क्या परमात्मा को प्राप्त करने की कई विधियाँ हैं?

प्रश्नक्या परमात्मा को प्राप्त करने की कई विधियाँ हैं?

उत्तर :- कदापि नहीं! भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! इस कर्म को किये बिना न तो कोई पूर्व में परमात्मा को प्राप्त कर सका है और न भविष्य में कोई प्राप्त कर सकेगा; परन्तु जिन महापुरुष के कर्मों के परिणाम में आत्मा विदित है, जो आत्मतृप्त हैं, आत्मस्थित हैं उन महापुरुष के लिए किंचित् भी कर्तव्य शेष नहीं है, प्राप्त होने योग्य कोई वस्तु अप्राप्य नहीं है। इसलिए कर्म करने से न उन्हें कोई लाभ है और कर्म छोड़ देने से न कोई क्षति। फिर भी वे महापुरुष पीछेवालों के मार्गदर्शन के लिए कर्म में भली प्रकार बरतते हैं। ऐसे सद्गुरु लोकहित के लिए होते हैं।

अनन्तकाल से जनकादि जितने भी ऋषि हुए हैं इसी कर्म को करके परमनैष्कर्म्य स्थिति को प्राप्त हो गये, जहाँ पहुँचने पर कर्म किये जाने से न कोई लाभ है और कर्म छोड़ देने से न कोई क्षति। वे सहज स्वरूप की स्थिति पा गये। इसलिए क्रिया तो एक ही है।

किन्तु इस विधि के कई स्तर हैं। इसका आरम्भ होता है प्रभु के गुणगान से, पारस्परिक भगवच्चर्चा से, पत्र-पुष्प-जल इत्यादि समर्पण से। यह आरंभिक कक्षा है।

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।। गीता, १०/९

निरन्तर मुझमें मन लगानेवाले मेरा गुणगान करते हुए वे प्रसन्न होते हैं, आपस में मेरी ही चर्चा करते हैं। शुरुआत यहीं से है।

क्रमशः स्तर उन्नत होने पर भगवान उठाने-बैठाने-चलाने लगते हैं। नियत कर्म अब प्रशस्त हो गया। इसके पश्चात् कर्म एक, साधना का परिणाम एक, मिलनेवाली सुविधा एक-जैसी ही सबको मिलती है।

भगवान कहते हैं- ‘‘अर्जुन! तू निमित्त मात्र होकर खड़ा भर रह, कर्त्ता-धर्त्ता तो मैं हूँ, विजय तुम्हारी होगी- निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन। मेरे द्वारा मारे हुए इन मुर्दों को मार, यश प्राप्त कर।’’ वस्तुतः जब तक परमात्मा स्वयं आपकी आत्मा से अभिन्न होकर जागृत न हो जाय, मार्गदर्शन न करने लगे तब तक पूर्ण निवृत्ति दिला देनेवाली साधना अभी जागृत ही नहीं हुई।

इस प्रकार साधना एक है, विधि एक है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।। गीता, १६/२३

इस शास्त्र-विधि को त्यागकर अन्य-अन्य विधियों से जो भजता है उसके जीवन में न सुख है, न सिद्धि है और न परमगति ही है। वह सबसे भ्रष्ट हो जाता है। इसलिए-

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।। गीता, १६/२४

तुम्हारे कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य के निर्णय में शास्त्र ही प्रमाण है। किसी अन्य शास्त्र के पीछे न भागें। भगवान स्वयं कहते हैं-

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।

एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।। गीता, १५/२०

हे निष्पाप अर्जुन! यह गोपनीय से भी अति गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। कौन-सा शास्त्र? यही गीताशास्त्र। गीता अपने आप में सम्पूर्ण शास्त्र है। इसका भली प्रकार अध्ययन करके आचरण कर। तू अमृतमय अनामय परमपद को प्राप्त करेगा, सदा रहनेवाला जीवन और समृद्धि प्राप्त कर कृतार्थ हो जायेगा।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत) * * *

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