जाग री मोरी सुरत सुहागिन
गुरु महाराज सुबह-सुबह दो ही बजे उठ के स्वयं बैठ जाय, तीन बजे से सबको बैठा देखना चाहें। सभी भजन में बैठ जायँ। चार बजे के करीब भजन गुनगुनाया करें। दो भजन बड़े प्रिय थे गुरु महाराज को। एक तो ‘जाग री मोरी सुरत सुहागिन।’, दूसरा ‘भज ले मन राम सिया राम सिया रामा।’ तो–
भज ले मन राम सिया राम सिया रामा।
भज ले मन राम सिया राम सिया रामा।
राम नाम कमल फूल संतन मन भँवर भूल।
पीवत रस झूम–झूम अमृत अनुपाना।
भज ले मन राम सिया राम सिया रामा।
राम नाम निर्मल नीर संतन मन सरयू तीर।
मज्जत निर्मल शरीर पावत विश्रामा।
भज ले मन राम सिया राम सिया राम।।
राम नाम वेद मूल तेहि समान नाहीं तूल।
कोविद करत गान पावत विश्रामा।
भज ले मन राम सिया राम सिया रामा।
राम नाम ओंकार तुलसीदास नमस्कार।
दीजै प्रभु भक्ति सार पल–पल पर नामा।
भज ले मन राम सिया राम सिया रामा।।
‘दीजै प्रभु भक्ति सार’– भक्ति का सार है ‘पल–पल पर नामा’– हर पल पर श्रद्धा के साथ भगवान का नाम चलता रहे हम समर्पित रहें चरणों में, झुके रहें, चरणों में नत रहें, एक भी पल हमारा मन भटकने न पावें। यही भक्ति का सार है।
दूसरा भजन था– ‘जाग री मोरी सुरत सुहागिन।’
सोना और जागना। जागना परिश्रम है, सोना परिश्रम का निवारण है। खाना अनिवार्य है शरीर के निर्वाह के लिए, ऐसे सोना भी अनिवार्य है। ये एक भोजन है शरीर का। जागना थकान है, सोना थकान का निवारण है। स्वस्थ व्यक्ति को यदि १५ दिन नींद न आवे तो पागल हो जाय। ये शरीर की खुराक है। इसी आधार पर ये बना हुआ है। लेकिन मन का वासनाओं में बहक जाना सोना है, और इससे सचेत हो जाना जागना है।
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा।
देखिअ सपन अनेक प्रकारा।। (मानस, २/९२/२)
मोहरूपी निशा में सभी लोग निश्चेष्ट पड़े हुए हैं। दीर्घ बेहोशी में, गाढ़ निद्रा में पड़े हुए हैं। रात-दिन जो अर्जित करते हैं, दौड़-धूप करते हैं, मात्र स्वप्न देखते हैं। यह सपना घड़ी दो घड़ी का! जीवन का सपना ८०-८५ साल का! और क्या? सपना ही है। लौट के अपने घर परिवार की रहनी को कोई नहीं देखता। सदा के लिए छूट जाता है ये सपना। फिर सपना है। इसलिए जगतरूपी रात्रि में संयमी पुरुष जाग जाता है। इसी आशय का भजन, गुरु महाराज का बहुत प्यारा भजन था– ‘जाग री मोरी सुरत सुहागिन’।
तो जागती है मनोवृत्ति, जागती है मन की दृष्टि, उस दृष्टि का नाम है सुरत। हम यहाँ पड़े हैं, बढ़िया भजन की चर्चा हो रही है, मन लगा है। सहसा कोई कह दे कि छोटा लड़का छत से गिर गया, बेहोश है, अस्पताल गया। तो यहाँ चाहे सब कुछ बढ़िया चलता हो, सत्संग चलता हो, दृश्य बढ़िया दिखाई देता हो…. आँखें खुली हैं, न दृश्य दिखाई पड़ेगा…. कान खुले हैं, न शब्द सुनाई पड़ेगा। लड़के का एक-एक रोआँ दिखाई पड़ेगा कि बरौनी कैसी? पलकें कैसी? हाथ की उँगलियाँ कैसी? क्यों? आँखें खुली हैं फिर भी यहाँ नहीं दिखाई पड़ेगा। आँखें नहीं देखती, इसके पीछे विचार देखता है। विचार तो वहाँ चला गया जहाँ लड़का है। कान नहीं सुनते, विचार सुनते हैं। विचार वहाँ चला गया। जो देखती है, उस दृष्टि का नाम सुरत है। मन की दृष्टि का नाम सुरत है। सुरत जगतरुपी रात्रि से हटकर परमात्म-चिन्तन में लग गयी तहाँ जग गयी। तो–
जाग री मोरी सुरत सुहागिन।
जब भगवान उठाने-बैठाने लगे, मन की लगाम पकड़ के सचेत करने लगे, उस दिन से सुरत सुहागिन हो जाती है।
का सोवत है मोहनिसाँ में, उठ के भजनियाँ में लाग री।
मोरी सुरत सुहागिन……..
क्या मोह-निशा में सो रही है। उठो भजन में लग जाओ। मोह ही निशा है।
भजन कैसे करें?
चित दे सबद सुनो स्रवनन लगि, उठत मधुर धुन राग री।
मोरी सुरत सुहागिन……..
स्वाँस आयी तो चिन्तन से कहो ॐ। गयी तो चिन्तन से कहो ॐ। राम जपते हो तो राम। स्वाँस आयी तो राम, गयी तो राम। कुछ दिन जपना पड़ेगा। फिर जपा-जपाया नाम, ढला-ढलाया मिल जायेगा। स्वाँस सिवाय नाम के कुछ कहती ही नहीं। मन को द्रष्टारूप में खड़ा कर दो, देखा भर करे कि स्वाँस आयी तो क्या कहा? लौट के गयी तो क्या कहा? सुना भर करें। सुनने की क्षमता आ गयी तो फिर केवल सुना भर करें।
भगवान से अवश्य माँगो–
चरण सीस दे विनती करिहौं, भक्ति विमल वर माँग री।
मोरी सुरत सुहागिन……..
शीश को चरणों में रखकर विनय करो, भक्ति का निर्मल वर माँगो।
कहत कबीर सुनो भाई सन्तो, जगत पीठ दे भाग री।
मोरी सुरत सुहागिन……..
संत कबीर कहते है– संतों, ध्यान दो। जगत की ओर पीठ कर दो। फिर खड़े मत रहो, धीरे मत चलो। भाग लो, पूरे वेग से चलो। पहुँचना भी तो है। भगवतपर्यन्त दूरी तय करना है इसलिए भागो।
जगत पीठ दे भाग री। मोरी सुरत सुहागिन…..
तो भागना क्या है?
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।
सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।
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(‘अनुसुइया के परमहंस जी’ से उद्धृत)