ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधिविश्वे निषेदुः।
यस्तन्ना वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद् विदुस्त इमे समासते।। (ऋग्वेद, १/१६४/३९)
सभी ऋचाएँ परम अविनाशी अक्षर में स्थित हैं, जिसमें सम्पूर्ण देवता भी स्थित हैं। जो उस अविनाशी को नहीं जानता, उसके लिए ऋचा क्या करेगी? जो उसे जानता है, उसी अविनाशी में प्रवेश पा जाता है।
श्री परमहंस आश्रम द्वारा प्रकाशित कतिपय पुस्तिकाओं पर आक्षेप करते हुए वाराणसी के श्री मस्तराम बाबा ने ‘नास्तिकों से सावधान’ नामक पुस्तिका प्रेषित की थी, जिसके समाधान का प्रयास ‘आस्तिकता के नाम पर….’ पुस्तिका के द्वारा किया गया था; किन्तु ‘नहले पर दहला (भाग-१)’ नामक उनकी एक पुस्तिका पुनः देखने को मिली है। सत्परामर्श-हेतु उनकी इस पुस्तिका पर भी सम्यक् विचार अपेक्षित है।
उनकी पुस्तिका का उप-शीर्षक है- ‘गड़बड़ सम्प्रदाय का छीछालेदर’। ऐसा वीभत्स नामकरण करने में उन्हें काफी विद्वता खर्च करनी पड़ी होगी। प्रथम पृष्ठ पर ही एक श्लोक है, जिसमें उन्होंने अपने वेदान्त को सिंहवत् तथा अन्यान्य शास्त्रों को जम्बूकवत् होने का प्रमाण-पत्र दिया है। आश्चर्य है कि जाति-पाँति, छुआछूत, कर्मकाण्ड और पंचदेव की पैरवी करनेवाले महानुभाव को अद्वैत वेदान्त से क्या लेना देना?
वेदान्त स्वयं में एक सम्प्रदाय बनकर रह गया है। इसके दसियों उप-सम्प्रदाय हैं। बादरायण के ब्रह्मसूत्र का माध्वाचार्यजी ने जो अर्थ लगाया- उसे द्वैत, निम्बार्क ने जो अर्थ समझा- वह द्वैताद्वैत, बल्लभाचार्यजी ने उन्हीं सूत्रों का अर्थ लगाया- शुद्धाद्वैत, रामानुजाचार्यजी ने उन्हीं सूत्रों में पढ़ा- विशिष्टाद्वैत, पण्डित श्रीकण्ठ ने उन्हीं सूत्रों में से निकाला- शैव विशिष्टाद्वैत, पण्डित श्रीपति का अर्थ- वीरशैव विशिष्टाद्वैत, विज्ञानभिक्षु ने देखा- अविभागाद्वैत, शंकराचार्यजी ने व्याख्या किया- निर्विशेषाद्वैत, उन्हीं सूत्रों में भाष्कराचार्यजी ने पढ़ा- भेदाभेद, तो बलदेवजी का अर्थ अचिन्त्य-भेदाभेद कहा जाता है। आचार्यजी अपनी पहचान बतायें कि इनमें से वे कौन हैं? वेदान्तवादी होने से ये दसों सिंहवत् हैं या अकेले वे? इनमें से कोई एक सत्य है या सभी?
सुधीजन विचार करें तो पायेंगे कि वेद में द्वैत-अद्वैत का झगड़ा ही नहीं है। वेद में है- ‘तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः’ (ईशावास्योपनिषद्, ५) अर्थात् वह परमात्मा सबके भीतर भी है और बाहर भी है, तो उसके अतिरिक्त अन्य वस्तु, और अन्य वस्तु उसके अस्तित्व के अतिरिक्त कहाँ रह सकती है? उसी तरह अनिर्वचनीय माया और माया विशिष्ट चेतन के बिना उस व्यापक का अस्तित्व ही कहाँ रह सकता है और वह बिना व्याप्य के किसका व्यापक हो सकता है? अतः ऐसा कोई अद्वैतवादी नहीं है जो अनिवर्चनीय जैसी कोई वस्तु और माया मोहित जीव-जैसा एक पदार्थ अनादि न मानता हो और ऐसा कोई द्वैतवादी नहीं है जो तीनों पदार्थों को व्याप्य व्यापक भाव से एक न मानता हो। इस प्रकार अनिर्वचनीय माया और माया विशिष्ट चेतन को अनादि मान लेने पर तथा दोनों में परमात्मा को ओतप्रोत, व्यापक मान लेने पर द्वैत-अद्वैत में कुछ भी अन्तर नहीं रह जाता। वैदिकों में द्वैत-अद्वैत सम्प्रदायों की सृष्टि ही अवैदिक है। अतः विद्वान् लेखक का यह तर्क कि ‘एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति’ बाधानुबाधित वृत्ति से शंकराचार्य-जैसे किसी विरले प्रपंचदर्शी तक ही सीमित है, सामान्यजनों के लिये तो द्वैत ही है- अद्वैत की यह व्याख्या ग्राह्य प्रतीत नहीं होती।
आदि शंकराचार्यजी के नाम पर प्रचलित भाष्यों को आधार मानकर कतिपय विद्वानों ने उसकी आलेाचना की है; जबकि ये विचार उनके हैं या उनकी गद्दी पर बैठनेवाले परवर्ती आचार्यों की देन है- यह गवेषणा का विषय है। हमारा तो यह भी विचार है कि दशनामी संन्यासियों का संगठन आदि शंकराचार्यजी ने नहीं किया था; क्योंकि मान्यता है कि आदि शंकराचार्यजी के शिष्य पद्मपाद से तीर्थ और आश्रम शाखा चली। इसी प्रकार हस्तामलकजी के शिष्य वन और अरण्य कहलाये। त्रोटकाचार्यजी के शिष्य गिरि, पर्वत और सागर कहलाये तथा सुरेश्वराचार्यजी के शिष्य सरस्वती, भारती और पुरी हुए। सशस्त्र मुसलमान फकीरों के कारण इन दशनामियों की समाप्तप्राय संख्या को पूरा करने के लिए स्वामी मधुसूदन सरस्वतीजी ने क्षत्रियों तथा वैश्यों से सतनामी संन्यासियों को दीक्षित किया, जिनके उपद्रवों के वर्णन से इतिहास भरा पड़ा है। जिस एक अद्वैत में इतना द्वैत है, वहाँ एकतामूलक सरल विचारधारा को भी साम्प्रदायिक कहा जाय तो आश्चर्य क्या?
शंकराचार्यजी के भाष्यसहित एकादश उपनिषद्, गीता तथा ब्रह्मसूत्र आधुनिक वेदान्त दर्शन के आधार हैं। इन तीनों को प्रस्थानत्रयी कहा जाता है और यह नाम बौद्धों के त्रिपिटक की नकल है। वेदान्त या ब्रह्मसूत्र अथवा उत्तर-मीमांसा वेदव्यास का रचा बताया जाता है, जिन्होंने गीता को भी लिपिबद्ध किया है। इस दर्शन में उपनिषदों को श्रुति और गीता को स्मृति बनाने में बड़ा जोर लगाया गया है।
गीता (१३/४) में है कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विभाजन ब्रह्मसूत्र के पदों में भी है। ब्रह्मसूत्रों की पुष्टि गीता से की जाती है और यहाँ गीता की पुष्टि में ब्रह्मसूत्र का नाम लिया गया है। अतः विचारणीय है कि गीता के पूर्व ब्रह्मसूत्र थे या ब्रह्मसूत्र के पूर्व गीता या दोनों ही अनादि हैं? शांकर भाष्यकार के अनुसार जिन वाक्यों से ब्रह्म पाया जाता है, वे सब ब्रह्मसूत्र हैं (यद्यपि यह कथन ही असंगत है फिर भी यदि ऐसा हो भी) तो केवल उत्तर-मीमांसा के सूत्रों को ही ब्रह्मसूत्र मानने का व्यामोह क्यों?
वेदान्त दर्शन में विश्वविख्यात सांख्ययोगादि शास्त्रों को स्मृति कहा गया है, शास्त्र नहीं और उनका खण्डन किया गया है। योगदर्शन पर महर्षि व्यास का भाष्य प्रसिद्ध है। यदि योगदर्शन खण्डन योग्य ही रहा होता तो व्यासजी उसका भाष्य ही क्यों करते? क्या इससे यह नहीं लगता कि योग का खण्डन करनेवाला वेदान्त-दर्शन उन महर्षि व्यास की रचना नहीं है।
इसी प्रकार आदि शंकराचार्य के नाम से प्रचलित शारीरिक भाष्य में है- ‘या तु श्रुतिः कपिलस्य ज्ञानातिशयं प्रदर्शयन्ती प्रदर्शिता न तया श्रुतिविरुद्धमपि कपिलं मतं श्रद्धातुं शक्यम् कपिलमिति श्रुतिसामान्यमात्रत्वात अन्यस्य च कपिलस्य सगरपुत्राणां प्रतप्तुर्वासुदेव नाम्नः स्मरणात्।’ (२/१/१/१) अर्थात् श्रुति में जिस अत्यन्त ज्ञानी कपिल का वर्णन है उससे श्रुतिविरुद्ध कपिल मत पर श्रद्धा नहीं की जा सकती; क्योंकि उपनिषद् में वर्णित कपिल और सांख्यस्मृति प्रणेता कपिल दोनों में केवल शब्द सादृश्य है। यज्ञीय अश्व की रक्षा के लिए नियुक्त सगर-पुत्रों को शाप से जलानेवाले एक दूसरे कपिल भी स्मृतियों में प्रसिद्ध हैं; किन्तु उनका असली नाम वासुदेव था।
उक्त उद्धरण से भाष्यकार का आशय है कि कपिल कई थे। जिन कपिल की सांख्यस्मृति (? शास्त्र) है वे मानने लायक नहीं हैं। मानने लायक वे वैदिक कपिल हैं जिनका कोई साहित्य नहीं मिलता। गीता के भाष्य में भाष्यकार महोदय ‘सिद्धों में कपिलमुनि मैं हूँ।’ (१०/२६)’ पता नहीं किस कपिल को भगवान की विभूति मानते हैं? मस्तरामजी के अनुसार वेदान्त के अतिरिक्त अन्य शास्त्र (सांख्य, योग, वैशेषिक इत्यादि) जम्बूकवत् हैं। कपिल जम्बूकवत् हैं और व्यासजी सिंहवत्। धन्य है आपकी अतुलनीय बुद्धि, जिसने इन महानुभावों को भी तौल दिया।
ब्रह्मसूत्र व्यासजी का लिखा होता तो बौद्धों के सिद्धान्त का खण्डन उसमें न होता; किन्तु वेदान्त-दर्शन (२/२/९८) में बौद्ध सम्प्रदायों का खण्डन है। महाभारतकालीन वेदव्यास के डेढ़ हजार वर्ष बाद भगवान बुद्ध का जन्म हुआ और उनके भी चार सौ वर्ष पश्चात् बौद्धों में सम्प्रदाय-विभाजन हुआ, जिसका काल-निर्धारण बौद्ध संगतियों तथा देश-विदेश के बौद्ध विवरणों से प्रमाणित है। ऐसी दशा में ये सूत्र महर्षि व्यासकृत नहीं माने जा सकते। हाँ, कृत्रिम व्यासों की रचना हो तो कोई आपत्ति नहीं है। अब इस हास्यापद तर्क में भी कोई दम नहीं रह गया है कि बौद्धधर्म बहुत पुराना है- इतना कि लंका के राजा रावण को त्रेतायुग में बुद्ध ने उपदेश दिया था। आज का बच्चा-बच्चा भी जानता है कि लंका में बौद्धधर्म का प्रचार सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा की देन है।
मस्तराम की पुस्तिका के मुख-पृष्ठ पर ही मनुस्मृति का सूत्रवाक्य ‘नास्तिको वेद निन्दकः’ लिखा है; किन्तु नास्तिकता की यह परिभाषा सर्वमान्य नहीं है। विश्व की अनेक पुस्तकें अपने को ईश्वरप्रणीत घोषित करती हैं, वेद या किसी अन्य पुस्तक के समर्थन की अपेक्षा नहीं करती; फिर तो सभी एक दूसरे को नास्तिक, काफिर या कुछ भी कहते रहेंगे। पाणिनि ने नास्तिक शब्द की दूसरी व्युत्पत्ति बतायी है- ‘अस्ति नास्ति दिष्टं मतिः’ (४/४/६०) अर्थात् ‘परलोक नहीं है’- ऐसी जिसकी मान्यता है, वह नास्तिक है। नास्तिक शब्द गाली-गलौज के रूप में भी प्रयुक्त होता है। अपने को वैदिक कहनेवाले सम्प्रदाय एक दूसरे को नास्तिक तथा अवैदिक कहते रहे हैं। शांकर भाष्यकारों ने वैष्णव मत को अवैदिक कहा (२/२/४२-४५), तो बहुतों ने उनके मायावाद को ही अवैदिक कहा है, प्रच्छन्न बौद्ध की उपाधि जैसा अलंकरण भी तो उन्हें ही प्राप्त है।
आश्रम की पुस्तिका ‘आस्तिकता के नाम पर….’ में आस्तिकता-नास्तिकता की विशद् चर्चा है; किन्तु उसे अनदेखा कर मस्तराम ने मनुस्मृति के उक्त सूत्रवाक्य से जताना चाहा है कि आश्रमीय प्रकाशन में वेद का अनादर है, जबकि उसी प्रकाशन को पढ़कर सभी अच्छी तरह जानते हैं कि हम वेदविरोधी कभी नहीं थे, न हैं। वेद के नाम पर शोषण, अन्धश्रद्धा या गलत व्याख्याओं के विरोधी अवश्य हैं।
इस सम्बन्ध में छान्दोग्य उपनिषद् में एक कथानक है। एक बार देवराज इन्द्र और असुरों के राजा विरोचन आत्मा को जानने की इच्छा से प्रजापति के पास पहुँचे। गुरु ने जो कहा, इन्द्र ने उस पर मनन-चिन्तन किया। समाधान न होने पर प्रश्न-परिप्रश्न एवं तपस्या द्वारा वह सत्य तक पहुँच गया, जबकि विरोचन की समझ में पहली ही बार जो कुछ उल्टा-सीधा आया, उसी को सिद्धान्त मानकर असुरों में प्रचारित करने लगा। यहीं से आसुर उपनिषदों का आरम्भ हुआ। इस कथानक से दो-तीन बातें स्पष्ट हो जाती हैं। पहली तो यह कि भगवत्पथ में अन्ध-विश्वास का कोई मूल्य नहीं है। दूसरी- साधन, भजन-क्रिया में उतरे बिना केवल पढ़-सुनकर सत्य तक पहुँचा नहीं जा सकता और तीसरी यह कि सभी उपनिषद् कल्याणकारी नहीं हैं। उपनिषदों के रूप में आसुरी विद्या भी है, प्रक्षिप्त अंश भी है।
वेदान्तियों के जगन्मिथ्या का आदर्श गीता के आसुरी स्वभाववालों से मिल जाता है कि ‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’ (१६/८)। इसी प्रकार ‘अहं ब्रह्मास्मि’ रटनेवाले तथा गीता के ‘ईश्वरोऽहमहं भोगी’ (१६/१४) का साम्य देखकर बहुत से लोग वेदान्त को आसुर उपनिषद् का परिमार्जित संस्करण कहते हैं।
व्यासजी ने भी वेद के नाम पर प्रचलित कुरीतियों से सावधान किया है-
सुरा मत्स्यान्मधुमांसमासवं कृसरौदनम्।
धूर्तै प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम्।। (महाभारत, शान्तिपर्व, २६५/९)
अर्थात् यज्ञों में मांस-मदिरादि का प्रचलन धूर्तों की देन है। वेदों में इनकी कल्पना तक नहीं है।
मस्तराम का प्रश्न है कि चार वेद के अलावा भी कोई वेद होता है क्या? कितना अच्छा होता कि यदि वे भी वेद को चार ही मान सकते। वे तो गोपथ ब्राह्मण को भी वेद कहते हैं, शतपथ और ऐतरेय को भी वेद मानते हैं, ग्यारह उपनिषदों को भी वेद मानते हैं। शेष उपनिषदों को भी कहने का नैतिक साहस उनमें नहीं है।
‘आस्तिकता के नाम पर….’ पुस्तिका में वेद के आशय और उपयोगिता पर पर्याप्त प्रकाश डाला जा चुका है, उन सबकी पुनरावृत्ति न कर कहना चाहेंगे कि वेद पुस्तक नहीं है। प्राचीनकाल में ‘वेद’ शब्द बड़े महत्व का था, इसलिये अनेकों पुस्तकें वेद के नाम से कही गईं। इसलिये ‘मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्’– मन्त्र और ब्राह्मण दोनों वेद नाम से कहे जाते थे। मन्त्र में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद आते हैं तथा ब्राह्मण-ग्रन्थ ऐतरेय या आश्वलायन कौशीतकी या सांख्यायन, शतपथ, पंचविंश, षडविंश, गोपथ इत्यादि दसियों हैं।
महर्षि जैमिनी, सायण इत्यादि ने स्थान-स्थान पर लिखा है कि ब्राह्मण-ग्रन्थ मन्त्रों की अर्थात् उक्त चारों वेदों की व्याख्या हैं, मूल तो संहिता या मन्त्र हैं, जिन्हें व्यासजी ने चार वेद के रूप में संकलित किया फिर भी दो-एक सम्प्रदायवाले इन बीसीयों पुस्तकों को वेद कहते हैं। गोपथ ब्राह्मण में इन चार के अतिरिक्त पाँच अन्य वेदों का वर्णन है- ‘सर्पवेदं पिशाचवेदं असुरवेदं इतिहासवेदं पुराणवेदमिति’ (१/१०) और तो और, इतिहास भी वेद, पुराण भी वेद है। छान्दोग्य उपनिषद् के सातवें अध्याय के प्रथम खण्ड में इतिहास-पुराण को पाँचवाँ वेद और वेदों का भी वेद व्याकरण को बताया गया है। इनके अतिरिक्त नाट्यवेद, आयुर्वेद, गन्धर्ववेद तथा महाभारत को पाँचवाँ वेद कहा जाता है। इन समस्त प्रकरणों में वेद का अर्थ मौलिक शिक्षा है। वेद का सही आशय भगवान श्रीकृष्ण की गीता के पन्द्रहवें अध्याय में है कि- जो संसार-वृक्ष को उसके मूल परमात्मासहित जानता है, दूसरे शब्दों में प्रकृति को परमात्मासहित जान लेता है वह वेदवित् है। वेद नाम से प्रचलित पोथी को रटनेवाले को श्रीकृष्ण ने वेदवित् नहीं कहा। यही विचार ‘आस्तिकता के नाम पर….’ पुस्तिका में है। माननीय उसे अन्यथा न लें। वेद शब्द ज्ञानवाचक है और श्रीकृष्ण के शब्दों में, ‘तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति’ (गीता, ४/३८)- वह ज्ञान योग की पूर्णावस्था में अपनी अन्तरात्मा में ही विदित होता है। योग की क्रिया सम्पादित किये बिना बाहर ज्ञान अथवा वेद जैसी कोई वस्तु नहीं है।
भगवान जो कुछ बताते हैं, साधक के लिये वह करोड़ों शास्त्रों से बढ़कर है। ईश्वर-प्रदत्त उस ज्ञान के आलोक में वह पोथियों में लिखे हुए की जाँच करता है और देखता है कि जो अनुभूति उसे हो रही है, उससे पूर्व के ऋषियों को भी हुई थी। इस पुष्टि के लिये ही प्रवचनों, पुस्तकों का उपयोग है। इसीलिये श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तत्त्वदर्शीजन तुझे ज्ञान का उपदेश करेंगे। ज्ञान के लिये तत्त्वदर्शी के पास जाने का विधान है। पोथी या वाद-विवाद कोई विधान नहीं है, बल्कि पोथी के पास जाना ही भ्रान्ति है। भगवान बुद्ध पोथी को प्रमाण न मानते हुए भी अपने को इसी अर्थ में वेदगू (वेदज्ञ) कहते थे।
* ‘ज्ञान’ शब्द की चर्चा हुई तो बाबाजी के इस आक्षेप पर भी विचार कर लेते हैं कि वेद माने ज्ञान, वेदान्त माने ज्ञान का अन्त तो क्या ज्ञान का भी अन्त होता है? सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। ज्ञान या आत्मा का अन्त मानते हो और ज्ञानी भी बनते हो? अन्त देह का होता है, ज्ञान तो अनन्त है।’…. ‘नास्तिकों से सावधान’ पृष्ठ १४।
यहाँ मस्तराम जी ने तैत्तिरीय उपनिषद् की ब्रह्मानन्द वल्ली में वर्णित ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।’ का उद्धरण दिया है। यदि वह इस पर अपने सम्प्रदाय की व्याख्या शांकरभाष्य भी पढ़े होते तो ऐसे आक्षेप की भूल कदापि न करते। शांकर भाष्यकार ने लिखा है- ‘सत्यादि शब्दा न परस्परं सम्बन्ध्यते परार्थत्वात्। विशेष्यार्था हि ते। अथ एकैको विशेषण शब्द परस्परं निरपेक्षो ब्रह्म शब्देन सत्यं ब्रह्म, ज्ञानं ब्रह्मानन्तं ब्रह्मेति।’ अर्थात् सत्यादि शब्द परार्थ होने के कारण परस्पर सम्बन्धित नहीं हैं। ये तो विशेष्य के लिये ही हैं। अतः उनमें से प्रत्येक विशेषण शब्द एक दूसरे की अपेक्षा न रखकर ‘ब्रह्म सत्य है, ब्रह्म ज्ञान है, ब्रह्म अनन्त है’- इस प्रकार ब्रह्म शब्द से सम्बन्धित है। इसी तरह सत् शब्द का प्रयोग गीता में भी है। ज्ञान अनन्त ही होता है- ऐसा निर्णय देते समय विद्वत्प्रवर अन्वयव्यतिरेक भूल गये क्या? क्या रामचरितमानस में उन्हें यह नहीं दिखायी पड़ा कि ‘बिनसइ उपजइ ज्ञान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।’ (मानस, ४/१५ ख)- ज्ञान पैदा होता है और नष्ट भी होता है।
वास्तव में प्रत्येक गुण की दो सीमाएँ होती हैं- एक आरम्भिक अवस्था और दूसरी पराकाष्ठा। गीता में स्थान-स्थान पर है कि- ‘ज्ञानों में भी उत्तम ज्ञान मैं तेरे लिए कहूँगा।’, ‘ज्ञानीजन (तत्त्वदर्शी) तुझे ज्ञान का उपदेश करेंगे।’ यहाँ साधक के लिये ज्ञान की प्रवेशिका है, बीजारोपण है और जहाँ ज्ञानाग्नि में सभी कर्म जल जाते हैं वहाँ ज्ञान का अन्त है। जिसे जानना था जान लिया, आगे कोई श्रेष्ठ सत्ता नहीं है, तो किसे ढूँढ़े? किसके लिये कर्म करे? जिसे जानना था, वह भी अब भिन्न नहीं रहा- यहाँ ज्ञान की पराकाष्ठा है और उसके भी आगे की अवस्था में ब्रह्म अनिर्वचनीय है। गीता के सत्-असत् सम्बन्धी वर्णनों में मस्तराम को जो विरोधाभास दिखायी पड़ा, वह द्वन्द्वात्मक जगत् के कारण है और जहाँ वह ब्रह्म न सत् है, न असत् है; वह अनिर्वचनीय स्थिति है, अनुभवगम्य है। किसी भी पोथी में उसके वर्णन का कोई तरीका ही नहीं है। पोथी तो केवल वहाँ तक का अंगुल्या निर्देश कर ‘नेति नेति’ कहकर उसकी अगाधता को ही व्यक्त कर पाती है।
जब तक वह प्रभु साधक के हृदय से रथी होकर मार्गदर्शन नहीं करने लगते, तब तक निवृत्ति दिलानेवाला भजन आरम्भ ही नहीं होता। उस विद्या को भगवान ही पढ़ाते हैं। मस्तराम ने इसका यह अर्थ लगा लिया कि महाराजजी भगवान की अनुमति से ही बोलते हैं। ऐसा दावा तो हमने कहीं किया नहीं। हमारे कहने का सीधा अर्थ है कि भगवान साधक से बोलते हैं। बहुतों से बोलते रहे हैं, किसी से भी बोल सकते हैं, उन्हें बोलने से पहले किसी से आदेश लेने की बाध्यता क्या है? ऐसा भी तो नहीं है कि वह किसी युग में बोलते रहे हों और अब उन्होंने बोलना बन्द कर दिया हो।
साधक और उन परम प्रभु का वार्त्तालाप ही तो साधना का आकर्षण है, साधक की पूँजी है। यही साधक का वेद है। नश्वर संसार में उसके लिये उतना ही धु्रवसत्य है; किन्तु यह नितान्त व्यक्तिगत और गोपनीय हुआ करता है। अनुरागी-विरही साधकों का उत्साहवर्धन करने के लिए पूज्य गुरुदेव महाराज इस पक्ष की ओर संकेत कर दिया करते थे। दूसरे शब्दों में इस अवस्था के अन्वेषण के स्थान पर अपने में प्रभुकृपा प्राकट्य की प्रार्थना अधिक उपादेय होगी।
* आश्रम की पुस्तिकाओं में वेद के लिये है कि परमात्मा की शोध का पहला विवरण वैदिक ऋषियों द्वारा मिला है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि एक परमात्मा का ही अस्तित्व है। अतः परमात्मा के शोध-ग्रन्थ वेद को कौन इनकार कर सकता है? वेद का महत्त्व इसलिये है कि वह शाश्वत सत्य परमात्मा को दृढ़ाता है।’’ इस कथन में आपत्ति लायक कुछ भी नहीं था; किन्तु मान्यवर ने बाल की खाल-सी निकालते हुए ऊपर की पंक्तियों को अनदेखा कर अन्तिम पंक्ति का अभिधात्मक अर्थ करते हुए पूछा है कि- ‘‘क्या परमात्मा कमजोर हो गया जो वेद उसे दृढ़ बनाते हैं? क्या वेद सीमेंट है और परमात्मा खम्भा कि सीमेंट दृढ़ायेगा!’’- पृष्ठ १०
मस्तराम स्वयं न्यायतः समीक्षा करें कि उपर्युक्त पंक्तियों का क्या यही आशय निकलता है? अन्तिम वाक्य को यदि स्वतन्त्र रूप से लें तब भी शाश्वत शब्द को आपने छोड़ क्यों दिया? क्या शाश्वत को सीमेंट लगता है? अभिधा के अतिरिक्त लक्षणा और व्यंजना भी होती है। कहावत है कि अक्ल पर पत्थर पड़ गया, तो क्या कोई सचमुच का पत्थर ढूँढ़ने लगता है? उद्धृत पंक्ति का आशय केवल इतना ही है कि शाश्वत सत्य केवल परमात्मा है और वेद उस एक के प्रति हमारी श्रद्धा का स्थिरीकरण करते हैं, हमारी-आपकी श्रद्धा को दृढ़ करते हैं। अतः मस्तराम का यह आक्षेप भी अकारण है।
मस्तराम ही विद्वान् हैं- इसमें दो राय नहीं; क्योंकि वे समझते हैं कि गीता का अर्थ या तो वे जानते हैं या उनके यहाँ प्रथमा कक्षा का विद्यार्थी! शांकरभाष्य में है- ‘तद् इदं गीताशास्त्रं समस्त वेदार्थ सारसंग्रहभूतं दुर्विज्ञेयार्थम्’– अर्थात् यह गीताशास्त्र सम्पूर्ण वेदार्थ (उपनिषदों) का सार-संग्रहरूप और इसका अर्थ समझने में अत्यन्त कठिन है। शांकर भाष्यकार के लिये गीता कठिन थी; किन्तु उनके स्वयंभू पीठाधीश्वरों के लिये हस्तामलकवत् है- यह प्रसन्नता की बात है।
मस्तराम ने एक अच्छा-सा तर्क दिया है कि शंकरजी के डमरू ने व्याकरण नहीं पढ़ा था; किन्तु शंकरजी तो ज्ञान-निधान हैं। महत्त्व हारमोनियम का नहीं, उसे बजानेवाले का होता है (पृष्ठ १०)- ऐसा कहकर मस्तराम ने हमारे कथन को ही पुष्ट किया है। हम भी तो यही कहना चाहते हैं कि महिमा वेद की नहीं अपितु बोलनेवाले परमात्मा की है। जो परमात्मा पहले बोला था, क्या आज नहीं बोल सकता?
कोई एक महापुरुष या अकेली पोथी ही ज्ञान का केन्द्र होती, ईश्वर के यहाँ से उतरती तो विभिन्न महापुरुषों को समय-समय पर आने और अलग से ग्रन्थ लिखने की आवश्यकता ही न होती- एक उसी से विश्वभर का काम चल जाता; किन्तु पोथी कोई माध्यम नहीं है। माध्यम जीवन्त होना चाहिए, चेतन होना चाहिए, साधक का समकालीन होना चाहिए, इसीलिए विश्व के सभी धर्म ‘गुरु की अनिवार्यता’ स्वीकार करते हैं। पोथी के बिना काम चल सकता है। जड़भरत, गौतम बुद्ध, मीरा, सन्त कबीर, रामकृष्ण परमहंसजी इत्यादि अनेकों का पोथी के बिना भी काम चल गया, संस्कृत ज्ञान के बिना भी चल गया, व्याकरण ज्ञान के बिना भी चल गया; किन्तु गुरु के बिना नहीं चलेगा।
इसी अर्थ में सन्त कबीर कहते हैं- ‘पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पण्डित भया न कोय।’ यही योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि ‘एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते।’ (गीता, ९/२१) अर्थात् तीनों वेदों की अनेकानेक धार्मिक क्रियाओं में अनुरक्त पुरुष आवागमन में पड़े रहते हैं, तो मस्तराम इस अर्थ पर रुष्ट हो गये। लिखा है कि महाराजजी ने ‘कामकामा’ छोड़ दिया। यहाँ वेद की निन्दा नहीं, सकामी पुरुषों की निन्दा है, इत्यादि।
हम ‘बाबा वाक्यं प्रमाणम्’ मान लेते, वेद शब्द से हमें कोई एलर्जी नहीं है। हमने तो वेद के प्रति गीतोक्त धारणा का स्पष्टीकरण किया था। वेद शब्द तक सीमित है जबकि परमात्मा अनिर्वचनीय है, शब्दों में आ ही नहीं सकता। इस प्रसंग में मस्तराम ने ‘श्रुतिविप्रतिपन्ना’ वाला गीता का श्लोक जान-बूझकर छोड़ दिया, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि वेद-वाक्यों के सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब अचल-स्थिर ठहर जायेगी, तब तू योग को प्राप्त होगा। भगवान श्रीकृष्ण की ही तरह के विचार वेद के सम्बन्ध में छान्दोग्य उपनिषद्कार के भी हैं-
देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविश ्ँस्ते छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिरच्छादय ्ँ स्त– च्छन्दसां छन्दस्त्वम्। तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि। ते नु वित्त्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् (१/४/२-३)
अर्थात् मुत्यु से डरे देवताओं ने ऋक्, यजुः और सामरूप तीनों वेदों में प्रवेश किया। उन्होंने गायत्री इत्यादि छन्दों को अपना कवच बनाया; किन्तु जिस प्रकार मछली पकड़नेवाला धीवर जल के भीतर भी मछली को देख लेता है, उसी प्रकार देवताओं को मृत्यु ने उन ऋक्, साम एवं यजुर्वेद के मन्त्रों की ओट में भी देख लिया। वहाँ भी उसने इनका पिण्ड नहीं छोड़ा। देवता भी इसे जान गये इसलिये ऋक्, साम और यजुर्वेद के मन्त्रों से ऊपर उठकर स्वर में अर्थात् ओंकार में प्रवेश कर गये। उस ॐ का आश्रय लेकर देवता लोग अमर और निर्भय हो गये।
स्पष्ट है कि वेदों के आश्रित रहनेवालों को मृत्यु कभी नहीं छोड़ता, आवागमन लगा रहता है और यही गीता में दिखलाया गया तो मस्तराम ने आसमान सिर पर उठा लिया। जो बात छान्दोग्यकार ने कही, वही श्री गुरु नानकजी भी कहते हैं- ‘एक ओंकार सतगुरु प्रसादि’- एक ओंकार ही सत्य है लेकिन वह भी सद्गुरु का कृपा-प्रसाद ही है। सद्गुरु की देन है।
वेद की घोषणा है-
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद् विदुस्त इमे समासते।। (ऋग्वेद, १/१६४/३९)
अर्थात् सभी ऋचाएँ परम अविनाशी अक्षर में स्थित हैं, जिसमें सम्पूर्ण देवता भी स्थित हैं। जो उस अविनाशी को नहीं जानता, उसके लिए ऋचा क्या करेगी? जो इसे जानता है, उसी अविनाशी में प्रवेश पा जाता है।
‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः’ के सन्दर्भ में मस्तराम ने पूछा है कि यदि प्रवचन से आत्मा प्राप्त नहीं होती, तो शिष्यों को प्रवचन उपदेश क्यों करते हैं? क्या अपनी दुकान चलाने के लिये प्रवचन-उपदेश करते हैं? मस्तराम धन्य हैं जो प्रवचन का ऐसा उपयोग भी जानते हैं। हम तो अथर्ववेद की बात कहते हैं-
यन्न देवा ब्रह्मविदो ब्रह्म जेष्ठमुपासते
यो वै तान् विद्यात् प्रत्यक्षं स ब्रह्मा वेदिता स्यात्। (१०/७/२४)
अर्थात् जहाँ ब्रह्मविद् ब्रह्म की उपासना करते हैं वहाँ जाकर जो मुमुक्षु उनको जानता है वह ब्रह्मा हो जाता है, ब्रह्मनिष्ठ हो जाता है। इस मन्त्र में ब्रह्मविदों का सत्संग आवश्यक बतलाया गया है। ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।’ (कठो., १/३/१४) इस उपनिषद् वाक्य का भी यही आशय है। तैत्तिरीयोपनिषद् में है- ‘अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात्। ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्तेरन्। तथा तत्र वर्तेथाः’ (१/११/३-४) अर्थात् यदि तुमको कर्म के बारे में अथवा सदाचार के बारे में कोई शंका हो तो वहाँ जो उत्तम विचारवाले, परामर्श देने में कुशल तथा योग में दक्ष ब्रह्मनिष्ठ हों, वे जिस प्रकार वहाँ बर्ताव करते हों वैसे ही तुमको भी बर्ताव करना चाहिए। आगे लिखते हैं, यही आदेश है, यही उपदेश है, यही वेदों का रहस्य है, यही अनुशासन है। इसी प्रकार तुमको अनुष्ठान करना चाहिए। तैत्तिरीय उपनिषद् के इस वर्णन से आचार्यश्री को स्पष्ट हो गया होगा कि उपदेश की परम्परा रही है, उसका उपयोग शंका-समाधान में है; किन्तु इससे आत्मा विदित नहीं हो जाता। किं बहुना कठ एवं मुण्डकोपनिषद् के ‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो’ और उपदेश में कोई विरोधाभास नहीं है।
* ‘नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन चेज्यया।’ (गीता, ११/५३)- भगवान ने कहा कि मैं वेद, तप, दान तथा यज्ञ से नहीं देखा जा सकता, तो मस्तराम ने अर्थ बताया है कि भगवान का आशय है कि भक्ति के साथ वेदाध्ययन, भक्ति के साथ यज्ञ, भक्ति के साथ तप और भक्ति के साथ दानादि द्वारा मैं देखा जा सकता हूँ। प्रश्न उठता है कि भक्ति मिला देने से क्या सभी क्रियायें प्रशंसनीय बन जाती हैं?
इस महत्वपूर्ण प्रश्न को गीताशास्त्र में तीन बार उठाया गया है। अध्याय दो में है कि इस योग में निर्धारित क्रिया एक ही है। अविवेकियों की बुद्धि अनेक शाखाओंवाली होती हैं इसलिये वे अनन्त क्रियाओं को गढ़ लेते हैं। ऐसे लोग स्वयं तो गुमराह हैं ही दूसरों को भी गुमराह करते हैं।
सोलहवें अध्याय में है कि आसुरी स्वभाववाले ‘यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्’ (गीता, १६/१७)- शास्त्रविधि से रहित केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा, यज्ञ हैं नहीं किन्तु यज्ञ का नाम दे रखा है- ऐसे यज्ञों द्वारा दम्भपूर्वक यजन करते हैं, यज्ञ के नाम पर कुछ न कुछ करते ही रहते हैं, योगश्वर कहते हैं- वे मनुष्यों में अधम हैं, पापयोनि हैं।
अध्याय सत्रह के आरम्भ में अर्जुन पूछता है कि जो मनुष्य शास्त्रविधि को छोड़कर किन्तु श्रद्धा-भक्तिसहित यजन करते हैं, उन्हें कौन-सी गति मिलती है? भगवान बताते हैं कि शास्त्रविधि को त्यागकर भजनेवाले सात्त्विक पुरुष देवताओं को, राजसी पुरुष यक्ष-राक्षसों को और तामसी लोग भूत-प्रेतों को पूजते हैं, यहाँ तक कि घोर तप करते हैं; किन्तु वे सब मुझ परमात्मा से दूरी ही पैदा करते हैं न कि भजते हैं। इन सबको तू असुर जान! स्पष्ट है कि शास्त्र-अविहित भक्ति का भी कोई मूल्य नहीं है।
भगवान ने गीता में शास्त्र भी बताया और विधि भी, इसलिये इन दोनों के नाम पर भी भागने की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। कदाचित् शास्त्र माने हो वेदान्त शास्त्र, मीमांसा शास्त्र, न्यायशास्त्र या शास्त्र के नाम पर भगवान का आशय रहा हो- गरुड़ पुराण या पाराशर स्मृति! ऐसा कुछ भी नहीं है। भगवान ने स्वयं बताया है कि शास्त्र कौन है-
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।। (गीता, १५/२०)
हे अनघ! यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। कौन? यही गीता! योगेश्वर की इतनी ही वाणी स्वयं में पूर्ण शास्त्र है। वेद, शास्त्र, पुराणों के संकलनकर्ता की यही सम्मति है कि ‘किमन्यै शास्त्रविस्तरैः’। अतः शास्त्र के नाम पर केवल गीता लें। यह विश्वभर के मनुष्यमात्र का अतर्क्य शास्त्र है। अब विधि भी योगेश्वर श्रीकृष्ण के शब्दों में सुन लें-
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।। (गीता, १८/४६)
जिस परमात्मा से सब भूतों की (हिन्दू, मुसलमान, यहूदी, ईसाई सबकी) उत्पत्ति हुई है, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस एक परमात्मा को अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म के द्वारा अर्चन कर मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त होता है। अतः मात्र एक परमात्मा का पूजन ही विधि है- एकदेशीय, एकवर्गीय देवी-देवताओं का पूजन कोई विधि नहीं है।
आचार्यप्रवर ने लिखा है कि तत्त्चदर्शी के लिये वैदिक कर्मकाण्ड का उपयोग भले न हो; किन्तु क्या भारत के सभी लोग पूरे ज्ञानी हैं? उनके लिये विधि-निषेध या आचार-संहिता कुछ मानेंगे या नहीं? ग्रन्थ सर्वजनहिताय लिखा जाता है फिर कर्म की निन्दा क्यों? पृष्ठ २ पर लिखते हैं कि वैदिक कर्मकाण्ड से जीवन में उपासना आती है, उपासना से अमृत (ज्ञान) और ज्ञान से मोक्ष होता है। केवल कर्म नहीं, बल्कि दोनों साथ-साथ करना चाहिए। निष्काम भाव से किया जानेवाला साधारण कर्म भी दिव्य बन जाता है। निष्काम कर्म अन्तःकरण की शुद्धि का साधन है।…. इत्यादि।
आचार्यश्री के इन वाक्यों के अवलोकन से कर्म के प्रति उनकी अत्यन्त धूमिल धारणा परिलक्षित होती है। वे उपासना को कर्म नहीं मानते बल्कि उपासना और कर्म को अलग-अलग बताते हैं। वे विधि-निषेध या आचार-संहिता को कर्म मानते हैं, कर्मकाण्ड को कर्म मानते हैं और जीने-खाने की हर क्रिया में सकाम और निष्काम की भूमिका भी गढ़ चुके हैं, उसे अन्तःकरण की शुद्धि का साधन मान बैठे हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कर्म न बताया होता तो हम-आप कुछ भी करते। कुछ भी कर गुजरने को गीता कर्म नहीं कहती। न तो अमृत माने ज्ञान होता है और न कर्मकाण्ड कोई उपासना है; क्योंकि वेद का वह विभाग जो यज्ञीय कृत्यों तथा उसके फल से सम्बन्ध रखता हो, कर्मकाण्ड कहलाता है। वैदिक यज्ञों को आपने पृष्ठ १३ पर नकार दिया फिर कौन-सा कर्मकाण्ड आप कराना चाहते हैं?
आइए, गीता के आलोक में कर्म को समझने का प्रयास करें। सर्वप्रथम तथ्य तो यही है कि गीता में निष्काम कर्म शब्द नहीं है। मनोवैज्ञानिकों का दावा है कि कोई कर्म निष्काम नहीं होता। योगी भी ईश्वर की कामना लेकर भजन में प्रवृत्त होता है। इस शब्द का सही प्रयोग केवल भजन-क्षेत्र में है कि भजन करना चाहिए, इस विश्वास के साथ कि इसका परिणाम निश्चित शुभ मिलेगा, इसलिए फल प्रभु पर छोड़ देना चाहिए। मन भगवान को दे दिया तो फल की कामना करेगा कौन?
कर्म की विशेषता बतलाते हुए श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि-
(१) ‘व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।’ (२/४१)- इस कर्म में निश्चयात्मक क्रिया एक ही है। अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है इसलिये वे कर्म के नाम पर अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं।
(२) ‘नियतं कुरु कर्म त्वं’ (३/८)- अर्जुन! तू नियत किये हुए कर्म को कर। अर्थात् क्रियायें बहुत-सी हैं, वे कर्म नहीं हैं। गीता में नियत कर्म करने की बात कही गई है।
(३) ‘शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।’ (३/८) कर्म कोई ऐसी विधि है जो जन्म-जन्म से चले आ रहे आत्मा की शरीर-यात्रा का अन्त कर देती है? कई विद्वान् शरीर-यात्रा का अर्थ जीवन-निर्वाह करते हैं; किन्तु श्रीकृष्ण ने गीता में ही ऐसे विचार का खण्डन किया है। जो शरीर के लिए पचते हैं, परिश्रम करते हैं, पापी हैं। शरीर-यात्रा का अर्थ है शरीर धारण करना, जन्म लेना। आप विचार करें कि कौन-सा कर्म करने से अगला जन्म नहीं लेना पड़ेगा?
(४) वह नियत कर्म है कौन-सा? श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है- ‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः’ (गीता, ३/९) अर्जुन! यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है। इसके अतिरिक्त हम-आप कुछ भी करें, इसी लोक का बन्धन है न कि कर्म। बहुत से व्याख्याकार यज्ञ के नाम पर ‘यज्ञो वै विष्णुः’– विष्णु के निमित्त किये जानेवाला सम्पूर्ण कर्म यज्ञ है, तो कई ‘यज्ञो वै ब्रह्म’– ब्रह्म ही यज्ञ है, कई ‘आत्मा वै यज्ञः’– आत्मा ही यज्ञ है तो कई ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्मं’– श्रेष्ठतम कर्म ही यज्ञ है- ऐसा अर्थ करते हैं; किन्तु अपने मन से क्रियाएँ गढ़ने लगते हैं, जबकि यज्ञ के नाम पर भी कहीं भागने की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि अध्याय ४ में श्रीकृष्ण ने एक ही यज्ञ के तेरह-चौदह सोपानों का वर्णन किया, जो प्राण-अपान (श्वास-प्रश्वास) के द्वारा, ध्यान के द्वारा, चिन्तन और इन्द्रिय संयम द्वारा होते हैं। इन यज्ञों में बाहर का कोई सामान नहीं लगता। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कर दिया है कि भौतिक द्रव्यों से होनेवाले यज्ञ भी हैं; किन्तु उनका फल अत्यल्प है, चाहे आप करोड़ों का ही यज्ञ क्यों न करें।
(५) कर्म के सम्बन्ध में भ्रान्तियाँ श्रीकृष्ण के समय में भी थीं। गीता के अध्याय ४/१६ में वे कहते हैं कि कर्म क्या है? अकर्म क्या है?- इस विषय में विद्वानों में भी भ्रम है, इसलिए मैं तुझे कर्म को विशेषरूप से बताऊँगा, जिसे जानकर तू अशुभ संसार-बन्धन से छूट जायेगा। यहाँ कर्म की विशेषता बताते हैं कि उसे करने से संसार का बन्धन छूट जाता है। अभी बता चुके हैं कि यज्ञ के अतिरिक्त कुछ भी करें, बन्धन तैयार होगा। लेकिन कर्म वही है जो संसार-बन्धन से छुड़ा दे। आप स्वयं निर्णय लें कि कौन-सा कर्म करने से भव-बन्धन कटेगा? निष्काम भाव से नौकरी करने से? पूज्यश्री ने ‘नहले पर दहला’ के पृष्ठ २ पर लिखा है कि ‘‘रात में दो-दो बजे तक जागना, उठते ही चाय-बिस्कुट खाना, अखबार पढ़ना, स्वरूप को भूला रहना यह सब मृत्यु है। इस मृत्यु से बचने के लिए वैदिक कर्म करें।’’ उनका आशय है कि समय से सोयें, नहा-धोकर मन्त्र पढ़कर खायें; किन्तु बिस्कुट खाने न खाने से गीता के कर्म का कोई सम्बन्ध नहीं है। मन्त्र पढ़कर नहाना गीता का कर्म नहीं है। विचार करें कि गीता किसे कर्म कहती है?
(६) ‘तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर।’ (३/९) नियतकर्म को ही तदर्थ कर्म या यज्ञार्थ कर्म कहा गया है। इसी को ‘कार्यम् कर्म’, ‘पुण्य कर्म’ और ‘शास्त्र-विधानोक्त कर्म’ भी कहा गया है। अलग से कोई पुण्य कर्म गीता में नहीं है। पुण्य के नाम पर संसार में जितने भी कार्य किये जाते हैं, सामाजिक व्यवस्थाएँ हैं। गीता में पुण्यकर्म एक ही है- आराधना!
इस तदर्थ कर्म को संगदोष से अलग रहकर करना होता है। भर्तृहरि का अनुभव है- ‘दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनश्यति यतिः सङ्गत’– यही मानस में भी है- ‘संग तें जती कुमंत्र ते राजा।’ (मानस, ३/२०/१०) ऋग्वेद में है- ‘उपह्वरे गिरीर्णा सङ्गमे च नदीनाम्। धिया विप्रो अजायत।’ (८/६/२८)- पहाड़ की कन्दराओं तथा नदियों के संगम में ध्यानादि से विप्रत्व का जन्म होता है। गीता में स्थान-स्थान पर एकान्त-सेवन पर बल दिया गया है। एकान्त में कौन-सा कर्म करेंगे?
(७) यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।। (गीता, ४/१९)
जिस भी व्यक्ति का सम्पूर्णता के साथ किया गया कर्म इतना सूक्ष्म हो गया कि वह कामना और संकल्प से शून्य हो गया, उस समय ज्ञानाग्नि में कर्म सदा के लिये जल जाते हैं। आगे कर्म करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। स्पष्ट है कि गीता का नियत कर्म व्यक्ति के संकल्पों का निरोध कर देता है। सांसारिक किसी भी कर्म से, किसी भी विधि-निषेध से, किसी भी आचार-संहिता से किं बहुना किसी भी कर्मकाण्ड से संकल्पशून्यता आती हो तो कीजिए।
बुझै कि काम अगिनि तुलसी कहुँ, बिषय–भोग बहु घी ते। (विनय०, १९८)
(८) आठवें अध्याय के आरम्भ में ही अर्जुन का प्रश्न था कि भगवन्! कर्म की पूर्णता कब है? भगवान ने बताया- ‘भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः’ (गीता, ८/३)- प्राणियों के वे भाव, जिनसे कुछ न कुछ रचना होती है, उन पर विसर्ग लग जाना, उनका रुक जाना कर्म की पूर्णता है। संकल्पों का रुक जाना ही कर्म की पराकाष्ठा है।
(९) गीता १६/२२ में कहते हैं- काम, क्रोध, लोभ नरक के तीन द्वार हैं। इन्हें त्याग देने पर ही वह कर्म आरम्भ होता है, जिससे परमगति की प्राप्ति होती है। आचार्यश्री विचार करें कि किस कर्म से परमगति प्राप्त होती है और किस कर्म से पितृलोक प्राप्त होता है? गीता किसे कर्म कहती है?
(१०) गीता १७/२७ में है- ‘कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते।’ उस परमात्मा के लिये नियत किया हुआ कर्म ही सत्य है। मानस में भी यही है- ‘सत हरिभजनु जगत सब सपना।’ (मानस, ३/३८/५)
योगेश्वर श्रीकृष्ण के इतना बल देने पर भी आचार्यश्री उस नियत कर्म को न मानकर उलटी-सीधी कल्पना करते हैं कि जो कुछ भी संसार में किया जाता है, कर्म है। कुछ भी त्यागने की जरूरत नहीं है, केवल फल की कामना न करो, हो गया निष्काम कर्मयोग! कितनी भ्रान्त धारणाएँ हैं? कहते हैं- कुछ भी करो नारायण को अर्पण कर दो- हो गया समर्पण योग; किन्तु यह समर्पण नहीं है। योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि कहते हैं कि ‘समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्।’ (२/४५)- ईश्वर को समर्पण करने से समाधि सिद्ध होती है। समर्पण का परिणाम है समाधि। समर्पण से संकल्पशून्यता आती है। मन ही तो कामना करता है। उसी मन का समर्पण कर दिया, तो कौन करेगा कामना? मन में सतत् प्रभु का चिन्तन करने से निष्कामता स्वतः हो जाती है। कामनाओं को रोकने से या केवल कह देने से कि नारायण को अर्पण किया- कामना कभी नहीं रुकेगी। वह जब भी रुकेगी इष्ट के चिन्तन से ही रुकेगी। नौकरीवाले कहते हैं कि हम तो कर्त्तव्य समझकर साहब के आदेश का पालन करते हैं, हमारी अपनी कोई कामना नहीं। निष्काम कर्मयोग तो हमने अपने जीवन में ढाल लिया है- कर्म जानते ही नहीं तो निष्काम कर्मयोग कैसा? यदि श्रीकृष्ण ने स्पष्ट न कहा हो तो आप कुछ भी करें। यदि बताया है तो जितना कहा है उतना ही मान लें। किन्तु व्यक्ति मान नहीं पाता। विरासत में अनेक रीति-रिवाज, पूजा-पद्धतियाँ मस्तिष्क को जकड़े हुए हैं। बाह्य वस्तुओं को बेचकर कदाचित् हम-आप भाग भी सकते हैं; किन्तु पूर्वाग्रहग्रस्त विचार, कुसंस्कार मस्तिष्क में साथ-साथ चलते हैं। सिर काटकर कोई अलग तो रख नहीं सकता। यही विवशता आचार्यश्री के साथ भी है। नियत कर्म को छोड़कर उन्होंने इतनी क्रियाओं को गिना दिया है कि गीतोक्त कर्म पहचान ही खो बैठा।
* मान्यवर ने लिखा है कि ‘धर्म’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता है- एक निवृत्तिपरक और दूसरा प्रवृत्तिपरक। विधिपरक पुण्य को, व्रत को, दान को, सामाजिक अभ्युन्नति हेतु हम धारण करें। (पृष्ठ २०) विधि-निषेधात्मक धर्म जीवन को नियन्त्रित एवं व्यवस्थित करता है, अनगढ़ क्रिया-कलाप का शोधन करता है। (पृष्ठ १८)
जब धर्म ही दो प्रकार का हो गया, तो अधर्म किसे कहेंगे? अधर्म कितने प्रकार का होगा? बीसवें पृष्ठ पर मस्तराम लिखते हैं कि जो गलती करने से रोके, उसका नाम धर्म है। सरकार के सभी कानून गलती करने से रोकते हैं, तो क्या वे धर्म हो गये? धर्म विधि-निषेधात्मक नहीं बल्कि कर्म विधि-निषेधात्मक कहा गया है- ‘विधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रबिनंदिनि बरनी।।’ (मानस, १/१/९) विधि-निषेध तो सड़क के नियमों में भी है कि बायें से चलो, दाहिने मत चलो- तो क्या यह धर्म हो गया? अत्यन्त उपयोगी होते हुए भी यह विधि-निषेध न तो धर्म है न गीता का नियत कर्म। प्राचीन ग्रन्थों में शौच, दन्तधावन, स्नान, भोजन, निद्रा, जागरण, विवाह, नियोग इत्यादि के विधि-निषेधों की लम्बी चर्चाएँ हैं। ये उस समय के राष्ट्रीय कानून हैं, जीवन को नियन्त्रित-व्यवस्थित करते हैं, अनगढ़ क्रिया-कलापों का शोधन भी करते हैं फिर भी ये नियम धर्म नहीं हैं। ये केवल स्वास्थ्य, स्वच्छता, अधिकार तथा सदाचार के नियम हैं। इनमें भी अधिकांश के लिये उन्नत आविष्कार जन-जीवन में प्रचलित हैं। साबुन-तेल छोड़कर आज कितने लोग स्नानहेतु मिट्टी या अंगराग लगाने के लिए तैयार हैं? उपयोगी-अनुपयोगी प्राचीन सभी नियमों को अकारण धर्म कहकर मनवाने का आज के शिक्षित समाज में कोई औचित्य नहीं रह गया है।
धर्म का प्रयोजन बताते हुए मस्तराम ने श्रीमद्भागवत के निम्नलिखित श्लोक का उद्धरण दिया है-
धर्मस्यह्यपवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थापकल्पते।
नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृति।। (१/२/९)
आर्चायजी ने इसका अर्थ लिखा है- ‘कहीं अनुचित धन में हम फँस न जायँ, यदि फँस गये तो छुड़ानेवाला धर्म है’ (पृष्ठ १९)। आश्चर्य है कि ऐसा अर्थ एक वेदान्ताचार्य ने किया है। आजकल अनुचित धन में फँस जाने पर छुड़ाने का काम इनकम टैक्स के वकील करते हैं, राजनेता करते हैं, तब तो आज के धर्म भी वही सब हैं।
इन श्लोकों का सही अर्थ इस प्रकार होगा- ‘धर्म का फल है मोक्ष। उसकी सार्थकता अर्थप्राप्ति में नहीं है। अर्थ केवल धर्म के लिए है। भोग-विलास धन की सार्थकता नहीं है।’ अपना निष्कर्ष निकालते समय मस्तराम ने भागवत के कई प्रसंगों को अनदेखा कर दिया है। दूसरे स्कन्ध के दूसरे अध्याय के दूसरे श्लोक में है- ‘वेदों की वर्णन-शैली ही इस प्रकार की है कि लोगों की बुद्धि स्वर्ग आदि निरर्थक नामों के फेर में फँस जाती है। जीव सुख की वासना से स्वप्न-सा देखता हुआ भटकने लगता है; किन्तु उन मायालोकों में कहीं भी उसे सच्चे सुख की प्राप्ति नहीं होती।’ आश्चर्य है! मस्तराम को यह श्लोक नहीं दिखाई पड़ा?
धर्म का विशुद्ध स्वरूप गीता में द्रष्टव्य है। अध्याय २/१६-२९ में भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। परमात्मा ही सत् है। किन्तु वह अचिन्त्य भी है। जब तक चित्त और चित्त की तरंग है तब तक उसे देखा नहीं जा सकता। चित्त का निरोध करके उस परमात्मा को पाने की विधि का नाम कर्म है। इस कर्म को कार्यरूप देना धर्म है अर्थात् प्रभु से मिलन करा देनेवाली क्रिया पर चलना धर्म है।
गीता, २/४० में है कि इस कर्मरूपी धर्म का रंचमात्र साधन भी जन्म-मृत्यु के महान् भय से उद्धार करानेवाला होता है अर्थात् इस कर्म को करना ही धर्म है। इस नियत कर्म (साधन-पथ) को साधक के स्वभाव में उपलब्ध क्षमता के अनुसार चार भागों में बाँटा गया है। कर्म को समझकर मनुष्य जब से आरम्भ करता है, उस आरम्भिक अवस्था में वह शूद्र है, क्रमशः विधि पकड़ में आयी तो वही वैश्य है। प्रकृति के संघर्ष को झेलने की क्षमता और शौर्य आने पर वही व्यक्ति क्षत्रिय और ब्रह्म के तद्रूप होने की योग्यताओं (ज्ञान-विज्ञानादि) के आने पर वही ब्राह्मण है।
गीता १८/४६-४७ में कहते हैं कि स्वभाव में पायी जानेवाली क्षमता के अनुसार कर्म में लगना स्वधर्म है। हल्का होने पर भी स्वभाव से उपलब्ध स्वधर्म श्रेयस्कर है; किन्तु क्षमता अर्जित किये बिना दूसरों के उन्नत धर्म की नकल हानिकारक है। स्वधर्म में मृत्यु कल्याणकारी है। जहाँ से साधन छूटा था वहीं से पुनः आरम्भ हो जायेगा। सोपानशः चलकर वह परमसिद्धि, अविनाशी पद प्राप्त कर लेगा।
जिस परमात्मा से सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई है, जो सर्वत्र व्याप्त है, स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार उसे भली-भाँति पूजकर मानव परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है- अर्थात् निश्चित विधि से एक परमात्मा का चिन्तन ही धर्म है।
धर्म करने का अधिकार किसे है? योगेश्वर ने बताया कि अत्यन्त दुराचारी भी यदि अनन्य भाव से अर्थात् अन्य किसी को न भजकर केवल मुझे भजता है, तो वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है, उसकी आत्मा धर्म से संयुक्त हो जाती है। अतः श्रीकृष्ण के अनुसार- धर्मात्मा वह है जो एक परमात्मा में अनन्य निष्ठा से लग गया है। धर्मात्मा वह है जो एक परमात्मा की प्राप्ति के लिये नियत कर्म का आचरण करता है। धर्मात्मा वह है जो स्वभाव में नियत क्षमता के अनुसार परमात्मा की शोध में संलग्न है।
अन्त में कहते हैं- अर्जुन! सारे धर्मों की चिन्ता छोड़कर एक मेरी शरण में हो जा। अतः एक परमात्मा के प्रति समर्पित व्यक्ति ही धार्मिक है। एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर करना ही धर्म है। उस एक परमात्मा की प्राप्ति की निष्चित क्रिया को करना ही धर्म है। इस स्थिति को प्राप्त महापुरुष, आत्मतृप्त महापुरुषों का सिद्धान्त ही सृष्टि में एकमात्र धर्म है। उनकी शरण में जाना चाहिए कि उन महापुरुषों ने कैसे परमात्मा को पाया? किस मार्ग से चले? उन सबका मार्ग सदा ही एक है। उस मार्ग से चलना धर्म है।
धर्म मनुष्य के आचरण की वस्तु है और वह आचरण निर्धारित है, नियत है। उसके अतिरिक्त मनमाना कुछ भी करना धर्म नहीं है, चाहे वह धर्म के नाम पर ही क्यों न किया जाय? इसमें निश्चयात्मक क्रिया एक है। इन्द्रियाँ जो विषयों की ओर दौड़ती थीं, उन्हें संयत कर इष्ट की ओर मोड़ना है। इन्द्रियों की चेष्टा और मन के व्यापार को संयमित कर आत्मा की ओर प्रवाहित करना है (४/२७)। इस संयम के लिये गीता में स्थान-स्थान पर उपाय बताये गये हैं- एकान्त-सेवन, स्वल्पाहार, ब्रह्मचर्य, ॐ का जप, सद्गुरु का ध्यान। इन्हें करना धर्म है और गीता में प्राप्त निर्विवाद सरल क्रमबद्ध एवं पूर्ण साधन को छोड़कर ग्रन्थों के नाम पर इधर-उधर भागना धर्म नहीं है।
कहीं लिखा होने से ही किसी बात को आँख मूँदकर मान लेना विवेकसम्मत नहीं है। अतः वेद के नाम पर दसियों ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक, सैकड़ों उपनिषद्, वेदान्त या अन्य शास्त्रों तथा सैकड़ों स्मृतियों को अपौरुषेय या ईश्वरप्रणीत कहकर मनवाना श्रद्धा का दुरुपयोग है। लोगों ने देखा कि अपौरुषेय कहने से ग्रन्थ का महत्त्व बढ़ जाता है, तो प्रत्येक साहित्य को अपौरुषेय कहने लगे। बृहदारण्यक उपनिषद् (२/४/१०) में है कि ऋक्, यजुः, साम, अथर्व, इतिहास, पुराण, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, व्याख्यान, अनुव्याख्यान इत्यादि सब-के-सब ईश्वर के निःश्वास हैं, अपौरुषेय हैं। इस तरह मत्स्यपुराण में भगवान मत्स्य कहते हैं-
पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्।
अनन्तरं च वक्तेभ्यो वेदाश्च विनिर्गतः।। (५३/३)
अर्थात् सबसे पहले ब्रह्मा ने पुराण बनाया और इसके बाद वेद की रचना की। पुराण में लिखा होने से क्या मान लिया जाय? पाँचवें-छठें श्लोक में मत्स्य भगवान कहते हैं कि सभी लोगों के नष्ट हो जाने पर मैंने ही अश्वरूप से व्याकरणादि छहों अंगोंसहित चार वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का संकलन किया था। बृहदारण्यक (६/२/१३) तथा छान्दोग्य (५/८/१-२) उपनिषदों में यज्ञ के लिये दी गयी अश्लील उपमा को अपौरुषेय कहने का क्या औचित्य है? सामवेद गायन की उपमा छान्दोग्य उपनिषद् में देखें-
उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रतिस्त्री सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम्।
स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति, मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न कांचन परिहरेत्तद्व्रतम्। (२/१३/१-२)
अर्थात् स्त्री-पुरुष का परस्पर संकेत हिंकार है, सहमति प्रस्ताव है, एक पलंग पर साथ-साथ होना उद्गीथ है…. इत्यादि। यहाँ सामवेद गायन की तुलना मैथुन से की गई है। ‘न कांचन परिहरेत् तत् व्रतम्’ अर्थात् किसी भी स्त्री को छोड़ना नहीं चाहिए- यही व्रत है। शांकर भाष्यकार ने इसका अर्थ किया है- ‘न कांचन कांचदपि स्त्रियं स्वात्मतल्प प्राप्तां न परिहरेत् समागमार्थानाम्’ अर्थात् समागम चाहनेवाली जो अपनी शय्या पर आये ऐसी किसी भी स्त्री को न छोड़ें। क्या यह भगवती श्रुति है?
छान्दोग्य उपनिषद् में है, ‘चन्द्र इव राहोर्मुखात् प्रमुच्य’ (८/१३/१)- जैसे चन्द्रमा राहु के मुख से छूट जाता है। चन्द्रमा को राहु खा जाता है और फिर उगल देता है। क्या सृष्टिकर्त्ता को अपनी सृष्टि का ही पता नहीं है कि ग्रहण कैसे लगता है?
बृहदारण्यक उपनिषद् में है- ‘कस्मिन्नु खल्वादित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चन्द्रलोकेषु गार्गीति’ (३/६/१) गार्गी ने पूछा था कि सूर्यलोक किसमें स्थित है? याज्ञवल्क्य ने बताया- चन्द्रलोक में! यहाँ चन्द्रलोक को सूर्य से बड़ा अर्थात् सूर्य को चन्द्र से निकला हुआ बताया गया। ऋषियों के इस वाद-विवाद को भगवान की वाणी कहना जरूरी है क्या?
आदरणीय मस्तराम का हठ वहाँ भी देखने लायक है जहाँ वे अब भी कहते हैं कि बादल यज्ञ के धुएँ से बनता है। अपना पक्ष सबल बनाने के लिये वे महाकवि कालिदास तथा पूज्य उड़िया बाबा की दुहाई भी देते हैं। बादल तो जैसे बनते हैं वैसे ही बनते रहेंगे, इन महानुभावों का नाम लेने से उनकी निर्माण-क्रिया में परिवर्तन हो जायेगा क्या?
बादल बनाने के लिये आचार्यश्री वेद, उपनिषद्, पुराण और स्मृति से उतरकर कालिदासजी तक पहुँच गये। थोड़ा और आगे बढ़े होते तो उन्हें श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी के चैतन्य चरितावली प्रथम खण्ड, अनेक ग्रन्थों तथा वामन शिवराम आप्टे के संस्कृत-हिन्दी कोश में स्मृति धर्मशास्त्र में रूप में उद्धृत ‘जन्मना जायते शूद्रः….’वाला श्लोक भी मिल गया होता।
कालिदासजी का एक अन्य वर्णन लें। लोकालोक नामक एक पर्वत है जो पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए है। पृथ्वी के सात द्वीप हैं। सातवें द्वीप के भी बाहर एक पर्वत है। इसके उस पार अन्धकार ही अन्धकार रहता है और इसी पार तक सूर्य का प्रकाश पहुँच पाता है। अतः यह पर्वत अन्धकार और प्रकाश को पृथक् करता है। कालिदासजी ने इस पर्वत के विषय में कहा है- ‘प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोक इवाचलः।’ (रघुवंश०, १-६८) महाकवि के पास कविसत्य भी होता है। चकोर अंगार खाता है- यह कविसत्य है। हंस मानसरोवर के मोती चुगता है- यह भी कविसत्य है। कवि के पास उक्ति वैचित्र्य है, वाग् विदग्धता है, काव्य है। उससे रसानुभूति ही अपेक्षित है, न कि वैज्ञानिक परीक्षण।
इसी प्रकार सन्त के पास ऋषिसत्य होता है, योगपरक शब्द होते हैं। श्री रामकृष्ण परमहंसजी ने बताया कि ‘गीता गीता’ दो-चार बार दुहराने से ‘तागी तागी’ अर्थात् त्यागी बन जाता है। अतः गीता का सार त्याग है। अब आप पूछेंगे कि यह कौन-सी विधि है? जबकि उन्होंने गीता का सही आशय बताया।
सन्त कथन के भाव पर जाते हैं। सन्त के पास आप व्याकरण, छन्द या निरुक्त सीखने नहीं जाते। अतः किसी शब्द में कहाँ उपसर्ग, कहाँ प्रत्यय, कहाँ कृत और कहाँ तद्धित है- इसका समाधान शिक्षाविद् के क्षेत्र की वस्तु है, धर्म उसका रणांगन कदापि नहीं है।
सन्त इनसाइक्लोपीडिया भी नहीं है। किसी ग्रन्थ को रटना भगवत्पथ में अनिवार्य भी नहीं है। कितनी पुस्तकें लिख गईं और कितनी अब भी मौखिक, हस्तलिखित प्राप्य या अप्र्राप्य हैं। लगनशील साधक के लिये इस प्रश्न का भी कोई उपयोग नहीं है। साथ ही इस प्रश्न को दुबारा पूछकर हम पूज्यश्री को संकोच में नहीं डालेंगे कि ‘नास्तिकों…’वाली पुस्तिका में गोस्वामी तुलसीदासजी के नाम पर यह दोहा उन्होंने कब गढ़ा कि- ‘ब्रह्मज्ञान जाना नहीं, कर्म दिया छटकाय। सो नर पाँवर मूढ़ है पुनि पुनि नरकहि जाय।।’
छान्दोग्य उपनिषद् में है कि- हे सोम्य! राजकर्मचारी पुरुष को हाथ बाँधकर लाते हैं और कहते हैं कि इसने चोरी की है। राजा लोहे का परशु तपाकर उसके हाथ में रखवाता है। यदि वह सचमुच चोर है तो जल जाता है (८/१३/१)। आचार्यश्री स्वयं निर्णय करें कि अज्ञान पर आधारित इस प्रथा को अपौरुषेय कहकर कितने लोगों से इसका पालन करा पायेंगे? निर्दोष होते हुए भी क्या वह स्वयं ऐसे परीक्षणों के लिए प्रस्तुत हैं? क्या ये वाणियाँ अपौरुषेय हैं?
जिस प्रकार इन आर्षग्रन्थों में प्रक्षिप्त अंश है, उसी प्रकार इनके भाष्य में भी प्रदूषण स्पष्ट है। उदाहरण के लिये चौदहवीं शताब्दी में विजय नगर के राजा बुक्क के दीवान सायणाचार्य ने पण्डितों की सहायता से वेदों और ब्राह्मण-ग्रन्थों का भाष्य किया। उनके पश्चात् उबट और उबट के पश्चात् महीधर हुए, जिन्होंने सायण और उबट को आधार मानकर वेदों का भाष्य किया। यहाँ प्रस्तुत है यजुर्वेद के तेइसवें अध्याय की उन्नीसवीं कण्डिका-
गणानां त्वा गणपति ँ्हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति ँ्हवामहे निधीनां त्वा निधिपति ँ्हवामहे वसो मम। आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्।।
इसका भाष्य करते हुए महीधर लिखते हैं- ‘अस्मिन् मंत्रे गणपति शब्दादश्वो बाजी ग्रहीतव्य इति। तद्यथा महिषी यजमानस्य पत्नी, यज्ञशालायां पश्यतां सर्वेषामृत्विजामश्वसमीपे शेते शयानां सत्याह, हे अश्व! गर्भधं गर्भं दधाति, गर्भधं गर्भधारकं रेतः, अहं आ अजानि आकृष्य क्षिपामि त्वं च गर्भधं रेतः आ अजासि आकृष्य क्षिपसि।’ आशय यह है कि यजमान की पत्नी यज्ञ करानेवाले पण्डितों के सामने घोड़े के पास सोवे और उससे गर्भ धारण कराने के लिए कहे।
सायणाचार्यजी ऋग्वेद प्रथम मण्डल के सूक्त चौबीस से तीस तक के भाष्य में शुनःशेप की कथा लिखकर वेदों में नरबलि का भयंकर उदाहरण दिखलाया है और शुनःशेप का अर्थ ‘शुन इव शेपः यस्य’ अर्थात् कुत्ते का…. किया है।
उन्हीं की शैली में आचार्यप्रवर ने अपनी पुस्तिका के पृष्ठ बारह पर वेदों में जाति दिखलाने के लिए आपस्तम्ब धर्मसूत्र, शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण, पातंजल योगदर्शन, तैत्तिरीय आरण्यक तथा निरुक्त का उद्धरण दिया है; किन्तु चार वेदों के अतिरिक्त ये ग्रन्थ भी वेद हैं क्या? इन उद्धरणों का जातिपरक अर्थ लगाकर श्रीमन् ने विद्वता का दुरुपयोग ही किया है। उदाहरण के लिये पातंजल योगदर्शन से आप द्वारा दिये गये उद्धरण ‘सतिमूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः’ नामक सूत्र में जाति शब्द का अर्थ भारत में प्रचलित जाति-व्यवस्था नहीं है। साधनपाद के इस तेरहवें सूत्र के पहले बारहवें सूत्र में है कि वासनाओं का फल वर्तमान तथा आनेवाले जन्मों में भोगा जाता है। तेरहवें सूत्र में यही फल जाति, आयु और भोग बताया गया है। जाति का अर्थ यहाँ जन्म है। मनुष्य, पशु, कीट-पतंगादि योनियों में जन्म जाति है। बहुत काल तक जीव का एक शरीर के साथ सम्बन्ध आयु है। इन्द्रियों के रूप-रसादिक विषय भोग हैं। इसी योगशास्त्र के कैवल्यपाद का दूसरा सूत्र है- ‘जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्।’ अर्थात् प्रकृति के पूर्ण होने से एक जाति दूसरी जाति में बदल जाती है। भारत की जाति-व्यवस्था में यह लक्षण कहाँ पाया जाता है?
ठीक यही भागवत के नवम स्कन्ध, द्वितीय अध्याय के श्लोकों में है कि मनुपुत्र धृष्ट से धार्ष्टय नामक क्षत्रिय हुए, जो अन्त में इस शरीर से ही ब्राह्मण बन गये। मनुपुत्र नरिष्यत से चित्रसेन, उनसे ऋक्ष, ऋक्ष से मीटवान, उनसे कूर्च, उनसे इन्द्रसेन, उनसे वीहिहोत्र, उनसे सत्यश्रवा, उनसे उरुश्रवा, उनसे देवदत्त, उनसे अग्निवेश नामक पुत्र हुआ, जिनसे ब्राह्मणों का अग्निवेश्यायन गोत्र चला। चतुर्थ स्कन्ध के चौदहवें-पन्द्रहवें अध्याय में ब्राह्मणों द्वारा पुत्रहीन राजा वेन की जंघा से निषाद तथा भुजाओं से पृथु और अर्चि की उत्पत्ति का वर्णन है, जिन्होंने आपस में विवाह कर लिया। कहाँ रह गया कि ब्राह्मण विराट् के मुख से ही पैदा हुए? स्कन्ध तीन के बारहवें अध्याय में ब्रह्मा के पुत्र मरीची आदि ऋषियों ने सरस्वती-सम्बन्धी आसक्ति के लिये उन्हें फटकारा कि आपसे पूर्ववर्ती किसी भी ब्रह्मा ने ऐसा संकल्प नहीं किया। स्पष्ट है कि ब्रह्मा भी व्यवस्थाकार मात्र हैं, उनसे पहले भी सृष्टि थी।
आश्रम की पुस्तिका में है कि झल्ल-मल्ल-लिच्छिवि जातियाँ, जिनका वर्णन मनुस्मृति में है, महाभारतकाल के बाद ही हैं; तो सुहृदवर आचार्यजी ने यजुर्वेद के कुछ शब्दों का साम्य जातियों में बैठाकर जाति-प्रथा रेखांकित करने का अनावश्यक श्रम किया है। इन शब्दों को जातिसूचक माननेवाले कई भाष्यकार शुक्ल यजुर्वेद के तीसवें अध्याय को विभिन्न जाति के व्यक्तियों को बलि चढ़ानेवाले नरमेध यज्ञ का वर्णन मानते हैं। अतः सम्पूर्ण तीसवें अध्याय पर विचार करना होगा, जिसमें कुल २२ मन्त्र हैं। पहले मन्त्र में ईश्वर से सत्कर्म की प्रेरणा के लिये प्रार्थना की गई है। दूसरा प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र है, जिसमें सर्वत्र व्याप्त एक परमात्मा के प्रति समर्पण है। तीसरे मन्त्र में बुराइयों से दूर रहने तथा सत्पथ पर चलाने की प्रार्थना है तथा चौथे से बाइसवें मन्त्र में शिक्षा दी गई है कि उत्तम रहन-सहन एवं कल्याण के लिये मनुष्य को क्या करना चाहिए।
यजुर्वेद मे उपर्युक्त मन्त्रों में एक सौ चौरासी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल का वर्णन है। यदि मस्तरामजी के अनुसार इनमें छत्तीस शब्द जातिवाचक हैं, तो शेष एक सौ अड़तालीस शब्दों का क्या होगा? इन्हीं मन्त्रों में है, ‘योगाय योक्तारम्’– योग के लिए योगी को, ‘प्रियाय प्रियवादिनम्’– प्रेमहेतु प्रिय वक्ता को, ‘सन्धये जारम्’– सुलहहेतु वृद्ध व्यक्ति को, ‘क्षेमाय विमोक्तारम्’– कल्याणहेतु मुक्तिदाता को, ‘भूत्यै जागरणम्’– उन्नति के लिये जागरण को, ‘वृद्धयै अपगल्भम्’– अभ्युदय-हेतु गर्वहीनता को वरण करना चाहिये। इन मन्त्रों में प्रयुक्त मुक्तिदाता या योगी कोई जाति नहीं है। वृद्ध कोई जाति नहीं है। जागरण, गर्वहीनता इत्यादि भी कोई जाति नहीं हैं।
इन मन्त्रों में नरमेध देखनेवाले लोग ‘ब्रह्मणे ब्राह्मणं आलभते’ का अर्थ लगाते हैं कि ज्ञान के लिये ब्राह्मण की बलि चढ़ाना चाहिये। यहाँ ‘आलभ्’ का अर्थ हनन करना उचित नहीं है बल्कि आशय है कि ज्ञान के लिये ज्ञानी के पास जाना चाहिए, उसका आश्रय लेना चाहिये, उसके प्रति समर्पित होना चाहिये। यह तो वर्णन-शैली का चमत्कार है कि जो ब्राह्मण की विद्या लेना चाहता है वह अपना मस्तक काटकर ब्राह्मण का मस्तिष्क ले ले, अपने मस्तिष्क की रूढ़ियों का त्याग करके विचारों को अपने में ढाल ले। यही सन्त कबीर कहते हैं- ‘यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं। सीस काटि चरननि धरै, तब पैठे घर माहिं।।’ विद्वतजनों से अनुरोध है कि इन मन्त्रों पर और अधिक विचार करें तथा इनका जातिवाचक तथा नरमेधवाचक सन्दर्भ न गढ़ें।
ऐसे ही असंगत अर्थ गीता के ‘धर्मविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।’ (७/११) का भी देखने को मिलता है कि धर्मानुकूल काम अर्थात् ऋतुकाल में अपनी पत्नी से पुत्र की उत्पत्तिहेतु मैथुन करना धर्म है- ‘ऋतौ च मैथुनं धर्म्यं पुत्रोत्पत्ति निमित्ततः।’ वे कहते हैं कि ऐसी आज्ञा तैत्तिरीय उपनिषद् की शीक्षावल्ली के नवम तथा एकादश अनुवाक् में है। इसलिये ऐसा न करने से पाप पड़ता है। शांकर भाष्यकार के अनुसार प्राणियों की जो कामना शास्त्र के अविरुद्ध है, जैसे- देह धारण मात्र के लिये आवश्यक खाना-पीना, विषय-भोग करना इतना भगवान की आज्ञा है। गीता में है धर्म-अविरुद्ध तो इन्होंने कर दिया शास्त्र-अविरुद्ध। देह धारण भर के लिए खाना-पीना, विषय-भोग अपने मन से जोड़ दिया। तब तो सभी दरिद्र जो येन केन प्रकारेण देह धारण भर के लिये भोजन-वस्त्र भी जुटा नहीं पाते हैं- भगवान की विभूति हैं? कदाचित् इसीलिए भगवान को दीनबन्धु या दरिद्र नारायण कहा जाता हो।
यदि गीता का यही अर्थ है, तो इससे बड़ा अनर्थ क्या होगा? इसका तो सीधा-सा अर्थ है कि परम धर्म है परमात्मा। उसके अविरुद्ध अर्थात् अनुकूल कामना अर्थात् परमात्मा की प्राप्ति की कामना भी भगवान की देन है। कामनाएँ सभी बुरी हैं, केवल एक को छोड़कर और वह है एक परमात्मा को प्राप्त करने की इच्छा! भगवान गीता में कहते हैं- ‘मां इच्छाप्तुं धनंजय!’– मेरी प्राप्ति की इच्छा कर।
इसी प्रकार कर्म की मनोरंजक व्याख्या गीता के तथाकथित शांकरभाष्य में देखें। अध्याय ३/१४ में लिखते हैं- ‘ऋत्विग्यजमानयोः च व्यापारः कर्म’– ऋत्विक और यजमान के व्यापार का नाम कर्म है, इस कर्म से यज्ञ की उत्पत्ति होती है। अध्याय ४/१२ में लिखते हैं कि वर्ण और आश्रम कर्म हैं- ‘मानुषे लोके वर्णाश्रमादि कर्माधिकारं’ जबकि गीता में आश्रम-व्यवस्था जैसा कोई शब्द आया ही नहीं है। अध्याय ८/३ में भाष्यकार महोदय लिखते हैं- ‘देवतोद्देशेन चरु पुरोडशादिः द्रव्यस्य परित्यागः स एष विसर्ग लक्षणो यज्ञः कर्मसंज्ञित एतस्माद् हि बीजभूताय वृष्ट्यादि क्रमेण स्थावरं जंगमानि भूतानि उद्भवन्ति।’ अर्थात् देवता के उद्देश्य से चरु पुरोडश आदि हवन करने योग्य वस्तुओं का त्यागरूपी यज्ञ कर्म नाम से कहा जाता है, जिससे वृष्टि आदि के क्रम से समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं। स्पष्ट है कि इन भाष्यकार महोदय ने जिसे कर्म और यज्ञ बताया, गीता में वह है ही नहीं।
भाष्यकार के मनोगत भाव तैत्तिरीय उपनिषद् के शीक्षावल्ली के ग्यारहवें अनुवाक् में उभरकर सामने आ गये हैं। वहाँ है- ‘ये केचास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः, तेषां त्वयाऽऽसने न प्रश्वसितव्यम्।’ अर्थात् हममें जो श्रेयमार्गी ब्राह्मण हों उन सबका तुझे आसनादि से सत्कार करना चाहिए। इनका शांकरभाष्य देखें- ‘ये के च विशेषिता आचार्यत्वादि धर्मेरस्मदस्मतः श्रेयांसः प्रशस्यतरास्ते च ब्राह्मणा, न क्षत्रियादयः तेषामासनेनासन दानादिना त्वया प्रश्वसितव्यम्’ कि आचार्य इत्यादि धर्मों के कारण जो कोई हमसे श्रेष्ठ हैं और ब्राह्मण भी हैं- क्षत्रिय आदि नहीं हैं, उन्हीं का आसनादि द्वारा सत्कार करना चाहिए।
पूज्य आदि शंकराचार्यजी के नाम से प्रचलित इन भाष्यों को देखकर ही स्वामी विवेकानन्दजी ने उनके प्रति कहा- ‘‘शंकर की बुद्धि क्षुरधार के समान तीव्र थी। वे विचारक थे और पण्डित भी; परन्तु उनमें गहरी उदारता न थी और ऐसा अनुमान होता है कि उनका हृदय भी उसी प्रकार था। इसके अतिरिक्त उनमें ब्राह्मणत्व का अभिमान बहुत था। एक दक्षिणी पुरोहित-जैसे ब्राह्मण थे और क्या! अपने वेदान्त भाष्य में कैसी बहादुरी से समर्थन किया है कि ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य जातियों को ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकता। उनके विचार की क्या प्रशंसा करूँ? विदुर का उल्लेख कर उन्होंने कहा कि पूर्वजन्म में ब्राह्मण-शरीर होने के कारण वह (विदुर) ब्रह्मज्ञ हुए। अच्छा, यदि आजकल किसी शूद्र को ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो, तो क्या शंकर के मतानुसार कहना होगा कि पूर्वजन्मों में वह ब्राह्मण था? ब्राह्मणत्व को लेकर ऐसी खींचातानी करने का क्या प्रयोजन?… फिर उनका हृदय देखो, शास्त्रार्थ में पराजित कर कितने बौद्ध-श्रमणों को आग में झोंककर मार डाला। शंकराचार्य के ये कार्य संकीर्ण दीवानेपन से निकले हुए पागलपन के अतिरिक्त और क्या हो सकते हैं?…’’ (विवेकानन्द साहित्य, खण्ड ६, पृष्ठ ८१-८२)
वस्तुतः वेद तथा महापुरुषों के नाम से प्रचारित भाष्यों में अनेक प्रक्षिप्त अंश हैं, अतः उन आदरणीय पूर्वजों का नाम उछालने के स्थान पर उनसे सार उपदेश लेकर अपनी और समाज की उन्नति करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास ही श्रेयतर है। जो जाति आत्म-चिन्तन छोड़ ग्रन्थों से चिपक बैठ जाती है, उस पर मुर्दे शासन करते हैं। वह जीवन्त नहीं रह सकती। सुविज्ञजनों से विनम्र निवेदन है कि वेद के नाम पर आतंक फैलाकर घृणित स्वार्थ-साधन बन्द करें।
पहले सनातन के नाम पर छुआछूत धर्म था। किसी को छूने से, पानी पीने से, उसके हाथ का एक ग्रास चावल खाने से धर्म नष्ट हुआ मान लिया जाता था। कभी देववाणी संस्कृत को छोड़कर ग्रामीण भाषा में शास्त्र-रचना अधर्म था। कभी समुद्र पार की यात्रा करना अधर्म था। इसके लिए कितनों को धर्म से बहिष्कृत कर दिया गया। आज तो बड़े-बड़े धर्माचार्य तक बीमार होने पर दूसरे का रक्त चढ़वा लेते हैं। सबने सबको छू लिया, सबके साथ खा लिया। कोई धर्म-बहिष्कृत नहीं होता।
ले-देकर धर्म के नाम पर बची है गाय! उसकी धार्मिकता प्रमाणित न कर पाने पर मस्तराम ने दुहाई दी है स्वामी दयानन्दजी की और हवाला दिया है कि १८५७ ई. की क्रान्ति गाय की चर्बी के कारण हो गई थी तथा सिखों का ‘कूका आन्दोलन’ गाय की सुरक्षा के लिए था। सन् सत्तावन के स्वतन्त्रता संग्राम में प्रयोग तो सुअर की चर्बी का भी हुआ था, तो क्या सुअर धर्म हो गया? कितनी भ्रान्ति है कि हिन्दुओं के लिए शूकरावतार भगवान हैं; किन्तु मुसलमानों के लिए हराम! धर्म का राजनैतिक उपयोग करने पर ऐसा ही होता है। कभी रोटी के लिए क्रान्ति हुई है तो कभी टैक्स न देने के प्रश्न पर। इससे धर्म का क्या लेना-देना? गाय को धर्म बताने के लिए मस्तराम सिखों को प्रमाण मानते हैं; किन्तु जिन आदर्शों पर सिखधर्म टिका है, जैसे- एक ईश्वर की भावना, मूर्तिपूजा की निःसारता, वर्ण-व्यवस्था की व्यर्थता- इन सबकी ओर से मस्तराम ने आँख मूँद लिया है। गुरु नानक का प्रधान शिष्य मरदाना मुसलमान था; किन्तु मस्तराम इन आदर्श का अनुकरण नहीं कर सकते।
कूका आन्दोलन के नेता भाई रामसिंह का जन्म सन् १८२४ में भैणी नगर जिला लुधियाना में हुआ था। युवावस्था में यह महाराज रणजीत सिंह की सेना में रह चुके थे। इनके अनुयायी नामधारी या कूका कहे जाते हैं। कूका का अर्थ है कूक करनेवाला। इस पन्थवाले आराधना के समय सिर हिलाया और चिल्लाया करते हैं, अन्त में ‘सत् श्री अकाल’ कहकर भावावेश में भी आ जाते हैं। आरम्भ में यह पन्थ पुरोहितों के कर्मकाण्ड और सामाजिक बुराइयों के विरोध में बना, किन्तु बाद में यह अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतन्त्रता-प्राप्ति का आन्दोलन बन गया। रामसिंहजी ने पंजाब प्रान्त को २२ जिलों में बाँटकर अपनी ओर से अध्यक्ष बनाये तथा अंग्रेजी स्कूल, रेल, तार, डाक और अदालतों का बहिष्कार कराकर अपना निजि प्रबन्ध कराया। इनके अनुयायी खादी पहनते थे। ये गो-वध के विरुद्ध थे। इनके अनुयायियों द्वारा कसाइयों की हत्या किये जाने पर गुरु रामदासजी को रंगून (काला पानी) भेज दिया गया, जहाँ १८८५ ई. में उनका देहान्त हो गया। इस सम्पूर्ण प्रकरण से यह निष्कर्ष निकालना कहाँ तक उचित है कि गाय सनातन-धर्म है?
इसी प्रकार स्वामी दयानन्दजी के स्मरण के लिये मस्तरामजी साधुवाद के पात्र हैं, किन्तु दयानन्दजी ने भी ‘गो करुणानिधि’ नामक पुस्तिका गो-हत्या के विरुद्ध ही लिखा है। गाय की धार्मिकता या पूँछ पकड़ाकर वैतरणी पार कराने के ढोंग का समर्थन दयानन्दजी की किसी भी पुस्तक-पुस्तिका में नहीं है। आश्रम की पुस्तिकाओं में भी गाय की उपयोगिता तथा गोवंश के संवर्धन पर भरपूर बल दिया गया है। अतः अकारण यह दुष्प्रचार क्यों कि हम गाय-विरोधी हैं?
गायधर्म ढूँढ़ते-ढूँढ़ते बाबाजी दयानन्दजी की ‘गो करुणानिधि’ तक गये किन्तु आश्चर्य है कि ‘शंकराचार्यजी की हत्या कर दी गई थी’- यह प्रकरण स्वामी दयानन्दजी के विख्यात ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में उन्हें दिखायी क्यों नहीं पड़ा? बाबाजी की शब्दावली देखें- ‘‘शंकराचार्य की हत्या कर दी गई। यह बात केवल अड़गड़ानन्दजी ही जानते हैं, दूसरा कोई नहीं? जाने क्यों न! ईश्वर ने ट्रंकाल द्वारा उन्हें ही सूचित किया था, तो भला दूसरा कौन जान सकता है? कोई अर्द्ध-विक्षिप्त व्यक्ति ही ऐसा लिखेगा।’’
अब प्रस्तुत है ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के एकादश समुल्लास के शंकराचार्यजी की हत्या के सम्बन्ध में स्वामी दयानन्दजी के विचार- ‘‘जैनियों की जितनी टूटी मूर्तियाँ निकली हैं वे शंकराचार्य के समय में टूटी थीं। जैनियों के मन्दिर शंकराचार्य और सुधन्वा राजा ने नहीं तुड़वाये; क्योंकि उनमें पाठशाला करने की इच्छा थी। इतने में दो जैन, ऊपर से कथन मात्र वेदमत और भीतर से कट्टर जैन अर्थात् कपटमुनि थे; शंकराचार्यजी उन पर अतिप्रसन्न थे। उन दोनों ने अवसर पाकर शंकराचार्यजी को ऐसी वस्तु खिलायी कि उनकी क्षुधा मन्द हो गयी, शरीर में फोड़ा-फुन्सी होकर छः महीने के भीतर शरीर छूट गया।’’ जहर देकर मारने को हत्या नहीं, तो क्या सद्गति कहेंगे? सद्गति दिलाने के प्रयास में आजकल ब्रह्मरन्ध्र को हथौड़ी मारकर फोड़ने की प्रथा भी निकली है- यह किस शास्त्र में लिखा है? ऊसर मरन विदेश ताहू पर कुछ और….। कभी काशी में आरे से चीरना मुक्तिदायक माना जाता रहा, तो कभी प्रयाग में वट-वृक्ष से कूदकर प्राण देना मोक्षदायक माना जाता रहा, जिसे अंग्रेजों ने काट दिया तो धर्म के नाम पर क्रान्ति हो गयी। तुलना करें उन महान् सन्त से जिसने फटकार दिया इन आडम्बरों को- ‘जो कासी तन तजै कबीरा रामहिं कौन निहोरा।’ आदि शंकराचार्यजी का भी ऐसा ही एक श्लोक मिलता है-
सम्पूर्ण जगदेव नन्दनवनं सर्वेऽपि कल्पद्रुमा
गांगंवारि समस्तवारिनिवहाः पुण्याः समस्ताः क्रियाः।
वाचः प्राकृत संस्कृताः श्रुतिशिरो वाराणसी मेदिनी
सर्वावस्थिरस्य वस्तुविषया दृष्टे परब्रह्मणि।
भाव यह है कि जिसने उस परब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है उसके लिये सम्पूर्ण जगत् ही नन्दनवन है, समस्त वृक्ष कल्पवृक्ष हैं, उसकी वाणी प्राकृत हो अथवा संस्कृत- वेद की सारभूत है, उसके लिये समस्त भूमण्डल काशीक्षेत्र है, सम्पूर्ण जल गंगाजल है; और भी उसकी जो-जो चेष्टायें हैं सब परमार्थमयी ही हैं।
* आश्रम की पुस्तिका में है कि परमात्मा एक है अतः पंचदेवोपासना गीताशास्त्र सम्मत नहीं है, तो आचार्यश्री ने उत्तर दिया कि शंकराचार्यजी ने पंचदेव स्तोत्र बनाया था जो बहुत ही प्रसिद्ध है। क्यों? शंकराचार्यजी दस देवस्तोत्र बनाते तो क्या दस देवता हो जाते? ‘बाबावाक्य प्रमाणम्’ कहकर कितने लोगों से मनवायेंगे? बृहदारण्यक उपनिषद् के तृतीय अध्याय, नवम ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य और शकल्य का संवाद ही देवताओं की गणना को लेकर है, जिसमें एक देवता, डेढ़ देवता, दो देवता, तीन देवता, छः देवता, तैंतीस देवता और तीन हजार छः सौ देवताओं की गणना है, सब-के-सब देवता मन के भीतर बताये गये हैं; किन्तु पंचदेवों का वर्णन वहाँ भी नहीं है। पंचदेवोपासना अतीत में धर्म के नाम पर बिखरे लोगों को संगठित करने का, एक करने का एक सत्प्रयास मात्र था।
* बाबा मस्तराम ने लिखा है, ‘सनातन धर्म स्वाभाविक है एवं अन्य मतों में फँसना विकार है’- इसके स्थान पर उन्हें लिखना चाहिए था कि धर्म स्वाभाविक है और मानव मात्र के लिए एक है। कैसा हमारा? कैसा आपका? कैसा अन्य का? धर्म के साथ सनातन शब्द लगाकर उसे सम्प्रदाय बना देना भी शंकराचार्यों की देन है।
पुनः उन्होंने लिखा है- ‘अनार्यजुष्ट, अमर्यादित, अशास्त्रीय, वर्णाश्रम-विरोधी आचार-विचार होने से गड़बड़ सम्प्रदाय भी विकार है।’ सुधीजन समझ गये होंगे कि बाबा मस्तराम ने गीता से यह विशेषण तो लिया किन्तु उचित प्रयोग नहीं कर पाये। गीता में है कि अर्जुन लड़ना नहीं चाहता था। उसने तर्क दिया था कि ऐसे युद्ध से कुलक्षय होगा, कुल की स्त्रियाँ दूषित होंगी, वर्णसंकर उत्पन्न होगा, पिण्डोदक क्रिया लुप्त हो जायेगी। यह प्रश्न अकेले अर्जुन का नहीं पूरे समाज का है। अधिकांश लोगों की तरह अर्जुन भी धर्म के नाम पर कुछ न कुछ मानता और करता था तथा उनकी रक्षा के लिये प्राण तक देने को तत्पर था; किन्तु भगवान ने अर्जुन के उन विचारों को कश्मल अर्थात् गन्दा, पापपूर्ण, ‘अज्ञान’ ठहराया-
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ।। (गीता, २/२)
अर्जुन ने कहा था- ‘सनातन जातिधर्म’, ‘सनातन कुलधर्म’, ‘पिण्डा-पानी धर्म’, तो भगवान ने इन सबको कहा- ‘अनार्यजुष्टम्’। आश्रम-धर्म गीता में कहीं है ही नहीं, जातिधर्म हो गया अनार्यजुष्टम् फिर आप जाति-पाँति, ऊँच-नीच, छुआछूत, मन्दिर-मस्जिद, उसमें घुसना न घुसना किस गीता से सिद्ध कर रहे हैं? गीता-जैसे उदार ग्रन्थ में इन संकीर्णताओं के लिए कोई स्थान नहीं है। गीता में अर्जुन का एकमात्र लक्ष्य है श्रेय की प्राप्ति।
* आश्रम की पुस्तिकाओं से अधूरा या तोड़-मरोड़कर उद्धरण देकर पूज्यश्री ने यह कहने का अवसर दे दिया कि उनका हृदय-पक्ष भी हम सबके साथ नहीं है। आश्रम की पुस्तिका में है कि केवल पोथी प्रमाण नहीं है, तो बाबाजी ने केवल शब्द छोड़कर घोषित कर दिया कि हम पोथी-प्रमाण नहीं मानते। गायवाली पुस्तिका में है कि मानस में गाय या उसका पर्याय कितनी बार उदाहरण के रूप में है, कितनी बार दान इत्यादि की वस्तु के रूप में है और कितनी बार यह इन्द्रियों के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है; किन्तु नास्तिकतावाली पुस्तिका में धर्मात्माजी ने लिख दिया कि गाय शब्द का अर्थ हम इन्द्रिय ही करते हैं।
इसी प्रकार वेद के कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड के प्रति कई आचार्यों के दृष्टिकोणों की चर्चा आश्रम की पुस्तिका में है; किन्तु महात्माजी ने उन मतों को भ्रमवश आश्रम का मान लिया और कई पृष्ठ तक उसका खण्डन करते चले गये। नास्तिकतावाली पुस्तिका में महात्माजी ने ‘व्यवसायात्मिका बुद्धि’ वाले श्लोक के प्रति दूसरे के विचारों को भी हमारा मान लिया और आस्तिकतावाली पुस्तिका में यद्यपि महात्माजी को इस भूल के लिये याद दिलाया गया फिर भी ‘नहला-दहला’ में वे उसे हमारा मत मानने से विरत नहीं हुए।
महात्माजी सर्वतन्त्र स्वतन्त्र हैं, समर्थ हैं इसलिये अपनी लिखी हुई बात से मुकर जाते हैं। कहते हैं कि उन्होंने व्याकरण-ज्ञान पर कहीं बल नहीं दिया है, वेद के लिये लिखा है। यद्यपि उनके इस कथन में भी विरोधाभास है; क्योंकि बिना व्याकरण-ज्ञान के अध्ययन कैसे होगा? फिर भी उन्हें नास्तिकतावाली अपनी पुस्तिका का पृष्ठ ट, पृष्ठ ४ इत्यादि का पुनरावलोकन कर लेना चाहिए जहाँ उन्होंने व्याकरण, ज्योतिष इत्यादि षडंगसहित वेद पढ़ने को कहा है। ऐसा भी उन्होंने वैदिक यज्ञों के लिये भी कहा है कि वे जरूरी नहीं हैं। पृष्ठ १२-१३ पर उन्होंने लिखा है कि ज्योतिष्टोम वाजपेय राजसूय इस समय नहीं हो पा रहा है, हो भी नहीं सकता और अनिवार्य भी नहीं है।
कहीं-कहीं इन महात्मन् ने सुधारने के लिये कुछ बताना चाहा; किन्तु जब बताया तो आश्रमीय विचारों का ही अनुवाद कर दिया। उदाहरण के लिये पूज्यश्री को खेद था कि भगवान ने महाराजजी को श्रौत और स्मार्त का अन्तर क्यों नहीं बताया? करुणा से द्रवित होकर महात्माजी ने अन्तर बताया, स्वतः और परतः प्रमाण था। किन्तु आस्तिकतावाली पुस्तिका के पृष्ठ १६ पर यह पहले ही लिखा जा चुका है- ‘प्रत्यक्ष वेदमूलो दर्शपौर्णमासादि श्रौतः। अनुमित शाखामूलः शौचमाचनादि स्मार्तः।’ महात्माजी ने इसके अतिरिक्त बताया है क्या? हमने संस्कृत का उद्धरण दिया और आपने उसी का हिन्दी अनुवाद कर दिया। यह तो भाषा-शैलीगत भेद हैं, भावगत नहीं। पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में इसी को दूसरे शब्दों में कहा गया है कि वेद और ब्राह्मण-ग्रन्थों में बतायी हुई पूजा श्रौत कही जाती है, वाशिष्ठ-पद्धति के अनुसार की जानेवाली पूजा को स्मार्त कहते हैं तथा पांचरात्र में बताया गया विधान आगम कहलाता है। अब इसे क्या कहेंगे? जब लिखित तथ्यों में आप इतनी धाँधली कर सकते हैं, निराधार आरोप मढ़ सकते हैं फिर मौखिक का तो भगवान ही मालिक है।
अन्त में यज्ञ-सम्बन्धी प्रकरण पर विचार अपेक्षित है। ‘नहला-दहला’ पुस्तिका में आचार्यप्रवर ने लिखा है कि वैदिक यज्ञ इस समय नहीं हो रहे हैं, हो भी नहीं सकते। लाखों की दक्षिणावाले ये यज्ञ भारत-जैसे दरिद्र देश के लिये हैं भी नहीं, जहाँ का सोना विदेश चला जा रहा है। इनकी अनिवार्यता कहीं भी शास्त्रों में नहीं दी गई है। अनिवार्य तो पंचयज्ञ हैं, जिन पर कोई आक्षेप नहीं कर सकता। इत्यादि….. (पृष्ठ १२-१३)
इन वाक्यों की समीक्षा के पूर्व मस्तराम बाबाजी की नास्तिकतावाली पुस्तिका का अवलोकन आवश्यक है, जिसमें पृष्ठ १४ पर वह स्वयं श्रौतयज्ञ, स्मार्तयज्ञ, गीता के चौदह प्रकार के यज्ञ, अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमास तथा लक्षाहुत यज्ञों को करना धर्म बता चुके हैं। आश्रम की पुस्तिकाओं में वैदिक यज्ञों का जटिल विधि-विधान बताया गया, तो उन्होंने लिख दिया कि वैदिक यज्ञ जरूरी नहीं हैं। एक ओर कहते हैं वेद जानना जरूरी है, यहाँ कहते हैं कि यज्ञवाला भाग जरूरी नहीं है। लाखों की दक्षिणा के बिना वैदिक यज्ञ नहीं हो सकता! कैसी भ्रान्ति है? विचारणीय है कि क्या अब यज्ञ करना जरूरी नहीं है? वैदिक यज्ञ किसी सतयुग के लिये ही थे?
यदि आचार्यश्री का यह कथन मान लिया जाय, तो उन अनेक मन्त्रों का क्या होगा जिनमें यज्ञ करना जरूरी बताया गया है। वेद यज्ञ करने की आज्ञा देता है। यावज्जीवं अग्निहोत्र यावज्जीवं दर्शपौर्णमासाभ्याम् यजेत्। वशिष्ठ धर्मसूत्र उपनिषद् में है कि तीन वैदिक अग्नियाँ (आवहनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि) प्रज्ज्वलित करना और उनमें दर्श, पौर्णमास, अग्रयण इष्टि, चातुर्मास्य, पशु एवं सोमयज्ञ करना अनिवार्य है। इन तीन अग्नियों को त्रेता भी कहते हैं। इनके अतिरिक्त भोजन बनानेवाली अग्नि को लौकिक अग्नि तथा सभ्य लोगों के घर शीत हटानेवाली अग्नि को साभ्य अग्नि कहते हैं। जिनके घर में यह पंचाग्नि रहती है उसे पंक्तिपावन ब्राह्मण कहा जाता है- कितनी भ्रान्ति है!
इन कर्मकाण्डों से भिन्न यज्ञ का विशुद्ध स्वरूप वेद तथा तदनुसार गीता में है। यह भी है कि जो यज्ञ नहीं करता उसके लिये मनुष्य-शरीर, लोक-परलोक कुछ भी नहीं है और मस्तराम बाबाजी लिखते हैं कि अनिवार्य नहीं है। जबकि गीता में है कि यज्ञ, दान और तप किसी भी अवस्था में त्यागने योग्य नहीं हैं। यह अवश्य है कि गीता का यज्ञ स्वाहा बोलनेवाला यज्ञ नहीं है बल्कि मन और इन्द्रियों से होनेवाला है, एकान्त स्थान में शान्तिपूर्वक बैठकर अकेले-अकेले किया जानेवाला है। बाहर की वस्तुएँ उसमें नहीं लगतीं। अमीर-गरीब का उसमें प्रश्न नहीं है। हिन्दू-मुसलमान-ईसाई-पारसी-यहूदी कोई भी हो, गीतोक्त यज्ञ में प्राणिमात्र का अधिकार एक समान है।
मस्तरामजी के शब्दों में वैदिक यज्ञ अनिवार्य नहीं रह गया, अनिवार्य हो गया पंच महायज्ञ। वैदिक यज्ञ तो बेचारे यज्ञ ही रह गये, ये बन गये हैं महायज्ञ, तो इस पर भी विचार कर लेते हैं। पहली बात यही है कि पंचयज्ञ शब्द वेद में नहीं है, उत्तरकालीन व्यवस्थाकारों की व्यवस्था है। कहते हैं कि पंचयज्ञों को नित्य करने की आज्ञा है; किन्तु नित्य तो बहुत से कर्म किये जाते हैं, जैसे- मैत्र कर्म (मल-मूत्र त्याग), दन्तधावन, स्नान इत्यादि, तो क्या ये धर्म हो गये? ये सब स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के नियम हैं, इन्हें धर्म कहने के लोभ का अब तो संवरण कीजिये।
जिन पाँच को महायज्ञ कहते हैं, उनके बारे में स्मृतिग्रन्थों में है कि वेद का अध्ययन और अध्यापन ब्रह्मयज्ञ है। देवता का नाम लेकर ‘स्वाहा’ शब्द बोलते हुए अग्नि में हवि डालना देवयज्ञ है। आजकल होम इत्यादि का कार्य केमिकल अगरबत्तियों से भी चल जाता है। तर्पण पितृयज्ञ है। पके भोजन का एक अंश निकालना भूतयज्ञ या बलि वैश्वदेव है तथा अतिथि-पूजन नृयज्ञ है।
सूत्र एवं स्मृतिग्रन्थों में इन पाँच यज्ञों की अनिवार्यता का कारण बताया गया है कि प्रत्येक गृहस्थ १. चूल्हा, २. चक्की, ३. झाड़ू, ४. ऊखल, मूसल, सूप और ५. जल के लिये घड़ा रखने के लिए स्थल का प्रयोग करता है। इन पाँचों स्थानों में हिंसा होती है जिससे बचने के लिये इन पाँच महायज्ञों को करना चाहिये। हारीति धर्मसूत्र को श्रद्धापूर्वक सुनने का प्रयास करें, जिसके कुछ अंशों का अनुवाद इस प्रकार है-
‘अब हम सूनाओं की व्याख्या करेंगे। ये सूना इसलिये कही जाती हैं कि चल-अचल प्राणियों की हत्या करती हैं। पहली सूना वह है जो अचानक जल में प्रवेश करने, जल में डुबकी लेने से, जल में थपेड़े देने से, वस्त्र से बिना छाने पानी पीने से, गाड़ियों को चलाने से होती है। दूसरी वह है जो अन्धकार में इधर-उधर चलने से, जाने-अनजाने कीड़े-मकोड़े पर चढ़ जाने से होती है।’…. इत्यादि।
कहना न होगा की यह व्यवस्था जीवन की प्रत्येक क्रिया को हत्या घोषित कर, भोलीभाली जनता को आतंकित कर दान लेने के क्षेत्र को विस्तृत बनाने की योजना मात्र है। इसका तो यह भी अर्थ निकलता है कि जो लोग इन पाँच हत्यास्थलों से काम नहीं लेते, उनके लिये पंचयज्ञ बेकार है। जल निगम के नलों के समक्ष जलघटों का प्रयोग शिथिल पड़ता जा रहा है। नदियों-तालाबों में स्नान, थपेड़े देना कम हो चला है। ऊखल, मूसल, चक्की कितने घरों में हैं? पंचयज्ञों के पीछे यही कारण थे तो इन कारणों को समाप्त ही समझिये।
वास्तविकता तो यह है कि ये पंचयज्ञ सरल वैदिक यज्ञ के नाम पर कर्मकाण्डों के घुस जाने की प्रतिक्रिया में बनाये गये हैं। जटिल क्रियाओं को न कर पाने पर भी यज्ञ करने का सन्तोष हर मानव को दिलाना इसके व्यवस्थापकों का उद्देश्य था। इन पाँचों कर्त्तव्यों में व्यावसायिक पुरोहित और पुष्कल दक्षिणा का प्रश्न नहीं है, वेदमन्त्र पढ़ने न पढ़ने के अधिकार का प्रश्न नहीं है, ब्राह्मण और शूद्र का प्रश्न नहीं है। वैदिक यज्ञों की प्रेरणा है- स्वर्ग, सम्पत्ति, पुत्र आदि की कामना जबकि पंचयज्ञ द्वारा प्रयास है कि सम्पूर्ण विश्व के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन! अग्नि में एक समिधा देकर भी हम-आप परमात्मा के प्रति श्रद्धा-निवेदन कर सकते हैं, वायुमण्डल शुद्ध कर सकते हैं, दो-एक श्लोक मात्र पढ़कर प्राचीन ऋषि साहित्य एवं संस्कृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर सकते हैं, एक अंजलि जल से पूर्वज की प्रिय स्मृति को जीवित रख सकते हैं, भोजन के एक ग्रास से अशक्त मनुष्यों, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़ों तक के प्रति मानव के गुरुतर दायित्व का बोध कर सकते हैं। इसलिये कहा था ऋषियों ने कि जो अकेले खाता है, पाप खाता है। उस युग-जमाने में यातायात के साधन विकसित नहीं थे। प्रचुर मात्रा में भोजन-वस्त्र लेकर पैदल यात्रा करना पूरे समाज की एक समस्या थी। इस असुविधा को दूर करने के लिये तथा विचरणशील महात्माओं की व्यवस्था के लिये मनीषियों ने अतिथि-सत्कार को भी किसी कर्मकाण्ड से कम नहीं माना।
पंचयज्ञ नाम से प्रचलित इन व्यवस्थाओं में इतिहास है, कृतज्ञता ज्ञापन है, सम्मान है, प्रिय स्मृति है, सहिष्णुता एवं उदारता भी है; किन्तु इसे रूढ़ि या ढोंग बना लेना धर्म कदापि नहीं है। सुविज्ञजनों से अनुरोध है कि ‘धर्म’ शब्द को उस मूल रूप में ही रहने दें जो विश्वभर के मानवमात्र के लिए एक है, जिसकी निर्धारित क्रिया का वर्णन भगवान श्रीकृष्ण की गीता में है।
संसार भर के मनुष्य (चाहे वे जिस मज़हब के हों) विचार करें तो पायेंगे कि उनके विभिन्न महापुरुषों ने सत्य की जिन रश्मियों से उनका परिचय कराया है वे सब की सब अकेले गीता में पहले से ही देदीप्यमान हैं। यह देखकर गीता के प्रति उनका आदर तथा विश्वास और भी बढ़ जाना चाहिए कि जो कुछ उनके महापुरुषों को कहने का अवसर नहीं मिला वह सब भी गीता में अविकल रूप से संकलित तथा सुरक्षित है। गीता उनके अधूरे अन्वेषण-क्रम को पूर्णता की ओर ले जानेवाली अमूल्य निधि है। काल-भेद से इन सभी धर्मों तथा उनकी व्याख्याओं में विकृतियाँ भी आ गई हैं और उन सबका समाधान है- ‘यथार्थ गीता’।
विश्व में अन्य कोई भी धर्मशास्त्र नहीं है जिसमें परमात्मा की शोध में तत्पर व्यक्ति के लिये उपयोगी साधनों का, सावधानियों का एक ही स्थान पर इतना क्रमबद्ध वर्णन हो, जैसा गीता में हैै। विश्व में जितने भी धर्मग्रन्थ हैं, सब मिलकर भी गीता द्वारा निरूपित सत्य की दूरस्थ प्रतिध्वनि मात्र हैं। सत्य को सही-सही देखना है, नजदीक से देखना है, ठीक-ठीक जानना है तो गीता के आलोक में देखें।
गीता आपकी है, आपके लिये है। इसकी अवहेलना आपकी अपनी ही अपूरणीय क्षति है। यह धर्म की परिमार्जित पुस्तक है, प्राचीन किताब है। बाद में वही ईश्वर मूसा में बोला, ईसा में बोला, महावीर-बुद्ध-मुहम्मद-नानक और कबीर में बोला; किन्तु गीता तो परमात्मा की पहली आवाज है। इसका आदर करके आप खुदा की पहली आवाज का आदर कर रहे हैं।
गीता का सन्देश केवल ईमानवालों के लिये नहीं है, दुराचारियों के लिये भी है। केवल इजरायलियों के लिये ही नहीं अपितु विश्वभर के लोगों के लिये है। संसार के अनेक धर्मग्रन्थों में भविष्यवाणियाँ हैं, जादू-टोने हैं, सामाजिक व्यवस्थायें हैं, ईश्वर द्वारा किये गये उपकारों का विवरण है, चमत्कारों की चकाचौंध हैं, जिन पर आधुनिक विज्ञान प्रश्नचिन्ह लगाता जा रहा है; किन्तु गीता के सिद्धान्त नितान्त आध्यात्मिक हैं, निर्विवाद हैं। किसी धर्मग्रन्थ में ईश्वर बात-बात में हजारों स्वर्ग और नरक की चेतावनी देता दिखाई देता है तो किसी में अच्छी फसल-भोगों का प्रलोभन; किन्तु गीता में परमात्मा आपसे अन्तरंग मित्र की तरह मिलता है, परामर्श देता है, आपके समीप आ जाता है और अन्ततः अपने जैसा बना लेता है। अतः धर्म के क्षेत्र में इस महान् ग्रन्थ से प्रेरणा लें और परमात्मा से तादात्म्य स्थापित करने की दिशा में अग्रसर हों।
गीता को लेकर पूज्य श्री मस्तराम को स्वयं भी कोई सन्देह नहीं हैं; किन्तु इन प्रश्नों को उन्होंने जगत्-हित में उठाया और आप सबने धैर्यपूर्वक यह सब पढ़ा-सुना, एतदर्थ हम विनयानत हैं।
।। बोलिये श्री गुरुदेव भगवान की जय।।
(‘शंका-समाधान’ से उद्धृत)