धर्म के नाम

धर्म के नाम

पूज्य गुरु महाराज जी के समक्ष भक्तों द्वारा जब ‘हिन्दू’ के विषय में पूछा गया तब पूज्य गुरुदेव ने कहा, ‘‘हो! नाम तो प्राचीन है क्योंकि भारत के सुदूर वनप्रान्तों – असम, मेघालय, ब्रह्मा, बहुत दूर-दूर तक जहाँ इस्लाम धर्म की व्यवस्थाएँ नहीं थीं, वहाँ भी पूर्ण श्रद्धा से स्वीकृत है।’’ ‘ग्यारह सौ वर्ष पूर्व सिन्धुघाटी से यह नाम उत्पन्न हुआ’- यह बात आधारहीन है। मूलभाषा संस्कृत, धर्मशास्त्र गीता और गौरवपूर्ण इतिहास-ग्रन्थ महाभारत, जिसमें सृष्टि के आरम्भ से द्वापर तक का गौरवपूर्ण इतिहास वर्णित है- इन सब पर कड़े प्रतिबन्ध लग जाने से इन भ्रान्तियों ने जन्म लिया कि ‘हिन्दू’ शब्द कहाँ से आया, आर्य कहाँ से आये और सनातन क्या है? किन्तु यह सब गीतोक्त शब्द हैं।

गीता के आरम्भ में ही भगवान ने कहा-

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।। (गीता, 2/2)

अर्जुन! इस विषमस्थल में तुझे यह अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हो गया? न यह कीर्ति बढ़ानेवाला है, न कल्याण करनेवाला है, न ही पूर्व वरिष्ठ महापुरुषों ने भूलकर इसका आचरण ही किया। अनार्यजुष्टम्’- यह अनार्यों का आचरण तुमने कहाँ से सीखा? गीता आर्य-संहिता है। सिवाय आत्मा के किसी का अस्तित्व नहीं है। जो उस परमात्मा के प्रति निष्ठावान है, आर्य है। उस आत्मा को विदित करने की विधि (योग-विधि) यज्ञ को जो आचरण में ढालता है, वह आर्यव्रती है और इसके परिणाम में जिसकी आत्मा विदित है, जो आत्मतृप्त है, आत्मस्थित है- वह आर्यत्व-प्राप्त है।

आत्मा सनातन है। जो उसका पुजारी है, सनातनधर्मी है। उस परमात्मा का निवास बताते हुए भगवान कहते हैं-

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।। (गीता, 13/17)

अर्जुन! वह ज्योतियों का भी ज्योति है, अन्धकार से अति परे कहा जाता है। वह ज्ञानस्वरूप, पूर्णज्ञाता, जानने योग्य और ज्ञान द्वारा सुलभ परमात्मा सबके हृदय-देश में निवास करता है। हृदय में निवास कर वह करता क्या है? इस पर अध्याय 15/15 में कहते हैं-

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।

अर्जुन! मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ। मुझसे ही स्वरूप की स्मृति, अनुभवी उपलब्धि और बाधाओं का शमन होता है। वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ। वेदान्त का कर्ता और वेदवित् भी मैं ही हूँ। अठारहवें अध्याय में भगवान ने बताया- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।(गीता, 18/61) अर्जुन! वह ईश्वर सम्पूर्ण भूतों अर्थात् प्राणियों के हृदय में निवास करता है। इतना समीप है तो लोग जानते क्यों नहीं? भगवान बताते हैं कि मायारूपी यन्त्र में आरूढ़ होकर सब लोग भ्रमवश भटकते ही रहते हैं, इसलिये नहीं जानते।

जब ईश्वर हृदय में है तो शरण किसकी जायँ? पूजा किसकी करें? अगले ही श्लोक में भगवान कहते हैं-

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (गीता, 18/62)

अर्जुन! उस हृदयस्थ ईश्वर की शरण जाओ, सम्पूर्ण भाव से जाओ। उसकी कृपा-प्रसाद से तू परमशान्ति, शाश्वतधाम को प्राप्त कर लोगे। इसी हृदयस्थ ईश्वर के लिये प्रयत्नशील व्यक्ति ‘हिन्दू’ कहलाता है। जगतरूपी रात्रि के अन्धकार में भी उस ज्योतिर्मय परमात्मा का प्रकाश सदा प्रवाहमान है, प्रेरणा देता रहता है। रात्रि में तो चन्द्रमा (इन्दु) ही प्रकाश करता है, अतः ‘हृदि इन्दु स हिन्दू’- प्रत्येक को इसी का साधक होना है। सृष्टि में मानवमात्र को इसी की शरण जाना है, इसलिये ‘हिन्दू’ शब्द सार्वभौम है। जो आशय हिन्दू का है, वही सनातन का है और वही आर्य का है। अस्तु, अस्तित्व के प्रति निष्ठावान ‘आर्य’, सनातन आत्मा में श्रद्धा रखनेवाले ‘सनातनधर्मी’ और हृदयस्थ ईश्वर का उपासक होने से ‘हिन्दू’ कहलाते हैं। कालक्रम से बदलते हुए ये तीनों नाम पर्याय हैं, एक ही सन्दर्भ के संदेश हैं और इन सबका एक ही धर्मशास्त्र ‘गीता’ है।

।। ओम्।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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