पिण्डदान

पिण्डदान

।। बोलिये श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय।।

आज आपमें से किसी ने पूछा है कि पिण्डदान उचित है या अनुचित? आजकल पितृपक्ष चल रहा है। हमें यह देखना है कि पितृपक्ष क्या है? पूरे संसार में किसी न किसी रूप में लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते ही हैं। आज हम देखेंगे कि इसका औचित्य क्या है?

पिण्ड माने केवल भोजन होता है, उदक माने पानी होता है तो पिण्डोदक…। बुद्धकाल में मागधी भाषा जोरों पर थी। उन दिनों जो महात्मा भिक्षा करने जाते थे, वे बोलते थे- पिण्डपात करने जा रहे हैं। और कोई महात्माओं को भोजन करावे तो उसको पिण्डकश्रेष्ठी, पिण्डदान करनेवाला श्रेष्ठी, भोजन करानेवाला श्रेष्ठी, अनाथपिण्डक। तो पिण्डपात करने जा रहे हैं, आज कहते हैं, भिक्षा करने जा रहे हैं। जब हम खाने लायक हैं तो हमें भोजन चाहिए। जब हम खाने लायक नहीं हैं…. एक शरीर छूटा, दूसरा शरीर मिला, बीच में ऐसा कोई रिक्त स्थान नहीं जहाँ तुम्हारे पूर्वज पड़े हों और वह भी तुम लोगों से आस लगाये हों कि आओ भइया! भोजन दो, नहीं तो गया प्राण… ये मध्यकाल में लिखी गयी स्मृतियों की व्यवस्था थी जिसे अतिरंजित कर दिया गया।

ये शरीर छूटा, वो शरीर मिला। बीच में ऐसा कोई गड्ढा नहीं जहाँ पूर्वज पड़े हों। और अच्छी अवस्था है हमारी, सात्विक गुण का कार्यकाल है, स्तर उन्नत है तो देव इत्यादि उन्नत योनियाँ पा जायेगें। भजन पूरा हो गया तो स्थिति पा जाओगे। मध्यम है तो मनुष्य जन्मोगे। निम्न है तो पशु इत्यादि का जन्म होगा। हर हाल में जन्म होगा तो दाल-रोटी कौन खायेगा?

पूर्वजों ने यह व्यवस्था इसलिए दी थी कि यह हमारी संस्कृति है कि माता-पिता, दादा… इनके प्रति हमारी अटूट श्रद्धा बनी रहे, श्रद्धा का सूत्र कभी न टूटे, वृद्धावस्था में किसी प्रकार का कष्ट न हो, अपना दायित्व समझकर लोग लगें। यह हमारी संस्कृति है।

दान एक ऐसी वस्तु है, जेन केन बिधि दीन्हे दान करइ कल्यान– किसी भी विधि से कर दो, दान तो कल्याण ही करता है। समाज इकट्ठी हो, फलाने स्वजन हमारे बीच से चले गये, सत्पुरुष थे, ऐसे थे, वैसे थे, आज एक खम्भा टूट गया। जब नेता लोग मरते हैं तो कितनी लच्छेदार भाषा बोलते हैं- ओह हो…. पार्टी का एक स्तम्भ उखड़ गया, हम अनाथ हो गये। और भीतर-भीतर कहते हैं- भले ससुरा चला गया, सीट खाली हो गयी। और कर क्या रहे हैं! सब बनावटी बोल रहे हैं। लेकिन आपका कोई स्वजन मरता है, जिस घर में, परिवार में, जिस माहौल में तो घड़ियाली आँसू नहीं रोते। वह सचमुच के आँसू होते हैं, वो वेदना के आँसू होते हैं। उनकी वेदना को सांत्वना दिया लोगों ने, उसके लिए दान-पुण्य कर दिया। इस परम्परा से आपका भी वही होगा। बुढ़ौती तो सबको आना ही आना है। ये हमारी संस्कृति है। इस बहाने से दान-पुण्य कराया, भागवत कथा करवायी। महत्व कथा का है, चिन्तन का है।

प्रत्येक काण्ड पर, घटना पर जाकर पुर का हित करनेवाला -पुरोहित- आपको ये बताता है कि मनुष्य क्या है?, हमें भजन किसका करना है?, कैसे करना है? कर्त्तव्य का बोध कराना कर्मकाण्ड है। कर्त्तव्य का बोध कराना, दान-पुण्य करना, स्वजनों के प्रति श्रद्धाञ्जली देना – यह हमारी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें भजन भी छिपा हुआ है। जो हम दान-पुण्य और सुमिरन करते हैं, बस साधना के अंश हैं; किन्तु हमारा कोई पूर्वज गड्ढे में नहीं पड़ा है।

गुरु महाराज जब सती अनुसुइया पहुँचे। घनघोर जंगल में कोई नहीं… बियावान। सवा सौ साल पहले वहाँ एक महात्मा रहे, फिर चले गये धाम तो कुटिया उजड़ गई, एक तखत पड़ा हुआ था। गुरु महाराज उसी तखत पर बैठ गये। तखत से आवाज आई- ये हमारी जगह है। महाराज कहे- ये सूखा काठ बोल रहा है। कहता है, हमारी जगह है। दूसरे दिन ठीक रात के नौ बजे, दिया-बत्ती कुछ नहीं, न महाराज के पास माचिस है। एक कमण्डल है, एक छड़ी का टुकड़ा और कुछ नहीं। दूसरे दिन आवाज आई– हम पतित हो गये हैं, ये हमारी जगह है। तीसरे दिन आवाज आई– आपकी जगह नीचे है। तो महाराज बोले– पतित होने के बाद भी इतना जानते हैं कि हमारी जगह भी नीचे है तो कोई महापुरुष हैं। जब यह पतित ही हो गये हो तो हम उनकी जगह पर क्यों रहें, हम अपनी जगह पर जाएँ।

महाराज उठे और नीचे चले आए। एक ब्रह्मशिला थी, उस पर बैठे तो भगवान ने संकेत दिया– नहीं, थोड़ा दक्षिण की ओर बढ़ जाओ। एक चबूतरे के किनारे बैठे तो शगुन मिला– थोड़ा उत्तर बढ़ जाओ। जब चबूतरे के बीच में आये तो आदेश हुआ कि बैठ जाओ। जब बैठ गए, तब भगवान ने समर्थन किया– जनम भर यहीं रहना है, आपकी जगह यही है।

चौदह उपवास हुए। खाना-वाना कुछ भी नहीं, भगवान कहें– बैठो तो बैठे हैं। आज्ञापालन ही तो भजन होता है, ईश्वर-पथ में खाली आँख मूँदना काम नहीं देता। लगे थे अपने श्वांस में। चौदहवें दिन पेशाब में खून जैसा कुछ प्रतीत हुआ…. लाल-लाल। महाराज को लगा, खून गिर रहा है, तब भगवान से कहा। महाराज बताते थे- हो, हमने कहा नहीं, झटके से मुँह से निकल गया, ‘इष्टदेव बने बैठो हो, घोर जंगल में लाकर पटक दियो, न कुछ खाये का, न कुछ पिये का। जब शरीर ही नहीं रहेगा तो भजन कौन करेगा?’ उस दिन भगवान ने कहा- ठीक है, जब खाना ही है तो कल से खाओ। महाराज कहें- भगवान कहें जब खाये के हैं तो कल से खाओ। तब महाराज घबड़ा गये कि भगवान ने रुखा वचन क्यों कहा कि जब खाये पे उतारु हो तो कल से खाओ। आखिर प्रभु हमसे चाहते क्या थे?

तब पुनः अनुभव में आया कि यदि तुम इक्कीस दिन न खाते तो जनम भर खाना न पड़ता। जैसे के तैसे बैठे रहते, रंचमात्र भी चेहरे पर शिकन न पैदा होती, प्रसन्नता न भंग होती, लेकिन तुम तो चूक गये। महाराज जब ये बात बतावें तो बाल उखाड़ के फेंक दे, बोले कि- का बताएँ, सात दिन तो बाकी रहा, उहो बीत जाता। भगवान भी इतनी कड़ी परीक्षा लेते हैं। का बताएँ, अरे! कह देवे के चाहत रहा- अरे बेटा! सात दिन और धीरज धर, तो भगवान का क्या बिगड़ जाता। फिर बहुत बिगड़ें अपने ऊपर।

महाराज ने बताया- हूँ… देखो, आज्ञापालन ही भजन है। भगवान कहते हैं- यहाँ बैठ, तो तुम्हारी जगह वही है। हो, खूनवा देख के हमें करुणा आ गई, नहीं तो कोई बात नहीं थी। मन में बड़ी प्रसन्नता थी। भूख नहीं सता रही थी।

दूसरे दिन महाराज ने सोचा- मैं खाऊँगा क्या! तो सिढ़ियों पर वहाँ जंगल में चना पड़ा दिखाई दिया, आधा मन… करीब २० किलो। दृष्टि पड़ते ही भगवान ने शगुन दिया- आज यही खाना है। कच्चा चना कोई कहाँ तक चबायेगा! एक मुट्ठी चबाकर पानी पी लिया। एक खप्पर था उसमें आधा किलो रख लिया। इतने में बंदर पेड़ों से उतर कर आये और टपाटप बीनकर खा गये। ये था भोजन। और फिर चला क्रम आकाशवृत्ति से। आकाशवृत्ति से ही महाराज की व्यवस्था होने लगी, कभी कोई कमी नहीं। न तो बँधा था, न भिक्षा करते थे, न करने देते थे। न खेत न क्यारी, न बाग न बगीचा। महाराज कहें- हो! मोर व्यवस्था भगवान करत हैं। और भगवान ही करते थे।

काफी समय बीत गया, महाराज ने पूछा- ये गिरे पड़े मकान किसके है? पच्चीसों खण्डहर पड़े हैं। तो लोग बोले- एक सिद्धबाबा थे। उन्हीं का ये आश्रम है। उनकी शिष्य-परम्परा में एक लड़का जीवित है। महाराज ने बुला लिया- क्यूँ रे! तू सिद्धबाबा का नाती है? तो वह बोला- हाँ महाराज!

वह गिलहरी जैसा मरियल गोरा-सा लड़का आया, तो महाराज बोले- अच्छा ठीक। क्या कर रहा है?

वह बोला- ठाकुरों के यहाँ पेट जियावत हूँ, और का करत हूँ।

महाराज बोले- तुम यहाँ रहो, तुम्हें खाना मिलेगा।

महाराज ने सोचा, एक साधु का भटका हुआ लड़का है, चलो कोई बात नहीं। तीसरे दिन वह बोला- महाराज! हुकुम हो तो ठाकुरों को बता आता कि मैं महाराज के पास हूँ। महाराज बोले- अच्छा, अच्छा! जाओ, कह के आना।

आया तो उतनी बड़ी एक लड़किया ले आया, कोई १५-१६ साल की, गिलहरी जैसी एक लड़की। महाराज बोले- इ कौन है रे? वह बोला- मोर मेहरिया है। महाराज बोले- धत तेरे ऐबी की! एकउ बार नहीं बताया कि हमरे पास मेहरिया भी है। भाग यहाँ से, अब नहीं जरूरत है।

अब लड़किया वहाँ बैठ के रोवे और लड़कवा उधर रोवे। महाराज कहे- हे भगवान! दया बिन सन्त कसाई, दया करी तो आफत आई। कहाँ हम दया में पड़ गए! ई तो फाँसी दे दिया। हल्ला हो गया चित्रकूट में चारों तरफ कि लगता है, महाराज के लड़का-लड़की या बेटवा-पतोहू आए हैं, महाराज का परिवार आया है।

महाराज ने तीन महीने में गाँव में उनकी जगह बनवाकर उन्हें गाँव भेज दिया। फिर महाराज के मन में विचार आया कि ये सिद्धबाबा प्राप्तिवाले महापुरुष हैं। जरा सा चूक गए। मरते समय परिवारवाले आ गए थे ढूँढते हुए। महापुरुष के पास कल्याण की आशा से बैठे हुऐ थे जो साधु, उनसे राग-द्वेष करने लगे। जो सदगुरु के पास कल्याण के लिए आया है, उसे प्रापर्टी से क्या मतलब! वो किनारे हो गये। तब सिद्धबाबा का शरीर छूटते ही गद्दी पर बैठा उनका भतीजा, दस महीने रहा और बोला- मैं इस लायक नहीं हूँ, और भाग गया। तो उसका छोटा भाई बैठा। दस ही महीने रहा, घनघोर जंगल, सिद्ध बाबा के चेलों ने ही उसको काट डाला। अरे, कोई धक्का देने से साधु होगा? अच्छा चरित्र नहीं रहा होगा, और क्या! फिर उसका छोटा भाई बैठा तो दो-एक औरत लेकर जंगल में पड़ा रहता था। गाँव के बाजू में, बगिया में, वह कभी आया ही नहीं था। उसी का एक लड़का यह था। तो महाराज कहे- तू असली दोगला है। एकउ बार नहीं बताया कि मोर बियाह हो गया है।

सिद्ध बाबा से भूल कुछ नहीं हुई। घरवाले आकर उनके आश्रम में टिक गए, उन्होंने मना नहीं किया – इतनी सी भूल हुई। साधु होना मरना बराबर है। और कोई हमारा है भी, लेकिन घरवालों के नाम पर कोई नहीं।

फिर महाराज भजन में लग गए, छः महीने तक सिद्धबाबा के लिए माला टाला, तब बोले- वह पार हो गए। तब उसको बुलाया लड़के को, बोले- देख! गया हो आ। वह बोला- गया में हमारी श्रद्धा नहीं है। तो महाराज बोले- तुम्हारी श्रद्धा से कुछ होनेवाला भी नहीं है, न गया में ही कुछ होनेवाला है। जो कुछ करना था, मैंने कर दिया। सिद्ध बाबा पार हैं। ई मर्यादा है रे, ये हमारा तीर्थ है, मर्यादा है, इसलिए तू जा। तीर्थ की मर्यादा रह जाएगी। देखा-देखी लोग आया-जाया करेंगे। ऐसा न होने से भष्टाचार फैलता है। तो वह बोला- महाराज! अकेले कैसे जाऊँ? महाराज के चरण दबा रहा था एक स्थानीय नाई भगत। महाराज बोले- इसको लेता जा।

अब पण्डित लोगों ने अड़ंगा लगाया- पहले गुरुमंत्र ले ले, तब जा। कई पंडित मंत्र देने को तैयार थे। बगैर मंत्र के गया में पिण्डा नहीं पड़ता। नाई बोला- ना! मैं मंत्र तो महाराज से लूँगा। वह भाग के आया, बोला- महाराज बगैर मंत्र के गया सिद्ध नहीं होता। पंडित फलाने-फलाने मंत्र दे रहे थे, मैं मंत्र नहीं लिया हूँ, हमें मंत्र दे दो। महाराज जी की गाली स्पेशल रहे, वही गाली बोल दिए। फिर बोले- ओम्, राम, शिव – एकाध नाम का जाप किया कर। इतने दिन सेवा करते हो गया, अभी मंत्र नहीं मिला।

वह गया पहुँचा तो पण्डा बोले- गुरुमंत्र बोलो। तब महाराज जो गाली दिए थे, नाई ने वही बोल दिया। तब पण्डा बोले- अरे! देखो हमें गरीयावत है। पण्डे फिर बोले- और कुछ कहे रहे महाराज? तो वह नाई बोला- ओम, राम, शिव – यहीं तीनों नाम कहे रहे। तो पिण्डा पार के लौट आये।

महाराज बोले- जा बेटा, सिद्धबाबा पार हो गए। अब इस तखत में कोई खराबी नहीं है, और न आश्रम में कोई खराबी है। आज से विघ्न खतम। अन्यथा कोई अच्छा संत आये तो सिद्ध बाबा न बोलें, कोई ढोंगी आकर बैठे तो दो हाथ मार के भगा दिया करें। स्वरूपस्थ महापुरुष सदैव अपनी गद्दी पर रहते हैं। हमारे गुरु महाराज भी आज हैं। अत्रि महाराज आज भी हैं। भगवान श्री कृष्ण हैं, राम हैं, कोई भी कहीं नहीं गया। कमी है तो हमारे श्रद्धा और समर्पण की। और भजन करने की सही विधि का कमी है। विधि है प्रेम। एक नाम का जाप करो। यह था गुरु महाराज का पिण्डदान।

रामचरितमानस के अनुसार, जब दशरथ की मृत्यु हो गई तो- सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।।– सरयू के किनारे बड़ी सजाकर चिता तैयार किया। लगता था, देवलोक तक पहुँचाने वाली सीढ़ी बनी हो।

      एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।।

इस विधि से दाह-संस्कार किया और विधिवत स्नान करके तिलांजलि दिया। हाथ में तिल लेकर, पानी लेकर तिलांजलि दिया। तेल में शरीर को डूबा दो तो वह शरीर महीना भर आप रखिए। भरत नहीं आये थे तब तक दशरथ के शरीर को तेल में डुबाकर रखा था। तो- ‘बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।’, फिर किया दान-पुण्य।

जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा।।

भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना।।

फिर हाथी, घोड़ा, गज, बैल, गाय सब दान कर दिया इस शुभ अवसर पर। भरत जब राम से मिलने गये चित्रकूट में और पिता का जब संदेश सुनाया तो राम भी विकल हो गये।

नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा।।

मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए।।

जब सुना कि दशरथ का शरीर छूट गया, सुनते ही राम जी ने दुसह’- असहनीय दु:ख प्राप्त किया। मुनिवर ने बार-बार राम जी को समझाया। सहित समाज सुसरित नहाए।अच्छी, पवित्र सरिता में सबने स्नान किया। बाद में, करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।।– जैसा वेदों में रीति-रिवाज का वर्णन है, वैसे ही पिता की क्रिया किया और राम हो गये पवित्र। भवसरिता से पार करने वाले राम स्वयं हो गये पवित्र। पातक तम तरनी’- पापरूपी अंधकार की नदी को पार कराने वाले राम पवित्र हो गये।

सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस।।

सारे तीर्थों का मन ही मन सुमिरन किया और इतने पवित्र हो गये जैसे गंगा में नहा लिये हों। अब चित्रकूट में कहाँ गंगा जी बैठी है? लेकिन मन से संकल्प करके उन्होंने स्नान किया।

जब गीध की क्रिया किया तब अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।’- ‘अबिरल भगति’- जो भक्ति कभी आपको बीच में न त्याग दे, मोक्ष देकर दम ले, ऐसी सदा रहने वाली स्थायी भक्ति का वरदान लेकर गीध हरि के धाम चले गये। तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम।।’- यथोचित क्रिया राम जी ने अपने कर-कमलों से किया।

सम्पाती के पंख जले हुए थे, समुद्र के किनारे पड़ा हुआ था एक कन्दरा में। जब बन्दरों ने संदेशा दिया कि आपका भाई जटायु माता सीता की रक्षा में रावण से लड़ा। वृद्ध होने की वजह से रावण थोड़ा बीस पड़ा, उसने वीरगति पायी।

सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बहुबिधि बरनी।।

      मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि।

      बचन सहाइ करबि मैं पैहहु खोजहु जाहि।।

मुझे समुद्र किनारे ले चलो, मैं अपने बंधु को तिलांजलि दूँगा। वचन से सहायता करूँगा। जिसको तुम खोज रहे हो, अवश्य प्राप्त कर लोगे।

अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा।।

पहले समुद्र के किनारे अनुज की क्रिया की, तिलांजलि दी और फिर बन्दरों को सीता का पता बताया। संपाति के जले हुए पंख उग गये, वह उड़ चला।

यह है हमारी परम्परा, रीति-रिवाज! इस शुभ अवसर पर दान देना और पूर्वजों को विधिवत स्मरण करना, उनसे कल्याण की मंगलकामना करना…. किन्तु मुक्ति कब हुई? केवट के पास जब राम पहुँच गये तो केवट बोला- प्रभो! बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।पर बगैर चरण धोये तो पार नहीं ले जाऊँगा। चरण की धुलाई किया, तो-

     पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।

     पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।

पहले भगवान के चरणों को धोया, फिर खुद जल पिया, पूरे परिवार को भगवान के चरणामृत का पान कराया, पितरों को पार किया और मुदित गयउ लेइ पार’- तब भगवान को बड़ा प्रसन्नचित, सफल मनोरथ होकर प्रभु को उस पार ले गया।

केवट के पूर्वज गंगा में ही मरे थे, गंगा में ही बहे थे, मुक्त कोई नहीं हुआ। मुक्त तब हुआ जब प्रभु के चरण की धुलाई किया, उसको खुद पान किया, परिवारों को पान करने को दिया और पितरों को दे दी वहीं अंजली। पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।– आज उसके पितर तरे। युगों से उसके पितर वहीं पर मरते-जीते थे गंगा जी के ही बीच में, लेकिन तरा कोई नहीं। वह पितर तरे तब जब केवट, उसके वंशजों ने राम के चरणों को धो लिया।

रावण जब मर गया, वही दशा रावण की हुई।

कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका।।

राम ने रावण को कृपादृष्टि से देखा, तब राम मुस्कुराये- इसके लिए शोक मत करो। ये हमारे धाम पहुँच गया, मेरे निवास पर पहुँचा। सारे शोक को त्याग दो, तुम केवल क्रिया करो। जो लोकरीति है, उसको करो- करहु क्रिया परिहरि सब सोका।

भगवान की कृपादृष्टि से ही रावण को मोक्ष मिला और भगवान ने कहा- निश्चिन्त हो जाओ, उसके लिए चिन्ता करो ही मत। हाँ, जो सामाजिक रीति है, वह क्रिया अवश्य कर डालो। तो, कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी।।’- भगवान के आदेश का पालन करके रावण की अन्त्येष्टि की गयी। विधिवत किया, देशकाल व परिस्थिति के अनुसार किया। कदाचित् झगड़ा न हुआ होता, लंका धूल में न मिली होती तो महाराजा रावण मरते तो क्रिया कुछ और ऊँचाई से होती। लेकिन देश, काल और परिस्थिति के अनुसार क्रिया किया अवश्य।

     मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि।

     भवन गईं रघुपति गुन गन बरनत मन माहि।।१०५

मंदोदरी ने भी तिलांजलि दी। स्त्री-पुरुष सभी तिलांजलि दिया करते थे। इस प्रकार ये जलांजलि, तिलांजलि मिली थी दशरथ को। राम जी ने भी वही किया गीध-क्रिया में। सम्पाती ने भी तिलांजलि दी, किन्तु पार तब हुए केवट के पूर्वज, पितर लोग तब पार हुए जब प्रभु के चरण धो लिये, और रावण तब पार जब भगवान ने कृपादृष्टि से देख लिया।

यह हमारी परम्परा है। यह सिद्ध होता है कि पूर्वजों के पीछे ये जलांजलि, तिलांजलि, पिण्डदान होता आया है। संसार भर के लोग किसी न किसी रूप में पूर्वजों का सम्मान करते ही हैं। पारसियों में सात दिनों तक मांस खाना मना है पूर्वजों की शान्ति के लिए, वो भी कर रहे हैं। मुसलमानों में चालीसवाँ होता है, बड़े-बड़े मकबरे बनाते हैं, उनकी याददाश्त और शान्ति के लिए। हिन्दुओं में गया पहुँचाते हैं, दान-पुन्य करते हैं। और कहीं-कहीं मिस्र इत्यादि में पिरामिड बनाकर, यहाँ जो सुख पा रहे हैं माता-पिता, आगे भी वह सुख पावें, तो भोग्य सामग्री उसके कब्र में ही बन्द कर देते हैं ताकि वहाँ सुखी रहें, खाते-पीते रहें, मस्त रहें। पूरे संसार में किसी न किसी रूप में अपने पूर्वजों को, अपने माता-पिता को श्रद्धांजलि तो लोग देते ही हैं।

युद्ध में वीरगति प्राप्त हुए सम्बन्धियों को युधिष्ठिर जलांजलि दे रहे थे, इतने में कुन्ती ने कहा- कर्ण को भी देना, वे तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता हैं। तो युधिष्टिर ने कहा- माते! वह सूतपुत्र हमारा ज्येष्ठ भ्राता भला कैसे हो गया? तब बताया कि नहीं, वह तुमसे भी ज्येष्ठ, तुम्हारे सगे भ्राता हैं। वह कौन्तेय है, सूतपुत्र राधेय नहीं है।

तब युधिष्ठिर बोले- माताजी, आपने यह छुपाया क्यों? वह बोली- लोकलज्जा बेटा। युधिष्ठिर को बड़ी ठेस लगी, वह बोले- माता जी, भाई के द्वारा भाई को मरवा डाला आपने। जाओ, मैं स्त्री-जगत को श्राप देता हूँ कि आज से स्त्रियों के मन में कोई बात पचेगी ही नहीं।

आज भी भले पति को फांसी हो जाय लेकिन स्त्रियों के मन में बात नहीं पचती। एक बार अकबर बोले- अरे बीरबल, ऐसी कौन मूर्ख होगी जो पति को फांसी लग जाये, ऐसी बात बतायेगी? कभी नहीं बतायेगी। बीरबल बोले- है तो जहाँपनाह ऐसा ही। अकबर बोला- तब हमें सिद्ध करके दिखाओ, प्रमाण चाहिए मुझे।

अकबर का साला बैठा था बगल में, खुसरो नाम था। बीरबल ने उससे पहले तू-तू-मैं-मैं किया। खुसरो बोला- तुम काफिर की जात, तुम्हें काट नहीं दिया तो मेरा नाम खुसरो नहीं। बीरबल ने कहा- मैं भी राजा हूँ, होगा तू बादशाह सलामत का साला, आज काट नहीं दिया तुम्हें तो मैं भी राजा नहीं। किया झगड़ा सबके बीच में और उसे इशारा कर दिया, वह जाकर सो गया।

बीरबल तमतमाकर पहुँचा घर, बोला- आज उस मियां को काट नहीं दिया तो मेरा नाम बीरबल नहीं। फिर बाहर निकल गया। थोड़ी देर में घूमकर आया बीरबल तो एक तरबूज में रंग भरकर, अपने राजकीय पोशाक का जो लम्बा वाला गमछा था, उसी में बाँधकर, ले जाकर खूँटी में टाँग दिया। उससे टपक रहा था बराबर खून… लाल रंग। औरत ने कहा- ये क्या? बीरबल बोला- हमने कहा था न आज कि वह होगा बादशाह सलामत का साला, मैं काट डालूँगा, उसकी गर्दन काट लाया हूँ। तुम किसी से बताना मत, नहीं तो कल हमारी गर्दन कट जायेगी, पूरा राजद्रोह है। अब मैं तुमसे ये बताता हूँ, मुझसे तो यह घटना घट गई। किसी से कहना मत, नहीं तो कल हमें फांसी हो जायेगी। ये बाल-बच्चे अनाथ हो जायेंगे, तुम भी मारी-मारी फिरोगी। वह बोली- मुझे कौन गरज पड़ी कि मैं किसी से बताऊँ! भला अपने घर का मैं कैसे विनाश कर सकती हूँ!

अब बीरबल की पत्नी को घर में चैन ही न पड़े। भागकर खेत में जाय, फिर बाहर आवे। पहले घर में बनने वाले आधुनिक शौचालय कहाँ थे। राजा हो चाहे प्रजा, जाना तो बाहर ही पड़ता था। दूसरी स्त्रियों ने पूछा- बहन जी, आज आप बहुत उखड़ी-उखड़ी लग रही हैं, बात क्या है? वह बोली- अरे पूछो मत, बात बताने लायक नहीं है। वे बोलीं- क्या हम पर विश्वास नहीं। आप जरा हमारे कान में कह दो। तो उसने कह दिया कि खुसरो का गला काटकर, बीरबल लाकर टाँगे हैं घर में। उन्होंने कहा- हम किसी से नहीं कहेंगे, आप बेफिकर रहो।

रात भर में तो पूरा क्षेत्र जान गया। सुबह बीरबल को हथकड़ियाँ पड़ गयीं। बीरबल ने कहा- हुजूर, किस जुर्म में मुझे हथकड़ियाँ पहनायी गयीं? इतने में बेगम साहिबा चली आईं कि इसको बस फाँसी पर लटकाओ हमारे सामने। बीरबल बोले- भाई, जुर्म क्या है? वह बोलीं- हमारे भाई का तुमने कत्ल किया। बीरबल बोले- प्रमाण क्या है? तो वह सिपाहियों से बोली- जाओ, सिर लेकर आओ बीरबल के घर से।

सिपाही गये, सिर ले आये। खोला तो उसमें था तरबूज। तब अकबर बोला- बीरबल, यह सब क्या है? तब बीरबल बोला- हुजूर, औरतों के मन में बात नहीं पचती। अकबर बोले- तो वह खुसरो कहाँ हैं? बीरबल बोला- साला जहाँपनाह का, भाई बेगम साहिबा का, इन्हीं के पास होगा और कहाँ होगा। पता लगाया तो बेगम साहिबा के बगल वाले कमरे में ठाठ से लेटा हुआ था। इसलिए युधिष्ठिर ने श्राप दिया था कि जाओ, आज से स्त्रियों के मन में कोई बात पचेगी नहीं अर्थात् जलांजलि की परम्परा पुरानी है। युधिष्ठिर ने अपने बन्धुओं तो तिलांजलि दी। भगवान राम ने अपने पिता दशरथ को जलांजलि दी। ये श्रद्धा-सुमन भेंट करना होता है जिससे पीछे आने वाली पीढ़ी अपने माता-पिता की सेवा करे, उनका आदर करे। इस परम्परा का निर्वाह करने लिए सुसंस्कार डाला है और यह उचित भी है। इसमें कोई खराबी नहीं है। ये बिल्कुल उचित है जिससे कि आबाल-वृद्ध पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुखी रह सके, स्नेहपूर्ण, सौहार्द्रपूर्ण जीवन व्यतीत कर सके। संसार में सौहार्द्र से बड़ा कोई धन नहीं है, कोई सम्पत्ति नहीं है।

हम संकल्प करके कुछ दे देते हैं, दान-पुण्य हो जाता है। ‘जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान।’ लेकिन ऐसा नहीं होता कि पूर्वज किसी गड्डे में पड़े हैं, पीछे आनेवाली पीढ़ी उनके भोजन-पानी की व्यवस्था करे – यह भ्रान्ति स्मृतिकारों की देन है। हमारे पूर्वज गड्ढे में कभी नहीं हैं। सारे के सारे गड्ढे में? हिन्दू हो भर जाओ तो पूर्वज गड्ढे में। वह गड्ढे में कभी नहीं रहते। इधर शरीर छोड़ा, उधर शरीर मिला, बीच में कोई रिक्त स्थान नहीं जहाँ पूर्वज गड्ढे में पड़े हों।

महाभारत युद्ध के समय अर्जुन भी घबड़ाया हुआ था, बोला- भगवन्! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा करें, मैं देख तो लूँ, मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है?

जहाँ रथ को खड़ा किया, अर्जुन लगा काँपने, बोला- प्रभु, मैं युद्ध नहीं करुँगा। कुलधर्म सनातन है, ‘जातिधर्माश्च शाश्वताः’- जाति-धर्म शाश्वत धर्म है। ऐसा युद्ध करने से शाश्वत धर्म, सनातन धर्म लोप हो जायेगा। फिर कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जायेंगी, वर्णसंकर पैदा हो जायेगा और वह वर्णसंकर कुल और कुलघातियों को नर्क में ले जाने के लिए होता है। पिण्डोदक क्रिया लोप हो जायेगी, पितर लोग गिर जायेंगे। हम लोग समझदार होकर महान पाप करने को उद्यत हुए हैं। केशव! क्यों न इस पाप से बचने के लिए हमें प्रयास करना चाहिए। फिर धनुष फेंक दिया, रथ के पिछले भाग में लेट गया, बोला- केशव! भले में शस्त्रधारी कौरव मुझे मार डाले, मरना श्रेयस्कर है किन्तु युद्ध नहीं करूँगा।

एक धार्मिक भ्रान्ति ने अर्जुन को मौत के मुहँ में ढकेल दिया। जिस दुर्योधन ने माता कुन्ती समेत इन सब भाइयों को लाच्छागृह में ढकेल दिया, जंगल में थे तो असुरों को नियुक्त कर दिया कि जब अर्जुन आँख मूँदकर भजन में बैठे तब इसको मार डालो। भला निहत्थे अर्जुन को वन में लेटा पाते तो छोड़ देते? एक धार्मिक भ्रान्ति ने अर्जुन को मौत के मुँह में ढकेल दिया। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-

     कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।

     अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।।

अर्जुन! तुझे इस विषम-स्थल में बने यह अज्ञान किस हेतु से उत्पन्न हो गया? न यह कीर्ति बढ़ाने वाला है, न ही कल्याण करने वाला है, न ही पूर्व वरिष्ठ महापुरुषों ने भूल से भी इसका आचरण ही किया है। तुझे यह अज्ञान किस हेतु से उत्पन्न हो गया?

अर्जुन ने सनातन धर्म की रक्षा का नाम लिया, शाश्वत धर्म की रक्षा के लिए प्राण देने को तैयार है, क्या धर्म के लिए प्राण-पण से खड़े हो जाना अज्ञान है? भगवान ने कहा- अर्जुन! न तो यह कीर्ति बढ़ाने वाला है, न ही कल्याण करने वाला है, न ही पूर्व महापुरुषों ने भूल से भी आचरण किया है। ‘अनार्यजुष्टम्’- यह अनार्यों का आचरण तुमने कहाँ से सीख लिया? तुझे यह घोर अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हो गया?

जिसको अर्जुन सनातन-सनातन कह रहा था, वह एक रूढ़ि थी, वह एक कुरीति थी। पिण्डोदक क्रिया भी अज्ञान। और कुलधर्म सनातन धर्म और जातिधर्म शाश्वत कह रहा था – अज्ञान। पिण्डोदक क्रिया का लोप होगा, ये अज्ञान। वर्णसंकर अज्ञान। तो ये सब के सब प्रश्न हैं। आखिर सत्य है क्या? तब अर्जुन ने समर्पण कर दिया- प्रभु, ये सब अज्ञान है तो मैं इसके आगे कुछ भी नहीं जानता। तो सिद्ध है कि मैं बुझदिल हूँ, कायर हूँ।

     कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:

               पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:

     यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे

               शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।२/

गोविन्द! ये सब अज्ञान है तो सिद्ध है कि कायरतारूपी दोष ने मेरे स्वभाव को नष्ट कर दिया है। ‘धर्मसम्मूढचेता:’- यदि ये अज्ञान है तो मैं धर्म के रास्ते में मूढ़ नहीं, विशेष रूप से मूढ़ चित्त हूँ। आप ही बताइए, सत्य क्या है जिससे मैं परम श्रेय को प्राप्त हो जाऊँ? मुझे साधिये, सम्हालिये। कदाचित् मैं आपके आदेश के अनुसार न चल सकूँ तो मुझे सहारा दीजिए। क्यों? क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ। स्पष्ट है, गीता गुरु-शिष्य-संवाद है।

भगवान ने कहा- अर्जुन!,

     नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:

     उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:।।

अर्जुन! सत्य वस्तु का तीनों काल में अभाव नहीं, असत्य का अस्तित्व नहीं, वह है ही नहीं। इन दोनों का अन्तर तत्त्वदर्शियों ने देखा।

एक नवीन प्रश्न खड़ा हो गया कि तत्त्वदर्शी क्या है? आत्मा ही सत्य है, परम तत्व है, काल से अतीत है, अमृत-स्वरूप है। और भूतादिकों के सम्पूर्ण शरीर नाशवान हैं, आज है तो कल नहीं रहेंगे। अर्जुन! इसलिए तू युद्ध कर। शरीर नाशवान है इसलिए युद्ध कर। क्या पाण्डव पक्ष के शरीर अविनाशी थे? आधे रिश्तेदार इधर खड़े थे कौरव पक्ष में, आधे इधर खड़े थे पाण्डव पक्ष में। थे तो शरीर ही। शरीर है नाशवान। इस आदेश से तो यह भी सिद्ध नहीं कि वह केवल कौरवों को मारे। जहाँ भी शरीर दिखाई दे, चलाओ बाण।

फिर प्रश्न खड़ा होता है कि क्या शरीर मारने से मर जायेगा? दूसरी बात, शरीर नाशवान है तो भगवान किसकी रक्षा में खड़े थे? अर्जुन कौन था? क्या किसी शरीर की रक्षा में खड़े थे। भगवान आगे कहते हैं- वह मूढ़बुद्धि व अविवेकी है जो शरीर के लिए पचता है। यदि भगवान केवल शरीर के रखरखाव में खड़े हैं तब तो वह भी मूढ़बुद्धि और अविवेकी की श्रृंखला में आ जायेंगे। अर्जुन कौन?

वास्तव में गीता योगदर्शन है। आपके हृदय के दैवीय सम्पद् का सशक्त गुण है, सर्वोपरि गुण है अनुराग। अनुराग ही अर्जुन है। अनुरागी के हृदय बसे, उदासीन के शीश।– अनुरागी के हृदय में भगवान सदा निवास करते हैं और उसका योगक्षेम प्रदान किया करते हैं। भगवान अनुरागी के रक्षक हैं, ये प्रश्न अलग।

शरीर नाशवान है तो क्या मारने से मर जायेगा? आगे कहते हैं कि-

     वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

               नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

     तथा शरीराणि विहाय जीर्णा

               न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।

पुराने जीर्ण-शीर्ण वस्त्र को त्यागकर मनुष्य जैसे नवीन वस्त्र धारण कर लेता है, ठीक इसी प्रकार भूतादिकों का स्वामी आत्मा जीर्ण शरीररूपी वस्त्र को त्यागता है, त्यागकर नवीन शरीररूपी वस्त्र धारण कर लेता है। इधर शरीर छूटा, उधर वस्त्र तैयार। तो शरीर ही कैसे मरे? शरीर का आधार है संस्कार। एक भी संस्कार बाकी है तो जैसा संस्कार है वैसा शरीर मिलेगा। अन्तिम संस्कार का कट जाना और शरीर के होने के कारण का मिट जाना, एक साथ घटित होता है।

अन्तिम संस्कार का मिट जाना और मन का अचल स्थिर ठहर जाना, और पुन: शरीर के निर्माण के कारण का समाप्त हो जाना एक साथ घटित होता है। ये एक योगदर्शन है। सदा के लिए शरीरों से मुक्ति मिल जायेगी। तो शरीर इधर छूटा, उधर वस्त्र बदला। बीच में कोई रिक्त स्थान नहीं है जहाँ गड्ढे में आपके पूर्वज पड़े हो इसलिए यह एक अज्ञान है।

आगे कहते हैं- यह पुरुष मेरा विशुद्ध अंश है।

     ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:

     मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।

अर्जुन! यह जीवात्मा मेरा विशुद्ध अंश है। उतना ही पवित्र जितना मैं स्वयं हूँ। मेरा ही विशुद्ध अंश है। यह सनातन पुरुष है। मनसहित इन्द्रियों के व्यापार को लेकर जीर्ण शरीर को त्यागती है, उसको त्यागकर नवीन शरीररूपी वस्त्र को धारण कर लेती है। मनसहित इन्द्रियों का व्यापार पशुओं में नहीं होता, पक्षियों में नहीं होता, यह केवल मनुष्यों में होता है। इधर शरीर छूटा और अगले शरीर में अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते।– उस शरीर में स्थित होकर यह जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, जिह्वा, नासिका और मन का आश्रय लेकर अर्थात् इन सबके सहारे ही विषयों का सेवन करता है।

तामसी गुण के कार्यकाल में मृत्यु को प्राप्त पुरुष पशु इत्यादि निम्न योनि प्राप्त करता है। राजसी गुण के कार्यकाल में मृत्यु को प्राप्त पुरुष मनुष्य योनि प्राप्त करता है, और सात्विक गुण के कार्यकाल में मृत्यु को प्राप्त पुरुष देव इत्यादि उन्नत योनि को प्राप्त करता है। हर हालत में योनि प्राप्त करता है। देवता भी इस योनि के अन्तर्गत हैं। और वायु जैसे एक स्थान से गन्ध का अपहरण करके ले जाती है, दूसरे स्थान पर फैला देती है, ऐसे ही भूतादिकों का स्वामी यह आत्मा जीर्ण शरीर को त्यागती है, त्यागकर मनसहित इन्द्रियों के कार्यकलाप को लेकर दूसरे नवीन शरीर को धारण कर लेती है और उस शरीर में अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते।– मनरूपी अधिष्ठाता के माध्यम से पुन: विषयों में प्रवृत्त हो जाती है। किन्तु,

     उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।

     विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष:।।

शरीर छोड़कर जाते हुए को, पुन: नवीन शरीर धारण करते हुए को मूढ़ लोग नहीं जानते। पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष:’- ज्ञानरूपी नेत्रवाले महापुरुष उसे भली प्रकार देखते हैं, कब कौन किस ऊँचाई पर है, कब कहाँ गया? ये उनके क्षेत्र की वस्तु है। इसलिए कोई ऐसा गड्ढा नहीं है जहाँ हमारे पूर्वज पड़े हों, और बच्चे लोग अगर खाना न दें तो ‘त्राहि माम्..त्राहि माम्..’ करने लगें।

हाँ, एक बात है। एक गड्ढा अवश्य है। कदाचित् मरने के बाद यदि तामसी गुण का बाहुल्य है तो हम हो गये हाथी तो आपका दिया हुआ आटा-भाटा क्या हाथी के पेट में जायेगा? यदि हम हो गये जलचर लो क्या कर लोगे? हम कदाचित शेर ही हो गये…. महावीर स्वामी एक जनम में शेर हुए… आपका दिया हुआ यह पिण्डा शेर के मुँह में जायेगा? ये दान है, ये श्रद्धा-समर्पित है, व्यर्थ नहीं जाता। ये पूर्वजों के प्रति लगाव का सूचक है। श्रद्धा से हम देते हैं, प्रभाव भी पड़ता है।

संसार स्वयं में एक गड्ढा है। जब तक प्रभु की प्राप्ति नहीं तब तक तो गड्ढे में ही पड़ना है। राम कथा भवसरिता तरनी’- प्रभु के चरनों में प्रीति होने से भवसागर, भव-कूप हो जाता है। यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।पूर्वज अवश्य गड्ढे में पड़े हैं, और आप भी पड़े ही हो। भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।’- प्रभु के चरणों में प्रेम नहीं करते, अथाह भवसिंधु में पड़े हैं, बहुत बड़ा गड्ढा है। और जहाँ हमने प्रभु की कथा, प्रभु-प्राप्ति की साधना-पद्धति करना शुरू किया, राम कथा भवसरिता तरनी’- वह सरिता में परिवर्तित हो जाता है। चरणों में और प्रीति होने से भवसागर भवकूप हो जाता है- यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।– वे भवकूप में नहीं पड़ते।

सिंधु सरिता बना, फिर कुआँ बना। लेकिन कुएँ में गिर गये तब भी खतरा। तो गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।’- गरुड़ जी! सुमेरु पहाड़ भी रजकण के समान हो जाता है यदि भगवान करुणा करके एक निगाह देख लें। गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।’- विष अमृत में बदल जाता है, शत्रु मित्र हो जाते हैं और अथाह भवसागर गोपद सिंधु– गाय ने जमीन पर पाँव रखा, कुछ गड्ढा सा बना, चुल्लू भर पानी भर गया, बस इतना ही है आपके लिए समुद्र। फिर भी झटके में पाँव पड़ गया तो मोच जरूर हो जाएगी। कभी-कभी होता है। लेकिन आगे जब साधना बढ़ी, नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं।।’- अथाह भवसागर भी सूख जाता है। समुद्र ही खत्म, गड्ढा ही खत्म। हर हालत मे ये गड्ढा खत्म होता है – एक प्रभु के चिंतन से, शरणागति से। पूर्वजों को सबसे बड़ा दान यही है। भजन एक परमात्मा का करो, वे भली प्रकार इससे प्रभावित होंगी।

पूर्वज हमारे गड्ढे में हैं तो ये रोटी-दाल नहीं खायेंगे। भजन ही भोजन है। उनको भोजन दो तो भजन का। प्रभु की शरणागति से गड्ढे से निकलेंगे। निकालने का और कोई तरीका नहीं है इसलिए एक प्रभु के प्रति शरणागति। यदि परिवार में कोई सचमुच साधु हुआ तो २१ पीढ़ी तर जाती है। सचमुच प्राप्तिवाला साथ है, पूर्वजों के निकालने का यही एक तरीका है।

महापुरुष जिस पशु-पक्षी को छू देते हैं उनको भी वही संस्कार मिल जाता है। गुरु महाराज ने एक सुग्गी पाल रखी थी। बड़ी टॉय-टॉय बोला करे- महाराज जी, महाराज जी, ब्रह्मचारी जी…. और खाना लाओ, पानी जाओ। बहुत प्रवक्ता थी वह सुग्गी। एक दिन मर गयी। अब जीव की तो आयु होती है तो महाराज कहें- मैं अपनी गोद में रखता था, अपने हाथ से उसको दाना-पानी देता था। आखिर महापुरुष के छूने से इन जीवों की कुछ भलाई होती भी है या नहीं। आखिर हमारी सुग्गी गयी कहाँ? तब महाराज के अनुभव में आया कि वह समरिया गाँव में नवल पण्डित के यहाँ कन्या बनकर उसने जन्म लिया है।

वहाँ से आठ किलोमीटर दूर गाँव है चित्रकूट में, तुरन्त नवल पंडित को बुलाया- क्यों, तुम्हारे बच्चे कितने हैं? पंडित बोले- महाराज, चार लड़के हैं। महाराज बोले- लड़की? पंडित बोले- बस महाराज, आपका आशीर्वाद मिल जाता। एक लड़की के लिए मैं बेचैन हूँ। महाराज बोले- हमारी सुग्गी गई है, तुम्हारे यहाँ जनम लेगी। ठीक से परवरिश करना।

फिर वह लड़की जनमी, नाम भी रखा सुग्गी। जब उसके शादी-विवाह का निमंत्रण लेकर आया तब महाराज ने कहा- बस बेटा, सुग्गी तुम्हारी। खूब दान-पुण्य करो, विदा करो। हमारा सम्बन्ध वहीं तक था कि महापुरुषों के छूने से इन जीवों को क्या लाभ होता है!

एक और सुग्गा पाल रखा था। पड़ गया बीमार। सात दिन से उसने कुछ खाया ही नहीं। तब महाराज उसको गोद में लेकर बैठे थे, सहला रहे थे, बोले- हो… यह छोटी सी जान, सात दिन से इसके पेट में दाना तक नहीं गया। ये कब तक जियेगा! दो-चार आदमी और बैठे हुए थे आजू-बाजू। दिया-बत्ती हो गया था, शाम का समय था, अंधेरा हो चला था। ‘ये कब तक जीयेगा ऐसे…’ इतने में खाँसने की आवाज आई। सामने कुँआ है, कुँए के नीचे से। महाराज ने पूछा- कौन है रे? तब इधर से बोला- अहूँ-अहूँ। महाराज बोले- एक पल में वहाँ पहुँच गया, आखिर तू है कौन? तब इधर से बोला- अहँ-अहँ। तब महाराज बोले- बड़ा जादूगर है। घोर जंगल की बात। फिर महाराज ने डाँटा तो सामने मंदाकिनी है, उस पार से बोला। फिर सन से चला आया कुँए के सामने…. अहँ-अहँ…

महाराज बोले- बेटा समझ गये, यमदूत आये हैं, यमराज आये हैं इसको लेने। हमारे हाथ में है इसलिए इसकी हिम्मत नहीं पड़ रही है। ऐसा करो, तुम लोग जाओ अपने-अपने कमरे में। हमें देख लेने दो। सती सावित्री के हाथ से उसके पति को नहीं ले जा पाये तो हमारे हाथ से कैसे ले जाते हैं यमराज? मैं भी तो जरा देखूँ। तो एक उसमें से था नाई, बोला- नहीं महाराज, जब यहाँ यमराज ही चक्कर मार रहा है, आपके पास रहेंगे तो हमें कुछ ढाढ़स बँधा रहेगा। दूर मत भेजो, दुहाई महाराज की। महाराज बोले- अरे जा भाग, तुम्हारे लिए नहीं, वह इस सुग्गे के लिए आया है। तुम निश्चिन्त रहो। वह चला तो गया किन्तु उतनी दूर बैठ कर झाँके- देखो महाराज, ध्यान देइहो।

महाराज उस सुग्गे को लेकर अंदर कमरे में चले गये। रातभर बैठकर भजन कर रहे थे, उसकी श्वास देख रहे थे कि गरम-गरम हवा चल रही है। हाँ, अभी तो जिंदा है। बारह बजे भड़ाम से दरवाला खुला, जैसे कोई ताकत से ढकेल के खोल दे। तो महाराज कहें- तोरी हरामी की, भीतरै चला आवत है…। छड़ी लेकर दौड़े तो इतना लम्बा जंगली नेवला खरखर भागा। महाराज भी पीछे भागे। जब वह थोड़ी दूर निकल गये तो महाराज को चिन्ता हुई- अरे! सावित्री को एक स्वरूप धारण कर इधर भरमा दिया, और पीछे से उसके पति के गले में रस्सी बाँधकर ले गया यमराज। कहीं नेवले का रूप धरकर मुझे इधर बहका दिया, और पीछे से ले न जाय कहीं। तो महाराज कहें- जितनी ताकत थी उतनी लगाकर हम दौड़े वापस। दौड़कर आये, देखा तो श्वाँस चल रही थी। अभी तो बचा है। लेकर बैठ गए। इतने में सुग्गा बोला- सीताराम-सीताराम-सीताराम-सीताराम…. महाराज कहें- यमराज आया रहा। यदि सीताराम-सीताराम ही जपते तो यह काल क्यों आता तुम्हें लेने। सुग्गा बोले- महाराज जी, भूख लगी, जरा ब्रह्मचारी जी को बुलाइए। जरा सत्तू दीजिए। महाराज जी ने सबको जगाया, बोले- बेटा, जी गया। काल आया जरुर था, लेकिन जी गया। तो ‘संत दरस जिमि पातक टरई।’-संतों के दर्शन से पाप पुण्य में परिवर्तित हो जाता है। फिर वह सुग्गा दीर्घकाल तक आश्रम में रहा।

कभी-कभी ये घटना भी घटती है। संकल्प शक्ति से अवश्य मिलेगा। ययाति को उसके लड़के ने अपनी जवानी दे दी, यह संकल्प की शक्ति थी। हुमायूँ बीमार था और उसके पिता बाबर हुमायूँ के खाट के पास बैठे थे। सात दिन से बैठे थे और बचने की कोई उम्मीद दिखाई नहीं दे रही थी। हकीम-वैद्यों ने जवाब दिया। तब बाबर उठा, हाथ जोड़कर कहा- हे परवरदीगार, यदि इसकी आयु पूरी हो गई तो मेरे आयु के जो दिन शेष हैं वो उसको दे दें और मुझे ले चलें। सात परिक्रमा उस खाट की किया और सर पटक कर बैठ गया। हुमायूँ की तबीयत सुधरने लगी और बाबर बीमार पड़ गया, दो महीने में शरीर टूट गया। तो संकल्प-शक्ति का महत्व है जब हम दिल से संकल्प कर सकें।

गुरु महाराज के यहाँ कैसे भी लोग बीमार हों, महाराज एक छड़ी मार दें तो ठीक हो जायं। हम पंखा चलाया करें, दो-चार घटना रोज घटे। घनघोर जंगल… वैद्य-डॉक्टर थे नहीं। राम भरोसे चल रहे थे। और ये मलेरिया बुखार…. जब बिगड़ जाता है मलेरिया तो तिजारी, चौथिया, अ‍ॅतरा… एक दिन छोड़ के बुखार अ‍ॅतरा कहलाता है। दो दिन बाद आये तो तिजारी कहलाता है, तीन दिन बाद चौथे दिन आवे तो चौथिया कहलाता है।

लोग आवें, कहें- महाराज! मैं चार महीने से मर रहा हूँ। कोई कहे- मुझे तीन महीने से बुखार नहीं छोड़ रहा। महाराज कहे- पापी कहीं का, धूनी में प्रणाम कर, मुड़ी पटक, खो विभूति…। और जहाँ मुड़ी पटके तो एक छड़ी उठा के मार दें। वह विभूति खाकर, सिकुड़कर बैठ जाए तब फिर महाराज हँसे, बोले- बेटा, बुखार का नम्बर कब है। वह बोले- गुरु महाराज, कल। कोई कहे- परसों। महाराज बोले- जरा इसकी पारी बीता के आ तो, देख क्या होता है? और जब बुखार न आवे तब दही वगैरह लेकर दौड़े, बोले- गुरु महाराज, बुखार तो नहीं आया। महाराज बोले- जाओ बेटा, बुखार ठीक हो गया।

हजारों केस…. एक-दो नहीं। हमने पूछा- महाराज, ये सब क्या है? महाराज बोले- बेटा, भगवान जब स्वरूप देते है तो कुछ हथियार भी दे दिया करते हैं। जब हमको स्वरूप मिला, स्थिति मिली तब भगवान ने कहा- आज से यमराज का फंद कट गया, दुबारे कहा- गर्भवास से आज तुम्हारा छुटकारा हो गया। और फिर भगवान ने कहा- तुम्हारे वाणी में ये गुण है, तुम्हारे दाहिने हाथ में ये गुण है कि किसी को छड़ी मार दोगे तो यदि कल फांसी होनी तो फांसी टल जायेगी, सजा चाहे जो हो जाय। तुम्हारे बांये हाथ में ये गुण है कि सिर पर रख दोगे तो सब करम हो जायेगा। तुम्हारी विभूति में ये गुण है, तुम्हारी वाणी में ये गुण है। इस प्रकार जब भगवान अपनाते हैं तो कुछ हथियार भी दे दिया करते हैं। उसी के द्वारा मैं लड़त-भिड़त निश्चिन्त रहता हूँ। बेटा, भगवान पहरा देते हैं यहाँ।

ये जो आजकल चल रहा है पिण्डदान की भयंकरता, ये सब स्मृतियों की देन है। स्मृतियों में लिखा है- बारहो महीना ब्राह्मण भोजन दूध-दही द्वारा करायें, थाल लेकर चलो तो हाथ न हिलने पायें। चमार, कुत्ता और मुर्गा उस ब्राह्मण-भोजन को करते समय देख न पावें। यदि देख लेगा तो असुर खा लेंगे, खिलानेवाला को पुण्य ही नहीं होगा।

फिर लिखा- चतुर्दशी छोड़कर बाकी सभी तिथियों में बारहो महीने जो भोजन कराता है तो पितर लोग स्वर्ग में नृत्य करते हैं। और जब नहीं करायेंगे लोग तो पितर लोग सिकुड़ के सुईं की नोंक के बराबर हो जायेंगे। पितर गड्ढे में पड़े रहते हैं, बढ़िया भोजन कराओगे तो स्वर्ग पहुँचकर नाचेंगे, और नहीं खिलाओगे तो गड्ढे के नीचे चले जायेंगे, सूईं के नोंक के बराबर हो जायेंगे। और हजारों साल बाद यदि किसी ने खिला दिया तो फिर फुलकर कुप्पा हो जायेंगे। इसका मतलब कि हिन्दुओं के पुरखा कभी गड्ढे से बाहर होंगे ही नहीं। बाहर हो जायेंगे तो फैक्ट्री ही चली गई, धन्धा ही चौपट हो गया। कोई ऐसा गड्ढा नहीं है। ये स्मृतियों की देन है।

फिर कहते हैं- पानी पीते समय लम्बे कान वाले बकरे, जिनके कान पानी में डूब जाए लाल रंग का बकरा है, उसके मांस का भोजन करा दो तो बारह वर्ष तक पितर तृप्त रहेंगे। तो यह भयंकरता जो है, ये स्मृतियों की देन है। स्मृतियों में ऐसा बहुत कुछ लिखा हुआ है, हमने तो एक-दो प्वाइंट संकेत किया है।

ये पिण्डदान जो होता है केवल श्रद्धांजलि है, माता-पिता का सेवाभाव है, पूज्य भाव है। ऐसा करने से पीछे की पीढ़ियाँ ऐसा ही करती रहेंगी। माता-पिता वृद्धावस्था में कष्ट नहीं पायेंगे। ये हमारी संस्कृति है लेकिन सेवा पिण्डदान नहीं।

मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी।।

माता-पिता, भगवान और गुरु की वाणी पर विचार ही मत करो, कर डालो।

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें।।

माता-पिता, स्वामी और प्रभु की शिक्षा का पालन करने से कुमार्ग पर चल दोगे तब भी आपका पाँव न कभी काँटों में पड़ेगा, न गड्ढों में पड़ेगा।

               जहाँ भगत मेरो पग धरे, तहाँ धरूँ मैं हाथ।

               पाछे लागा सदा रहूँ, कबहुँ न छोड़ूँ साथ।।

आप गड्डे में पाँव डाल दो, गिरोगे नहीं, भगवान अपना हाथ बढ़ा देते हैं। इसलिए माता-पिता की सेवा जीते जी ही। और यदि जीते जी नहीं पार लगी, यदि महाप्रयाण को प्राप्त हो चुके हों तो श्रद्धा-सुमन भेंट करना – ये हमारी संस्कृति है। इससे अगले मासूम बच्चे सुसंस्कृत हो जायेंगे, पुश्त-दर-पुश्त सौहार्द्र, स्नेह व प्रेम में जीवन भी जीयेंगे।

।। बोलिए, श्री सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

(अमृतवाणी भाग-8’ से उद्धृत)

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