मानस में नारी का स्वरूप

मानसमें नारी का स्वरूप

प्रश्नमहाराजजी! गोस्वामी तुलसीदासजी नेरामचरित मानसमें स्त्रियों को अत्यन्त हेय दृष्टि से देखा है। प्रतीत होता है कि मानस में उन्होंने पुरुष के लिए पक्षपात किया है। इस पर आपके क्या विचार हैं?

उत्तर पूज्य परमहंस महाराज बताते थे- हो! एक बार मैं हरिद्वार में हर की पैंड़ी पर बैठा चिन्तन कर रहा था। थोड़ी ही दूर पर महिलाओं का एक शिविर लगा था। महिलायें वहाँ एकत्र हो रही थीं। समय-समय पर तालियों की गड़गड़ाहट भी सुनायी पड़ जाती थी। कुतूहलवश मैं भी चला गया। मंच पर अधेड़ महिला बता रही थी कि तुलसीदास की रामायण घर में रखना महिलाओं के लिये अपमानजनक है। कैसा लिख मारा कि ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।– हम सब डण्डों और जूतों के अधिकारी हैं! ऐसा रामायण घर में रखना भी अपराध है। लिखा है, अवगुन आठ सदा उर रहहीं। देखो न! ये पुरुष दूध के धोये हैं, इनमें एक भी अवगुण नहीं और हम लोगों में आठ अवगुण सदैव रहते हैं। ऐसी रामायण फूँक देनी चाहिए।’’- ऐसा कहकर जब वह रामायण को मेज पर पटकती, तो बड़े जोर की तालियाँ बजती थीं। उस सभा में स्कूल की छात्राएँ थीं, जो अबोध थीं। महाराजजी ने हम लोगों से बताया, ‘‘हो! जब उन्हीं लोगों का गोल था तब हम क्या बताते।’’ यद्यपि महाराज जी महापुरुष थे, वास्तविकता उनको विरासत में मिली थी, तथापि उस समय वे विरक्त स्वरूप में विचरण कर रहे थे। क्या प्रयोजन कि कौन क्या कह रहा है?

इन्हीं चौपाइयों को लेकर रामायण के पन्ने फाड़ने की घटनाएँ भी यत्र-तत्र सुनने में आती रहती हैं। संसद एवं विधानसभाओं में चर्चा होती है कि रामायण समत्व में बाधक है।

लिखा तो वास्तव में ऐसा ही है; लेकिन शास्त्र कोई विरला ही महापुरुष जानता है और उनके संरक्षण में कोई विरला अधिकारी ही पढ़ता है। सब न पढ़ते हैं, न जानते हैं; क्योंकि पूरी की पूरी रामायण एक साबर मंत्र के रूप में है। कलियुग के भयंकर प्रवाह को आते देखकर भगवान शंकर ने विचार किया कि अब वेद इत्यादि संस्कृत-गर्भित पुरातन शास्त्रों से जीव का कल्याण सम्भव नहीं है, तब उन्होंने जगत् के परम कल्याण के लिये एक साबर मन्त्र का सृजन किया।

कलि बिलोकि जगहित हर गिरिजा।

साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।। (1/14/5)

भगवान शंकर ने देखा कि कलियुग में मनुष्य की स्मृति भ्रमित है, बुद्धि विकल है, वह यथार्थ को सहसा ग्रहण नहीं कर सकेगा- इस तरह की विकृति देखकर भगवान शंकर ने जगत् के हित के लिये ‘साबर मन्त्र’ की रचना की। यह मंत्रजाल है कैसा?-

अनमिल आखर अरथ न जापू।

प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।। (1/14/6)

अनमिल आखर– न तो उसमें अक्षरों की संगति बैठती है, न अर्थ का ही विधान है और न उसके जप का ही क्रम है। ऐसा है मंत्रजाल! तब तो निरर्थक होना चाहिए? किन्तु निरर्थक नहीं है, प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू’- शंकरजी के कृपा-प्रसाद से यदि कहीं प्रत्यक्ष प्रभाव है, कल्याण कर देने की क्षमता है, तो वह साबर मंत्र में ही है। जिनमें अक्षरों की संगति नहीं बैठती, न अर्थ का विधान है और न जप का ही सिलसिला है। सिद्ध है कि व्याकरण से उस साबर मंत्र का कोई सम्बन्ध नहीं है। भाषा में यदि बड़ी मात्रा के स्थान पर छोटी मात्रा लग जाय तो परीक्षक लाल लकीर खींच देते हैं, विद्यार्थी अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। इस साबर मंत्र में तो अनमिल आखर’- अक्षरों की संगति ही नहीं बैठती। अतः अक्षरों की संगति बैठानेवाला अथवा भाषा का ज्ञाता, भले वह दस भाषाओं का ज्ञाता ही क्यों न हो, भाषा के बल पर इस ‘मानस’ को समझ नहीं सकता।

प्रश्न खड़ा होता है कि जब कलियुग में साबर मंत्र से ही जगत् का कल्याण सम्भव है तो तुलसीदासजी कौन-सी गाथा कहने जा रहे हैं? क्या वे इस साबर मंत्र से भिन्न कोई नयी कथा कहने जा रहे हैं? नहीं-

सो उमेस मोहि पर अनुकूला।

करिहिं कथा मुद मंगल मूला।। (1/14/7)

उसी साबर मंत्र के रचयिता भगवान शंकर मुझ पर अनुकूल हैं। मैं उसी ‘मंगल मूल साबर मंत्र’ की रचना करने जा रहा हूँ। अर्थात् यह पूरी की पूरी रामायण एक साबर मंत्र के रूप में है, जिसे भाषा के बल पर पहचाना नहीं जा सकता। इसलिए जो लोग समय-समय पर तर्क-कुतर्क करते हैं वह उनके लिए स्वाभाविक ही है। कुछ न करने से करनेवाला श्रेष्ठ होता है इसी बहाने वे कुछ पढ़ते तो हैं।

जब रामायण का समापन होने लगा तो प्रश्न खड़ा हुआ कि यह कहा किससे जाय?-

यह न कहिअ सठही हठसीलहि।

जो मन लाइ न सुन हरिलीलहि।। (7/127/3)

यह शठ से नहीं कहनी चाहिए, हठधर्मी से नहीं कहनी चाहिए। जो मन लगाकर नहीं सुनता उससे भी नहीं कहनी चाहिए।

कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि।

जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।। (7/127/4)

यह लोभी से, क्रोधी से, कामी से नहीं कहनी चाहिए। यहाँ तक कि उपर्युक्त विकारों से युक्त इन्द्र के समान ऐश्वर्यशाली नरेश ही क्यों न हो, उससे भी नहीं कहनी चाहिए-

द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ।

सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।। (7/127/5)

भला जो इन्द्र के समान प्रतिभाशाली नरेश होगा तो वह हजारों पण्डित बैठाकर पढ़-सुन लेगा जबकि रामायण बाजार में मिलनेवाली पुस्तक है। फिर उससे न कहने का क्या अभिप्राय है? परन्तु नहीं, इस प्रकार भले ही कोई रामायण पढ़ ले, कण्ठस्थ कर ले, बाल की खाल निकालकर समझ ले, फिर जो समझने और समझाने वाली वस्तु है उससे वह पुरुष कुछ दूर ही खड़ा रहेगा। यह मानस है, साबर मंत्र के रूप में है।

कामी, क्रोधी, लोभी, मोही से यह रामायण नहीं कहनी चाहिए। कितने व्यक्तियों में ये विकार नहीं है? क्या आप में नहीं हैं? तो बताइये कहा किससे जाय? क्या हमारे लिए रामायण नहीं है? लेकिन है हमी-आप के लिए! हाँ, इन विकारों में ज्यों-ज्यों न्यूनता आयेगी, त्यों-त्यों रामायण आपकी समझ में ढलती जायेगी। इसके लिए तो नितान्त सुलझे हुए, अनुभवी महापुरुष का सान्निध्य ही समझने का एकमात्र माध्यम है और रहेगा। जिनके अन्दर काम, क्रोध, लोभ, मोह का दबाव नहीं है वे ही इसके वास्तविक जानकार होंगे।

यही कारण है कि अबोध लोगों को ‘मानस’ में स्त्रियों की निन्दा दृष्टिगोचर होती है। वे ‘मानस’ के कतिपय प्रसंगों का उल्लेख करते हैं, जैसे- भरत ननिहाल से लौटकर आये, माता की करतूति पर विचार किया, तो बोले- भूपँ प्रतीति तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।। (2/161/3) राजा ने तुम्हारा विश्वास कैसे कर लिया? नहीं, राजा का दोष नहीं है। ब्रह्मा जिसने सृष्टि की, वे भी नारी को नहीं जान सके। फिर राजा तो धर्म में रत और सरल स्वभाव के थे। वे भला त्रिया-चरित्र क्या जानते?

बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी।

सकल कपट अघ अवगुन खानी।।

सरल सुसील धरम रत राऊ।

सो किमि जानै तीय सुभाऊ।। (मानस, 2/161/4-5)

आगे कहते हैं-

काह न पावकु जारि सक, का न समुद्र समाइ।

का न करै अबला प्रबल, केहि जग कालु न खाइ।। (मानस, 2/47)

ऐसी कौन-सी वस्तु है जो समुद्र में नहीं समाती? ऐसी कौन-सी वस्तु है जिसे आग जला नहीं डालती? कौन ऐसा प्राणी है जिसे काल खा नहीं लेता और कौन-सा ऐसा कृत्य है जो अबला नहीं कर डालती? अबला क्यों! वह तो साक्षात् काल है, समुद्र है, अग्नि है! इससे अधिक नारी-निन्दा क्या होगी? अतः विचारणीय है कि वह अबला है क्या बला? ‘मानस’ में नारी का स्वरूप क्या है?

नारी के लिये अन्यत्र कहते हैं-

बुधि बल सील सत्य सब मीना।

बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।। (3/43/8)

बुद्धि, बल, शील और सत्य सभी मछली के तुल्य हैं और त्रिया उस कँटिया के समान है जिसे बच्चे चारा चिपकाकर पानी में फेंक देते हैं। जहाँ मछली ने पकड़ा तहाँ उठाकर बाहर पटक देते हैं। इस प्रकार स्त्री बुद्धि, बल, शील, सत्य इत्यादि के लिए काल ही है। ‘मानस’ में यहाँ तक लिखा गया है कि भगवत्पथ में यदि कोई रुकावट है तो केवल नारी ही है, अन्य कोई रुकावट है ही नहीं।

जप तप नेम जलाश्रय झारी।

होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।। (3/43/2)

जप, तप, नियम भजन सभी जल के झरने हैं और नारी प्रबल ग्रीष्म के तुल्य है जो इन सम्पूर्ण झरनों को सुखा डालती है। जप-तप, यम-नियम, चिन्तन इत्यादि भगवत्-पथ के ही माध्यम हैं और यदि इनमें कहीं रुकावट है, सुखा डालने की कोई प्रक्रिया है तो वह एकमात्र नारी ही है। भगवत्-पथ में यदि कोई बाधा है तो केवल नारी!

जब नारी भगवत्-पथ में बाधा है, तो नारी के लिये भजन का विधान नहीं होना चाहिए? नारी रुकावट है तो स्वयं भजन क्या करेगी? जो दूसरों को डुबाती है वह स्वयं पार क्या जायेगी? किन्तु नहीं, नारी के लिये भी भजन का अधिकार पुरुषों के समान ही है-

पुरुष नपुंसक नारि वा, जीव चराचर कोइ।

सर्बभाव भज कपट तजि, मोहि परम प्रिय सोइ।। (7/87 क)

पुरुष हो, नपुंसक हो, नारी अथवा नर हो- हिन्दू हो, मुसलमान हो, ईसाई हो- ऐसा नहीं कहा, क्योंकि-

अखिल बिस्व यह मोर उपाया।

सब पर मोहि बराबरि दाया।। (मानस, 7/86/7)

सम्पूर्ण विश्व भगवान की रचना है, सब पर समान दया है। इसमें से जो मद-माया का त्याग करके भगवान को भजता है वही उन्हें परमप्रिय है। सम्पूर्ण विश्व का अर्थ क्या भारत होता है? क्या यूरोप होता है? नहीं, सारा जगत्! जगत् का कोई भी पुरुष हो, नपुंसक हो, नारी हो अथवा नर हो, सम्पूर्ण भावों से सिमटकर, कपट का त्याग करके जो भजता है; भगवान कहते हैं, वह मुझे परमप्रिय है। प्रिय ही नहीं, परमप्रिय है। इस प्रकार माताओं के लिये भी भजन का उतना ही विधान है जितना पुरुषों के लिये। नारी के लिये पहले तो भजन का विधान नहीं होना चाहिये था क्योंकि वे ही तो साक्षात् बाधा हैं; किन्तु उन महापुरुष के शब्दों में विधान भी समान है तब तो कम से कम नारियों के लिये भजन में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए मोह न नारि नारि कें रूपा (मानस, 7/115/2) परन्तु बाधा भी समान ही दिखायी पड़ती है; क्योंकि जप-तप-नियम स्त्री का हो या पुरुष का, उसे सुखानेवाली नारी ही है। वास्तविकता तो यह है कि स्त्रियों के भजन में बाधाएँ पुरुषों की अपेक्षा अधिक हैं। पुरुष भजन करता है तो बाधाएँ कुछ कम हैं; क्योंकि यदि स्त्रियाँ पुरुष के मार्ग में बाधक बनती हैं तो मात्र हाव-भाव से साधक की बुद्धि विकृत करती हैं। जब साधक स्वयं विचलित होता है तभी नष्ट हो जाता है; किन्तु पुरुषों में बलात्कार का एक दोष अधिक है जो स्त्रियों में नहीं पाया जाता। बहुत-सी अटूट श्रद्धावाली महिलायें इन अभागों के कारण अपने भजन-पथ से च्युत हो जाती हैं। इसीलिये पूर्व मनीषियों ने माताओं के लिये घर में ही रहकर भजन करने का विधान रखा। उन्हें परिवार के संरक्षण में रहकर अनवरत चिन्तन में समय देना चाहिये। बाहर रहकर भी उनके भजन का विधान है; किन्तु जब क्षमता आ जाय तभी। जब वे अपने बचाव की क्षमता प्राप्त कर लें तभी उन्हें गृहत्याग करना उचित है। सीता, नर्वदा, अनुसुइया, मीरा, शबरी इत्यादि ने भगवान को इतना अनुकूल कर लिया था कि उन पर विघ्न आये परन्तु असफल हो गये। मीरा के ऊपर बड़े-बड़े उपद्रव आये- राणा ने साँप भेजा, विष भेजा; किन्तु एक समय ऐसा आ ही गया कि मीरा ने राणा को ललकार दिया-

राणो जी! मैं तो गिरिधर रंगवा राती।

औरों के पिया परदेश बसत हैं, लिख लिख भेजत पाती।

म्हारे पिया म्हारे हिये बसत हैं, नहि कहुं आती जाती।।

अब तक तो बाधायें पहुँचायी, किन्तु अब भगवान क्षमा नहीं करेंगे। राणाजी ने चरणों में प्रणाम किया और फिर उन्हें कोई कष्ट न दिया। अस्तु, जिस नारी पर गोस्वामीजी बार-बार बल देते हैं, वे ये नारियाँ नहीं हैं। फिर कौन-सी हैं?-

काम क्रोध लोभादि मद, प्रबल मोह कै धारि।

तिन्ह महँ अति दारुन दुखद, मायारूपी नारि।। (मानस, 3/43)

काम, क्रोध, लोभ इत्यादि मोह की धारायें हैं, जिनमें अत्यन्त दुखदायी मायारूपी नारि है। माया ही नारी है। स्त्रियाँ भजन करती हैं तो माया ही बाधक है। पुरुष भजन करते हैं तब भी माया ही बाधक है। माया क्या है? इन्द्रियों की विषयमयी तरंगें, मनसहित इन्द्रियों का संसार। न कि संसार-सागर में कहीं जल भरा है जिसमें डूब जाओगे। माया तो लम्बी-चौड़ी है, जो कुछ दिखायी-सुनायी पड़ता है माया है; लेकिन हमारे-आपके ऊपर उतना ही प्रभाव डाल पाती है जितना हमारे चित्त की प्रवृत्तियाँ विकृत अथवा उन्नत हैं। कारण यह है कि माया जिस माध्यम से पुरुष पर आक्रमण करती है वह माध्यम ‘चित्त’ है। जिस महापुरुष ने इस चित्त की वृत्ति का निरोध कर लिया उसके ऊपर से माया का प्रभाव सदा-सदा के लिये टल गया। माया ने जहाँ पिण्ड छोड़ा, वे द्रष्टा-स्वरूप में स्थित हो गये।

इस प्रकार सूक्ष्म दृष्टि से ‘चित्तवृत्ति’ ही नारी है। भजन में तल्लीन साधक की ‘चित्तवृत्ति’ जब विषयोन्मुख होती है, संगदोष से साधन छोड़कर किसी इन्द्रिय के पीछे बह जाती है, विषय के चिन्तन में डूब जाती है, उस समय-

दीप सिखा सम जुबति तन, मन जनि होसि पतंग।। (मानस, 3/46 ख)

उस क्षण यही चित्तवृत्ति तरुण होती है, दीप-शिखा के समान होती है और निश्चित जला डालती है। आज नहीं, यहाँ नहीं, तो अवसर मिलते ही कहीं ले जाकर पटक देती है- श्रृंगी की भृंगी करि डारी, पराशर के उदर विदार। जब यह चित्तवृत्ति किसी विषय को लेकर उसी के चिन्तन में सराबोर हो चलती है और भजन का क्रम टूट जाता है तब दीप सिखा’- यह पूर्ण युवा होती है, जला देनेवाली होती है। उस समय न बुद्धि बचेगी, न बल बचेगा, न भजन बचेगा और न योग-युक्ति ही बच पायेगी। मन जनि होसि पतंग’- रे मन! तू पतंगा न हो जा। काम, क्रोध, मद इत्यादि को छोड़कर करहि सदा सतसंग’- इस दीपशिखा से यदि चित्तवृत्ति को बचाना है तो सदैव सत्संग करो।

सत्संग दो प्रकार का होता है। एक सत्संग तो वह है जिसे आप महापुरुषों से सुनते हैं। दूसरा सत्संग सूक्ष्म और क्रियात्मक है जो चिन्तन-ध्यान और समाधि के द्वारा सम्पन्न होता है; क्योंकि सत्य वस्तु है आत्मा, मिथ्या जगत पसार’- सत्य वस्तु तो आत्मा है, उसका संग ही सत्संग है। सब ओर से चित्त को समेटकर उस आत्मा की संगति करना, उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलना, उस आत्मा के साथ रहना ही वास्तविक सत्संग है। अतः सब ओर से चित्त समेटकर उन चरणों में लगाने से ही दीपशिखासे रक्षा सम्भव है।

दीप सिखा सम जुबति तन(मानस, 3/46 ख)- यदि सांसारिक युवतियों की बात होती तो पिता के सामने प्रथम पुत्री युवती ही होती है, भाई के लिए बहन युवती ही होती है, वह तो कहीं खरोंच नहीं मारती! कितना स्नेह रहता है! कितनी सहृदयता रहती है कि जब तक जीवन है, दोनों का स्नेह समाप्त नहीं होता। प्रथम पुत्र के समय माता भी युवती ही होती है लेकिन वह पुत्र को जला नहीं डालती? वह मातृस्नेह आजीवन रहता है और माँ के मरने पर भी नहीं भूलता। अभी कल-परसों ही एक को बिच्छू ने डंक मार दिया। कराह रहा था, ‘अरे माई रे! अरे माई रे!’। था एकदम वृद्ध किन्तु माँ का स्नेह आज भी उसके मन में कसक रहा है। इस दृष्टि से युवतियों का तन दीप सिखा समकहाँ है? वस्तुतः चित्तवृत्ति जब किसी विषय की तरंग लेकर उसमें ओत-प्रोत हो चलती है तब वह युवा होती है, विकराल रूप धारण कर लेती है और दीप-शिखा के समान मानव (स्त्री-पुरुष दोनों मानव हैं) को पतंगे की तरह जला डालने में सक्षम होती है। ऐसी परिस्थिति में इससे बचने के लिए सत्संग ही एकमात्र माध्यम है। गोस्वामीजी जिस नारी से बचने पर बल देते हैं, वह आन्तरिक ही है, बाहर से उसका कोई प्रयोजन नहीं है।

जब तक यह चित्तवृत्ति जीवित है तब तक अवगुन आठ सदा उर रहहीं।(मानस, 6/15/2) आज कदाचित् मन केन्द्रित लगता है, श्वास का यजन सुचारु रूप से हो रहा है किन्तु प्रारम्भ में मन की ऊपरी सतह ही केन्द्रित रहती है, भीतर तो संस्कारों की रील (राशि) भरी है। जब भी उन संस्कारों का अभ्युदय होगा, चित्तवृत्ति युवा हो जायेगी। उस समय दुःसाहस, असत्य, चंचलता, कपट, भय, छल-छद्म, अविवेक, अभ्यान्तरिक मलिनता और कठोरता इत्यादि विकार चित्तवृत्ति में विद्यमान रहते हैं।

इसी सन्दर्भ में इस बहुचर्चित चौपाई पर विचार करें-

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी।

सकल ताड़ना के अधिकारी।। (मानस, 5/58/6)

ताड़ना के अधिकारी– लोग इसका आशय लगाते हैं कि सभी डण्डे के अधिकारी अथवा जूतों के अधिकारी अथवा मारने-पीटने के पात्र हैं। यह एक भ्रान्ति है। ‘ताड़न’ का तात्पर्य परखने से है। आये दिन लोग कहा करते हैं कि ‘‘भाई, हम तो पहले ही ताड़ गये थे कि आज बदली का रूख खराब है, बीज न छिड़को।’’, ‘‘हम पहले ही ताड़ गये थे कि वह क्या कहनेवाला है?’’ इत्यादि।

ढोल ‘ताड़न’ के अधिकार क्षेत्र की वस्तु है।  ‘ताड़न’ का अर्थ पीटना मानें तो किसी को दीजिये ढोल, पीटना आरम्भ करे! आप कहने लगेंगे, भाई! रहने दो, दिमाग मत खराब करो। रख दो! प्रचलित अर्थ में वह ताड़न ही तो करता है, लेकिन किसी को अच्छा नहीं लगता। किन्तु वास्तविक अर्थों में यदि कोई कलाकार है, ढोल की सम्पूर्ण कलाओं को जिसने ताड़ लिया है तो ‘किटधिन्न, ताता धिन्ना’ ताल बढ़ाते-बढ़ाते 16वें ताल तक सबको मुग्ध कर लेगा, समा बँध जायेगी। इस प्रकार ‘ताड़न’ का आशय जानकारी का होना या विशेषज्ञ होना है।

गँवार से काम करा लेना, उसे सत्पथ पर चला देना भी सबके वश की बात नहीं है और न तो वह मारने, पीटने से ही वश में किया जा सकता है। सहसा किसी कार्य को करने के लिये वह तैयार ही नहीं होता। यदि आप उससे कहें कि सभ्य आदमियों की तरह क्यों नहीं रहते, तो तुरन्त कह देगा कि अपनी सभ्यता अपने पास रखें। परन्तु जो व्यक्ति उनकी गतिविधियों से परिचित है, मनोविज्ञान का विशेषज्ञ है, वह क्रमशः उसका उत्थान करते-करते सुयोग्य बना देगा। गँवारों को ताड़ना-परखना भी अधिकारी के क्षेत्र की वस्तु है। डाकू अंगुलिमाल इतना क्रूर और असभ्य था कि मानव अंगुलियों की माला पहनता था; किन्तु गौतम बुद्ध से टकराते ही वह दानव से मानव बन गया। क्रूर, गँवार भी सुधर गया। बुद्ध ने डण्डा नहीं मारा था अपितु उस क्षेत्र के ताड़क थे, विशेषज्ञ थे। उस कला का प्रयोग करके उन्होंने अंगुलिमाल को सत्पथ पर प्रवृत्त कर दिया।

इसी प्रकार शूद्र भी अधिकारियों के ताड़न का विषय है। शूद्र का तात्पर्य चमार या हरिजन नहीं होता, जैसा कि वर्तमान में प्रचलन है। आध्यात्मिक जगत् में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमशः अति उत्तम, उत्तम, मध्यम और अधम साधकों के चार भेद मात्र हैं। शूद्र का अर्थ है- बहुत छोटा, तुच्छ। मान लीजिये हम छः घंटे भजन करने बैठते हैं किन्तु सांसारिक विषयों में अनुरक्त मन हवा से बातें करता है और दस मिनट भी हम उसे एकाग्र अपने पक्ष में नहीं पाते। सिद्ध है कि चिन्तन-पथ में हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। वहाँ हम तुच्छ हैं, शूद्र हैं, अल्पज्ञ हैं। अल्पज्ञ का क्रमशः उत्थान करके उसे विज्ञ बना देना किसी ताड़क अर्थात् विशेषज्ञ के क्षेत्र की बात है। जो स्वयं विज्ञ है वही विज्ञ बना सकता है क्योंकि वह उन घाटियों से गुजर चुका है, उस पथ के प्रत्येक उतार-चढ़ाव को उसने ताड़ा है, परखा है।

इसी सन्दर्भ में एक कथानक का उल्लेख अप्रासंगिक न होगा। किसी राजा के चार कुमार शूद्र प्रकृति के थे। विद्वानों ने बहुत प्रयास किया किन्तु वे पढ़ते ही न थे। राजा ने घोषणा करायी कि क्या कोई ऐसा विद्वान् है जो रात-दिन हँसने-खेलनेवाले गँवारों को शिक्षित बना सके? विद्वान् तो हजारों थे किन्तु इस चुनौती को स्वीकारनेवाला एक ही निकला; क्योंकि वह मूर्ख, गँवार, अल्पज्ञों के उन्नयन में पारंगत था। उसने छोटी-मोटी कहानी सुनाना प्रारम्भ किया। बालकों का मन लगने लगा। उनका उत्साह बढ़ा तो वे गुरुजी से आगे की घटना को सुनाने का आग्रह करने लगे। सुनते-सुनते एक दिन वे पूर्ण विद्वान् बन गये। ऐसी ही कथाओं का संकलन विष्णु शर्मा के ‘पंचतंत्र’ में मिलता है। जिसमें रीति-नीति, राजनीति, लोकनीति, भेदनीति इत्यादि का अद्भुत समन्वय है। डण्डे के बल पर ऐसे बालकों को सुधारना कदापि सम्भव न था। अतः गँवार तथा शूद्रों का उदात्तीकरण भी विशेषज्ञ के क्षेत्र की वस्तु है।

इसी क्रम में पशु भी ताड़न के अधिकारी हैं। हाथी पशु है। ताड़न का अर्थ यदि पीटना है तो मारिये डण्डा, वह उलटकर चढ़ बैठेगा, चीरकर फेंक देगा; भले आप कितने ताकतवर क्यों न हों। परन्तु यदि कोई कलाविद है, उसकी कला का अधिकारी है तो वह ‘चैधत, अगत, मल’ कहता हुआ उसे उठायेगा, बैठायेगा, आगे बढ़ायेगा, पीछे हटायेगा, घुमायेगा, दो पैरों पर खड़ा करेगा और यहाँ तक कि उससे जमीन से सुई उठवा लेगा। साधारण-सा पीलवान ऐसा कर लेता है, हम-आप नहीं कर पायेंगे। क्यों? क्योंकि वह उसकी कला का विशेषज्ञ है। भैंस दूध देनेवाली जानवर है। जब पशु ताड़न के अधिकारी हैं तो लगाइये डण्डा। आज यदि पाँच किलो दूध देती है तो कल तीन किलो ही देगी। किन्तु ग्वाला जो उसकी गतिविधियों से अवगत है, खली-भूसी खिलाकर, नहलाकर, सहलाकर उसका दूध पाँच से बढ़ाकर सात किलो कर लेगा। ऐसा ग्वाला पशुओं के ताड़ने का अधिकारी है। पशु उसके क्षेत्र की वस्तु है। सबके क्षेत्र की वस्तु नहीं है। अनधिकारियों के खूंटे पर तो वह सूख जाते हैं।

ठीक इसी तरह ‘मायारूपी नारि’ भी है। पूर्वोक्त प्रकरण के अनुसार माया तो लम्बी-चौड़ी है- गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।। (मानस, 3/14/3) जो भी दिखाई-सुनाई देता है, माया है; किन्तु व्यक्ति पर उसका उतना ही प्रभाव पड़ता है जितना कि चित्तवृत्ति केन्द्रित अथवा विकृत है। जनसाधारण के लिये माया पूरे वेग पर है किन्तु योगियों के लिये कम है; क्योंकि चिन्तन में केन्द्रित होने के कारण उनकी चित्तवृत्ति निरोध की ओर है। माया जिस माध्यम पर अंकित होकर आक्रमण करती है वह है चित्तवृत्ति। अतः चित्तवृत्ति ही नारी है। अब इस विकृत चित्तवृत्ति को निरुद्ध कर देना, शनैः-शनैः उसका उत्थान कर चित्तवृत्ति को केन्द्रित करना तथा ‘मायारूपी नारि’ से पार दिलाना किसी सद्गुरु के अधिकार-क्षेत्र की वस्तु है; क्योंकि वे महापुरुष उस रास्ते से गुजरे हुए हैं। आरम्भिक अवस्था से क्रमशः चलते हुए उन्होंने पूर्ण निरोध तक की घाटियाँ पार की हैं। इसलिये वे इस क्षेत्र के विशेष ज्ञाता हैं। जिन्होंने भी इस चित्तवृत्ति का पार पाया है सद्गुरु के ही आधार पर पाया है-

गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई।

जौं बिरंचि संकर सम होई।। (मानस, 7/92/5)

करनधार सद्गुर दृढ़ नावा।

दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।। (मानस, 7/43/8)

इस मायारूपी नारी का अन्त उनके बल पर ही सम्भव है। सद्गुरु ही साधक के हृदय में जागृत हो जाते हैं और उनके संरक्षण में चलनेवाला साधक मायारूपी नारी से पार पा जाता है। चलना तो साधक को ही पड़ता है किन्तु साधक जो पार होता है वह उन्हीं सद्गुरु की ही देन है। हल का भार बैलों पर होता है, किन्तु बैल नहीं जोतते, हलवाहा जोतता है। हल के पीछे रहकर वह बैलों को संचालित करता है, उन्हें सही दिशा देता है। इसी प्रकार साधना का समस्त भार साधक पर ही रहता है, किन्तु उसके द्वारा जो पार लगता है, वह उन्हीं प्रेरक की देन है अन्यथा साधक को कैसे ज्ञात होगा कि वह सही दिशा में बढ़ रहा है अथवा नहीं।

करत करावत आप हैं, पलटूपलटू शोर’- करते-कराते स्वयं सद्गुरु हैं किन्तु नाम उसका होता है जिससे कराते हैं। साधक अपने बल पर नहीं, बल्कि तत्त्वदर्शी सद्गुरु के कृपा-प्रसाद से चित्तवृत्तिरूपी नारी अथवा मायारूपी नारी का पार पा सकता है। 

नोट प्रेरक के रूप में सद्गुरु और भगवान एक दूसरे के पूरक हैं।

सज्जनो! अब तो आप इस प्रसंग को समझ गये होंगे। बतायें- भगवत्-पथ में बाधा कौन है?

श्रोतागणमहाराजजी, भजन करते समय पुरुष के लिए नारी बाधा है और नारी के लिये पुरुष।

महाराजजी तब तो आप जहाँ के तहाँ रह गये। देखिये, शरीर तो रहने का एक मकान मात्र है। आत्मा न तो स्त्री है न तो पुरुष, वह न तो स्त्रीलिंग है और न पुलिंग। वह तो निर्लेप है। स्त्री-शरीर से भजन किया जाय अथवा पुरुष-शरीर से, बाधक चित्तवृत्ति ही है। चित्तवृत्ति ही नारी है। चित्तवृत्ति और विषय के संयोग से भावनाओं का चित्रण होता है, साथ ही उसकी क्रिया शरीर में भी उभर आती है। संसार में स्त्री-पुरुष के संयोग से केवल काम का सृजन होता है, जबकि भगवत्-पथ में काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि माया की सैकड़ों धाराएँ हैं। अकेला काम ही तो रुकावट नहीं है, हाँ वह भी एक अंग मात्र अवश्य है। मोह एक अलग शत्रु है, तृष्णा एक अलग शत्रु है, सभी माया के अंग-प्रत्यंग हैं। सामान्य नारी से तो सभी व्यक्त नहीं होते। अतः केवल स्त्री ही माया कैसे हो गई? स्त्री के लिये पुरुष ही सम्पूर्ण माया कैसे हो गया? इनके पारस्परिक सम्पर्क से अनन्त विकारों में से केवल एक विकार ‘काम’ का ही खतरा है। अन्य विकार तो अपने जगह पर बने ही हैं। अतः चित्तवृत्ति ही नारी है। वही माया है। न पुरुष माया है, न स्त्री माया है। चित्त की प्रवृत्ति ही माया है।

जहाँ तक इस प्रवृत्ति के निरोध का प्रश्न है, यह ताड़न के क्षेत्र की वस्तु है अर्थात् जो तत्त्वदर्शी महापुरुष उसका पार पा चुके हैं, जिनकी चित्तवृत्ति बाधक न रहकर विलीन हो चुकी है, ऐसे तपोधन ही उसके ताड़क हैं, विशेषज्ञ हैं। नारी उनके अधिकार-क्षेत्र की वस्तु है और वे ही इस नारी से आपको छुटकारा दिलाने में समर्थ हैं। गीता के अनुसार, इसके निरोध के लिये अनुभवी महापुरुषों का सत्संग, एकान्त देश का सेवन, यौगिक क्रियाएँ और चिन्तन परम आवश्यक है।

।। ओम्।।

(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)

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