारीश्वर हैं अर्थात् वह ब्रह्म अर्द्धनारी और अर्द्धपुरुष मिलाकर संसार का सृजन करता है। यह अवश्य है कि समय के साथ कुछ विकृतियाँ भारत में भी आ गई हैं; जैसे- चिता को अग्नि देने के लिए पुरुष की अनिवार्यता क्यों? स्त्री को भी यह अधिकार मिलना चाहिए। इसी प्रकार मुक्ति के लिए पिण्डदान और पिण्डदान के लिए पुत्र की अनिवार्यता, पुत्र के लिए भ्रूण-परीक्षण, पुत्र-जन्म पर विशेष समारोह, दहेज इत्यादि प्रथायें मानवता के नाम पर कलंक हैं। विधवा सामाजिक बहिष्कार झेलती है, अमंगल का प्रतीक मानी जाती है, पर विधुर का कोई तिरस्कार या सामाजिक बहिष्कार नहीं होता। विधुर का विलासी जीवन भी क्षम्य है, किन्तु विधवा सुख-शान्ति से जीने का अधिकार भी खो देती है। विधवाएँ ही अनाथ क्यों होती हैं? महाभारत आदिपर्व में है कि एकचक्रा नगरी में राक्षस से आतंकित एक ब्राह्मणी विधवा होने की आशंका से विलाप कर रही थी कि जिस प्रकार पृथ्वी पर पड़े माँस के टुकड़े पर पक्षी टूट पड़ते हैं, वैसे ही पतिहीन स्त्री पर पुरुष टूट पड़ते हैं।

* इस प्रकार स्त्रियाँ तब जलती थीं, जब उनके सतीत्व पर संकट था, धर्माचरण में बाधा थी; क्योंकि धर्माचरण का एक ही तो शत्रु है काम। गीता में है- काम एष क्रोध एष। इन्द्रिय-संयम के साथ सतत तपस्या का व्रत लेनेवाली वेदवती ने जब देखा कि महाबली रावण ने उसके केशों को पकड़ लिया है, तो धर्माचरण को सुरक्षित न समझ उसने उन केशों को काटकर अपने शरीर का दाह कर लिया। दीर्घकाल तक इन्द्रिय-संयम के साथ निरन्तर चिन्तन द्वारा जो उस सत्य के लिये मन को वश में करने में लगा है, इस व्रत के निर्वाह में यदि बाधा उत्पन्न होती है तो सत्य के बचाव के लिये साधकों ने शरीर का त्याग ही श्रेयस्कर माना है, चाहे पुरुष रहे हों या महिला। महिलाओं के लिए एक बलात्कारिक विघ्न पुरुषों की तुलना में अधिक है, इसलिए माताओं को एक निश्चित क्षमता आने के पूर्व तक घर में रहकर ही भजन करने का विधान है। पतित होने की अपेक्षा शरीर-त्याग अच्छा है। इसी को लक्ष्य करके पूज्य गुरुदेव कहा करते थे- ‘‘हो साधु होना और मरना बराबर है।’’ साधन कठिन न मन कहुँ टेका (मानस, ७/४४/३) साधन कठिन नहीं होता, मन की टेक दृढ़ होनी चाहिए। यही बात ईसा कहते थे कि- यदि तेरा हाथ, पाँव या आँख तुझे ठोकर खिलायें तो इन्हें काटकर अलग कर दे। तेरे लिये अच्छा है कि इन अंगों से रहित होकर भला जीवन बिताये। इन अंगों के साथ जीने से क्या लाभ, यदि इन्हीं अंगों के कारण तुझे अनन्तकाल तक नरक को जाना पड़े। (मरकुस ९/४३-४७)। अस्तु वेदवती ने अग्नि-प्रवेश कर लिया; किन्तु जलने से उसे मोक्ष नहीं मिल गया बल्कि जन्म लेना पड़ा। जहाँ से साधन छूटा था, वहाँ से पुनः आरम्भ करना पड़ा। दूसरे जन्म में वही सीता कहलाई। उस शाश्वत सत्य पर दृढ़ निष्ठावान् होने और जन्म-जन्म में सतत साधनापरायण होने से राम को पा गयी।

शरीर देकर भी सत्य को सुरक्षित रखने की गौरवशाली परम्परा रही है; किन्तु प्रथा प्रथा है, धर्म नहीं। प्रथा परिस्थितिजन्य होती है, जबकि धर्म शाश्वत है। माताओं ने जिन किन्हीं परिस्थितियों में यह बलिदान दिखाया, आज वे परिस्थितियाँ नहीं रहीं। अतः हर प्रथा को पूर्वजों की धरोहर मानकर उसे ज्यों-का-त्यों अपनाना कोई बुद्धिमानी नहीं है। एक समय वही जरूरी था किन्तु अब वह आवश्यक नहीं रही- यह जानकर हम श्रद्धा-पूर्वक इस प्रथा का विसर्जन कर सकते हैं और इसके विसर्जन के दिन आये भी हैं।

वेद

चारों वेदों में पति के साथ जलकर मरनेवाली एक भी स्त्री का नाम नहीं है, न कहीं सती शब्द आया है और न कहीं स्त्रियों के लिए पति के साथ जलना धर्म बताया गया है; बल्कि इसके विपरीत वेद का निर्णय है कि एकमात्र परमात्मा को विदित किये बिना जन्म-मृत्यु से बचने का अन्य कोई रास्ता है ही नहीं। विश्वभर के लिए, स्त्री-पुरुष सबके लिए एक ही रास्ता है- परमात्मा का भजन। गार्गी-जैसी विदुषी नारियों ने इसी परमात्मा की शोध को श्रेयतर समझा, उन्होंने विवाह किया ही नहीं। पति के साथ जलना वेदसम्मत होता तो उस काल की इन विदुषी नारियों ने यह स्वर्ण अवसर हाथ से जाने न दिया होता। मैत्रेयी को भी उसके पति याज्ञवल्क्य ने अविनाशी आत्मा को ही विदित करने का बहुमूल्य परामर्श दिया, जलने का नहीं। अपाला, विश्ववारा, घोषा कोई भी तो नहीं जली।

श्रीरामचरितमानस

रामचरितमानस में भगवान श्रीराम ने कहा कि पुरुष नपुंसक नारि वा, जीव चराचर कोइ।– इनमें से कोई भी हो, जो सम्पूर्ण भावों से मुझे भजता है-सर्ब भाव भज कपट तजि, मोहि परम प्रिय सोइ। (७/८७ क)- वह मुझे परमप्रिय है।

गोस्वामीजी का निर्णय है कि-

बारि मथें घृत होइ बरु, सिकता ते बरु तेल।

बिनु हरिभजन न भव तरिअ, यह सिद्धान्त अपेल।। (७/१२२ क)

अकाट्य सिद्धान्त है कि बिना हरि-भजन से कोई भवसागर पार नहीं होता और यहाँ तमाम तरीके लोगों ने निकाल रखे हैं, जो सब-के-सब भव ही पार कराने का दावा करते हैं जिसमें से एक उपाय पति के साथ जलना भी है। तब तो वेद झूठा, गोस्वामी तुलसीदासजी झूठे, राम और श्रीकृष्ण की वाणी भी झूठी; किन्तु ऐसा कुछ नहीं है। परमात्मा तक की दूरी तय करने की, भव पार करने की अन्य कोई क्रिया नहीं, क्रिया एक ही थी, एक ही है और एक ही रहेगी- केवल एक परमात्मा का भजन।

रामायण

वाल्मीकीय रामायण में है कि दशरथ की मृत्यु पर कौशल्या शोक-विकल हो कैकेयी से कहती है कि एक पतिव्रता की भाँति मैं भी पति के शरीर का आलिंगन कर चिता की आग में प्रवेश कर जाऊँगी; किन्तु आदिकवि लिखते हैं कि जब दशरथ की चिता को आग लगा दी गयी, इसके बाद रानियाँ बूढ़े रक्षकों से घिरी हुईं शिविकाओं और रथों पर आरूढ़ होकर नगर से निकलीं। श्मशान में जाकर चिता की परिक्रमा कीं, पुनः सवारियों में जाकर सरयू तट पर उतरीं और दशरथ को जलांजलि दिया, जली एक भी नहीं। अतः पतिव्रता का आशय मात्र एक पति में निष्ठा से है, जीवनपर्यन्त सुख-दुःख में हाथ बँटाने से है। आग में जलने की बात एक परिस्थिति एवं शोकजनित उद्गार है। कहीं-कहीं जलने की घटना हो भी जाती थी; किन्तु उसे धर्म की मान्यता कभी नहीं मिली। तेरहवें दिन अस्थि-संचय के समय भरत और शत्रुघ्न भी इसी प्रकार अपने पिता की स्मृति से विह्वल होकर अग्नि में कूदकर प्राण देने को तत्पर हुए तो सुमन्त ने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया। कदाचित् वे ऐसा कर भी लेते तो क्या यह धर्म हो जाता? यह भी शोकजनित व्यवहार ही होता।

* बालि की मृत्यु के पश्चात् तारा पति के साथ जलने का निश्चय कर चुकी थी। हनुमान उसे समझाकर हार चुके थे, सुग्रीव भी प्रज्वलित अग्नि में कूदना चाहते थे; किन्तु मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने उन दोनों को समझा-बुझाकर प्राण त्यागने से रोका। यदि जीवित जलना धर्म रहा होता तो राम मना क्यों करते? धर्म की रक्षा के लिए, मृत्युलोक के प्राणियों को शिक्षा देने के लिए ही तो वे आये थे। इस प्रथा का मौन समर्थन भी तो उन्होंने नहीं किया। आजकल के धर्माचार्य कहते हैं कि सती होना चाहिए और उस समय के धर्माचार्य वशिष्ठ इत्यादि ने रोका था, धर्म-धुरीन भरत ने समझाया है। यदि यह सत्य होता तो क्या वे महापुरुष सहमति न देते? वाल्मीकीय रामायण के अनुशीलन से स्पष्ट है कि श्रीराम का प्रभाव जहाँ-जहाँ स्थापित होता गया, उन्होंने ऐसी अमानुषिक घटना नहीं होने दी।

रामचरितमानस में भी है कि भगवान ने तारा को समझाया-

छिति जल पावक गगन समीरा।

पंच रचित अति अधम सरीरा।। (मानस, ४/१०/४)

अर्थात् शरीर पाँच तत्वों से बना है और नाशवान् है। यदि इस शरीर के लिये रो रही हो तो बेकार है; क्योंकि शरीर तुम्हारे समक्ष अब भी है, और जो निकल गया उस जीवात्मा के लिए शोक करती हो तो व्यर्थ है; क्योंकि वही तो एक शाश्वत है, अमृत है, अशोच्य है, ठीक वही बात जो गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं। अस्तु, हमारे-आपके पूर्वजों ने मृत शरीर को कभी भी महत्त्व नहीं दिया, इसलिये उसके दाह-संस्कार की प्रथा है। गाड़ने, मजार बनाने, पिरामिड बनाने या ममी बनाकर उसे सुरक्षित रखने का विधान स्वीकार नहीं किया गया।

* महासती अनसूया ने सीता के आचरण की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम्हारे समान जो स्त्रियाँ हैं (राम के जीवित रहते सीता सती हैं, इस प्रकार की सती स्त्रियाँ), वे उत्तम गुणों से युक्त होकर पुण्यकर्म में संलग्न रहती हैं। अतः तुम सती-धर्म का पालन करो, अपने स्वामी की सहधर्मिणी बनो। अनसूया ने पति के साथ जलने का उपदेश नहीं दिया बल्कि पति के धर्म का भागीदार बनने को कहा। क्या था राम का धर्म? चित्रकूट में राम ने भरत से कहा था कि पिताजी ने जरा-जीर्ण मानव-शरीर का परित्याग कर दैवी सम्पद् अर्जित की है, जो ब्रह्मलोक में विहार करानेवाली है। मनुष्यों में श्रेष्ठ भरत! पूज्य पिताजी के शुभ आचरणों पर दृष्टिपात करके तुम अपने धार्मिक स्वभाव द्वारा आत्मा की उन्नति के लिये प्रयत्न करो। अतः आत्मा की उन्नति करना ही धर्म है। ठीक यही श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा को अधोगति में न ले जायँ क्योंकि आत्मा ही सत्य है। अस्तु, जो इस सत्य पर आरूढ़ रहे (सत्य एकमात्र परमात्मा है), जो परमात्मा में निष्ठावान् रहे, वही सच्चा सती है। जलने को राम ने न सती कहा, न धर्म।

गीता

वेदों के सारांश उपनिषद् और उपनिषदों का भी सारांश साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण की वाणी गीता (अध्याय २/१६) में है कि असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत्य का तीनों काल में अभाव नहीं है। सत्य है क्या? कहते हैं- अर्जुन! आत्मा ही सत्य है। आत्मा, परमात्मा, ईश्वर, भगवान या परब्रह्म इत्यादि एक दूसरे के पर्याय हैं। आत्मा ही शाश्वत है, आत्मा ही सनातन है। हम कौन हैं? सनातनधर्मी! सनातन कौन है? आत्मा! अब यदि हम उस आत्मपथ को नहीं जानते, उस आत्मा को विदित करने की क्रिया को नहीं जानते तो कैसे सनातनधर्मी? सिद्ध है कि हम अभी धर्म के पिपासु मात्र हैं किन्तु उसे नहीं जानते। अभी उसके समीप भी नहीं पहुँचे। पति के साथ जलना सनातन-धर्म नहीं है बल्कि आत्मा को जानने की निर्धारित क्रिया का आचरण ही सनातन-धर्म है।

* गीता (अध्याय २/१८) के अनुसार- आत्मा सनातन है और भूतादिकों के सम्पूर्ण शरीर नाशवान् हैं, शरीर का कोई अस्तित्व नहीं है। (२/१३) वह मूढ़बुद्धि है जो शरीरों के लिये पचता है; क्योंकि शरीर नाशवान् है, इसे रोका नहीं जा सकता। अब इस नश्वर शरीर के पीछे कोई शरीर को त्याग दे तो उसने सत्य के पीछे तो त्यागा नहीं, सनातन परमात्मा के पथ में तो त्यागा नहीं, अस्तित्वविहीन, अशाश्वत के पीछे प्राण त्यागनेवाला शाश्वत धाम कैसे पायेगा?

* वासांसि जीर्णानि यथा विहाय (गीता, २/२२)- जैसे पुराने वस्त्रों को त्यागकर हम-आप नया वस्त्र धारण करते हैं (वस्त्र बदलनेवाला जीवित है, वस्त्र फटने के बाद भी आप जिन्दा हैं), ठीक इसी प्रकार आत्मा केवल वस्त्र बदलता है तो सदैव जीवित इस आत्मा को छोड़कर एक वस्त्र के पीछे जल मरने से सनातन शाश्वत धाम कैसे मिल जायेगा? सनातन को पाने की यह विधि नहीं है।

* आत्मा सबमें है तो ढूँढ़ा किसे जाय? योगेश्वर कहते हैं कि है तो अजर-अमर-शाश्वत ऐसा ही; किन्तु (गीता २/२५) आत्मा अचिन्त्य है। जब तक चित्त और चित्त की लहर है तब तक आत्मा की अनुभूति नहीं होती। इसी चित्त के निरोध के लिये इन्द्रिय-संयम किया जाता है। इन्द्रिय-संयम के साथ चित्त के अचल स्थिर ठहर जाने पर जब अन्तिम संस्कारों का भी शमन हो जाता है तो तत्क्षण जो शेष बचता है उसी का नाम आत्मा, परमात्मा है। अगले जन्मों या किसी कल्पित स्वर्ग में पति के साथ विहार की कामना जिसमें अभी शेष है, तो सिद्ध है कि न तो अभी उसका चित्त निरुद्ध है और न ऐसी विषमता में परमगति ही है।

* गीता, अध्याय १४ श्लोक १८ में है कि तामसी गुणों के कार्यकाल में शरीर त्यागनेवाला पशु-पक्षी, कीट-पतंगादि अधम योनि को प्राप्त होता है, सात्त्विक गुणवाला उन्नत योनि में जाता है। योनि मिलती है, मोक्ष नहीं। राजसी गुणप्रधान व्यक्ति मध्यम शरीर को प्राप्त करता है। लोग उचित-अनुचित साधनों से अपनी गृहस्थी में ही तो लगे हैं, ईश्वर-चिन्तन तो किया नहीं, उनकी वृत्तियाँ सात्त्विक, राजस या तामस कहीं न कहीं उलझी अवश्य हैं। जो जैसी परिस्थिति में है वैसी ही योनि प्राप्त करेगा। मान लें, यदि कोई पशु हो गया। नहुष इन्द्रपद से गिरा तो अजगर हुआ। राम के समय कलिंजर और विरक्त गद्दीधारियों की यह हालत है तो सामान्य मनुष्य को पशुयोनि मिले तो आश्चर्य क्या? मान लें, कोई पशु हो गया और उसके पीछे चलनेवाली को पति के लोक में जाना है, परमगति तो मिली नहीं और उसका लोक हो गया पशुयोनि, जहाँ न कोई किसी का पति है, न पत्नी। वहाँ तो उन्मुक्त विचरण है। कहाँ सुरक्षित रहा उसका सतीत्व?

* गीता में ही है कि यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः। (अध्याय ८/६) अन्तिम समय में जो जिसका स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, उसी योनि को प्राप्त करता है। मृगशावक का चिन्तन करनेवाले महर्षि जड़भरत को मृग-शरीर मिला। इसी प्रकार पुरुष का स्मरण करते हुए जल मरनेवाली अगले जन्म में बनेगी पुरुष, तो पुरुष का पति कैसा? अस्तु, जल मरना एक भ्रम है।

* योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि (८/५) अर्जुन! जो मेरा स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, साक्षात् मेरे स्वरूप को प्राप्त करता है। जहाँ से पीछे लौटकर आवागमन में नहीं आना होता। तब तो बड़ा सस्ता सौदा है। जन्मभर मस्ती काटें, जब मरने लगेंगे तो भगवान को भी याद कर लेंगे; किन्तु अभी पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, सदा तद्भावभावितः– प्रायः वही चिन्तन बलात् उभरकर आ जाता है जिसका जीवन में अधिक प्रयोग किया है। इसलिये अर्जुन! तू आज से ही (कल कभी नहीं आता), अभी से मेरा ही चिन्तन कर। अतः आवागमनरहित परमगति का रास्ता क्या है? परमात्मा का निरन्तर चिन्तन! चिता में जलने से परमगति गीता नहीं कहती। जीवनपर्यन्त पतिपरायण वृन्दा को जलन्धर का पतिलोक भी नहीं मिल सका। अपितु, जिसने पातिव्रत में बाधा पहुँचाई, उसी विष्णु का साथ मिला, जलन्धर का नहीं।

* शरीर धारण करने के सम्बन्ध में गीता का निर्णय है कि शरीर से उत्क्रमण करते हुए जीवात्मा मनसहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के जीवन भर के क्रियाकलापजन्य संस्कारों के अनुरूप नया शरीर धारण करता है। इसलिये अपने-अपने संस्कारों के अनुरूप पति-पत्नी को तथा उनके परिवारवालों को भिन्न-भिन्न देह की प्राप्ति अधिक सम्भव है।

* महाभारत-जैसे युद्धकाव्य में, जो रक्तरंजित इतिहास से भरा पड़ा है, स्त्रियों के जल मरने का प्रतिशत नगण्य है। स्त्री-पर्व में है कि कौरव और पाण्डव पक्ष के वीरों की पत्नियाँ जली नहीं। प्रभास क्षेत्र में श्रीकृष्ण के लीला-संवरण के पश्चात् यदुवंशी वीरों की पत्नियाँ नहीं जलीं। अर्जुन उन्हें लेकर हस्तिनापुर लौट रहे थे कि भीलों ने मार्ग में ही उन स्त्रियों को छीन लिया- भीलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन वही बान।

* गीता में है कि अर्जुन युद्ध के परिणाम नरसंहार के पश्चात् कुल की स्त्रियों के दूषित होने की आशंका से विकल था (गीता १/४१)। यदि उन सबको पति के साथ जलना ही रहा होता, तो अर्जुन इतना चिन्तित क्यों होता? आश्चर्य है कि जिस सती-प्रथा से परमगति मिलनेवाली हो, गीता-जैसे धर्मशास्त्र में उसकी चर्चा तक नहीं है।

* गीता अध्याय ९ श्लोक ३२ में है कि स्त्री, वैश्य, शूद्रादि तथा जो कोई भी पापयोनिवाले हों, वे सभी मेरे आश्रित होकर परमगति को प्राप्त होते हैं। अर्थात् एक परमात्मा को ही भजने का विधान सबके लिए है। ऐसा नहीं है कि स्त्री के लिये कोई दूसरा विधान हो और पुरुष के लिये कोई दूसरा। उसी एक परमात्मा को भजना, पुरुष और स्त्री के लिये एक ही विधान निर्धारित है।

* अध्याय ८/१२-१३ में है कि मन को हृदयदेश में निरुद्ध करके जो पुरुष शरीर का त्याग कर जाता है, वह परमगति को प्राप्त होता है। अर्थात् पहले मन का निरोध फिर परमगति, यही तरीका है। यहाँ मन का निरोध तो किया नहीं, पहले शरीर को जला दिया, तो परमगति कैसे मिलेगी? साधन-धाम जो शरीर मिला था, वह भी जला दिया? जीते-खाते परिवार में सहसा कोई मरा, आमोद-प्रमोद में जीवन बितानेवाली स्त्री चिता पर चढ़ गयी। जलाना जिस मन को था उसका संयम तो किया नहीं, जला दिया देवदुर्लभ मानव-तन को। अनन्त योनियों का चक्कर काटकर न जाने कब यह साधन-तन मिले? इससे बड़ी क्षति क्या होगी? अतः सबको एक परमात्मा का सुमिरन करना चाहिए।

स्मृति

सती-प्रथा को उछाला स्मृतिकारों ने। पाराशर-स्मृति में है कि जो स्त्री पति के मर जाने पर संयमपूर्वक दिन बिताती है, वह मरने पर स्वर्ग जाती है; किन्तु जो पति के साथ प्राण त्यागकर उसका अनुगमन करती है, वह मनुष्य शरीर में रहनेवाले साढ़े तीन करोड़ रोएँ के बराबर वर्षों तक स्वर्ग में वास करती है। जिस प्रकार सपेरा साँप को उसके बिल से बलात् निकाल लेता है, ऐसी सती अपने पति को खोजकर वहाँ भी उसी के साथ विहार करती है। स्पष्ट है कि इस स्मृतिकार को विधवा का संयमित जीवन भी पसन्द है, किन्तु प्राण त्यागनेवाली विशेष है, क्योंकि वह स्वर्ग में भी सहवास करती है। विधवा का पुनर्विवाह स्मृतिकारों को मान्य नहीं है, क्योंकि उसकी शुद्धि असम्भव है।

इसी स्मृति के चौथे अध्याय में है कि जो ब्राह्मण अनिच्छा से पतितों के साथ पाँच, दस, बारह अथवा पन्द्रह दिन या एक मास, दो मास, छः मास या अधिक से अधिक एक वर्ष तक निवास करे तो उसकी शुद्धि सम्भव है जिसमें गो-मूत्र में पके जौ खाना और तप्त कृच्छ्र व्रत रखना पड़ता है; किन्तु यदि एक वर्ष से एक दिन भी अधिक उनके बीच रह जाय तो उसकी शुद्धि का कोई उपाय नहीं रह जाता। वह वही हो जाता है, जिनके बीच वह रह रहा है। आज ब्राह्मणों के बालक यूरोप और अमेरिका जाते हैं, ढाई-तीन साल में लौटते हैं। दुबई इत्यादि खाड़ी देशों में रिश्वत देकर भी सर्विस पाना, मुसलमानों के बीच रहना, खाना-पीना पसन्द करते हैं, नाम तक बदल लेते हैं, कुछेक तो वहीं अन्तर्जातीय विवाह करके लौटते हैं। व्यवस्था न होते हुए भी वे ब्राह्मण आज शुद्ध हो गये, कोई धर्माचार्य उनकी ओर अंगुली भी उठाने का साहस नहीं कर पाता, तो माताओं को जलाने में ही क्यों गौरव मानते हैं?

मनुस्मृति के दसवें अध्याय में है कि ब्राह्मण पिता और शूद्र जाति की स्त्री से निषाद या केवट पैदा होता है तो वह नाव चलाये और मछली का व्यवसाय करे। विचारणीय है कि पृथ्वी का तिगुना धरातल जल! इतनी अधिक नदियाँ, झीलें और समुद्र! इन सब स्थानों पर मत्स्य व्यवसाय, विशाल नेवी विभाग का संचालन एक-दो ब्राह्मणों के आकस्मिक भूल से सम्भव नहीं है। इन विभागों को बड़े पैमाने पर छूट देनी होगी कि वे निषादों की संख्या बढ़ायें।

इसी प्रकार क्षत्रिय और ब्राह्मणी से उत्पन्न पुत्र सूत घोड़ों और रथों का कार्य देखे। प्राचीन नरेशों के पास चतुरंगिणी सेना होती थी, जिनमें लाखों रथों की देखभाल पचीस-पचास सूत पैदा करने से नहीं हो सकता था। शूद्र और ब्राह्मणी के समागम से उत्पन्न चाण्डाल स्टेटों में वध-कार्य करता था। जेल विभाग उसके अधीन था। जिस वर्ण/वर्णसंकर के लिए जो कार्य निर्धारित था, उसे दूसरे वर्णवाले नहीं कर सकते थे; अन्यथा इसी स्मृति में है कि राजा उसे निर्धन करके देश से निकाल दे। आप विचार करें कि उपर्युक्त विभाग राज्य के प्रमुख अंग हैं और इन्हें चलाने की यदि व्यवस्था थी तो कोई सती कैसे होगी? ऐसी अवस्था में पातिव्रत धर्म कब तक सुरक्षित रह सकेगा?

प्राचीन समाज में वर्णसंकर पैदा करने की छूट के प्रमाण भी मिलते हैं। इतना ही नहीं, जिन माता-पिताओं ने वर्णेतर सहवास किया, उनको दण्ड तो दूर अपमान भी नहीं झेलना पड़ा; प्रत्युत् उनसे पैदा होनेवाले निर्दोष बच्चे ही दोषी ठहराये गये कि वे गाँव के बाहर रहें, मिट्टी के बर्तन में खायें, मुर्दों के उतारे वस्त्र पहनें, पेड़ के नीचे आज यहाँ तो कल वहाँ रहें। मनुस्मृति कहती है कि शुद्ध हृदयवाले ब्राह्मणों ने ऐसी व्यवस्था दी है। भूल माता-पिता ने की और पीढ़ी-दर-पीढ़ी दण्ड बच्चों को? धिक्कार है ऐसी व्यवस्था को!

निष्कर्ष

सती-प्रथा धर्म है या नहीं?- यह जानने के लिए आवश्यक है कि सभी लोग धर्म की सही परिभाषा जान लें कि मात्र एक परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ना ही धर्म है; क्योंकि वही समस्त सुख तथा शाश्वत शान्ति का केन्द्र है। वह है तो सर्वत्र; किन्तु उसे खोजने की स्थली प्रत्येक स्त्री-पुरुष के हृदय के भीतर ही है- बाहर कहीं है ही नहीं। वेद के पुरुष-सूक्त का उद्घोष है कि दैवी सम्पद् को हृदय में उतारनेवाले पूर्व महापुरुषों ने मानस यज्ञादि साधनों द्वारा शरीर में स्थित जिस पुरुष को जाना था, ब्रह्मा ने जिसकी स्तुति की थी, इन्द्र ने जिसे सर्वत्र व्याप्त देखा था, उस परमपुरुष को जो जानता है वह यहीं, इसी जन्म में अमृतपद प्राप्त कर लेता है। इसके अतिरिक्त अमर होने का अन्य कोई भी मार्ग नहीं है। यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् (ऋग्वेद, १०/९०/१६)- दैवी गुणसम्पन्न पुरुषों ने यज्ञस्वरूप महापुरुष को लक्ष्य बनाकर उनकी पूजा की। यही धर्म है।

अतः वेद के अनुसार धर्म क्या है? उस एक परम पुरुष को जानना। जानने के लिए क्या करना है? मानसिक यज्ञ, मन का निरोध! वह होगा कैसे? तो हर ऋतु में उसी एक परमात्मा के चिन्तन से, यज्ञस्वरूप महापुरुष से! बस इतना ही धर्म है। यही सत्पथ है। इसी पर चलनेवाला सती है। यह स्थिति जीवित अवस्था में ही मिलती है, जलने या मरने से नहीं।

ठीक यही गीता का निर्णय है कि इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।– उन पुरुषों द्वारा जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया, जिनका मन समत्व में स्थित है। निर्दोषं हि समं ब्रह्म– उधर वह ब्रह्म निर्दोष और सम है और इधर साधक का मन भी निर्दोष और सम स्थितिवाला हो गया। समान गुणधर्मवाला होने से तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः (गीता, ५/१९)- वह ब्रह्म में स्थित हो जाता है। तो ब्रह्म में स्थिति कब मिलती है? जब संसाररूपी शत्रु जीतने में आ जाय। संसार कब जीतने में आता है? जब मन का निरोध हो जाय! महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।(मानस, ६/८० क)

प्राप्तिवाले हर महापुरुष ने मन को जीतने की बात कही है। मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। (ब्रह्मबिन्दूपनिषद्, १)- मनुष्यों की मुक्ति और बन्धन का कारण मन है, तो जब तक मन जिन्दा है तब तक शरीर जलाने या न जलाने से क्या होगा? मन के निरोध के लिए ही तो साधन-भजन किया जाता है; किन्तु शरीर जलाने से न तो मन का निरोध देखा-सुना गया है और न यह भजन की कोई विधा ही है।

संसार भर के लोग भजन के नाम पर कुछ-न-कुछ करते ही रहते हैं, जैसे- लोग सवेरे नहा-धोकर सूर्य को, पीपल को या कहीं जल चढ़ाते हैं, धूप-दीप करते हैं, कुछ श्लोक या चालीसा पढ़ लेते हैं। स्त्रियाँ डीहबाबा, चौरा माई, सती माई, विविध पेड़-पौधों अथवा जलाशयों को पूजती हैं, जिसमें सामग्री और आसन (मुद्रा) की भिन्नता रहती है, जैसे- कोई एक पैर उठाकर पूजता है, कोई लेटकर तो कोई बैठकर। तरह-तरह की पूजन सामग्री और नैवेद्य के अन्तर्गत पशु-पक्षी तथा स्त्री-पुरुष की भी बलि चढ़ाकर समृद्धि के साथ परमधाम पाने की चेष्टा करते हैं।

इसी प्रकार गृहत्याग के पश्चात् कोई एक दण्ड को, तो कोई तीन दण्ड को मोक्ष का उपाय मानता है। कोई चन्दन के लेप का, कोई स्नान का महत्त्व बताता है तो कोई मुण्डन का, कोई कुण्डल का, तो कोई विभूति का। ये सन्त-वेष त्याग और तपस्या को ही इंगित करते हैं, सत्य के प्रति हमारे द्वारा लिये गये व्रत की स्मारिका हैं। बाना (पोशाक) सत्य की ही है; किन्तु यह साधन नहीं है, यह केवल फाउण्डेशन (नींव) है।

जैन साहित्य में इसका आशय बताते हुए एक रोचक कथा कही गयी है कि भगवान महावीर अपने पूर्वजन्म में सम्राट भरत के पुत्र मरीचि के रूप में थे। कठोर साधना से विचलित होने पर उन्होंने सोचा कि मैं मन, वचन और काया के विकारों से युक्त हूँ अतः इसके प्रतीक के रूप में त्रिदण्ड धारण करूँगा। मैं तपस्या के शील से सुरभित नहीं हूँ अतः अपनी कमी का बोध करते रहने के लिए चन्दन लगाया करूँगा। मोह के प्रतीक रूप में छत्र धारण करूँगा। राग-द्वेष से कलुषित हूँ अतः काषाय वस्त्र धारण करूँगा। मैं अन्तःपवित्र नहीं हूँ, इसे याद रखने के लिए दिन में तीन बार स्नान किया करूँगा। वास्तव में वेष प्रतिज्ञा को सतत याद दिलाने के लिए है। वेष सत्साधन में लगाता है किन्तु वेष ही सत्साधन नहीं है। इस वेष में या किसी वेष-कुवेष में जो सत्साधन करना चाहिए, वह गुरुओं की विद्या एक ही है, जिसमें बहुत-सी साधनायें नहीं हैं। व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन (गीता, २/४१)- वह क्रिया एक ही है। उसे महापुरुषों से प्राप्त करना पड़ता है और ये बाह्य आचरण नहाना-धोना इत्यादि न तो धर्म हैं और न अधर्म। विकार मन में हैं तो शरीर धोने से क्या होगा? भजन कोई ऐसी क्रिया है जिससे मन की धुलाई होती है, जिससे संसार में फैला मन धीरे-धीरे सिमटने लगता है, जिससे मन का निरोध होता है। मनगढ़न्त कुछ भी करने से मन नहीं रुकेगा। साधन करिय विचारहीन मन सुद्ध होइ नहिं तैसे। (विनयपत्रिका, ११५)

मन के निरोध के लिए वेद ने बताया परमात्मा का सतत चिन्तन। ग्रीष्म इध्मः शरद्ववि– ग्रीष्म, शरद्, वसन्त हर ऋतु में सतत चिन्तन द्वारा जब मन के संकल्प-विकल्प शान्त हो जाते हैं और इस शान्त मन का भी जब विलय हो जाता है तब जो तत्त्व मिलता है उसी का नाम मोक्ष है, परमगति है, परमधाम है। मन के निरोध के लिए जिसने यत्न किया ही नहीं तो शरीर जलाने से मोक्ष कैसे मिल जायेगा?

वायु की तरह चंचल मन का निग्रह दुष्कर माननेवाले अर्जुन को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता के छठें अध्याय के सैंतालीसवें श्लोक में एक सुगम उपाय बताया कि भक्ति करो, श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः। उस भक्ति का आरम्भ है कि हृदय में जो परमात्मा है, उसमें (सद्गुरु में) श्रद्धावान् हो जाओ। और किसी का भी अस्तित्व नहीं है, वही एक शाश्वत है, वही सत्य है, वही अविनाशी है, वही परमतत्त्व है। उसे अपने जीवन का उद्देश्य बना लो और उसके बाद उसकी प्राप्ति के जो साधन हैं जिसका नाम दैवी सम्पद् हैं, उन गुणों को हृदय में ढालो। इन्द्रियों के बहिर्मुखी प्रवाह को संयमाग्निषु जुह्वति (गीता, ४/२६) संयम की अग्नि में हवन करो। विषयोत्तेजक शब्दों के आशय को वैराग्योत्तेजक भावों में बदलकर उनसे बचो। सम्पूर्ण इन्द्रियों के व्यापारों को ईश्वरीय आदेशों के आलोक में संयमित करो।

साथ ही आवश्यक है नाम-जप, जिसका उतार-चढ़ाव श्वास पर है। श्वास के साथ यदि नाम-जप की क्षमता नहीं है तो आरम्भ में माला, उँगली या नाड़ी के स्पन्दनों के सहारे भी कुछ लोग नाम-जप के लिये अनुबन्धित हो लेते हैं; किन्तु शीघ्र ही श्वास में सुरत प्रारम्भ हो जाती है, फिर माला या किसी बाह्य उपकरण की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, फिर तो श्वास से ही जपना चाहिए। श्वास कब अन्दर गई उसे देखो, कब बाहर निकली उसे देखो, कितनी देर तक बाहर रुकी उसे जानो, फिर तो श्वास अन्दर जाने लगे तो उसके द्वारा नाम जपाओ, जानकारी के बिना श्वास खाली न जाय, सुरत को उस श्वास में लगाओ, श्वास में उठनेवाले शब्द को पकड़ो, श्वास नाम को छोड़ अन्य कुछ कहती ही नहीं। प्रारम्भ में हम सुनने लगेंगे तो नाम नहीं दिखाई देगा, सन्न-सन्न, साँय-साँय सुनाई पड़ेगा; किन्तु बैखरी, मध्यमा के स्तर के पश्चात् पश्यन्ती का स्तर आते-आते यह नाम श्वास में ढल जाता है। इस प्रकार श्वास के द्वारा जप करना चाहिए, जिसे श्रीकृष्ण ने प्राणापान कहा। गौतम बुद्ध ने इसी को ‘अनापान सति’ कहकर सम्बोधित किया। ऐसा करने से प्राणों का याम अर्थात् निरोध हो जाता है। अब न भीतर से कोई संकल्प उठता है, न बाह्य वायुमण्डल के संकल्प भीतर ग्रहण हो पाते हैं- इसी का नाम प्राणायाम है, यही मन की पूर्ण निरोधावस्था है और निरुद्ध मन भी जहाँ विलय हुआ तो भक्ति का, भजन का, यज्ञ का परिणाम निकल आता है। ‘यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।’ (गीता, ४/३१)- यज्ञ के पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी संरचना करता है, उस ज्ञानामृत का पान करनेवाला योगी शाश्वत-सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है।

प्रारम्भ से लेकर परिणाम तक संक्षेप में, सूत्ररूप में कुल इतना ही है भजन की विधि। यही है यज्ञ, योग-साधना भी यही है। परमात्मा में विलय दिला देनेवाली इस क्रिया को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यज्ञ कहकर सम्बोधित किया है। संसार के संयोग-वियोग से रहित अविनाशी परमात्मा की प्राप्ति की जो क्रिया है, उसी को (वेद ने भी) यज्ञ कहकर सम्बोधित किया, इसी विधि से चलने पर बल दिया। चेतावनी भी दी कि इस यज्ञ से रहित स्त्री-पुरुष के लिये यह शरीर भी सुलभ नहीं है, तो भला उनके लिये परलोक कैसे होगा?

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस विधि से भजन करने के लिए बड़ा प्रोत्साहन दिया कि कोई इस विधि में से कुछ भी करता है तो वह भजन का ज्ञाता है, वह यज्ञ को जानता है- अन्तर इतना ही है कि कोई आरम्भिक स्तर पर है, कोई मध्य में तो कोई उन्नत अवस्था में है। अध्याय ४, श्लोक २४ से ३१ तक आठ श्लोकों में तथा चौदह भागों में विधि प्रस्तुत की है।

सब ओर से सिमटकर उस एक परमात्मा में श्रद्धा एकत्र हुई, उसी क्षण से भजन की शुरुआत है, वहीं से आपने भजन का पहला कदम भली प्रकार उठाया है, धर्म को न जानते हुए भी आपने धर्म का मार्ग पकड़ा है। योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- मयि चानन्य योगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। (गीता, १३/१०)- भक्ति अव्यभिचारिणी होनी चाहिए, अनन्य भाव से मुझसे जुड़ी होनी चाहिये। जिसको महापुरुषों ने सती कहा, उसी भक्ति को अव्यभिचारिणी कहकर सम्बोधित किया गया। यही है सती के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण का सम्बोधन। स्त्रियों के प्रदूषण की जिस आशंका से अर्जुन विकल था, योगेश्वर ने उसे अज्ञान कहा और बताया कि प्राप्तिवाला महापुरुष यदि पीछेवालों को भजन के पथ पर न चलाये, स्वयं करता हुआ उनसे न कराये तो पीछेवाले भी उनकी देखादेखी क्रिया छोड़ बैठते हैं। सीधे उन्हीं की तरह, प्राप्तिवाले महापुरुष-जैसा स्वांग बना लेते हैं। भजन-पथ में आयी इस विकृति को योगेश्वर वर्णसंकर कहते हैं। महापुरुषों की दृष्टि में ईश्वर की प्राप्ति के लिये निर्धारित उपर्युक्त क्रिया के अतिरिक्त जो कुछ भी किया जाता है वह समाज में संस्कार-सृजन का उपादान है, व्यवस्था है- धर्म नहीं। धर्म के नाम पर समाज में भयंकर भ्रान्तियों का सृजन हुआ है, जिसमें सती-प्रथा भी एक है।

अयोध्या की जनसभा में भगवान श्रीराम ने समझाया, जिसका उल्लेख रामचरितमानस में है, उस सभा में गुर द्विज पुरबासी सब आये। (७/४२/१)- सद्गृहस्थ आश्रम में रहनेवाले लोग भी थे। मानव-शरीर की नश्वरता का वर्णन कर भगवान ने कहा कि यदि परलोक चाहते हो अथवा इसी जीवन में सब प्रकार का सुख चाहते हो तो दोनों के लिये केवल एक ही रास्ता है- भगति मोरि– मेरी भक्ति करो। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई। (मानस, ७/४४/२)- मेरी ही भक्ति का गायन पुराण में है, मेरी भक्ति का ही गायन वेद में है। अतः एक परमात्मा में निष्ठा भक्ति का सबल चरण है। भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।। (मानस, ७/४४/५) एक परमात्मा में श्रद्धा दृढ़ाने के लिए आरम्भ होता है सन्तों का सेवन। सन्त सब अच्छे हैं, किन्तु यदि वे एक परमात्मा को छोड़कर अन्य देवी-देवताओं को भजवाते हैं, अनेक स्थानों पर श्रद्धा बिखराते हैं, तो अभी स्वयं बिखरे हुए सन्त हैं। समय पाकर उन्हें भी एक परमात्मा के रास्ते पर आना ही होगा। एक परमात्मा के प्रति निष्ठा ही सती का लक्षण है।

एक परमात्मा के स्थान पर दाहिने-बायें कुछ न कुछ करते-करते शनैः-शनैः हम-आप इतने नीचे उतर आये कि ओझाई, पशुबलि और टोना-टोटका में फँस गये। जब सब भगवान के ही अंग हैं तो भूत भी होंगे, फिर करो न पूजा। यह भयंकर भ्रान्ति का अन्तिम चरण है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने जे परिहरि हरि हर चरन, भजहिं भूतगन घोर। (मानस, २/१६७) कहकर इसकी भर्त्सना की है, फिर भी लोग झाड़-फूँक कराते हैं, रामायण भी पढ़ते हैं। भोलीभाली माताओं को आतंकित कर, झिझककर, मनोवैज्ञानिक दबाव डालकर ऐसा करने के लिये बाध्य किया जाता है। बरगलाने के लिये उनकी प्रशंसा भी करते हैं कि माताओं पर ही तो धर्म-कर्म टिका है। माताएँ इस बहकावे में शीघ्र आ जाती हैं; क्योंकि आज तक उन्हें शिक्षा से वंचित रखा गया। धर्मशास्त्र सुनने का विधान उनके लिये नहीं था। आज तक उन्हें ऐसे नाथकर रखा गया कि पिंजड़े के अन्दर ही रह गईं। पति की इच्छा न हो तो खाना न खायें, न धरम करें। उन्हें सचाई से वंचित रखा गया। भूत-भवानी, पीपल, पेड़-पत्ता, डीह, चौरा, पुत्र जिलानेवाली देवी, जो कुछ भी उन्हें बताया गया उसी को धर्म मानकर वे व्रत-उपवास करने लगीं या लपसी (हलवा) चढ़ाने लगीं। यह भुलावा है, धोखा है। माताओं को भूलकर भी इन भ्रान्तियों में नहीं जाना चाहिए, न भय खाना चाहिये, क्योंकि सृष्टि में ऐसा कोई भूत नहीं है जो मनुष्य से तगड़ा हो। भूत का अर्थ होता है प्राणी- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। (गीता, १८/६१)

अतः माताओं को कभी भी ओझा, सोखा, भूत-भवानी, टोना-टोटका नहीं मानना चाहिए। यह कुछ नहीं, केवल वाममार्ग है- जिसमें अधिकांश देवता शाकाहारी हैं किन्तु उनकी पत्नी देवियों को मांसाहारी घोषित करके उदरपूर्ति के साधन जुटाये गये हैं। माताओं को जानना चाहिये कि स्त्री-पुरुष सबके लिये भजन का एक ही रास्ता है। हमारा-आपका, संसार में सबका शास्त्र गीता है। आप गीता, रामायण अथवा मूल वेद ही देखें तो उन सबका आशय केवल इतना है कि अविनाशी तत्त्व केवल परमात्मा ही है। उसी एक के प्रति पूर्ण श्रद्धा से समर्पित हो जाओ।

उस जनसभा में भगवान श्रीराम ने इसलिए एक परमात्मा में निष्ठा को भक्ति का आरम्भ बताया और कहा कि भक्ति आरम्भ करने के लिये न तो किसी योग की आवश्यकता है न यज्ञ, जप, तप और उपवास की। शुरू-शुरू में अभी इतना जरूरी है कि सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ सन्तोष सदाई।। (मानस, ७/४५/२) प्रयास है तो केवल इतना कि सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो, इस मन को ही तो सीधा करना है, सम करना है। जैसा कुछ लाभ मिले उसी में सदा सन्तोष रखें। मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।। (मानस, ७/४५/३) मेरा दास कहलाता है और अन्य की आशा करता है तो आप ही विचार करें कि उसने मेरा विश्वास ही क्या किया? वह भक्त नहीं है। आगे बताया कि वह किसी से बैर न करे, लड़ाई-झगड़ा न करे, सत्य के अनुयायी जनों का संग करे, मेरे नाम-जप में अनुरक्त हो ममता, मद और मोह का त्याग करे तो इसके परिणाम में मिलनेवाले सुख को वही जानता है जो परमानन्द राशि को प्राप्त है। यहाँ भगवान ने बताया- एक परमात्मा में दृढ़ श्रद्धा और नाम-जप में सतत संलग्नता। इतने से ही आपका प्रवेश भजन के सही पथ पर हो जायेगा।

प्रकारान्तर से यही भक्ति नौ सोपानों में श्रीरामचरितमानस में शबरी को भगवान राम ने बतायी जिसकी शुरुआत का पहला चरण है सन्तों का संग- प्रथम भगति सन्तन्ह कर संगा। (३/३४/८) उनके सान्निध्य से मिलेगा परमात्मा सम्बन्धित कथा-प्रसंग। जहाँ भली प्रकार समझ काम करने लगी, हृदय के पर्दे धुल गये, तहाँ गुर पद पंकज सेवा, तीसरि भगति अमान। (३/३५)- गुरु के द्वारा उनकी विद्या मिलेगी, उसे धारण करना ही गुण-गायन है। यही चौथी भक्ति है। फिर पाँचवाँ स्तर आता है उस कोटि के नाम का सतत जप- मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। (३/३५/१) एक परमात्मा में ही दृढ़ विश्वास हो जाय, तहाँ बिरति बहु करमा (३/३५/२)- घर-गृहस्थी के बहुत से कर्मों की जिम्मेदारियाँ धीरे-धीरे विचार करो, उत्तराधिकारी (भावी अधिकारी) को सौंपते जाओ। इससे कर्मों में विरक्ति आने लगती है, घर छोड़ने की जरूरत नहीं। इसका परिणाम निकलेगा सातवाँ स्तर कि सातवँ सम मोहि मय जग देखा। (३/३५/३)- सर्वत्र ईश्वर का संचार दिखाई देगा किन्तु सर्वाधिक संचार दीखेगा सन्त में। संसार मेरे बराबर, किन्तु सन्त मुझसे बढ़कर अर्थात् संसार से बढ़कर। आठवँ जथा लाभ सन्तोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।। (३/३५/४) परमात्मा विषयक दोष न देखें और अन्तिम स्तर आता है कि नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।। (३/३५/५) सरल स्वभाव हो, कुछ भी पाना है तो मेरा भरोसा करो, किसी अन्य का नहीं- यही भजन है, यही भक्ति का पथ है। इनमें से एक भी स्तर जो धारण कर लेता है तो भक्ति-पथ में प्रवेश पा जाता है। ठीक वही बात, जैसा कि गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये सब यज्ञ के जानकार हैं।

किसी ने सन्त कबीर से पूछा कि भजन क्या है? भक्ति क्या है?, तो बड़े नपे-तुले शब्दों में उन्होंने बताया कि भजन भगति हरिनाम है। पूछा गया कि नाम के अतिरिक्त जो लोग क्रियाएँ करते हैं क्या वह भजन नहीं है? कबीर कहते हैं, नहीं दूजा दुख अपार– वह तो दुःख का कारण है, भजन नहीं। मनसा वाचा क्रमना, कबीर सुमिरन सार।– एक परमात्मा का सुमिरन ही भजन है। इन सबके निष्कर्ष में एक ही बात मिलती है कि एक परमात्मा को अपना जीवन-उद्देश्य बना लेने से, नाम-जप से और शनैः-शनैः दैवी सम्पद् अर्जित करके आचरण करने से आपकी आत्मा पर जो आवरण है हल्का होगा, तहाँ आपकी ही आत्मा रथी होकर बतायेगी कि किधर चलें? कौन आपके सद्गुरु हैं? जब सद्गुरु ही मिल गये तो संशय-भ्रम मिट जाता है। फिर तो सर्वांगीण समर्पण के साथ चलना है, किन्तु उस सद्गुरु को ढूँढ़ो मत, पहले इसे ढूँढ़ो। एक परमात्मा के प्रति श्रद्धा को ढूँढ़ो, नामजप को ढूँढ़ो, दैवी सम्पद् के गुणों को अपने में तलाश करो। इनका पुण्य-पुरुषार्थ स्वतः सद्गुरु से मिला देगा। इस पथ में सबसे कम यदि किसी वस्तु की आवश्यकता है तो वह सद्गुरु को ढूँढ़ने की। उनके ढूँढ़ने का ही कुपरिणाम है कि आज सद्गुरुओं की कतार लगी हुई है। किन्तु सन्त या सद्गुरु जिस दृष्टि से पहचान में आते हैं, वह दृष्टि पुण्यमयी है। अतः पहले एक परमात्मा में निष्ठा द्वारा, नाम-जप द्वारा, शुभ आचरणों द्वारा, आप्तपुरुष की सेवा भजन का सबसे सुगम उपाय है इनकी सेवा द्वारा, केवल अपने परिश्रम की कमाई द्वारा सादा जीवन-निर्वाह, स्त्रियों के प्रति माँ-बहन की दृष्टि, ईमानदारी, सचाई, सरलता, अपने पड़ोसी का हित इत्यादि शुभ आचरणों द्वारा पुण्य अर्जित करें। जिस दिन यह पुण्य काँटे पर खड़ा होगा, सन्त या सद्गुरु पहचान में आ जायेंगे, स्वतः आ मिलेंगे- पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न सन्ता। (मानस, ७/४४/६)

इसके विपरीत आचरण करने से आप परमात्मा से दूर होते जाते हैं, जो आपकी अपनी अपूरणीय क्षति है। स्त्री हो या पुरुष, जब तक वह परमात्मा को अपने से बाहर बैठा हुआ मानता रहेगा, जब तक वह महसूस न करने लगे कि हृदय के भीतर बैठा परमात्मा उसके प्रत्येक विचार तक को देख रहा है (जिसका परिणाम संस्कार-रूप में उसी को भुगतना पड़ेगा) तब तक वह आत्मानुशासित नहीं हो सकता। केवल आत्मानुशासित व्यक्ति ही सच्चा सती है और वही रूढ़ि जर्जर समाज के जीर्णोद्धार का सत्साहस कर सकता है।

अतः माताओं को चाहिए कि उन्हीं आदर्शों को अपनायें, जैसा कि महासती अनसूया, सीता, मदालसा या मीरा ने आपसे करने को कहा है। इन सबका आदेश केवल इतना ही है कि एक परमात्मा को श्रद्धा से पकड़ें, अपने आपको शनैः-शनैः समर्पित करें, उन्हें पाने के लिये यत्न करें। विपद् सम्पद् हो जायेगी, दुःख सुख में बदल जायेगा और वह प्रभु ही कृपा कर देंगे तो सिर पर पहाड़ आनेवाला हो तो रजकण हो जायेगा। आप करके तो देखें!

विषम परिस्थितियों में अपने उज्ज्वल चरित्र की रक्षा के लिये कुछ भी किया जा सकता है। इज्जत की रक्षा के लिये इस अमूल्य शरीर का अन्त भी किया जा सकता है, किन्तु मुक्ति के लिए नहीं। इसमें कल्याण कदापि नहीं, धर्म कदापि नहीं है। पति के शव के साथ पत्नी का चितारोहण अकारण पीछा करती हुई एक रूढ़िमात्र है, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है।

विचार-विमर्शहेतु श्री परमहंस आश्रम, शक्तेषगढ़ (चुनार-राजगढ़ रोड), मिर्जापुर-उ०प्र० आपको सहर्ष आमन्त्रित करता है।

।। ॐ ।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

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