मय पीकर जे बउराइ गवा

मय पीकर जे बउराइ गवा

संसार में जब भी किसी ने परमात्मा को पाया है, भजन के नशे से गुजरकर ही पाया है। सन्त इकबाल इत्यादि इसी स्तर के महापुरुष थे। उन सबके विचारों का भावानुवाद प्रस्तुत पद में प्रस्तुत है–

मय पीकर जे बउराइ गवा मत पूछ का देखेसि।

पक्षिन मां मानुष मां गाछन मां हर मां हरि का जलवा देखेसि।।

मन इल्म मारफत का दारू जब पीकर के मखमूर भवा।

हू हू का नारा लाग भरै हस्ती का प्याला चूर भवा।।

अमर लोक में लाग घुमै या मृत्युलोक से दूर भवा।

अपने में हरि के लाग लखै कुल मन कै मनसा पूर भवा।।

जब जब चाहिसि हृदय बीच या दुनिया का नकशा देखेसि।

मय पीकर……।।

मंसूर अनलहक का दारू जब पीकर के मस्ताना भा।

दुसरी दुनिया में लाग घुमै यहि दुनिया से बेगाना भा।।

अपने में हरि का लाग लखै सब समझेनि की बौराना बा।

फाँसी पर चढ़ाइ दिहेन उलमा मुए पर पदी जमाना भा।।

जब लहू अनलहक कहि दिहलेसि तब के देखेसि दुनिया देखेसि।

मय पीकर……।।

जे जैसन जैसन पियत गवा तैसन तैसन दरजा होइगा।

केउ नबी बनल केउ कुतुब बनल केउ विज्ञानी बाला होइगा।।

केउ मस्त होइ बउराइ गवा सब समझेनि की पगला होइगा।

केउ कुम्मे इज्नी कहि दिहलेसि मरल मनई जिन्दा होइगा।।

जे भूलभुलैया में भूलल का देखेसि माया देखेसि।

मय पीकर……।।

जेकरे पर सरिअत खुनसाइल जिउ दइकै अम्मर होइगा।

आकाश के ऊपर लाग घूमै दूनौ बाजू में पर होइगा।।

सोच रहल मिट गइल खुदी तब मनई दूसर होइगा।

सबके लखै लखि परे लामकां पर ओकर घर होइगा।।

तीनहूँ लोक चौदहो भुवन बैकुण्ठ दरइँ बैठा देखेसि।

मय पीकर……।।

इस भजन में प्राप्ति की ओर अग्रसर साधक की रहनी पर प्रकाश डाला गया है। सन्त सृष्टि के किसी कोने में हो जायँ, एक ही निर्णय पर आते हैं। यह मत-मतान्तर, म़जहब-सम्प्रदाय, वाह्य व्यवस्था और कानून का शिकंजा तैयार करते हैं। इनमें आध्यात्मिकता भी आंशिक रूप से रहती है किन्तु अधिकांशत: इनसे उत्पीड़न ही हुआ है। इन संकीर्णताओं से कभी भला नहीं होता। इन मत-मतान्तरों के अनुपालन से भगवान कभी नहीं मिलते और न भजन का नशा ही मिलता है। वह तो केवल रूढ़ि पकड़ा देते हैं।

महापुरुषों ने पाया कि भजन एक नशा है। वह नशा भी ऐसा जो खव्तुल हवास पागल बना देता है। यदि बाहर की दुनिया का भान रह ही गया तो नशा चढ़ा कहाँ? अभी तो अपना भला-बुरा चयन ही कर रहे हैं; किन्तु भजन की खुमारी में,

मय पीकर जे बउराइ गवा मत पूछ का देखेसि।

पक्षिन मां मानुष मां गाछन मां हर मां हरि का जलवा देखेसि।।

भजन एक नशा है। मदिरा के नशे से इसका नशा कम नहीं है। इसे पीकर जो बावला हो गया, इसी के नशे में झूम गया; जैसे मीरा झूमी थी, सुतीक्ष्ण झूमे थे। उन्होंने सुना कि भगवान राम आ गये। वह विचार करते हुए आतुरता के साथ दौड़ पड़े–

हे बिधि दीनबन्धु रघुराया।

मो से सठ पर करिहहिं दाया।। (मानस, ३/९/४)

मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं।

भगति बिरति ग्यान मन माहीं।। (मानस, ३/९/६)

हे विधाता! दीनबन्धु प्रभु! क्या मेरे ऐसे अधम पर भी कृपा करेंगे? हमारे हृदय में भरोसा दृढ़ नहीं हो रहा है; क्योंकि मुझमें न भक्ति है, न वैराग है न ज्ञान।

नहिं सतसंग जोग जप जागा।

नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।।

एक बानि करुनानिधान की।

सो प्रिय जाके गति आन की।। (मानस, ३/९/७-८)

मेरे पास न जप का बल है; न सत्संग, योग या यज्ञ ही है। हाँ, भगवान का एक बाना है कि वह उन्हें प्राणों के समान प्यारा होता है जिसे किसी अन्य का भरोसा न हो। इसलिए,

होइहैं सुफल आजु मम लोचन।

देखि बदन पंकज भव मोचन।। (मानस, ३/९/९)

दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा।

को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा।।

कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई।

कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।। (मानस, ३/९/११-१२)

वह इतना प्रेम-विभोर हो गये कि पूरब किधर, पश्चिम किधर– कोई ज्ञान नहीं रहा। मैं कौन हूँ और कहाँ जा रहा हूँ?– यह भी भूल गये।

अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा।

प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।। (मानस, ३/९/१४)

अतिशय प्रीति का प्रवाह देख भवबाधा को शान्त करने के लिए भगवान उनके हृदय में प्रकट हो गये। और जहाँ स्वरूप हृदय में आया,

मुनि मग माझ अचल होइ वैसा।

पुलक सरीर पनस फल जैसा।। (मानस, ३/९/१५)

मुनि बीच रास्ते में निश्चल होकर बैठ गये। वह किसी पगडण्डी में नहीं बैठे, फुटपाथ पर नहीं बैठे! सृष्टि से पार जाने का एक ही तो रास्ता है– निवृत्तिपथ, भक्तिपथ। भक्तिपथ में जहाँ स्वरूप हृदय में आया, चञ्चलता समाप्त हो जाती है, मन और मन की सुरत स्थिर हो जाती है। भगवान समीप आ गये। मुनि को जगाने लगे किन्तु वह नहीं जगे। प्रभु ने एक उपाय किया। हृदय से रामरूप तिरोहित हो गया और चतुर्भुज स्वरूप प्रसारित हो गया।

मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें।

बिकल हीन मनि फनिबर जैसें।। (मानस, ३/९/१९)

मुनि घबड़ाकर खड़े हो गये मानो सर्प की मणि खो गयी हो। जहाँ उन्होंने आँखें खोलीं तो भगवान सामने खड़े थे। जब स्वरूप हृदय में आ जाता है तो जहाँ भी दृष्टि डालें, भगवान वहाँ हैं। अस्तु, सुतीक्ष्ण भजन के नशे में इतने विक्षिप्त हो गये थे कि अपना और दिशाओं का बोध भी नहीं रह गया था। इन पंक्तियों में इसी नशे का संकेत है–

मय पीकर जे बउराइ गवा मत पूछ का देखेसि।

यह तो पूछो ही मत कि उसने क्या देख लिया? क्योंकि उसने जो देखा है वह वाणी का विषय नहीं है। वाणी से कहकर हम उसे समझा ही नहीं सकते। इसे वही जानता है जिसके हृदय में वह देखते बन रहा है। उसने क्या पाया?– तो,

पक्षिन मां मानुष मां गाछन मां हर मां हरि का जलवा देखेसि।

उसने पक्षियों में, मनुष्यों में, वृक्षों में, जहाँ भी दृष्टि पड़ी अर्थात् जड़-चेतन, जंगम-स्थावर जहाँ भी निगाह गयी, हर मां हरि का जलवा देखेसि’– सबमें परमात्मा का संचार देखा, उनके स्वरूप का विस्तार देखा, उनकी विभूति और लीला देखी।

सरगु नरकु अपबरगु समाना।

जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।। (मानस, २/१३०/७)

यह अवस्था सन्तों में आती है। सूफी सन्तों ने कोई नयी बात नहीं कही थी। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह स्तर जब आता है तो न स्वर्ग स्वर्ग के रूप में रहता है और न नरक नरक के ही रूप में रह जाता है जिसकी हम कामना या घृणा करें। उस समय साधक की जहाँ भी दृष्टि पड़ी, उसने अपने आराध्यदेव के स्वरूप को खड़ा पाया। यदि ऐसा है तो नशा सही है। भला इस नशे को आपने प्राप्त कैसे किया? इसकी विधि क्या है?– तो,

मन इल्म मारफत का दारू जब पीकर के मखमूर भवा।

हू हू का नारा लाग भरै हस्ती का प्याला चूर भवा।।

अमर लोक में लाग घुमै या मृत्युलोक से दूर भवा।

अपने में हरि के लाग लखै कुल मन कै मनसा पूर भवा।।

जब जब चाहिसि हृदय बीच या दुनिया का नकशा देखेसि।

मय पीकर……।।

धर्म का पालन करने के लिए संसार में दो तरीके प्रचलित हैं। एक तो शास्त्रीय पद्धति, व्यवस्थापरक पद्धति ‘शरीअत’, जिसे प्रवृत्ति मार्ग भी कहा जाता है और दूसरा है गुरु द्वारा निर्दिष्ट ज्ञान, जो गुरुओं के ‘मारिफ़त’ अर्थात् माध्यम से मिलता है जिसे निवृत्ति मार्ग भी कहा गया है। इन दोनों में प्राय: मतभेद हुआ करता है; क्योंकि गुरु कहता ‘आँखिन की देखी’ और शास्त्रों में प्रधानता है ‘कागज की लेखी’ का, जिसकी व्याख्या पढ़े-लिखे लोग बुद्धि और तर्क से करने लगते हैं जिसका ईश्वरीय पथ में बहुत उपयोग नहीं है। इसलिए सूफी सन्तों का आग्रह है कि यह इल्म मारिफ़त द्वारा मिलता है और इसे पीने का पात्र मन है।

भौतिक नशा सुराही से, प्याले से, बोतल से और मुँह से पीते हैं लेकिन भजन का नशा वस्तुओं के सहयोग से नहीं, मन से पिया जाता है। मन इल्म मारफत का दारू’– इल्म अर्थ है विद्या, योगयुक्ति! यह एक गोपनीय विद्या है जो भगवान तक की प्राप्ति करा दे वह भजन-विधि। यह कहीं नहीं मिलेगी सिवाय सद्गुरु के। यह इल्म जहाँ प्राप्त होता है वह स्थान है गुरु का दरबार।

कभी-कभी बहुत पढ़े-लिखे ख्यातिलब्ध विद्वान् महाराज जी के दर्शन को आ जाते थे। साथवाले उनका परिचय देते कि– महाराजजी! आपने दर्शनशास्त्र और अध्यात्म पर शोध किया है। आपने देश-विदेश की डिग्रियाँ ली हैं। वह लोग स्वयं भी निवेदन करते कि सब कुछ तो हमलोगों ने पलट डाला; किन्तु साधन समझ में नहीं आता, भजन-विधि समझ में नहीं आती। महाराज जी उनसे कहते, ‘‘हो! सब बात सब कोई जानत है। दो-दो पैसे में वेदान्त बिकत हैं। लोग पढ़त हैं और लिखतौ जात हैं। पता नहीं क्या लिखत हैं लेकिन केवल भजन ही एक ऐसी वस्तु है जो लिखने में नहीं आती, वाणी से कहने में नहीं आती। वह तो किसी महापुरुष के द्वारा किसी-किसी अनुरागी के हृदय में जागृत हो जाया करती है।’’

लक्ष्मण ने भगवान राम से पूछा, ‘‘प्रभो! सुख का स्रोत क्या है?’’ भगवान ने कहा–

भगति तात अनुपम सुख मूला।

मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।। (मानस, ३/१५/३)

लक्ष्मण! अनुपम सुख की मूल तो भक्ति है, लेकिन इसकी प्राप्ति तभी होगी जब सन्त अनुकूल हों। सीधे-सीधे तो मैं भी नहीं दे सकता। जब कभी भक्ति मिलेगी, तो सो बिनु सन्त काहू पाई।’ (मानस, ७/११९/१८)

सन्त कबीर से किसी ने पूछा– ‘‘भगवन्! यह भक्ति कहाँ से प्राप्त करें? यह तीर्थों में मिलेगी, पुस्तकों में या कर्मकाण्ड के अनुष्ठान से?’’ कबीर ने कहा– ‘‘इनमें कुछ भी कर डालो, भक्ति नहीं मिलेगी।’’ जो भगवान से सीधा मेल कराती है उसका नाम है भक्ति! विभक्त माने होता है विभाजन, अलगौझी। यह भक्ति तो सन्तो! भगती सदगुरु आनी।’– सद्गुरु प्रदान करते हैं, लाकर दे देते हैं, जागृत कर देते हैं। यह मन सद्गुरु प्रदत्त योगयुक्ति के मारि़फत शनै:-शनै: नशा प्राप्त करने लगा, नाम की खुमारी चढ़ने लगी और चढ़ते-चढ़ते जब पीकर के मखमूर हुआ’– इतना पिया कि नशे में डूब गया, इतना भजन किया कि मखमूर अर्थात् यज्ञस्वरूप हो गया तब उसने पाया कि मैं तो निमित्त मात्र हूँ, कर्ता-धर्ता तो प्रभु स्वयं हैं; उस दिन से उसने पाया कि उसके इशारे के बिना तो पत्ता भी नहीं हिल सकता। तब,

हू हू का नारा लाग भरै हस्ती का प्याला चूर भवा।

अब तक तो वह साधक ‘मैं, मैं’ कर रहा था– यह सब मैंने किया, मैंने भजन किया, मैंने ध्यान किया, यह कुटिया-बगिया मेरे भजन के प्रताप से है– बिनु तप तेज कि कर विस्तारा।’ किन्तु नशा चढ़ जाने पर वही आज कहने लगा– भगवन्! सब तू ही तू है। वास्तव में साधक तो एक नाथा हुआ बैल है। वह तो निमित्त मात्र है। करता-धरता तो हरि हैं। इसलिए उसके हस्ती का प्याला तो टूट गया, अब भविष्य में भी उसे अहं आयेगा ही नहीं।

अमर लोक में लाग घुमै या मृत्युलोक से दूर भवा।

मृत कहते हैं नाशवान् को। जगत् नाशवान् है, परिवर्तनशील है, क्षणभंगुर है, प्रतिपल भंग होते चला जा रहा है, यह कल नहीं रह जायेगा। आज फुदकते हुए गुलफाम की तरह बच्चे, आयु के साथ झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और एक दिन राम नाम सत्य हो जाता है। यह संसार मरणधर्मा है। अमृत, जहाँ मृत्यु का समावेश न हो, जिसे मृत्यु न मार सके, वह है आत्मा! आत्मा अविनाशी है, आत्मा शाश्वत है। इसे न तो शस्त्र काट सकता है, न आग जला सकती है, न वायु सुखा सकता है, न आकाश विलय कर सकता है और यह शरीर के मरने से न तो मरता ही है। आत्मा नित्य, शाश्वत, सनातन, काल से अतीत, परमतत्त्व है और साधक भजन की खुमारी प्राप्त कर लेने के पश्चात् आत्मा के आलोक में भ्रमण करने लगता है इसलिए जन्म-मृत्यु की परिधि से बहुत दूर निकल जाता है। उस समय,

अपने में हरि के लाग लखै कुल मन कै मनसा पूर भवा।

वह अपने में हरि को देखने लगा, उसकी सारी मनोकामना पूर्ण हो गयी। जहाँ भगवान रहते हैं, जहाँ लक्ष्मी रहती है, ऐश्वर्य रहता है; भगवान अविनाशी हैं, साधक अविनाशी स्थितिवाला हो जाता है। भगवान सर्वत्र हैं तो महापुरुष भी सर्वज्ञता की अवस्था प्राप्त कर लेता है। जड़ जीव संसार में जितने भोग भोग सकता है, भगवान के तादात्म्य से उससे बहुत आगे की समृद्धि वह भक्त पा जाता है। ऐसा कुछ भी नहीं है जिसकी वह चाह करे। उसकी रहनी ऐसी हो जाती है कि–

जब जब चाहिसि हृदय बीच या दुनिया का नकशा देखेसि।

उसने इच्छा कर लिया कि हिमालय की चोटी पर क्या है या काशी में क्या हो रहा है? तत्काल वहाँ का वातावरण, वहाँ की परिस्थिति उसके समक्ष आ जायेगी। उसके पास टेलीविजन से भी बड़ा यन्त्र है। वह चाह भर ले!

सती अनुसुइया आश्रम चित्रकूट में गुरुदेव विराजमान थे। क्वार का महीना था। जगह-जगह रामलीला का मंचन चल रहा था। उनमें काशी की रामलीला विख्यात थी। महाराज जी ने बताया– ‘‘हो! हमारे मन में आया कि एक बार काशी की रामलीला और देखते। जब भी चलने का मन करता, भगवान मना कर देते। महाराज ने भगवान का आदेश शिरोधार्य कर लिया किन्तु मन में इच्छा तो थी ही। तीसरे पहर महाराज गाँजे का दम लगाकर चिलम हाथ में लेकर बैठे तो बैठे ही रह गये। घण्टा, डेढ़ घण्टा, दो घण्टे हो गये, चिलम न जाने कब बुझ गयी। जब होश में आये तो कहने लगे– आज तो मैं रामलीला देखने चला गया। यहीं से उड़ते-उड़ते गया और लीला देखकर चला आया। आज यह लीला हुई, आज ऐसा हुआ। जब तक रामलीला चलती रही, महाराज ऐसा ही कुछ कहते रहे।

एक दिन महाराज चौंक पड़े। वह बोले– यार! आज तो गजब हो गया। लीला में हाथी बिगड़ गया। राजा गिरते-गिरते बचे। मैं भी हाथी के पाँव से दबते-दबते किसी प्रकार दूर सरक गया। व्यासजी रामजी का हाथ पकड़कर गिरते-पड़ते भाग लिये। बड़ी ताली, बड़ी थपोड़ी बजी। सबेरे भी अपना यह वर्णन महाराज जी कर ही रहे थे कि दर्शनार्थियों का एक दल आ पहुँचा। महाराज जी के मुख से यह विवरण सुन उन्हें आश्चर्य हुआ; क्योंकि कल की वह लीला देखने के पश्चात् कार से चलकर यह लोग रातोरात चित्रकूट आ गये थे और पैदल चलकर अनुसुइया पहुँच रहे थे। उन्होंने कहा– ‘‘अरे महाराज! आप कब आ गये? हमलोग रातभर कार से चलकर अभी पहुँच ही रहे हैं। आप किस साधन से चले आये? जब हाथी बिगड़ा था, हमलोग वहीं थे।’’ महाराज जी बोले– ‘‘भैया! हम गये ही नहीं थे। मैं यहाँ बैठे-बैठे ही सब देखा करता हूँ।’’ यही इस पंक्ति में भी है कि जब जब चाहिसि हृदय बीच या दुनिया का नकशा देखेसि।’ वह देख लेगा किन्तु कब? जब मय पीकर बौराय गवा’। ऐसा भजन करें कि होश न रहे, भगवान और साधक की सुरत तद्रूप हो जाय, डोरी लग जाय, नशा हो जाय, खुमारी चढ़ जाय– सुतीक्ष्ण की तरह, जड़ भरत की तरह, मीरा की तरह, शरमद और मंसूर की तरह! अगले पद में पीनेवालों में एक सन्त मंसूर का नाम लिया–

मंसूर अनलहक का दारू जब पीकर के मस्ताना भा।

दुसरी दुनिया में लाग घुमै यहि दुनिया से बेगाना भा।।

अपने में हरि का लाग लखै सब समझेनि की बौराना बा।

फाँसी पर चढ़ाइ दिहेन उलमा मुए पर पदी जमाना भा।।

जब लहू अनलहक कहि दिहलेसि तब के देखेसि दुनिया देखेसि।

मय पीकर……।।

नाम का नशा पीते-पीते मंसूर को इतनी खुमारी चढ़ी कि अनलहक की अवस्था आ गयी, ब्रह्म और आत्मा तद्रूप हो गये। वह कहने लगे कि मैं खुदा हूँ, अहं ब्रह्मास्मि’ कहने लगे। वह इस दुनिया से अनजान होकर परमात्मा की धारा में चलने लगे– मैंने जाना दुनिया को, दुनिया ने मुझे जाना।’ उसने पाया क्या? अपने में हरि का लाग लखै’– अपने हृदय-देश में, अपने स्वरूप में वह हरि को देखने लगे। अपने में भगवान का संचार देखने लगे तो सबने उन्हें पागल समझा। मौलवियों ने इसे धर्मविरुद्ध समझ बादशाह से शिकायत की।

फाँसी पर चढ़ाइ दिहेन उलेमा, मूए पर पदी जमाना भा।

धर्माधिकारी उलेमा वर्ग को मंसूर का अनलहक कहना कुफ्र लगा, शरीअत के खिलाफ लगा। उन्होंने फतवा जारी कर दिया कि यह अपने को अल्लाह कहता है, काफिर है। इसे शूली पर चढ़ा दिया जाय। शूली से पहले उनके हाथ-पाँव काटे गये, आँखें निकाल ली गयीं, तब भी मंसूर को अपने कथन पर कोई खेद नहीं था। उन्हें संगसार अर्थात् पत्थरों से मारने की सजा भी दी गयी। जनता ने पत्थर फेंकना शुरू किया, मंसूर शान्त रहे। उस भीड़ में वाहिद नाम के एक सन्त थे जो मंसूर की स्थिति से परिचित थे; किन्तु उलेमाओं की कट्टरता देख उन्होंने सोचा कि यदि मैं कुछ नहीं फेंकूँगा तो लोग समझेंगे कि यह भी काफिर है। अपने बचाव के लिए उन्होंने एक फूल (कुछ लोगों के अनुसार मिट्टी का बहुत छोटा-सा टुकड़ा) मंसूर की ओर फेंक दिया। जहाँ फूल का शरीर से स्पर्श हुआ, मंसूर चीख उठे, ‘‘वाहिद! ये बेचारे अनजान हैं, तू तो जानता है फिर भी तुमने फूल उठाकर मारा। इनके पत्थरों की चोट तो हमें नहीं लगी लेकिन तुम्हारे फूल से हमें चोट पहुँची।’’ जनता समझ गयी कि आँखें न होने पर भी यह देख रहे हैं कि कौन पत्थर फेंक रहा है और कौन फूल? अन्त में उन्हें कत्ल कर दिया गया किन्तु कटे हुए अंगों से रक्त की जो बूँदें टपकती थीं, उनसे भी अनलहक की आवाजें आ रही थीं जिसे किसने नहीं देखा? सभी ने देखा। आज इस्लाम जगत् में जिन सन्तों की पूजा होती है या जिनकी मजारों पर फूल चढ़ते हैं, वे किसी समय में काटे गये, सताये गये। ऐसे सन्तों में सन्त तवरेज, मंसूर, शरमद, राबिया इत्यादि के नाम उल्लेखनीय हैं। प्रश्न उठता है कि सबको बराबर नशा क्यों नहीं होता? यह निर्भर करता है हमारी साधना पर, लगन पर।

जे जैसन जैसन पियत गवा तैसन तैसन दरजा होइगा।

केउ नबी बनल केउ कुतुब बनल केउ विज्ञानी बाला होइगा।।

केउ मस्त होइ बउराइ गवा सब समझेनी की पगला होइगा।

केउ कुम्मे इज्नी कहि दिहलेसि मरल मनई जिन्दा होइगा।।

जे भूलभुलैया में भूलल का देखेसि माया देखेसि।

मय पीकर……।।

जिसने भजन में जितनी लौ लगायी, जितनी मात्रा में संयम साधा, उसका वही स्तर होता गया। केउ नबी बनल’– कोई नबी अर्थात् अवतार की अवस्थावाला हो गया, केउ कुतुब बनल’– कोई कहीं का बड़ा ऋषि, मठाधीश या महन्त बन जाता है। केउ विज्ञानी’– कोई अनुभवी संचारवाला हो गया, वह बैठे-बैठे ही सर्वत्र की जानकारी लेने-देने लग जाता है और कोई बाला’ अर्थात् बालकवत् रहनीवाला हो गया। स्वरूप में स्थित महापुरुष परमहंस और पाँच वर्ष का बच्चा एक ही होता है। महापुरुष का शरीर भर बड़ा है किन्तु मन:स्थिति बच्चे की होती है। पाँच वर्ष के बच्चे में काम-क्रोध-लोभ-मोह-राग-द्वेषादि विकार नहीं होते। भजन इस ऊँचाई तक पहुँचे कि अन्त:करण में बालवत् स्वभाव आ जाय। यह संतत्व की चरमोत्कृष्ट अवस्था है। सनकादिक इसी अवस्था के सन्त थे– देखत बालक बहुकालीना’ (मानस, ७/३१/४)। इन्हीं पीनेवाले सन्तों में से केउ मस्त होइ बउराइ गवा, सब समझेनि की पगला होइगा’– कोई आनन्द में इतना डूब गया, मस्त हो गया कि लोगों ने समझ लिया कि यह अवश्य पागल है, विक्षिप्त है।

इसी कोटि के महापुरुष जड़भरत थे। जीवन के आरम्भिक वर्षों में वह चक्रवर्ती सम्राट रह चुके थे। उस ऐश्वर्य में भी जब उन्हें कोई रस नहीं दिखाई पड़ा तो सबकुछ त्यागकर सन्त हो गये। भजन पूर्ण हो ही चला था कि एक मृग में आसक्ति हो गयी। जंगल में नदी के किनारे जहाँ वह भजन कर रहे थे, उन्हें एक शेर की दहाड़ सुनायी पड़ी। उन्होंने देखा कि उस दहाड़ से भयभीत एक मृगी ने छलाँग लगायी। उसका प्रसवकाल था, बच्चा वहीं गिर गया। अब महाराज को उस मृगशावक पर दया आ गयी। उन्होंने उस बच्चे का लालन-पालन शुरू किया। वह मृगशावक दस दिन में ही कुलाँचे मारने लगा और एक दिन छलाँग लगाया तो जंगल में ओझल हो गया। भरत बहुत चिन्तित हो गये कि अभी वह निरा शावक है, कोई अनुभव नहीं है। वह इतना भोला है कि शेर का भी मुँह सूँघ लेगा, बहेलिये को भी छू लेगा। अभी तक वह आया नहीं, कहाँ चला गया? कुछ अनहोनी तो नहीं हो गयी!

भरत के जीवन के वे अन्तिम क्षण थे। मृगशावक का चिन्तन करते-करते उनका शरीर छूट गया। ‘अंत मति सो गति’ के सिद्धान्त के अनुसार उनका अगला शरीर मृग का मिला। मृग के शरीर में भी उन्हें ज्ञान था कि मैं सन्त रहा हूँ, मोह का परिणाम भुगत रहा हूँ। उन्होंने मृगों का झुण्ड छोड़ दिया और एक सन्त की कुटिया में चले गये। महात्मा लोग किसी जीव को पाते हैं तो उसे बड़े स्नेह से पालते हैं। मृग का भी पालन होने लगा। मृग बने भरत ने सोचा, जीवन तो कट रहा है किन्तु इस पशुयोनि में कब तक रहूँगा? वह इन्द्रायणी नदी में गले तक पानी में जाकर खड़े हो गये। चार दिनों तक वह बिना पानी पिये नदी में खड़े रहे और शरीर त्याग दिया।

मृगशरीर त्यागने पर उनका अगला जन्म एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ। वह आठ भाई थे जिनमें तीन तो विद्वत्ता में दिग्विजय कर रहे थे। उनमें मूर्ख थे तो यह भरत! यद्यपि इनका पूर्वज्ञान यथावत् था, विद्या ज्यों-की-त्यों थी; किन्तु यह उसका प्रयोग जानबूझकर नहीं करते थे। पिता ने सोचा– ब्राह्मण का लड़का है, कुछ तो पढ़ ले, कुछ तो याद कर ले। उन्होंने छ: महीने तक गायत्री मंत्र पढ़ाया और अन्त में कहा– गायत्री मंत्र सुना दो। भरत ने कहा– ‘ओ गाय भैंस..।’ पिता ने भी हार मान ली कि यह नहीं पढ़ेगा।

पिता के मरने पर भाइयों ने भरत को कृषि-सुरक्षाहेतु नियुक्त किया। खेतों में लोग पक्षी उड़ा रहे थे किन्तु भरत गा रहे थे– राम की चिड़िया राम का खेत। खा लो चिड़िया भर भर पेट।।’ कोई प्रतिरोध न देख सारे पक्षी इन्हीं के खेत पर मँड़रा रहे थे। बड़ा भाई आया। उसने भरत को एक झापड़ मारा और बोला– खाता है किलोभर! यह पक्षी कौन उड़ायेगा? तुम्हारी रखवाली से तो फसल का सर्वनाश हो जायेगा। उसने गर्दन पर हाथ लगाकर बोला– जा, कहीं भी चला जा।

भरत इसी दिन की प्रतीक्षा में थे कि यह लोग धक्का देकर हमें घर से निकाल दें। कदाचित् मैं निकलने का प्रयास करूँगा तो यही लोग बाधाएँ खड़ी करेंगे कि भाई! तू ही तो घर का उजाला था, तेरे जाने से अँधेरा हो गया। फिर तो ये पिण्ड नहीं छोड़ेंगे। भय्या-भय्या की कतार लग जायेगी। अच्छा हुआ, इन्होंने स्वयं निकाल दिया।

लोक-व्यवहार से उदासीन भरत ‘जड़भरत’ के नाम से जाने जाते थे। वह मस्ती में जंगल की ओर निकल गये। वहाँ सात डाकू देवी की पाषाण-प्रतिमा के समक्ष नरबलि का अनुष्ठान कर रहे थे। बलि के लिए पकड़ा गया मनुष्य बन्धन खोलते ही सरपट दौड़कर जंगल में ओझल हो गया। सरदार ने कहा– ‘‘शीघ्रता करो! किसी दूसरे को पकड़कर लाओ अन्यथा समय पर बलि न मिलने से देवी नाराज हो जायेंगी और हमलोगों को वर्षभर अच्छे डाके नहीं मिलेंगे।’’

जंगल में दूसरा व्यक्ति इतनी शीघ्रता से कहाँ से मिलता? जड़भरत वहाँ पागलों की तरह टहल रहे थे। उन्हें पकड़कर बलि के लिए लाया गया। जड़भरत से देवी को प्रणाम करने को कहा गया पर वे शान्त रहे। एक डकैत ने बलपूर्वक जड़भरत का गर्दन झुकाया। सरदार ने शराब पीकर खड्ग उठाया। देवी की मूर्ति जहाँ थी, वहाँ से लपटें उठने लगी। लपटों में से एक पुतला निकला, सरदार से तलवार छीन ली, सातों डकैतों को काट डाला। जड़भरत ने जब सन्नाटा देखा तो सिर उठाया, देखा सातों मरे पड़े थे। वह अपनी उसी शान्त मुद्रा में आगे बढ़ गये।

कुछ दिनों पश्चात् महाराजा रहूगण गुरु की खोज में निकले। उनकी पालकी उसी जंगल से होकर जा रही थी जहाँ जड़भरत भजन कर रहे थे। जंगल में पालकी ढोनेवाला एक कहार बीमार पड़ गया। राजा ने कहा– ‘‘कोई दूसरा कहार ढूँढ़ो।’’ जंगल में दूसरा कहार कहाँ मिलता! उनलोगों ने जड़भरत को पकड़ा और पालकी ढोने के लिए लगा दिया।

जड़भरत ठहरे सन्त! जहाँ चींटियाँ दिखाई दीं वह कभी दायें, कभी बायें पैर रखते, कभी उछल पड़ते। पालकी में झटका लगने से राजा झल्लाया– ‘‘कैसे चलते हो? हमको झटका लग रहा है।’’ तीन कहारों ने कहा– ‘‘राजा साहब! हमलोग तो कदम मिलाकर चल रहे हैं किन्तु यह जो नया कहार है इसे हमलोग बहुत समझा रहे हैं कि सीना तानकर चलो, कदम मिलाकर चलो, बोली बोलकर चलो किन्तु यह गँवार सुनता ही नहीं।’’ राजा ने पालकी रोकवा दी, उतर पड़ा और जड़भरत के सामने खड़ा होकर बोला– ‘‘तुम दुबले-पतले भी नहीं हो! क्या भार अधिक है या तुमसे रास्ता चला नहीं जाता?’’

जड़भरत जीवन में पहली बार बोले– ‘‘राजन्! दुबला या मोटा वह होता है जिसे देहाध्यास होता है। इसी तरह भार ढोने और रास्ता चलने का हाल वह जानता है जिसके कन्धों पर भार है। तू क्या जाने! तू तो ऊपर बैठा है।’’ रहूगण ने सोचा– ‘गुरु की तलाश में निकला था, कहीं गुरु मिल तो नहीं गये।’ उन्होंने साष्टांग दण्डवत् कर पूछा– ‘‘प्रभो! जीव का कल्याण कैसे हो?’’ भरत ने कहा– ‘‘एक परमात्मा के चरण-कमलों में प्रीति! अन्य कोई रास्ता नहीं है।’’ राजा ने कहा– ‘‘एक परमात्मा में प्रीति कैसे जागृत करें?’’ महात्मा भरत ने कहा– ‘‘राजन्! किसी तत्त्वदर्शी महापुरुष के चरणों की धूलि में लोटे बिना वह भजन जागृत ही नहीं होता।’’ राजा ने अनेक देवालय बनवा रखे थे। कहीं युद्ध के देवता, कहीं धन की देवी, कहीं विद्या के देवता– तमाम मन्दिर बनवाये थे। उसने पूछा– ‘‘भगवन्! ये देवी और देवता?’’

जड़भरत ने कहा– राजन्! ये देवी-देवता बटेर की तरह बुज़दिल, कौवे की तरह भला-बुरा सब खा लेनेवाले, उल्लू की तरह अचेत आत्माओं की हत्या करनेवाले, बगुले के समान बाहर से साफ-सुथरे लेकिन भीतर से घात लगानेवाले– ये सब जिस परमात्मा के सेवक हैं, उनका भजन करो।’’ भाइयों को वास्तविकता की जानकारी हुई तो सबने जड़भरत से क्षमा माँगी कि सन्त लोग जब इतना छुपकर रहेंगे तो हम अभागे अन्धे कैसे पहचान पायेंगे? यही है कि ‘केउ मस्त होइ बउराइ गवा सब समझेनि की पगला होइगा।’ उन सगे विद्वान भाइयों ने नहीं पहचाना, जड़भरत को धक्का देकर निकाल दिया। रहूगण यद्यपि नरेश थे, उन्होंने भी पहले उन्हें पागल ही समझा। भगवान जब परिचय देते हैं तब समझ में आता है और इन्हीं पागलों में से केउ कुम्मे इज्नी कहि दिहलेसि मुअल मनई जिन्दा होइगा।’– किसी ने कह दिया कि मेरे नाम से उठ तो मरा आदमी भी जिन्दा हो गया।

अरब में एक सन्त हुए हैं शम्स तवरेज। वहाँ के बादशाह का एकमात्र पुत्र मर गया। वह हाय-हाय करने लगा– ‘‘मेरा तो चिराग गुल हो गया! मेरे बाद कौन है?’’ एक सिपाही बोला, ‘‘हुजूर! किले के पीछे एक फकीर रहते हैं। वह चाहें तो यह जीवित हो सकता है।’’ बादशाह ने कहा, ‘‘उन्हें बुलाओ।’’ सिपाही ने कहा, ‘‘उन्हें बुलाना उचित न होगा। उनसे प्रार्थना कीजिए।’’ बादशाह गया। वह बोले, ‘‘भाई! मैं तो केवल मालिक का नाम लेता हूँ, अन्य कुछ भी नहीं जानता हूँ।’’ बादशाह ने अनुनय-विनय किया कि चलकर उसे देख लें। तवरेज आये। उन्होंने कहा– ‘‘उठ! अल्लाह के नाम से उठ।’’ लाश में कोई हरकत नहीं हुई। खुदा के नाम से, परवरदिगार के नाम से…..; जितने नाम याद थे सब बोल दिया। कहा– ‘‘रहम कर, तू तो रहम करनेवाला है।’’ किन्तु कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। तवरेज जाने लगे तो बादशाह उनके पैरों पर गिर पड़ा, ‘‘भगवन्! कुछ तो कृपा करें।’’ तवरेज ने कहा, ‘‘भाई! सब नाम तो हमने पुकार लिये, यह नहीं उठा तो मैं क्या करूँ?’’ बादशाह पुन: गिड़गिड़ाने लगा तो फकीर ने कहा, ‘‘उठ! मेरे ही नाम से उठ।’’ लड़के के शरीर में हरकत होने लगी। बादशाह को मानो अपना प्राण ही मिल गया।

वस्तुत: सन्त या फकीर में अपनी कोई शक्ति नहीं होती। तवरेज अभेद स्थिति अनलहक की अवस्था पार कर चुके थे– देखते देखते क्या से क्या हो गया, गर खुदी गुम हुई तो खुदा हो गया।’ भगवान ऐसे सन्त का मान रख देते हैं। किन्तु मौलवी लोगों ने हाय-तौबा मचाया कि इसने मुर्दे को अपने नाम से उठाया, अल्लाह के नाम से नहीं। यह तो काफिर है। इसकी खाल खींच लो। वह महापुरुष पकड़े गये। उन्होंने स्वयं अपनी थोड़ी-सी खाल उतार दी कि इस पर कोड़े लगाओ और आगे बढ़ गये।

धर्माधिकारियों ने आदेश दिया कि इसे कोई खाना न दे, कोई पानी न दे; फिर भी श्रद्धालु लुक-छिपकर कुछ-न-कुछ खिला-पिला देते थे। एक दिन किसी ने उन्हें थोड़े चने दे दिये। वह भड़भूजे के पास जाकर बोले, ‘‘भाई! बुढ़ौती के दाँत हैं, थोड़ा चना भून देते।’’ उसने कहा, ‘‘साईं! हम भून तो देते लेकिन ये सिपाही हमें फाँसी दे देंगे।’’ तवरेज ने सूरज की ओर देखकर कहा, ‘‘यार! तू ही कुछ मदद कर! यह चने नरम हो जाते।’’ कहते हैं सूरज नीचे आने लगा, गर्मी बहुत बढ़ने लगी, हाहाकार मच गया। सब उनके चरणों में गिरे कि दया करें! क्या सबको मार ही डालेंगे? तवरेज शान्त हो गये। इसी घटना से लोग उन्हें शम्स तवरेज कहने लगे। इन्हीं महात्मा की ओर संकेत है कि केउ कुम्मे इज्नी कहि दिहलेसि’– किसी के मुँह से निकल ही गया, मुअल मनई जिन्दा होइगा’। हमारे गुरु महाराज के जीवन में भी ऐसी बहुत-सी घटनायें हैं जिनका वर्णन ‘जीवनादर्श एवं आत्मानुभूति’ साहित्य में है।

जे भूलभुलैया में भूलल का देखेसि माया देखेसि।

सन्तों ने सांसारिक विकास-प्रकाश को भूलभुलैया कहा है। भूलभुलैया उस इमारत को कहते हैं जिसमें इतने अधिक दरवाजे और रास्ते होते हैं कि व्यक्ति उस इमारत से बाहर निकल नहीं पाते। गृहत्याग कर संतवेष धारण करनेवाले भी इस चकाचौंध में उलझ जाते हैं। आरम्भिक चार दिनों तक तो वे आँखें मूँदते हैं, फिर पर्ची फाड़कर चन्दा वसूलने, मन्दिर बनवाने, परमात्मा की पाठशाला खोलने या आश्रम-निर्माण कराने में लग जाते हैं। यह सब भूलभुलैया है। भजनानन्दी को इनकी जरूरत ही नहीं होती– करतल भिक्षा तरुतल वासं, गोविन्दं भज मूढमते।’ इससे हटकर यदि वह भूलभुलैया में भूल गया तो उसने क्या पाया? घूम-फिरकर उसने माया ही तो देखा; उसकी दशा सोचनीय है।

जेकरे पर सरिअत खुनसाइल जिउ दइकै अम्मर होइगा।

आकाश के ऊपर लाग घूमै दूनौ बाजू में पर होइगा।।

सोच रहल मिट गइल खुदी तब मनई दूसर होइगा।

सबके लखै लखि परे लामकां पर ओकर घर होइगा।।

तीनहूँ लोक चौदहों भुवन बैकुण्ठ दरइँ बैठा देखेसि।

मय पीकर……।।

शरीअत अर्थात् धर्म के नाम पर व्यवस्थाकारों का कानून! कट्टर म़जहबी व्याख्याकार इसमें तनिक भी परिवर्तन स्वीकार नहीं करते। यह आवश्यक नहीं कि किन्हीं परिस्थितियों के लिए बनायी गयी व्यवस्था हर परिस्थिति में उपयोगी हो। तलाक के शाहबानो प्रकरण पर भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने उसे गुजारा पाने का हकदार बताया। भारत के बहुत से संगठनों ने मानवता की दृष्टि से इसे उचित भी बताया किन्तु धार्मिक नेता हाय-हाय करने लगे कि धार्मिक व्यवस्था में किसी अन्य का हस्तक्षेप उन्हें स्वीकार नहीं है। उसे गुजारा नहीं मिल पाया। यह है शरीअत! शरीअत ने सन्त ज्ञानेश्वर के माता-पिता को जलसमाधि लेने पर विवश कर दिया।

सन्त ज्ञानेश्वर के ब्राह्मण पिता मोरोपन्त ने संन्यास ले लिया था। एक माह पश्चात् गुरु की आज्ञा से वह पुन: घर आ गये। व्यवस्थाकारों ने अधर्म-अधर्म कहकर उन्हें जाति से च्युत कर दिया, उनके बच्चों को चाण्डाल कहकर उनका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं होने दिया। जो संन्यासी रहकर घर आ गया वह चाण्डाल, उसके लड़के चाण्डाल! मोरोपन्त ने धर्माचार्यों से प्रार्थना की कि किसी प्रकार उनके बच्चों को ब्राह्मण बना लिया जाय। धर्माचार्यों ने निर्णय दिया कि यदि मोरोपन्त देहान्त-प्रायश्चित कर लें तो उनके बच्चों को ब्राह्मण बनाया जा सकता है। सपत्नीक मोरोपन्त ने जलसमाधि ले ली; फिर भी बच्चों को ब्राह्मण नहीं माना गया। यह थी शरीअत!

पण्डितों ने घोषणा कर दिया कि उन बच्चों को कोई भिक्षा न दे; किन्तु सन्तों की भिक्षा का प्रबन्ध तो भगवान करते हैं। वही बच्चे निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर, सोपानदेव और मुक्ताबाई महाराष्ट्र के प्रसिद्ध सन्त हुए। संत ज्ञानेश्वर ने ‘ज्ञानेश्वरी गीता’ लिखी। आज महाराष्ट्र में कोई तीर्थस्थल है तो संत ज्ञानेश्वर की समाधि! जबकि शरीअत उनसे नाराज थी। संत एकनाथ को जाति से च्युत कर दिया गया। स्वामी दयानन्द सरस्वती को पाँच बार जहर दिया गया। गोस्वामी तुलसीदास जब तक जीवित रहे, इन व्यवस्थाकारों ने उन्हें चैन से रहने नहीं दिया। उनकी रामायण यमुना में डुबो दी गयी। उनके भक्त टोडरमल के पास एक प्रति थी इसलिए श्रीरामचरितमानस उपलब्ध हो सका है। जिसने डुबाया वह ब्राह्मण ही थे। उनके शत्रु थे तो उन्हीं के भाई ब्राह्मण! उनका मानना था कि ग्रन्थ संस्कृत भाषा में होना चाहिए। यह ग्राम्य भाषा में है गलत है, अधर्म है। आज उसी रामायण की चार चौपाई कोई याद कर लेता है तो व्यास जी कहलाता है, कितने लोगों की जीविका चल रही है; परन्तु उसी के रचनाकार से शरीअत खुनसाइल’ थी।

ईसा को शूली पर चढ़ा दिया गया। शूली पर चढ़ाये जाने के पश्चात् भी उनकी महिमा कम नहीं है। तीन अरब से भी अधिक लोग उनके अनुयायी हैं जो उन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं जबकि शरीअत उन पर भी खुनसाइल ही थी।

यूनान में एक अच्छे सन्त हुए हैं– सुकरात। उन्होंने जनता को उपदेश दिया कि देवी-देवताओं को बलि चढ़ाने की अपेक्षा मनुष्य के सत्कर्म अधिक उपयोगी हैं। उन पर समाज को बहकाने और अव्यवस्था फैलाने का आरोप लगाया गया। शरीअत उनसे नाराज हो गयी। उन्हें मृत्युदण्ड दिया गया। सुकरात ने अपने ऊपर लगाये गये आरोपों का खण्डन किया और बताया कि उनके मृत्युदण्ड का कारण है अधिकारियों का अविवेक। दूसरा कारण है अपार बढ़ता हुआ उनका समर्थन और अपार बढ़ता हुआ विरोध।

उस जमाने में मृत्युदण्ड के लिए जहर पीसकर पिलाया जाता था। जब जहर पीसा जा रहा था सुकरात ने अपने शिष्यों को बुलाया, उन्हें एक घण्टा उपदेश दिया कि ‘इनकी सजा से मैं जा रहा हूँ’– ऐसी बात नहीं है, मेरा समय आ गया है इसलिए जा रहा हूँ। सत्य वही है जो मैं तुम्हें सिखाता रहा हूँ। तुम सब उसका भली प्रकार पालन करना। ये अधिकारी बेचारे अबोध हैं, एक जाल में फँसे हैं इसलिए ऐसा कर रहे हैं। मेरे पास जो ज्ञान है गीता की देन है।

कहा जाता है कि सिकन्दर जब भारत आने लगा तो उसके गुरु अरस्तू ने कहा था कि भारत में ज्ञानी गुरु के दर्शन करके आना, गीता लेकर आना। जरा मैं भी देखूँ कैसी है, क्योंकि गुरुजी (सुकरात) ने देखी थी।

आज भी यूरोप में कोई अच्छे महापुरुष हैं तो सुकरात! इसलिए जेकरे पर शरीअत खुनसाइल’– ये धार्मिक कानून का शिकंजा जहाँ जिस पर कसा, वह जिउ दइकै अम्मर होइगा’– उसने नश्वर शरीर का कलेवर, यह वस्त्र तो बदल दिया लेकिन वस्त्र बदलने के बाद वे अमर हैं। आज भी उन्हीं के पीछे जनसमूह है। उन्हीं के स्वरूप से सबको प्रेरणा मिलती है। ऐसा महापुरुष,

आकाश के ऊपर लाग घूमै दूनौ बाजू में पर होइगा।

एक तो आकाश बाहर है– यह शून्य; दूसरा आपके हृदय में है जिसे चिदाकाश कहते हैं। ऐसा महापुरुष सबके अन्त:करण में, चिदाकाश में उड़ने लगता है, प्रेरक के रूप में प्रसारित होने लगता है मानो उसके दोनों हाथों में पर उग आये हों।

सोच रहल’– वह महापुरुष अब निश्चिन्त है। उसे अब कोई फिक्र नहीं। मिट गइल खुदी’– उसका अहम् मिट गया और उसमें भगवान का स्वरूप प्रसारित हो गया, उसका स्वरूप ही शेष रह गया। तब मनई दूसर होइगा’– अब वह दूसरा ही आदमी हो गया। क्या विशेषता आ गयी उसमें? सबके लखै’– वह सबको देख रहा है कि कौन क्या है और लखि परे’– वह महापुरुष लोगों की समझ से परे है। लोग तो यही सोचते हैं कि खाते-पीते, उठते-बैठते यह महापुरुष हमारे-जैसे ही तो हैं।

पूज्य गुरु महाराज के निवासकाल में अनुसुइया आश्रम के चतुर्दिक घनघोर जंगल था। दस-पन्द्रह किलोमीटर पर गाँव थे। बड़े सवेरे पैदल चलकर आने में दर्शनार्थियों को नौ-दस बज जाते थे। नौ से दो बजे के बीच ही दर्शनार्थी आया करते थे। बीच में कभी-कभी सन्त महात्मा भी आया करते थे। महाराज जी को उनके आने का पूर्वाभास होने लगता था। किसी-किसी के लिये वह कहते– ‘‘हूँ! आ रहे हैं। ससुराल से कूँड़ा लेकर आवत हैं। अब इन्हें खाने को दो, बैठने को दो, पीने को गाँजा दो। हर दे हरवाह दे, खोदे का पैना दे!’’

हमलोग सोचते कि गुरु महाराज किसके लिए कह रहे हैं; क्योंकि वहाँ दूसरा कोई दिखाई नहीं दे रहा था और आप भुनभुनाते जा रहे थे। इतने में दूर कोई आता दिखायी पड़ता। सौ-पचास मीटर दूरी रह जाय, महाराज उस साधुवेशधारी पर बिगड़ पड़ें– ‘‘क्यों? अब तक तो हर जोता, धान की रोपाई किया! अब जटा खोलकर, फटी कमरी बगल में दबाकर, चिमटा हाथ में लेकर साधु बनकर चले आये। बिना किराये के घूम रहे हो। यह लोक तो नष्ट है ही, वह भी नष्ट कर रहे हो। अरे! होना ही है तो सच्चा पाठ करैका चाही। जाओ सचो का हो जाओ, नशेवाले हो जाओ।’’ उनमें से जो समझदार होते वह आकर महाराज जी को दण्डवत् करते। जब वह प्रणाम कर ले तब महाराज जी उसके खाने-पीने, बैठने-लेटने की सारी व्यवस्था करते और साधन भी बताते थे। यदि कोई वेषधारी तुनककर चला जाय तो महाराज जी उसे भी सुनाते थे– ‘‘जाओ, जाओ! नाराज होकर क्या पाओगे? क्या हमारे बिटिया का विवाह बिगड़ जाई?’’

हमने महाराज जी से अनुरोध किया कि इनको दो रोटी के लिये क्यों झिड़क दिया जाता है? महाराज जी ने कहा, ‘‘तैं न जनिहे! कुपात्र को दान देने से दाता नष्ट हो जाता है। जब वह यहाँ आ ही गया तो कम-से-कम यहाँ तो उसका ढोंग छूट जाना चाहिए। कुछ तो उपदेश कहूँ तो मिले बिचारे को!’’

कभी-कभी महाराज जी कहते, ‘‘आज भोजन कुछ बढ़ाकर बना लेना। कोई अच्छे महात्मा आ रहे हैं। ध्यान देना, कहीं निकल न जायँ। रोज चार-छ: आदमियों का भोजन बनता तो उस दिन सात लोगों का बन जाता था। इतने में कोई-न-कोई सन्त पहुँच जायँ। गुरु महाराज कहते थे, ‘‘देख, वे खड़े हैं। जाकर लिवा आ।’’ वह आयें तो सचमुच के महात्मा निकलें। हमलोग उनकी सेवा करते, उन्हें विधिवत् बैठाकर खिलाते, उनसे चार वाणी उपदेश भी सुनने को मिलता।

यही है सबके लखै’– कौन कितने पानी में है? कैसा संस्कार लेकर आ रहा है? और लखि परै’– लोगों की निगाह में उनका महापुरुषत्व नहीं आता था। लोग तो इतना ही देखते-जानते थे कि एक महात्मा बैठे हैं।

लामकां पर ओकर घर होइगा’– लामकान अर्थात् मकानों से परे, बहुत ऊपर; सच पूछो तो परमात्मा ही उसका घर हो गया। गीता में है–

उपद्रष्टानुमन्ता भर्ता भोक्ता महेश्वर:

परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुष: पर:।। (गीता, १३/२२)

भगवान रहता कहाँ है? गीता अध्याय अठारह में है कि अर्जुन! ईश्वर सम्पूर्ण भूतप्राणियों के हृदय-देश में निवास करता है। आरम्भ में भगवान उपद्रष्टा’– उप माने समीप; बहुत समीप द्रष्टा के रूप में है। लाइट जल रही है; उसके आलोक में आप भागवत पढ़ो या कसाईखाना खोल दो, वह आपको मना नहीं करेगी। उसका काम है केवल प्रकाश देना। वह न तो आपके शुभ कर्मों का भागीदार है न अशुभ कर्मों के लिये उत्तरदायी है। जहाँ किसी ने श्रद्धा से एक परमात्मा को शिर झुकाया तो अनुमन्ता’– भगवान अनुमति देने लग जाते हैं कि यह करो और यह न करो। यदि आपने आज्ञा का पालन नहीं किया तो ठोकर खायेंगे।

इससे अवस्था जहाँ उन्नत हुई, तो भर्ता’– वही परमात्मा आपका भरण-पोषण करने लग जाता है, वही करता है जिसमें आपका कल्याण है। योगक्षेमं वहाम्यहम्’– वह योग के सुरक्षा की व्यवस्था अपने हाथ में ले लेता है। फिर तो साधक चाहे कि हम पतित हो जायँ, नहीं हो सकता, भगवान उसे होने ही नहीं देंगे। जिसमें आपका शाश्वत हित है वही व्यवस्था देंगे और उससे उन्नत होने पर भोक्ता’ बन जाते हैं। साधक द्वारा जो कुछ पार लग गया; यज्ञ, तप, भजन, संयम– उसको वे स्वीकार कर लेते हैं। अंत में परमात्मेति चाप्युक्तो’– उस साधक में अपना स्वरूप प्रसारित कर देते हैं, साधक परम से संयुक्त आत्मावाला हो जाता है। यही है लामकां पर ओकर घर होइगा’– भगवान ही उसका निवास-स्थान हो गया। और फिर उस महापुरुष की रहनी कैसी होती है?–

तीनहूँ लोक चौदहों भुवन बैकुण्ठ दरइँ बैठा देखेसि।

तीन लोक और चौदहों भुवन परमधाम परमात्मा को वह अपने हृदय में ही प्राप्त करता है। जब कभी किसी ने पाया है हृदय-देश में ही पाया है, बाहर भटककर नहीं। फिर उसे बैकुण्ठ के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता।

सब घट मेरा साँइयाँ, सूनी सेज कोय।

बलिहारी घट तासु की, जा घट परगट होय।।

सबके हृदय में भगवान प्रसारित हैं, एक भी हृदय उनसे खाली नहीं है किन्तु उस घट के ऊपर मैं अपने को बलि चढ़ाता हूँ जा घट परगट होय’– जिस घट में वे प्रगट हो गये हों, जागृत हो गये हों।

भजन एक नशा है। इसे इस तरीके से पियो– जड़भरत की तरह, मीरा की तरह, सुतीक्ष्ण की तरह, सन्त मंसूर की तरह एक नशा सवार हो जाय। मय पीकर जे बउराइ गवा, मत पूछो का देखेसि।’– यह पूछो ही मत कि उसने क्या देखा? क्योंकि जो उसने देखा वह वाणी से व्यक्त नहीं किया जा सकता। वह तो तभी समझ में आता है जब हमारे हृदय में भी प्रकट हो।

सन्त कबीर से पूछा गया कि वह नशा कैसा होता है? उन्होंने कहा– कह कबीर गूँगे की शक्कर खाय सोई पै जाने।’ गूँगा शक्कर खाता है, शिर हिलाता है, मुस्कुराता है किन्तु उसके स्वाद को व्यक्त नहीं कर सकता क्योंकि उसके पास वाणी ही नहीं है। शंकराचार्य से पूछा गया तो वह बोले– ‘अनिर्वचनीय’– उसे वाणी से समझाया नहीं जा सकता। हर महापुरुष ने एक ही निर्णय दिया है। जहाँ भी दृष्टि पड़ी वहाँ हरि का जलवा देखा। बिन गोपाल ठौर नहिं कतहूँ नरक जात धौं काहे।’ यह अवस्था सबको प्राप्त करनी होती है। इस अवस्था के लिए बहुत जन्मों तक भजन करने की आवश्यकता नहीं है बशर्ते नशा हो जाय। पिछले जन्म का रंचमात्र भी संस्कार नहीं है किन्तु नशा सवार हो जाय; प्रण करके, हठ करके लग भर जायँ तो इस जन्म में भी प्राप्ति हो सकती है। यह नशा, यह प्राप्ति जब कभी किसी को मिली है तो जीते जी मिली है।

मुये मुक्ति गुरु कहे स्वार्थी झूठा दे विश्वासा।

यदि कोई गुरु कहता है कि मरने के बाद मुक्ति मिलेगी, इसी तरह आँख मूँदते रहो– लगता है गुरुजी का कोई स्वार्थ छिपा है। यह स्थिति जब भी मिलेगी, जीते जी मिलेगी; क्योंकि–

जीअत मन बस हुआ नहीं तो पुनि देवे बहु त्रासा।

जहँ आशा तहँ बासा मन का यही तमाशा।।

यदि जीते जी मन वश में नहीं हुआ तो मन में संचित संस्कारों के अनुसार जन्म मिलेगा, जैसी आशायें वैसा निवास मिलेगा। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अन्तकाल में जो जिसका स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है प्राय: उसी योनि को प्राप्त होता है और जो मेरा स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है वह मेरे सहज स्वरूप को प्राप्त होता है जहाँ से लौटकर आवागमन में नहीं आता। तब तो बड़ा सस्ता सौदा है। जीवनभर काला-सफेद करते रहें, जब मरने लगेंगे भगवान का स्मरण कर लेंगे। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं– अर्जुन! ऐसा हो नहीं सकता। सदा तद्भाव भाविता’– प्राय: वही चिन्तन कण्ठ पर बैठ जाता है जिसका जीवन में अधिक प्रयोग किया है। मरते समय स्मृति भ्रमित रहती है, बुद्धि विकल रहती है, उस समय हम-आप कोई नवीन स्मरण कर ही नहीं सकते तो कर कहाँ से लेंगे? इसलिए अर्जुन! तू आज से ही, अब ही से निरन्तर मेरा चिन्तन कर और युद्ध कर। निरन्तर चिन्तन और युद्ध एक साथ कैसे संभव है?

हो सकता है कि ‘जय कन्हैयालाल की’ कहते रहें और बाण चलाते रहे। इस पर भगवान कहते हैं– अर्जुन! उसका एक नियम है कि योग की विधि को जानकर वैराग्य में स्थिर रहते हुए, एकान्त-देश का सेवन करते हुए, सिवाय मेरे अन्य किसी विषयवस्तु का न स्मरण करते हुए निरन्तर चिन्तन कर और युद्ध कर। एकान्त-देश का सेवन! हमें छोड़कर कोई है भी नहीं, आँखें भी बन्द हैं, वहाँ पर भला हम किससे लड़ाई करेंगे? वास्तव में भजन एक युद्ध है। यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ की लड़ाई है, प्रकृति और पुरुष के बीच का संघर्ष है। जब हम शान्त-एकान्त में भजन करने बैठते हैं कि सिवाय आराध्य के और कोई स्वरूप नहीं देखूँगा, अन्य कुछ भी नहीं सोचूँगा, उस समय मायिक प्रवृत्तियाँ बाधा के रूप में आती हैं, क्राम-क्रोध-लोभ-मोह की योजनाएँ प्रसारित होने लगती हैं। शरीर बेशक बैठा है किन्तु मन, जिसे भजन करना चाहिए, हवा से बातें कर रहा होता है। इन मायिक प्रवृत्तियों को काटना युद्ध है, यह अन्त:करण की लड़ाई है। इस युद्ध के शुरू हो जाने पर ही नशेवाले भजन का स्तर आता है।

एक सेठ जी मरणासन्न थे। उन्होंने कहा– लगता है अन्तिम समय है, मेरी बिटिया को बुलाओ। बेटी आई तो बोले– जरा नाती का हाथ पकड़ा दो। उनके एक सुपुत्र बड़े धार्मिक थे। उन्होंने कहा– पिताजी! आप हमारी चिन्ता न करें। अब आप भगवान का नाम लें लेकिन उस सेठ को भगवान का कोई नाम याद ही नहीं आता था। इतने में चारपाई पर पड़े-पड़े उसकी निगाह आँगन की ओर पड़ी, जहाँ बछड़ा झाड़ू चबा रहा था।

सारी ताकत लगाकर सेठ बोला– ब….झा….। सत्संगी लड़का यह सुनकर बोला– अब पिताजी भगवान का सुमिरन ‘वासुदेव, वासुदेव’ कर रहे हैं। यह जरूर वहाँ जायेंगे जहाँ दशरथ जी पहुँचे थे। बड़ावाला लड़का थोड़ा मायावी था। उसने कहा– नहीं, उन्होंने कहा ब झा। हमें शंका थी– कहीं दो-तीन लाख छुपाकर रखा है। बाबूजी उसे बताना चाहते हैं। ब से कोई वसीयत भी हो सकती है। वह डॉक्टर के पास दौड़ा– डॉ० साहब! हमारे पिताजी कोई खास बात बताना चाहते हैं। आप ऐसा इंजेक्शन लगा दें जिससे उन्हें थोड़ी ताकत आ जाय। डॉक्टर ने कहा– थोड़ी देर के लिए ताकत आ सकती है किन्तु इंजेक्शन जरा महँगा है। एक हजार रुपये लगेंगे।

उस लड़के को यह धनराशि बड़ी सस्ती प्रतीत हुई। लाखों का मामला जो था। इंजेक्शन की गर्मी चढ़ते ही सेठ बोले, ‘‘अरे! बछवा झाड़ू चबा रहा है। हमारे बाद हमारी इज्जत-प्रतिष्ठा का क्या होगा? इसी तरह नुकसान होता रहा तो तुमलोग खाये बिना मर जाओगे।’’ जहाँ सूई की गर्मी कम हुई वह ठण्डे हो गये।

इस प्रकार जीवनभर काला-सफेद करते रहे तो मरते समय भगवान का स्मरण कैसे कर लोगे? वही स्मरण बरबस कण्ठ पर आकर बैठ जाता है जिसका जीवन में अधिक प्रयोग किया है। इसलिए आज से ही, अभी से एक ईश्वर के प्रति समर्पण के साथ दो-ढाई अक्षर के नाम का सुमिरन आरम्भ करें, कल तो कभी आता ही नहीं। यही सुमिरन करते-करते एक दिन नाम का नशा चढ़ जायेगा।

!! श्रीसद्गुरुदेव भगवान की जय !!

(अमृतवाणी भाग-3’ से उद्धृत)

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