प्रश्न – पूरा विश्व भारत की आध्यात्मिक विद्या का ऋणी है। भारत विश्वगुरु है तो उसका शास्त्र क्या है?
उत्तर :- श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्य मात्र का धर्मशास्त्र है। सौभाग्य से इसका प्रादुर्भाव भारत में हुआ अतः भारतीयों का भी शास्त्र होने का गौरव गीता को है। ‘एकं शास्त्रं देवकीपुत्र गीतं’– शास्त्र एक ही है जिसका गायन देवकीपुत्र भगवान श्रीकृष्ण ने किया। उस गायन में क्या सत्य बताया? एक परमात्मा। एक ही मंत्र है, किस नाम से उन्हें पुकारें ‘ओम्’ और वही तत्त्व है, वही परमसत्य है। दुर्लभ मानव-तन मिला है तो आप सबका एक ही कर्त्तव्य है, ‘कर्माप्येको तस्य देवस्य सेवा’– उन परमदेव परमात्मा की सेवा करें, उनका सेवन करें। चलते-फिरते, उठते-बैठते हर समय उनका नाम याद आये, प्रभु का स्मरण बना रहे। प्रातः-सायं आधा घण्टा समय इस स्मरण के लिए अवश्य दें। पाँच मिनट से ही आरंभ करें किन्तु समय अवश्य दें। कोई दुर्घटना भी घट जाय तब भी समय दें, जिससे नियम खण्डित न हो। वह प्रभु जानते हैं कि भक्त मुझे पुकार रहा है। वह यह भी जानते हैं कि इसको क्या चाहिए, वे देते हैं। जो माँगेंगे, मिलेगा।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी चार प्रकार के भक्त मुझे भजते हैं। चारों उदार हैं; क्योंकि जिसे भजना चाहिए उसे भजते हैं और जिससे माँगना चाहिए उससे माँगते हैं। वस्तु तो मिलती ही है और ईश्वर से जुड़े रहने के कारण इस पथ में आरम्भ का नाश भी नहीं है। वस्तु का उपभोग करते हुए क्रमशः आगे बढ़ते जायेंगे और एक दिन प्रभु का दर्शन, स्पर्श और उनमें स्थिति प्राप्त कर लेंगे। इसलिए सम्पूर्ण शास्त्र गीता ही है। आप अध्ययन अवश्य करें।
कभी-कभी साधक माया की प्रबलता और लोक-व्यवहार के लिए साधना में शिथिल हो जाते हैं; किन्तु यह सब अवरोध भजन की जागृति के पूर्व की अवस्था तक ही हैं। एक पण्डितजी कथावाचक थे। कथा में वे सत्य ही सत्य बताया करते थे। एक दिन कलियुग पुरुष-वेश में उनके पास आकर कहने लगा, ‘‘पण्डितजी! हमारा राज्य है, कुछ हमारे हिस्से का भी बताया करें।’’ पण्डितजी ने पूछा- ‘‘आप कौन हैं?’’ उसने कहा- ‘‘मैं कलियुग हूँ।’’
पण्डितजी बिगड़ खड़े हुए- ‘‘नालायक कहीं का! सुबह-सुबह आ गया। तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी? इस मुख से झूठ हम बोल ही नहीं सकते, यह तो प्रभु का ही स्मरण और उन्हीं का गुणानुवाद करेगा।’’ कलि ने कहा, ‘‘महाराज! हमारा राज्य है तो हम कोई उपाय करेंगे।’’ पण्डितजी ने डाटकर उसे भगा दिया।
पण्डितजी के प्रवचन में अपार भीड़ रहती थी। दूसरे दिन साफ-सुथरे कपड़े पहनकर एक व्यक्ति प्रवचन में आया। वह कभी मंच के पास जाने का प्रयास करता, कभी पीछे लौट आता। कभी सिगरेट मुख में रख लेता। श्रोताओं ने उसे मना किया- ‘‘आप कैसे अशिष्ट हैं। हजारों लोग शान्ति से गीता की कथा सुन रहे हैं, अमृत बरस रहा है, क्या आप शान्ति से कथा नहीं सुन सकते?’’ उसने कहा, ‘‘आप ठीक कहते हैं। मैं कुछ काम से आया था। थोड़ा शीघ्रता में हूँ।’’ लोगों ने पूछा, ‘‘काम क्या है?’ उसने कहा, ‘‘काम तो पंडितजी से ही है। ऐसा है कि जुए का कुछ कर्ज पंडितजी पर शेष है। उन्होंने कहा था कि कथा में रुपये मिलेंगे तभी दे पाऊँगा। और कोई खास बात नहीं है। पंडितजी भले आदमी हैं, कोई बात नहीं, पहुँचा ही देंगे।’’ वह चला गया। प्रचार हो गया कि पंडितजी जुआ खेलते हैं।
पाँच-सात दिन में ही श्रोताओं की भीड़ आधी हो गयी। पुनः एक दूसरा व्यक्ति आया। सभा में आगे बैठकर कभी उठता कभी बैठ जाता, कभी इधर-उधर देखने लगता। लोग चौकन्ने हो गये। उससे पूछा- ‘‘क्या बात है?’’ उसने कहा, ‘‘कोई खास बात नहीं है। शराब वाले सेठ ने मुझे भेजा है कि पैसा हो गया हो तो पण्डितजी दे दें, पन्द्रह दिन से उधार ही चल रहा है।’’ लोगों ने सोचा कि पण्डित शराब भी पीता है। चौथाई भीड़ खिसक गयी।
कुछ दिनों पश्चात् एक फटीचर-जैसा व्यक्ति कथा के दौरान बोला, ‘‘क्या गुरुजी! कथा ही कहते रहेंगे या कुछ इधर भी ध्यान देंगे?’’ पण्डितजी ने पूछा- ‘‘कौन हो भाई?’’ उसने कहा, ‘‘जो नगर-वधू, बाईजी हैं उन्हीं का सेवक हूँ। नाच-गाना देखने का कई दिनों का आप पर बकाया है, मिल जाता तो बड़ी कृपा होती। बड़ी देर हो रही है।’’ ऐसा सुनना था कि अधिकांश श्रोता भी चले गये।
दो-चार वयोवृद्ध ही अब उनकी कथा के श्रोता रह गये थे। वे पण्डितजी को सान्त्वना देते थे। एक दिन कलियुग पुनः एकान्त में पण्डितजी से मिला। उसने पूछा- ‘‘क्या हाल-चाल है?’’ पण्डितजी ने कहा, ‘‘पता नहीं कैसे-कैसे लांछन लग रहे हैं, अब तो कथा में लोग आते ही नहीं।’’ उसने कहा, ‘‘आपकी सभा तो मैं पुनः एकत्र कर दूँगा; किन्तु आप हमारा भी कुछ हिस्सा कथा में बताया करें।’’ उन्होंने स्वीकार कर लिया।
दूसरे दिन पण्डितजी की कथा के मध्य एक पुलिस अधिकारी तीन अपराधियों को गिरफ्तार करके लाया और बोला- ‘‘पंडितजी! इन नालायकों ने दिल्ली में कथा बिगाड़ी, कोलकाता में अफवाह फैलायी, हरिद्वार कुम्भ मेले में इन्होंने ही दंगा कराया और आपकी कथा में भी व्यवधान डाल रहे हैं। ये धर्मविरोधी हैं।’’ तुरन्त भीड़ एकत्र हो गयी। लोगों ने कहा, ‘‘साहब इन्हें छोड़ना नहीं।’’ उसने कहा, ‘‘आप लोग चिन्ता न करें, मैं इन्हें ले जाता हूँ।’’
चार रूपों में वह कलियुग ही था, चला गया। पण्डितजी ने भी कथा के अंत में मध्यम मार्ग अपनाने का उपदेश दिया कि सत्य तो सदैव सत्य होता ही है लेकिन ‘जैसी देखो दुनिया की रीति। वैसी उठाओ अपनी भीति।’ थोड़ा-बहुत समझौता कर लेना परिस्थिति है, कोई पाप नहीं है।
‘धरा न काहू धीर, सबके मन मनसिज हरे।’– जब माया की चपेट लगती है, साधक खो जाता है; किन्तु जब भगवान वरदहस्त रख देते हैं फिर आपको झूठ बोलने की कोई आवश्यकता नहीं है-
होइ न बाँको बाल भगत को, जो कोई कोटि उपाय करे।
गीता के अनुसार साधना जहाँ पकड़ में आयी फिर यह कलियुग धोखा नहीं दे पायेगा। ‘हरि भक्तन के पास न आवें, भूत प्रेत पाखंड।’ ये प्रपंच पास फटकते ही नहीं। हमारी साधना जब तक अविधिपूर्वक है तभी तक ये प्रपंच चला करते हैं।
(‘प्रश्न समाज के – उत्तर गीता से’ से उद्धृत) * * *