प्रश्न– महाराजजी! अवध–प्रसंग में पावन मुख से यह सुनने में आया कि यजनपूर्ण स्वर ही सरयू है। अब इसको पकड़ने की कोई युक्ति बताने की कृपा की जाय और साथ ही यह भी बताया जाय कि श्वास–प्रश्वास की क्रिया की स्थिति क्या है?
उत्तर– प्रारम्भिक अवस्था में श्वास-प्रश्वास का उपयोग तुम्हारे लिए न हो सकेगा। निरन्तर अभ्यास के कुछ काल बाद यही सरल हो जाती है। जिस प्रकार वह हमारे समझ में आती है और जीवन में ढलती है, उस प्रकार से लोग करना नहीं चाहते। लोग सीधे उसी योग्यता को चाहते हैं, जो श्वास-जप की चरमोत्कृष्ट स्थिति है।
जहाँ-तहाँ उल्टी-सीधी मान्यताओं का आधार लेकर समझाना भी प्रारम्भ कर देते हैं। बहुत से लोग तो काफी मात्रा में श्वास को खींचकर पेट को घड़े की तरह भर लेते हैं और कहते हैं कि श्वास-प्रश्वास की क्रिया हो रही है। शारीरिक व्यायाम और मन के निरोध से कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसी उलझन में पड़ने से तो जल्दी के बजाय दूरी ही पैदा हो जाती है। यह एक ही नाम की ऊँची-नीची श्रेणी है, जो क्रमशः चलकर ही सुलभ हो सकती है। जैसे किसी बच्चे का संरक्षक उसको उच्चश्रेणी की शिक्षा दिलाना चाहता है, यदि वह प्रारम्भ में ही उसे किसी उच्चश्रेणी की शिक्षा के स्थान पर बैठा दे तो बताओ क्या परिणाम निकलेगा? यदि वास्तव में संरक्षक की चाह उच्चश्रेणी की शिक्षा दिलाने की है तो वह प्राथमिक शिक्षाहेतु सभी सम्भव प्रयत्न करेगा। ठीक इसी प्रकार श्वास-प्रश्वास की क्रिया को यदि पाना है तो क्रमिक रूप से ही समझना होगा।
एक ही नाम-यजन की चार श्रेणियाँ हैं। अतएव ये चारों श्रेणियाँ एक ही नाम की ऊँची-नीची अवस्थाएँ हैं जो बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा के नाम से जानी जाती हैं। इसी विशेष पथ की आधी दूरी तय करने पर श्वास-प्रश्वास की योग्यता आ जाती है। जपनेवाले नाम अथवा मंत्र का तात्पर्य ‘ओम् नमो भगवते वासुदेवाय’ नहीं है। वह तो एक प्रार्थना है, जैसा कि- ओम् शब्द से उच्चरित परात्पर ब्रह्म, सबकी श्वास में वास करनेवाले भगवन्! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। ‘ओम् नमः शिवाय’ इत्यादि भी इसी प्रकार की प्रार्थनाओं के रूपक हैं।
अब आप किसी एक छोटे से नाम को ले लें। जैसे कि तुलसीदासजी ने अपने चिन्तन-क्रम में दो अक्षर का नाम ‘राम’ रखा। कबीर और नानक ने भी वही नाम चुना। पूर्व के महर्षियों में ओम्, सोहम् इत्यादि चलता था। इस प्रकार किसी दो या ढाई अक्षर के नाम का नियमित रूप से ऐसे गति से उच्चारण करें कि आसपास वालों को भी सुनाई पड़े। व्यक्त होने के कारण यह बैखरी वाणी का जप कहलाता है। जितना नियम से निभा सकें उतना नियम से जपें और इसके अतिरिक्त हर वक्त जपने का विधान है।
मध्यमा– उसी नाम को ऐसे ढंग से जपें कि आपके अतिरिक्त कोई और न सुन सके। यह केवल कण्ठ से ही जपी जानेवाली वाणी है। नाम जपने से आवाज तो निकलती है, परन्तु मध्यम होने के कारण मध्यमा कहलाती है। इसको तब तक निरन्तर जपना पड़ता है जब तक कि ध्वनि न बँधे और मन ध्वनि में न फँस जाय।
पश्यन्ती– पश्य का अर्थ होता है देखना। इसमें वाणी से नाम जपा नहीं जाता बल्कि देखा जाता है। इसकी प्रवेशिका में नाम श्वास के साथ ही जपा जाता है जिससे कि वह नाम श्वास में ढल जाय। नाम की इसी अवस्था को पश्यन्ती कहते हैं। मन को द्रष्टा के रूप में खड़ा कर दें और श्वास में उठनेवाले शब्द को सुनें। संगदोष से मन कभी इतना विकृत हो जाता है कि सुनने की क्षमता ही नहीं रहती। ऐसी स्थिति में जब साधक बरबस अपने मन को लगाता है तो सिर में दर्द होने लगता है। संगदोष से बचने के लिए इस मन को सावधानी से लगाना पड़ता है। यहीं से श्वास-प्रश्वास की क्रिया का प्रवेश है। इसमें श्वास को घटाना या बढ़ाना नहीं पड़ता बल्कि शारीरिक शक्ति के अनुसार श्वास की स्वाभाविक गति में नाम को ढालने का प्रयत्न करना चाहिए। उसी श्वास की गति के साथ नाम को जपें। महापुरुषों का तो कहना है कि श्वास नाम के अतिरिक्त और किसी भी चीज का उच्चारण नहीं करती, परन्तु जब आप लोग सुनने का प्रयत्न करते हैं तो सन्न-सों सुनाई देता है। कारण कि शुद्ध अवस्था से प्रकृति के द्वन्द्व में लोग इतना दूर हट गये हैं कि स्पष्ट सुनाई नहीं पड़ता किन्तु सानुराग अभ्यास से क्रमशः सुनाई देगा।
परावाणी– पश्यन्ती के चिन्तन में तो मन को सुनने के लिए बाध्य किया जाता है, किन्तु परावाणी में मन स्वाभाविक रूप से ही लग जाता है। न साधक जपे और न मन को जपने के लिए विवश करे। यदि इतने पर भी जप धारावाही होता रहे तो बस यही अजपा की प्रवेशिका है। इसी की पूर्तिकाल में श्वास में उठनेवाला शब्द नाम मात्र ही शेष रह जाय और जपनेवाले के इस मन की स्थिति उसमें विलीन हो जाय तब वह क्रम परमात्मा अथवा परम चैतन्य चिन्मय भगवान की स्थिति में परिवर्तित हो जाता है। ऐसी अवस्था में वह प्रभु स्वयं ही समझा देते हैं कि बेटा हम ऐसे हैं और तुम्हारा यह रूप है। इस स्थिति के बाद अपने में प्रवेश दे देते हैं।
यजनपूर्ण स्वर ही सरयू है। अजपा की स्थिति में स्वर यजन से परिपूर्ण रहता है। यह इष्ट के समीपवाली वाणी का जाप है। इसके बाद जाप का कोई विधान नहीं है। इस स्थिति में यजनपूर्ण स्वर ही सरयू है। इस सरयू के महत्त्व को दर्शाते हुए कहते हैं कि-
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा।
मम समीप नर पावहिं बासा।। (मानस, 7/3/6)
इसमें मज्जन करने से नर मुक्ति पा जाता है या मेरे समीप निवास करता है, परन्तु कार्यरूप में देखने से यह गुण नहीं मिलता। उदाहरण के लिए पाकिटमार चोर सबसे प्रथम ही स्नान कर लेते हैं। यदि भक्त चार बजे सुबह डुबकी लगाता है तो वे दो बजे रात्रि में ही स्नान करके राम-सीताराम की ध्वनि लगाना प्रारम्भ कर देते हैं। वे लोग भक्त के डुबकी लगाते ही उनका सामान लेकर चम्पत हो जाया करते हैं। परम मुक्ति तो दूर रही, कम-से-कम उनका यह दुष्कर्म तो छूट जाता। देखें-
वस्तु कहीं खोजे कहीं, कैसे पावे ताहि।
तीर्थ और उसका फल अपनी जगह पर है। वह सामीप्य मुक्ति और साक्षात्कार यजनपूर्ण स्वररूपी सरयू में मज्जन करने से ही सुलभ हो सकता है।
उत्तर दिसि बह सरजू पावनि। (मानस, 7/3/5)
इस स्थिति में श्वास प्रकृति से उपराम हो जाती है। अध्यात्म में यही उत्तर दिशा है, जिसे ऊर्ध्वरेता कहते हैं। चिन्तन की इस योग्यता में मन पर दबाव नहीं देना पड़ता बल्कि यह स्वाभाविक ही होने लगता है। ऐसे यजनपूर्ण स्वर में मज्जन करनेवाला निश्चय ही सामीप्य मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। बैखरी, मध्यमा के चिन्तन में स्वर से सम्बन्ध नहीं रहता। पश्यन्तीकाल में स्वर में खींचातानी मची रहती है और परावाणी के चिन्तनकाल में यजन से परिपूर्ण रहती है। इसी में मज्जन करनेवाला व्यक्ति सामीप्य मुक्ति प्राप्त करता है।
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा।
भइ सरजू अति निर्मल नीरा।। (मानस, 7/2/10)
प्रायः सबकी श्वास सात्त्विक, राजस, तामस तीनों गुणों के उतार-चढ़ाव से प्रवाहित रहती है। जब श्वास-यजन की क्रिया तीनों गुणों से उपराम हो जाती है तो शुभ से ओतप्रोत रहती है। शुभ का अर्थ है सत्य, कहने का तात्पर्य यह है कि वह विकारों से रहित हो जाती है। इस स्थितिवाले स्वर का मज्जन करनेवाला ही सामीप्य मुक्ति का अधिकारी है। जन्म-जन्मान्तरों के मनोमल के मज्जनार्थ यही सरयू है। मन में विकारों के रहते भगवत्-स्थिति प्राप्त करना असम्भव है। शारीरिक मल तो बाह्य मज्जन से ही छूट जाता है परन्तु आन्तरिक मल की धुलाई चिन्तन-भजन के द्वारा ही होती है। देखो, यह रामचरितमानस क्रियात्मक होने से क्लिष्ट है। इस योग्यता की उपलब्धि क्रियात्मक ढंग से ही हो सकती है।
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(‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ से उद्धृत)