स्वार्थ

स्वार्थ

प्रश्नमहाराजजी! दुनिया में स्वार्थियों की भरमार है।सुरनरमुनिभी इससे नहीं बच सके। फिर स्वार्थ रहते परमार्थ कैसे होगा?

उत्तर देखिये, अभी हमने पूछा था तो यह दस साल का लड़का, इसे भी ज्ञात है कि स्वार्थी अधिक हैं। साठ-सत्तर वर्षीय वयोवृद्ध भी कह रहे हैं कि हम स्वार्थी हैं, स्वार्थियों की भरमार है। किन्तु नहीं, वस्तुतः संसार में स्वार्थी कम हैं। स्वार्थ के दो स्वरूप हैं। एक स्वार्थ तो वह है जैसा अभी आपने कहा। इसी से अभिभूत होकर लोग रात-दिन झूठ-कपट तथा छल-छद्म करते रहते हैं। उनसे पूछा जाय कि ऐसा आज क्यों करते हैं, तो कहेंगे स्वार्थ के लिए! यह एक प्रकार का स्वार्थ है, किन्तु यौगिक शास्त्रों में स्वार्थ की जो परिभाषा है उसमें और इसमें पूरब और पश्चिम का अन्तर है। उस दृष्टि से देखें तो दुनिया में स्वार्थी कम हैं।

रामचरितमानस के अनुसार, भरत स्वार्थी थे। माता कैकेयी ने भरत के लिए साम्राज्य की व्यवस्था कर दी। साम्राज्य भी ऐसा, जिसमें कोई कमी नहीं थी। यहाँ तक कि-

अवध राजु सुर राजु सिहाई।

दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई।। (मानस, 2/323/6)

अवध का कोष इतना सम्पन्न था कि धनपति कुबेर भी लज्जित हो जाता था। सोचता था कि अवध की तुलना में तो मेरे पास कुछ भी नहीं है। और सम्मान कितना था?-

आगें होइ जेहि सुरपति लेई।

अरध सिंघासन आसनु देई।। (मानस, 2/97/4)

देवराज इन्द्र भी अवध के नरेश से आगे बढ़कर मिलते थे, अपना आधा सिंहासन उन्हें बैठने के लिए देते थे। सम्मान में इन्द्र के समकक्ष, ऐश्वर्य में कुबेर से भी उत्कृष्ट साम्राज्य की व्यवस्था अम्बा कैकेयी ने भरत के लिए कर दी; फिर भी भरत विकल थे। कहीं कोई कमी कसक रही थी, उसकी पूर्ति के लिये वे चित्रकूट चल पड़े। रोते-बिलखते जब प्रयाग पहुँचे, सुना कि यह प्रयागराज सब कुछ देने में सक्षम हैं, इन तीर्थराज का महत्त्व अगाध है तो भरत प्रार्थना करने लगे, भीख माँगने लगे-

मागउँ भीख त्यागि निज धरमू।

आरत काह न करइ कुकरमू।। (मानस, 2/203/7)

 ऐसा कौन-सा कुकर्म है जो आर्त नहीं करता? मनुष्य भीख कब मॉंगता है? जब पेट नहीं भरता! मनुष्य आर्त कब होता है? जब अर्थ की कमी होती है! अर्थ तो कुबेर से भी अधिक था, फिर भरत आर्त क्यों थे? वस्तुतः एक अर्थ तो रुपया-पैसा है जिससे जीविका की व्यवस्था होती है, किन्तु एक सम्पत्ति आत्मिक भी है जो इस शरीर का नहीं बल्कि आत्मा का पोषण करती है। इसी आत्मिक सम्पत्ति के लिये भरत आर्त थे। चित्रकूट की सभा में भरत इसकी पुष्टि भी करते हैं-

कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू।

रहत न आरत के चित चेतू।। (मानस, 2/268/4)

मैं जो कुछ कह रहा हूँ, अपने स्वार्थ के लिये कह रहा हूँ। आर्त के चित्त में चेत नहीं रहता। स्वार्थ के लिये भरत आर्त हैं, अपना धर्म त्यागकर गिड़गिड़ा रहे हैं, भीख माँग रहे हैं। माँगा भी तो क्या?-

सीता राम चरन रति मोरें।

अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।। (मानस, 2/204/2)

भिक्षा में उन्होंने भगवान के चरण कमलों का स्नेह माँगा। भरत की दृष्टि में भगवान के चरण कमलों का स्नेह ही एकमात्र स्वार्थ है।

भगवान राम तो नहीं लौटे लेकिन उनकी खड़ाऊँ मिली। भरत ने उसे सिर पर रखा, लौट पड़े और नन्दिग्राम में आकर बैठ गये। चिन्तन करते-करते सुरत की डोरी जब लग गई, उन खड़ाऊँओं की पूजा में मन केन्द्रित हो चला तब उन्होंने अपने स्वार्थ को कुछ हल हुआ समझा। यद्यपि-

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई।

घटइ तेजु बलु मुख छबि सोई।।

नित नव राम प्रेम पनु पीना।

बढ़इ धरम दलु मनु न मलीना।। (मानस, 2/324/1-2)

शरीर उत्तरोत्तर दुबला होता जाता था (खान-पान से बढ़नेवाला बल घटता जाता था) किन्तु मुख छबि सोई’- मानसिक प्रसन्नता वही थी क्योंकि राम के प्रेम का प्रण नित्य नवीन तथा परिपुष्ट होता जा रहा था, इसीलिये मानसिक प्रसन्नता कम नहीं थी, मन मलीन नहीं था। यहाँ पर भरत ने अपने स्वार्थ को कुछ हल होते देखा और जब राम लौटे, उस दिन उन्होंने अपना स्वार्थ सम्पन्न पाया।

कागभुशुण्डिजी स्वार्थी थे। एक समय गरुड़ को सन्देह हो गया। वे नारद, ब्रह्मा इत्यादि के पास से होते हुए शंकरजी तक पहुँचे। शंकरजी ने कहा कि आपका संशय इतना शीघ्र दूर नहीं होगा-

तबहिं होइ सब संसय भंगा।

जब बहु काल करिअ सतसंगा।। (मानस, 7/60/4)

दीर्घकाल तक सत्संग करो, तभी तुम्हारा संशय दूर होगा। वह सत्संग जहाँ होता है, मैं तुम्हें वहीं भेज देता हूँ। शंकरजी ने गरुड़ को कागभुशुण्डि आश्रम पर भेज दिया। आश्रम में जाते ही उनके अधिकांश सन्देह दूर हो गये, जब सत्संग आरम्भ हुआ तो सर्वथा निर्मूल हो गये। गरुड़ ने कहा- अब मुझे कोई सन्देह नहीं है; किन्तु भगवन्! आप समर्थ हैं, महाप्रलय में भी आपका नाश नहीं होता- ऐसा भगवान शंकर ने बताया है और भगवान शंकर कभी झूठ नहीं बोलते- मुधा वचन नहिं ईस्वर कहई।(मानस, 7/93/6) जब आप इतना समर्थ हैं कि महाप्रलय में भी आपका नाश नहीं होता तो फिर आपने यह निकृष्ट काला कलूटा कौवे का तन क्यों धारण कर रखा है? कागभुशुण्डिजी ने इसका एक ही उत्तर दिया-

जेहि तें कछु निज स्वारथ होई।

तेहि पर ममता कर सब कोई।। (मानस, 7/94/8)

जिससे अपना निजी स्वार्थ होता है, उस पर सभी ममता करते ही हैं। भला इस निकृष्ट काग-तन से कौन-सा स्वार्थ सिद्ध हुआ? महर्षि काग समाधान करते हैं-

राम भगति एहिं तन उर जामी।

ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।। (मानस, 7/95/4)

इसी निकृष्ट तन से मुझे राम-भक्ति उपलब्ध हुई, इसीलिए यह मुझे परमप्रिय है।

महर्षि ने यह भी कहा कि मैं सदैव कौवा ही रहा, ऐसी बात भी नहीं है। मैंने सुन्दर तन भी धारण किया था-

कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं।

मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।।

देखेउँ करि सब करम गोसाईं।

सुखी न भयउँ अबहिं की नाईं।। (मानस, 7/95/8-9)

दानव-देव, कीट-पतंग, पशु-पक्षी, ऊँच-नीच ऐसी कौन-सी योनि है जिसमें हमने भ्रमवश बार-बार जन्म न लिया हो। सभी प्रकार की क्रियाएँ करके भी मैं थक गया; किन्तु इस बार कौवे के तन में, जिसे आप निकृष्ट कहते हैं, मुझे भक्ति उपलब्ध हुई है। इस बार मैं जैसा सुखी हुआ हूँ वैसा कभी नहीं रहा। ऐसा देव-तन भी किस काम का जो रामभक्ति से शून्य है? कागभुशुण्डिजी का निर्णय है कि रामभक्ति ही एकमात्र स्वार्थ है-

स्वारथ साँच जीव कहुं एहा।

मन क्रम बचन राम पद नेहा।। (मानस, 7/95/1)

वस्तुतः जीवमात्र का सच्चा स्वार्थ मन-क्रम-वचन से भगवान के चरण कमलों में स्नेह का होना ही है। ‘स्व’ का अर्थ ही स्वार्थ है जिससे स्वयं की सिद्धि होती है, ‘स्व’-रूप की उपलब्धि होती है। धन-दौलत, विशाल साम्राज्य किसके रह गये? जब शरीर ही हमारा साथ नहीं देगा फिर इसके सुख के लिये संग्रहीत वस्तुएँ कब साथ देंगी? मकान-दुकान, पद-प्रतिष्ठा, राज्य-वैभव पा लेने पर भी वस्तुतः ‘स्व’ को कुछ नहीं मिलता क्योंकि हम शरीर तो हैं नहीं! दूसरे, इन नश्वर भोगों में ‘स्व’ का वास्तविक कल्याण निहित नहीं, वह तो रामभक्ति से ही होगा। अतः जीवमात्र का वास्तविक स्वार्थ इसी में है कि इष्ट के चरण-कमल में स्नेह हो जाय। इससे आप परमात्मस्वरूप का दिग्दर्शन कर उसी स्थिति को प्राप्त करेंगे जहाँ से फिर कभी पतन नहीं होता। यही सच्चा स्वार्थ है।

कालान्तर में इस शब्द का अपभ्रंश हो गया। आन्तरिक आशय को लोग बाह्य वस्तुओं में खोजने लगे। इसी को लक्ष्य करके गोस्वामीजी लिखते हैं-

करहिं मोह बस नर अघ नाना।

स्वारथ रत परलोक नसाना।। (मानस, 7/40/4)

मोहासक्त मनुष्य नाना प्रकार के कुकृत्य करता है। अपनी सूझबूझ से तो वह स्वार्थ में ही अनुरक्त है; किन्तु परलोक नसाना’- यहाँ के भोग-विलास तो यहीं छूट जाते हैं, वह परलोक तक भी खो बैठता है क्योंकि मोहाच्छन्न नहीं जान पाता कि वास्तविक स्वार्थ तो मन-क्रम-वचन से भगवान के चरणों में स्नेह का होना ही है।

कहते तो सभी हैं कि हम मन-क्रम-वचन से भगवान का भजन करते हैं, तब तो सभी सच्चे स्वार्थी हैं? परन्तु नहीं, उसकी भी एक कसौटी है, भजन करने का एक विधान है। विभीषण जब राम की शरण में गया तो राम ने स्वयं उस विधि पर प्रकाश डाला-

जननी जनक बन्धु सुत दारा।

तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।।

सब कै ममता ताग बटोरी।

मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।। (मानस, 5/47/4-5)

माता-पिता, पुत्र, भाई, स्त्री, प्रिय परिवार, परम हितैषी अथवा जहाँ तक मन का लगाव है, वहाँ-वहाँ से ममत्व के धागों को समेटकर एक रस्सी बना लें और सारे ममत्व का केन्द्र मेरा चरण बन जाय। मन को सब ओर से समेटकर मेरे चरणों में रस्सी बनाकर बाँध दें। ऐसा जो भी कर ले करउँ सद्य तेहि साधु समाना। (मानस, 5/47/3)- मैं तत्काल उसे साधु के समानान्तर स्थिति प्रदान कर देता हूँ, साध्य वस्तु को सम्भव करा देता हूँ।

इस प्रकार स्वार्थी बनने की कसौटी इतनी कठिन है कि सभी उस पर खरे उतरने की कल्पना भी नहीं कर सकते। मित्र-परिवार, सगे-सम्बन्धी सबका त्याग सबसे नहीं होता। किसी विरले से ही पार लगता है। इसीलिए गोस्वामीजी ने सच्चे स्वार्थियों की गणना कर डाली।

श्रद्धा एवं विश्वास के साथ स्वार्थ के लिए प्रयत्नशील अल्पभाववाले भी एक दिन सुर-नर-मुनि की शुद्ध रहनी में परिवर्तित हो जाते हैं-

सुर नर मुनि सब कै यह रीती।

स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।। (मानस, 4/11/2)

मानव-जगत् में साधकों की तीन श्रेणियाँ ही ऐसी हैं जो केवल स्वार्थ के लिए प्रीति करती हैं। वे साधक न तो ऋद्धि के लिए लालायित होते हैं, न सिद्धि ही उन्हें आकर्षित कर पाती है, बल्कि मन-क्रम-वचन से इष्ट के चरणों में ही उनका लगाव रहता है। ‘सुर’ उन साधकों को कहते हैं जो दैवी सम्पत्ति को हृदय में ढाल चुके हैं। दैवी सम्पत्ति जब हृदय में पूर्णतः प्रवाहित हो जाती है, उस समय आसुरी वृत्तियों का शमन हो जाता है, साथ ही सुरा में प्रवेश करने की क्षमता आ जाती है। अतः सुरा में विचरने की क्षमता वाले सुर कहलाते हैं। इष्ट के अतिरिक्त अन्य संकल्प-विकल्प उसके चिन्तन में बाधक नहीं होते। इसी प्रकार नर भी साधना का एक स्तर-विशेष है। लिंग-भेद के आधार पर नारी और नर का लौकिक विभाजन यहाँ अभीष्ट नहीं है। ‘मानस’ के समापन पर गोस्वामी जी ने मानस रोगों का निदान किया और अन्त में ‘नर’ के स्वरूप पर भी प्रकाश डाला-

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।

तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहुसूला।।

काम बात कफ लोभ अपारा।

क्रोध पित्त नित छाती जारा।। (मानस, 7/120/29-30)

मोह सम्पूर्ण व्याधियों का मूल है। काम वात है। कफ लोभ है। क्रोध पित्त है जो निरन्तर छाती जलाता रहता है।

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई।

उपजइ सन्यपात दुखदाई।। (मानस, 7/120/31)

काम, क्रोध, लोभ तीनों जब हृदय में एक साथ कार्य करने लगते हैं तो दुखदायी सन्निपात हो जाता है। वह व्यक्ति फिर जलपता-कलपता ही रह जाता है, भगवच्चरणों में उसे सोचने का अवकाश ही नहीं रहता। अहंकार अति दुखद डमरुआ (मानस, 7/120/35)- अहंकार दुखदाई गँठिया रोग है। इसी तरह-

तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी।

त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी।। (मानस, 7/120/36)

तृष्णा उदर-वृद्धि के समान है जो बढ़ती ही जाती है। इस प्रकार बीसों रोगों की परिगणना के अन्त में गोस्वामीजी निर्णय देते हैं-

एक ब्याधि बस नर मरहिं, ए असाधि बहु ब्याधि।

पीड़हिं संतत जीव कहुँ, सो किमि लहै समाधि।। (मानस, 7/121 क)

उपर्युक्त रोगों में से यदि एक भी व्याधि नर का स्पर्श कर दे तो नर मरहिं’- नर मर जाता है। सिद्ध है कि नर कोई ऐसा स्वरूप है जिसमें लोभ, मोह, काम-क्रोध, मद-मत्सर इत्यादि मन के रोग नहीं होते। संयोग से, इनमें से यदि किसी व्याधि ने भी स्पर्श कर लिया तो वह व्यक्ति नरत्व से च्युत हो जाता है और जिसके पास सभी व्याधियाँ हों तो पीड़हिं संतत जीव कहुँ, सो किमि लहै समाधि– वह व्यक्ति जीव और जड़ है, उसके समाधि लेने का तो कोई प्रश्न ही नहीं खड़ा होता।

श्रोताओं से महाराजजी ने पूछा- बतावें, क्या आप सब में काम है, क्रोध है, लोभ है? ‘सभी भरे हैं महाराज’- सबने उत्तर दिया। महाराज ने कहा, भला बताइये कि इनमें से एक भी रोग जिसका स्पर्श कर ले, वह नर मर जाता है। आप तो जी रहे हैं। मर क्यों नहीं जाते?

स्पष्ट है कि नर कोई ऐसा स्वरूप है जिसमें एक भी मानस रोग नहीं होता। नर वह है जिसके ऊपर से ‘मायारूपी नारि’ का प्रभाव टल चुका हो, भले ही वह आक्रामक के रूप में खड़ी हो। विकार खड़े हैं, लेकिन स्पर्श नहीं कर पाते। कदाचित् वे विकार सफल हो गये तो वह व्यक्ति नरत्व से च्युत हो जाता है। इसी तन को गोस्वामीजी ने मानुष तन की संज्ञा दी है-

बड़ें भाग मानुष तनु पावा।

सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।। (मानस, 7/42/7)

बड़े भाग्य से मानुष तन अर्थात् मन के अन्तराल में टिकनेवाला तन प्राप्त होता है। यह देवताओं को भी दुर्लभ है- ऐसा सद्ग्रन्थों ने गायन किया है। ऐसे नर-तन को प्राप्त कर जो भवसागर का पार पा नहीं लेता; गोस्वामीजी कहते हैं वही आत्महत्यारा है।

अतः सुर-नर-मुनि ही एकमात्र स्वार्थ-हेतु प्रीति करते हैं। भगवान के चरण कमलों में स्नेह ही सच्चा स्वार्थ है। इसी स्तर के स्वार्थी भरत थे, कागभुशुण्डि थे, हनुमान और लक्ष्मण थे। ‘महाभारत’ में अर्जुन भी इसी स्तर के स्वार्थी थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि धन-धान्यसम्पन्न त्रिलोकी के साम्राज्य से भी हमारा क्या प्रयोजन? सिद्ध है कि भौतिक उपलब्धियों से वह स्वार्थ – ‘स्वयं’ का हित, स्वयं की उपलब्धि सम्भव नहीं है।

‘स्वयं’ को प्राप्त करनेवाले प्रत्येक महापुरुष का यही निर्णय है। योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि एक महापुरुष थे। स्वार्थ के सन्दर्भ में उनकी भी मान्यता है-

सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थात्स्वार्थसंयमात् पुरुषज्ञानम्।। (पातंजल योगदर्शन, विभूतिपाद 35)

अर्थात् सत्व (बुद्धि) और पुरुष (आत्मा) दोनों अत्यन्त भिन्न हैं। इनको कभी एक नहीं किया जा सकता। इनका जो सम्मिश्रण-सा हो गया है, जिसे मानव विचार से विलग नहीं कर पाता, वही भोग है जिसकी दो प्रवृत्तियाँ परार्थ और स्वार्थ हैं। जब बहिर्मुखी परार्थ को दबाकर संयम स्वार्थ की कसौटी पर आ जाता है तो ‘पुरुषज्ञानम्’- परम पुरुष परमात्मा का ज्ञान हो जाता है। दुनिया में बहुसंख्यक जिसे स्वार्थ कहते हैं उसके द्वारा सम्पत्ति चाहे जितनी मिल जाय, किन्तु उससे परमात्मा मिलता दिखायी नहीं देता। अतः जिससे यह आत्मा परमात्मा का साक्षात् कर ले, वही स्वार्थ है।

साक्षात्कार किसका होगा? किसी रूप का? नहीं, वह तो मन की एक कल्पना है। गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।। (मानस, 3/14/3) आप शरीर तो हैं नहीं, मन भी नहीं हैं। आप तो आत्मा हैं। जो शाश्वत है, एकरस है उस आत्मा का दिग्दर्शन हो जाय, पुनः योनियों का चक्कर न काटना पड़े, तभी पुरुष का स्वार्थ सिद्ध होता है।

महाभारत का प्रस्तुत आख्यान इसी तथ्य का प्रतिपादन करता है। एक यक्ष शापवश अजगर बनकर जलाशय पर पड़ा हुआ था। उसके चार प्रश्नों का उत्तर दिये बिना जो भी जलाशय से जल लेने का प्रयास करता, वह निश्चेष्ट होकर उसका आहार बन जाता। यथार्थ उत्तर पाते ही अजगर की शाप से मुक्ति का विधान था। वनवासकाल में विचरण करते हुए एक बार पाण्डव उसी जलाशय के पास आये। युधिष्ठिर ने सहदेव को जल लेने भेजा। अजगर ने अपना प्रश्न रखा। सहदेव ज्ञानी तो थे; किन्तु उन गूढ़ प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाये। धर्मराज की आज्ञानुसार जल ले जाना भी आवश्यक था। सहदेव ने अजगर की उपेक्षा करके जहाँ जल का स्पर्श किया, निश्चेष्ट हो गये। क्रमशः नकुल, अर्जुन और भीम की भी यही दशा हुई। अन्त में धर्मराज युधिष्ठिर पहुँचे। पूछा- महाभाग अजगर! आप कौन हैं? मेरे शूरवीर भाई संज्ञाशून्य कैसे हो गये? मैं प्यासा हूँ, मुझे जल चाहिए। अजगर ने उनसे भी अपना प्रश्न दुहराया- का च वार्ता, किमाश्चर्यम् कः पन्था कश्च मोदते?’ अर्थात् वार्ता क्या है? आश्चर्य क्या है? रास्ता कौन है? और सुखी कौन है?

युधिष्ठिर ने समाधान किया कि मोहरूपी कड़ाह में जीवों को रात-दिन काल पका रहा है, इसमें उपयोगी वार्ता वही है जो तत्त्व का निर्णय प्रदान करे। मनुष्य एक-एक करके काल के गाल में सिमटते जा रहे हैं फिर भी बचे हुए लोग अपने को अजर-अमर मानते हैं, काल से बचने का प्रयास नहीं करते; इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा? महाजनः येन गतः स पन्था’- जिस रास्ते से महापुरुष, भगवान के महान् भक्त निकल गये, वही हमारा अभीष्ट पद है। इसी प्रकार परमतत्त्व में स्थित निस्पृह महापुरुष ही वस्तुतः सुखी हैं, जिनके पीछे दुःख नहीं है।

इन उद्बोधनों को सुनकर अजगर की जड़ता समाप्त हो गई। वह पुनः यक्ष के स्वरूप में परिणत हो गया। बोला- राजन्! आपकी जानकारी यथार्थ है। हम आपसे प्रसन्न हैं। आप जिसे कहें, आपके एक भाई को हम जीवित कर सकते हैं। युधिष्ठिर ने नकुल या सहदेव में से किसी को जिलाने की सम्मति व्यक्त की। यक्ष ने कहा कि भीम और अर्जुन जैसे भाई वन में निशाचरों से आपकी रक्षा करते हैं, उन्हें छोड़कर इन बच्चों से आप कौन-सा स्वार्थ सिद्ध करेंगे?

युधिष्ठिर ने कहा कि शरीर तो नश्वर है। किसी दिन तो यह चला ही जायेगा। अतः धर्म की रक्षा ही जीवात्मा का एकमात्र स्वार्थ है। मुझे अपनी रक्षा का भय नहीं अपितु धर्म का भय है। कुन्ती का एक पुत्र मैं जीवित हूँ, नकुल या सहदेव के जीवित रहने पर माद्री का भी वंश जीवित रहेगा। धर्म यही कहता है। युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा देखकर यक्ष ने सबको जीवित कर दिया।

अतः प्रचलित भ्रम का परित्याग करके हम सबको वास्तविक अर्थों में स्वार्थी बनने का प्रयास करना चाहिए।

।। ओम् ।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

Q & A
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