आलम है उदासी का
जब तक भगवान की ओर से उनकी महिमा की कोई झलक नहीं मिलती, तब तक हृदय में उनके प्रति श्रद्धा जागृत नहीं होती। इसी आशय की गजलमिश्रित एक साधनापरक कौव्वाली इस प्रकार है–
आलम है उदासी का हस्रत सी बरसती है।
जिस दिन से गये हो तुम ये आँखें तरसती हैं।।
मैकश के लबों से जब पीने की सदा आई।
मैखाना भी खाली है बोतल भी तरसती है।।
मैखाने के अन्दर ही रहने दे मुझे साकी।
मैखाने के बाहर तो इक आग बरसती है।।
मैं शह्रे खमोशाँ से गुजरा तो सदा आई।
आहिस्ता चलो लोगों दीवानों की बस्ती है।।
दुनिया की निगाहें तो जहरीली हैं नागिन सी।
मैं दूध पिलाता हूँ फिर भी मुझे डसती हैं।।
साधना के आरम्भ में ही प्रभु एक झलक दिखाकर चले जाते हैं। तभी तो उन्हें प्राप्त करने की व्याकुलता बढ़ जाती है और साधक उन्हें प्राप्त करके ही दम लेता है। अनेक सन्तों की जीवनी में ऐसा देखने को मिला। अयोध्या के समीपवर्ती ग्राम के ठाकुर रामसिंह राजकीय कारागार के अधीक्षक थे। वह रामलीला तथा सत्संग के इतने अधिक प्रेमी थे कि जहाँ भी ऐसे आयोजन होते, वे वहाँ पहुँच जाया करते थे। एक बार किसी ने महाराजा साहब से उनकी शिकायत कर दी कि वहाँ पहरे पर कोई नहीं था। महाराजा ने कहा– वहाँ रामसिंह बहुत ही कर्त्तव्यनिष्ठ सेवक है। और लोगों ने भी बताया कि वह तो रात-दिन सत्संग सुनते रहते हैं। एक दिन महाराज वेष बदलकर निरीक्षण करने गये। वहाँ रामसिंह अपनी जगह उपस्थित मिले। शिकायत करनेवालों ने बताया कि वह सत्संग सुन रहे हैं, हमलोग देखकर आ रहे हैं। महाराजा उसी वेश में सत्संग-स्थल पर भी गये। उन्होंने देखा, वहाँ भी रामसिंह हाथ जोड़कर श्रद्धापूर्वक सत्संग सुन रहे थे। महाराजा को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। वह तत्काल कारागार की ओर चल पड़े। उन्होंने देखा, रामसिंह पहरे पर खड़े हैं।
दूसरे दिन प्रात:काल महाराजा ने रामसिंह को बुलवाया। रामसिंह चिन्तित हो गये। लोगों ने उन्हें बताया कि हुजूर आये थे। बड़े-बड़े अधिकारी भी थे। वह यहाँ कुछ जाँच करने आये थे। रामसिंह ने सोचा, कल तो मैं सत्संग में था, अब यहाँ जैसा हुआ हो। लगता है नौकरी तो गयी। रामसिंह दरबार में गये। महाराजा ने कहा– ‘‘रामसिंह! हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। अब तुम केवल सत्संग सुना करो, रामलीला देखो, वेतन भी लिया करो।’’ रामसिंह ने सोचा, महाराज व्यंग कर रहे हैं। उन्होंने कहा– ‘‘हुजूर! हम कल कारागार पर नहीं थे, क्षमा किया जाय।’’ महाराजा ने कहा– ‘‘लेकिन हमने तुम्हें वहाँ उपस्थित पाया था। यदि तुम सत्संग में थे तो ड्यूटी पर कैसे थे?’’ रामसिंह ने कहा– ‘‘महाराज! मैं झूठ नहीं बोलता। मैं सत्संग सुन रहा था। लगता है भगवान ने ही मेरे स्थान पर ड्यूटी दी।’’ उन्होंने विनयपूर्वक राजकीय सेवा से त्यागपत्र दे दिया और भजन में लग गये। वह बाबा मणिरामदासजी के नाम से प्रसिद्ध हुए। अयोध्या में मणिरामजी की छावनी आज भी सन्त-सेवा के लिए प्रख्यात है। भगवान की महिमा का प्रत्यक्ष दर्शन ही उनके गृह-निष्क्रमण का कारण बना। जिस दिन उन्हें लगा कि भगवान ने उनके स्थान पर ड्यूटी दी, उनकी लगन लग गयी कि भगवान ने इतने लोगों को दर्शन दिया तो मुझे क्यों नहीं दिया? ‘जिस दिन से गये हो तुम, ये आँखें तरसती हैं।’
पूज्य गुरु महाराजजी के जीवन की भी ऐसी ही घटना है। उन्होंने साधु होने के लिए कभी सोचा भी न था। उन्हें पहलवानी का शौक था। उन्हें बस एक ही लालसा थी कि कब गामा पहलवान से हाथ मिलायें। वह पड़ोस के स्टेट में आनेवाला था। उससे कुश्ती के लिए तेल-पानी, भोजन, दण्ड-बैठक चल रहा था। इसी बीच दो-तीन विचित्र घटनाएँ घट गयीं। एक आकाशवाणी हुई कि इन सन्त को भोजन कराओ। कुछ दिनों पश्चात् पुन: आकाशवाणी हुई कि पाप करने जा रहे हो, घोर नरक में जाओगे। उसी दिन तीसरी आकाशवाणी हुई कि इस मन्दिर में तुम्हारे गुरु महाराज हैं।
घने धुप्प अँधेरे में महाराजजी उस खण्डहर हो चले मन्दिर में गये जिसमें कोई दिया-बत्ती भी नहीं करता था। मन्दिर के भीतर जाकर अँधेरे में ही उसमें चारों ओर घूमकर महाराजजी बाहर निकल आये। भीतर कोई दिखा ही नहीं। महाराजजी को बड़ी झुँझलाहट हुई। पता नहीं हमारे पीछे कौन पड़ा है? कौन जोर से बोलता है, कौन धीरे से बोलता है? वह इसी उधेड़बुन में थे कि मन्दिर के भीतर से खाँसने की आवाज आयी। अब उन्हें लगा कि इसमें तो वास्तव में कोई है। उन्होंने पुन: मन्दिर के भीतर जाकर सूक्ष्मता से देखा तो गर्भगृह के कोने में उनके गुरु महाराज बैठे थे, वही जिन्हें क्षेत्रीय लोग पगला, सत्संगी या लँगड़ू बाबा कहते थे। महाराजजी ने मन्दिर में प्रकाश की व्यवस्था की और तीन दिन, तीन रात उनकी सेवा में लगे ही रह गये। इस अल्प अवधि में ही उन्होंने उनसे साधना का क्रम सीखा और भजन में लग गये।
गाँव से एक फर्लांग दूर एक झाड़ी थी, एकान्त था। महाराजजी उसी झाड़ी में बैठकर भजन करने लगे। गाँव के लोग परेशान थे कि उन्हें हो क्या गया? वह आसमान में उड़ गये या जमीन में समा गये। छ: दिनों के पश्चात् उन्हें लोगों ने झाड़ी में बैठा देख लिया। सब आकर उन्हें देखने लगे कि इनको क्या हो गया है? सबने उनसे घर चलने को कहा किन्तु महाराज ने किसी को कोई उत्तर नहीं दिया, भजन में लगे रहे। किसी ने कहा, हमने इन्हें उस लँगड़े के साथ देखा था। लोगों ने अनुमान लगाया, यह सब उसी का किया लगता है। उसका एक पाँव टूटा है, अब दूसरा भी तोड़ दो। वह लड़कों की बुद्धि भ्रष्ट कर रहा है, बड़ा जादूगर है। गाँव के बीस-पचीस युवक लाठी लेकर उन सत्संगी महाराज का पैर तोड़ने के लिए ढूँढ़ने लगे। एक महीने तक लोग ढूँढ़ते ही रह गये। इधर लोग महाराज को मनाते ही रह गये, महाराज किसी से बोलते ही न थे। क्रमश: लोग शान्त हो चले, सबने लाठियाँ रख दीं। लोग अपने-अपने कार्यों में लग गये।
मामला शान्त हो चलने पर एक दिन सत्संगी महाराज गाँव में दिखाई पड़ गये। सबलोग दौड़कर फिर एकत्रित होकर बोले– ‘‘अरे लँगड़ू बाबा! लड़के की बुद्धि भ्रष्ट कर दिया।’’ सत्संगी महाराज बोले– ‘‘हूँ! हमने ठेका ले रखा है सबकी बुद्धि बिगाड़ने का? क्यों, गाँव में वह पागल है, एक और उसका लड़का पागल है; और भी कई हैं! सबकी बुद्धि क्या हमने ही बिगाड़ा है? अपने कर्मों को दोष तो दोगे नहीं।’’ वह महापुरुष तो थे ही, लोग करते भी क्या? बड़ी परीक्षायें हुईं, लोगों ने अनुरोध किया किन्तु महाराज भजन में लगे ही रह गये।
प्रत्यक्ष रूप से कहने-सुनने का प्रभाव पड़ते न देख संगी-साथियों ने सेवा-सान्निध्य द्वारा उन्हें घर लौटाने की योजना बनायी। गुरु महाराज अच्छे पहलवान थे। उनके अखाड़े में लड़ने वाले पन्द्रह-पचीस शागिर्दों ने भजन-स्थली के समीप ही अखाड़ा खोद लिया। वे लोग वहीं दण्ड-बैठक लगाने लगे। रात को वह सभी वहीं सोने भी लगे। एक दिन उनलोगों ने महाराजजी के समक्ष प्रस्ताव रखा कि सन्तजी! प्रभातफेरी किया जाय। महाराजजी को उनका यह प्रस्ताव अच्छा लगा। प्रात: चार बजते ही लोग झाँझ-मजीरा बजाते ‘सीताराम सीताराम सीताराम जय सीताराम’ कहते रामकोला गाँव की परिक्रमा करते और सवेरा होने से पहले ही भजन कुटीर पर आ जाते थे। महाराजजी बताते थे कि मैं भी उनके साथ हो लिया करता था।
प्रभातफेरी के आरम्भ में पन्द्रह-सोलह व्यक्ति ही हुआ करते थे; किन्तु परिक्रमा ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती, समीप के लोग भी उसमें सम्मिलित हो जाया करते थे। उनकी संख्या बढ़ते-बढ़ते साठ-सत्तर तक पहुँच गयी। वे सभी महाराजजी के साथ आश्रम तक आते, महाराजजी को प्रणाम कर अपने-अपने घरों को लौट जाया करते थे।
महाराजजी का नियम था कि वह रात्रि के दो बजे ही उठकर भजन में बैठ जाया करते थे। वहाँ शयन करनेवाले पहलवान शिष्यों का अनुरोध था कि सन्तजी! आप हमलोगों को ठीक चार बजे जगा दिया करें जिससे प्रभातफेरी का नियम खण्डित न हो। महाराजजी उनको चार बजे जगा दिया करते थे। एक दिन महाराजजी भजन में बैठे तो बैठे ही रह गये। न जाने कब सवेरा हो गया। महाराज को बड़ी चिन्ता हुई कि आज तो नियम खण्डित हो गया। इतने में सभी शागिर्द भी भड़भड़ाकर उठे और कहने लगे– ‘‘सन्तजी! आपने जगाया नहीं।’’ महाराजजी कुछ बोले ही नहीं। चिन्ता तो महाराजजी को भी थी कि आज कीर्तन नहीं हुआ।
इतने में गाँव से लोग आने लगे। एक ने कहा– ‘‘सन्तजी! आज आप किस रास्ते से निकल गये? दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है? आज तो कीर्तन की बड़ी मधुर ध्वनि सुनायी पड़ रही थी। ध्वनि बहुत समीप से आती हुई सुनायी पड़ रही थी। हम चारपाई छोड़कर तैयार ही थे कि सामने से प्रभातफेरी गुजरे तो हम भी सम्मिलित हो लें किन्तु आप सब उधर आये ही नहीं! किस रास्ते से आप सब निकल गये?’’
महाराजजी ने सोचा– हम तो गये ही नहीं थे। यह व्यंग में कुछ कह रहा है। इतने में दो–चार-छ: क्या पन्द्रह-पचीस लोग अलग-अलग मुहल्ले से आये और कहे कि हमने भी सुना, हम भी सम्मिलित नहीं हो पाये। आज तो बहुत मधुर स्वर में कीर्तन हो रहा था। महाराज समझ गये कि भगवान ऐसा भी कुछ कर सकते हैं। वह मण्डली बनाकर कीर्तन भी करा सकते हैं। आज मेरी असावधानी से भगवान को कितना कष्ट उठाना पड़ा। महाराजजी ने सबसे कह दिया कि बस, अब आज से कीर्तन नहीं होगा। महाराजजी भाव-विह्वल हो गये कि जब भगवान इतने महान हैं तो हम अब केवल उन्हीं का चिन्तन करेंगे, हृदय से कीर्तन होगा। महाराज जी विक्षिप्त और उन्मत्त की तरह अहर्निश भजन में लीन रहने लगे।
लोगों ने महाराजजी की यह दशा देखी तो आपस में चर्चा करने लगे कि सन्तजी पागल हो गये, दिमाग का स्क्रू लूज हो गया लगता है। कोई कहता– इन्हें टी.बी. हो गयी है, घड़ी टल रही है, जब न मर जायँ। एक बार ऐसे ही शब्द महाराजजी को सुनायी दे गये। महाराजजी ने भगवान से पूछा– ‘‘प्रभो! क्या यह लोग ठीक कह रहे हैं कि हमें टी.बी. हो गयी है? क्या मैं बीमार हूँ?’’ भगवान ने कहा– ‘‘ये जो कुछ कहते हैं, इन्हें कहने दो। तुम लगे भर रहो।’’ बस, उस दिन से महाराजजी निर्द्वन्द्व होकर चिन्तन में लग गये। चिन्तन तो पहले भी करते थे किन्तु जिस दिन भगवान ने कीर्तन सम्पन्न कराया, महाराजजी की व्याकुलता और भी बढ़ गयी।
ऐसा ही कथानक भगवल्लीला के अमरगायक महात्मा सूरदासजी का भी है। वह करोड़पति बाप के इकलौते बेटे थे। अत्यधिक लाड़-प्यार बच्चों को बिगाड़ देता है। बचपन में उनका नाम विल्वमंगल था। युवावस्था तक आते-आते वह विषय-वासनाओं में आकण्ठ डूब चुके थे। पिता ने उनका विवाह एक अत्यन्त सुलक्षणा कन्या से कर दिया; किन्तु विल्वमंगल को नर्तकियों के यहाँ का नृत्य-संगीत अधिक रुचिकर था। घर की सारी सम्पत्ति इसी व्यसन में समाप्त हो गयी। मरते समय उनके पिता ने बहू को कुछ सम्पत्ति दिया, उसे भी विल्वमंगल नर्तकियों की सेवा में अर्पित कर आये। धन समाप्त होने पर नर्तकियों ने उन्हें तिरस्कारपूर्वक अपने घर से निकाल दिया। इस अपमान से क्षुब्ध होकर उन्होंने एक नर्तकी को छुरा मार दिया। उस अपराध में उन्हें फाँसी होती किन्तु उनकी पतिव्रता पत्नी ने आरोप अपने सिर ले लिया। विल्वमंगल को सिपाहियों ने छोड़ दिया।
सम्पत्ति-घर-पत्नी, विल्वमंगल का सब कुछ समाप्त हो चुका था। नर्तकी से तिरस्कृत, समाज से उपेक्षित उन्होंने वृन्दावन का रास्ता पकड़ लिया। दोपहर होते-होते वह एक नगर में पहुँचे। वहाँ का नगरसेठ बहुत धर्मात्मा था। कोई उस रास्ते से भूखा-प्यासा नहीं जा सकता था। संत-महात्माओं को कुटी बनवा देना, कम्बल-लोटा देना, भोजन कराना उसका स्वभाव था। उसने अपने दस-पन्द्रह सेवकों को इसीलिए लगा रखा था कि कोई साधु-महात्मा, भूखा-प्यासा, जरूरतमंद कहीं कष्ट न पा जाय। सेवक उन्हें ले आते और सेठ उन सबकी आवश्यकताओं की आपूर्ति कर देता था।
सेठ के सेवक विल्वमंगल को भी सेठ के घर ले आये। भोजन की थाल लेकर सेठानी आयी। विल्वमंगल को लगा, यह तो वही नर्तकी है। इसे तो हमने छूरा मार दिया था। क्या यह अभी जीवित है? हो सकता है यह उसकी बहन हो। उन्होंने कहा– ‘‘दरवाजे के बाहर हम भोजन नहीं करते। खिलाना ही हो तो हम इस सुन्दरी के कक्ष में भोजन कर सकते हैं।’’ सेठानी ने कहा– ‘‘महाराज! बिना भोजन-प्रसाद पाये इस दरवाजे से आज तक कोई सन्त-महात्मा गया ही नहीं। आप कृपा कर कक्ष में ही पधारें।’’ कक्ष में सेठाइन चाँदी का थाल लगाकर पहुँची तो विल्वमंगल को फाँसी का फन्दा दिखायी देने लगा। वह सोचने लगे– एक औरत के कारण फाँसी, एक औरत ने छुड़ाया; फिर भी यह दुष्ट चित्त उधर ही भाग रहा है। यह सारा दोष इन आँखों का है। उन्होंने सेठानी से कहा– ‘‘माताजी! एक सुई-धागा भी लाइए।’’
सेठानी ने सोचा– लगता है भगवान ने इनका हृदय-परिवर्तन कर दिया, तभी तो यह माताजी कहने लगे हैं। उसने सुई-डोरा देते हुए पूछा– ‘‘इनका क्या करेंगे महात्मन्!’’ विल्वमंगल ने कहा– ‘‘प्रेम टूट गया है, थोड़ी सिलाई कर लेने दो।’’ उन्होंने सुई दोनों आँखों में कोच लिया। सेवक दौड़े, महात्मा ने आँख में सुई चुभा लिया। लोगों ने उपचार किया किन्तु आँखों की रोशनी चली गयी। अब वह सूरदास हो गये थे। लोगों को पश्चाताप हुआ। सूरदास ने कहा– ‘‘आपलोग चिन्ता न करें। इन आँखों ने भूल की है इसलिए इनको दण्ड देना आवश्यक था। यदि एक इन्द्रिय हमें परमार्थ-पथ से भटकाती है, गड्ढे में गिराती है तो उस एक इन्द्रिय के बिना भी जी लेना श्रेयस्कर है। ये आँखें इसी लायक थीं, इसमें आपलोगों का दोष नहीं है। कृपया आप सब हमें वृन्दावन का रास्ता बता दें।’’ लोगों ने उन्हें वृन्दावन का रास्ता पकड़ा दिया।
जन्मान्ध व्यक्ति अनुमान के आधार पर प्राय: सर्वत्र चले जाते हैं किन्तु इन सूरदास को अन्धा हुए बहुत समय भी व्यतीत नहीं हुआ था। जंगल में पगडंडी के किनारे भूमितल के बराबर का ही एक कुआँ था, वह कुएँ में गिर गये। कुआँ में जल अधिक नहीं था। छाती भर पानी में सूरदास इधर से उधर चलते रहे। उनके मुख से केवल ‘हे गोविन्द, हे मुरारी’ निकल रहा था। उन्होंने सोचा, जितनी श्वास बची है, क्यों न मैं इन्हें प्रभु के स्मरण में ही लगा दूँ। वहाँ न कोई गाँव-गिराँव था न कोई संगदोष, अन्य कोई संकल्प-विकल्प भी न था। चिन्तन में भगवान ही भगवान थे। सातवें दिन एक बच्चे ने कहा– ‘‘बाबा! यहाँ क्या कर रहे हो? लो, मेरा हाथ पकड़ लो और बाहर निकल आओ।’’ सूरदास ने उस बालक का हाथ कसकर पकड़ लिया और कुएँ से बाहर आ गये। उन्होंने उस बालक से कहा– ‘‘भैया! कौन हो और इस जंगल में कहाँ से आ गये?’’ उस बालक ने हाथ छुड़ाया और बिना कुछ कहे ही चलता बना। कुएँ से निकलने में दीवाल से पाँव लगाते सूरदास को आभास हो गया कि कुआँ बीस-पच्चीस हाथ गहरा तो होगा ही। एक बच्चे का हाथ इतना लम्बा हो, असंभव है। लगता है, भगवान ने ही करुणा कर हमें बाहर किया है। वह बोल उठे–
बाँह छुड़ाये जात हो निबल जानि के मोहिं।
हिरदै से जब जाहु तो सबल बखानौ तोहिं।।
सूर ने प्रण कर लिया– जिन भगवान ने मेरी रक्षा की है, केवल उन्हीं का चिन्तन करूँगा। उनकी जीवनधारा ही बदल गयी। यही है ‘जिस दिन से गये हो तुम, ये आँखें तरसती हैं।’ सूरदास की आँखें फूट गयी थीं, फिर भी आँखें उन्हें देखने को तरस रही थीं।
सूरदास वृन्दावन पहुँच गये। जीवनभर नर्तकियों और गवैयों का साथ था। राग-रागिनियों का उन्हें अभ्यास था। उनका अपना गला भी बहुत सुरीला था। लोगों ने उन्हें रासबिहारीजी के मन्दिर में बैठा दिया। सूरदास तानपूरे पर भगवान की झाँकी का गायन करने लगे। बसन्त में भगवान को केसरिया वस्त्र, तो वर्षा में धानी रंग के वस्त्रों से उनका शृंगार होता था। जैसा शृंगार होता, सूरदास उसी का गायन अपने पदों में करते। लोगों को सन्देह हुआ कि यह सूरदास देखते हैं क्या! पुजारियों ने मन्त्रणा की कि आज भगवान को वस्त्र ही न पहनाया जाय। देखें, सूरदास आज क्या गाते हैं? उस दिन वस्त्र पहनाया ही नहीं गया। पुजारियों ने उनके मुख में कुछ मक्खन लगाकर छोड़ दिया। झाँकी खुलने पर सूरदास बहुत प्रसन्न हुए। मूर्ति की ओर मुँह कर उन्होंने गायन आरम्भ किया–
आजु हरि देख्यौं नंगम नंगा।
माखन चाटत करत उछंगा।….. आजु हरि…..
उस दिन भगवान का वही बालकोंवाला वेष था। सबने सूरदासजी को सविनय प्रणाम कर कहा– हमलोगों ने आपको साधारण-सा प्रज्ञाचक्षु समझ रखा था किन्तु आप तो वस्तुत: अन्तर्दृष्टिवाले महापुरुष हैं। फूलों के नीचे भगवान के एक पाँव में पैंजनी थी, आपने उसका भी वर्णन कर दिया। आप महान सन्त हैं। यह मन्दिर आपका है, हम सब आपके हैं। अब वह सामान्य गायक नहीं, सन्त हो गये। उनकी वाह्यदृष्टि का लोप हो गया था किन्तु भीतर की आँखें खुल गयी थीं। भगवान की कृपा का एक बार आस्वादन कर लेने के पश्चात् उनकी तड़प बढ़ गयी और भगवान को पाकर ही उन्होंने दम लिया।
यही दशा वृन्दावन के गोपियों की थी। अनेकानेक विपत्तियों से ब्रजमण्डल की रक्षा करनेवाले कन्हैया को चीरहरण और रासलीला प्रसंगों में जबसे उन्हें सर्वत्र व्याप्त देखा, गोपियों ने श्रीकृष्ण को आराध्य रूप में वरण कर लिया। इसीलिए जब वे वृन्दावन से मथुरा जाने लगे तो गोपियों से शीघ्र लौटने का वायदा किया किन्तु नहीं लौटे। फिर तो गोपियाँ अपना माखन-दूध-दही-पति-पुत्र – सब कुछ भूल गयीं और राधिका के संरक्षण में करील के कुञ्जों में अहर्निश श्रीकृष्ण की लीलाओं के चिन्तन में अनुरक्त हो गयीं।
एक बार भगवान अपना करिश्मा दिखाकर, अपना परिचय देकर, साधक को अपनी ईश्वरीय विभूति का स्वल्प भी भान करा दें, फिर तो साधक केवल उन्हें चाहेगा। सृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं है कि उसे भटकाये। और जब तक भगवान की ओर से कुछ प्रेरणा प्राप्त नहीं होती, कोई चमत्कार नहीं मिलता, तब तक साधक का प्रत्येक प्रयास अँधेरे में चलाया हुआ तीर है। उसे सन्देह बना रहता है कि भगवान हैं भी या नहीं! किन्तु जहाँ उसे प्रमाण मिला, उसके बाद वह केवल भगवान को ही चाहेगा।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।
ताहि भजनु तजि भाव न आना।। (मानस, ५/३३/३)
प्रभु जब एक बार अपनी विभूति का परिचय देकर हट जाते हैं, त्रिलोक की सम्पत्ति भी रख दो, साधक उस ओर देखेगा नहीं, उसका स्पर्श भी नहीं करेगा। गोपियाँ अपना घर-द्वार, धन-वैभव सब कुछ भूल गयीं। उनके मन में श्रीकृष्ण का विरह मात्र था। एक दिन वह साधारण-सी ग्वालिनें श्रीकृष्ण के सर्वोपरि भक्तों की श्रेणी में आ गयीं। भगवान के यहाँ केवल भाव की, श्रद्धा की कीमत होती है और ज्योंही प्रभु का किञ्चित् भी चमत्कार देखने को मिला, साधक जग से एकदम उदास हो जाता है– ‘उदासीनो गतव्यथ:’ (गीता, १२/१६) गुरु महाराज की ‘बारहमासी’ में है– ‘जगत से रहना नित्य उदासी।’ यही इस भजन की पंक्ति का भी आशय है– ‘आलम है उदासी का’ आलम का आशय है वातावरण, संसार से उदासीन और प्रभु के लिए विरह वेदना की बेचैनी! प्रभु के लिए उसके अरमान उमड़ते रहते हैं। यह स्थिति कब आती है? जब भगवान अपना कुछ परिचय दे दें। संसार में उन्हें आकर्षित करने की कोई वस्तु बची ही नहीं। आँखें प्रभु-दर्शन के लिए तरसने लगीं। जिस दिन से सूर का हाथ छुड़ाकर गये, गोपियों को आश्वासन देकर गये, उनकी आँखें तरसती ही रह गयीं।
मैकश के लबों से जब पीने की सदा आई।
मैकश माने शराबी होता है। एक शराब वह है जिसे दुनिया में लोग पीते हैं। इसी तरह से भजन भी एक नशा है और शराब से अधिक नशा इसमें है, जैसा कि गुरुनानक ने कहा है–
सभी नशे संसार के उतर जात परभात।
नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।।
संसार के सभी नशे शाम को लेने पर सबेरे तक उतर जाते हैं। नशा उतर जाने पर लोग उसे पुन: ढूँढ़ने लगते हैं किन्तु नाम में ऐसी खुमारी है, ऐसा नशा है कि यह ‘चढ़ी रहे दिन रात’– कभी उतरती ही नहीं; क्योंकि इसका विधान ही ऐसा है कि,
जागत में सुमिरन करे, सोवत में लव लाय।
सुरत डोर लागी रहे, तार टूट ना जाय।।
जागृत अवस्था में प्रभु का सुमिरन करते रहना है और सोते समय भी प्रभु में लौ लगा लो, सुरत की डोरी लगी रहे, क्रम टूटने न पाये। इस प्रकार का भजन भी एक नशा है और यह नशा तब चढ़ता है जब भगवान का कुछ चमत्कार देखने को मिल जाय। फिर तो भजन करनेवाला केवल उन्हें चाहेगा। यही इस पंक्ति में कहते हैं कि पीनेवाले के होठों से जब पीने की आवाज आयी कि मैं पीयूँगा, केवल भजन ही करूँगा, मैं अवश्य प्राप्त करूँगा तो,
मैखाना भी खाली है, बोतल भी तरसती है।
यहाँ सद्गुरु का दरबार ही मैखाना है क्योंकि भजन की जागृति सद्गुरु के बिना कभी किसी को नहीं होती। अच्छे-अच्छे विद्वान प्राय: गुरु महाराज से कहते थे कि उन्होंने संसार का सारा दर्शनशास्त्र पढ़ डाला, किन्तु साधन समझ में नहीं आता, भजन समझ में नहीं आता। महाराज जी उन्हें बताते थे– हाँ, हो! सब बात सब कोई जानत हैं, दो-दौ पैसे में वेदान्त बिकत है। लोग पढ़ते जा रहे हैं, पता नहीं क्या लिखते भी जा रहे हैं किन्तु साधना ही एक ऐसी वस्तु है जो लिखने में नहीं आती, वाणी से कहने में नहीं आती है। हम जो कह रहे हैं, इससे भी नहीं मिलेगा। वह किसी अनुभवी महापुरुष द्वारा किसी-किसी अनुरागी के हृदय में जागृत हो जाया करती है। जिसकी किसी अनुभवी महापुरुष सद्गुरु में श्रद्धा से डोरी लग गयी, उनके द्वारा बतायी गयी साधना और उन महापुरुष की टूटी-फूटी सेवा पार लग गयी तो भजन जागृत हो जायेगा।
श्रीरामचरितमानस का एक प्रसंग है। भगवान श्रीराम पंचवटी की पर्णकुटी में बैठे थे। उसी समय अनुज लक्ष्मण ने उसने परमार्थ विषयक कई प्रश्न किये। भारत में सामान्य कृषक भी जब दोपहर में वृक्ष के नीचे बैठते हैं, आपस में हरिचर्चा या भजन की विधि पर प्रश्नोत्तर होता है, शिक्षाप्रद कहानियाँ होती हैं, सत्संग चलता है; जबकि विदेशों में आपस में मिलने पर लोग राजनीति, व्यवसाय, षड्यन्त्रों की चर्चा में व्यस्त रहते हैं। लक्ष्मण ने कई प्रश्नों के साथ यह भी पूछा– ‘कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया।’ (मानस, ३/१३/८)– वह भक्ति बताइए जिससे आपकी कृपा प्राप्त होती है?
भगवान राम ने कहा– ‘भगति तात अनुपम सुख मूला।’ (मानस, ३/१५/४)– हे तात! अनुपम सुख का मूल तो भक्ति है। लक्ष्मण ने कहा– प्रभो! उसे मुझे प्रदान कर दें। भगवान ने कहा– लक्ष्मण! उसे सीधा तो मैं भी नहीं दे सकता। वह तो ‘मिलइ जो सन्त होइँ अनुकूला।’ वह मिलेगी तभी जब सन्त अनुकूल हों। सन्त का मिलना ही पर्याप्त नहीं है, जब सन्त अनुकूल हो जायँ, भक्ति तो तभी मिलेगी। किताबें तमाम थीं, उपदेश भी तमाम थे, भगवान भी उपदेश ही कर रहे थे किन्तु भक्ति अर्थात् अन्त:करण से भजन की जागृति बिना किसी तत्त्वदर्शी सद्गुरु के नहीं मिलेगी। गुरु का द्वार ही वह मयखाना है जहाँ ईश्वरीय नशा भजन की जागृति संभव है। मान लें, गुरु के दरबार में पहुँच ही गये लेकिन,
मैखाना भी खाली है, बोतल भी तरसती है।
गुरु के दरबार में पहुँच भी गये लेकिन यह नशा ऐसा नहीं है कि बाल्टी भरकर उड़ेल दिया जाय, यह शनै:-शनै: आता है। इसके लिए आप सद्गुरु की सेवा करो, उनकी आज्ञा का पालन करो। उनके निर्देशन के अनुसार साधना सुमिरन करते-करते भजन का नशा शबाब पर आता है। इसलिए पहुँचने पर भी आरम्भ में हमारे लिए ‘मैखाना भी खाली है, बोतल भी तरसती है।’ दुनिया में शराब बोतलों में भरी जाती रही है किन्तु ईश्वरीय नशे के लिए वृत्ति ही बोतल है। इष्टोन्मुखी लगन है, तड़पन है, सब कुछ है लेकिन वृत्ति भजन में टिकती ही नहीं। वृत्ति में तड़प है कि मै (मदिरा) अवश्य प्राप्त कर लें। इसके लिए साधक कभी उपवास करता है, कभी प्रार्थना करता है लेकिन वृत्ति में भजन नहीं टिकता इसलिए ‘बोतल भी तरसती है’। तब साधक करे क्या? उसकी वृत्ति में भजन कैसे स्थायित्व ले? इस पर कहते हैं–
मैखाने के अन्दर ही रहने दे मुझे साकी।
साकी कहते हैं मदिरा पिलानेवाले को। मधुशाला में वेतनभोगी कोई भी व्यक्ति शराब दे देता है किन्तु भजन की जागृति, भजन में साधक को उत्तरोत्तर संरक्षण प्रदान कर लक्ष्य तक ले चलना सद्गुरु की देन है। सद्गुरु ही भजन में खुमारी प्रदान करनेवाले हैं, वही साकी हैं इसलिए साधक प्रार्थना करता है कि उसे मयखाने के अन्दर अर्थात् गुरु दरबार की परिधि में ही रहने दिया जाय; क्योंकि ‘मैखाने के बाहर तो इक आग बरसती है’– गुरु दरबार से बाहर संसार में लोभ-मोह, राग-द्वेष, आशा-तृष्णा-लिप्सा की एक लपट उठती रहती है, विषय की ज्वाला भड़कती रहती है–
मन करि बिषय अनल बन जरई।
होइ सुखी जौं एहिं सर परई।। (मानस, १/३४/८)
मनरूपी हाथी विषयरूपी दावानल में रात-दिन झुलसता रहता है। यह सुखी हो जाय, यदि इस भक्तिरूपी जल में अवगाहन कर ले। इसीलिए साधक सद्गुरु से निवेदन करता है कि उसे दरवाजे पर पड़े रहने दिया जाय। बाहर संसार में आशा-तृष्णा की आग बरस रही है। एक काम पूरा हुआ, दूसरा तैयार, तीसरा तैयार, चौथा तैयार…… इतने में बुढ़ौती आ गयी। जबरदस्ती! त्रितापों में से कोई न कोई पीछा करता ही रहता है– ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा।’ (मानस, ७/२०/१) लगे रहते हैं किन्तु गुरु दरबार में टूटी-फूटी साधना, सेवा करते-करते एक स्तर ऐसा आता है कि–
मैं शह्रे खमोशाँ से गुजरा तो सदा आयी।
एक दिन संस्कारों की भीड़ से भरा अन्त:करण ‘शह्रे खमोशाँ’ अर्थात् कब्रिस्तान जैसा शान्त हो जाता है। एक माताजी मुम्बई से आती हैं। वह कह रही थीं– महाराजजी! जब हम भजन करने बैठते हैं तो मन बतियावत बहुत है। रोटी सेंकते समय मन में दूसरी बातें नहीं आतीं, और सभी कार्यों में यह नहीं भागता लेकिन भजन में बैठने पर भजन के अतिरिक्त दूसरे विचार मन में उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। एक दूसरे ने अपना अनुभव बताया कि भजन करते समय प्राण जाने कहाँ-कहाँ भटकता रहता है। ऐसा इसलिए होता है कि अन्त:करण में संस्कारों की भीड़ लगी हुई है, लेकिन सद्गुरु के दरबार में रहते बन गया तो वृत्ति शान्त प्रवाहित होने लगती है। जब साधक इस खमोशाँ अर्थात् शान्त वृत्ति की अवस्था से गुजरता है तो भगवान देखरेख करने लग जाते हैं, भगवान की ओर से आवाजें आने लगती हैं कि,
आहिस्ता चलो लोगों दीवानों की बस्ती है।
भगवान साधक को सचेत करने लग जाते हैं। इसका यह आशय नहीं है कि साधक कुछ पा गया है। इसका अर्थ केवल इतना है कि अब साधना पकड़ में आने लगी है, ध्यान लगने लगा है। किन्तु ध्यान ही हमारा उद्देश्य नहीं है। ध्यान की परिपक्व अवस्था में जो लक्ष्य विदित होगा, हमारा उद्देश्य वह है। जब तक लक्ष्य परमात्मा प्राप्त न हो जाय, तब तक आहिस्ता चलो, धीरे-धीरे किन्तु लगातार चलते रहो, सचेतावस्था में चलो, सावधान रहकर चलो; क्योंकि यह स्तर दीवानगी का है। विरही, अनुरागी, दीवाना इस पथ में पर्याय हैं। जब चित्तवृत्ति शान्त प्रवाहित हो, साधक को और भी सावधान होकर चलना चाहिए। यह दीवानों का क्षेत्र है, एक प्रभु के पीछे लौ लगानेवाले विरहियों की बस्ती है। विरही का चित्त ही एक लक्ष्य के चिन्तन में प्रवाहित होता है। वह एक प्रभु के चिन्तन में ही डूबता हुआ चलता है।
एक गुरु ने शिष्य से कहा– ‘‘बेटा! इस पेड़ पर चढ़ जा।’’ शिष्य वृक्ष पर चढ़ने लगा। गुरु ने कहा– ‘‘एकदम ऊपर तक चढ़ जा।’’ शिष्य शीर्षस्थ चोटी पर चढ़ गया। शिष्य ने पूछा– ‘‘गुरुदेव अब?’’ उन्होंने कहा– ‘‘उतर आ।’’ और अपने ध्यान में बैठ गये। जब शिष्य की दृष्टि नीचे गयी तो वह काँपने लगा। इतने ऊँचे वृक्ष से चिपकते हुए, सँभलते, खिसकते-खिसकते पर्याप्त नीचे तक उतर आया। जब जमीन की सतह दस फीट रह गयी होगी तो गुरुजी चौंक पड़े। अपना भजन बन्द कर उन्होंने शिष्य को ललकारा– ‘‘सावधान! देखो वह डाल पकड़ लो, उस खूँटी पर पाँव चिपका लो।’’ शिष्य धीरे-धीरे नीचे उतर आया। गुरु महाराज को प्रणाम कर वह बोला– ‘‘ऊपर जहाँ मुझे गिरने की अधिक संभावना थी, आप आँख बन्द कर बैठे थे। जब केवल दस फीट रह गया तो ‘सावधान, खूँटी पकड़, डाल पकड़, चिपक कर चल’। ऐसा क्यों?’’
गुरु महाराज ने कहा– बेटा! उस ऊँचाई पर तू स्वयं सावधान था। नीचे आने पर तू लापरवाह हो चला था कि अब कितना रह गया? अब तो आ गये। इसी अवस्था में माया कामयाब होती है– ‘छोरत ग्रन्थि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।।’ (मानस, ७/११७/६)– माया देखती है कि यह प्राणी हमारे चंगुल से निकला जा रहा है, बन्धन छूटने ही वाला है तब वह ‘बिघ्न अनेक करइ तब माया।’– एक नहीं अनेक विघ्न उपस्थित करती है। ‘कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा।।’ (मानस, ७/११७/८)– वह माया कल करेगी, छल करेगी, बल करेगी; जीव को उलझाने के लिए, नष्ट करने के लिए हर हालत में करीब पहुँचेगी। फिर भी जीव यदि उसके आकर्षण में नहीं फँसा, वह एक सूक्ष्म दाँव और चलती है–
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई।
बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई।। (मानस, ७/११७/७)
वह ऋद्धियाँ प्रदान करेगी, यहाँ तक कि सिद्ध बना देगी। भगवान कभी किसी को सिद्ध नहीं बनाते। बन्धन छूटने का जब समय आता है, माया ही चमत्कार जैसा थोड़ा चारा फेंक देती है। ऐसी स्थितिवाला साधक बगल से निकल भर जाय तो मरणासन्न रोगी भी जी उठेगा, श्वास बन्द हो गयी हो तो लौट आयेगी। श्वास भले ही लौट आये, उसका स्वरूप वही है, साधक का स्तर वही है; किन्तु जहाँ उसने सोचा कि ऐसा तो हमारे पराक्रम से हो गया तो माया कामयाब हो गयी। कुछ दिन तक ऐसे चमत्कार होते रहेंगे किन्तु कुछ ही काल पश्चात् कहीं कुछ नहीं रह जाता।
ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा।
बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।। (मानस, ७/११७/१४)
जो थोड़ा-बहुत चमत्कार मिला था वह भी समाप्त और बन्धन भी नहीं छूटा। इसीलिए महर्षि पतञ्जलि ने साधकों को सचेत किया– ‘व्युत्थाने सिद्धय:’ (पातञ्जल योगदर्शन)– व्युत्थानकाल में सिद्धियाँ प्रकट होती हैं तब वे तो वास्तव में सिद्धियाँ हैं किन्तु कैवल्य-प्राप्ति के लिए यह उतना ही बड़ा विघ्न हैं जितना काम-क्रोध-लोभ इत्यादि। इसलिए जब थोड़ी ही दूरी रह जाती है, सँभलकर चलना पड़ता है। ‘आहिस्ता चलो लोगों दीवानों की बस्ती है’– सूझ-बूझ से, सचेतावस्था में जागरूक रहकर चिन्तन में डूबकर चलना है। यह विरही लोगों की अवस्था है। इस अवस्था के पश्चात् साधकों के चतुर्दिक भीड़ उमड़ने लगती है, किसी को वह स्वप्न में दिखायी देते हैं तो उनके सान्निध्य में अप्रत्याशित घटनाएँ घटने लगती हैं।
दुनिया की निगाहें तो जहरीली हैं नागिन सी,
मैं दूध पिलाता हूँ फिर भी मुझे डसती हैं।।
दुनियावालों की हर निगाह इस अवस्था के साधक के लिए नागिन-सी जहरीली होती हैं। दूध पिलाने पर भी डसना ही उनका स्वभाव है। अनुसुइया के घनघोर जंगल में दूर-दूर तक बस्ती नहीं थी। जंगली कोल-भील और दूरदराज के गाँवों से लोग अपना दु:ख-दर्द लेकर पहुँचते ही रहते थे। वे कहते– ‘‘महाराज! मैं तो मर रहा हूँ, लगता है प्राण नहीं बचेंगे। मलेरिया बुखार तीन महीने से आ रहा है।’’ दयार्द्र होकर महाराज पूछते– ‘‘कितने दिन पर बुखार आता है?’’ कोई अँतरा, कोई तिजारी, कोई चौथिया बताता अर्थात् दूसरे दिन, तीसरे दिन और किसी को चौथे दिन नियमित बुखार आता था। महाराज जी उससे कहते– ‘‘अच्छा, धूनी पर कर प्रणाम! खा विभूति!’’ ज्योंही वह प्रणाम के लिए शिर झुकाता, विभूति खाता, महाराजजी उसे एक छड़ी मार देते थे। वह बेचारा सिकुड़कर बैठ जाता था।
महाराजजी उससे पूछते– ‘‘हाँ, बताओ अब बुखार आने की बारी कब है?’’ वह कहता– ‘‘महाराजजी, कल है।’’ महाराजजी उससे कहते– ‘‘अच्छा! पारी बिताकर आना। देखो क्या होता है!’’ दूसरे दिन उसे बुखार न आता, तो अगले दिन वह दूध-दही कुछ लेकर महाराजजी की सेवा में आकर कहता– ‘‘महाराज! बुखार तो नहीं आया।’’ महाराज उसे सान्त्वना देते– ‘‘जाओ बेटा! गया बुखार।’’ इस प्रकार के हजारों रोगी महाराजजी के पास आते। कोई बुखार, कोई टी.बी. का रोगी, और भी कई तरह के रोगी! महाराज उन्हें छड़ी से छू भर देते, रोग समाप्त हो जाता।
एक दिन महाराजजी ही ज्वराक्रान्त हो गये। डेढ़ वर्ष तक बुखार बना ही रह गया। महाराजजी सोचते, जब हमारे पाप समाप्त हो गये तो यह बुखार क्यों आ रहा है? दो-एक अच्छे वैद्य-डॉक्टर दवा रख जाते किन्तु उधर देखते ही महाराज को अपशकुन हो। भगवान का संकेत था कि दवा छूना मत! चार-छ: महीने पश्चात् वैद्य-डॉक्टर पुन: आते तो उनकी दवा वहीं रखी मिलती। शीशियों के ऊपर गर्द पड़ी रहती। वह कहते– ‘‘महाराजजी! दवा तो लेना चाहिए था। देखिए, आपका स्वास्थ्य कितना खराब हो गया है। आपको भयंकर मलेरिया है, तिल्ली बढ़ गयी है, लीवर कमजोर है।’’ फिर वे दवा बदलकर रख दें किन्तु भगवान मना करते ही रहे।
एक दिन महाराजजी को इतना बुखार चढ़ा कि प्यास के मारे मानो दम निकला जा रहा हो। महाराजजी घिसटते-घिसटते मंदाकिनी नदी के किनारे जाते, दो-चार चुल्लू पानी पीते, एक खप्पर में भरते, अन्य कोई पात्र भी नहीं था। पुन: बैठकर खिसकते-खिसकते आसन तक आते तो पुन: प्यास तड़क जाती। वह खप्पर का जल पी लेते। पुन: वैसी ही प्यास! उस दिन महाराज जी चार पलोटन नदी तक गये और आये। इतने में वह पस्त हो गये। ज्वर के आवेग में उन्होंने भगवान को भी उलाहना दे डाला कि ‘जब हमारी निवृत्ति हो गयी, पाप है ही नहीं तो मैं यह मरणान्तक कष्ट क्यों भोग रहा हूँ?’
उस दिन भगवान ने महाराजजी को बताया– ‘‘जो लोगों को छूकर उनका बुखार उतार लेते हो, उसे कौन भोगेगा?’’ महाराज ने कहा– ‘‘हमने तो कई हजार लोगों को छू दिया है। यह कब तक भोगना पड़ेगा?’’ अनुभव में ही महाराजजी को एक काला-सा एक आँख का डुमार दिखाई पड़ा। उसके शरीर से बुखार जैसी दुर्गन्ध आ रही थी। उसने कहा– ‘‘मालिक! तीन आना पैसा हमारा मिल जाय।’’ महाराजजी ने पूछा– ‘‘यह तीन आने क्या है? कैसे वसूल करोगे?’’ उसने कहा– ‘‘तीन महीने और बुखार।’’ महाराज बिगड़े– ‘‘धत् तेरे पापग्रह की! एक आने में एक महीना भोगावत है।’’
महाराज ने लोगों से पूछा– ‘‘हो! यह कौन महीना चल रहा है?’’ लोगों ने कहा– ‘‘महाराज! सावन लगा है।’’ महाराज ने कहा– ‘‘तो सावन, भादों और कुआर! कुआर में मेरा बुखार उतर जायेगा।’’ महाराज अपने को समझाते थे– ‘भोग लो परमहंसजी! जब बुखार उतारा है तो उसे भोगेगा कौन!’
यही आशय इन पंक्तियों का भी है कि ‘दुनिया की निगाहें तो जहरीली हैं नागिन सी’। नागिन के डसने से व्यक्ति अधिक से अधिक एक बार मर सकता है किन्तु साधक यदि दुनिया की निगाहों के झाँसे में आ गया तो कई जन्म लेना पड़ सकता है। सांसारिक लोग तरह-तरह की समस्या लेकर आते हैं। किसी को लड़का नहीं है, किसी की कन्या का विवाह तो कहीं पदोन्नति का मामला, कहीं नौकरी नहीं लगी तो कहीं मुकदमेबाजी; दुनिया में और है ही क्या?
‘मैं दूध पिलाता हूँ’– दूध का आशय क्या है? मानस में है–
जड़ चेतन गुन दोष मय, बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार।। (मानस, १/६)
विधाता की सृष्टि गुण और दोषों से मिलकर बनी है। इसमें से सन्त ईश्वरीय गुणरूपी दूध को ग्रहण कर लेते हैं और प्रकृति के विकाररूपी वारि का त्याग कर देते हैं। इसी प्रकार साधक, जिनकी वृत्ति शान्त प्रवाहित है, जब ‘शह्रे खमोशाँ’ से गुजरते हैं तो भगवान उन्हें सचेत करते चलते हैं। दुनिया की निगाहें उसे डसने का प्रयास करती हैं किन्तु सन्त तो उन्हें दूध ही पिलाता है, उनके कल्याण का पथ ही प्रशस्त करता है, उनमें ईश्वरीय गुणों का ही सूत्रपात् करता है। ‘फिर भी मुझे डसती हैं’– लाख दूध पिलाये, ईश्वरीय गुणधर्मों का बीजारोपण करे, किन्तु समस्याएँ तो सामने आयेंगी ही।
इसीलिए साधक के समक्ष ईश्वर से न मिल पाने की उदासी का आलम बना रहता है। इष्ट को देखने की तड़प बनी रहती है। उधर इष्ट की कृपा भी बरसती रहती है किन्तु प्रभु की महिमा का परिचय मिलते ही साधक की तड़प बढ़ जाती है।
अपने युग के सर्वोपरि महापुरुष गोस्वामी तुलसीदासजी का बचपन अत्यन्त विपन्नावस्था में अनाथ बालक की तरह व्यतीत हुआ। युवावस्था में कहा जाता है कि बढ़ी हुई यमुना नदी को एक लाश के सहारे पार कर, दीवाल पर लटकते सर्प को पकड़कर रात के अँधेरे में अपनी पत्नी के कक्ष तक पहुँच गये। पत्नी ने पूछा– ‘‘आप यहाँ तक आये कैसे?’’ उन्होंने बताया– ‘‘तुमने रस्सी जो लटका रखी थी।’’ पत्नी ने पूछा– ‘‘नदी कैसे पार की?’’ तुलसी ने बताया– ‘‘एक लकड़ी का कुन्दा पकड़कर, लेकिन उससे दुर्गन्ध बहुत आ रही थी।’’ पत्नी को बहुत ग्लानि हुई। उसने कहा– ‘‘मुझसे मिलने के प्रयास में आप दो बार मरने से बचे। इस क्षुद्र हाड़-मांस के पिंजरे के लिए इतना मोह! इसकी आधी भी लगन यदि भगवान से हो तो बेड़ा पार हो जाता।’’ पहले तो तुलसी को कुछ समझ में ही नहीं आया। जब उसने दुबारा झिड़का तो उन्हें कुछ होश आया। जब यही तीसरी बार सुना तो तुलसी का विवेक जागृत हुआ, वह बोले– ‘‘चुप-चुप! किसी से कहना नहीं कि तुलसी आया था।’’ वह छत से नीचे कूदकर भाग गये, लौटकर घर गये ही नहीं।
तुलसी जा रहे थे काम की ओर, किन्तु निकल पड़े राम की ओर! वास्तव में शरीर में न काम है, न क्रोध, न लोभ है और न मोह! वृत्ति में ही सबकुछ है। इसे सन्मार्ग की ओर मोड़ने के लिए–
संगत ही गुन होत है, संगत ही गुन जाय।
बाँस फाँस अरु मीसिरी, एकै भाव बिकाय।।
मिश्री में लगी हुई बाँस की खपच्ची भी मिश्री के भाव में बिक जाती है। इसलिए उत्तम संगति करनी चाहिए। सर्वोपरि संगति सत्पुरुषों की है।
मति कीरति गति भूति भलाई।
जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।।
सो जानब सतसंग प्रभाऊ।
लोकहुँ वेद न आन उपाऊ।। (मानस, १/२/५-६)
इन सबकी प्राप्ति का अन्य कोई उपाय न लोक में है, न वेद में है। किताब रटने से कुछ नहीं मिलेगा। किताबों का शिरमौर वेद है। गोस्वामीजी कहते हैं कि वेद में भी कोई उपाय नहीं है। सद्बुद्धि, कीर्ति, परमगति, ऐश्वर्य और कल्याण जब कभी किसी ने पाया है तो सत्संग से पाया है। एक प्रभु में श्रद्धा रखता हो, प्रभु के उस एक नाम का जप करें। चलते-फिरते, उठते-बैठते नाम याद आया करे तो सोने में सुहागा है।
।। ॐ श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय ।।
(‘अमृतवाणी भाग-5’ से उद्धृत)