प्रश्न– महाराजजी! निशाचर का क्या स्वरूप है?
उत्तर– जो निशा-प्रिय हो, जिसे प्रकाश में न दिखाई पड़े, वही निशाचर है। यहाँ उदय-अस्त होनेवाले रात्रि-दिन से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह अदृश्य सत्ता के द्वारा प्रसारित जीवधारियों का पालन-क्रम है। जैसा कि-
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।। (गीता, 2/69)
यह सम्पूर्ण जगत् ही रात्रि है, जिसमें संयमी पुरुष जग जाते हैं। यही रूप मानस इत्यादि हर परमात्म-तत्त्व अवगत पुस्तिका में है।
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।। (मानस, 2/92/3)
जगतरूपी निशा में योगी लोग जग जाते हैं। परमतत्त्व के लिए आर्त एवं विधाता के प्रपंच को त्याग देते हैं। यहाँ विधाता का प्रपंच ही निशा है। इस निशा में जागते किस प्रकार हैं?-
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी।
बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।। (मानस, 1/21/1)
नाम के प्रभाव से योगी लोग जग जाते हैं। वास्तव में राम नाम इतना ही नहीं, जितना कि हम जिह्वा से रटते हैं। जैसा कि-
राम नाम में अन्तर है।
कहीं हीरा है, कहीं पत्थर है।।
उस रात्रि का प्रसार, जहाँ तक विधाता का प्रपंच है, उसके लगाव का सर्वथा त्याग कर देते हैं। नाम-चिन्तन की युक्ति के द्वारा परमात्म-तत्त्व को पाना ही प्रकाश है। अब जो इन मायिक प्रवृत्तियों को सत्य समझकर उसी में व्यस्त है, वही निशाचर है। दूसरों को मारकर खुद जीनेवाले, सृष्टि के छिटपुट ऐश्वर्यों में मदान्ध, दुर्व्यसनों में रत एवं भगवत्-विस्मृत स्वभाववाले ही निशाचर हैं। कारण कि जगतरूपी रात्रि में ही उनकी सूझबूझ है और परम प्रकाशमय उस परमात्म-तत्त्व से वंचित हैं।
***
(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)