आर्य – शंका समाधान

आर्य

जो सन्मार्ग पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ है, आर्य है।गीता

भाग-१ : ‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ देखें।

भाग-२ : प्रस्तुत लेख।

भारतवर्ष को अत्यन्त प्राचीन वैदिक युग से ही आर्यावर्त कहलाने का गौरव प्राप्त है, जिसका आशय है आर्यों की निवासस्थली! एक ईश्वर के प्रति आस्थावान् एवं उसकी प्राप्ति की विहित क्रिया का आचरण करनेवाले आर्य कहे जाते थे, जिनकी बहुतायत इस पुण्यभूमि में थी। धार्मिक अनुष्ठानों का संकल्प लेते समय ‘जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तैक क्षेत्रान्तर्गते’ कहकर इस व्रत के स्मरण की परम्परा थी; किन्तु भारत में प्रवेश करनेवाली यूरोपीय जातियों ने ‘फूट डालो और राज्य करो’ की योजना के अन्तर्गत यह भ्रम सृजित करने का प्रयास किया कि गोरे रंग की एक प्रजाति ‘आर्य’ उन विदेशियों की तरह भारत में आयी, जिसने यहाँ के मूल निवासी काले द्रविड़ों को दक्षिण भारत की ओर खदेड़ दिया। इसी विचारधारा का पल्लवन करके कुछेक यहाँ तक कहने लगे हैं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, कायस्थ (सवर्ण जातियाँ) आर्य हैं जो बाहर से आई हैं, इसलिए उन्हें अब यह देश छोड़कर चले जाना चाहिए। यहाँ के मूल निवासी तो चमार इत्यादि दलित एवं पिछड़ी जातियाँ हैं। ऐसे विषाक्त परिवेश में विचारणीय है कि आर्य कौन है? आर्यत्व का निर्धारण कैसे होता है?

सम्प्रति समग्र भारत में इस प्रश्न को लेकर उलझन है कि भारत में आर्य कहाँ से आये? वास्तविकता तो यह है कि आर्य न कहीं से आता है और न जाता है। आर्य आप में से ही कोई हो जाता है। विचारणीय तो यह है कि अंग्रेज भारत आये तो उन्होंने ही इस प्रश्न को जन्म दिया। इससे पहले मुगल तुर्क अथवा राजपूत युग में ऐसे प्रश्न की कल्पना तक नहीं थी। तत्सामयिक किसी भी इतिहासकार ने ऐसा प्रश्न नहीं उछाला कि आर्य कहीं बाहर से भारत आये।

लार्ड मैकाले की प्रसिद्ध उक्ति है कि किसी देश या जाति को सदा-सदा के लिये गुलाम रखना है तो उसकी भाषा, उसका इतिहास, उसकी संस्कृति नष्ट कर देनी चाहिए। इसी मानसिकता की परिणति यह प्रश्न है कि आर्य कहाँ से आए? इस कुत्सित योजना का सूत्रपात इटैलियन व्यापारी फिलिप्पो ने किया, जिसने १५८३ से १५८८ ई. तक भारत में अपने पाँच वर्षों के निवास के उपरान्त पहली बार यह घोषणा की कि भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत तथा यूरोप की कुछ प्रमुख भाषायें निश्चित रूप से सम्बन्धित हैं और इस सम्बन्ध का कारण उनका एक उद्गम स्थान है अर्थात् आर्यों के पूर्वज भी यूरोप से ही आये थे। मूलतः दोनों एक ही नस्ल के हैं।

संगठित रूप से इस विचारधारा को गति प्रदान किया सर विलियम जोन्स ने, जिन्होंने १७८४ ई. में बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना के समय संकेत किया कि ग्रीक, लैटिन, ग्रोथिक, संस्कृत एवं फारसी भाषाओं का- जिन्हें विद्वानों ने इण्डो-यूरोपियन या इण्डो-जर्मन भाषा-परिवार का नाम दिया – मूलस्थान एक है। इस उद्बोधन ने विद्वानों को एक नई दिशा प्रदान की। फलतः प्रजातीयता के निर्धारण में भाषा एक महत्वपूर्ण साधन बन गई। प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् मोक्षमूलर ने, जो १८५० ई. में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भाषाविज्ञान के प्राध्यापक नियुक्त किये गये, बताया कि ‘आर्य’ शब्द प्रजाति का बोधक नहीं अपितु मात्र भाषासूचक शब्द है और जब हम प्रजाति के रूप में आर्य शब्द का व्यवहार करते हैं तो इसका अर्थ है- वह प्रजाति, जो आर्य-भाषा भाषी है।

डॉ. गाइल्स का विचार था कि आर्यों का आदि निवास आस्ट्रिया-हंगरी का मैदान या डेन्यूब नदी की घाटी रही होगी; क्योंकि आर्य लोग अश्व, गाय, भेड़, बकरी आदि पालते थे और खेती करते थे। वहाँ पशुओं को चराने और कृषियोग्य भूमि थी। इन्हीं सुविधाओं के आधार पर पार्किन महोदय ने रूस के दक्षिणी मैदान को आर्यों की आदिभूमि होने की सम्भावना व्यक्त की, तो कुछ विद्वानों ने इसी आधार पर पोलैण्ड और कैस्पियन सागर के बीच आर्यों के आदि निवास को रेखांकित करने का प्रयास किया।

एडवर्ड मेयर का विचार है कि आर्यों का मूल निवास काकेशस पर्वत या पामीर के पठार के पास रहा होगा; क्योंकि इसी क्षेत्र के एल अमर्ना नामक स्थान की खुदाई में एक रथ प्राप्त हुआ है जो आर्यों का बताया जाता है, जिसके धुरे पर भोजपत्र बँधा है जो काकेशस पर्वत पर ही पाया जाता है। अतः आर्य पहले यहीं रहते रहे होंगे।

टर्की के बोगाज कोई नामक स्थान पर उत्खनन में कुछ अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनमें वरुण, मित्र, इन्द्र देवताओं के नाम तथा एक, तेर, पंज, सत्त आदि संख्याएँ उत्कीर्ण हैं। देवताओं के मिलते-जुलते नामों से मोक्षमूलर (मैक्समूलर) महोदय ने आर्यों का निवास मध्य एशिया होने की सम्भावना व्यक्त की।

कतिपय विद्वानों का विचार है कि सुनहले बाल भारोपीय जाति की विशेषता थी, जिनका स्थान जर्मन प्रदेश रहा होगा। यूनानी देवता अपोलो के बाल सुनहले बतलाये गये। रोमन शासकों के बाल भूरे थे। प्रसिद्ध योगप्रणेता व्याकरणाचार्य महर्षि पतंजलि के अनुसार भारत के ब्राह्मणों के बाल सुनहले भूरे हैं, अतः जर्मनी को आर्यों का मूल मानना उचित होगा।

प्रजाति के रूप में आर्यों के मूल निवास के अन्वेषकों के अनुसार आर्यों ने वायु, सूर्य, विद्युत, चन्द्रमा, अग्नि इत्यादि प्राकृतिक शक्तियों को विचित्र कार्य करते देख भय से इन्हें देवता मान लिया। यही कारण है कि भारत में देवता अधिक हैं। सैन्धव सभ्यता के प्रणेता अनार्य थे, जो सिन्धुघाटी के मूल निवासी थे। आर्यों और अनार्यों के दीर्घकालीन सहवास के फलस्वरूप दोनों में विचारों का आदान-प्रदान हुआ। अनार्यों के धर्म, उनकी पूजा-पद्धति एवं अन्ध-विश्वासमूलक जादू-टोने इत्यादि ने आर्यों पर क्रमशः अपना प्रभाव जमाना प्रारम्भ कर दिया। आर्य लोग न चाहते हुए भी अनार्य संस्कृति से अछूते नहीं रह सके। उनके चौथे वेद अथर्ववेद में तो जादू-टोने, भूत-प्रेत एवं अभिचार ही मन्त्रों के वर्ण्य विषय बन गये। जान पड़ता है कि इस सांस्कृतिक आमेलन में अनार्यों की वैराग्यमार्गी परम्परा ने आर्य मनीषियों को पर्याप्त प्रभावित किया और ब्राह्मणकाल में ही तप और त्याग की ओर आर्यों का आकर्षण बढ़ने लगा। फलतः आर्यों ने यति, मुनि आदि के रूप में वनों के शान्त वातावरण में अपना आश्रम बनाकर रहना प्रारम्भ कर दिया और ब्राह्मण-ग्रन्थ लिखे।

उपर्युक्त अनुच्छेद से यह निष्कर्ष निकलता है कि आर्य मूर्ख थे। सिन्धुघाटी में आने के पश्चात् ही आर्य कुछ सभ्य हुए। जादू-टोना, वैराग्यमार्गी परम्परा इत्यादि उन्होंने अनार्यों से सीखा। ऐसा प्रतीत होता है कि यह संस्कृति को मिटाकर हीनता जगाने का प्रयास है। भारत के जिस-जिस कबीले को आज के विद्वान् अनार्य कहते हैं वे सब पिछड़े हुए हैं। उन्हीं से सारी पद्धतियों को सीखकर ये आर्य सुसभ्य हो गये और वे अनार्य अपनी कल्याणमार्गी परम्परा को ही ऐसा भूले कि उन्हें सिखाने पर भी नहीं आता। उनके लिए उन्हीं की परम्परा का पालन करने पर रोक भी लग गई कि शूद्र वैराग्य न ले। पाश्चात्य मनीषी जताना चाहते हैं कि आर्य न केवल मूर्ख अपितु कायर भी थे, जो क्षुद्र प्राकृतिक शक्तियों से भयभीत होकर उन्हें देवता मान बैठे या वे प्रकृति के सत्यों से अवगत भी न थे। कहना न होगा कि आर्य-चरित्र को लेकर भी पाश्चात्य विचारकों ने जो कुछ भी प्रचारित किया वह उनकी दुरभिसन्धिपूर्ण मानसिकता का ही द्योतक है।

सारांशतः पाश्चात्य विद्वानों में किसी ने भाषा और पुरातत्त्व को, तो किसी ने पेड़-पौधों, पशुओं या रहन-सहन को आधार बनाकर और इससे भी अपने मन्तव्य की पुष्टि न देख कतिपय विद्वानों ने शरीर-विज्ञान को माध्यम बनाकर यह अटकल लगाया कि आर्य एशिया माइनर में सीरीया या टर्की से, यूरोप में आस्ट्रिया, हंगरी, जर्मनी, यूक्रेन (रूस) इत्यादि देशों में से कहीं से भारत आये होंगे। इस तरह के पचीसों मत हैं जिनमें दस-बारह अधिक मान्यता प्राप्त हैं; किन्तु जिन लोगों ने आर्य-जीवन जिया, जो आर्य थे, उन्होंने भी तो आर्य शब्द का आशय बताया है, आर्य-संस्कृति का परिचय प्रस्तुत किया है, आर्यत्व पर भरपूर बल दिया है। उनके आँखों देखे उपदेशों को, जैसे- भगवान श्रीकृष्ण, भगवान महावीर, भगवान बुद्ध के वक्तव्य, महात्मा वाल्मीकि का आदिकाव्य रामायण, महर्षि व्यासरचित महाभारत इत्यादि आर्षग्रन्थों में स्थान-स्थान पर अनुस्यूत आर्य शब्द के भाव को किसी ने नहीं लिया। इनमें से किसी एक का भी उद्धरण इन यूरोपीय विद्वानों ने प्रस्तुत नहीं किया।

भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, जो एक परमात्मा के चिन्तन में दृढ़ता के साथ प्रवृत्त है, आर्य है। सन्मार्ग पर जो दृढ़तापूर्वक आरूढ़ है, वह आर्य है। महाभारत-युद्ध के आरम्भ में अर्जुन कुल की रक्षा को ही सनातन-धर्म मानकर उसके लिए विकल था, जिसकी भगवान ने अनार्यजुष्टम्’ कहकर भर्त्सना की कि अर्जुन! यह अनार्यों का आचरण तूने कहाँ से पकड़ लिया। न तो आर्य-पुरुषों का यह आचरण है, न कीर्ति करनेवाला और न कल्याण ही करनेवाला है। जिसमें कीर्ति नहीं, कल्याण नहीं, जो आर्य-पद्धति नहीं तब सिद्ध है कि यह अज्ञान है। सनातन एकमात्र आत्मा है। जो आत्मा की शोध में लगा है, आर्य है।

भगवान बुद्ध के अनुसार भी यही है कि जो मरणधर्मा होने पर भी अमरत्व की शोध करता है, आर्य है। दुःखों में रहते हुए भी शाश्वत सुख की तलाश करता है, आर्य है। यह आर्यत्व की अधिकतम कसौटी है; किन्तु इसकी शुरुआत जहाँ से है वह निम्नतम सीमा है आर्य-संस्कारों का बीजारोपण (आर्य-सत्कर्मों की एक लम्बी श्रृंखला), जिसका पालन आर्य-संस्कृति है।

आर्य-संस्कृति का परिचय ऋषि वाल्मीकि के रामायण में आद्योपान्त भरपूर है। कुम्भकर्ण को देख जब वानरी सेना भागने लगी, तब युवराज अंगद ने अपने सैनिकों को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘‘शूरवीरो! हमारे पूर्वजों ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी थीं। उन्होंने विजय प्राप्त की थी अथवा वीरगति को प्राप्त हुए थे; किन्तु कभी पीठ नहीं दिखाई। हम उन्हीं आर्यों की सन्तान हैं। आज पीठ दिखाने से हम अनार्य कहे जायेंगे। शूरवीरो! लौट आओ। अपने सम्मान को मत खोओ। काल भी होगा तब भी हम शत्रु को जीतेंगे या वीरगति प्राप्त करेंगे।’’ सेना लौट आयी। यह थी आर्य-संस्कृति। आर्य कभी पीठ नहीं दिखाता।

पंचवटी में सुवर्ण मृग की आवाज सुनकर भी लक्ष्मण को राम की सहायता में जाता न देख सीता ने फटकारा- ‘‘कपटी अनार्य लक्ष्मण! तुमको धिक्कार है। तू भरत के इशारे पर बड़े भाई की भक्ति का अभिनय कर पीछे लग गया कि राम संकट में पड़ेंगे तब सीता को मैं प्राप्त कर लूँगा।’’ लक्ष्मण का धैर्य खो गया और उन्हें जाना पड़ा। यह आर्य-संस्कृति है। आर्य कभी चरित्र से नहीं गिरता।

राम आर्य थे। आदिकवि ने स्थान-स्थान पर आर्य शब्द से उन्हें सम्बोधित किया है। हिन्दी में रामकथा के अमरप्रणेता गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी राम के लिए इस शब्द का प्रयोग किया- आरज सुत पद कमल बिनु, बादि जहाँ लगि नात।’ (मानस, २/९७) आर्य-संस्कृति की एक झलक गोस्वामीजी के रामचरितमानस में देखें- रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ काऊ।।’ (मानस, १/२३०/५) सीता के रूप को देख राम के मन के भाव कुछ बदल गये। तब निष्कपट निश्छल राम ने लक्ष्मण से कहा कि भाई लक्ष्मण! यह सब कारण तो विधाता ही जानें। वैसे हमें अपने मन पर पूर्ण भरोसा है जिसने भूलकर भी कुपन्थ पर कदम नहीं रखा। यह आर्यों का सहज स्वभाव है। राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं।।’ (मानस, १/२३६/२) निष्कपट भाव से सम्पूर्ण प्रकरण राम ने विश्वामित्रजी से भी कह सुनाया। यह आर्य-संस्कृति है कि आर्य कपटरहित, छलरहित, मन-अन्तःकरण से सरल, परोपकारी, चरित्रवान् और शरणागतवत्सल होता है।

आर्य शब्द की ठीक यही परिभाषा भगवान महावीर ने की है। उनके अनुसार जो मनुष्य मन से सरल है, आचार से सरल है, कपटरहित है, परोपकारी है, जो अपने दोषों को नहीं छिपाता तथा जिसकी यथार्थ दृष्टि है वह आर्यत्व प्राप्त है। वह शुद्ध आर्य है। जो मनुष्य वक्र है, वाणी एवं आचार से वक्र है, मन से कपटी है, मिथ्या दृष्टि है- वह अनार्य है। आर्य एक दृष्टि का नाम है, निष्ठा है, स्थिति है न कि कोई प्रजाति। आपका एक सगा भाई आर्यत्व प्राप्त कर आर्य हो सकता है और दूसरा आर्यत्व च्युत असुर भी हो सकता है।

आर्यों का भाई-भाई के प्रति सहृदयता, मित्र-व्यवहार, अतिथि-सत्कार, स्त्री-पुरुष के निष्ठापूर्ण सम्बन्ध इत्यादि जीव-जगत् में मिलनेवाले सम्पूर्ण व्यवहार निश्छल और आदर्श होते हैं। वे पड़ोसी का हित करनेवाले होते हैं। माता-पिता, गुरुजनों की सेवा, रोगी तथा वृद्धजनों की निस्वार्थ परिचर्या, दूसरों का दुःख बाँट लेना, सहज कल्याण करना आर्यत्व प्राप्त पुरुषों का रहन-सहन है। इसलिए भारत ने परम कल्याण का ही उपदेश दिया, किसी की सभ्यता सीखने का उनके लिए कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

जनकल्याण की भावना से प्रेरित होकर ही हमारे पूर्वजों ने कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’– सम्पूर्ण विश्व को आर्य बना डालने का व्रत लिया था। ये सत्यद्रष्टा इसीलिए विश्वभर में फैल गये। जहाँ भी वे गये, वहाँ की क्षेत्रीय भाषा को समझा और उसके माध्यम से आर्य-प्रणाली ईश्वर-पथ का उपदेश किया। यही कारण है कि भारत की संस्कृत भाषा और प्राचीन भारतीय सभ्यता से मिलते-जुलते पुरातात्विक अवशेष विश्वव्यापी हैं न कि चन्द शब्द कहीं मिल गये तो वहाँ से आये। लोग इतना भी नहीं सोचते कि आर्य वहाँ से पूरी संस्कृत भाषा ही बाँध लाये और वहाँ किंचित् शब्द ही बचे। आर्य वेद भी लेते आये और बचे परिवार के लिये कुछ भी नहीं छोड़ा; क्योंकि विदेशों में केवल भाषा मिली वेद नहीं, इतिहास नहीं, रहन-सहन भी नहीं।

भारतीय मनीषियों ने सोती आत्माओं को जगाया, परमात्मा के रूप में स्थिति दिलायी किन्तु नश्वर भौतिक सामग्रियों के संग्रह में कभी रुचि नहीं ली; क्योंकि यहाँ पर बच्चे-बच्चे को आर्यशिक्षा प्राप्त होने के साथ ही यह ज्ञान हो जाता है कि सृष्टि में क्या सत्य है और क्या झूठ? यह व्यवहार आर्य-भाव में स्वल्प प्रवेश भी जिन-जिन को है उनका है, जिसे आर्य-संस्कृति कहते हैं; किन्तु भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार एक आत्मा ही सत्य है, उसे प्राप्त करने की निश्चित विधि का आचरण ही धर्म है। यह आर्यत्व की पराकाष्ठा है, उसका विशुद्ध स्वरूप है। जब तक अनुभवी सद्गुरु नहीं मिलते, आर्यत्व का यह प्रशिक्षण पूर्ण नहीं होगा।

आश्चर्य है कि विलियम जोन्स के समय से अर्थात् मात्र दो सौ वर्ष से इस प्रश्न को विद्यालयों में पढ़ा-पढ़ाकर बच्चे-बच्चे को गुमराह किया जा रहा है कि आर्य कहाँ से आये? वैदिककाल से गौतम बुद्ध के समय तक विश्व के कोने-कोने में जो आर्य-संस्कृति के ध्वजवाहक रहे, जिनका साहित्य आर्य-संस्कृति का दर्पण है, विभिन्न अटकलों के बीच उनके सुस्पष्ट विचारों को उद्धृत करने का ध्यान एतद्विषयक किसी शोधकर्त्ता को क्यों नहीं आया? ध्यान अवश्य आया होगा किन्तु विदेशी शासकों के गर्हित मन्तव्यों में सहायक न होने, प्रत्युत् विरोधी होने से ऐसे शोध-प्रबन्धों को मान्यता न मिलती इसीलिए लोगों ने सत्य से आँखें मूँद लीं। अतः आप सब सदा-सदा के लिये भूल जायँ कि आर्य कहीं से आता-जाता है। यह शब्द साधनासूचक है, भाषा या प्रजातिसूचक कदापि नहीं। इस विवाद को विराम देकर किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष की शरण में जाकर आर्यत्व के गुणों को सीखें। आर्य और देवता, अनार्य और दस्यु पर्यायवाची हैं। किसी समय देवासुर शब्द के साथ ही आर्य एवं दस्यु शब्द प्रचलन में था, कालान्तर में आर्य-अनार्य शब्द उभरकर सामने आया। आर्य शब्द जाति-पाँति, भेदभाव से परे है। विश्वभर का मानव मात्र एक इकाई है। प्रकृति के थपेड़ों से घबड़ाकर विश्व का कोई भी मानव जब आर्यत्व की शोध में निकलता है तो मृत्यु से अमरत्व की ओर, दुःखों से सहज सुख की ओर गमन कर जाता है।

आर्य और अनार्य शब्दों के प्रयोग से हमारे प्राचीन आर्षग्रन्थ भरे पड़े हैं। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार उत्तर भारतीय-दक्षिण भारतीय, सुग्रीव का परिवार, वानर-भालू जातियाँ आर्य थीं। रावण जितना अनार्य था उसके पूर्वज पुलस्त्य, विश्रवा तथा उसका सहोदर विभीषण उतना ही आर्य था।

आर्य और अनार्य शब्द पर भगवान बुद्ध के विचार मज्झिम निकाय के पाशराशि सुत्त में संकलित हैं। उन्होंने समझाया- ‘‘भिक्षुओ! इस संसार में दो प्रकार की खोज (पर्येषण) है- आर्य और अनार्य। अनार्य-खोज उसे कहते हैं, जो स्वयं जातधर्मा (जन्मनेवाला) होते हुए भी जातधर्म का ही पर्येषण करता है। स्वयं जराधर्मा (बूढ़ा होने के स्वभाववाला) होते हुए भी जरा-धर्म का ही आह्नान करता है, व्याधि-मरण-शोक और संक्लेशधर्मा होते हुए भी इन्हीं की खोज करता है। पुत्र और भार्या जातधर्मा है। सोना-चाँदी तथा सृष्टि की सारी भोग-सामग्री जातधर्मा है। इन्हीं में यह पुरुष ग्रसित, मूर्च्छित और आसक्त हो स्वयं जातधर्मा होकर दूसरे जातधर्मा अर्थात् नश्वर पदार्थों की खोज करता है- यह अनार्य-खोज है। किन्तु भिक्षुओ! कोई-कोई पुरुष स्वयं जातधर्मा होते हुए, जातधर्म में दुष्परिणाम देख अजात (जन्मरहित), सर्वोत्तम, मंगलमय निर्वाण की खोज करता है। स्वयं व्याधिधर्मा (व्याधिरहित), मरणधर्मा (मरणरहित), अ-मृत, शोकधर्मा (शोकरहित), स्वयं संक्लेशधर्मा (मलरहित) अति उत्तम योगक्षेम, निर्वाण की खोज करता है- वह आर्य-पथ पर है।’’

स्पष्ट है कि आर्य एक पथ है, मन की एक रुझान है, एक निर्धारित दिशा है। आपका एक सगा भाई आर्य, दूसरा अनार्य हो सकता है। एक ही व्यक्ति जीवन के किन्हीं क्षणों में आर्य और दूसरे क्षण अनार्य हो सकता है। कोई कभी आस्तिक तो कभी नास्तिक हो सकता है। जो उस अस्तित्व का उपासक है आस्तिक है, वह आर्य है। निष्ठा के साथ उस परमात्मा को पाने की विधि का आचरण आर्य-शोध है और इसके विपरीत जो अस्तित्वहीन, नश्वर, क्षणभंगुर कलेवरों की कामना करता हुआ भटक रहा है, कहीं-न-कहीं वह अनार्य है। इसी को महापुरुषों ने कभी विद्या और अविद्या कहा, तो किसी ने इसी को अन्तर्मुखी-बहिर्मुखी, सजातीय-विजातीय, दैवी सम्पद्-आसुरी सम्पद् कहा। यह वृत्ति है, एक प्रवृत्ति है। सत्यशोध की प्रवृत्ति आर्य है, असत्य-शोध की प्रवृत्ति अनार्य है। इसीलिए पूरा संसार आर्य है और पूरा संसार अनार्य है। वेद में है कि कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ अर्थात् विश्व को आर्य बनायें। आर्य बनाने जाते हैं, न कि जन्म या स्थान से कोई आर्य होता है।

सृष्टि का आदिशास्त्र गीता, उसी का विस्तार वेद, गौतम बुद्ध तक सबने आर्य का आशय इष्टोन्मुखी प्रवृत्ति माना, गुणवाचक माना, न कि भारत के बाहर से आनेवाली कोई जाति। हाँ, भारत में उस परमात्मा की शोधवाले बहुसंख्या में थे, इसीलिए भारत को कभी आर्यावर्त भी कहा जाता था। जिस समाज का बहुमत एक परमात्मा के लिये संकल्पवान् था, इन्द्रिय-संयम और मन के निरोध के लिये जो प्रतिबद्ध थे; उनका रहन-सहन, खानपान, वेशभूषा, शादी-विवाह, नियम-कानून सब कुछ सुसंस्कृत था, जो आर्य-संस्कृति कहलायी; लेकिन आर्यों की जो मूल क्रिया है उस पर भारतीयों का ही वर्चस्व नहीं है, वह तो विश्व के मनुष्यमात्र की है। अपने को ईसाई माननेवाला भी यदि उस अविनाशी परमात्मा की खोज में तत्पर है, जिसमें अनन्त जीवन है तो वह आर्य है, अन्य कुछ भी नहीं। मुसलमान ही क्यों न हो (सूफी सन्तों की तरह), एक परमात्मा के लिए जो हृदय-मन से प्रयत्नशील है, वह आर्य-शोध पर है, आर्य ही है। आर्यत्व की मुख्य पहचान खानपान, वेशभूषा, रहने का ढंग या सामाजिक व्यवस्था नहीं बल्कि वह योग-क्रिया है जिस पर चलकर जीवात्मा अपने मूल परमात्मा तक की दूरी तय करता है। सनातन साध्य है आर्यों का। जो दैवी सम्पद् से युक्त है, वह आर्य है। जो आसुरी सम्पद् से युक्त है, वह अनार्य है। इन्हीं क्रियाओं का अनुशीलन करनेवाले आर्य कहलाये। आर्य का अर्थ आर्यसमाजी नहीं, आस्तिक है। आर्य एक स्थिति है।

।। ।।

(शंका-समाधानसे उद्धृत)

Q & A
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