परमात्मा ही सत्य है तब देव-पूजा क्या है?

प्रश्नपरमात्मा ही सत्य है तब देवपूजा क्या है?

उत्तर :- गीता में भगवान श्रीकृष्ण का स्पष्ट आश्वासन है कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। स्वल्प अभ्यास भी पार लग गया तो अगले जन्म में जहाँ से छूटा था वहीं से अभ्यास ही करेगा। अनेक जन्मों के परिणाम में वह वहाँ पहुँच जायेगा जो परमगति है, परमधाम है, मेरा निजस्वरूप है। फिर भी कामनाओं से जिनकी बुद्धि आक्रान्त है, ऐसे मूढ़बुद्धि अविवेकीजन अन्य-अन्य देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। जहाँ वे पूजा करते हैं वहाँ देवता नाम की कोई सक्षम सत्ता नहीं होती; किन्तु मनुष्य की श्रद्धा भूत-भवानी में, पेड़-पौधे में, नदी-नाले में, ग्रह-उपग्रह में जहाँ कहीं भी टिक जाती है, उस देव-श्रद्धा को मैं ही पुष्ट करता हूँ, उसके लिए फल का विधान मैं ही करता हूँ। फल भी तत्काल मिलता है, भोगने में आता है और नष्ट हो जाता है; किन्तु मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

जब फल मिल ही जाता है, भले ही नष्ट हो जाता है, हमें तो तत्काल आवश्यकता थी, उतना तो मिल ही गया, तब देव-पूजा से क्षति ही क्या है? भगवान गीता के अध्याय ९ में अर्जुन से कहते हैं- देवपूजक मेरे ही पुजारी हैं; किन्तु वे अविधिपूर्वक पूजते हैं इसलिये नष्ट हो जाते हैं। जब चिन्तन करना ही है तो विधिपूर्वक क्यों न करें।

देवपूजक को यह भान हो जाय कि जिसकी मैं पूजा करता हूँ, वह कमजोर है, तो वह पूजा छोड़ देगा। अपनी समझ से तो वह सर्वशक्तिमान, सर्वत्र व्याप्त, ज्योतिर्मय सत्ता की तलाश में है। हाँ, उसे विधि ज्ञात नहीं है।

पुरुष श्रद्धा का पुतला है, कहीं न कहीं उसकी श्रद्धा होगी ही। उसे जिसने जिधर उँगली घुमा दी, उधर ही वह घूम जाता है। वह अनजान में मेरा ही पुजारी है, मुझे ही ढूँढ़ रहा है। वह कण-कण में व्याप्त, सर्वशक्तिमान प्रभु परमात्मा को ही ढूँढ़ रहा है। हाँ, वह पूजन अविधिपूर्वक है इसलिए नष्ट हो जाता है।

परमात्मा को विदित करने की विधि गीता है। भगवान ने कहा- अर्जुन! हम दोनों के इस संवाद को भूले-भटके भक्त लोगों में जो कहेगा उसके समान मेरा प्रिय कार्य करनेवाला दुनिया में और कोई नहीं होगा। जो इसका श्रवण कर लेगा, उसके द्वारा मैं भली प्रकार पूजित हो जाऊँगा, वह मुझे प्राप्त करेगा। और जो केवल कानों से सुन भर लेगा वह भी उत्तम लोकों को प्राप्त होगा। गीता आपका ऐसा धर्मशास्त्र है कि इसका श्रवण करने मात्र से उत्तम लोक, कहनेवाला मेरा प्रिय और जिसने इसके अनुसार चलना आरम्भ कर दिया वह मुझे प्राप्त कर लेता है, मेरे इस भगवत् स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। प्राप्ति की सम्पूर्ण विधि गीता ही है।

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।। गीता, १६/२३

इस शास्त्र-विधि को त्यागकर अन्य-अन्य विधियों से जो भजते हैं उनके जीवन में न सुख है, न सिद्धि है और न परमगति ही है। वे सबसे वंचित हो जाते हैं, कुछ नहीं पाते। उनका समर्पण व्यर्थ चला जाता है।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य व्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।। १६/२४

इसलिए तुम्हारे कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में यह शास्त्र ही प्रमाण है। गीता भली प्रकार समझकर आचरण कर, तू मुझमें निवास करेगा।

देवपूजक साधक को साधना की सही विधि नहीं मिली है। वह इतना गया-बीता नहीं है कि उसे समाप्त कर दिया जाय। वह केवल भूला हुआ है, आवश्यकता उसके मार्गदर्शन की है।

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।

एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्याकृतकृत्यश्च भारत।। गीता, १५/२०

अर्जुन! यह गोपनीय से भी अति गोपनीय धर्मशास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। इसे जानकर तू समग्र अनुभूति, कैवल्यज्ञान और परमश्रेय को प्राप्त कर लेगा। शास्त्र के नाम पर भटककर अन्य कुछ ढूँढ़ने न लग जायँ। गीता अपने आप में सम्पूर्ण शास्त्र है, यह अपौरुषेय वाणी है। मनुष्य के प्रादुर्भाव से पहले ही गीता का आविर्भाव है। यह परमात्मा का सीधा प्रसारण है।

(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता सेसे उद्धृत) * * *

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