प्रश्न– कुछ विद्वानों ने आकर प्रश्न किया कि, महाराजजी! परहित क्या है? लोकहितार्थ आपकी वाणी जनसमूह तक पहुँचनी चाहिए।
उत्तर– श्री परमहंस महाराजजी उत्तर देते हुए कहते हैं कि यह अधिकारी के लिए है, न कि सबके लिए। हम क्या कहें, कोई सुनेगा भी नहीं। हम आँखों की देखी बात कह रहे हैं और तुम लोग कागज की लिखी बता रहे हो। भला बताओ, हमारा-तुम्हारा मन एक कैसे होगा? किसी को खाना-पीना, कपड़ा व इन्द्रिय-तृप्ति की सामग्री देने का नाम परहित नहीं है। यह तो उसका एक अंग मात्र है। यह आत्मा प्रकृति से परे होने के कारण ‘पर’ कहलाता है। इसका हित हो जाय, बस यही परहित है। जैसा कि-
पर हित सरिस धरम नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।। (मानस, 7/40/1)
इस आत्मा का हित हो जाय, इससे बढ़कर कोई धर्म नहीं है। यही परम धर्म है। इसको अधोगति में रखना अर्थात् इसे योनियों के सिलसिले में छोड़े रहना – इससे बढ़कर कोई पाप नहीं है। आत्मा तो अजर-अमर, शाश्वत एवं सर्वत्र है। हमें उसी को प्राप्त कर अपने स्वरूप में स्थित हो जाना है।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)